Tuesday, 12 January 2021

इस्लाम लाओ या युद्ध करो जैसी धमकी देके दुसरे राज्यों पर आक्रमण क्यों?



राज और राज्य व्यस्था।

सबसे पहले हम ये समझ ले कि राज्य या राजा बनते कैसे है। एक चला आ रहा सोशल और पोलिटिकल सिस्टम जैसे कोई गांव, शहर या देश का सिस्टम तब बदलता या नया बनता है जब वंहा की प्रजा या जनता ऐसा करे, या शासकों के भरोसेमंद लोग या रिश्तेदार शासक को हटा कर ऐसा करे या बाहर से कोई दूसरा राजा या देश हमला करके ऐसा करे। इसके बाद अगर वो नया सिस्टम शक्ति और क्षमता रखता है तो आस पास के सिस्टम भी उसकी खूबियां देखते हुए उसमें मिलते चले जाते है या ताकत के ज़ोर पर मिला लिए जाते है। और इस तरह एक बहुत बड़ा सिस्टम या राज्य बनता चला जाता है। इसके दो कारण होते है, महत्वाकांक्षा और डर। राज्य का विस्तार तभी होता है जब शासकों की महत्वाकांक्षा हो कि मैं सब कुछ पा लूं या इस बात का डर हो की इससे पहले अन्य शक्तियों हमें बर्बाद करें, क्यों न उन्हें ही नेस्तानाबूद कर दिया जाए।

दुनिया की हर बड़ी शक्ति यही करती है। अपने पड़ोसियों को या तो अधीन आने को कहती है या युद्ध करने को। और इसी तरीके को ही इस्तेमाल करके आज तक कि सबसे बड़ी उपाधि वाली शक्तियां या हुकूमतें बनी है जैसे रोम, सीज़र, सिकंदर, फेरों, भोज, विक्रमादित्य, अशोक, चंगेज़ और मंगोल। ये रियासतें हमेशा आपस मे सत्ता और वर्चस्व की लड़ाईयां लड़ती रही है, दूसरी वर्ल्ड वॉर तक। उस समय जो अरब में हो रहा था वही भारत और पूरी दुनिया में भी हो रहा था। भारत में भी नन्द, मौर्य, शुंग, सातवाहन ,गुप्त जैसे हज़ारों बड़े छोटे राज्य और वंश आपस में युद्ध कर रहे थे।


आखिरी नबी का मक़सद।

मोहम्मद रसूल सल्ल. का सबसे बड़ा काम, तमाम इंसानों को एक सूत्र में बांध कर एक सभ्य और एक ईश्वर परस्त समुदाय बनाना था और इसे व्यवस्था हेतु जम्हूरी हुकूमत का का निज़ाम स्थापित करना था।

क्योंकि आखिरी बार पैग़म्बर दुनिया मे भेजे गए थे इसलिए ये लाज़िम था कि उनकी दावत दुनिया भर के बड़े हिस्से में पहुँचे जंहा तक मुमकिन हो। इसी लिए सुलैह हुदेबिया के बाद और अपनी मृत्यु से 4 साल पहले ही नबी ने हब्शा, रोम, फारस, यमन जैसे बादशाहों (दूर दराज़ के नहीं बल्कि अपने आस पास के बड़े राज्यों को, जो केद्नीय सत्ता रखते थे और छोटी-छोटी या बिखरी हुई ताकतें नहीं थे) को खत लिख कर दीन की दावत दी की हक़ आ चुका है जो मक्का से शुरू हुआ है। इसी दावत की बुनियाद पर साहाबा दूसरे देश पहुंचे जैसे बुद्ध के अनुयायी पूरे एशिया में निकले थे। ये खतनुमा दावत तो उन्हें पहुंचानी ही थी जो कि खुदा का हकुम था और पूरा करना ही था। इसलिए नबी ने मक्का के मुशरिकों से चल रही जद्दोदजहद जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी, उसके बीच में ही ये पैग़ाम सभी देशों को पहुंचा दिये और हुज्जत तमाम कर दी। अगर ये खत देशों के जीतने के लिए लिखे गए होते तो यक़ीनन इन्हें मक्का जितने के बाद लिखा गया होता जब मुसलामन एक पूरी ताकत बन चुके थे। पर बिना कोई ताकत हासिल किए ये खत लिखना यही बताता है कि इसका असल मक़सद उन तक हक़ की दावत पहुंचाना था, न कि धमकी देना या राज्य जीतना। अगर मुसलमान एक बड़ी क़ौम न भी बन पाते तो भी नबी को ये दावती पैग़ाम भेजना ही था क्योंकि इसके लिए ही वो आये थे। 


नबी की जंगे।

ये सच है कि फतह मक्का तक नबी के वक़्त में हुई जंगे अपना अस्तित्व बचाने के लिए हुई और ये मुसलामनों पर थोपी हुई जंगे थी। ये लड़ाइयां नबी और साहाबा ने बचाव में लड़ी न कि इस्लाम के प्रचार के लिए। इनका मक़सद जान माल की हानि करना नहीं था और न ही किसी राज्य को जितना या हुकूमत क़ायम करना था। नबी के द्वारा लड़ी गई सभी जंगों में दोनों तरफ से कुछ सौ लोग ही मरे। जबकि उस समय युद्धों में मरने वालों का आंकड़ा हज़ारों में होता था जैसे कलिंग युध्द में 1 लाख लोग मरे थे।

मुहम्मद सल्ल. अपने जीवन काल मे सिर्फ एक बार "जंग ए तबुक" के मौके पर बाहरी मुल्क के खिलाफ जंग पर निकले थे। जिसकी वजह भी बाहरी मुल्क के आक्रमण की खबर होना थी और उस मोके पर भी आखिर में कोई जंग ही नही हुई थी।



नबी का दूरंदेशी

अगर नबी को लोगो को मारना या युद्ध ही पसंद होता तो ताइफ़ में जब उन्हें अल्लाह का पैग़ाम देने पर पत्थरों से मार मार कर लहू लुहान किया गया तो उन्होंने अल्लाह की तरफ से भेजे गए फ़रिश्ते को उन पर पहाड़ गिराने की बजाए यह कहा कि नहीं इनकी आने वाली नसलें ईमान लाएंगी और ये हुआ भी। खंदक की जंग में जब नबी ने एक अटूट चट्टान पर 3 वार करके उसे तोड़ा तो उसमें से 3 बार चिंगारी निकली थी जिस पर नबी ने मुस्कुरा कर साहाबा को कहा कि अल्लाह ने तुम्हे सीरिया, पर्शिया और यमन पर फतह दी है। यही वो भविष्यवाणी थी जिस पर साहाबा ने काम किया कि इन मुल्कों पर मुसलमानों का शासन आना ही है। यंहा काबिले गौर बात ये है कि इन देशों को फतह करने का हकुम अल्लाह या नबी ने नही दिया बल्कि ये कहा कि इन पर तुम्हारी जीत होगी और ये तुम्हारे कदमों में होगी। यानी मुसलानों की उनसे लड़ाई होगी और इनमें जीत हासिल करंगे।


नबी के खत।

नबी ने ईश्वर के संदशवाहक होने की हैसियत से खत लिखे और ईश्वर की बात से इनकार करने पर आगाह भी किया।
 
नबी द्वारा दूसरे देशों को लिखे गए खतों में लिखा गया कि मैं खुदा का संदेष्टा है और आपको इस्लाम की दवात देता है। अगर आप नही मानते है तो अपने लोगों के लिए आप खुद ही जिम्मेदार होंगे। यानी उन पर आए खुदा के कहर और अज़ाब के लिए आप जिम्मेदार होंगे। इनमे कंही भी इस्लाम मानने पर ज़बरदस्ती नही की गई। ये एक हुकूमत (भावी ही सही) का दूसरी हुकुमत को पैग़ाम था।  

उन्होंने इस्लाम का पैगाम देने के लिए कई बादशाहों को खत लिखे । जिनके कारण इसलाम को सच्चा मान कर कुछ बादशाहों ने इसलाम कबूल भी किया और कुछ ने नही भी किया।  कुछ से संधियां की और कुछ से जंग हुई। खत के मज़मून में अल्लाह के पैगम्बर ने बिल्कुल सीधे और साफ शब्दो में इस्लाम का पैगाम दिया और इस बात से भी आगह किया कि यदि आप अल्लाह के आदेश को नही मानेंगे तो सज़ा के भागी होंगे और साथ ही अपने सल्तनत की गुमराही के भी ज़िम्मेदार होंगे। क्योंकि इसलाम का पैगाम सभी के लिए है और तुम इसे उन लोगो तक पहुँचने नही दे रहे हो। इन खतों में कही भी ये बात नही कही गई कि तुम इसलाम कबुल करो नही तो हमसे जंग करो।


क़ोमों का स्वभाव।

नबी के अंतिम समय से थोड़ा पहले ही ज़ुल्म करने वाले मक्कावासी खुद को मुसलमानों के अधीन कर चुके थे, और उनकी हुकूमत और निज़ाम मुसलमानो को सौंप चुके थे क्योंकि तब तक पूरा अरब उनकी ज़्यादतियों के खिलाफ हो चुका था और मुसलमान भी बन चुके थे। इसलिए मुसलमान अब एक हुकूमत बन चुके थे। नबी के बाद हुई इन लड़ाइयों में न तो आम जनता को क्षति पहुंचाई गयी और न ही जीतने के बाद उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया गया। चूंकि मुसलमान भी इन्सान है और दुनिया के चलन से दूर नहीं है। मुसलामनों ने वैसे ही किया जैसे कोई नई उभरी हुई शक्ति या राज्य आस पास के राज्यों के साथ करता है। 

पूरा अरब एक कबीलाई समाज था और इसलिए अलग थलग पड़े हुए थे पर जब इस्लाम के परचम के नीचे मिले तो एक होकर दुनिया के बहुत बड़ी ताकत बन गए। वंही दूसरी तरफ रोमी और फारसी जैसी क़ौम और रियासतें पहले से ही एक थी और बड़ी ताकते थी। अरब भी उसी तरीके से बड़ी ताकत बनी जैसे दुनिया मे बनती आयी है। क्योंकि अब अरब भी अब एक स्टेट, बड़ी ताकत हो चुके थे तो आस पास की ताकतों से उनका टकराना भी लाज़मी ही था।  

अंतर सिर्फ इतना है कि इस्लाम और मुसलमान एक बेहतरीन सिस्टम बना के दिखा चुके थे जिसमें शासक इतना ईमानदार होता है कि पैबंद लगे कपड़े पहनता है और  किसी का हक़ नहीं मारा जाता। जबकि दुसरे राज्यो के शासन अक्सर उतना ही क्रूर था जितने उनके शासक। जहाँ ताकतवर हुकूमत सिर्फ दूसरे पर हमला कर राज और क़ब्ज़े का ही सिद्धान्त अपनाती थी । ऐसे में मुसलमान सिर्फ जिज़िया लेकर कमज़ोर रियासतों को युद्ध से बचने और दूसरी बड़ी ताकतवर रियासतों से उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेकर, उन्हें चिंता रहित खुशहाल रहने का विकल्प देता था।


क्योंकि वो सच्चे मुसलमान थे तो सिर्फ दुवाओं से काम नही चलाया बल्कि मेहनत करना सीखा और लड़ - लड़ कर एक बड़ी ताकत बने। अगर सिर्फ दुवा करते रहते तो खुद कभी के ख़त्म हो जाते। अरबियों को जंग का तजुर्बा हुआ और उसके बाद ही दुनिया की ताकतों से लड़ पाए। वैसे ही जैसे दूसरी क़ौमें तजुर्बे से बड़ी ताकतें बनती है। अल्लाह का वक़्ती निज़ाम था कि अरब मिलके एक क़ौम बननी ही थी और इसलिए ज़रायें  बनते चले गए और वो सबसे बड़ी ताक़त बन गए।


तानाशाही के बदले दुनिया को एक लोकशाही देना।

इस्लाम या क़ुरान या अल्लाह ने कभी नही कहा कि मुसलमानों की हूकमत क़ायम करो और न ही नबी ने कभी कहा। पर हुकूमत बनना नियति थी। इसलिए ये हुआ भी। खुदा को यही मंज़ूर था। पर ये इनाम के रूप में मिला। अल्लाह की कुदरत का नियम है कि लोगों को  भला चाहने वालो को वो खूब नावज़ती है। ये अल्लाह का निज़ाम है कि उसके मानने वालों को दुनिया पर ग़ालिब कर दिया जाता है यानी शिखर पर पहुंचा दिया जाता है। उसके सच्चे बंदों के साथ इस तरह से वाक़ियात और हालात पेश आते चले जाते है की एक निज़ाम उनके ज़रिए दुनिया मे बनता चला जाता है जंहा कोई नाइंसाफी नही होती और हकों का ध्यान रखा जाता है। अल्लाह ऐसे ज़रिए और असबाब बनाता चला जाता है कि उसके बंदे एक हुकूमत या निज़ाम बनाते चले जाते है।

दुनिया में आखिरी नबी के वक़्त एक बार इस्लाम का निज़ाम नाफ़िस करके दिखाना और एक उम्मत को मुमकिन हद तक बनाना अल्लाह का इरादा था जो साहाबा के ज़रिए पूरा हुआ भी। ये निज़ाम एस्टेब्लिश होने के बाद कुछ सालों तक चल कर भी दिखाना था कि हक़ को मानने वाले दुनिया कितनी बेहतरी के साथ चला सकते हैं। जबकि कुछ साल, कौमो की उम्र के आगे कुछ नहीं होते। पर कौमो की नफसियात बदलने के लिए एक बार निज़ाम आना ज़रूरी था ताकि उनकी नाफिसयत में ये शामिल हो जाये। लोग अपनी मर्ज़ी करना चाहते है थे और वापिस जाहिलियत की तरफ जाना चाहते थे. कुछ महत्वाकांक्षी सियासी और हुकुमती लोगों ने इस्लाम छोड़ा भी था. इसलिए जंगे होनी ही थी। ज़्यादा ताकतवर को हुकूमत करनी ही थी। अपने बनाये हुए निज़ाम से सबको मुहब्बत होती है और अगर वो हक़ है तो उसे बचाने की कोशिश में जंगे भी होती है। चाणक्य ने भी यही किया था।

जिसने भी दुनिया मे ज़ुल्म किया उसने अल्लाह और नबी की नाफरमानी की इसलिए उनसे जंग करी जा सकती है और करी गयी। रोमियों ने दुनिया को हराया और दबाया था, मुसलामनों ने उन्हें हराया।


ख़लीफ़ाओं द्वारा ताक़त के युद्ध।

नबी की वफात के बाद भी, 4 बड़े खलीफाओं के द्वारा दूसरे शासकों को लिखे गए खतों में भी यही लिखा गया. इन 4 खुलफाए रशिदून में से हर किसी ने लगभग 10-20 ऐसे ख़त दूसरी रियासतों को लिखे अगले लगभग 30 साल तक. ऐसे पत्र प्राचीन और मध्यकालीन युग में कूटनीति का एक रूप और आम चलन था. ऐसे पत्र केवल इस्लामी रियासतों द्वारा ही नहीं लिखे गए थे.  
 
इन खतों में लिखा लिखा गया कि इस्लाम अपना कर सत्य का साथ दो और अगर आप नहीं मानते तो जिज़िया दो यानी हमारे अधीन हो जाओ और सुरक्षा पाओ या फिर जंग करो। किसी भी खत में ये नही कहा गया कि इस्लाम कुबूल करो या जंग करो बल्कि ये कहा गया कि इस्लाम ले आओ तो ज़कात दो और अगर नही मानते तो जिज़िया देकर हमारे अधीन हो जाओ या फिर जंग करो. इसका मतलब है कि जंग हारने पर भी हमारे अधीन ही होना पड़ेगा। यानी इसका मूल संदेश ये था कि एक ईश्वर को पूज्य मान लो वरना आपकी ताक़त समाप्त होनी ही है। इस्लाम नहीं पसंद तो अब खालिस हुकूमत की बात होगी और मुसलमानों के अधीन आना पड़ेगा (जैसा दुनिया का हर बड़ा राजा युद्ध से पहले कहता है) जिसके बाद जिज़िया देके आपकी हुकूमत चलती रहेगी जब तक आप राज्य में न्याय कायम रखते हो। अगर अधीनता भी नहीं पसंद तो युद्ध करना पड़ेगा और जिसके बाद आप शासक ही नहीं रहोगे और राज्य छीन लिया जाएगा।

आम तौर पर यही माना जाता है कि जिज़या एक टैक्स होता था जो गैर मुसलमानों को राज्य सरकार को देना होता जिसके बदले उन्हें राज्य की किसी से जंग शुरू होने पर जंग में हिस्सा लेना अनिवार्य नहीं था। इसके बदले उन राज्यों को सुरक्षा दी जाती थी। मुसलमानों को ज़कात सरकार को देनी पड़ती थी और साथी ही मुसलामनों को जंगी हालातों में सेना में सेवा देने की भी अनिवार्यता थी। इसे जिज़या और ज़कात से राज्य सरकार चलती थी, गरीबों के वजीफे दिए जाते थे और जनता की सुरक्षा की जाती थी चाहे वो किसी भी धर्म के मानने वाले हो। माले ग़नीमत के अलावा ज़कात या जिज़िया से हुकूमत चलती थी। पूरी दुनिया में हुकूमतों के तब भी यही दो बड़े आय स्रोत होते थे। जिम्मी लोगों की जान माल आदि की ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर होती थी। हालांकि इसे एक कंपनसेशन भी माना जाता है जो उन राज्यों से लिया जाता था जो मुस्लिम स्टेट से जंग में शामिल थी, या जंग पर आमादा दी या जो दुश्मन राज्यो के भागीदार थे।


दीन में ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं।

जीत के बाद, खलीफाओं ने वंहा दीन मानने के लिए कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं कि क़ुरान के अनुसरण करते हुए। बल्कि मुसलामनों ने अपने अखलाक़ो और इस्लाम का मुज़ायरा किया की वंहा सभी लोग धीरे धीरे मुसलमान होते चले गए जैसे पूरे अरब में हुए थे। ऐसी मुसलामनों की रियासतों में जिम्मी यानी गैर मुस्लिम नागरिकों के पूरे अधिकार होते थे

इराक की तरफ जाते हुए हज़रत अबू बकर में कमांडर खालिद बिन वलीद को भी यही लिखा था कि लोगों के दिलों को जीतों, उन्हें इस्लाम की दावत दो। अगर वो कुबूल करें तो अच्छा है वरना जिज़िया लो और देने से मना करे तो उनसे जंग करो। ये भी आदेश दिया कि किसानों से मैसूर न लेना और लोगों को अपने साथ मिलाने के लिए जबरदस्ती न करना।

इस्लाम का फैलाव तलवार के ज़ोर पर तब होता जब जबरन इस्लाम कुबूल करवाया जाता। पर यंहा शासकों को हरा कर उनके राज्यों में एक न्याय व्यस्था कायम की गई, व्यापार और रिहाइश के रास्ते खोले गए, जनता को मन चाहा धर्म मानने की छूट दी गई। और धीरे धीरे इस्लाम की शिक्षाए और मुसलानों के अखलाक़ देख कर लोग मुतासिर होते गए और इस्लाम कुबूल करते गए।

ये सच है कि सभी राज्यों से हुई लड़ाइयों में लोकल लोगों ने मुसलमानों को सहायता करी थी क्योंकि वो उनसे त्रस्त थे और मुसलमानों से उन्हें उम्मीदें थी। बड़ी जंगों में वंहा की स्थानीय जनता या मदद करने दूसरी ताकतों के साथ मुसलामन करार कर लेते थे। मुसलमान खुद उनके सामने ये वादे रखते थे और निभाते भी थे ताकि वो मुसलामनों का साथ दे। जंगे यरमुक जीतने के बाद अबू उबैदा रज़ी ने स्थानीय लोगों से ऐसे ही वादे किए थे जिन्होंने ये शर्ते मानकर साथ आने की हामी भरी थी। ये शर्ते या वादे थे कि मुसलमान जीत के बाद वापिस चले जाएंगे, उन्ही लोगों को हुकूमत दे जायँगे, सबकी जान माल की हिफाज़त करेंगे, जबरन धर्म परिवर्तन नहीं करँगे, जिज़िया की रकम देना होगा जिसका प्रतिशत ज़कात से कम होगा, इंसाफ करने तक राजपाट में दखल नहीं होगा, कॉमन दुश्मन से हिफाज़त करँगे और न कर पाए तो कुछ रकम न लेंगे, जो फैसला मुसलमानों से करवाना चाहो, वो मुसलमान कर देंगे।


तरीकेकार क्या रहा।

मुसलामन जानते थी कि आम लोगों का बहाए बिना जितना ही मक़सद है और अगर ज़बरदस्ती की तो ये लोग मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ हो जायँगे जो कतई नहीं चाहते थे। वो तो हुकूमत को ताकत से और अवाम को व्यवहार से जीतना चाहते थे, जो हुआ भी। मुसलमानों ने जीत कर किसी की जान, माल, जायदात, ज़मीन नहीं छीनी, सिर्फ उनसे टैक्स लिया जो शासक का हक होता है। यंहा तक कि जेरुसलम की चर्च में ईसाई द्वारा पेशकश किये जाने के बाद भी वंहा नमाज़ नहीं पढ़ी (ह. उमर का फैसला) ताकि कोई गलत संदेश न जाये। सभी जनता को हक़ दिया कि वो मुसलमान प्रशासकों के खिलाफ बेहिचक शिकायत भी कर सकते है।

इसका नतीजा ये हुआ कि खुसरो नहीं रहे पर पारसी दुनिया में रहे। किसरा नहीं रहे पर रोमी रहे। मुश्रिक शासक नही रहे पर अरब रहे। ये सब तलवार के ज़ोर पर नही हुआ।

इतिहास सबूतों से भरा है कि रोमी शासकों से मिस्रवासी छुटकारा चाहते है और उनके खिलाफ गुस्से में थे पर कुछ कर नहीं पाते थे क्योंकि रोमी एक बड़ी ताकत थे। रोमी राजा मिस्र वालों से ज़बरदस्ती करता था। ईसाई धर्मपरिवर्तन पर ज़ोर देते थे उस समय। इसलिय मिस्रवासी मदद करने से पहले मुसलमानों से ये शर्त रखते थे कि उनपर धार्मिक जबर नहीं करँगे और मुसलमान इससे भी बढ़कर उन्हें छूट देते है। जैसे मिस्र के लोगों ने अपने धर्म चर्च जान माल आदि की हिफाज़त की गारन्टी मुसलमानों से पाने के बाद करार किए और मदद की। बल्कि ऐसे भी वादे किए जो रोमियों से कभी भी नहीं करने को तैयार थे। एक बात जान लीजिए बड़ी लड़ियाँ बिना अंदुरूनी मदद के नहीं जीती जा सकती इसलिए ये मुमकिन ही नहीं कि जनता खुद मुसलामनों की मदद करके उनके न्यायपूर्ण शासन में आना चाहती थी।


दूसरी हुकूमतों की कार्यप्रणाली और इकदाम।

पर्शियन राजा ने मुहम्मद साहब के कत्ल की साजिश में सहायता की थी। फारसियों ने मुर्तद हुए लोगो की मदद की थी जो मुसलमानों के खिलाफ खड़े हुए थे। फारसियों से जंग को पानी की लड़ाई भी कहा जाता है क्योंकि उन्हीने मुसलमानों का पानी रोक दिया था। बनू नादिर काबिले ने नबी के कत्ल की कोशिश की थी। और मक्कावासियों ने भी की थी।

अरब में जिस तरह लोग मुतासिर होकर मुसलमान बने, दूसरे मुल्क नही चाहते थे कि उनके यंहा मुसलमान तबलीग करे इसलिये वंहा तक हक़ की दवात बिना नई हुकूमत लाये नहीं पहुँच सकती थी जबकि बादशाह ने साफ इनकार कर दिया हो।

दूसरे पड़ोसी, मुल्कों द्वारा हमले किये जाने का खतरे थे। झूठे नबी बनके लोग राज करने लगे थे। ज़कात देने से लोग मुकर गए थे। इस्लाम छोड़ कर मुर्तद हो कर जाहिलियत में वापीस चले गए थे। बहुत से ताकतें साहाबा का निज़ाम और हुकूमत गिराने के फिराक में लग गए थे। 
 
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इस्लाम के दूत हारीस इब्न उमैर अल-अज़दी को रोमन साम्राज्य के एक गवर्नर ने क़त्ल कर दिया। इनसे मूताह की जंग हुई.  ग़स्सानी क़बीला (Ghassanid tribe)जो कि रोमन साम्राज्य के मातहत थे और ईसाई थे, इन्होंने मुसलमानों के खिलाफ़ हमला करने वालों को मदद दी।

पैग़म्बर को खबर मिली कि रोमन साम्राज्य और उनके साथी ईसाई अरब क़बीले मदीना पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। बिजेंटाइन सेना ने मुस्लिमों की ताक़त देखकर हमला टाल दिया। मुस्लिम मदीना वापिस लौट आये. यह तबूक (630 AD) की बात है. पैग़म्बर ने कुछ रोम के अधीन स्थानीय ईसाई क़बीलों से सुलह की और उनसे जिजिया (टैक्स) लिया।

फारसी सम्राट खुसरो द्वितीय (किसरा) को जब इस्लाम का पैग़ाम भेजा गया, उसने अपने गवर्नर को पैग़म्बर को गिरफ़्तार करने का हुक्म दिया। लेकिन कुछ ही समय में अल्लाह ने उसे ज़िल्लत के साथ खत्म कर दिया उसका बेटा ही उसे मार कर तख्त पर बैठ गया।
 
 
कुरानी उसूल, विस्तारवाद -सत्ता की लड़ाई या आज़ाब।

 
इन खतों और जंगों के पीछे 3 ही कारण दिए जाते हैं आम तौर पर। पहला दीन-राज्य विस्तार के लिए (आम उलेमा द्वारा), दूसरा अल्लाह के अज़ाब (अधीन आने का) के तौर पर जो रसूल के साथ आता है और तीसरा क़ुरान के दिये जंगी उसूलों के कारण। दूसरे कारण में पहला अपने आप शामिल हो जाता है। हालाँकि नबी ने जब ये खत लिखें तब तक मुस्लिम खुद एक ताकतवर क़ौम नहीं बने थे जो दूसरों को ज़ुल्म से जाके आज़ाद करवा पाते।
 
जंग के लिए क़ुरान में 3 शर्ते हैं:- आत्मरक्षा में (कुरान 2.190), अनुबंध टूटने पर (कुरान 9.4-5), कंही बड़े स्तर पर हो रहे अत्याचारों से लोगों को निजात दिलवाने के लिए (कुरान 4.75)। नबी के वक़्त में लिखे गए ऐसे खतों में (खुल्फ़ा के राशिदून के भी) कोई कांट्रेक्ट तोड़ने का ज़िक्र नही है, न ही हमले से सेल्फ डिफेंस का है और न ही उन स्टेट में हो रहे लोगों पर बड़े स्तर के ज़ुल्म का। (शिर्क को ज़ुल्म माने तो बात अलग है क्योंकि इसके हिसाब से तो फिर हर गैर मुस्लिम राज्य ज़ुल्म पर साबित हो जायेगा)। 

एक बात तय है कि इन खतों में 3 ऑप्शन देने का मतलब यह था कि इस्लाम अपनाने की ज़बरदस्ती नहीं करी गयी थी। हां इस्लाम की पेशकश जरुर करी गयी थी, जो पुराने ज़माने में एक आम राजसी चलन था। यह एक अभियान था राज्यों को अपने अधीन लाने का. उन्हें ऑप्शन मिलता था की युद्द की बजाय इस्लाम मान ले या जिजिया दे दें (हिंसा रहित ऑप्शन), दोनों में से एक मानना पड़ेगा वरना भी जंग लड़नी होगी. जो खुद से इस्लाम में आएगा वो बराबर का स्थान पायेगा और जो जिज़िया देके अधीन आयेगा उसकी ताकत और सीमित स्वतंत्रा बरक़रार रहेगी (राजा, प्रजा को सुरक्षा) और जो जंग करेगा तो हार कर कर अधीन आएगा।

अज़ाब के मामले में पहला मत है कि ये युद्ध और मुसलामनों की हुकुमत, न मानने वाले लोगों पर आज़ाब था। क्योंकि मक्का का तख्ता पलट होना इसका निशानी थी कि मुहम्मद सल्ल अल्लाह के सच्चे पैग़म्बर है। एक जाहिल क़ौम और समाज का एक बड़ी ताकत बनना भी निशानी था की ये काम कोई अल्लाह का बंदा ही कर सकता है। नबी की कही एक एक बात सच होती गयी कि न मानने वालों को अल्लाह पलट गया हटा देगा। ये भी सच्ची नबूवत की दलील थी जिसे पूरी दुनिया ने होते हुए देखा। इनका इनकार अब कोई नहीं कर सकता था। इसलिए नबी ने इन बादशाहों को खत लिखे थे। उनके वक़्त में ही जंगों का सिलसिला शूरू हुआ और खलीफाओं द्वारा मुकम्मल हुआ। इन जंगों में जीत के बाद में दुनिया के बड़े हिस्से को रसूल का पैगाम पहुंचा दिया गया। मानने वाले बेहतरीन निज़ाम का हिस्सा बनते चले गए और न मानने वाले खाक होते गए।

पहले के रसूलों के वक़्त हुज्जत क़ायम होने पर आसमान से अज़ाब नाज़िल होता था पर नबी के वक़्त ये नबी के साथियों के ज़रिए हुआ। पैगम्बरी आयी, हक़ की पहचान कराई गई। न मानने वालों पर अज़ाब आया। नबी ने अपनी वफात से 4 साल पहले खत लिख कर हक़ उन पर भी खोला की आ कर जांच करले।  4 साल की मोहलत मिला उन्हें जांचने के लिए। कुछ ने हक़ मान लिया। पर कुछ ने इंकार किया तो साहाबा के ज़रिए अज़ाब आया और वो हुकूमत खो बैठे। क्योंकि मुसलमानों को ताकत हासिल हुई थी तो इन्ही से अज़ाब दिलवाया गया। रसूल के मानने वालों पर इनायत की गई। 

अज़ाब के मामले में दूसरा मत यह है कि असल में सिर्फ मक्का वालों पर अज़ाब आया और बाहर वालो पर पोलिटिकल वॉर हुई। नबी के जाने के बाद जितनी भी लड़ाइयां हुई वो सभी पोलिटिकल लड़ाइयां थी। असल में ये लड़ाइयां और फतह अल्लाह की तरफ से एक निज़ाम बनाने का रास्ता थी। इंसानी स्वभाव और प्रकृति के नियमों के अनुसार अरब क़ौम बड़ी और ताक़तवर होती हुई दुनिया पर छाती चली गई। 
 
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रोम और ईरान के ख़िलाफ सहाबा किराम ने जो जंगें कीं उसकी नौईयत को सही तरीक़े न समझने की वजह से कुछ ग़लतफहमियां फैल गई हैं! हमारे नज़दीक इसको क़ुरान मजीद और तारीख़ की रौशनी मे देखा जाए तो ये वाज़ेह हो जाता है कि ये ख़ुदा के उस वादे का ज़हूर था जो क़ुरान (सूरह नूर:55) मे सहाबा किराम के साथ किया गया था! {माहनामा इन्ज़ार Dec.2021 से मफहूम} P.25
 
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Gist of letters of Prophet and righteous Caliphs to neighboring centralized States and powerful Rulers, in likely chronological order.

नबी ने लगभग 9 ताकतवर और मरकज़ी निज़ाम वाली पडोसी रियासतों को ख़त लिखे थे जो बेहद वाज़ेह, शार्ट एंड ब्रीफ होते थे। इन्हें दवती खत भी कहा जाता है। हालांकि कुछ उलेमा नबी के कुल 20-25 ख़त भी बताते हैं मगर आम खत थे जो ऐसी फीचर नहीं रखते थे। इन्हें 627–631AD के दौरान लिखा गया था हालांकि अक्सरियत का मानना है कि ये खत सुलैह हुदैबिया (628AD) के बाद लिखे गए थे। फतह मक्का 630AD में हुई थी और नबी की वफ़ात 632AD में।  

627/628 AD onwards:

• To Heraclius (Byzantin - Rome) [showed interest but not converted]; to Khosrow/Kisra (Sassanid- Persia) [got angered]; to Muqawqis (Egypt) [sent gifts but not converted]: I invite you to accept Islam. If you accept Islam, you will be safe/have safety and will be granted rewards by Allah. If you refuse, you will bear the burden/ responsibility of your people’s sins.

• To Najashi (Abyssinia- Ethiopia) [likely accepted]: Very polite, unconditional, no poltical demand or threatening content.
   
628AD onwards:

• To Munzir ibn Sawa (Bahrain) [welcomed and allowed Islam to spread]: If you refuse, then you will be required to pay Jizyah (a tax for protection) as a covenant, and your people will be safe. If you reject both, we will be forced to fight/ As long as you are virtuous you will continue to rule. Jews and Magians have only to pay a tax. Do not make any other demands to them. Those who do not have enough land to maintain them should have four dirhams each and some cloth.

• To Hawdha ibn Ali (Yamama- Central Arabia) [rejected - He demanded position/share in the power, the Prophet replied that Allah is the one to decide who will rule]: My religion shall prevail everywhere. You should accept Islam, and whatever under your command shall remain yours.

• To Harith Ghassani (Damascus/ Syria) [threatened back]: I invite you to believe in Allah, you will be safe and your kingdom will remain yours.

• To Jaifer and Jalandi (Oman) [accepted]: You will be safe if you submit to Islam. I warn all those living that Islam will prevail. if you do not, then you will lose your country, and my horsemen will invade your territory and my prophecy will dominate your country.


631AD onwards:

• To King of Himyar (Yemen) [likely accepted]: I invite you to believe in Allah, you will be safe and your kingdom will remain yours.

 
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Abu Bakr's letter to Lakhm Tribe: I invite you to accept Islam. You can either accept and be our brothers in faith, or you may remain in your position and pay the jizya tax, which will grant you protection under the laws of Islam. If you refuse both, then we will have to prepare for battle.

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Abu Bakr's letter to BahrainI invite you to embrace Islam. If you accept Islam, you will be granted protection and you will share in the rewards of the Muslims. But if you refuse, the sword will be the answer.

 Umar upon the peaceful conquest of Jerusalem: This is the assurance of safety which Umar has given to the people of Aelia. He has given them an assurance of safety for themselves, for their property, their churches, their crosses, the sick and healthy of the city and for all the rituals which belong to their religion. Their churches will not be inhabited by Muslims and will not be destroyed. Neither they, nor the land on which they stand, nor their cross, nor their property will be damaged. They will not be forcibly converted.

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Uthman's letter to CyprusIf you accept Islam, you will receive the protection of Allah, and your people will be treated justly. If you choose not to, then pay the jizya, and you will have security for your lands and property. However, if you refuse both, we will take up arms to defend our rights.

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Uthman's letter to ArmeniaI invite you to Islam. Should you accept, you will find peace and security under the protection of Allah. If you refuse, the option to pay the jizya tax remains, and you will be exempt from the duties of military service. However, if you reject both options, then we will be forced to engage in battle.

Ali's letter to Bahrain: If you accept Islam, you will be granted protection and you will be part of a community. If you choose not to accept Islam, then pay the Jizyah for the protection of your rights and your safety. If you refuse both, then we will be compelled to defend ourselves and uphold the laws of Islam through force, as Allah commands.

Hadith: Majah 2858; Dawud 2612; Muslim 1731; Muslim: 19: 4294: The Prophet would advise the commanders to fear Allah and fight in the name and cause of Allah. Fight those how disbelieve in Allah. But do not be treacherous, do not steal from the spoils of war, do not mutilate and do not kill children. When you meet your enemy from among the polytheists, invite them to accept Islam, and if they respond then accept it from them and refrain from fighting them. Then invite them to leave their land and move to the land of the polytheists (Hijrah). Tell them that if they do that, then they will have the same rights and duties as the polytheists. If they refuse, then tell them that they will be like the Muslim Bedouins (who live in the desert), subject to the same rulings of Allah as the believers. But they will have no share of war spoils, unless they fight alongside the Muslims. If they refuse to enter Islam, then ask them to pay the Zakat (Poll-tax). If they do that, then accept it from them and refrain from fighting them. But if they refuse, then fight them. If they want you to give them the protection of Allah and Prophet, give them the protection of yours, your father and your Companions, because if you violate it, it is easier than violating the protection of Allah and the Messenger.
 

यह एक अहिंसा संधि है जो अल्लाह और उनके पैग़म्बर मुहम्मद की ओर से युहन्ना और आइला के निवासियों के लिए है। इस संधि के अनुसार, उनके सब परिवहन के साधन, चाहे वे समुद्री हों या भूमि वाले और सभी व्यक्ति को जो सीरिया, यमन और द्वीपों से संबंधित हो सकते हैं, वे सभी अल्लाह और उसके पैग़म्बर की सुरक्षा में होंगे। हालांकि, यदि उनमें से कोई भी नियम का उल्लंघन करता है, तो उसका धन उसे सजा से नहीं बचा सकता। सभी समुद्र और भूमि मार्ग उनके लिए खुले हैं और वे उनसे आने-जाने के हकदार हैं। (इब्न हिशाम, खंड II, पृष्ठ 526)

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  1. सुराः तौबा में कहा कि अरब के मुश्रिक के कोई मौत की सज़ा है और बाकी के लिए मेहकूमी की सज़ा है जिन तक रसूल का पैग़ाम पहुंचा। उन्होंने अज़ाब नही दिया, न ही मुल्क फतह किये। ये बात रसूल के हक़ होने की दलील है।

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