Monday, 17 August 2020

ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी कितनी ज़रूरी।



हज, बक़रा ईद और क़ुर्बानी।

इस्लाम में दो ईद है यानी दो त्योहार। ईद के मायने बार बार लौट के आने वाले दिन से है।  इन दोनों ईदों से दो बड़ी इबादतें जुड़ी हुई है और दो वाकियात भी। ईदुल फितर से इबादतन रोज़े और ईदुल अज़हा से हज का ताल्लुक़ है। ये दोनों त्यौहार, क़ुरान और दीन से 2 तरह से जुड़े हुए है।  जिस महीने पहली बार क़ुरान नाज़िल हुआ, उस महीने में रोज़े रखे जाते है और उसके आखिर में अगले दिन खुशी के तौर पर ईद उल फितर मानयी जाती है।  जिस दिन की क़ुरान की आखिरी आयात नाज़िल हुई कि आज दीन मुक़म्मल हो गया, उसके अगले, दिन खुशी के तौर पर ईद उल अज़हा मानयी जाती है।  ईदुल अज़हा की क़ुर्बानी का ताल्लुक हज़रत इब्राहीम से भी है। इस मौज़ू पर बात शुरू करने से पहले हज, उमराह, हज़रत इब्राहिम अलैह के वाक़ये पर एक नज़र डालना बेहद ज़ुरूरी है।


हज और उमराह।

 
हम अपने मालिक को देख नहीं सकते, न मिल सकते है, तो कोई उससे अपने जुड़ाव, लगाव, ताल्लुक, जज़्बात और एहसास बताना चाहता है जो वो बोल कर भी करता है और अलामतों से भी। जैसे मां बाप, रिश्तेदारों, दोस्तों, मुल्क, क़ौम या माशरे से इज़हार करते है। जैसे अपने मुल्क के एम्ब्लम, तराना, झण्डा, सलाम, आजादी दिवस के जरिए उससे मुहब्बत का अलमाती इजहार करते है। जैसे किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते है, या अदब में  खड़े हो जाते है या उसके सामने सिर झुका कर या हाथ बांध कर खड़े हो जाते है। जैसे किसी अज़ीज़ से मिलने पर हाथ मिलाते है, गले मिलते है, माथा चूमते है, उसी तरह।  
 
जिस तरह किसी बेटे को अपने फौत हुए बाप की चीज़े उसे बाप की याद तो दिलाएंगी पर बेटे को जो लगाव और याद, बाप के उस पुश्तेनी, ख़ानदानी घर में जाके आयगी, वैसी और कंही नही आएगी। उसी तरह हमारी मस्जिदो में नमाज़ में अल्लाह की याद तो है पर उस घर में जो शुरू से ही अल्लाह के लिए मख़सूस किया हुआ है वंहा का आलम ही अलग है।  उन रासुमात के दोहराना की वजह उन कैफियात को महसूस करना जो हज़रत इब्राहीम से जुड़ी हुई है। मशहूर आर्कियोलॉजिस्ट के.के. मुहम्मद कहते है कि जब भी वो आगरा के किले की पगडंडियों, रास्तों पर चलते है तो उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वो बादशाह अकबर के साथ चल रहे है और इस बात पर फ़र्क़ होता है कि इन्ही रास्तों पर कभी अकबर महान चला करता था। यही कैफियत रसुमात (हज की) के अदा करने में होती है। ये रासुमात असल मे एक ज़हनी तजुर्बा है जो अपनी अक़ीदत का इज़हार करती है। 
 

इबादत अपने मालिक से मुहब्बत, जुड़ाव का अलामती इजहार यानि सिम्बालिक एक्स्प्रेशन है। इबादत की तीन बुनियाद है, परसतीश (जो नमाज़ है), ईतात (जो रोजा है) और जान माल को नजर करना (जो हज है)। इसलिए हज सबसे बड़ी इबादत है क्योंकि इसमें तीनों लगते है और हर कोई नहीं कर सकता। जो हज की इबादत नहीं कर सकते (क्योंकि पैसे, ताकत, हुजूम के साथ होता है, खास दिन लगते हैं), इसलिए उनके लिए उमरे की सहूलियत दे दी गई। इसी को करने के लिए एक दिन मुक्करर कर दिया और कह दिया की कुर्बानी तक  नाखून-बाल न काटों और  कुर्बानी न करो या जानवर न हो तो भी यह नजर की कुर्बानी पूरी कर सकते हो (जो मुस्तहब है)। दस दिन तक आप इसी नजर की ईबादत के असर में रहते है फिर बाल तरशवा लेते है।
 
क्योंकि अल्लाह से मिल तो सकते नही तो उसकी कमी हज (फर्ज) या उमराह (नफ़ील) पूरी करता है। हज और उमराह असल में जानों माल की नज़र है। हज खुदा से ताल्लुक के इज़हार है हज एक अलामती इज़हार है की हम शैतान के खिलाफ जान भी देने को तैयार है। हज के मायने है क़सद यानी ये नज़र का क़सद। उमराह के मायने है आबाद करना क्योंकि बार बार जाने पर कोई जगह आबाद हो जाती है। हज लगभग 5 दिन और उमराह ज़्यादा से ज़्यादा 2 घंटे चलता है। उसकी बारगाह में हिजाब और निक़ाब नहीं होता है।  जैसे नमाज़ में कुछ पढ़ना, रुकु, सजदा वगेरह सब अलामती इजहार है। जैसे रोज़े में अपने जिस्म या वजूद पर पाबंदी लगा कर दिखाते है। इसी तरह उसके लिए माल और जान देने को सिम्बलाइज़ कुर्बानी से किया गया है। 
 
 
हज के दौरान हम हजरे अस्वद को अल्लाह को हाथ मानकर बोसा देते और अहद करते है। सर मुड़वाने के पीछे की वजह ये है कि क़दीम ज़माने में ग़ुलाम बनाते हुए ग़ुलाम का सर मुंडवाया जाता है ताकि लोग समझ लें कि यह ग़ुलाम बना लिया गया है। वहीं से ये रिवाज चालू है, यह इज़हार करने के लिए की फला शख्स ग़ुलाम हो गया है। इसलिए हज उमराह में सर मुंडवाना दरअसल अल्लाह के ग़ुलाम होने का इज़हार है। बाईबिल में भी लिखा है कि ईमान वाला सर के बाल और नाखून काटता है। अहराम कफन की हालत का इज़हार करता है कि अब दुनिया से नाता टूट गया है।

 
हज के लिए 3 महीने मुकरर किए है ताकि आना जाने का सफर हो सके यानि इन्हे हराम करार दे दिया है ताकि कोई जंग न हो इसमें और लोग हज कर सके। उमरे के लिए रजब का एक महिना हराम दे दिया है। ये मिल कर 4 महीने हराम हैं। हालांकि पूरे  महीने उमरे कर सकते हैं। मगर हज सिर्फ इन्ही महीनों में हो सकता है। हज की कोई किसमें नहीं होती। ये तो लोगों ने तरीक़े की बुनियाद पर किस्में बना ली है।


क़ुरबानी

क़ुरबानी एक सिंबॉलिक एक्सप्रेशन है जैसे नमाज़ परस्तिश का एक अलामती इज़हार है। क़ुरबानी नियाज़ ही है। ये एक बेहद गैर मामूली हैसियत रखती है। जैसे बादशाह को मुलाक़ात पर कुछ हीरे जवाहरात नज़र करते है ये बताने के लिए की सब कुछ आपका है, जबकि बादशाह को उनकी ज़रुरत नहीं, उसके पास पहले से बहुत है। उसी तरह एक जानवर की जान को नज़र किया जाता है अपनी जान के बदले। ये खुदा के लिए जान देने की अलामती इज़हार है। जैसे मुल्क के लिए झण्डा लहराते है अलामती तौर पर जबकि उसकी कीमत कुछ रुपये होती है। झंडे से मोहब्बत का इज़हार करने में भी पैसा, वक़्त या दोनों खर्च होते है। वैसे ही क़ुरबानी करते है अल्लाह से अकीदत की वजह से। उसमें भी पैसा और वक़्त खर्च होता है। पहले क़ुरबानी भी फ़र्ज़ होती थी। पर वक़्त के एडवांस होने को देखते हुए अल्लाह ने क़ुरबानी को नफिल कर दिया गया क्योंकि आने वाला दौर जानवरो या चरवाहों का नहीं होना था। आम हो या खास, क़ुर्बानी नफिल है।  क़ुरान साफ कहता है अल्लाह को न गोश्त पहुंचता है और न खून, सिर्फ तक़वा पहुंचता है। क़ुरबानी पूरे साल कर सकते है पर वो आम क़ुरबानी होगी जैसे अक़ीके की आम क़ुरबानी होती है। क़ुर्बानी सिर्फ चौपायों की होती है।
 

हाबिल और काबिल के दरम्यान हुआ मामला या कुरबानी, अल्लाह के रास्ते में दिया गया हदिया ही था। यानि तब से ही कुर्बानी इबादत रही है। रोज कर रहे काम यानि जाबियाह को ही एक दिन अलामती बनाया गया है। पहले कुर्बानी का गोश्त  जला दिया जाता था या आसमान से आग उतर कर उसे खा लेती थी। अब गोश्त खा सकते है। पहले कुर्बानी के जानवर पर सवारी नहीं कर सकते थे मगर अब कर सकते है और दूसरे फायदे जैसे उससे दूध ले सकते है। हज़रत इब्राहीम से पहले हज की बजाए कुरबानी के जरिए जान की नजर दी जाती थी। बैतूललह पहले भी मौजूद था। आपने इनकी बुनियाद दुबारा खड़ी करी। यानि हज होता होगा जरूर, मगर तारीख में नहीं है। कुर्बानी भी एक इबादत है। कोई भी कुरबानी फर्ज नहीं है अब, चाहे हज हो या उमरा या बकरा ईद की, ये तीनों नफील इबादत है । 


क़ुरान में क़ुर्बानी।

क़ुरान में नहर लफ्ज़ आया है जो असलन ऊंट को ज़िबह करने के लिए इस्तेमाल होता है। क़ुरान में नुसुकी लफ्ज़ भी आया है क़ुरबानी के लिए। क़ुरबानी बना है क़ुर्ब से जिसका मतलब होता है करीब आना। और ईदुल अज़हा के पसमंज़र में क़ुर्बानी का मतलब हो गया जानवर को अलामत के तौर पर ज़िबह करके अल्लाह के करीब आ जाना। यानी क़ुर्बानी से मुराद ज़िबह भी है। अज़ीहा के मतलब है ज़िबह जिससे ईदुल अज़हा बना है।  ज़िबह का मतकब आम जानवरों को कुर्बान करना है। 


सबसे अफ़ज़ल हज उसका कहा गया है जो ज़्यादा बुलुन्द आवाज़ में लब्बेक पुकारे और ज़्यादा खून बहाए मतलब ज़्यादा क़ुरबानी करें। हज और उमराह की क़ुरबानी नफिल इबादत है। असल क़ुर्बानी तो मीना में ही है। और इसीलिए सहाबा, हाजियों के साथ अपने अपने जानवर भेजते थे की हमारी क़ुरबानी वंहा जाके कर देना। पर रसूलुल्लाह ने सहाबा को अपने अपने वतन में भी क़ुरबानी करने की इजाज़त दी।  हाजी की क़ुरबानी नफिल है। उमराह तो खुद एक नफिल इबादत है तो उसकी क़ुरबानी के नफिल होने में तो कोई शुबह ही नहीं। उमराह में भी क़ुरबानी कर सकते है क्योंकि ये बात साबित है कि रसूलुल्लाह सुलह हुदैबिया के वक़्त जब उमरा करने गए थे तो कई ऊंट साथ लेके गए थे।  हज, उमराह की तरह क़ुरबानी भी नज़र की इबादतें है। इसलिए इससे पहले बाल नहीं तराशते। रसूलुल्लाह ने क़ुरबानी तक सर न मुड़वान्ने और अहराम न खोलने की मनाही की क्योंकि रसूलुल्लाह उमराह में जानवर साथ लेके गए थे इसलिए क़ुरबानी होने तक का इंतज़ार किया और अहराम तब तक नहीं खोला पर दूसरे लोगो को कहा कि जो जानवर नहीं लाये है वो अहराम खोल लें।  रसूलुल्लाह ने आखिरी हज के दौरान कहा था कि मैं भी यहीं से आकर जानवर खरीदता। आखिरी हज में रसूलुल्लाह ने 100 ऊंट कुर्बान किए थे।


आज के हाजियों की क़ुरबानी।

क़ुरान बताता है कि हज में अगर कोई (गैर हरम रिहाइश वालें) उमरा का फायदा उठाना चाहे (सिर्फ एक बार) तो उमरा भी साथ साथ करले जिसके बदले कफ़्फ़ारा में एक क़ुरबानी करनी पड़ेगी या 10 रोज़े रखने पड़ेंगे अगर क़ुरबानी की इस्तितात नहीं है. इसे ही हज्जे तमत्तो कहते है। तमत्तो के मायने है फायदा उठाना। ये जो आज मीना में क़ुरबानी है ये दरअसल कफ़्फ़ारा की ही क़ुरबानी है, हज की नहीं।
 
हज और उमरा अलग अलग है और अलग अलग ही करना चाहिए मगर एक साथ करने पर ही हज की कुर्बानी है जुर्माने के तौर पर। क़ुरान में हरम के बाहर से आने वालों के लिए दोनों को एक साथ जमा करने की सिर्फ इजाज़त अता की गई है पर सिर्फ एक बार और जिसका कफ़्फ़ारा क़ुरबानी है। अगर आप कही  घिर गए हैं और नहीं जा सकते तो अपनी कुर्बानी वहा भेज दें (जैसे की साहबा करते थे) और मजबूरी में कुर्बानी भी नहीं भेज सकते तो जिस जगह है वहीं कुर्बानी कर दीजिए (जैसा सुलह हूदेबईया के वक्त हुआ था) तो आपके मनासिक पूरे हो जाएंगे, ये मजबूरी की वजह से होगा (शायद ये औरतों के हेज के मसले मे काम करता है)। आम हालात में तवाफे ज़ियारत जरूरी है। फुकहा ने इसी पर कियास करके कहा है की किसी कमी या कोताही के बदले कुर्बानी कर दें। 


ईदुल अज़हा की क़ुर्बानी।

हज पर जाने से पहले या जब तक इस्तितात हासिल न हो तब तक यही जानों माल की नज़र का इज़हार क़ुरबानी के जरिए किया जाता है। ईदुल अज़हा के मौके पर क़ुरबानी आम नहीं है। क्यूंकि रिसालत में यह एक खास हुकुम है और इसे एक खास मुक़ाम हासिल है। जैसे रोज़ जानवर जिबह करते है बस साल में एक बार अल्लाह लिए मख़सूस कुर्बान करते है। जैसे रोज़ गोश्त काटकर खाते है पर सिर्फ एक दिन अल्लाह के लिए काट कर खाते और बांटते है। बस इतना फ़र्क़ है। ईदुल अज़हा पे खानदान या कुन्बे की तरफ से एक ही क़ुरबानी होती है, जिसका चूल्हा एक हो।  सभी क़ुरबानी नफिल होने की वजह से इसका फैसला निसाब पर नहीं किया जाता है। पर क्योंकि हनाफ़ यानी हनफ़ी फ़िक़्ह में ईदुल अज़हा की क़ुरबानी को वाजिब क़रार दिया है तो इसलिए इसके लिए वो निसाब भी मुक़र्रर किये हुए है। हालांकि रसूलुल्लाह ने रिसालत में सिर्फ इबादत के लिए दो टर्म इस्तेमाल की है, फर्ज़ और नफिल। यह तो बाद में लोगों ने रसूलुल्लाह के अमल की बुनियाद पर वाजिब, सुन्नते मुअक़्क़दा, गैर मुअक़्क़दा जैसी टर्म बना ली। वाजिब और फ़र्ज़ को इन्टररचंगेबल भी माने तो भी कुछ आलिमों ने सिर्फ हाजी पर क़ुरबानी को फ़र्ज़ बताया है। गैर हाजी पर तो कुर्बानी वाजिब भी नहीँ है। हदीस के अल्फ़ाज़ है कि ज़ुल हिज्जा का चांद देख कर 'जिस का क़ुरबानी का इरादा हो, वो बाल और नाखून न काटे'..। यानी इन लफ़्ज़ों साबीत है कि ये एक नफिल इबादत है।


हज़रत इब्राहीम की क़ुर्बानी।

वैसे तो आदम अलैह के वक़्त से क़ुरबानी का वजूद है पर इब्राहिम अलैह से इसे एक खास एहमियत हासिल हो गई। हुआ यूं कि हजरत इब्राहिम को ख्वाब आता है कि वो बेटे हज़रत इस्माइल की क़ुरबानी कर रहे है। उन्होंने सोचा कि शायद अल्लाह यही चाहता है और अपने बेटे हज़रत इस्माइल को लेके पहाड़ पर जिबह करने निकल गए। हालांकि ऐसा सिर्फ उन्हें ख्वाब में दिखा था जिसकी अलग ताबीर भी हो सकती थी यानी ऐसा करने का अल्लाह का हुक्म नहीं था, कम से कम, सीधा और साफ तो कोई हुकुम नहीं था। यंहा दो मौकीफ आम है। पहला कि हज़रत इब्राहिम ने बेटे को बता दिया था कि उन्हें कुर्बान करने जा रहे है। दूसरा यह है कि रास्ते मे बेटे को खुद ब खुद कुछ खास चीज़ों होती देख अहसास हो गया कि क्या होने जा रहा है। इसलिए उन्होंने बाप से कहा कि अगर अल्लाह को यही मंज़ूर है तो ऐसा ही कर डालिए, मेरे कदम पीछे नहीं हटेंगे। ऐन मौके से पहले अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम को रोक दिया यह कह कर कि यह ये तो बहुत बड़ा इम्तिहान हो गया, तुमने तो ख्वाब सच कर दिखाया। फिर पहाड़ पर वंही उन्हें एक मेंढा मिला जिसे उन्होंने इसके बदले अल्लाह को नज़र यानी कुर्बान कर दिया। यानी बेटे की जान के फिदिए में अल्लाह ने जानवर की क़ुरबानी क़ुबूल की। तभी से अल्लाह ने इस वाकये को यादगार बना दिया और कहा कि इसे हम आगे जारी कर देंगे। ये क़ुरबानी तब से अलामती हो गयी यानी अल्लाह के लिए अपना सब कुर्बान कर देने का अहद है। असल मे ये आपनी जान की नज़र है जो हम अल्लाह के लिए देने का अहद करते है और इसी सिलसिले में अलामत के तौर पर एक जानवर की जान की क़ुरबानी देते है।


क़ुरबानी छोड़ना।

हज़रत अबु बकर और हज़रत उमर, इस्तितात होन के बावजूद, जानबूझ कुछ साल क़ुरबानी छोड़ देते थे यह बताने के लिए की क़ुरबानी फ़र्ज़ नहीं है, जो सहीह हदीसों से साबित है। एक ताबईन थे जो एक साल ऊंट कुर्बान करते थे, दूसरे साल गांय, तीसरे साल बकरी, फिर उसके चौथे साल नागा करते थे। इसका मतलब सीधा है कि ईदुल अज़हा की क़ुरबानी फ़र्ज़ नहीं है और छोड़ी भी जा सकती है क्योंकि इसकी बहुत ताक़ीद और अहमियत है इसलिए ईदुल अज़हा की क़ुरबानी के बदले सदक़ा करना सही नहीं है यानी इसे आम हालत में छोड़नी नहीं चाहिए पर कभी कभी माल भी सदक़ा कर सकते है, बस एक वाजिब वजह की दरकार है।  इसकी दलीलें इमाम इब्ने हज़म ने अल मुहल्लाह में जिक्र किया है। जिस हदीस में आता है कि जिसने ताकत पायी और क़ुरबानी नहीं कि वो इदगाह के पास न आएं, बहुत से मुहद्दिस इसे ज़ईफ़ हदीस मानते है। और जो मुहदिस इसे क़ाबीले क़ुबूल मानते है वो भी यही मानते है कि असलन यह कहा तो तरग़ीब दिलाने के लिए ही है, न कि इसकी फ़र्ज़ीयत साबित करने के लिए। 

 
 
यहूदी और ईसाई रिवायतों में मूसा अलैहसलाम के ख़ुत्बे बताते हैं कि यहूदी लोग मस्जिदे अक़्सा में क़ुर्बानी के लिए बैल (चौपायें) ले आते थे। जिस पर अल्लाह सुबहानवताला फ़रमाते थे कि इनकी बस्तियों में ग़रीब, बेवाएँ, यतीम रोते हैं क्योंकि उन पर यही लोग ज़ुल्म ढहाते हैं और फिर यही लोग यंहा आ कर क़ुर्बानी करते हैं, कह दो इनसे की क़ुर्बानी से ज़्यादा अल्लाह को इंसाफ दरकार है, इसलिए जाओ पहले इंसाफ करो।
यानी हमें अपने अमालों को क़ुरबानी से पहले ज़रूर टटोलना चाहिए।



आम हालात।

इंसान एक नफसियाती और जज़्बाती वजूद का जिस्म है। सो हज, उमराह, क़ुरबानी भी इसके मुताबिक करने की चाह रखेगा। पर और चीज़ों का भी ख्याल रखेगा। पर सच बात ये है कि ईदुल अज़हा गरीबों में गोश्त बांटने के लिए नहीं है। मगर बाँट भी सकते है और पूरा का पूरा भी अपने पास रख सकते हैं। मक्का में कुर्बानी का पूरा गोश्त गरीबों में बाँट दिया जाता है।  कुर्बानी का असल मकसद अल्लाह का क़ुर्ब पाना या राज़ी करना है। रसूलुल्लाह से कोई हुकुम नहीं मिलता की गोश्त सारा बांट दिया जाए। पर चाहे तो पूरा बांट भी सकते हैं और चाहे तो पूरा गोश्त खुद भी खा सकते है। अल्लाह की तरफ़ से इस पर रोक नहीं है।   क्योंकि यह सदके की नहीं बल्कि नज़र की क़ुरबानी है। सदका खुद नहीं खा सकते, सदक़ा का इस्तेमाल खुद के लिए कतई नहीं कर सकते।  पर उलेमाओं ने कुछ उसूल बना के बात दिया कि बेहतर है इसका हिस्सा बाटें भी यानी खुद भी खाएं औरों को भी खिलाएं। ये बेहद बहरीन हिदायत है। कुछ उलेमा इसके गोश्त के दो हिस्से करने को और ज़्यादातर तीन हिस्से करने को कहते है। 



आज के हालात।

अगर ईदुल अज़हा पर  क़ुर्बानीयों से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल न हो रहा हो या हमारे ज़रिए किया गए अहद कच्चे और कमज़ोर साबित हो रहे हो तो क़ुरबानी सिर्फ एक कर्मकांड बन कर रह जाता है जिसका कोई बड़ा फायदा नहीं। अगर इसके ज़रिए हम में ज़रा भी बेहतरी एक बंदे के तौर पर नहीं आती है तो इतने बड़े लेवल पर ऐसी कुर्बानियां सिर्फ और सिर्फ जानवरों की जान लेना हो जाएगा। या यूं कहें है कि वैसा ही हो जाएगा जैसे हम रोज़ जानवर मार कर खाते है जिससे पेट के सिवा किसी को कुछ हासिल नहीं होता। इससे अल्लाह की ज़रा सी भी मोहब्बत हासिल न हो पाए तो ये एक कत्लेआम ही है जिस पर ऐतराज़ात उठते रहंगे, अंदर वालों के भी और बाहर वालों के भी।  जैसे नमाज से रुहानियत और रोज़ो से तक़वा हासिल न तो तो वो सिर्फ एक जिस्मानी कसरत और फाका रह जाता है। पर नमाज़ और रोज़े को फ़र्ज़ की हैसियत हासिल होने की वजह से इसको हर हाल में अदा तो किया ही जाना है। पर क़ुर्बानी को यह हैसियत नहीं हासिल है हाँलाकि फिर भी बहुत अहम है। यहीं से फ़र्क़ वाज़ेह हो जाना चाहिए। 

इस्तितात मिलने पर सिर्फ एक बार हज फ़र्ज़ है। आज कल ज़्यातर लोग बार बार हज क्यों करते है। क्योंकि एक आम गलतफहमी है कि हज पर जायँगे और सारे गुनाह माफ हो जायँगे। क्योंकि हज एक स्टेटस सिंबल हो गया है। क्योंकि हज उमराह एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन हो गया है। नाम के आगे कोई नमाज़ी, जकाती, रोज़ेदार नही लगाता तो हाजी क्यों लगाते है? अब बताइए ऐसे हजों से हज का मक़सद हासिल होगा? पहला हज फ़र्ज़ है, उमराह तो है ही नफिल। इन सब के बावजूद अगर कोई इंसान बार बार हज या उमराह पर जा रहा है तो उसे ज़रूर सोचना चाहिए कि उसके आस पास, कोई रिश्तदारों, यार दोस्त, पड़ोसी मजीद मदद के तलबगार तो नहीं है। यक़ीनन किसी को जाने से रोका तो नहीं जा सकता पर तवज्जो तो दिलाना बहुत ज़ुरूरी है। यही हाल क़ुरबानी का भी है जो इसलिए भी होती है कि न करी तो लोग क्या कहँगे।

एक सच्चा वाक़या सुनाता हूँ।  एक साहब ने बेटे की हायर एजुकेशन कोर्स में मेरिट में सीट निकल आने पर एड्मिसन के लिए अपने रिश्तेदार से उधार मांगा। रिश्तेदार ने नहीं दिया तो उस शख्स ने बैंक से ब्याज़ पर पैसे लेके फीस अदा की। फिर कुछ दिन बाद वही रिश्तेदार अपनी पूरी फैमिली को लेके हज या उमराह पे चला गया जबकि वो पहले कई बार जा चुके थे। और वो रिश्तेदार देखता रह गया।

यंहा एक सदा उसूल समझ लें कि गरीब मुस्तहिक़ बेवा यतीम मजबूर की मदद भी उतनी ही ज़रूरी है जितना कि फ़र्ज़ इबादतें। अगर किसी का अकसीडेंट हो जाये तो एक अल्लाह का बंदा क्या करेगा, उसे वंही छोड़ कर मस्जिद में नामज़ पढ़ने घुस जाएगा?  खून देने की नौबत आ जाये तो क्या रोज़ा खत्म होने का इंतेज़र करेगा? हॉस्पिटल में उसके इलाज से बड़ा एडवांस अमाउंट जमा करने की नौबत आ जाये तो क्या यह कह कर मना कर देगा कि मुझे तो हज पर जाना है या क़ुरबानी करनी है। इंसानी जान की क़ीमत सबसे बड़ी है और इंसानियत भी। इसलिए अल्लाह ने ऐसे हालातों में हराम काम को भी हलाल करने की इजाज़त दी है। फिर ये तो नफिल इबादत है जिसे कभी कभार छोड़ भी सकते है। मजबूरी और बेबसी में इंसान को तरजीहात बदलने की इजाज़त है।  यक़ीनन सब की ढूढं ढूंढ कर मदद करने लगे तो हम कभी क़ुरबानी न कर पायंगे। पर उनकी तो कर सकते है जो हम से बार बार मदद का मुतालबा करते या हमारे से जिनके हालात बिलकुल भी नहीं छिपे है। कभी सोचा है कि ऐसे लोग हमारे सामने क्यों आते हैं, कंही अल्लाह हमारे ज़रिये से उनकी मदद करवाना तो नहीं चाहता।

फ़र्ज़ हज एक बार करके बाकी बार ज़रूरतमंदों ग़रीबों के सामने आने पर उनको को क्यों नहीं देना चाहिए। आज हज और क़ुरबानी एक प्रेक्टिस और सिर्फ नंबर बन गया है। मैंने 7 हज किए है, मैंने 20 उमराह किये है, मैंने 10 क़ुरबानी की है। और क्या मदद की किसी की? हां की है, ज़कात दी तो है। यानी ज़कात जो कि देनी ही देनी है वो कैसे मदद हो गयी। मदद तो अपने हक़ वाले माल में से है।  हमें आज यह ग़लतफ़हमी है कि सिर्फ जानवर की क़ुर्बानी कर देंगे और अल्लाह का क़ुर्ब हासिल हो जाएगा और उसे राज़ी कर लेंगे।  इसलिए आम तौर पर आसपास के जरूरतों पर आंख बंद करके क़ुरबानी करते है। 


कोरोना आफ़त।

गैर मामूली हालातों में पैसे का सबसे अच्छा इस्तेमाल करिये। गैर मामूली हालातों में पैसा किसी को दे दीजिए।  गैर मामूली हालात बाढ़ है, ज़लज़ला है, दंगे है, कोरोना काल है, रिसेशन है। ऐसे हालतों में गोश्त क्या नफा देगा? कभी कभी क़ुरबानी मत कीजिये, ऐसा कर सकते है, यह जायज़ है। फैसला आपको करना है कि आपके पैसे की कब और कंहा ज़रूरत ज़्यादा है। अगर कोई सामने बहुत ज़रूरतमंद नहीं है तो बिलकुल कीजिये क़ुरबानी। पर अगर कोई सामने आ गया तो एक ही क़ुरबानी करने में क्या हर्ज है या हिस्सा करने में क्या हर्ज है। वैसे ही जैसे दुसरी बार हज पर या उमरा पर जाता हुआ आदमी, किसी मुस्तहिक़ के सामने आने पर उसे सारे पैसे दे दे। इससे खदा नाराज़ नहीं बल्कि खुश ही होगा क्योंकि ये फ़र्ज़ है। पर आज लोगों में इतनी शिद्दत भरी है कि इस बारे में कुछ सुन्ना ही नहीं चाहते और क़ुरबानी को फ़र्ज़ का दर्जा दे रखा है। 

वैसे आम हालात में तो क़ुरबानी ही होनी चाहिए पर इस बार कोरोना की वजह से क़ुरबानी को टाला या खत्म किया जा सकता था। इस बार तो मदद की जा सकती है। इस बार तो क़ुरबानी कम की जा सकती थी। मस्जिदें, हज तक महदूद करे गए है। लोगों पर काम नहीं है, रोटी नहीं, है ,पैसे नहीं है, दवाई नहीं है। आने वाले कई महीने भी ऐसे ही गुजरने वाले है। भूखमरी, बेरोज़गारी दिन ब दिन बढ़ने पर है। क़ुरबानी की बजाए गरीब, लाचारों, माज़ूर, बीमार, पढ़ाई, लड़की, माज़ूरों, बेरोजगारों की मदद की जा सकती थी। इतना तो किया जा सकता है कि सिर्फ एक क़ुरबानी की जाए। या बकरे की बजाय किसी बड़े जानवर की जाए और बाकी पैसों से मदद कर दी जाय। क़ुरबानी का हुक्म है, बकरे की क़ुरबानी का नहीं।  आपके ज़्यादा माल में माशरे का हक़ है तभी तो ज़कात दी जाती है। क़ुरबानी न करने का किसी पर हुकुम तो नहीं लगा सकते न ही तनक़ीद कर सकते है पर इन सब बातों पर गौर तो किया ही जाना चाहिए। बदलाव के लिए पहली जेहनियत बदलनी पड़ती है।

अगर किसी वक्त सभी कुरबानी नहीं कर सकते तो एक पूरे खानदान के लिए, पूरे इलाके के लिए या पूरी हुकूमत सबकी तरफ से हुक्मरान कुर्बानी कर सकता है। पूरी कौम के लिए भी हुक्मरान चंद कुर्बानी कर सकता है जब मुल्क के सामने गैर मामूली हालत पैदा हो गए हैं जैसे मुल्क में बाढ़ या जलजला। रसूलुल्लाह ने कहा था कि मैंने अपनी उम्मत की तरफ से क़ुरबानी कर दी है। 
 
अगर कोरोना काल और इस इकॉनमी क्राइसिस मे दान न करके, मदद न करके, अगर क़ुरबानी ही करना ज़रूरी था तो फिर तो साफ है कि उम्मत ने क़ुरबानी को फ़र्ज़ के दर्जे पर बिठा दिया। 
 
पहले सभी जगह कुरबनी आसान होता था, आज कुछ मुल्कों में मुश्किल हो गई है इसलिए एक अलामती चीज को अलामती ही रहने दो, इससे आगे बढ़ेंगे तो दूसरी परेशानियाँ पैदा होंगी। इसलिए कुरबानी कम करना चाहे तो कम करे, ज़्यादा कर सकते है तो ज़्यादा करे, बस इसकी हकीकत को समझ लें पहले। 

हर समाज अपने त्योहार जैसे न्यू ईयर , बसंत, इंडिपेंडेंस डे, शादियाँ रस्में मानते हैं, अरबों खर्च होते हैं।  वैसे ही कुर्बानी में खर्च होते हैं मगर इस से भी ईकानमी बढ़ती है।


दलीलें और जवाबात।

कुछ आलिमों ने कहा कि क़ुरबानी तो करनी ही करनी है और इस कोरोना काल की मुसीबत में मदद अपने ज़ाती खर्चे में निकाल कर करो। यह कैसी अजीब बात है। अरे बहुत से लोगों ने जाती खर्च रोक कर ही क़ुरबानी के लिए पैसे बचाय, मदद का हाथ रोक कर पैसे बचाए और क़ुरबानी की। क्योंकि उन्हें यही बताया गया है कि क़ुरबानी तो बहुत ज़रूरी और लाज़मी है।  तो फायदा किसका हुआ।  आपकी नफिल क़ुरबानी अदा हुई और 500 रुपए की मदद को तरस रहे गरीब को आपने 600 रुपये किलो का गोश्त दे दिया जो एक दिन की ख़ुराक़ भी नहीं। जबकि इसी लॉकडाऊन में सिर्फ 500 रुपए में गरीब परिवारों ने हफ्ते भर तक राशन खाया है। 

ये सही बात है कि लाखों की शादी करने वालों के खर्चो में कोई कमी नहीं होती है तो क़ुरबानी भी करो। पर ये बात क्या उनसे भी कह सकते है जो बेचारे क़ुरबानी को ज़ुरूरी समझ कर अपनी जरूरतों में से पैसा बचाते है ताकि क़ुरबानी कर सके।  अगर अमीर मदद के लिए ही क़ुरबानी करता होता तो बाकी दिन भी  क़ुरबानी करता। पर वो इसे ज़रूरी मान कर सिर्फ बक़रा ईद पर करता है। मिडिल और लोअर क्लास में बहुत से अपने पेट के लिए या यूं कहें कि बकरे के गोश्त का लुत्फ उठाने के लिए करते है। चाप, बोंग, पाय फ्रीजर में महीनों रखे जाते है। न जाने कितने लोग है जो पूरे साल किसी की मदद नहीं करते या कम करते है पर क़ुरबानी बहुत बढ़ चढ़ कर करते है। 

जो यह कहते है कि क़ुरबानी न दें तो क्या ज़कात भी बंद कर दे। अरे भाई, क़ुरबानी को ज़कात से मुकाबला कर ही नहीं सकते या किसी और इबादत से क्यूंकि वो सब फ़र्ज़ है और क़ुरबानी नफिल। नफिल इबादत चाहे कितनी भी अहम हो पर उसको तर्क किया जा सकता है, फ़र्ज़ को नहीं।

दीन के मानसिक़ आपस मे बदलते नहीं है। पर लोगों ने मदद रोक पर क़ुरबानी करनी से क्या दीन के और अहम मानसिक तर्क़ नहीं हो रहे। जब इबादतों के नतीजे नहीं आ रहे है तो सोचना ज़रूरी है कि कमी कंहा हो रही है। 150 रुपये किलो गोश्त खाने वालों को 600  रुपए किलो वाला खिला रहे है। पूरी दुनिया में लोग कितना पैसा इस पर खर्च कर रहे इसे वाजिब मान कर। गरीब मुल्कों के गरीबों से क्या इससे कुछ फायदा है।

दलील दी जाती है कि अल्लाह को ईदुल ज़ुहा के दिन या क़ुरबानी के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद अमल क़ुरबानी है तो क़ुरबानी ही करें। यक़ीनन है, पर उस दिन से पहले किसी मजबूर को मदद को तरसते देखो तो क्या उसे इग्नोर कर कर, बक़रा ईद के दिन खर्च करने का इन्तिज़ार करोगे? हमने बस हक़ीक़त में सिर्फ रस्मे पकड़ रखी है। सिर्फ ईदुल अज़हा पर क़ुरबानी करके अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करने का टारगेट रखते है। क्या उसका क़ुर्ब ऐसी दोगली पॉलिसी अपनाने पर मिलेगा?  


यह ऐसा ही है की जैसे मान लीजिए हम किसी तंज़ीम (उम्मत) के मेंबर (उम्मती) बनते हैं जिसके लिए हमें रोज़ सोशल और ह्यूमनेटेरियन (ख़ैर के) काम करने हैं। पर हम पूरे साल में एक भी ऐसा काम न करें या न के बराबर करें। फिर सालाना जलसे में तंज़ीम के चेयरमैन (ख़ुदा) के पास एक गुलदस्ता (कुर्बानी) लेके चले जाएं (क्योंकि हमें पता है चेयरमैन को फूल पसंद है जैसे ख़ुदा को इस दिन क़ुरबानी पसदं है)। और हम ये सोच कर खुश होने लगें कि आज तो चेयरमैन ज़रूर इनाम (अजर) देगा। तो क्या ख़ुदा इनाम देगा? बिल्कुल नहीं देगा। बल्कि उल्टे, हमें भाग देगा कि पूरे साल भर एक काम तंज़ीम के मुताबिक नहीं किया और अब रिश्वत (तोहफ़े या कुर्बानी की शक्ल में) पेश करके तुम्हे क्या लगता कि तुम एक अच्छे मेंबर साबित हो गए हो। नहीं। हरगिज़ नहीं। जाओ पहले मोमिन बनके दिखाओ।
 

अगर आप ज़िंदगी भर अपने माल को दूसरों के लिए क़ुर्बान करते हुए और उससे ज़रूरतमंदो की मदद करते हुए आ रहे है तो आपका ज़िबह किया गया जानवर वाकई में एक कुर्बानी है। अगर आप ज़िंदगी भर दूसरों का हक़ हड़पते हुए और लोगों का माल डकारते हुए आ रहे है तो आपका ज़िबह किया हुआ जानवर सिर्फ़ एक हलाक़त है और कुछ नहीं।
 
यह वो क़ौम है जिसके अफ़राद को ये फिक्र है कि उन्होंने अगर ज़ुलहिज्जा में ईदउल अज़हा से पहले नाखून तरशवा दिये, दाढ़ी साफ करली या बाल काट लिए तो उसका ज़बीहा क़ुबूल होगी या नहीं। मगर उन्हें यह फ़िक्र नहीं है कि वो किसी की ज़मीन काट कर, किसी का माल साफ करके, और किसी का हक़ मार कर भी बेफिक्र बैठे हैं, तो क्या उनका ज़बीहा कुबूल होगा?

दुनिया में आज तक इस्लाम के लिए सबसे ज़्यादा क़ुर्बानीयां बकरों ने दी हैं, और सबसे कम इंसानी नफ़्स और अना ने (यानी ख्वाहिशात और ग़ुरूर ने)।
 

निष्कर्ष

जिस आदमी पर कुर्बानी वाजिब भी नहीं है, वो अगर ईद से कुछ रोज़ पहले बहुत एक बेहतर मौका मिलने पे अल्लाह की राह में खर्च कर दे वो पैसा जो उसने कुर्बानी के लिए जोड़ रखा था, तो क्या उसने गलत जगह पैसा खर्च कर दिया? जबकि ऐसा मदद करने वाला अमल अल्लाह को बेहद पसंद है। क्या उसे क़ुरबानी के लिए पैसा रोक कर रखना था? जैसे कोई बाढ़, ज़लज़ला, दंगा पीड़ित को दे देना।  ऐसे न जाने कितने लोग है जो कई कई कुर्बानिया करते है ईद पे और उन्हें ही पुरे साल न जाने कितने मौके मिलते है मजबूरों और गरीबों कि मदद करने के पर वो अक्सर ये मौके छोड़ते चले जाते है। बाढ़ में सब लूटा चुके लोगो से पूछो की क़ुरबानी के आधा किलो गोश्त लोगो या कुछ पैसे या कुछ ज़ुरूरत का सामान। दवाई खरीदने या रेहड़ी लगाने के लिए तरस रहे गरीब से पूछो, तब पता लगेगा कि उसे गोश्त चाहिए या कुछ पैसे।  क़ुरबानी भी अल्लाह की ख़ातिर है।  पिछले साल शायद बिहार से था,  एक बुज़ुर्ग आदमी ने बाढ़ आने पर बाढ़ पीड़ितों के लिए अपनी क़ुरबानी के लिए जोड़ी रकम खर्च कर दी थी तो मुसलमान उस पर चढ़ दौड़े थे कि सिर्फ क़ुरबानी ही करनी थी। कुछ कह रहे थे कि आधे से मदद करता और आधे से क़ुर्बानी। किसी ने यह जानने की कोशिश न कि उस आदमी ने ज़रूर उन बाढ़ पीड़ितों कि कोई बहुत बड़ी ज़रूरत ही देखी होगी जो ऐसा फैसला किया। लोग खुद देख कर भी मदद करते नहीं, अंधे बने रहते है और जिसका दिल पिघलता हो, दूसरों की मजबूरी देख कर, उसे मदद करने नहीं देते हो। इसलिए हमें क़ुर्बानी का असल मुक़ाम, उसका मक़सद, अपनी तरजीहात और ज़िम्मेदारियाँ वैगरह पर गौर करके ही कोई फैसला लेना चाहिए क्योंकि अल्लाह हमारी सलाहियत, नियतों वैगरह के हिसाब से ही सवाल करेगा।

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बक़रा ईद की क़ुर्बानी कितनी ज़रूरी।

पहली बात तो ये है कि रसूलल्लाह ने वाजिब जैसी कोई टर्म इस्तेमाल ही नहीं करी। कर्मो के लिए असल में बुनियादी तौर पर सिर्फ दो टर्म है। एक फ़र्ज़ और बाकी सब नफिल अमल। वाजिब टर्म तो हनाफ़ की ईजाद है। हनाफ़ इसे वाजिब कहते है इसलिए एक निसाब भी मुकर्रर किये हुए है।  पर अगर वाजिब और फ़र्ज़ को इन्टररचंगेबल भी माने तो भी ज़्यादातर आलिमों ने सिर्फ हाजी पर क़ुरबानी को फ़र्ज़ बताया है, न की गैर हाजी पर क़ुरबानी को फ़र्ज़ कहा। असल में गैर हाजी पर तो कुर्बानी वाजिब भी नहीँ है। हदीस के अल्फ़ाज़ है कि ज़ुल हिज्जा का चांद देख कर 'जिस का क़ुरबानी का इरादा हो, वो बाल और नाखून न काटे'..। यानी ये नफिल इबादत ही साबित है। नबी पर इतना माल ही नही होता था कि वो ज़कात निकाल सके। वो तो पहले ही माल तकसीम करते रहते है। पर फिर आप हर साल क़र्बानी करते थे। रसूलुल्लाह लगभग 10 साल मदीने में रहे और हर साल क़ुरबानी की।  जिस आदमी पर कुर्बानी वाजिब भी नहीं है, वो अगर बकरा ईद से कुछ रोज़ पहले बहुत बेहतर मौका मिलने पे अल्लाह की राह में खर्च कर दे वो पैसा जो उसने कुर्बानी के लिए जोड़ रखा था। तो क्या उसने गलत जगह पैसा खर्च कर दिया? जबकि ऐसा मदद करने वाला अमल अल्लाह को बेहद पसंद है। क्या उसे क़ुरबानी के लिए पैसा रोक कर रखना था? ऐसे न जाने कितने लोग है जो कई कई कुर्बानिया करते है ईद पे और उन्हें ही पुरे साल न जाने कितने मौके मिलते है मजबूरों और गरीबों कि मदद करने के पर वो अक्सर ये मौके छोड़ते चले जाते है। बाढ़ में सब लूटा चुके लोगो से पूछो की क़ुरबानी के आधा किलो गोश्त लोगो या कुछ पैसे या कुछ ज़ुरूरत का सामान। दवाई खरीदने या रेहड़ी लगाने के लिए तरस रहे गरीब से पूछो, तब पता लगेगा कि उसे गोश्त चाहिए या कुछ पैसे। 150 रुपए मिलने वाले बड़े के गोश्त की बजाय 600 रुपए किलो का बकरे का गोश्त खिलाना कितना सही है। क़ुरबानी का असल मक़सद भी गरिबों की ही मदद करना है अल्लाह की ख़ातिर। दलील दी जाती है कि अल्लाह को ईदुल ज़ुहा के दिन सबसे ज़्यादा पसंद अमल क़ुरबानी है। यक़ीनन है, पर उस दिन से पहले किसी मजबूर को मदद को तरसते देखो तो क्या उसे इग्नोर कर कर, बक़रा ईद के दिन खर्च करने का इनतीज़ार करोगे? हमने बस हक़ीक़त में सिर्फ रस्मे पकड़ रखी है। सिर्फ ईदुल अज़हा पर क़ुरबानी करके अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करने का टारगेट रखते है। क्या उसका क़ुर्ब ऐसी दोगली पॉलिसी अपनाने पर मिलेगा?

Farz ka matlab hai, wo kaam jo aap ko karna lazim hai, jinko nahi kare to Allah sawal karega ki kyon nahi kiya, aur na karne par gunah aur saja bhi hai. Farz ke alwa baaki kaam nafil hai yaani karo to swab aur ajar bahut aur na karo to koi pakad nahi. Collective and individual fardh are basically same in nature and they are accountable. Zakat farz hai aur qurbani non farz. Dono ko equivalent nahi mana jaa sakta as per quran. Kuch alag alag saalon me  Hazrat Abu Bakar aur Hazrat Umar R.A. ne Qurbani nahi ki, jaan boojhkar, istitaat ke bawjood, yahi sabko batane ke liye ki IdulZuha ki Qurbani farz nahi hai. Hum unke waqt hote to unhe kya kehte ki apke paas jo 20000 hai wo paise gareebon pe karch karke, usme se 10000 ki hi qurbani kar do? Kyoki aaj bhi hum logo ko yahi kehte hia jab wo kisi majboor ki madad karne jaat hai Bakra Eid par.
 
ईद उल अज़हा की क़ुरबानी न तो गरिबों के लिए है और न ही कोई सदक़ा (क्योंकि गरीबों की मदद ऐसे नहीं होती) और न ही जानवर से मुहब्बत कोई शर्त है जैसा लोग बताते हैं (क्योंकि चटखारे खोर लोग पेट में जाने वाले जानवर से असल मुहब्बत नहीं कर सकते)। न ही इसमें इकोनॉमी में तेज़ी लाने का कोई मक़सद मौजूद है (ये न होता तो लोग कुछ और कर रहे होते)। ऐसे आर्गुमेंट सिर्फ अपने को सही साबित करने के लिए दिए जाते जबकि सच ये है कि.. ये एक नफिल इबादत है जिसे फ़र्ज़ के दर्जे पर पहुंचा दिया गया है। असल में अब ये सिर्फ खाने पीने, शानो शौकत का मौका बन कर रह गया है। एक रस्म बन चुकी है जो बिना सोचे समझे अदा करी जा रही है. ये सिर्फ एक नज़र की इबादत है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। ऐसे ही अदा करके फ़ारिग हो जाएं बस। जंहा बड़ी ज़रूरत महसूस हो, वंहा क़ुरबानी छोड़कर मदद कर दो, अगर पॉकेट एक ही चीज़ अलाऊ कर रही है तो। दिल गंवारा करना चाहिए बस। उलेमा या जाहिल क़ौम की बातों में इमोशनल हो कर इस नफिल को हर बार बढ़ चढ़ कर अदा करने से गुरेज़ करें। 
 
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रसूलुल्लाह के जब क़ुरबानी करना चाहा तो दो बड़े, मोटे,  सींगों वाले  चितकबरे और ख़स्सी (बधिया) मेंढे लाएं। एक अपनी उम्मत की तरफ़ से ज़बह किया यानी उम्मत के हर उस शख़्स की तरफ़ से जो अल्लाह की तौहीद और नबी के पैग़ाम पहुंचाने की शहादत देता हो और दूसरा अपनी और अपनी आल की तरफ़ से ज़बह किया। (सुनन इब्ने माजह: 3122)
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