आम जन में धर्म शब्द के कई प्रकार माने जाते है। एक तो है धर्म अर्थात हमारी धार्मिक विश्वास। इसीलिए कहा गया है कि सर्व धर्म समभाव यानी प्रत्येक धर्म के प्रति सम्मान रखो। दूसरा कर्तव्यों को भी धर्म कहा जाता है। जैसे कहा गया है अहिंसा परमो धर्म यानी अहिंसा ही सबसे बड़ा कर्तव्य है। मानवता भी एक धर्म है। या यूं कहें कि धर्म और मानवता एक ही सिक्के के दो पहलू है। हमारी हमारा मनुष्यों के प्रति प्रथम कर्तव्य है।
पर आज मानवता दिन ब दिन इसलिए समाप्त होती जा रही है क्योंकि हम दूसरे मनुष्यों को अलग और असमान मानने लगे गए है। जबकि हम सभी एक कि स्त्री और पुरुष के संतानें है। खबरों में जब आता हैं कि किसी की हत्या हो गयी या किसी का बलात्कार हो गया तो हम सबसे पहले उसके धर्म या जाति को चेक करते है। हमारे धर्म या जाति का हुआ तो बहुत गुस्सा आता है और नहीं हुआ तो खबर देखे के आगे बढ़ जाते है। इसका दर्द क्यों नहीं होता कि वो एक इंसान था।
हमारी परंपराओं में मुक्ति के तीन मार्ग बताए गए है। भक्ति, ज्ञान और कर्म। ईश्वर की भक्ति से और ईश्वरीय ज्ञान या संसारिक ज्ञान की प्राप्ति से हम मोक्ष प्राप्त कर सेकते है। कर्म मार्ग यानी अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों से बचना से भी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। ये कर्म मार्ग ही मानवता है।
दुनिया के सभी ग्रन्थ समस्त मानवों को एक ही समूह मानते है.
वसुदेव कुटुम्बकम यानी सारा विश्व एक परिवार है (उपनिषद)
अल ख़लकु अयालुल्लाह यानी समस्त प्राणी ख़ुदा का परिवार है (हदीस).
अरज़ुल्लाह यानी अल्लाह की धरती। (क़ुरान)
The Lord looks from Heaven, He sees all the sons of men यानी परमेश्वर को ऊपर से देखने पर सभी लोग मानव की संतानें लगती है (बाइबिल)।
The earth is the Lord's and everything in it (Bible)
मानस की जात सभै एकै पहिचानबो यानी मानव जाति की एक ही पहचान है (गुरु तेग बहादुर सिंह)।
The Golden Rule are some common teachings from all the Religions of the world.
Hinduism:
जो बात अपने को अच्छी न लगे, वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिए।
(महाभारत: अनुशासन पर्व: 113: 1-11)
Islam:
No one of you shall become a true believer until he desires for his brother what he desires for himself.
(Prophet Hadith: Bukhari and Muslim)
Christianity:
So in everything, do to others what you would have them do to you.
(Bible:Matthew: 7:12)
Sikhism:
I am a stranger to no one; and no one is a stranger to me. Indeed, I am a friend to all.
(Guru Granth Sahib, p.1299)
Judaism:
What is hateful to you, do not to your fellowmen.
(Talmud: Shabbat: 31:a)
Zoroastrianism:
That nature alone is good which refrains from doing unto another whatsoever is not good: for itself.
(Dadistan-i-dinik: 94:5)
&
Do not do unto others whatever is injurious to yourself. (Shayast-na-Shayast 13.29)
Buddhism:
Hurt not others in ways that you yourself would find hurtful. (Udana Varga: 5:18)
One should treat all creatures in the world as one would like to be treated.”
(Sutrakritanga 1.11.33)
Confucianism:
Surely it is the maxim of loving-kindness: Do not unto others that you would not have them do unto you.
(Analects: 15:23)
Taosim
Regard your neighbor’s gain as your own gain, and your neighbor’s loss as your own loss.
(T’ai Shag Kan Ying P’ien)
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