Thursday, 26 November 2020

Statements of Muslims and Non Muslims on Islam, Muslims, God and Religion.


● लोगों ने ऐसा ख़ुदा दरयाफ्त कर रखा है जिससे डरने की ज़रूरत नहीं। लोगों को ऐसा रसूल हाथ आ गया है जो सिर्फ इसलिए आया था कि उनकी सारी बद-अमालियों के बावजूद ख़ुदा के यहां उनका यकीनी सिफारिश बन जाए। लोगों को ऐसी आख़िरत मिल गई है जहां जन्नत सिर्फ अपने लिए है और जहन्नम दूसरों के लिए। लोगों को ऐसी नमाज़ें हासिल हो गई हैं जिनके साथ किब्र और हसद जमा हो सकते हैं। लोगों को ऐसी रोज़ी मालूम हो गई है जो झूठ और ज़ुल्म से फासिद नहीं होती। लोगों को ऐसा दीन हाथ आ गया है जो सिर्फ बहस और मुबाहिसे करने के लिए है न कि अमल करने के लिए। मगर झूठा सोना उसी वक़्त तक सोना है जब तक वो कसौटी पर परखा न गया हो। उसी तरह फरेब का ये कारोबार भी सिर्फ उसी वक़्त तक है जब तक ख़ुदा ज़ाहिर हो कर अपने इंसाफ की तराज़ू खड़ा न करदे। ~ मौलाना वहीदुद्दीन खान

● अमन के लिए इंसाफ की शर्त लगाना गैर हकीकी है। अमन सिर्फ इसलिए होता है की इंसाफ के मकसद को पूरा करने की कोशिश के लिए कारगर फिज़ा हासिल हो सके। यही अक़्ल के मुताबिक भी है और यही इस्लाम के मुताबिक भी। पैगंबरे इस्लाम ने जब हुदैबिया का अमन मुआहिदा किया तो उसमें आप को सिर्फ अमन मिला था, इंसाफ नहीं मिला था। अलबत्ता जब अमन के ज़रिए मुनासिब हालात पैदा हुए तो आपने उन हालात में अमल करके बाद को इंसाफ भी हासिल कर लिया। इंसाफ कभी अमन का हिस्सा नहीं होता, इंसाफ हमेशा अमन के बाद हासिल शुदा मवाके को इस्तेमाल करने से मिलता है, न कि बराह रास्त तौर पर ख़ुद अमन से। ~ मौलाना वहीदुद्दीन खान।

● Conspiracy is Not Islam's Greatest Problem Today. The challenge before Muslims is to present Islam in the language of present age.  Failure of meeting this intellectual challenge is wrongly perceived as conspiracy and enmity on the part of other groups and nations. ~ Maulana Wahiduddin Khan (A gist of his Speech)

● 
इस्लाम और साइंस का मेल।
एक बार मेरी मुलाकात एक एेसे शख़्स से हुई जिन्होने साइंस में डिग्री हासिल की थी और इसी के साथ उन्होने मज़हब और तारीख़ (इतिहास) का भी अध्ययन किया था। वह ख़ुदा और मज़हब को नही मानते थे। बातचीत के दौरान उन्हेनें कहा : कि इस्लाम को अगर इतिहास से निकाल दिया जाये तो इन्सानी तारीख़ में क्या कमी रह जायेगी ?

मैने कहा : वही कमी जो इस्लाम से पहले इन्सानी तारीख़ में थी । ज़मीन पर इन्सान हज़ारों साल से आबाद है। मगर इतिहास गवाह है कि इस्लाम से पहले किसी भी दौर में इन्सान उस फन तक न पहुंच सका जिसको आज साइंस कहा जाता है। इसकी वजह क्या है! इसकी वजह बहुत सादा है, इस्लाम से पहले हर दौर में इन्सान के ऊपर शिर्क हावी था। यही शिर्क प्रकृति (चांद, सूरज, सितारे, पानी, हवा, आग आदि) पर तहकीक (Research) करनें मे रुकावट बना हुआ था। क्योंकि शिर्क के अकीदे के मुताबिक प्रकृति पूजने की चीज़ बनी हुई थी, जबकि साइंस का आगाज़ उस वक्त होता है जब इन चीज़ों को तहकीक की चीज़ समझा जाये न कि पूजने की । मुशरिक इन्सान चांद को देवता समझता था इसलिये उसकी सोच इस तरफ जा ही नही सकती कि वह चांद पर अपने कदम रखे। वह सैलाब को खुदा का हिस्सा समझता था, इसलिये उसके लिये यह सोचना नामुमकिन था कि वह सैलाब को काबू में लाकर उससे बिजली पैदा करे। इतिहास में पहली बार इस्लाम नें शिर्क को कमज़ोर कर के तौहीद (एकेश्वरवाद) को ताकतवर बनाया। दूसरे शब्दों में इस्लाम ने इस सोच को बढ़ावा दिया कि ख़ुदा सिर्फ एक है बकि तमाम चीज़े खुदा की बनाई हुई हैं (वो खुदा नही हैं), इस तरह इस्लाम ने प्रकृति पर reserch का दरवाज़ा खोला। और आखिरकार तमाम साइंसी तरक्कियां वजूद में आयीं । इसमें शक नही कि इस्लाम इसलिये नही आया कि वह दुनिया को साइंस दे । मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि अगर इस्लाम न आता तो साइंसी तरक्कियों का दरवाज़ा इन्सान के ऊपर बन्द रहता, जैसे कि इस्लाम से पहले वो इन्सान के ऊपर बन्द पड़ा हुआ था। साइंसी तहकीक और तरक्की के सिलसिले में तौहीद (एकेश्वरवाद) की इस अहमीयत को Arnold toynbee (1889-1975) ने खुले लफ्ज़ों में कुबूल किया है।  (मौलाना वहीदउद्दीन की किताब "इस्लाम 15वीं सदी में" से मफहूम)


● एक साहब से गुफ्तगू के दौरान मैंने कहा कि मौजूदा ज़माने में मुसलमानों के तमाम लिखने और बोलने वाले, मुसलमानों के ऊपर दूसरी कौमों के मज़ालिम की दास्तान बयान करते हैं। ये बात बज़ाते ख़ुद सही है कि मुसलमान इस वक़्त हर जगह दूसरी कौमों के मज़ालिम की ज़द में है। मगर ये तंबीह ख़ुदावंदी है न कि गैरों का ज़ुल्म। मुसलमानों ने इन वाकियात को गैरों के ज़ुल्म के खाने में डाल रखा है इसलिए उनके अंदर सिर्फ एहतिजाज का ज़हन उभर रहा है। अगर वो इन वाकियात को तंबीह ख़ुदावंदी समझते तो उनके अंदर इसलाह ख्वाहिश का जज़्बा पैदा होता। ~मौलाना वहीदुद्दीन खां

● सब इंसान मुर्दा हैं, ज़िंदा वो हैं जो इल्म वाले हैं।  सब इल्म वाले सोए हुए हैं, बेदार वो हैं जो अमल वाले हैं। तमाम अमल वाले ख़सारे में हैं, फायदे में वो हैं जो इख़लास वाले हैं।  सब इख़लास वाले ख़तरे में हैं, कामयाब वो हैं जो तकब्बुर से पाक हैं। ~ईमाम ग़ज़ाली

● मैं अपनी बात को दुरुस्त समझता हूं मगर इस मुमकिन सुरतेहाल के साथ कि वो गलत भी हो सकती है। और अपने मुखालिफ की बात को गलत समझता हूं मगर इस मुमकिन सुरतेहाल के साथ कि वो दुरुस्त भी हो सकती है। ~ईमाम शाफी

● हम में से हर शख़्स ग़लती करता है और हम में से हर शख़्स की कोई बात काबिले रद हो सकती है। सिवाय रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जो की मासूम हैं। ~इमाम मालिक

● जब हदीस से साबित हो जाए तो वही मेरा मसलक है। उसके बाद मेरे कौल को दीवार पर मार दो। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सिवा किसी का कौल हुज्जत नहीं। ~इमाम शाफई

● जो शख़्स मेरी दलील को ना जाने उसके लिए दुरुस्त नहीं कि वो हमारे कौल पर फतवा दे। अबु हनीफा जब किसी मसले पर फतवा देते तो कहते कि नोमान बिन साबित की राय है। हमारे इल्म के मुताबिक ये अहसन है। जो शख़्स इससे ज़्यादा अहसन को पाए तो उसके बाद वही ज़्यादा सही है। ~इमाम अबु हनीफा

● तुम मेरी तक़लीद ना करो और ना मालिक और शाफई और अवज़ई या किसी और कि तक़लीद करो। तुम भी वहीं से लो जहां से उन्होंने लिया। ~इमाम अहमद बिन हम्बल

● मुझे मुल्लों और सरमायदारों की जन्नत नहीं चाहिए; मेरा मिशन तो जहन्नम में फंसे लोगों की मदद करना है। -अब्दुल सत्तार इदी

● An unchallenged faith is a traditionally acquired prejudice. A society that doesn't allow faith to be questioned encourages pseudo faith. ~ via Dr. Khalid Zaheer.
एक निर्विरोध आस्था सांस्कृतिक तौर पर अपनाया हुआ एक पूर्वाग्रह होता है। ऐसा समाज जो आस्था पर प्रश्न करने की आज्ञा नहीं देता है, वह छद्दा आस्था को प्रोत्साहित करता है।
~ डॉ. ख़ालिद ज़हीर के द्वारा।

● मैं अपनी आवाज़ आपके कानों तक पहुंचा सकता हूँ, आपके दिल में नहीं उतार सकता, दिल में वही उतार सकता है, जिसने दिलों को पैदा किया है - मौलाना अबुल कलाम आज़ाद


■■■


● इंसानों के बीच रहना मुश्किल तरीन काम है। इसलिए सूफियों ने तन्हाई इख़्तियार की और पैगंबरों ने इंसानी बस्ती।

● सब से बड़ी बेहयाई, हया के फलसफे को सिर्फ औरत तक महदूद रखना है।

● मुसलमानों में लड़की को शादी के लिए हर चीज उसकी पसंद की दिलवाई जाती है सिवाय दूल्हा के।

● बात चल रही थी कि दीन किरदार से फैला है या तलवार से। जबकि मैं ये सोच रहा था कि ये जो फैला हुआ है क्या यही दीन है?

● आज के मुसलमानों का इस्लाम तब तक ही अमन का मज़हब है जब तक आप इख़्तिलाफ नहीं करते।

● दुरुस्त अकीदा ये है कि आप कभी किसी दूसरे के अकीदे की तौहीन ना करें।

● ये दुनियां सोए हुए लोगों का हुजूम है। और सोए हुए लोग कभी बेदार लोगों को  बरदाश्त नहीं करतें।

● लोग काफिर होने से डरते हैं, ज़ालिम होने से नहीं डरते!

● है नमाज़े सभी मेरी पूरी, बस फ़र्ज़ इंसानियत कज़ा हुई है।

● किसकी समझूं कीमत ऐ खुदा तेरे इस जहान में।
तू मिट्टी से इंसान बनाता है और वो मिट्टी से तुझे।

● कंही मसलक अलग तो कहीं फ़िरक़ा जुदा मिलता है।
यंहा सब कुछ मिलता है बस असल दीन नहीं मिलता।

● पायजामा नहीं किरदार ऊंचा कीजिए, दाढ़ी नहीं अमाल बढ़े कीजिए।

● जवानी में लोगों को हराम की टोपियां पहनाने वाले बुढ़ापे में हरम की टोपियां पहन लेते हैं।

● वो लोग दे रहे हैं हवाला कुरआन का, जो लोग खा रहे हैं निवाला हराम का।


■■■

नास्तिक अगर कहते हैं कि ईश्वर नहीं है तो इसलिए नहीं कि उन्हें पता चल गया है कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर के ना होने का पता तो किसी को भी नहीं चल सकता।  ईश्वर के ना होने का पता तो तभी चल सकता है जब कुछ भी जानने को बाकी नहीं रहे। जब तक कुछ भी जानने को बाकी है तब तक किसी भी व्यक्ति को ये अधिकार नहीं कि कहे ईश्वर कहीं नहीं है क्योंकि जो बाकी है उसमें ईश्वर हो सकता है। ~ओशो

■■■

भगत सिंह ने कहा अंग्रेज़ी हुकूमत स्पंज की तरह है। मुसलमानों पर इसलिए बम नहीं फोड़ा क्यंकि इन्होंने ऐसा राज किया कि सोने की चिड़या बन गया। उसी की चहचाहट तुम्हें यंहा खींच लाई। इन्होंने ने यंहा को ही घर बना लिया, यंहा की दौलत यंही लगा दिया।

सावरकर ने कहा है कि 1857 में सबसे बड़ा नुकसान बहादुरशाह का हुआ। 2 बेटे और 1 पोते का सार पेश किया गया।

For Vivekananda, Muslims were a “generous race, at heart as Indian as the Hindus.” He envisioned that India could reclaim her glory by combining the two great systems: “Hinduism and Islam – Vedanta brain and Islam body.” Comparing the Muslims with the British, he opined: “You look about India, what has the Hindu left? Wonderful temples everywhere. What has the Mohammedan left? Beautiful palaces. What has the Englishman left? Nothing but mounds of broken brandy bottles!”  In his article “On the future of Bharat,” Vivekananda wrote: “The Mohammedan rule was experienced as a liberation for the poor and downtrodden. That is how one fifth of our people became Mohammedans. To think that all these were brought by sword and fire is sheer madness.” He believed that Indian Muslims were strongly influenced by the Vedantic spirit of tolerance thus making them different from Muslims hailing from other nations.

◆◆◆

हम मुस्लिम शासन के ऋणी हैं। उनका शासन एक महान आशीर्वाद था और विशेषाधिकारों का अंत था। वह शासन मुकम्मल बुरा कतई नहीं था। कुछ भी पूर्णतया अच्छा नहीं होता और कुछ भी पूर्णतया बुरा नहीं होता। भारत पर मुसलमानों की विजय दलितों और गरीबों के लिए उद्धार लेकर आयी थी।  इसलिए हमारी आबादी का पांचवा भाग मुसलमान हो गया। यह सब तलवार के कारण नहीं हुआ था। भारत में इस्लाम अकेला तलवार और आगज़नी के ज़ोर पर फैला, ऐसा कहना पागलपन की चरमसीमा है।

मेरे अनुभव के अनुसार अगर किसी धर्म ने आज तक समानता को इतने प्रशंसनीय तरीके से छुआ है तो वह इस्लाम है, केवल इस्लाम। इसलिए व्यवहारिक  इस्लाम की सहायता के बिना वेदांत का सिद्धान्त अधिकतर लोगों के लिए बिल्कुल मूल्यरहित है। हमारी मातृभूमि के लिए दो महान व्यवस्थाओं का मेल, हिंदुइज़्म और इस्लाम यानी वेदांत बुद्धि और इस्लाम शरीर ही इकलौती आशा है। मैं वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ भविष्य के सर्वोत्तम भारत को इस अव्यवस्था और कलह से निकल कर तेजस्वी और अपराजेय उभरता हुआ देखता हूँ।

[Swami Vivekananda, The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol.3, Lecture - The Future  of India, Page No. 294 and Vol.6, Chapter - Epistles, Letter No. 142, Page No. 415-416]


---------------------
 
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामाह भारतेन्दु हरिश्चंद्र (जन्म 1850) ने एक किताब लिखी थी - पंच पवित्रात्मा। इसमें उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद साहब को महात्मा मुहम्मद कहकर पुकारा है।
 
 

No comments:

Post a Comment

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...