अक्सर कुछ गैर मुस्लिम ये सवाल करते है कि इस्लाम औरत और मर्दों को समान रुतबा देता है तो फिर औरतों को नबी क्यों नही बनाया गया?
नबी या रसूल होना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी की बात होती है। नबी को विरोध, ज़ुल्म और सितम तक झेलना पड़ता है। हर वक़्त उम्मत के बीच रहना पड़ता है। दिन हो या रात लोगों की एक आवाज़ पर सब काम छोड़ कर मदद करने आना पड़ता है। अच्छे बुरे तमाम तरह के आदमियों से राब्ता क़ायम करना पड़ता है। लोगों को खुले आम और दूर दराज़ तक तबलीग़ करनी पड़ती है। पहले के ज़माने में औरतों की स्तिथि आज की तरह सशक्त नहीं थी। औरतों को कमज़ोर, मामूली चीज़ और सिर्फ़ घरेलू कामकाजी समझा जाता था। औरत की बात मानने वाले मर्द को नीचा समझा जाता है। औरतों को बहुत ज़्यादा पर्दे में रहने और घर से बाहर न निकलने पर ज़ोर दिया जाता था। खुले आम चौराहे-चौपालों पर मर्दों को औरत भाषण दें, ऐसा करना उस समय किसी चमत्कार या हिमाक़त से कम नही था। आज भी गांव देहात या वृद्ध लोगों में ऐसे पिछड़े और दकियानूसी खयालात आसानी से देखें जा सकते है। ऊपर से औरतों का गर्भधारण करने से मां बनने तक और फिर बच्चे के पालन पोषण तक में समय इतना व्यस्त और कष्टदायक होता है कि किसी और कार्य को अंजाम देना उनके लिये इस समय में बहुत भारी पड़ता है।
इसलिए ऊपर लिखे हालतों के मद्देनजर ये संभव है कि ख़ुदा द्वारा किसी औरत को नबी न बनाया गया हो क्योंकि पुराने दकियानूसी ज़माने में औरत का ऐसी बड़ी ज़िम्मेदारी को निभाना बहुत मुश्किल काम हो सकता था। हालांकि अपवाद स्वरूप कुछ विशेष समुदाय या विशेष समय में अनुकूल हालात मिलने पर ये काम औरतों कर भी सकती है और हो सकता है कि किया भी हो खुदा की आज्ञा अनुसार। पर हमें इसकी जानकारी नही दी गयी कि ऐसा कभी हुआ था या नही। औरतें नबी हो सकती है या नहीं इस बारे में क़ुरान कोई रहनुमाई नही करता है। क़ुरान में जिन 25 नबियों के नाम बताए है उनमें कोई भी औरत नही है। मगर नबी तो 25 से बहुत ज़्यादा हुए है और एक आम मान्यता है कि 124000 नबी हुए है। इन नबियों के क्या नाम थे और क्या इनमे औरतें भी थी, ये बात हमें नहीं मालूम। इसलिए पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता कि औरतें भी नबी रही है या नही।
हालांकि कुछ आलीमों का मानना है कि औरतें भी नबी रही है (रसूल नहीं) जैसे इमाम क़ुरतुबी, इब्न हज़म, अबु हसन अल अशरी (अस्यरी), इमाम बदरुद्दीन अल ऐनी, इमाम सुयूती, इमाम राज़ी और इमाम कमाल इब्न अल हुमाम। इनके द्वारा हव्वा अलैह, हाजरा अलैह, साराह अलैह, इसहाक़ अलैह की वालिदा, मूसा अलैह की वालिदा आसिया अलैह (फिरौन की बीवी) आदि को नबी होना माना गया है। तफ़सीर कुर्तुबी में इमाम कुर्तुबी एक हदीस नकल करते है जिसमे नबी पाक फरमाते है कि यक़ीनन औरतों में 4 औरतें नबी रही है, हव्वा, आसिया, मूसा की वालिदा और मरयम। हालांकि ये हदीस आज हदीसों के ज़ख़ीरे में कंही पाई नहीं गई। ईसाई और यहूदी मत के अनुसार भी कई स्त्रियां नबी रही है जो अमूमन ऊपर बताई गई स्त्रियां ही है।
क्या हज़रत मरयम अलैहसलाम नबी थी।
हज़रत मरयम के नबी होने की संभावना बहुत है। उनका इस्लाम में मर्तबा भी तमाम औरतों पर सबसे अधिक है और उनके नाम पर क़ुरान में एक सुरहः भी है। वो है हज़रत मरयम अलैह.। ज़्यादातर आलीमों ने उनको नबी नहीं माना है। मगर आलीमों की एक छोटी सी जमात ऐसी रही है जो उन्हें नबी मानती है। क़ुरान ने साफ तौर पर तो उन्हें नबी नहीं कहा है। वैसे क़ुरान तो हज़रत ख़िज़्र अलैह. के नबी या फ़रिश्ते होने पर भी खामोश है। पर कुछ लोग उन्हें नबी मानते है और कुछ फ़रिश्ता। उसी तरह क़ुरान में उल्लेखित हज़रत लुक़मान को भी कुछ लोग नबी मानते है। नबी के लक्षणों की रोशनी में रख कर देखें देखें तो ऐसा लगता है कि हज़रत मरयम भी नबी थी, पर रसूल नहीं। नबी लफ़्ज़ "नबा" (ख़बर) से बना है जिसका मतलब ऐसा इंसान जिसका अल्लाह से सम्पर्क स्थापित हो और अल्लाह उसे ग़ैब की खबरें देता हो। जब इन खबरों को दुनिया तक पहुँचाने यानी "इरसाल" करने की ज़िम्मेदारी अल्लाह अपने नबी को दे देता है तो वो नबी रसूल कहलाता है। नबी के लक्षण है:-
1. अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिए नबी से बात करता है। मरियम अलैहिस्सलाम से भी अल्लाह फ़रिश्ते के ज़रिए बातें किया करता था।
2. नबी अपने लोगों और तमाम इंसानियत के लिए एक नमूना होता है। हज़रत मरियम का भी यही दर्जा है।
3. नबी अपनी उम्मत को दावते हक़ देता है और हज़रत मरयम ने इस काम को भी अंजाम दिया है।
4. नबी अपने समुदाय में एक चुने हुए शख्स की तरह बड़ा होता है और हज़रत मरयम भी ऐसे ही पली बड़ी हुई थी।
5. नबी अल्लाह के हकुम से करिश्मों को अंजाम देता है या अपने लोगो को इस बारे में आगाह करता है। क़ुरान हज़रत मरयम के 2 करिश्मों का ज़िक्र करता है। एक उनके कुवारी मां होने का और दूसरा, अल्लाह के द्वारा उनके लिए खाने पीने का खुद इंतज़ाम करने का।
6. क़ुरान हज़रत मरयम के नबी होने का इशारा भी करता है जैसे कि क़ुरान 21:48-91 में बारी बारी से बहुत से नबियों का ज़िक्र करता है और आखिर में हज़रत मरयम का ज़िक्र करता है। यानी कई नबियों के ज़िक्र के साथ उनके नाम का ज़िक्र आता है।
औरतों के नबी होने की दलीलें
■ औरतें नबी नहीं होती इस हक़ में क़ुरान की 16:43 आयत पेश की जाती है कि जहां कहा गया है कि हमनें जितने भी पैग़म्बर पहले भेजें वो साधारण "पुरुष" थे जिन्हें हमने अपनी वहिय दी। पहली बात इस आयत में पुरुष के लिए आये शब्द रिजाल को क़ुरान कई जगह जैसे 7.46, 9.108, 24. 37, 72.6 में मर्द और औरत दोनों के लिए इस्तेमाल करता है। और अगर ये मान भी लिया जाए कि यंहा इसका अर्थ सिर्फ मर्द ही है तो हो सकता कि क़ुरान यंहा एक गिरोह का नाम लेकर सबको संबोधित कर रहा है और जबकि उस गिरोह में कुछ अपवाद भी हो। यानी हो सकता है कि सभी नबी को मर्दों के लक़ब से इसलिए पुकारा गया हो क्योंकि औरतें बहुत कम नबी रही हो यानी नगण्य। इस शब्द के प्रयोग जैसा एक उदाहरण क़ुरान में मिलता है जब क़ुरान बताता है कि फ़रिश्तों को आदम को सजदा करने को कहा गया। पर वंहा जिन्न भी मौजूद था। क्योंकि एक जिन्न वंहा था इसलिए जिन्न-फ़रिश्ते कहने की बजाए सामान्य तौर पर सभी को फ़रिश्तें कह कर पुकारा गया।
दूसरी बात ये है कि इल्म वाले जानते है कि इस आयत के पसमंज़र में नबी नहीं बल्कि रसूलों की बात हो रही है। और नबी और रसूल में फ़र्क़ होता है। रसूल होना, नबी होने से बड़ी जिम्मेदारी होती है। रसूल को एक शरीयत दी जाती है और उनकी बात ठुकराने वालों पर आज़ाब नाज़िल होता है। जबकि नबी एक पहले आये रसूल की शरीयत को ही आगे बढ़ता है। रसूल को किताब भी दी जाती है। हर रसूल नबी होता है पर हर नबी रसूल नहीं होता।
■ माँ हव्वा का अल्लाह की शुरवाती तख़लीक़ में से होना, जन्नत में उनकी पहली रिहाइश होना, उनके आदम अलैह के साथ दुनिया को शुरू करना। ये फ़ज़ीलतें किसी नबी की ही हो सकती है।
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