Wednesday, 20 January 2021

क्या ईसा दुनिया में वापस आएंगे।



● कुरान 4:157-158: और उनके इस कथन के कारण कि हमने मरयम के बेटे ईसा मसीह, अल्लाह के रसूल, को क़त्ल कर डाला - हालाँकि न तो इन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध हो गया। और जो लोग इसमें विभेद कर रहे हैं, निश्चय ही वे इस मामले में सन्देह में थे। अटकल पर चलने के अतिरिक्त उनके पास कोई ज्ञान न था। निश्चय ही उन्होंने उसे (ईसा को) क़त्ल नहीं किया. बल्कि उसे अल्लाह ने अपनी ओर उठा  (rafaahu) लिया। 
 
● कुरान 5:117: और जब तक मैं उनमें रहा उनकी ख़बर रखता था, फिर जब तूने मुझे उठा लिया (tawaffaytani) तो फिर तू ही उनका निरीक्षक था। और तू ही हर चीज़ का साक्षी है।  
 


क्या ईसा अलैह. दुनिया में वापस आएंगे? क्या वो हयात है? 
 
 
हज़रत ईसा अलेहसलाम दुनिया में वापिस आयंगे या नहीं आयंगे, ये दीन के बुनियादी अकीदों का हिस्सा नहीं है। चाहे उनकी वापसी पर ईमान हो या न हो, इससे किसी के दीन में कोई कमी नहीं आती है और न ही कोई इजाफा होता है। आप दोनों में से कोई भी एक मौकिफ़ अपना सकते है क्योंकि ये इस्लाम की बुनियादी बात नहीं है और अल्लाह की तरफ से भी कुरान में साफ़ वाज़ेह नही की गई है।

यह बात तो सभी मुस्लिम मानते हैं कि यहूद ईसा को क़तल नहीं कर पाये थे और अल्लाह ने उनके लिए मामला शुबह या संदिग्ध कर दिया था। यहूद ने जिसे सूली पर लटकया था, वो मसीह नहीं थे, बल्कि कोई और था। जैसा इन्जीले बर्नाबास में आता है, संभवत यह ईसा अलैह का वही शागिर्द था जिसने रिश्वत लेके उनका ठिकाना यहूद को बता दिया था, इसलिए अल्लाह ने इसकी शकलों सूरत और आवाज़ ईसा जैसी कर दी जिसकी वजह से यहूद ने इसे ईसा समझ लिया था। और इस तरह अल्लाह ईसा को यहूद से सुरक्षित बचा कर अलग ले गए थे। ह. ईसा के तदफीन का बंदोबस्त फरिश्तों के ज़रिये करवाया गया क्योंकि यहूद उनके जिस्म की तौहीन करना चाहते थे. बर्नाबास की बाइबिल (भले ही प्रमाणिकता संदिग्ध) में ये वाकया तफसील से बयान हुआ है.  उनकी वापसी का अकीदा तो सैंट पॉल और उनके अनुयायियों ने गढ़ा था. 

क़ुरान में आये हज़रत ईसा की 'वफात' के लफ़्ज़ों के मायने उलेमा दोनों तरह से निकालते है और उन्ही मायनों को दलील के तौर पर दोनों मौकिफ़ में पेश करते है यानी हज़रत ईसा की मौत के हक़ में और उनकी वापसी के हक़ में भी। इसलिए यंहा हम इस इशू के मुतालिक क़ुरान की आयतों, हदीसों, तारीख़ और तर्कों का मुताआला करेंगें। मुसलमानों की अक्सरियत यही मानती है कि हज़रत ईसा को अल्लाह ने ऊपर उठा लिया था और वो दुनिया के अंत के करीब में यानि कयामत से पहले वापस आयंगे। हालांकि उलेमा का एक छोटा सा तबक़ा हमेशा से ऐसा रहा है जो इस बात से इख़्तलाफ़ रखता है। 

जिन उलेमा का मानना है कि हज़रत ईसा की मौत हो चुकी और वो अब वापस नहीं आयंगे, वो है:- इब्ने खल्दून, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, अल्लामा इकबाल, मौलाना वहीदुद्दीन खान, मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी, मौलाना अमीन हसन इस्लाही, जावेद अहमद गामीदी, शेख अहमद दीदात (अप्रत्यक्ष रूप से), मोहम्मद असद, सर सैयद अहमद खां, ग़ुलाम अहमद परवेज़, मुहम्मद शैख़ और अहमदिया (कादियानी)।
 
कुरान ने बताया कि ईसा गहवारे और कहलन (अरबी में यह लफ्ज़ बड़ी उम्र या 40-50 साल के लिए इस्तेमाल होता है) की उम्र में नबूवत की गवाही देंगे. इंजील के मुताबिक ईसा की उम्र 50 साल भी नहीं हुई थी.


नजूले ईसा के ख़िलाफ़ दलाईल।


 कुरान में कंही कोई बात मुख़्तसरन कही गयी है और कंहीं तफसील से. कुरान में उनकी मौत की बात बिलकुल वाज़ेह हो गयी है अगर बाहरी सोर्सेज को नज़रंदाज़ कर दिया जाये. पहले से कोई नतीजा दिमाग में हो तो इसके मायने मौत ही समझ आएंगे. उनके जिंदा उठाये जाने कि बात हदीसों में शायद नहीं है मगर उनके वापिस आने की ज़रूर हैं.
 
● हज़रत मुहम्मद सल्ल. के पहले से ही ईसाइयों में ये अक़ीदा आम था कि हज़रत ईसा दुबारा दुनिया में वापसी करेंगे और इसी वजह से मुसलमानों में भी ये अक़ीदा वक़्त गुजरने के साथ साथ आम होता चला गया।
 
बाइबिल में ह. ईसा ने फ़रमाया कि वो वापिस आएंगे और अज़ाब नाजिल करेंगे:-
Behold, I am coming soon, bringing my recompense with me, to repay each one for what he has done (Bible: Revelation: 22:12)

 मदीना में हुज़ूर के 150 साल बाद लिखी गई हदीस की सबसे पहली किताब इमाम मालिक की मुवत्ता में हज़रत ईसा की वापसी के बारे में एक हदीस नहीं मिलती। किसी नबी के दुबारा आना जैसी इतनी अहम बात और इमाम मालिक उसे हदीसों में शामिल न करें, ये नामुमिक है। पर हुज़ूर के 250 साल बाद लिखी जाने वाली दूसरी हदीसों में उनकी वापसी की बात मिलती है। यानी ये तर्कसंगत बात है की लोगों का अक़ीदा शुरवात में ख़ालिस रहता है और वक़्त के साथ उसमे मिलावट होना शुरू हो जाती है। बेहद अहम रिवायत, हदीसे जीब्रील में भी इसका कोई ज़िक्र नहीं है. 
 
  कुरान में उनको जिंदा उठाने की बात भी साफ तौर पर नहीं लिखी है. इसलिए बहस कुरान की बात पर नहीं बल्कि कुरान में आये लफ्ज़ वफात के मायनों को लेकर है, जिसमे इख्तिलाफ हो सकता है. वफात के बाद उठाये जाने की बात के मायने यही है कि अल्लाह के फरिश्तें उन्हें मौत दे कर उनके जिस्म को उठा कर ऊपर ले गए क्योंकि यहूद उनके जिस्म के साथ बेहुरमती करने वाले थे. बाइबिल से मालूम पड़ता है कि जब उन्हें पकड़वाने के लिए उनकी निशानदेही करी गयी तो एक शख्स की शक्लों-सूरत मसीह जैसी हो गयी और उसी का क़त्ल किया गया.
  
 वैसे भी इस लफ्ज़ वफात को मौत ना मानते हुए, ईसा को जिंदा उठाये जाने की बात मान भी लें तो भी कुरान ने नहीं कहा की उनकी वापसी होगी. हदीसों में जो वापिस के बयान हैं, उन्हें सबसे पहले कुरान से कवालीफाय किया जायेगा.
 
● क़ुरान कंही भी ये बात नहीं कहता कि ह. ईसा दुनिया में वापस आयंगे बल्कि लोग कुछ आयात से उनकी वापसी के क़यास लगाते हैं। कुरान में उनकी वापसी की बात साफ़ लिखी होती तो मानना लाज़मी था. 
 
 कुरान उनकी वापिस के वाकये को कुबूल नहीं करता है. बल्कि इसके उलट क़ुरान में कुछ दलीलें ज़रूर मिलती है कि वो वापिस नहीं आएंगे। दुनिया और इस्लाम की तारीख़ इतना बड़ा वाक़या आइंदा वक़्त में पेश आना है और क़ुरान इस बारे में हमें वाज़ेह न करे, ये नामुमकिन है। ये तो उसी तरह की बात है जो हम इस्कॉन वालों से पूछते है और उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होता कि ईश्वर को श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लेना था यानी इतना बड़ा चमत्कार होने वाला था और ये बात ईश्वर अपने वेदों में कहीं नहीं बताता, क्या ये अजीब बात नहीं?
 
 हदीसें क़यामत के नजदीक ईसा के वापसी लौटने के बयान ज़रूर करती हैं लेकिन सीधे तौर पर यह नहीं कहतीं कि 'वह अभी भी जीवित हैं या उनकी मृत्यु नहीं हुई है'। इसलिए कुरान कि आयतों की ये तावील कि ईसा मौत के बाद उठा लिए गए हैं, कोई हदीस इसे खिलाफ बात नहीं नहीं कहती है.
 
  जिस आयत में उनकी वफात, ऊपर उठाने यानि मौत की बात हुई है, उसी में खुसूसन क़यामत का भी ज़िक्र किया गया है. जब वफात के बाद उठाने की बात होगी तो मौत के बाद उठा के ले जाने की बात ही समझी जाएगी. फला की वफात हो गई है और उन्हें उठा के ले गए हैं, इसका मतलब यही लिया जाएगा कि जनाज़ा उठा के ले गए हैं. यंहा उठाने के मायने दर्जात या बुलन्दी के नहीं हो सकते क्योंकि आगे अल्लाह ने कहा कि 'अपनी ओर उठा ले जाऊंगा'. क्योंकि जब भी किसी बात में कोई खास करीना या बैकग्राउंड मौजूद होगा तो कोई लफ्ज़ अपने मायनों से हट जाएगा और ये करीना कलाम के अंदर से ही होना चाहिए.
 


नजूले ईसा के ख़िलाफ़ आयतें।
 

● कुरान 5:116-118 में हज़रत ईसा एक बार दुनिया से उठाये के बाद दुनिया के हालात से नावाकिफियत का इज़हार करते हुए अल्लाह से अर्ज़ करते हैं कि जब तक मैं दुनिया वालों के बीच रहा, उन्हें देखता रहा, फिर जब तूने मुझे उनके बीच से उठा लिया उसके बाद, ऐ रब तू ही उनकी निगरानी करता था और उनका गवाह है. 

[यंहा उनके वापस आने के बाद दुबारा उनके द्वारा लोगों को देखने ज़िक्र नही है और न ही ये लिखा है कि जब-जब मैं दुनिया वालों के बीच रहा, उन्हें देखता रहा था। यानी इस मौके पर हज़रत ईसा ने ये नहीं फ़रमाया कि ऐ अल्लाह, तूने मुझे दो बार दुनिया में भेजा और मैंने लोगों को दोनों बार नसीहतें करी बल्कि अभी हाल ही में भी करके आया हूँ, सलीब तोड़के, खंजीर क़त्ल करके, जिजिया उठा के आया हूँ मगर ये हठधर्मी हैं. ये एक अच्छा मौका था ह. ईसा की वापसी का ज़िक्र करने का।]
 
● कुरान 3:55: ऐ ईसा,अब मैं तुझे वापस ले लूँगा और तुझको अपनी तरफ़ उठा लूँगा और जिन्होंने तेरा इनकार किया है उनसे तुझे पाक कर दूँगा और तेरी पैरवी करने वालों को क़यामत तक उन लोगों पर हावी रखूँगा जिन्होंने तेरा इनकार किया है। फिर तुम सबको आख़िरकार मेरे पास आना है, उस वक़्त मैं उन बातों का फ़ैसला कर दूँगा जिनमें तुम्हारे बीच इख़्तिलाफ़ हुआ है।
 
[ये भी एक और अच्छा मौका था ह. ईसा की वापसी का ज़िक्र करने का. बल्कि यंहा तो क़यामत तक जो मामला चलेगा, उसे बयान किया गया है मगर उनके नुज़ूल का ज़िक्र नहीं है। उस वक़्त ईसा के मानने वाले मुट्ठी भर थे जिसके बाद ये मामला शुरू हुआ और क़यामत तक रहेगा.]
 
{इसलिए कुरान 43:61 में कहा गया है कि निश्चय ही वह (ईसा) उस घड़ी (क़यामत) का ज्ञान है। अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो और मेरा अनुसरण करो.} 

● कुरान 21:7-9 में अल्लाह ने नबी सल्ल० से फ़रमाया है कि आप सल्ल० से पहले भी हमने पुरुषों को ही को रसूल बनाकर भेजा, उनको हमने कोई ऐसा जिस्म नहीं दिया था कि वो खाना न खाते हों और 'न वो हमेशा रहने वाले ही थे', फिर हमने उनके साथ वादे को सच्चा कर दिखाया और उन्हें हमने छुटकारा दिया. 
 
[यंहा हज़रत ईसा के नश्वर जिस्म की बात कही गयी है और उन्हें छुटकारा देने की भी। यूं नहीं कहा गया कि ईसा अलैह को छोड़ कर या ये की ईसा अभी ज़िंदा है।]

● कुरान 5:75: मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। उससे पहले भी बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं। 
 
[यंहा भी उनकी वापसी जैसे इतनी बड़ी विशेषता का ज़िक्र नही है.]
 
● क़ुरान 4:159किताब वालों में से कोई ऐसा न होगा, जो उसकी मृत्यु से पहले 'उस' पर ईमान न ले आए। 'वह' क़ियामत के दिन उन पर गवाह होगा.
 
[ऐसा कहा जाता है कि ईसा किसी नबी के हैसियत से दुबारा नहीं आयंगे बल्कि मुहम्मद सल्ल. का उम्मती बनके आयंगे जबकि आम अक़ीदा यही है कि क़यामत के रोज़ अहले किताब पर ईसा इसलिए गवाह होंगे क्योंकि उस दिन गवाह होने का काम उस उम्मत के नबी का है। वैसे यंहा लफस 'उस' से मुराद कुरान भी ली जाती है.]


लफ्ज़ वफ़ात पर बहस


● कुरान 3:55: [वो अल्लाह की ख़ुफ़िया तदबीर ही थी] जब उसने कहा कि “ऐ ईसा! अब मैं तुझे वापस ले लूँगा और तुझको अपनी तरफ़ उठा लूँगा, और जिन्होंने तेरा इनकार किया है उनसे [उनकी संगति, गन्दे माहौल से] तुझे पाक कर दूँगा और तेरी पैरवी करने वालों को क़यामत तक उन लोगों पर हावी रखूँगा जिन्होंने तेरा इनकार किया है। फिर तुम सबको आख़िरकार मेरे पास आना है, उस वक़्त मैं उन बातों का फ़ैसला कर दूँगा जिनमें तुम्हारे बीच इख़्तिलाफ़ हुआ है।

इस मामले में सबसे पहला क़ायदा है कि हदीसो को क़ुरान की रोशनी में देखा जाएगा, न कि क़ुरान को हदीसों की रोशनी में है। दूसरी बात क़ुरान में कोई बात एक जगह शार्ट में कही गयी है और दूसरी जगह तफसील में तो तफसील वाले वर्ज़न की रोशनी में शार्ट वर्ज़न को समझा जाएगा।

कोई भी लफ्ज़ उसी मायने में लिया जाता है जिस मायने में उसको मक़बूलियत हासिल है। उसके मायने तभी बदलेंगें जब उसके साथ कोई और लफ्ज़ जोड़ कर उसके मायने बदल दे या कॉन्टेक्स्ट ही अलग हो। इस आयत में वफात के मायने वही किए जा जायँगे जो आम है यानी मौत आना। आयत में अल्लाह कहता है कि मैं तुझे वफात दूँगा यानी मौत दूँगा और उठा लूंगा। जब वफात के बाद उठाना कहा जाए तो मतलब यही है कि मौत के बाद उठा लिया गया। जैसे हम कहते है कि फलां को वफात के बाद उठा ले गए यानी जनाज़ा या मय्यत उठा ले गए। क़ुरान में बाज़ आयात में वफात के मायने मौत नहीं है पर यंहा हैं क्योंकि वफात के बाद कोई करीना (कॉन्टेक्स्ट) मौजूद है तो तब वफात के मायने बदल जायँगे। जैसे इंतेक़ाल का आम मतलब मौत है और जगह बदलना (transfer) भी है। पर ट्रांसफर को मानने के लिए वंहा लिंकर चाहिए जैसे कि दिल्ली से पंजाब ट्रांसफर हो गया। इसी तरह वफात के बाद उठाने लफ्ज़ के मायने बुलंदी और दर्जात के लिए नहीं आयंगे बल्कि जिस्म/रूह उठाने के आयंगे।

इस आयत में "मुतवफ्फिका" यानि वफ़ात देने का लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है कि 'हम तुझे वफ़ात देंगे और अपनी तरफ़ बुला लेंगे'। इस लफ्ज़ का रूट 'व-फ़-य' है और क़ुरानी लुग़त में इसका मतलब किसी चीज़ को मुकम्मल करने से है या किसी को मौत आने से है। अगर आप यंहा इसके मायने मौत न लेकर मुकम्मल करने से लेते हो तब भी इस आयत में अल्लाह ने हज़रत ईसा की दुनियावी ज़िन्दगी और उस ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारियों को मुकम्मल करने का ऐलान किया है, न कि उनके ज़िंदा रहने या वापस आने का। 
 
● कुरान 5:117: यंहा भी ईसा यही फ़रमाते हैं कि अल्लाह ने मुझे 'वफ़ात' (तवफ्फयतनी) दी।


अहले किताब का ईमान लाना


● कुरान 4:157: और उन्होंने कहा कि हमने मसीह, मरयम के बेटे ईसा, अल्लाह के रसूल, का क़त्ल कर दिया है। हालाँकि सही बात यह है कि उन्होंने न उसको क़त्ल किया, न सूली पर चढ़ाया, बल्कि मामला उनके लिए सन्दिग्ध कर दिया गया। और जिन लोगों ने इसके बारे में इख़्तिलाफ़ किया है वे भी हक़ीक़त में शक में पड़े हुए हैं। उनके पास इस मामले में कोई इल्म नहीं है, सिर्फ़ अटकल पर चलते रहे हैं। उन्होंने मसीह को यक़ीनन क़त्ल नहीं किया।
 
● कुरान 4:158: बल्कि अल्लाह ने उसको अपनी तरफ़ उठा लिया, अल्लाह ज़बरदस्त ताक़त रखनेवाला और हिकमतवाला है।
 
● कुरान 4:159: अहले किताब में से कोई ऐसा न होगा जो उसकी/अपनी मौत से पहले उस (ईसा/कुरान) पर ईमान न ले आएगा और क़ियामत के दिन वह (ईसा/कुरान) उन पर गवाह होगा।


इस आयात में किसकी मौत का ज़िक्र है, इस पर बेहद इख़्तलाफ़ है जो कि नीचे बताये गए हैं. क्योंकि यंहा दोनों मायने निकलते है, 'अपनी मौत से पहले या उसकी मौत से पहले' यानी हज़रत ईसा की मौत से पहले या अहले किताब की मौत से पहले।

 
●1. पहला मौकिफ़ यह है कि ईसा को ज़िंदा उठा लिया गया था और यह उनकी मौत का ज़िक्र है जो उन्हे दुनिया में वापिस आने के बाद मिलेगी।  इनका मानना है कि यंहा हर अहले किताबों की मौत का ज़िक्र मानना सही नही है क्योंकि ज़्यादातर अहले किताब अपनी मौत से पहले ईसा के हक़ को तस्लीम नहीं करते हैं और ऐसे ही मर जाते हैं इसलिए क़यामत से पहले जब हज़रत ईसा की वापसी के बाद उनकी मौत होगी, तब दुनिया में मौजूद हर अहले किताब उन पर ईमान ले आएगा। इस मत को सबसे ज़्यादा मान्यता प्राप्त है।
 
●2. दूसरा मौकिफ़ यह है कि ईसा को ज़िंदा उठा लिया गया था पर यंहा सभी अहले किताबों की मौत का ज़िक्र है, तब से लेके कयामत तक। इनका मानना है कि हर अहले किताब अपनी मौत से पहले ईसा के हक़ को अपने दिलों दिमाग में तस्लीम कर लेते हैं क्यूंकी ईमान लाना ज़ाहिरी नही बल्कि मरने वाले के ज़ेहन से संबंधित है और जेहन में ही कुबूलियत, मग़फ़िरत और पछतावा होता है जो अल्लाह के सिवा कोई नहीं जान पाता पर उस वक़्त अल्लाह के सामने इसकी कोई कीमत नहीं होती। 

●3. तीसरा मौकिफ़ यह है कि ईसा की मौत हो चुकी है और यह कुछ खास अहले किताबों की मौत का ज़िक्र है।  इनका मानना है कि ईसा कि यह मौत यहूद या सलीब के कारण नहीं हुई थी बल्कि अल्लाह की दी हुई थी जो उन्हें अल्लाह ने उन्हें यहूद के चुंगल से छुड़ा कर फौरन एक दूसरी जगह दी थी क्योंकि यहूद ने जिसे सूली पर लटकया था, वो मसीह नहीं थे, बल्कि कोई और था। इनका मानना है कि यंहा उन खास अहले किताबों की बात हो रही है जिन तक हज़रत ईसा अपनी ज़िंदगी में ही हक़ वाज़ेह कर चुके थे और इसलिए वो सभी हज़रत ईसा की मौत आने से पहले उन पर ईमान ला चुके थे।

●4. चौथा मौकिफ़ यह है कि ईसा अलैह की मौत हो चुकी है और यंहा उन सभी अहले किताब की मौत का ज़िक्र है जो ईसा अलैह की असली मौत तक जिंदा थे। इनका मानना है कि ईसा की मौत सलीब वाले हादसे के बहुत बाद पेश आयी थी और उनकी असली मौत तक सब अहले किताब उन पर ईमान ला चुके थे। क्योंकि सलीब वाले दिन के बाद कई दिनों तक हज़रत ईसा को ज़िंदा और भला चंगा देखे जाने का बाइबल में ज़िक्र है। अहमदिया और कुछ तिब्बती बौद्ध सम्प्रदाय ये मानते हैं कि इस हादसे के बाद ईसा वापस उसी जगह आ गए थे जंहा उन्होने बचपन के बाद और नबुवत से पहले का वक़्त बिताया था यानी तिब्बत और कश्मीर। हज़रत ईसा के बचपन के बाद से नबूवत मिलने तक वो कंहा रहे ये जानकारी कंही नही पाई जाती सिवाय बौद्ध स्रोतों के। अनुमान है कि यहूद के प्राचीन खोए हुए कबीलें कश्मीर में ही आके बसे थे। ऐसा भी कहा जाता है कि यंहा अहले किताब से मुराद सभी अहले किताब से नहीं बल्कि उनके सभी 12 कबीलों के कुछ बड़े बूढ़े लोगों से जिनकी कथनी को उनके सम्प्रदाय पूर्णता मानते थे। इस तीसरे मत को बेहद कम मान्यता प्राप्त है।

●5. पांचवा मौकिफ यह है कि ईसा अलैह की मौत हो चुकी है और यंहा इस आयात में ईसा की नहीं बल्कि कुरान की बात हो रही है. इनके मुताबिक़ इस आयात का सही तर्जुमा ये है कि:- 
 
कुरान 4:159: अहले किताब में से कोई ऐसा न होगा जो अपनी मौत से पहले इस/उस (कुरान) पर ईमान न ले आएगा और क़ियामत के दिन यह/वह (कुरान) उन पर गवाह होगा।
 
इस आयात के तर्जुमे में ज़्यादातर उलेमा ने इससे मुराद ईसा से ली है क्योंकि ये उलेमा यंहा आए लफ्ज बिहि का तर्जुमा 'इस (यानि ईसा) पर ईमान न ले आयंगे' करते हैं और यकुनु का तर्जुमा 'यह (यानी ईसा) उन पर गवाह होंगे' करते हैं. जबकि बाज़ उलेमा ने इससे मुराद कुरान ली है और इनके मुताबिक़ यंहा कहा जा रहा है कि 'इस (यानी कुरान) पर ईमान न ले आयंगे' और 'यह (कुरान) उन पर गवाह होगा'. लफ्ज बिहि कोई नाउन नहीं है बल्कि प्रोनाउन है.  
 
इसीलिए कुछ आलिम जैसे जावेद अहमद गामीदी साहब ने इस आयात का तर्जुमा इस तरह किया है जिसके पीछे के दलाइल नीचे दिये गए हैं:-
 
कुरान 4:159: अहले किताब में से कोई ऐसा न होगा जो अपनी मौत से पहले इस (कुरान) पर ईमान न ले आएगा और क़ियामत के दिन यह (कुरान) उन पर गवाह होगा।
  
इस आयत  (4:159) की शुरवात की आयतों (4:153) में अल्लाह फ़रमाते हैं कि ये अहले किताब तुमसे ये मुतालबा करते हैं कि उन पर कोई किताब सीधी उतरवा कर दिखाओ (इस क़ुरान की बजाय)। इन्होंने मूसा से भी कहा था कि हमें खुदा दिखाओ। यानी यंहा इन अहले किताब द्वारा उठायी जाने वाली फ़िज़ूल की मांगों की बात हो रही है (क्योंकि उनका इरादा हक़ को जानने और मानने का नहीं था बल्कि सिर्फ सवाल खड़ा करके नबी के इनकार करने का था)। इसीलिए यंहा यह कहा गया है इन अहले किताब में से हर एक अपनी मौत से पहले इस (किताब यानी क़ुरान) पर यक़ीन कर लेगा और आखिरत में यही (किताब यानी क़ुरान) इनके खिलाफ गवाही देगा। यानी कि ये लोग तुमसे अपने पर किताब नाज़िल करवाने की बात कह रहे हैं तो इनको नज़रंदाज़ करो क्योंकि इनमें से कोई ऐसा न होगा जो मरने से पहले इस (किताब यानि क़ुरान) पर इमान ना ले आएगा। असल में 4:153 में उठाये जा रहे सवाल का जवाब 4:159 में दिया गया है।


ईसा पर अहम रिवायतें।

● मुवत्ता इमाम मालिक (किताब 49 हदीस नम्बर 49.2.2) पर एक हदीस है जिसमें नबी ने फरमाया कि रात मैंने एक ख्वाब देखा कि मैं काबा शरीफ में हूँ और वहां मैंने एक काले रंग के शख्स को देखा जो इतने ज़्यादा खूबसूरत थे कि जितना ज्यादा खूबसूरत मर्द तुमने कभी काले लोगों में ना ही देखा हो और उनके बाल बेहद खूबसूरत थे जो उनके कानों और कंधों के दरम्यान पहुँच रहे थे जो और उन्होंने अपने बालों को काढ़ा हुआ था और उन बालों से पानी के क़तरे टपक रहे थे और उन्हें दो लोग काबा का तवाफ़ करा रहे थे. मैंने पूछा कि ये शख्स कौन हैं तो मुझे बताया गया कि ये मसीह इब्ने मरियम हैं. फिर मैंने एक और शख्स को देखा जिसके बाल कड़े थे और वो दाहिनी आँख से काना था. मैंने पूछा कि ये शख्स कौन ह तो मुझे बताया गया कि ये मसीह ए दज्जाल है. नबी ने इस ख्वाब में ह. ईसा का जो हुलिया देखा था, बाद की किताबों में उसी हुलिए को भविष्यवाणी के तौर पर लिखा गया साफ़ मालूम पड़ता है। ईमाम मालिक ने यंहा पर भी उनकी वापसी की रिवायतें या अकीदा बयान नहीं करा.

● इस बारे में सबसे ज़्यादा जो हदीस बताई जाती है, उसमें कहा गया है कि हज़रत ईसा वापस आके सलीब को तोड़ देंगे, खंजीर को कत्ल कर देंगे और जिज़िया खत्म कर देंगें। पर सवाल ये है कि जिज़िया गैर मुसलमानों पर मुसलमानी हुकूमत लगाती थी और अब ऐसी हुकुमतें अब रही नहीं। अब जिज़िया भी बंद हो चुका है। आज ऐसे टैक्स लगाए जाते हैं जो धर्म के आधार पर नहीं होते है और आने वाले वक्त के जमुहरियती निज़ाम में जिज़िया लगने की उम्मीद भी नहीं है। क्योंकि इस्लामी या मुसलमानी हुकूमत हज़रत ईसा और हज़रत मेहदी के आने से पहले तो बनने से रही तो फिर ये कैसे मुमकिन है कि उनके आने से पहेले ही जिज़िया लागू हुआ होगा। वो जिजिया को ख़त्म कर देंगे पर अगर ये दीन का हुकुम है तो इसे ख़त्म होना नहीं चाहिए और दीन का हुकुम नहीं है तो इसके ख़त्म होने में क्या खास है?
 
● एक ख्वाब में कई पैगम्बरों से पुछने का ज़िक्र है, जिसमे ईसा ने कहा की सलीब तो तोड़ दूंगा. क्योंकिये ख्वाब है तो इसमें आये बयानात की तावील होगी. 
 

आखिरी सवाल 

अब एक आखिरी सवाल ये उठता है कि अल्लाह ने क़ुरान में ह. ईसा की मौत के बारे में खुल कर क्यों नहीं कहा? इसके पीछे भी अल्लाह की कोई हिकमत होगी जैसे कि अगर क़ुरान में उनकी मौत की वज़ाहत हो जाती तो शायद नसारा उतनी जल्दी, आसानी या तादात के साथ इस्लाम में दाख़िल नहीं होते क्योंकि ये बात (कि वो फौत हो चुके हैं) उनके दरमयान पहले से ही पैठ बना चुकी मान्यता (कि वो वापिस आएंगे) के विरुद्ध होती जबकि इस बात से किसी के ईमान पर फर्क नहीं पड़ता है। इसीलिए क़ुरान ने ईसा को खुदा का बेटा बनाने की शिरकीया बात पर तो खूब ज़ोर दिया (जो कि इमानियात का अहम हिस्सा है) मगर उनकी वफ़ात पर नहीं।

यंहा सभी दलीलें रख दी गई है। अब आप हज़रत ईसा को हयात माने या न माने, ये आपका फैसला है।
 
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आले इमरान 
 
ऐसा माना जाता है कि कुरान ने आले इमरान लफ्ज़ का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि ह. ईसा वापिस आएंगे और उनकी नस्ल जारी होगी. वरना आले इमरान में तो सिर्फ उनकी बेटी मरयम और नातिन ईसा ही बचते हैं. असल में आल लफ्ज़ का रिश्ता सिर्फ नस्लों से नहीं है बल्कि चुने गए परिवार, खानदान, वंश, वंशावली (आले इबाहीम- 4:54, आले दावूद- 34:13) और पैरोकार, अनुयायी, लोग (आले फिरोन- 2:49, 7:141, 40:46) से भी है. इसलिए आले इमरान में ह. इमरान, उनकी पत्नी हानाह (Hannah), मरयम आती है (शायद जोसफ भी जो ह. मरयम के मंगेतर थे और आज कुछ लोग उन्हें शादी-शुदा भी बताते हैं. ये दोनों रिश्तेदार नहीं थे).  

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Quran 39:42: Allah takes (yatawaffā) the souls at the time of their death and the one who does not die in their sleep. Then He keeps those for which He has decreed death and releases the others for a specified term.
अल्लाह ही प्राणों को उनकी मृत्यु के समय ग्रस्त (yatawaffa) कर लेता है और जिसकी मृत्यु नहीं आई उसे उसकी निद्रा की अवस्था में (ग्रस्त कर लेता है)। फिर जिसकी मृत्यु का फ़ैसला कर दिया है उसे रोक रखता है। और दूसरों को एक नियत समय तक के लिए छोड़ देता है। 
 
[यंहा साथ में नींद का ज़िक्र/करीना आ गया है जिससे वफात के मायने ख़ास हो जाते हैं, ना कि आम. जैसे इन्तेकाल का मतलब विशेष संदर्भ में ट्रांसफर भी होता है, जब साथ में किसी जगह का नाम आ जाये.]
 
Quran 6:60: And it is He who takes (yatawaffākum) your souls by night and knows what you have committed by day. Then He revives you therein that a specified term may be fulfilled. Then to Him will be your return (marjiukum) then He will inform you about what you used to do.
 
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कंस्तुन्तुनियाँ पर तो 1453 में ही मुसलमानों को फतह हासिल हो गयी थी.

 
 

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