Thursday, 21 January 2021

गैर कौमों का मुo स० पर ईमान लाना कितना ज़रूरी? कर्म, हिसाब, आखिरत, हमेशगी?


क़ुरान की कुछ आयतों के मद्देनजर कुछ ख़ास क़ौमों या मज़हबो के लिए क्या हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर ईमाम लाना ज़रूरी नहीं है।


क़ुरान (5:69): ईमानवाले और जो यहूदी हुए, ईसाई, साबिई, जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और उसने अच्छे कर्म किये तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास अच्छा बदला है, उनको न तो कोई डर होगा और न वे ग़मगीन होंगे. 
 
यही बात क़ुरान (2:62) में एक और जगह कही गयी है। क़ुरान उस वक़्त अरब के आस पास मौजूद अलग अलग मज़हब, पंथ वालों का भी जगह-जगह इसी तरह ज़िक्र करता है.
 
क़ुरान (22:17): जो लोग ईमान लाए, यहूदी हुए, साबिई, ईसाई, मजूस और जिन लोगों ने शिर्क किया (कुफ्फार), इस सबके बीच अल्लाह क़ियामत के दिन फ़ैसला कर देगा। 

इन आयतों को देख कर यही लगता है कि इनमें बताई गई क़ौमों (यहूदी, इसाई, साबीन) को हज़रत मुहम्मद सल्लo पर ईमान लाना ज़रूरी नहीं है। इसमें आमतौर 3 मौकिफ़ पाए जाते है। पहला है कि क़ुरान में कई दुसरी जगह इन आयतों की तशरीह करते हुए ये वाज़ेह कर दिया गया है कि मुहम्मद सल्ल. को मानना ज़ुरूरी है क्योंकि क़ुरान की एक आयत को उससे संबंधित दूसरी सभी आयतों से मिला कर ही समझा जाता है। दूसरा मौकिफ़ यह है कि जब इन कौमों य या मज़हबों में से कोई अल्लाह और आख़िरत पर ईमान ले आता है तो कुछ वक्त बाद उसका यकीन अपने आप मुहम्मद सल्ल. में हो जाता है क्योंकि ये सारी क़ौम पहले से ही रिसालत के कांसेप्ट में यकीन रखती हैं। तीसरा मौकिफ़ यह है कि इस आयत का सीधा सीधा मतलब है कि इन क़ौमों को नबी सल्ल. पर ईमान लाना निजात के लिए इतना ज़ुरूरी नही है. असल में इनको स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया है कि वो अंतिम नबी के धर्म को मानें या न मानें, लेकिन अगर न भी मानें तो भी लड़ने का नही बल्कि नेकी के कामों में एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा करने का आदेश दिया है जो नीचे दी गयी आयतों से साबित है।

क़ुरान (5:45-48): तौरेत वाले तौरेत से फ़ैसला करें, और इंजील को तौरेत की पुष्टि में उतारा गया है, इंजील वालों को इंजील से फ़ैसला करना चाहिए, इसी तरह क़ुरान इन दोनों किताबों की पुष्टि में उतारी गई है और उनकी संरक्षक है, और क़ुरआन वालों को क़ुरआन से फ़ैसला करना चाहिए, अल्लाह ने सबके लिए एक ही शरीयत तय की है, अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता। पर जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसमें वह तुम्हारी परीक्षा करना चाहता है। "अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ो।" तुम सबको अल्लाह ही की ओर लौटना है। फिर वह तुम्हें बता देगा, जिसमें तुम विभेद करते रहे हो।

क़ुरान (22:67): प्रत्येक समुदाय के लिए हमने बन्दगी की एक रीति निर्धारित कर दी है, जिसका पालन उसके लोग करते है। अतः इस मामले में वे तुमसे झगड़ने की राह न पाएँ। तुम बस अपने रब की ओर लोगों को (भले ढंग से) बुलाओ, निस्संदेह तुम सीधे मार्ग पर हो।
 

अल्लाह को इल्मे ग़ैब है, उसे मालूम है कि क़ुरान और नबी के ज़रिये दावत पहुँचने के बाद भी अहले किताब में से कुछ लोग मानेंगे और बहुत से नही मानेगें। कुछ ज़िद में नही मानेंगे और कुछ दिल-अक्ल के मयार पर बात न उतर पाने के कारण। दूसरे केस में बात पहुँचाने वाली की कमी मानी जायेगी। ऐसे भी अहले किताब रहे हैं और आगे भी होंगे जिन तक क़ुरान और हमारे नबी की बात कभी पहुंची ही नहीं होगी या न के बराबर पहुंची होगी। ऐसे केस में इनकी स्तिथि के अनुसार निर्णय होगा जिसका ब्यौरा ऊपर आयतों में अल्लाह ने वाज़ेह कर दिया है. यानी इन क़ौमों के ऐसे लोग एक अल्लाह, आख़िरत पर ईमान रखने के साथ अमले सालेह करने वालो को अंतिम दिन यकीनन कोई दुख और भय न होगा।

जैसे बच्चा मां की ओर जाने बगैर भी लपकता है, वैसे ही इंसान का दिल इस तरफ झुकता है कि वो एक खलक है और उसका एक ख़ालिक़ है। ज़ाहिर इसके लिए उसे इसका शऊर होना या करवाना होगा कि वो एक खलक है। कम से कम दर्जे में भी इंसान ये समझ लेता है कि कोई तो है, कुछ तो है। इंसान ये तो उज़र दे पायेगा कि उसतक किसी नबी की दावत नहीं पहुँचीं मगर ये नही कि उस तक अख़लाकियात और तौहीद का बुनियादी तसव्वुर नहीं पँहुचा।


हमारे मन में अच्छे-बुरे का शऊर है, इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि जब कोई किसी के साथ बुरा करता है तो उसे ये खटकता ज़रूर है मगर वो स्वार्थ में इसे नज़रंदाज़ कर देता है मगर जब उसी के साथ कुछ बुरा होता तो वाकई बुरा महसूस होता है क्योंकि वो अन्दर से जानता है कि उसके साथ एक गलत या गैर अख्लाकी अमल किया गया है. 
 

कुरान के मुताबिक ऊपर बताया गया है कि एक खुदा के तसव्वुर में मानने वाली कौमों या मजहबों के साथ क्या मामला होगा. अब बात करते हैं कि गुनाहगार मुसलमानों के साथ क्या होगा.
 
गुनाहगार मुसलमानों के साथ मामला: हदीसों से ज़ाहिर है कि अल्लाह की रहमत की कोई हद नहीं है और इसी के तहत आखिर में हर इमान वाले के लिए जन्नत की बशारत करी गयी है. पर इसका असल मलतब यह है कि उनको एक दिन जन्नत में ज़रूर डाला जायेगा मगर उनके बुरे कर्मों के हिसाब के बाद. उनको जहन्नुम के अजाब से गुज़रना ही होगा. जो मुसलमान यह समझते है कि वो किनते भी बुरे कर्म कर लें मगर उन्हें थोडा वक्त जहन्नुम में बिता कर जन्नत में ही भेजा जायेगा तो वो एक बात समझ ले कि जहन्नुम में पल भर की ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है, जितनी लगती है। इसको इस मिसाल से समझ लीजिए कि अगर किसी आदमी को कहा जाय कि आपके लिए उस दीवार के पीछे एक बाग बनाया गया है पर आपको उस दीवार से पहले यह आग का दरिया पार करना है तो यक़ीम मानिए वो आदमी कहेगा कि मैं इसी जगह खड़े खड़े पूरी जिंदगी बिताने को तैयार हूं पर इसे पार नहीं करूँगा, भले ही जन्नत न दो। इसीलिए जहन्नुम और अल्लाह की सज़ा को इतना आसान न समझा जाये.

शिर्क करने वालों के साथ मामला: अल्लाह को सबसे नापसंद शिर्क है पर इसका मतलब ये नही है कि शिर्क करने वालो को अल्लाह ज़रा भी भाव नही देता। मलतब अल्लाह के कानून उसके चाहने वालो और न चाहने वालों दोनो के लिए काम करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि मुशरिकों की भी दुवाएं कुबुल होती है जबकि वो अपने देवी - देवताओं से प्राथनाएं करते हैं। यक़ीनन अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो  उनकी दुवायें सुनता और पूरी करता है। आखिर वे लोग मूर्ति आदि के माध्यम से अल्लाह को ही तो पूजते हैं. ज्यादत लोग इससे अनजान ही रहते हैं, वो किसी का भी नाम लें, उनकी सुनने वाला तो एक ही है. शिर्क की माफ़ी नहीं है और उन्हें जहन्नुम में जाना ही है. शिर्क की कठोरतम सज़ा इसलिए हैं क्योंकि यह अमल अपने हकीकी मालिक को छोड़कर किसी दूसरी गैर वजूदी शय के आगोश में ले जाता है जो कि सबसे बड़ी नाशुक्री है. जैसे किसी देश का कोई एजेंट दुसरे देश में जासूसी करते हुए पकड़ा गया तो उसकी सजा मौत या उम्र कैद ही होती है, भले ही उसने दुसरे देश कितने भी अच्छे काम किये हो. जैसे देश के गद्दारों के लिए भी यही सजा है.
 
काफिरों के साथ मामला: यंहा काफिर का मतलब गैर मुस्लिम नहीं बल्कि अल्लाह का खुला सरकश दुश्मन है जैसे इब्लीस, नमरूद, फिरोन, अबू जेहल, अबू लहब वगैरह. इनके लिए जहन्नम में हमेशा का अजाब है.

 
अच्छे कर्मों का सिला: हर धर्म के इन्सान को अपने एकमात्र खुदा या ईश्वर के लिए किये गए अच्छे कर्मों का सिला ज़रूर दिया जायेगा और जो कर्म उसने दुनिया के लिए किये होंगे, उसका सिला दुनिया में दे दिया जाता है.

आम गैर मुस्लिम का मामला: क़ुरान बताता है कि अल्लाह ने शुरवात से ही तौहीद (क़ायनात के एक मालिक होने का एहसास) और अखलाकियात (अच्छे बुरे कर्मो को पहचान) की बात इंसानी वजूद में डाल रखी है। इसलिए इन दोनों की बुनियाद पर हर इंसान की पकड़ होगी और उसी के मुताबिक उसका फैसला होगा। आख़िरत के दिन में हिसाब होना या रिसालत में यकीन होना जैसी बातें इंसान को दुनिया में मिलने वाले इल्म और उसकी बुनियाद पर बने उसके यकीन पर निर्भर करेगा, जिसके लिए हर इंसान अल्लाह के यंहा अपना उज़र पेश करेगा। अगर उस इन्सान को दुनिया में इस (आखिरत, रिसालत) का इल्म और यकीन हो गया था तो उसकी पकड़ लाज़मी होगी. वरना उसके उज़र के बदले अल्लाह चाहे तो उनकी बख्शीश भी कर सकता है।
 
जन्नत और जन्नुम की हमेशगी: क़ुरान ये भी बताया है कि अल्लाह ने जन्नत-जहन्नुम हमेशा के लिए कायम की है. जन्नत और जहन्नुम की जिस हमेशगी की बात हो रही है, अल्लाह की हमेशगी जैसी ही है, मगर फिर भी उसके बराबर नहीं। बल्कि उससे कम है मगर इन्सान के इल्म और सोच के मुताबिक बेइंतेहा है. कुरान यह भी इशारा करता है कि अल्लाह चाहे तो जहन्नुम को खत्म भी कर सकता है और नहीं भी। यानी खत्म करने के इमकान है। ज़ाहिर है यह एक बहुत लंबे अरसे बाद ही हो सकता है जो इंसानी हमेशगी जैसा ही होगा. वाकई अगर अल्लाह ने कभी जहन्नुम खत्म कर दी (जैसा कुरान में ईशारा है) तो जहन्नुमी लोगो का क्या होगा? वो जहन्नुम में लगभग हमेशगी की ज़िंदगी बिता कर और सज़ा पा कर कंहा जायँगे? क्योंकि तब जहन्नुम तो नहीं रहेगी? इससे ऐसा लगता है कि उन्हें भी अल्लाह की बेइंतेहा रहमत के तहत कभी न कभी कोई छोटी-मोटी जन्नत में डाल दिया जायेगा. हम जानते हैं कि जन्नत और जहन्नुम के कई दर्जात होते हैं।


जन्नत जहन्नुम को लेके कुछ सवाल बहुत पेचीदा होते है और अक्सर आम इंसान इन्हें फ़िज़ूल का मान कर नजरअदांज ही करता है। मगर जिन लोगों का नास्तिकों से पाला पड़ता है या मुसलमान होने के बावजूद जिनके दिमाग में ऐसे सवाल उठते हैं ताकि ईमान पुख्ता किया जा सके, उनके लिए ऐसे सवालों के जवाब बहुत अहम हो जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि ऐसे जवाब हर इंसान को संतुष्ट कर सके।

● अगर कभी न कभी जहन्नुम खत्म होनी ही है तो फिर सभी जहन्नुमियों को निकाल कर क्या जन्नत (छोटी मोटी ही सही) में डाल दिया जायेगा?

ऐसा लगता है कि हर मुस्लिम (गुनाहगर), गैर मुस्लिम (मुशिर्क भी) को जहन्नुम से निकाल लिया जाएगा मगर अरबो-खराबो साल बाद जो लगभाग हमेशा जितना ही होगा। इसीलिए कुरान में हर जगह हमेशा की जहन्नुम कहा गया है, यानी इंसानी हमेशगी, न कि अल्लाह की सिफ्त वाली हमेशगी। जैसे फरिश्तों की ज़िन्दगी चल रही है। उसके बाद, काफिरो (खुदा के सामने सरकश) के लिए कोई छोटी मोटी जन्नत न सही तो शायद कोई न्यूट्रल जंहा हो तैयार हो।

● क्या जन्नत में ज़िन्दगी बस यूँही चलती जायगी, और चलती ही जायगी?

एक मत यह कहता है कि वंहा हमेशा की ज़िन्दग़ी में बोरियत होगी ही नहीं। एक मत यह कहता है कि वंहा भी इंसान का एवोल्यूशन होता रहेगा और नए मुक़ाम आते रहंगे। मगर ऐसा भी तो हो सकता है कि शायद, हमेशा की जन्नत में एक ऐसा वक्त भी आए जब हर इंसान इतनी लंबी ज़िन्दगी के बाद खुद ही कह दे, कि या रब अब मुझे वैसे ही सुला दे, जैसे मैं दुनिया में जन्म से पहले और मौत के बाद सोया हुआ था। क्योंकि सिर्फ अल्लाह ही हमेशा था और रहेगा। वंहा जो चाहा जायेगा, मिल जायेगा।

● आखिर में सब बरी हो जायँगे तो सज़ा रखी ही क्यों गयी है?

अल्लाह की चाहत थी इंसान की पैदाइश और इरादा था इंसान की हमेशगी। इसके लिए एक स्कीम है। इस स्कीम में एक इम्तिहान है और उस इम्तिहान के बाद सजा और इनाम है। क्योंकि बिना प्रयास के मिली हमेशगी की असल कद्र नहीं होगी।  हर एक्शन का एक रिएक्शन भी होगा। 

किसी इंसान के द्वारा किसी और के साथ किये गए गलत कर्म की वजह से अल्लाह चाहे तो मुजरिम को सज़ा देने की बजाए मज़लूम को इतना नवाज़ कर कॉम्पेनसेट कर दे कि अपने साथ हुई ज़्यादतियों को भूल कर कुछ इंसान, अल्लाह की एक्स्ट्रा दी गई नेयमतों से खुश हो जाये। मगर कुछ इंसान ऐसे भी होंगे जो उन लोगों को वैसे ही पीड़ा, यातना मिलते हुए देखना चाहते हैं जैसी उन्होंने दुनिया में उन्हें दी थी। हम जानते हैं कि अल्लाह अपने से मुताल्लिक गुनाह तो माफ कर सकता है मगर बंदों के साथ करी गयी ज़्यादती तो बंदा ही माफ करेगा, जिस तरह तरीके से भी हो। इसलिए सज़ा का कानून इस स्कीम का हिस्सा होना ही चाहिए।

सरकारी नियमों के अनुसार प्राथमिक कक्षा में किसी को फेल नहीं किया जा सकता। मगर फिर भी एग्जाम होते हैं। ताकि बड़ी क्लासेस की तैयारी हो जाए।  ज़्यादा मार्क्स इनाम है, कम मार्क्स सज़ा, मगर अंत में सभी को पास होना ही है। तो फिर ये एग्जाम क्यों? क्योंकि ये आगे की तैयारी है। जो पढाई में बेहतर होगा वही भविष्य में बड़ी डिग्रियां पायेगा, जो कमज़ोर होगा वो छोटी डिग्री पायेगा।

इंसान का दिमाग सीमित है इसलिए वो यंहा अल्लाह की चाह, इरादा पूरी तरह नहीं समझ सकता है। मगर जब अल्लाह रूबरू होगा तो यकीनन हर चीज़ क्रिस्टल क्लियर हो जाएगी।
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अल्लाह चाहता तो अपने इल्म की बुनियाद पर ही लोगों को जन्नत जहन्नुम में डाल सकता था, बिना दुनिया के बनाये ही क्योंकि उसे पहले से ही पता है कौन अच्छे कर्म करेगा और कौन बुरे। ये दुनिया उसने अपनी तसल्ली के लिए नहीं बल्कि हमारी तसल्ली के लिए बनाई ताकि ज़िंदगी लाइव जी कर खुद ही गवाह हो जाएं। वरना कल को कोई कह सकता था कि आख़िरत में कि उसने ये कर्म किये ही नहीं और अल्लाह अपने इल्म के हिसाब से फैसला कर रहे हैं। हर किसी को अपनी ज़िंदगी की अहम बातें याद रहती है वरना याद दिलवाने या दिखाने पर ऐसी याद आ जाती हैं कि मुकरना खुद को और एक्स्पोसे करवाना ही होता है।

अल्लाह ने दुनिया बनाई है इम्तिहान के लिए। इम्तिहान में फ्री विल के बिना इम्तिहान ही नहीं होता। फ्री विल है तो कोई अच्छे कर्म करेगा और कोई बुरे। क्योंकि फ़्री विल में जब छूट मिलेगी तो कुछ भी कर सकता है।

हम सबसे पहले आसानी के लिए इंसानो को 5 कैटोगरी में बांट लेते हैं। पहले वो लोग, जिनके अच्छे बुरे कर्म लगभग बराबर हैं। दूसरे, जिनके ज़्यादातर कर्म नेक है। तीसरे, जिनके ज़्यादातर कर्म बुरे हैं। चौथे वो, जो पूरी तरह से अल्लाह के फरमाबरदार हैं। पाँचवे वो, जो पूरी तरह से उसके नाफरमान हैं।

अमूमन नेक से नेक शख्स कुछ न कुछ तो गलत कर्म करता ही है। इसी तरह बुरे से बुरा आदमी भी कोई न कोई नेक काम करता ही है। इसलिए जहन्नुम से गुज़र कर जन्नत वाले लोग भी होंगे। इनको तो दुनिया में आना ही पड़ता अपनी तसल्ली और उसके लिए बनाए गए अल्लाह के निज़ाम के तहत। इसलिये ऐसा नहीं हो सकता था कि अच्छे-बुरे मिक्स्ड कर्म करने वालों को दुनिया में न भेजा जाय। 

फिर आते हैं उन लोगों पर जिन्होंने ज़्यादातर नेक काम किये होंगे पर कुछ गलत कर्म भी किये होंगे। इनको वो बुरे कर्म किसी कारण माफ कर दिए जायँगे या नेकी-बुराई का एक्सचेंज कर दिया जाएगा आदि. फिर ऐसे लोग सीधा जन्नत ही जायँगे। जन्नत हमेशा के लिए है। जिन लोगो के कर्म ज़्यादातर बुरे होंगे और वो हमेशा जहन्नुम में रहंगे कर्म एक्सचेंज के बाद।

अब बात रह गयी सिर्फ उनकी जो मुक़म्मल तौर पर या तो जन्नती है (ये सिर्फ पैगम्बर ही हो सकते हैं) या मुक़म्मल तौर पर जहन्नमी है (ये सिर्फ इब्लीस, काफ़िर-अल्लाह के सामने खड़े हुए सरकश लोग जैसे नमरूद, फिरौन, अबु जहल और लहब आदि ही हो सकते हैं)। क्योंकि सीधे सीधा अपने मुकाम तक जायँगे जो इन्होंने ज़िंदगी मे कमाया है।

अगर अल्लाह सिर्फ अच्छे कर्मों वालो (मुक़म्मल जन्नती) को पैदा करता तो दुनिया का निज़ाम ही फैल हो जाता। फ्री विल का कांसेप्ट ही कामयाब नहीं होता। इंसान को मिली अख़लाक़ी सलाहियत का इस्तेमाल ही नहीं हो पाता। इम्तिहान इम्तिहान नहीं रहता। बेहद अहम बात कि दुनिया में जो खरबों लोग होने हैं, वो महज़ शायद कुछ हज़ार रह जाते। ये ऐसा ही होता कि स्कूल के एग्जाम में बच्चों को टेस्ट पेपर के साथ आंसर की भी दे देना। ज़रा सोचिये कि सिर्फ मुक़म्मल नेक इंसान ही चारों तरफ होते तो क्या अजीब बात होती। 

मुक़म्मल बुरे इंसान का दुनिया में होना भी हमारे लिए अल्लाह की एक हिकमत और नसीहत लेने वाले के लिए निशानी है। ये लोग हर इन्सान के सामने एक नमूना है, कि कैसा नहीं बनना है, ये लोग हमारे लिए उदाहरण बनते हैं, इनसे हमें याददिहानी मिलती है कि क्या नहीं करना और हमारे अंदर क्या क्या अच्छाई हैं या क्या अच्छाई पैदा करनी हैं। खुदा और हक़ का सरकश नाफरमान नहीं बनना है। वैसे भी ये दुनिया में नहीं आते तो वही बात कह सकते थे कि अल्लाह ने हमें मौका ही नहीं दिया, अपने इल्म से इतने कडा फैसला कर दिया हमारे लिए पूरी तरह जहन्नुम का।
 
जन्नत के बारे में अल्लाह को वादा है कि वो हमेशा रहेगी (जब तक ज़मीन असमान है), जैसे अल्लाह चाहेगा और वो कभी नहीं रुकेगी (इन्सान इस हमेशगी का अंदाजा नहीं लगा सकता)। जबकि जहन्नुम के बारे में अल्लाह ने कहा कि वो भी हमेशा रहेगी (जब तक ज़मीन असमान है) जैसे अल्लाह चाहेगा (इन्सान इस हमेशगी का अंदाजा नहीं लगा सकता) मगर फिर आगे ये नहीं कहा कि वो कभी नहीं रुकेगी बल्कि ये कहा कि अल्लाह जैसे चाहता वैसे करता है. [नीचे अंत में ये आयात देखिये]. बेशक ऐसा कहने में अल्लाह को कोई हिकमत छिपी है. अगर अल्लाह ने जहन्नुम को एक हमेशगी के बाद ख़त्म कर दिया तो उसके बाशिंदे को क्या होगा? वो कंही तो जायंगे? क्या कोई बेहद मामूली जन्नत भी होगी (हम जानते हैं कि जन्नत के दर्जात होते हैं) या फिर कोई न्यूट्रल प्लेस या फिर इन लोगों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया जायगा या फिर कुछ और? कोई नहीं जानता सिवाए अल्लाह के.
 
Quran 11:108: And as for those who were prosperous, they will be in Paradise, abiding therein as long as the heavens and the earth endure, except what your Lord should will - a gift uninterrupted/unfailing/without an end.
 
Quran 11:106-107: As for the wretched, they shall be in the Fire, wherein there shall be for them moaning and sighing, therein dwelling forever, so long as the heavens and earth abide, except as your Lord wills. Indeed your Lord is the mighty doer of what He intends
 
 
बाकि रही बात बिजनेसमैन कि फेल्ड प्रोडक्ट मार्किट में उतारने की तो इसे हम बाप के एग्जाम्पल से जोड़ कर भी समझ सकते हैं जो अपने लायक और नालायक दोनों बेटों के लिय काम-धंधे (ज्यादा या कम) का इन्तेजाम करता ज़रूर है, भले ही वो जानता हो कि नालायक बेटा एक दिन सब लूटा देगा. एग्जाम सवाल और जवाब (आसान, मुश्किल) से मिलकर बनता है, दोनों में कोई एक न हो तो वो एग्जाम नहीं कुछ और हो जायेगा।
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