आज कल एक मैसेज वायरल हो रहा है जिसमे इस्लाम और मुसलमानों पर 17 सवाल किये गए है। कोई भी सामान्य ज्ञान और बुद्धि वाला इनको पढ़ कर समझ जाएगा कि ये बेबुनियाद सवाल बिना किसी रिसर्च और जांच परख के बनाये गये है। इन्हें पढ़ते ही इनके मनघडक और कुतर्की होने का एहसास पहले ही पल हो जाता है। इनके जवाब निम्नलिखित है:-
(1) सूर्पनखा को नाक और कान काट कर छोड़ दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे को छुपा कर रहती थी । रावण के मर जाने के बाद वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी । राक्षसों का वंश ख़त्म न हो इसलिए, शुक्राचार्य ने शिवजी की आराधना की। शिवजी ने अपना स्वरुप शिवलिंग शुक्राचार्य को दे कर कहा की जिस दिन कोई वैष्णव मतलब हिन्दु इस पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश हो जायेगा। उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया, जो आज अरब में मक्का मदीना में है।
जवाब: प्रश्न में कमाल की मनघडक देवमाला बनाई गयी है। क्योंकि क़ाबा दरअसल एक कमरा है जो अंदर से खाली है। उसके अंदर कोई पत्थर नहीं है और शिवलिंग का तो सवाल ही नहीं उठता। इस्लामिक मत के अनुसार मक्का का निर्माण संसार के पहले मानव आदिम (जिन्हें सनातन धर्म मे स्वयम्भू मनु कहा जाता है) ने किया है इसलिए बहुत बाद में आने वाले किसी शुक्राचार्य द्वारा इसे बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता और उसमे किसी आत्मलिंग पत्थर के रखे होने का भी।
दूसरी बात वेद में कोई शिवलिंग शब्द ही नही है। उपनिषदों में जो लिंग शब्द आता है, प्रत्येक जगह उसका अर्थ होता है चिन्ह या निशानी। वेदों के अनुसार शिव असल मे ईश्वर का ही एक और नाम है कोई भगवान या देवता का नहीं। इसलिए शिवलिंग जैसे पत्थर में विश्ववास रखना या पूजना वेद और सत्य सनातनी धर्म के विरुद्ध है।
(2) मक्का में हिन्दुओं को नही जाने दिया जाता, क्युकी अगर किसी हिन्दुओं ने उस आत्म लिंग पर गंगा जल चढ़ा दिया तो सभी राक्षसों का नाश हो जायेगा ।
जवाब: ये प्रश्न ही हास्यास्पद है क्योंकि गंगाजल चढ़ाने से भारत में आज के आधुनिक युग में होया हुआ कोई चमत्कार बात दो तो माने। गंगा जल में पहले कभी रही होंगी मेडिकल प्रॉपर्टीज पर आज उसमे केमिकल, कूड़ा, मुर्दे और जानवर बहा कर इतना गंदा कर दिया है कि उसके प्रयोग करने पर पाप या बीमारियां ही मिलेंगी।
दूसरी बात, क़ाबा में गैर मुस्लिमों का जाना प्रतिबंधित है क्योंकि ये वंहा की सरकार का निर्णय है। खुदा ने तो वंहा उन सबको जाने की आज्ञा दी है जो एक खुदा या एक ईश्वर में मानते हो यानी जो वेद में उल्लेखित एक निराकर ईश्वर का भक्त होगा वो वंहा जा सकता है। मक्का, मदीना या मस्जिदों में सभी एकेश्वरवादी, सभी जाति के और सभी औरतें भी जा सकती है। रुकावट तो बहुत से मंदिरों में जंहा अन्य धर्म के लोगों को (जगन्नाथपुरी, काशी विश्वनाथ, पद्मनाभवस्वामी, पशुपतिनाथ, कामाक्षी, दिलवाड़ा, लिंगराज भवनेश्वर मंदिर आदि), महिलाओं को (सबरीमाला, रणकपुर और कार्तिक पुष्कर मंदिर आदि) और दलितों को (खुजर बुलंदशहर में, नाचल मंडी में, हमीरपुर लखनऊ जैसे स्थानीय मंदिरों में) जाने की आज्ञा नहीं है।
(3) सूर्पनखा जो उस समय चेहरा ढक कर रखती थी वो परंपरा को उसके बच्चो ने पूरा निभाया ओर आज भी मुस्लिम औरतें चेहरा ढकी रहती हैं।
जवाब: क्या हवा हवाई इतिहास दिया गया है प्रश्न में। क्योंकि मुस्लिम क्या हिन्दू औरतों भी वैदिक काल से पर्दा या घूँघट करती आयी है। घूँघट शब्द ही संस्कृत का है जिसका अर्थ ढकना ही है। ऋग्वेद ( 8:33:19-20 ) कहता है कि स्त्रियां घूँघट करके रहे। रामायण से पता लगता है कि सीता जी घूँघट किया करती थी और रावण की पत्नियां भी। शूद्रक की मृच्छकटिका (5 सदी BC) में घूँघट का उल्लेख है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुनतलम (3-4 सदी AD) में घूँघट करने का उल्लेख है। उत्तर गुप्त काल मे घूँघट किया जाता था। यानी पर्दा सुपर्णखा से पहले से ही प्राचीन सनातन धर्म का भी अंग रहा है और आज भी किया जाता है।
(4) सूर्पनखा के वंसज आज मुसलमान कहलाते हैं । क्यूँकी शुक्राचार्य ने इनको जीवन दान दिया, इस लिए ये शुक्रवार को विशेष महत्त्व देते हैं ।
जवाब: कंहा से लाते हो ऐसी मनोहर कहानियां? क्योंकि इतिहास बताता है कि मुहम्मद साहब ने शुक्रवार का दिन बाकी धर्मों के मानने वाले लोगो के दिनों (ईसाई - रविवार, यहूदी - शनिवार) से अलग हटते हुए मुसलमानो का एक दिन हफ्ते में खास रखा ताकि कोई मतभेद न हो। इसी दिन का महत्व इस्लामिक साहित्य में कई अलग अलग कारणों से बताया गया है। यह शुक्राचार्य जैसे काल्पनिक किरदार के कारण नही रखा गया जिसके चरित और अस्तितव का कोई वैज्ञानिक या मूल ग्रन्थ वेदो से प्रमाण ही नही है।
(5) असल में इस्लाम कोई धर्म नहीं है, बल्कि एक मजहब है, एक दिनचर्या है. मजहब का मतलब अपने कबीलों के गिरोह को बढ़ाना।
जवाब: सवाल करने वाले को इतना भी ज्ञान नही है कि क़ुरान में इस्लाम को मज़हब नहीं दीन कहा गया है । मज़हब शब्द का अर्थ है पंत। दीन का अर्थ होता है मार्ग, कानून, निष्ठा आदि यानी जो मनुष्यो को अपनानी है। धर्म का अर्थ भी यही है जो मनुष्यों को धारण करना है। ईश्वर या खुदा का धर्म या दीन शुरू से एक ही रहा है जिसमे लोग मिलावट करते गए। पहले सनातन धर्म भी एक ईश्वर पर आधारीत था जो समय के साथ बिगड़ कर कई देवताओं को मानने वाला हो गया जबकि वेद एक ईश्वर की बात करते है।
दूसरी बात की अगर धर्म या दीन अगर दिनचर्या न बताए, रोज़ जीवन में कैसे व्यवहार किया जाए यह न बताए तो वो किस धर्म किस काम का। अगर धर्म का दिनचर्या में कोई मार्गदर्शन न हो फिर तो सब लोग अपनी मनमर्जी करँगे और दुनिया मे शरीफों का जीना मुश्किल हो जाएगा। चारो तरफ अत्याचार बढ़ जाएगा। अच्छे कर्म रोज़ की जाने वाले दिनचर्या का ही अंग है न कि उन्हें केवल चुनिन्दा अवसरों पर करना है।
(6) यह बात सब जानते है की मोहम्मदी मूलरूप से अरबवासी है। अरब देशो में सिर्फ रेगिस्तान पाया जाता है. वहां जंगल नहीं है, पेड़ नहीं है. इसीलिए वहां मरने के बाद जलाने के लिए लकड़ी न होने के कारण ज़मीन में दफ़न कर दिया जाता था.
जवाब: मुसलमानो से पहले से ही विश्व भर मे दफनाने का रिवाज रहा है जो भारत मे भी था। हड़प्पा - मोहनजोदड़ो सभ्ययता (लगभग 4 हज़ार साल पुरानी) की खुदाई में राखीगढ़ी और सिनौली में कब्रे मिली है जिनमे कंकाल उसी अवस्था मे मीले है जैसे मुसलमान दफनाते है। यानी पांव दक्षिण की तरफ, सिर उत्तर की तरफ और मुंह पश्चिम की तरफ मुड़ा हुआ। आज भी दुनिया भर में लाखों वर्ष पुराने दबाए गए कंकाल मिलते है, न कि जलाए गए। आज साइंस दफनाने के उपजाऊ फायदे और जलाने के पर्यावरण नुकसान के बारे में साफ बताती है।
दूसरी बात जब अग्नि का अविष्कार नहीं हुआ था तब मरने वाले के शरीर का कैसे नष्ट किया जाता होगा? यक़ीनन उस समय भी ज़मीन में ही गाड़ा जाता था। आज भी हिन्दू धर्म मानने वाले लोग, बच्चो के मृत्यु पर उन्हें दफनाते ही है।
(7) रेगिस्तान में हरयाली नहीं होती. ऐसे में रेगिस्तान में हरा चटक रंग देखकर इंसान चला आता की यहाँ जीवन है ओर ये हरा रंग सूचक का काम करता था.
जवाब: सारे रंग एक निराकर ईश्वर के है। सभी धर्मों के रंग इसानों के निर्धारित किये हुए है। इस्लाम किसी रंग को धार्मिक रंग के तौर पर मान्यता नहीं देता। इस्लाम के लिए हरा, भगवा, सफेद, सब उसके रंग है। मुसलमानो की मान्यतों में हरे रंग को ज़रूर तरजीह दी जाती है वैसे ही जैसे हिन्दुओ में भगवा को दी जाती है। पर इसका मतलब ये तो नही है कि भारत के वनों में आग अधिक लगती थी इसलिए हिन्दुओ ने भगवा चुना। प्रश्न करने वाले के कुतर्क से चले तो दुनिया के सारे रेगिस्तानी इलाकों के लोगों के धर्म के रंग हरा होना चाहिए था और भारत के तिरंगे में हरा रंग राजस्थान के कारण रखा होना चाहिए था। अगर कोई लाभ, सुविधा और इच्छा अनुसार रंग चुने तो इसमे किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए।
(8) अरब देशो में लोग रेगिस्तान में तेज़ धुप में सफ़र करते थे, इसीलिए वहां के लोग सिर को ढकने के लिए टोपी पहनते थे। जिससे की लोग बीमार न पड़े.
जवाब: सवाल बनाने वाले ज़रा भी होमवर्क नहीं करते है। क्योंकि अरब के लोग टोपी नहीं, सर पर पगड़ी पहनते थे या कपड़ा रखते थे जैसा भारत या दुनिया में हर जगह पहले किया करते थे और आज भी करते है। जो धूप से बचने के लिए होता है और सम्मान की भी निशानी होती है। अरब में उस कपड़े या पगड़ी को सर पर टिकाए रखने के लिए अंदर पहले टोपी पहनी जाती है। आज इस पगड़ी की जगह टोपी ने ले ली है। टोपी इस्लाम धर्म का आदेश नही है अगर ऐसा होता नमाज़ के फ़राइज़ में टोपी भी होती। वैसे ही जैसे साधुओं की पगड़ी कोई धर्म का आदेश नही बल्कि एक कल्चरल चीज़ है।
(9) अब रेगिस्तान में खेत तो नहीं थे, न फल, तो खाने के लिए वहा अनाज नहीं होता था. इसीलिए अरब के लोग जानवरों को काट कर खाते थे और अपनी भूख मिटाने के लिए इसे क़ुर्बानी का नाम दिया गया।
जवाब: मांसहार ईश्वर की तरफ से दी गयी अनुमति है जो संसार के प्रारंभ से होता आया है। आज भी सभी रेगिस्तानी, पहाड़ी, चटियल, बर्फिली, तटीय जगहों में इन्ही कारणों से मांसहार किया जाता है। भारत मे भी ऐसे स्थानों पर हिन्दू भाई मांसाहार करते है जैसे पहाड़ी राज्य, नार्थ ईस्ट राज्य, दक्षिण भारत, बंगाल आदि में। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत में मांसहार का उल्लेख है। बलिप्रथा हिन्दुओ की प्रथा है और बलि शब्द ही संस्कृत का है। अश्मेध, अजमेध और नरमेध यज्ञ में मेध का अर्थ ही बलि है। भारत की आज कुल 75% जनसंख्या मांसाहारी है और भारत मे मुस्लिम जनसंख्या लगभग 15% है। बाकी के कौन से धर्म के हुए। आदिमानव काल से ही अधिकतर दुनिया हमेशा से मांसहारी रही है और आज भी है।
(10) रेगिस्तान में पानी की बहुत कमी रहती थी, इसीलिए मुसलमान लिंग (मुत्रमार्ग) साफ़ करने में पानी बर्बाद न हो जाये इसीलिए लोग खतना (अगला हिस्सा काट देना) कराते थे।
जवाब: खतना करना इस्लाम का नही बल्कि मुसलमानों का रिवाज है। इसका कारण बहुत से मेडिकली फायदे है जिसे एड्स, कैंसर, एसटीडी, इंफेक्शन आदि से बचाव, न कि पानी बचाने जैसा बचकाना कारण। इसका एक फायदा ये भी है कि यह हिस्सा (prepuce) जन्म के समय बच्चे के शिशन की रक्षा करता है जैसे जन्म उपरांत Umbilical Cord की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, उसी तरह लिंग की अतिरिक्त खाल काट दी जाती है। इसके फायदों के कारण ही दुनिया भर में यह होता रहा है और आज भी हर जगह वेस्टर्न लोग इसे कराते है। हालांकि भारत में इसका प्रचलन हमेशा से कम रहा है जिसका कारण सांस्कृतिक है। WHO की रिपोर्ट है कि दुनिया के लगभग 40% लोग खतना कराते है। प्राचीन काल से खतना समाज और पुरुषार्थ का अंग रहा है और इसे धार्मिक, सांस्कृतिक और मेडकिल कारणों से कराया जाता रहा है। दुनिया भर के इतिहासकार इसका प्रचलन 4 लाख पुराना मानते है (सुमेरी और सामी जाति माइग्रेशन काल से) और चिकित्सा पद्धति के तौर पर इसे 15 हज़ार वर्ष पुराना सर्जिकल प्रोसीजर मानते है। मिस्र में ढाई हज़ार वर्ष पुराने चित्र आकृति पर इनके सबूत मौजूद है। कई अफ्रीकी और ऑस्ट्रेलिया मूलनिवासी जनजातियों में यह रिवाज है। यहूदी धर्म में यह एक धर्मिक प्रथा है। ईसाइयों में खतना होता है और बाइबिल में इसकी आज्ञा दी गयी है।
इस त्वचा को काटना अगर ईश्वर की बनावट में छेड़छाड़ है या ये कहना कि ईश्वर को इसे कटवाना ही होता तो इसको बनाया ही क्यों जैसे तर्कों का एक ही जवाब है कि फिर बाल, नाखून, भंवे क्यों तराशते हो। कान, नाक छिदवाना भी क्या छेड़छाड़ नहीं है।
वैसे खतना यहूदियों में हज़रत इब्राहीम से शुरू हुआ। इस तरह बनी इस्राइल में जारी रहा। हज़रत ईसा बनी इस्राइल में आये थे इसलिए ईसाईयो ने करवाना जारी रखा। फिर कुछ समय बाद संत पॉल ने इसे रुकवा दिया कि इसकी अब ज़रूरत नहीं है।
(11) अरब में सब लोग एक ही कबिलो के खानाबदोश होते थे इसलिए आपस में भाई बहन ही निकाह कर लेते थे।
जवाब: इस्लाम मे भाई बहन की शादी हराम है और क़ुरान में बताए गए कई रिश्तों में शादी नही कर सकते। उनके अलावा सब जगह कर सकते है यंहा तक कि फर्स्ट कज़िन में भी कर सकते है। कज़िन मैरिज को वरीयता या प्राथमिकता नहीं दी गयी है पर अनुमति दी गयी है।
दुनिया भर में हर धर्म मे कज़िन मरीज होती थी और है। राजा महाराजा परिवारों में भी यह एक आम बात थी। हिन्दू मैरिज एक्ट (1955) से पहले कज़िन से शादियां कोई नई बात न थी।
आज भी हिन्दू धर्म और भारत में कज़िन मरीज का प्रचलन है और दक्षिण राज्यों में, नार्थ ईस्ट राज्यों में, पारसियों में, ईसाइयों में, आदिवासियों में और कई दलित जातियों में होती है। दक्षिण भारत के कई हिन्दू समुदायों में सगे मामा-भांजी की शादी को प्राथमिकता दी जाती है। केवल उत्तर भारत में इसका प्रचलन नहीं है क्योंकि उत्तरवैदिक काल में आर्यो में गोत्र कांसेप्ट की उत्पत्ति हुई और धीरे धीरे, उत्तर भारतीय उच्च वर्णों में इसका चलन कम होता गया। वैसे भारत में भी प्राचीन काल से इसका प्रचलन रहा है जिसका इतिहास में ऐसे कई प्रसंग है।
जैसे श्रीकृषण ने अपनी 2 क्रोस कज़िन भद्रा से और मित्रविन्दा (जो उनकी छठी पत्नी थी और कुंती की बहन की बेटी और पिता वासुदेव के भाई की बेटी थी) से विवाह किया। श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का भी विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था। भगवतपुराण में आता है की अभिमन्यु के बेटे परिक्षित ने अपन मामा की बेटी इरावती से विवाह किया। बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं। महावीर स्वामी की सुपुत्री अनोजया (प्रियदर्शनी) का भी अपने कज़िन जमाली से विवाह हुआ था। शिवाजी महाराज के सुपुत्र राजाराम ने कज़िन ताराबाई से शादी की थी और शिवाजी की बेटी सुकु बाई ने भी अपने कज़िन से विवाह किया था। राजा अजातशत्रु ने भी अपनी कज़िन से शादी की थी।
(12) रेगिस्तान में मिट्टी मिलती नहीं थी मुर्ती बनाने को इसलिए मुसलमान मूर्तीपुजा नहीं करते थे और खानाबदोश थे।
जवाब: सवाल करने वाले को अरब का अंश मात्र ज्ञान नहीं है। क्योंकि अरब में भी मूर्तिपूजा होती थी पहले। मानवता की शुरवात में केवल एक ईश्वर को पूजा जाता था। फिर धर्म मे बिगाड़ पैदा होने पर मानव मूर्तिपूजा शुरू कर देते थे। इस्लाम आने के बाद अरबों ने मूर्तिपूजा इसलिए बंद कर दी थी क्योंकि क़ुरान ने कहा कि सिर्फ एक ईश्वर उसकी इबादत करो। जैसे वेदों में कहा गया है कि 'तस्य ते भाक्ति वांस स्याम' अर्थात उसी एक निराकर ईश्वर की भक्ति करो। वेदों और उपनिषदों में मूर्तिपूजा को प्रतिबंधित किया गया है और केवल एक निराकर ईश्वर की पूजा के आदेश दिए गए है।
(13) अरब में एक जगह से दुसरी जगह जाना पड़ता था इसलिए वंहा कम बर्तन रखते थे और एक थाली नें पांच लोग खाते थे।
जवाब: ये सब धार्मिक नही सांस्कृतिक, सामायिक और आवश्यकता अनुसार करने वाले कार्य है जो हर जगह किए जाते है। पहले समय मे लोगों के घरों में बर्तन और अन्य सामान कम या ज़रूरत के मुताबिक ही होता है। भारत मे भी। और आज भी गांव देहात में या गरीबों के पास बर्तन कम ही होता है। पहले प्रेम भाव और मेल मिलाप भी अधिक था तो साथ साथ भी खाते थे। हमारी तरह वंहा जात पात का चक्कर नहीं है कि तथाकथित निचली जाती वालों के साथ एक बर्तन में खाना तो दूर, उन्हें छूना और उनके पास बैठना भी पसंद नहीं करते।
(14) कबीले की अधिक से अधिक संख्या बढ़े इसलिए अरब में हर एक को चार बीवी रखने की इज़ाजत दी जाती थी।
जवाब: पहले समय मे बहुपत्नी आम बात थी। राजघरानों, रजवाड़ों में यह बेहद सामान्य था। सौ साल पहले तक भारत मे भी ये एक आम चलन था और हिन्दू समाज में भी। ये तो डॉक्टर अम्बेडकर ने धर्म के ठेकेदारों सेनलड़ झगड़ कर 1955 का हिदू मैरिज एक्ट बनावाया और हिन्दुओ में अनेक शादियों पर प्रतिबंध लग गया। वेद आदि या दुनिया का कोई भी धार्मिक ग्रंथ नहीं कहता कि एक ही शादी करो, सिवाय क़ुरान के। क़ुरान कहता है कि केवल एक ही शादी करो। पर आगे क़ुरान एक से ज़्यादा शादी की इजाज़त देता है पर सिर्फ कुछ विशेष स्तिथियों में जैसे बांझो, विधवाओं, यतीमों, बेसहाराओं, निर्धन आदि से। पर साथ ही शर्त भी लगा देता है कि उनके बीच न्याय करना। और यह न्याय ऐसा नही होना चाहिए कि दो सेब लाओ, और दो बीवी में एक एक बांट दो। नहीं। बल्कि एक सेब के दो टुकड़े करो और उनको बाटों। और जो इतना परफेक्ट न्याय न कर सके उसके लिए एक शादी जायज़ है। क़ुरान आम हालात में एक ही शादी को कहता है और उसी को प्राथमिकता देता है पर कुछ विशेष स्तिथियों में बहुविवाह की अनुमति भी देता है।
हिन्दू धर्म और ग्रंथो में भी बहुपत्नी की इजाज़त है। अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा! ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की! मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति! कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी! कृष्ण भगवान की 16108 पत्नियां थी। राम के पिता दशरथ की पत्नियों की संख्या अलग अलग आती है। कंही 60000 है, कंही 353 है, कंही 3 है, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा! वाल्मीकी रामायण से पता लगता है उस समय बहुतपत्नी प्रथा आम थी। मनुस्मृति (9:83) तो यंहा तक कहती है कि दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।
(15) इस्लाम कोई धर्म नहीं मात्र एक कबीला है और इसके नियम असल में इनकी दिनचर्या है ।
जवाब: इस्लाम कोई क़बीला नहीं बल्कि दीने फितरत है यानी प्रकृति का धर्म जो सभी मनुष्यों को बहुत सिंपल दिनचर्या बिताने को कहता है और एक ही ईश्वर की भक्ति करने को भी। और जो धर्म प्रकृति, इंसानी फितरत और आम दिनचर्या के अनुकूल न हो वो धर्म हो ही नही सकता। ये सारी बाते केवल ईश्वर के ही धर्म में ही हो सकती है और ये सब इस्लाम में है। धर्म और उसके नियमों का सामान्य और तर्कसंगत होना ही उसके सच्चे होने की एक निशानी है।
(16) अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था । और फिर किस तरह पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा था ।
जवाब: ऐसे ख्वाजा तो साधु संत होते थे न कि राजा महाराजा जो सिपाहियों को ऐसे आदेश देंगे। तभी सभी धर्मों के लोग इन्हें सूफी संतों को मानते आए है और मानते है। ऎसी निवस्त्र करने की मनघडंक बाते कोई अज्ञानी ही कर सकता। एक भी प्रमाणिक इतिहास से सबूत कंहा है इस बात का? और ऐसे मेसेज लिखने वाले अनपढ़ को पता भी नहीं है कि ख्वाजा साहब की मृत्यु ऐसे नही हुई थी। रही बात 72 हूरों की तो बता दूं कि हिन्दू धर्म में हूरों से बढ़कर अप्सराएं होती है। 1008 प्रमुख अप्सरायें है जैसे रंभा, मेनका, उर्वशी जिनका कार्य आनंद और विलासता देना है। अथर्ववेद (4:34:2) कहता है कि स्वर्ग में बहुत सी स्त्रियों के साथ सुखमय जीवन प्राप्त होता है। महाभारत (12:98:46) में श्रीकृष्ण कहते है अर्जुन से की अगर तू धर्म के मार्ग पर लड़ते हुए मरा तो तूझे हज़ारों अप्सराएं स्वर्ग में मिलेगी । यानी हज़ारों अप्सराओं के लालच के आगे तो 72 हूरे कुछ भी नहीँ।
(17) अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है । मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था।
जवाब: उस समय, अपने पौराणिक कल्पनाओं से भरे धर्म, वर्ण व्यस्वस्था, जात पात से त्रस्त आ चुके लोग ख्वाजा जैसे साधु संत के दरबार मे आते थे और हिन्दू मुस्लिम देखे बिना ख्वाजा जी सब पर दयालुता, उपाकरता करते थे, उनसे स्नेह, प्रेम करते थे। उनकी मदद करते थे। उनकी वित्तीय सहायता, इलाज आदि भी किया करते थे।। इसलिए लोग अपना जात पात आधारित धर्म छोड़कर बराबरी के धर्म मे आ जाते थे। दुसरी बात ये ९० लाख का आंकड़ा कंहा से कॉपी किया है? इतनी लंबी भी न छोड़ो। और प्रामाणिक इतिहास में ऐसे उकसाने के कोई सबूत ही नहीं है। अगर गौरी जैसे शासक यंहा लूटने आते थे फिर यंहा के राजा महाराजा, राजवाड़े क्षत्रिय खानदान उनके साथ रिश्तेदारी क्यों करते थे, उनसे जागीरे, मन्स्बे और दरबारों में ओहदे क्यो लेते थे। असल में अधिकेतर केस में तो यंहा के कमज़ोर हिन्दू राजा ही उन्हें आक्रमण के लिए या अपनी सहायता के लिए दुश्मनों से बदला लेने के लिए बुलाते थे। यंहा आये मुस्लिम बादशाह भी धर्म के आधार पर नही बल्कि सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई लड़ते थे। वैसे ही जैसे यंहा पहले से रह रहे राजा, महाराजा आपस मे लड़ा मरा करते थे, राज पाट और सत्ता के लिए। भारत में मुसलमानो से पहले ही बहुत से विदेशी आक्रमणकारी आये और यंही बस कर अपनी नस्ले बढ़ाई जैसे आर्य, यवन (यूनानी), शक, पहलव, कुषाण, हूण आदि। यंहा तक कि भारत के कई राजाओं ने विदेशों पर भी आक्रमण किया और वंहा राज किया जैसे चोल आदि।
उपरोक्त सभी सवाल दरअसल व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का सिलेबस है। लिखने वाले न सही, पर कम से कम फारवर्ड करने वाले ही आगे भेजने से पहले थोड़ा दिमाग लागये तो सभी सवालों की बेवकूफी से भरे नज़र आ जायँगे। इन्हें सवाल की बजाए चुटकले कहना ज़्यादा अच्छा रहेगा।