Wednesday, 30 September 2020

आर्य समाज के मत।




स्वामी जी से पहले किसी का भी वेद भाष्य स्वामी जी जैसा एकेश्वरवादी नहीं है यानि एकेश्वरवाद था मगर दयानंदी जी जैसा नहीं. क्योंकि इन्होने वेदों को सृष्टि के आरंभ (1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार वर्ष पूर्व) में माना है सो उनमें इतिहास होना नहीं माना है इसलिए इन्होने वेदों में आये सूर्य, चन्द्र, पुरुष, दादा जैसे नामों को ईश्वर का नाम बताया है. वैसे पृथ्वी 4 अरब साल फर्स्टस सिंपल लाइफ हुई थी और 23 करोड़ साल पहले डायनासौर और महज़ 25 लाख साल पहले पहली इंसानी प्रजाति और 3 लाख साल पहले होमोसेपीयंस. 

इनके मुताबिक वेदों का अवतरण सृष्टि के आरंभ में अग्नि, वायु, आदित्य, और अंगिरा (जो पता नहीं कंहा आये और ईश्वर के माध्यम बन गए) नामक चार ऋषियों (सभी पुरुष, कोई स्त्री नहीं।) के माध्यम से हुआ, समाधिस्थ अवस्था में आत्मा में प्रेरणा से (इनके समय में अन्य अमैथूनी जन्मे मनुष्य भी थे). 
 
■ ब्रह्मा एक निराकर अखंड सत्ता है जिसका अर्थ है बड़ा। इसके जिस 4th भाग में प्रकृति समाई है उसे या उसके शासनकार को ईश्वर कहते है और शेष जगह वह ब्रह्म होता हैं। वेदों में जहां तत शब्द आया है वह ब्रह्म के लिए है क्योंकि ब्रह्म शब्द नपुंसक लिंग है और जंहा जंहा स: शब्द आया है वो ईश्वर के लिए है क्योंकि ईश्वर का पुल्लिंग होता है। ब्रह्मा की उपासना नहीं हो सकती क्योंकि वो प्रकरीबसे बाहर है और जीवात्मा की सीमा प्रकृति तक है यानी ईश्वर तक।


■ ईश्वर निर्गुण नहीं बल्कि सगुण होता है। प्रकृति के 3 तत्व सत्व, रज, तम में से ईश्वर केवल सत्त्व को धारण करता है जिससे उसमे दयालुता, न्यायकारिता, सर्वशक्तिमत्तता आदि पैदा होते है। ब्रह्मा गुण रहित यानी निर्गुण है जिसमे 3 तत्त्व नहीं होते इसलिय उसकी उपासना नही हो सकती क्योंकि वह उसका उत्तर नहीं देता। ब्रह्म सगुण निर्गुण व निराकर है और इसलिए ईश्वर भी निराकर है।

■  प्रकृति के 3 तत्व या गुण है , सत्व, रज, तम जिन्हें इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रॉन कहा जाता है।

3 अनादि तत्व है, ईश्वर, जीव (दोनों चेतन-ज्ञान सहित), प्रकृति (जड़-ज्ञान रहित).  या यूं कहें कि परमात्म, आत्मा, प्रकृति 3 अनादि तत्व है। आत्मा और परमात्मा चेतन और नित्य है। यानी ब्रह्म, जीव और प्रकृति 3 अनादि तत्व है और तीनों अलग है। परमात्मा, जीव, आत्मा भी अलग है।

ईश्वर सत या चत (सत्य), चित्त (चेतन), आनन्दस्वरूप (हमेशा आनंदित) है और इसलिए सच्चिदानंदस्वरूप है।

जीव और ईश्वर दोनों पुरुष है। कोई बंधन न होने के कारण ईश्वर, पुरूष विशेष है।  सबकी आत्मा होने से परमात्मा कहलाया।

सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु उसके सगुण है। इनकी उपासना  सगुण उपासना है। निराकार, अजन्मा अन्नत, अनादि उसके निर्गुण है। इनकी उपासना  निर्गुण उपासना है। ईश्वर निर्गुण सगुण दोनों है पर इन अर्थों में।
उसके गुणों की प्रशंसा सगुण स्तुति है और जिन गुणों से वह रहित है उसकी प्रशंसा निर्गुण स्तुति है।


मत खण्डन

■ एक तरफ आर्य समाजी कहते है कि ईश्वर सर्वव्यापक होने से वह मूर्ति के भीतर भी विद्यमान है परन्तु मूर्तिपूजा में नहीं है।

दूसरी तरफ वो कहते है कि आत्मा परमात्मा का अंश नहीं है वरना उसमे भी परमात्मा के गुण होने चाहिए थे पर वह हमेशा आनंदित नही होती है।  हम परमात्मा के अंश नहीं है वरना प्रत्येक कर्म का फल अच्छा होता। यदि हम ईश्वर के अंश है तो फिर उपासना किस की करते। 

प्रकृति का सृजन आरम्भ होने पर उसका प्रथन तत्व महत्त्व के रूप में प्रकट होता है जिसे बुद्धि कहा जाता है। इसी से अहंकार यानी अपने अस्तित्व का ज्ञान (मैं और मेरा अस्तिव है) होता है। इसे जब परमात्मा धारण करता है तब ईश्वर कहलाया जाता है। वह कहता है कि मैं अकेला हूँ और बहुतों में बदल जाऊं। तब सृष्टि रचना आरम्भ होती है। महतत्व के अंश से ही प्राणियों के चित्तो (बुद्धियों) की रचना होती है।

सवाल यंहा यह है कि वो सर्व्यापक है तो आत्मा और जीव में क्यों नहीं है।

■  आम हिन्दू वेद को परमात्मा की वाणी मानते है पर गीता को भी ईश्ववानी मानते है। पुराणों को भी ईश्वज्ञान मानते है। आम हिन्दू या सनातनी तो वेदो में एकेश्वरवाद भी नहीं मानता। देवताओं को मानता है। क्या ये सब मत धर्म संगत है? उवट, सायण, महीधर और श्रीराम शर्मा आदि के भाष्य या यूं कहें कि लगभग सभी नॉन आर्य समाजी भाष्यों और स्वामी दयानंद सरस्वती के वेद भाष्यों में सबसे बड़ा अंतर बहुदेववाद या देवतावाद और एकेश्वरवाद का है। स्वामी जी से पहले किसी का भी वेद भाष्य एकेश्वरवाद पर नहीं है। तो फिर इसका अर्थ यही हो सकता है कि बाकी सभी के भाष्य सही है, केवल स्वामी जी का गलत है जबकि वो निघण्टु और निरुक्त पर आधारित है।

■  It is said that Arya Samaj was launched to prevent Hindus from accepting Islam/Christianity. Swami Dayanand is still called as Christian agent due to his involvement with Christian organisations and forcing doctrine of one God on Hindus. Raja Ram Mohan and Brahmo Samaj were all inclined towards tauheed. However their concept of God was different. Brhamo Samaj did not believe in Personal God. Before Dayanad Sarswati, all the hindu scholars used to take all the attributes of GOD as diffrent figures. Then he came with the idea that they are the names of different qualities of God. People didn't like it and they still do not accept it that is why Arya Samajis is still a very small sect compared to others. 

He has  translated many names such as Sun, Moon, Purush, Dada and many more as God's name. These names may be interpolation which we as a Muslim can easily discard because we know that vedas have got polluted. We as Muslim can belive that names like Brahamma Vishnu Mahesh may be of God but not every name.

There is history in Vedas but Swami Dyayand had not agree to it. That why such names had been misinterpreted as he liked. Since Dayanand did not believe  in interpolation in Vedas so he declared those  figures as God's name which is not correct.  Their translations of these mantras denote different individuals which is not right.




Monday, 28 September 2020

इस्लाम और मुसलमानों पर किए जाने वाले 17 इल्ज़ाम


आज कल एक मैसेज वायरल हो रहा है जिसमे इस्लाम और मुसलमानों पर 17 सवाल किये गए है। कोई भी सामान्य ज्ञान और बुद्धि वाला इनको पढ़ कर समझ जाएगा कि ये बेबुनियाद सवाल बिना किसी रिसर्च और जांच परख के बनाये गये है। इन्हें पढ़ते ही इनके मनघडक और कुतर्की होने का एहसास पहले ही पल हो जाता है। इनके जवाब निम्नलिखित है:-

(1) सूर्पनखा को नाक और कान काट कर छोड़ दिया गया था । वह कपडे से अपने चेहरे को छुपा कर रहती थी ।  रावण के मर जाने के बाद वह अपने पति के साथ शुक्राचार्य के पास गयी और जंगल में उनके आश्रम में रहने लगी । राक्षसों का वंश ख़त्म न हो इसलिए, शुक्राचार्य ने शिवजी की आराधना की। शिवजी ने अपना स्वरुप शिवलिंग शुक्राचार्य को दे कर कहा की जिस दिन कोई वैष्णव मतलब हिन्दु इस पर गंगा जल चढ़ा देगा उस दिन राक्षसों का नाश हो जायेगा। उस आत्म लिंग को शुक्राचार्य ने हिन्दुओं से दूर रेगिस्तान में स्थापित किया, जो आज अरब में मक्का मदीना में है। 

जवाब: प्रश्न में कमाल की मनघडक देवमाला बनाई गयी है। क्योंकि क़ाबा दरअसल एक कमरा है जो अंदर से खाली है। उसके अंदर कोई पत्थर नहीं है और शिवलिंग का तो सवाल ही नहीं उठता। इस्लामिक मत के अनुसार मक्का का निर्माण संसार के पहले मानव आदिम (जिन्हें सनातन धर्म मे स्वयम्भू मनु कहा जाता है) ने किया है इसलिए बहुत बाद में आने वाले किसी शुक्राचार्य द्वारा इसे बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता और उसमे किसी आत्मलिंग पत्थर के रखे होने का भी।

दूसरी बात वेद में कोई शिवलिंग शब्द ही नही है। उपनिषदों में जो लिंग शब्द आता है, प्रत्येक जगह उसका अर्थ होता है चिन्ह या निशानी। वेदों के अनुसार शिव असल मे ईश्वर का ही एक और नाम है कोई भगवान या देवता का नहीं। इसलिए शिवलिंग जैसे पत्थर में विश्ववास रखना या पूजना वेद और सत्य सनातनी धर्म के विरुद्ध है।  


(2) मक्का में हिन्दुओं को नही जाने दिया जाता, क्युकी अगर किसी हिन्दुओं ने उस आत्म लिंग पर गंगा जल चढ़ा दिया तो सभी राक्षसों का नाश हो जायेगा ।

जवाब:  ये प्रश्न ही हास्यास्पद है क्योंकि गंगाजल चढ़ाने से भारत में आज के आधुनिक युग में होया हुआ कोई चमत्कार बात दो तो माने। गंगा जल में पहले कभी रही होंगी मेडिकल प्रॉपर्टीज पर आज उसमे केमिकल, कूड़ा, मुर्दे और जानवर बहा कर इतना गंदा कर दिया है कि उसके प्रयोग करने पर पाप या बीमारियां ही मिलेंगी। 

दूसरी बात, क़ाबा में गैर मुस्लिमों का जाना प्रतिबंधित है क्योंकि ये वंहा की सरकार का निर्णय है। खुदा ने तो वंहा उन सबको जाने की आज्ञा दी है जो एक खुदा या एक ईश्वर में मानते हो यानी जो वेद में उल्लेखित एक निराकर ईश्वर का भक्त होगा वो वंहा जा सकता है। मक्का, मदीना या मस्जिदों में सभी एकेश्वरवादी, सभी जाति के और सभी औरतें भी जा सकती है। रुकावट तो बहुत से मंदिरों में जंहा अन्य धर्म के लोगों को (जगन्नाथपुरी, काशी विश्वनाथ, पद्मनाभवस्वामी, पशुपतिनाथ, कामाक्षी, दिलवाड़ा, लिंगराज भवनेश्वर मंदिर आदि), महिलाओं को (सबरीमाला, रणकपुर और कार्तिक पुष्कर मंदिर आदि) और दलितों को (खुजर बुलंदशहर में, नाचल मंडी में, हमीरपुर लखनऊ जैसे स्थानीय मंदिरों में) जाने की आज्ञा नहीं है।  

(3) सूर्पनखा जो उस समय चेहरा ढक कर रखती थी वो परंपरा को उसके बच्चो ने पूरा निभाया ओर आज भी  मुस्लिम औरतें चेहरा ढकी रहती हैं। 

जवाब: क्या हवा हवाई  इतिहास दिया गया है प्रश्न में। क्योंकि मुस्लिम क्या हिन्दू औरतों भी वैदिक काल से पर्दा या घूँघट करती आयी है। घूँघट शब्द ही संस्कृत का है जिसका अर्थ ढकना ही है।  ऋग्वेद ( 8:33:19-20 ) कहता है कि स्त्रियां घूँघट करके रहे।  रामायण से पता लगता है कि सीता जी घूँघट किया करती थी और रावण की पत्नियां भी।  शूद्रक की मृच्छकटिका (5 सदी BC) में घूँघट का उल्लेख है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुनतलम (3-4 सदी AD) में घूँघट करने का उल्लेख है। उत्तर गुप्त काल मे घूँघट किया जाता था। यानी पर्दा सुपर्णखा से पहले से ही प्राचीन सनातन धर्म का भी अंग रहा है और आज भी किया जाता है।

(4) सूर्पनखा के वंसज आज मुसलमान कहलाते हैं । क्यूँकी शुक्राचार्य ने इनको जीवन दान दिया, इस लिए ये शुक्रवार को विशेष महत्त्व देते हैं ।

जवाब:  कंहा से लाते हो ऐसी मनोहर कहानियां? क्योंकि इतिहास बताता है कि मुहम्मद साहब ने शुक्रवार का दिन बाकी धर्मों के मानने वाले लोगो के दिनों (ईसाई - रविवार, यहूदी - शनिवार) से अलग हटते हुए मुसलमानो का एक दिन हफ्ते में खास रखा ताकि कोई मतभेद न हो। इसी दिन का महत्व इस्लामिक साहित्य में कई अलग अलग कारणों से बताया गया है। यह शुक्राचार्य जैसे काल्पनिक किरदार के कारण नही रखा गया जिसके चरित और अस्तितव का कोई वैज्ञानिक या मूल ग्रन्थ वेदो से प्रमाण ही नही है। 

(5) असल में इस्लाम कोई धर्म नहीं है, बल्कि एक मजहब है, एक दिनचर्या है. मजहब का मतलब अपने कबीलों के गिरोह को बढ़ाना।

जवाब: सवाल करने वाले को इतना भी ज्ञान नही है कि क़ुरान में इस्लाम को मज़हब नहीं दीन कहा गया है । मज़हब शब्द का अर्थ है पंत। दीन का अर्थ होता है मार्ग, कानून, निष्ठा आदि यानी जो मनुष्यो को अपनानी है। धर्म का अर्थ भी यही है जो मनुष्यों को धारण करना है। ईश्वर या खुदा का धर्म या दीन शुरू से एक ही रहा है जिसमे लोग मिलावट करते गए। पहले सनातन धर्म भी एक ईश्वर पर आधारीत था जो समय के साथ बिगड़ कर कई देवताओं को मानने वाला हो गया जबकि वेद एक ईश्वर की बात करते है।

दूसरी बात की अगर धर्म या दीन अगर दिनचर्या न बताए, रोज़ जीवन में कैसे व्यवहार किया जाए यह न बताए तो वो किस धर्म किस काम का। अगर धर्म का दिनचर्या में कोई मार्गदर्शन न हो फिर तो सब लोग अपनी मनमर्जी करँगे और दुनिया मे शरीफों का जीना मुश्किल हो जाएगा। चारो तरफ अत्याचार बढ़ जाएगा। अच्छे कर्म रोज़ की जाने वाले दिनचर्या का ही अंग है न कि उन्हें केवल चुनिन्दा अवसरों पर करना है।

(6) यह बात सब जानते है की मोहम्मदी मूलरूप से अरबवासी है। अरब देशो में सिर्फ रेगिस्तान पाया जाता है. वहां जंगल नहीं है, पेड़ नहीं है. इसीलिए वहां मरने के बाद जलाने के लिए लकड़ी न होने के कारण ज़मीन में दफ़न कर दिया जाता था.

जवाब: मुसलमानो से पहले से ही विश्व भर मे दफनाने का रिवाज रहा है जो भारत मे भी था। हड़प्पा - मोहनजोदड़ो सभ्ययता (लगभग 4 हज़ार साल पुरानी) की खुदाई में राखीगढ़ी और सिनौली में कब्रे मिली है जिनमे कंकाल उसी अवस्था मे मीले है जैसे मुसलमान दफनाते है। यानी पांव दक्षिण की तरफ, सिर उत्तर की तरफ और मुंह पश्चिम की तरफ मुड़ा हुआ। आज भी दुनिया भर में लाखों वर्ष पुराने दबाए गए कंकाल मिलते है, न कि जलाए गए। आज साइंस दफनाने के उपजाऊ फायदे और जलाने के पर्यावरण नुकसान के बारे में साफ बताती है।

दूसरी बात जब अग्नि का अविष्कार नहीं हुआ था तब मरने वाले के शरीर का कैसे नष्ट किया जाता होगा? यक़ीनन उस समय भी ज़मीन में ही गाड़ा जाता था। आज भी हिन्दू धर्म मानने वाले लोग, बच्चो के मृत्यु पर उन्हें दफनाते ही है।


(7) रेगिस्तान में हरयाली नहीं होती. ऐसे में रेगिस्तान में हरा चटक रंग देखकर इंसान चला आता की यहाँ जीवन है ओर ये हरा रंग सूचक का काम करता था.

जवाब: सारे रंग एक निराकर ईश्वर के है। सभी धर्मों के रंग इसानों के निर्धारित किये हुए है। इस्लाम किसी रंग को धार्मिक रंग के तौर पर मान्यता नहीं देता। इस्लाम के लिए हरा, भगवा, सफेद, सब उसके रंग है। मुसलमानो की मान्यतों में हरे रंग को ज़रूर तरजीह दी जाती है वैसे ही जैसे हिन्दुओ में भगवा को दी जाती है। पर इसका मतलब ये तो नही है कि भारत के वनों में आग अधिक लगती थी इसलिए हिन्दुओ ने भगवा चुना। प्रश्न करने वाले के कुतर्क से चले तो दुनिया के सारे रेगिस्तानी इलाकों के लोगों के धर्म के रंग हरा होना चाहिए था और भारत के तिरंगे में हरा रंग राजस्थान के कारण रखा होना चाहिए था। अगर कोई लाभ, सुविधा और इच्छा अनुसार रंग चुने तो इसमे किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए।

(8) अरब देशो में लोग रेगिस्तान में तेज़ धुप में सफ़र करते थे, इसीलिए वहां के लोग सिर को ढकने के लिए टोपी पहनते थे। जिससे की लोग बीमार न पड़े.

जवाब: सवाल बनाने वाले ज़रा भी होमवर्क नहीं करते है। क्योंकि अरब के लोग टोपी नहीं, सर पर पगड़ी पहनते थे या कपड़ा रखते थे जैसा भारत या दुनिया में हर जगह पहले किया करते थे और आज भी करते है। जो धूप से बचने के लिए होता है और सम्मान की भी निशानी होती है। अरब में उस कपड़े या पगड़ी को सर पर टिकाए रखने के लिए अंदर पहले टोपी पहनी जाती है। आज इस पगड़ी की जगह टोपी ने ले ली है। टोपी इस्लाम धर्म का आदेश नही है अगर ऐसा होता नमाज़ के फ़राइज़ में टोपी भी होती। वैसे ही जैसे साधुओं की पगड़ी कोई धर्म का आदेश नही बल्कि एक कल्चरल चीज़ है। 

(9) अब रेगिस्तान में खेत तो नहीं थे, न फल, तो खाने के लिए वहा अनाज नहीं होता था. इसीलिए अरब के लोग जानवरों को काट कर खाते थे और अपनी भूख मिटाने के लिए इसे क़ुर्बानी का नाम दिया गया।

जवाब: मांसहार ईश्वर की तरफ से दी गयी अनुमति है जो संसार के प्रारंभ से होता आया है। आज भी सभी रेगिस्तानी, पहाड़ी, चटियल, बर्फिली, तटीय जगहों में इन्ही कारणों से मांसहार किया जाता है। भारत मे भी ऐसे स्थानों पर हिन्दू भाई मांसाहार करते है जैसे पहाड़ी राज्य, नार्थ ईस्ट राज्य, दक्षिण भारत, बंगाल आदि में।  वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत में मांसहार का उल्लेख है। बलिप्रथा हिन्दुओ की प्रथा है और बलि शब्द ही संस्कृत का है। अश्मेध, अजमेध और नरमेध यज्ञ में मेध का अर्थ ही बलि है। भारत की आज कुल 75% जनसंख्या मांसाहारी है और भारत मे मुस्लिम जनसंख्या लगभग 15% है। बाकी के कौन से धर्म के हुए। आदिमानव काल से ही अधिकतर दुनिया हमेशा से मांसहारी रही है और आज भी है।

(10) रेगिस्तान में पानी की बहुत कमी रहती थी, इसीलिए मुसलमान लिंग (मुत्रमार्ग) साफ़ करने में पानी बर्बाद न हो जाये इसीलिए लोग खतना (अगला हिस्सा काट देना) कराते थे।

जवाब: खतना करना इस्लाम का नही बल्कि मुसलमानों का रिवाज है। इसका कारण बहुत से मेडिकली फायदे है जिसे एड्स, कैंसर, एसटीडी, इंफेक्शन आदि से बचाव, न कि पानी बचाने जैसा बचकाना कारण। इसका एक फायदा ये भी है कि यह हिस्सा (prepuce) जन्म के समय बच्चे के शिशन की रक्षा करता है जैसे जन्म उपरांत Umbilical Cord की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, उसी तरह लिंग की अतिरिक्त खाल काट दी जाती है। इसके फायदों के कारण ही दुनिया भर में यह होता रहा है और आज भी हर जगह वेस्टर्न लोग इसे कराते है। हालांकि भारत में इसका प्रचलन हमेशा से कम रहा है जिसका कारण सांस्कृतिक है। WHO की रिपोर्ट है कि दुनिया के लगभग 40% लोग खतना कराते है। प्राचीन काल से खतना समाज और पुरुषार्थ का अंग रहा है और इसे धार्मिक, सांस्कृतिक और मेडकिल कारणों से कराया जाता रहा है।  दुनिया भर के इतिहासकार इसका प्रचलन 4 लाख पुराना मानते है (सुमेरी और सामी जाति माइग्रेशन काल से) और चिकित्सा पद्धति के तौर पर इसे 15 हज़ार वर्ष पुराना सर्जिकल प्रोसीजर मानते है। मिस्र में ढाई हज़ार वर्ष पुराने चित्र आकृति पर इनके सबूत मौजूद है। कई अफ्रीकी और ऑस्ट्रेलिया मूलनिवासी जनजातियों में यह रिवाज है। यहूदी धर्म में यह एक धर्मिक प्रथा है। ईसाइयों में खतना होता है और बाइबिल में इसकी आज्ञा दी गयी है।

इस त्वचा को काटना अगर ईश्वर की बनावट में छेड़छाड़ है या ये कहना कि ईश्वर को इसे कटवाना ही होता तो इसको बनाया ही क्यों जैसे तर्कों का एक ही जवाब है कि फिर बाल, नाखून, भंवे क्यों तराशते हो। कान, नाक छिदवाना भी क्या छेड़छाड़ नहीं है।

वैसे खतना यहूदियों में हज़रत इब्राहीम से शुरू हुआ। इस तरह बनी इस्राइल में जारी रहा।  हज़रत ईसा बनी इस्राइल में आये थे इसलिए ईसाईयो ने करवाना जारी रखा। फिर कुछ समय बाद संत पॉल ने इसे रुकवा दिया कि इसकी अब ज़रूरत नहीं है। 

(11) अरब में सब लोग एक ही कबिलो के खानाबदोश होते थे इसलिए आपस में भाई बहन ही निकाह कर लेते थे।

जवाब: इस्लाम मे भाई बहन की शादी हराम है और क़ुरान में बताए गए कई रिश्तों में शादी नही कर सकते। उनके अलावा सब जगह कर सकते है यंहा तक कि फर्स्ट कज़िन में भी कर सकते है। कज़िन मैरिज को वरीयता या प्राथमिकता नहीं दी गयी है पर अनुमति दी गयी है।


दुनिया भर में हर धर्म मे कज़िन मरीज होती थी और है। राजा महाराजा परिवारों में भी यह एक आम बात थी। हिन्दू मैरिज एक्ट (1955) से पहले कज़िन से शादियां कोई नई बात न थी।

आज भी हिन्दू धर्म और भारत में कज़िन मरीज का प्रचलन है और दक्षिण राज्यों में, नार्थ ईस्ट राज्यों में, पारसियों में, ईसाइयों में, आदिवासियों में और कई दलित जातियों में होती है। दक्षिण भारत के कई हिन्दू समुदायों में सगे मामा-भांजी की शादी को प्राथमिकता दी जाती है। केवल उत्तर भारत में इसका प्रचलन नहीं है क्योंकि उत्तरवैदिक काल में आर्यो में गोत्र कांसेप्ट की उत्पत्ति हुई और धीरे धीरे, उत्तर भारतीय उच्च वर्णों में इसका चलन कम होता गया। वैसे भारत में भी प्राचीन काल से इसका प्रचलन रहा है जिसका इतिहास में ऐसे कई प्रसंग है।


जैसे श्रीकृषण ने अपनी 2 क्रोस कज़िन भद्रा से और मित्रविन्दा (जो उनकी छठी पत्नी थी और कुंती की बहन की बेटी और पिता वासुदेव के भाई की बेटी थी) से विवाह किया। श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का भी विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था। भगवतपुराण में आता है की अभिमन्यु के बेटे परिक्षित ने अपन मामा की बेटी इरावती से विवाह किया। बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं।  महावीर स्वामी की सुपुत्री अनोजया (प्रियदर्शनी) का भी अपने कज़िन जमाली से विवाह हुआ था। शिवाजी महाराज के सुपुत्र राजाराम ने कज़िन ताराबाई से शादी की थी और शिवाजी की बेटी सुकु बाई ने भी अपने कज़िन से विवाह किया था। राजा अजातशत्रु ने भी अपनी कज़िन  से शादी की थी।


(12) रेगिस्तान में मिट्टी मिलती नहीं थी मुर्ती बनाने को इसलिए मुसलमान मूर्तीपुजा नहीं करते थे और खानाबदोश थे।

जवाब: सवाल करने वाले को अरब का अंश मात्र ज्ञान नहीं है। क्योंकि अरब में भी मूर्तिपूजा होती थी पहले। मानवता की शुरवात में केवल एक ईश्वर को पूजा जाता था। फिर धर्म मे बिगाड़ पैदा होने पर मानव मूर्तिपूजा शुरू कर देते थे। इस्लाम आने के बाद अरबों ने मूर्तिपूजा इसलिए बंद कर दी थी क्योंकि क़ुरान ने कहा कि सिर्फ एक ईश्वर उसकी इबादत करो। जैसे वेदों में कहा गया है कि 'तस्य ते भाक्ति वांस स्याम' अर्थात उसी एक निराकर ईश्वर की भक्ति करो। वेदों और उपनिषदों में मूर्तिपूजा को प्रतिबंधित किया गया है और केवल एक निराकर ईश्वर की पूजा के आदेश दिए गए है।

(13) अरब में एक जगह से दुसरी जगह जाना पड़ता था इसलिए वंहा कम बर्तन रखते थे और एक थाली नें पांच लोग खाते थे।

जवाब:  ये सब धार्मिक नही सांस्कृतिक, सामायिक और आवश्यकता अनुसार करने वाले कार्य है जो हर जगह किए जाते है। पहले समय मे लोगों के घरों में बर्तन और अन्य सामान कम या ज़रूरत के मुताबिक ही होता है। भारत मे भी। और आज भी गांव देहात में या गरीबों के पास बर्तन कम ही होता है। पहले प्रेम भाव और मेल मिलाप भी अधिक था तो साथ साथ भी खाते थे। हमारी तरह वंहा जात पात का चक्कर नहीं है कि तथाकथित निचली जाती वालों के साथ एक बर्तन में खाना तो दूर, उन्हें छूना और उनके पास बैठना भी पसंद नहीं करते।

(14) कबीले की अधिक से अधिक संख्या बढ़े इसलिए अरब में हर एक को चार बीवी रखने की इज़ाजत दी जाती थी।

जवाब: पहले समय मे बहुपत्नी आम बात थी। राजघरानों, रजवाड़ों में यह बेहद सामान्य था। सौ साल पहले तक भारत मे भी ये एक आम चलन था और हिन्दू समाज में भी। ये तो डॉक्टर अम्बेडकर ने धर्म के ठेकेदारों सेनलड़ झगड़ कर 1955 का हिदू मैरिज एक्ट बनावाया और हिन्दुओ में अनेक शादियों पर प्रतिबंध लग गया। वेद आदि या दुनिया का कोई भी धार्मिक ग्रंथ नहीं कहता कि एक ही शादी करो, सिवाय क़ुरान के।  क़ुरान कहता है कि केवल एक ही शादी करो। पर आगे क़ुरान एक से ज़्यादा शादी की इजाज़त देता है पर सिर्फ कुछ विशेष स्तिथियों में जैसे बांझो, विधवाओं, यतीमों, बेसहाराओं, निर्धन आदि से। पर साथ ही शर्त भी लगा देता है कि उनके बीच न्याय करना। और यह न्याय ऐसा नही होना चाहिए कि दो सेब लाओ, और दो बीवी में एक एक बांट दो। नहीं। बल्कि एक सेब के दो टुकड़े करो और उनको बाटों। और जो इतना परफेक्ट न्याय न कर सके उसके लिए एक शादी जायज़ है। क़ुरान आम हालात में एक ही शादी को कहता है और उसी को प्राथमिकता देता है पर कुछ विशेष स्तिथियों में बहुविवाह की अनुमति भी देता है।

हिन्दू धर्म और ग्रंथो में भी बहुपत्नी की इजाज़त है। अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा! ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!  मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति! कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी! कृष्ण भगवान की 16108 पत्नियां थी। राम के पिता दशरथ की पत्नियों की संख्या अलग अलग आती है। कंही 60000 है, कंही 353 है, कंही 3 है, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा! वाल्मीकी रामायण से पता लगता है उस समय बहुतपत्नी प्रथा आम थी। मनुस्मृति (9:83) तो यंहा तक कहती है कि दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।


(15) इस्लाम कोई धर्म नहीं मात्र एक कबीला है और इसके नियम असल में इनकी दिनचर्या है ।

जवाब: इस्लाम कोई क़बीला नहीं बल्कि दीने फितरत है यानी प्रकृति का धर्म जो सभी मनुष्यों को बहुत सिंपल दिनचर्या बिताने को कहता है और एक ही ईश्वर की भक्ति करने को भी। और जो धर्म प्रकृति, इंसानी फितरत और आम दिनचर्या के अनुकूल न हो वो धर्म हो ही नही सकता। ये सारी बाते केवल ईश्वर के ही धर्म में ही हो सकती है और ये सब इस्लाम में है। धर्म और उसके नियमों का सामान्य और तर्कसंगत होना ही उसके सच्चे होने की एक निशानी है।


(16) अगर हर हिँदू माँ-बाप अपने बच्चों को बताए कि अजमेर दरगाह वाले ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती  ने किस तरह इस्लाम कबूल ना करने पर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को मुस्लिम सैनिकों के बीच बलात्कार करने के लिए निर्वस्त्र करके फेँक दिया था । और फिर किस तरह  पृथ्वीराज चौहान की वीर पुत्रियों ने आत्मघाती बनकर मोइनुद्दीन चिश्ती को 72 हूरों के पास भेजा  था ।

जवाब: ऐसे ख्वाजा तो साधु संत होते थे न कि राजा महाराजा जो सिपाहियों को ऐसे आदेश देंगे। तभी सभी धर्मों के लोग इन्हें सूफी संतों को मानते आए है और मानते है। ऎसी निवस्त्र करने की मनघडंक बाते कोई अज्ञानी ही कर सकता। एक भी प्रमाणिक इतिहास से सबूत कंहा है इस बात का? और ऐसे मेसेज लिखने वाले अनपढ़ को पता भी नहीं है कि ख्वाजा साहब की मृत्यु ऐसे नही हुई थी। रही बात 72 हूरों की तो बता दूं कि हिन्दू धर्म में हूरों से बढ़कर अप्सराएं होती है। 1008 प्रमुख अप्सरायें है जैसे रंभा, मेनका, उर्वशी जिनका कार्य आनंद और विलासता देना है। अथर्ववेद (4:34:2) कहता है कि स्वर्ग में बहुत सी स्त्रियों के साथ सुखमय जीवन प्राप्त होता है।  महाभारत (12:98:46) में श्रीकृष्ण कहते है अर्जुन से की अगर तू धर्म के मार्ग पर लड़ते हुए मरा तो तूझे हज़ारों अप्सराएं स्वर्ग में मिलेगी । यानी हज़ारों अप्सराओं के लालच के आगे तो 72 हूरे कुछ भी नहीँ।

(17) अजमेर के ख्वाजा  मुइनुद्दीन चिश्ती को ९० लाख हिंदुओं को इस्लाम में लाने का गौरव प्राप्त है ।  मोइनुद्दीन चिश्ती ने ही मोहम्मद गोरी को भारत लूटने के लिए उकसाया और आमंत्रित किया था।

जवाब: उस समय, अपने पौराणिक कल्पनाओं से भरे धर्म, वर्ण व्यस्वस्था, जात पात से त्रस्त आ चुके लोग ख्वाजा जैसे साधु संत के दरबार मे आते थे और हिन्दू मुस्लिम देखे बिना ख्वाजा जी सब पर दयालुता, उपाकरता करते थे, उनसे स्नेह, प्रेम करते थे। उनकी मदद करते थे। उनकी वित्तीय सहायता, इलाज आदि भी किया करते थे।। इसलिए लोग अपना जात पात आधारित धर्म छोड़कर बराबरी के धर्म मे आ जाते थे। दुसरी बात ये ९० लाख का आंकड़ा कंहा से कॉपी किया है? इतनी लंबी भी न छोड़ो। और प्रामाणिक इतिहास में ऐसे उकसाने के कोई सबूत ही नहीं है। अगर गौरी जैसे शासक यंहा लूटने आते थे फिर यंहा के राजा महाराजा, राजवाड़े क्षत्रिय खानदान उनके साथ रिश्तेदारी क्यों करते थे, उनसे जागीरे, मन्स्बे और दरबारों में ओहदे क्यो लेते थे। असल में अधिकेतर केस में तो यंहा के कमज़ोर हिन्दू राजा ही उन्हें आक्रमण के लिए या अपनी सहायता के लिए दुश्मनों से बदला लेने के लिए बुलाते थे। यंहा आये मुस्लिम बादशाह भी धर्म के आधार पर नही बल्कि सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई लड़ते थे। वैसे ही जैसे यंहा पहले से रह रहे राजा, महाराजा आपस मे लड़ा मरा करते थे, राज पाट और सत्ता के लिए। भारत में मुसलमानो से पहले ही बहुत से विदेशी आक्रमणकारी आये और यंही बस कर अपनी नस्ले बढ़ाई जैसे आर्य, यवन (यूनानी), शक, पहलव, कुषाण, हूण आदि। यंहा तक कि भारत के कई राजाओं ने विदेशों पर भी आक्रमण किया और वंहा राज किया जैसे चोल आदि।

उपरोक्त सभी सवाल दरअसल व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का सिलेबस है। लिखने वाले न सही, पर कम से कम फारवर्ड करने वाले ही आगे भेजने से पहले थोड़ा दिमाग लागये तो सभी सवालों की बेवकूफी से भरे नज़र आ जायँगे। इन्हें सवाल की बजाए चुटकले कहना ज़्यादा अच्छा रहेगा। 

Sunday, 13 September 2020

संस्कृत काल और रामायण काल।

क्या संस्कृत ईसा काल (1st Centuray AD) से पहले  नहीं थी और क्या रामायण, बुद्ध काल (6th Century BC) के बाद लिखी गयी?

संस्कृत

यह बात सत्य है कि संस्कृत भाषा के सभी प्राचीनतम आर्कियोलॉजिकल एविडेन्स और इंस्क्रिप्शन, ईसा (1 cent. AD) के आसपास के हैं और बुद्ध (6 cent. BC) के काफी समय बाद के। पर जो लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि संस्कृत प्राचीनतम भाषा नहीं है, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि संस्कृत एक प्रचिनतम भाषा है, भले ही इसके बेहद पुरातात्विक प्रमाण अभी न मिल रहे हो। क्योंकि इराक, सीरिया, टर्की में 1500 BC काल में मितन्नी जैसे कई वंश हुए हैं जिनके राजाओं के नाम इसी भाषा में मिलते हैं जैसे पुरुष, सुबंधु आदि। अब यंहा से संस्कृत भाषा वंहा गयी या वंहा से यंहा आयी, ये एक भिन्न प्रश्न है। 

ऋग्वेद की संस्कृत और पारसीयों की जेंद अवेस्ता की अवेस्तन भाषा में समानता के कारण, दोनों का काल ईसा से 1500 से 2000 साल पूर्व कहा जाता है। भाषाविद्व कहते हैं कि अवेस्ता से 400 से अधिक शब्द ऋग्वेद में लिए गए हैं। इसका काल, इनकी भाषा और घटनाओं के आधार पर फिक्स किया गया है। संस्कृत ऋग्वेद से होती हुई अन्य तीन वेदों में सरल होती गयी है और इस तरह से वैदिक संस्कृत और आधुनिक संस्कृत में बहुत अंतर आ चुका है। हर पुरानी भाषा के साथ ऐसा ही होता है।

संस्कृत के पुरातात्विक सबूत इसलिय कम मिलते हैं क्योंकि उत्तरवैदिक काल से, इस पर एक विशेष वर्ग अर्थात ब्राह्मणों ने नियंत्रण रखना शुरू कर दिया जिससे यह खत्म होती चली गई। क्योंकि संस्कृत में धर्मग्रन्थ होने पर इसका महत्व अधिक धार्मिक होता गया और अन्य वर्गों विशेषतः शूद्रों द्वारा इसके मंत्र उच्चारण, पाठ, सीखने पर पाबंदी और दण्ड लगाते चले गए।

संस्कृत भाषा एक आम भाषा से होते हुए समय के साथ साथ उच्च वर्ग की भाषा हो गई या यूं कह सकते है कि संस्कृत बोलने वाले, वर्चस्ववादी वर्ग के हो गए। फ़ारसी ज़ुबान के साथ भी बाद में यही हुआ था। जब फ़ारसी बोलने वाले, हुक्मरान बने तो सरकारी ज़ुबान फ़ारसी हो गयी। पर लोगों की ज़ुबान स्थानीय ही रही और इसलिए वो भाषाएं बाकी रही। बाद में फ़ारसी और देवनागरी की मिलावट से उर्दू की पैदाइश हुई और फ़ारसी यंहा से खत्म होती चली गयी। 


रामायण

सबसे पहले असल में राम शब्द, ईश्वर का एक नाम था जिसका अर्थ होता है सबसे सुंदर। पर बाद में ये विष्णु के नाम के लिए भी प्रयोग होने लगा क्योंकि विष्णु को भी ईश्वर की एक विशेषता की बजाए एक अलग अस्तित्व और ईश्वर के समतुल्य माना जाने लगा था। इसी तरह राम को विष्णु का अवतार भी माना जाने लगा। फिर आम लोग भी यही नाम या इस पर आधारित नाम रखने लग गए थे जैसे आज भी लोग रखते है। श्रीराम का असली नाम रामचंद्र था यानी राम का चन्द्र हैं। असल मे उनका नाम ईश्वर के एक भक्त के रूप में रखा गया था।

वेदो में राम शब्द दो बार आया है जो किसी अन्य व्यक्ति और राजा के नाम है। वेदों में सीता शब्द भी आया है पर वंहा इसका अर्थ खेती है, न कि एक स्त्री का नाम है। वेदो में इक्षवाकु (रामचन्द्र के पूर्वज) शब्द आया है पर उन अर्थो में नहीं जो रामायण में है। वाल्मिकी का भी उपनिषदों और पुराणों में कंही उल्लेख नही है। 

सबसे पहले श्रीराम का उल्लेख साहित्यिक तौर पर बुद्ध की दंतकथाओं यानी जातक कथाओं (4 cent. BC or older) की दशरथ कथा में आता है। जिसने श्री राम की कहानी बेहद सादे अंदाज़ में बताई गई है जिसमे वह सिर्फ एक साधारण मानव हैं और पिता के कारण वनवास काटकर आते हैं और फिर एक अच्छे राजा बनकर राजपाट चलाते है। इस कथा में राम, लक्ष्मण और सीता तीनों भाई-बहन हैं और रावण का पात्र नहीं है। कहानी के अंत में बुद्ध इस राम को अपना पूर्व जन्म बताते है। इस कहानी को बाद में भरहूत स्तूप पर (2 cent. BC) और दूसरी जगह (नागार्जुन कोंडा और सांची आदि) भी उकेरा गया। स्पष्ठ है कि वाल्मीकि की रामायण से पहले यही राम कथा अधिक प्रचलित थी और संभवतः इसी की प्रेणना से रामायण लिखी गई।  इस पर विद्वानों की दोनों राय मिलती है यानी पहली कि दशरथ कथा से प्रेरणा लेके रामायण लिखी गयी और दूसरी कि रामायण का ही एक संक्षिप्त संस्करण दशरथ कथा है। मूलतः रामायण एक बायोग्राफी ही है। 

असल में प्राचीन काल से ही रामचंद्र की कथा अलग अलग वर्ज़न में बहती चली आ रही थी और आगे भी जारी रही इसकिये आज भारत और साउथ ईस्ट एशिया में ऐसी कथाओं की भरमार है। आज ऐसे लगभग 300 से अधिक रामायण के संस्करण है और 1000 से अधिक रामकथा के। किसी में लक्षमण रावण का वध करता है तो किसी मे लक्षमण हीरो है। किसी मे रावण हीरो है तो किसी में सीता रावण के बेटी है। जैनियों की भी रामायण पौमचरित के नाम से (1 cent. AD) में लिखी गयी जिसे बाद में 7वीं सदी में पदमपुराण या पदमचरित के नाम रिवाइज्ड किया गया और बाद में भी कई वर्ज़न आये। इन सभी मे अंतर पाया जाता है। जैनियों की अपनी महाभरत भी है जिसका नाम है पांडव पुराण। सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि रामायण के जितने भी प्रकरण विश्व भर में मिलते है, सभी के सभी ईसा काल के बाद है। अगर रमायण हज़ारों वर्षों पुरानी होती तो इसके विभिन्न भाषाओं में प्रकरण हज़ारों साल पुराने भी मिलते।

यानी राम बुद्ध से बहुत पहले हुए थे और विभिन्न प्रकार की रामकथा भी बुद्ध से पहले ही दंतकथाओं में भी चली आ रही थी जिनमें सिर्फ बुद्धिस्ट वर्ज़न के ठोस प्रमाण उपलब्ध है। वाल्मीकि की रामायण, बुद्ध के बाद लिखी गई जिसमे काल्पनिक इवेंट्स और अतिशयोक्ति की भरमार है। वाल्मीकि रामायण में ही बुद्ध और उनके अनुयायियों के ज़िक्र आता है:-

● यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्ध स्तथागतं। नास्तिक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम्  स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।
(वाल्मीकी रामायण: अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34) 
अर्थात जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार बुद्ध और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है।

यास्क मुनि (6 cent. BC) द्वारा रचित प्राचीन शब्दकोश और व्याकरण ग्रन्थ जैसे निघण्टु और निरुक्त में रामायण या उसकी ग्रामर के बारे में एक शब्द नही है। संस्कृत ग्रामर पर आज तक कि सबसे प्रमाणिक किताब पाणिनि द्वारा लिखित अष्टाध्यायी (4 cent. BC) में महाभारत, वासुदेव, अर्जुन जैसे शब्दों पर तो टिप्पणियां मिलती है पर रामायण पर कुछ नहीं मिलता। पंतजलि (2nd cent. BC) ने पाणिनि पर एक कमेंटरी, महाभाष्य (संस्कृत ग्रामर विषय पर) लिखा और वो भी रामायण और उसके शब्दो के ज़िक्र से खाली है। हालांकि वाल्मीकि रामायण में श्री कृष्ण शब्द उल्लेख मिल जाता है जो इस बात का प्रमाण है कि महाभारत काल के बाद रामायण लिखी गयी।
 

● हे रामचन्द्र, आप अंतर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हो, आप ही विष्णु और आप ही महाबली कृष्ण हो

(वाल्मीकि रामायण 6.117.15)  

 

इसी तरह रामायण में चैत्य शब्द भी कई स्थानों पर आता है और बौद्ध मंदिरों को चैत्य कहते हैं। एक समय में सनातन धर्म बौद्ध और जैन धर्म का घोर विरोधी रहा है और इन धर्म से संबंधित चीजों को नीचा दिखाने के लिए हिन्दू ग्रंथो में काफी कुछ लिखा गया है।


● भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि।

( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15 )
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं।


इसके अलावा लंका में रावण की बनाई अशोक वाटिका को सभी जानते हैं, जिसका उल्लेख रामायण में है। बौद्ध होने के बाद सम्राट अशोक (3सरी सदी ई.पु.) ने लंका में अपने पुत्र और पुत्री को भेजकर बुद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करवाया था और लंका को बुद्धमय कर दिया था। इसी कारण यंहा किसी स्थान का नाम अशोक के नाप पड़ा होगा या फिर अशोक के नाम से लंका वासियों ने जोड़ा होगा। और अगर इस नाम की कोई जगह नहीं थी और ये केवल वाल्मीकि की कल्पना मात्र थी तो वाल्मीकि द्वारा सनातन धर्म के किसी नाम की बजाय अशोक के नाम पर वाटिका का नाम रखना यही संकेत करता है कि उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रतीकों के वके प्रति दुर्भावना से यह नाम रखा हो क्योंको सनातन और बौद्ध धर्मों की आपस प्रतिस्पर्धा इस काल में सामान्य बात थी।


● तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।

ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ ७३ ॥

वहाँ रावणपालित लङ्कापुरी में पहुँचकर, उन्होंने अशोक वाटिका में सीता को चिन्तामग्न देखा।

(बालकांड प्रथम सर्ग)


रामकथा का स्रोत लोकजीवन ही है। वाल्मीकि ने अपनी महाकाव्य रचना, रामायण, लोक में प्रचलित रामकथा को आधार बनाकर ही रची। राम की कथा लोकगाथाओं, वाचिक परंपराओं और लोकमानस में पहले से ही विद्यमान थी। वाल्मीकि ने इन कथाओं को संगठित और काव्यात्मक रूप देकर रामायण की रचना की। इसका संदर्भ रामायण बालकांड में भी मौजूद है:-

● आदिकवि वाल्मीकि ने नारद से प्रश्न किया - कोsन्वस्मिन्‌सांप्रतं लोके बलवान्कश्च वीर्यवान्‌? नारद ने उत्तर दिया - इक्ष्वाकुवंश प्रभवो रामो नाम जनै: श्रुत:। 

वाल्मीकि ने जब नारद से पूछा कि इस संसार में सबसे श्रेष्ठ और आदर्श पुरुष कौन है, तब नारद ने राम के गुणों का वर्णन किया और कहा कि राम का नाम लोक में पहले से प्रचलित है। नारद के शब्द "रामो नाम जनैः श्रुतः" का अर्थ यही है कि रामकथा पहले से लोक में अनुश्रुति (श्रुति परंपरा) के माध्यम से सुनाई और गाई जाती थी।


हालांकि आम तौर पर यही माना जाता है कि रामायण हज़ारों वर्ष पूर्व लिखी गयी जबकि बहुत से निष्पक्ष विद्वान मानते हैं कि रामयण में समय के साथ साथ श्लोकों में बढ़ोतरी होती गयी।


वाल्मीकि की रामायण का डिक्शन, स्टाइल और अश्वघोष (1 cent. AD) की बुद्धचरित की शैली एक जैसी ही है। बुद्धचरित में अश्वघोष, रामायण की ग्रामर और वोकेबलरी पर बात करता है और वाल्मीकि की समकालीन लेखकों से तुलना भी करता है। यानी या तो वाल्मीकि अश्वघोष के समकालीन रहे है या कुछ ही वर्ष पहले। असल मे रामायण की प्रसिद्धता देख कर ही बुद्धचरित लिखी गयी थी। सनातम धर्म के रामचरित के सामने बौद्धधर्म का बुद्धचरित लिखा गया, संस्कृत में और टक्कर देने के लिए, बुद्धचरित में भी बहुत काल्पनिक इवेंट्स और अतिशयोक्तियां बुद्ध के जीवन से जोड़े गए, जिसके खिलाफ स्वयं बुद्ध उपदेश देके गए थे।


यंहा तक कि सुंदर कांड, सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है जो अश्वघोष रचित  बुद्धचरितम ( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक।

श्री अरबिंदो ने राम और रामायण पर कहा है कि "राम को ऐतिहासिक मानने का कोई आधार उपलब्ध नहीं है। वानरों की सेना जैसी बात विश्वसनीय नहीं है। वाल्मीकि ने ये सब या तो पम्परा लिया होगा या कल्पनाशीलता से या किसी दैविक संसार से। और ऐसी पत्रों को गढ़ा होगा। कुछ का ये मानना है कि वाल्मीकि से पूर्व भी रामायण रही है।"

देवदत्त पटनायक ने वाल्मीकि रामायण को पौराणिक यूनानी महाकाव्य से प्रेरित हो सकने की आशंका ये कहके जताई है की "कुछ विद्वानों ने महाकाव्य इल्लियाड और महाकाव्य रामायण में बहुत सी समानताएं पाई है। दोनों ही महाकाव्यों का अंत दुःखद है क्योंकि इनके विजेता अन्ततः प्रसन्न नही थे। ट्रोजन युध्द और लंका युध्द के पीछे का कारण भी समान है (यानी दोनो युद्दों के केंद्र में स्त्री है)। भारतीय पौराणिक कथाओं में सुखद अंत होना एक अनिवार्य गुण होता था जैसा की पांचवी सदी ईसा पूर्व में भारतमुनि द्वारा लिखे गया ग्रन्थ नाट्यशास्त्र से भी विदित है जो भारतीय उपमहाद्वीप की रंगकलाओं से संबंधित एक महाग्रंथ है। हालांकि रामायण का अंत सुखद न होकर दुखद होना यही दर्शाता है की यूनानी महाकाव्य रामायण का प्रेरणा स्रोत हो सकता है।"

रोड्स (Rhodes) में बनी 610 ईसापूर्व के काल की एक प्लेट पाई गई है जिस पर इल्लियाड का चित्र अंकित है। जबकि रामायण कथा के साक्ष्य इसके उपरांत के है। रामायण पर सबसे पुरानी इंस्क्रिप्शन गिरनार (2 cent. AD) अभिलेख पर मिली है। और रामायण की सबसे पुरानी मैनुस्क्रिप्ट 11 वी सदी की है। इससे यही बात स्पष्ट होती है कि सदियों से परम्परा में चली आ रही रामकथा के इर्दगिर्द यूनानी काव्य से प्रभावित होकर रामायण लिखी गयी।

राम, रामयण और यूनानी पौराणिक कथाओं में और भी कई अन्य समानता मिलती हैं। अब्राहम और राम कथा में भी अनेकों समानता है जिस पर डॉक्टर भारत झुनझुनवाला कैसे कुछ विद्वान काफी कुछ लिख चुके हैं।

निष्कर्ष ये है कि समकालीन साक्ष्यों, वाल्मीकि रामायण कि भाषा शैली, कंटेंट व इतिहास आदि से यह पता लगता है कि उसे बुद्ध  (6 cent. BC) के बाद लिखा गया। इसीलिए बड़े हिस्टोरियनस का यही मानना है कि वाल्मीकि रामायण 3 cent. BC के बाद लिखा गया है। 
 
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दर्शन के ग्रंथों (न्याय दर्शन, मीमांसा दर्शन आदि) में रामायण और महाभारत के चरित्रों का उल्लेख है जैसे ब्रह्मसूत्र में राम, हनुमान और योग दर्शन में कृष्ण का। 
 
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हालाँकि मितानी साम्राज्य के लोगों की संस्कृति और भाषा हिटाइट या हुर्रित (Hurrian) भाषा से जुड़ी थी, न कि संस्कृत से। मितानी साम्राज्य में संस्कृत या वैदिक संस्कृति के प्रभाव हैं. ऐसा माना जाता है कि आर्य-वंशीय लोग जिन्होंने सिंधु-सप्त सिंधु (Indus Valley) क्षेत्र और उत्तर भारत में संस्कृत भाषा और संस्कृति को स्थापित किया, उनके साथ संपर्क के कारण संस्कृत या संस्कृत जैसी भाषाएँ मध्य एशिया में पनपीं। हालांकि, हुर्रित संस्कृति और भाषा में भारतीय प्रभाव का पता नहीं चला है, लेकिन यह संभव है कि आर्य प्रवासी संस्कृत भाषा या उनके धार्मिक प्रभाव से परिचित थे, और इसलिए उनके नामों में संस्कृत के तत्व थे। 
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Adam’s Bridge is made mainly of coral reefs, limestone shoals, calcareous sandstone and shell fragments — all marine carbonate materials arranged in layers, formed between about 18,000 and 3,500 years ago from the oldest to the youngest parts.

Treta Yuga lasted 12,96,000 years (Arya Samaj also believed this to be hid period). However, generally, Shri Ram's life is traditionally placed around 5000-7000 years ago by some scholars/historians. Moreover, Shri Krishna is also believed to be lived in the same period by many Hindu scholars. It clearly seems that all the assumptions and no concrete evidence can be presented to prove it with authenticity.
 
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Some similarities by Dr. Harmik Vaishnav, School of Liberal Studies.
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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...