Friday, 26 February 2021

सत्संग।


                                           परिचय

1. 
नमस्कार, वन्देश्वरम।  इस संदेश का आरम्भ करता हूँ ईश्वर के नाम से जो बहुत ही दयालु और कृपावान है। सबसे पहले मैं आपको अपना परिचय दे दूं। हमारा उद्देश्य राजनीतिक नहीं है। न ही हम कोई दान दक्षिणा लेते है। हम एक ______ नामक NGO से है जो समाज सेवा के कार्य करती है। हम अंतर धार्मिक सौहार्द के लिए भी काम करते है और लोगों के बीच जाके बातचीत करते है। हम सत्संग करते है, सत्संग का अर्थ होता है सत्य की संग बैठ कर बात करना।  
 
2. 
आप जानते है कि आज समाज में भेदभाव और दूरियां बहुत बढ़ गई है। आपस का भाईचारा, अपनापन और प्रेम समाप्त होता जा रहा है। समाज में इंसानियत कम होती जा रही हो तो वंहा हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम लोगों को एक दूसरे से जोड़े। लोगों के मतभेद तो स्वीकार है पर मनभेद न होने पाए। बातचीत से ही नफरतर की दीवारों में खिड़की खुलती है जिससे बाद में दिवार भी गिर जाती है। कंही आग लग रही हो तो क्या आप वंहा खड़े होकर तमाशा देखेंगे, बल्कि उसे बुझाने का प्रयास करंगे।
 
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                                                  समानता
 
1. 
इसलिए हुमें ये भेद और नफरते मिटानी है और ये तभी तभी समाप्त होंगी जब हम सभी मनुष्यों को समान और एक मानने लगेंगे।  

2.
प्रकृति के लिए हम सब समान है। प्रकृति हमें समान सुविधाएं देती है। पिता एक भाई को 2 बीघा जमीन दे दे और दुसरे को 10 तो अन्याय हो जाएगा।  मां की खोख से, दूध पीने तक और जमीन में अनाज उगाने तक हमारे लिए प्रकृति ने सभी प्रबंध समान रखे है।

हवा सबको सांस देती है। पानी सबकी प्यास बुझाता है। सूर्य सबको प्रकाश देता है। पेड़ सबको छांव देता है, हिन्दू हो या मुस्लिम। वर्षा किसी का खेत नहीं छोड़ती की ये इस जाती वाले का खेत है और ये उस जाती वाले का। 

उसकी सुविधाओं का महत्व तब पता लगता है जब खरीदनी पड़ती है जैसे बिसलेरी की बोतल 20 रुपए की मिलती है जबकि पानी फ्री मिला है। ऑक्सीजन का सिलिंडर हज़ारों रुपए का आता है जबकि हवा फ्री है। 

मीठा सबको मीठा लगता है, कड़वा सभी को कड़वा।  सर्दी और गर्मी सभी को लगती है। अगर प्रकृति के लिए सभी सम्प्रदाय बराबर नहीं होते तो एक धर्म वाले को एक आंख कम देता और दूसरे को एक कान ज़्यादा। किसी जाति वाले को एक हाथ कम देता और दूसरी जाति वाले को एक टांग ज़्यादा। 

पर प्रकृति ने कभी हम में भेदभाव नहीं किया। भेदभाव हमने कर लिया। खुद को धर्म, जाति, रंग, नस्ल, भाषा मे बाँट लिया।  इस पर बस नहीं चला तो धरती पर लकीरें खींच कर अलग अलग देशों में बांट लिया। हमें अपने कर्मों के आधार पर बड़ा बनना था। पर हम स्वार्थ के आधार पर बड़ा बनने लगे।
 
3.
जैसे प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने पर सुनामी और बाढ़ आती है। वैसे ही मानवता में छेड़छाड़ करने का नतीजा ये हुआ कि अब हम प्रकृति का प्रकोप झेल रहे है। इतनी प्रगति और मेडिकल साइंस के बाद भी आज किसी के मन मे चैन, सुख, शांति, सुकून नहीं है। 
 
शांति मिलेगी भी कैसे। इसी मुंह से ईश्वर का नाम जपते हौ और इसी मुंह से गालियां बकते है।  इसी आंख को बंद करके उससे याद करते हौ और इन्ही आँखों से गलत चीज़े देखते हौ। इन्ही मन मे उसे याद करते है और इसी मन में दूसरा का बुरा चाहते हौ। इन्ही हाथों को उसके आगे जोड़ते है और इन्ही से सभी बुरे काम करते है। ऐसी दोहरे व्यवहार से हमारी आत्मा कभी सुखी नहीं रह सकती।  
 
पेन तभी चलता है जब उसके अंदर रीफ़ील होता है। इसलिए अपने अंदर कि आत्मा को जगाइए। जो अंदर होगा वही बाहर आएगा। आत्मा में रंग, रस होगा तो बाहर भी दिखाई देगा।
 
4.
लोग अपने दुख से इतने दुखी नहीं है जितने दूसरे का सुख देख के दुखी है। 

आज जब थोड़ा सा दुख मिलता है तो कहते है अरे मैं ही मिला था क्या। और जब सुख मिलता है तब कोई नहीं कहता कि अरे मेरे पास पहले से बहुत सुख है, मुझे और सुख नहीं चाहिए, किसी और को दे दो सुख। 

लोग किसी के नए जुते देख कर जलने लगते है कि मेरे पास क्यों नहीं है। पर किसी बिना पैर वाले विकलांग को देख कर धन्यवाद नहीं करते। 

5.
प्रकृति ने हम सभी के चेहरे, अंगूठे और आंखें अलग बनाएँ पर हममें बहुत सी समानताऐं भी रखी। सबसे बड़ी समानता तो ये है कि हम सब आपस में रिश्तेदार और संबंधी है। 

दुनिया की आज आबादी लगभग 8 अरब है। 500 साल पहले ये सिर्फ 50 करोड़ थी। 2000 साल पहले सिर्फ 3 करोड़ थी और 10000 साल पहले दुनिया मे सिर्फ कुछ लाख लोग ही थे। यानी समय मे जितना पीछे जाते रहोगे, आबादी कम होती चली जाती है। पीछे जाने पर जीवन के आरम्भ में ऐसा समय आएगा जब धरती पर केवल एक जोड़ा अर्थात एक पुरूष और एक स्त्री थे जिनसे सारी मानव जाति फैली। हम सभी उन्ही की संताने है और इसलिय हम सभी आपस मे रिश्तेदार हुए। 

डीएनए विज्ञान यही इशारा करती है और दुनिया के लगभग सभी धर्म ग्रंथ यही बताते है कि समस्त मानव जाति इसी जोड़े से पैदा हुए है। इसलिए हम सब एक परिवार के सदस्य है। इन्हे ही स्वयंभू मनु या आदिम या आदिपिता और शतरूपा या हवव्यवती कहा गया है। इन्हें इस्लाम धर्म में आदम और हव्वा और ईसाई धर्म में एडम और ईव कहा जाता है।
 
6.
यही बात हमारे मन में बैठी हुई है की हम एक है। इसलिए आपदा में हम में से अधितकर एक दुसरे की मदद करने लगते है। किसी का एक्सीडेंट हो जाए तो बिना जाने उस तरफ मदद करने के लिए भागते है। कंही आग लग जाए तो बिना जाने उस तरफ पानी लेके भागते है। 

खून देना वाला नहीं कहता कि मेरा खून इसी जाति वाले को देना। खून लेने वाला भी कभी नहीं पूछता की देने वाले का धर्म क्या था। आखिर हम सभी का खून लाल है।

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7.
हम सभी एक हो जाएँ इसके लिए हुमें एक चीज़ समझनी होगी. वो ये है कि जैसे एक पिता की 4 संतान आपस मे कितनी ही लड़ाई हो पर वही पिता जब अपने नाम का वास्ता दे देता है तो अक्सर बेटे भी एक हो जाते है। उसी तरह सभी पिताओं का पिता, वो परमपिता, वो परमेश्वर भी तो एक ही है।  हिन्दू मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी ईश्वर के पैदा किए हुए है। तो फिर हम उसके नाम पर क्यों नहीं एक हो सकते। आखिर सब उसी के बंदे और भक्त है। ऐसे ही देश के नाम पर और युद्ध के समय में भी हम सब एक हो जाते है तो ईश्वर के नाम पर भी तो एक हो सकते है।

8.
हम लोगो में अंतर क्यों है, उसका कारण बताता हूँ । वही 4 बेटों का पिता अपने हर बेटे के जवान होने पर उन्हें कुछ शिक्षा देता है जैसे कि अच्छे कर्म करना, बुरे कर्म मत कारण और लोगों की सेवा करना आदि । पिता यही शिक्षाएं अपने दूसरे बेटे के जवान होने पर देता है। तीसरे और फिर चौथे बेटे को भी यही शिक्षाएं देता है।  बाद में चारों बेटे आपस में लड़ने लगते है। एक बेटा कहता है कि पिता केवल उससे ही प्रेम करता था, उहोंने केवल उसे ही शिक्षाएं दी और इसलिए वह केवल मेरा ही पिता है तुम्हारा नहीं। बाकी तीनों बेटे भी ऐसा ही दवा करते है। ये कोई नहीं समझता कि उनका पिता चारों से प्रेम करता था और चारों को एक ही शिक्षा दी। इसी तरह वह ईश्वर हम हिन्दू मुस्लिम ईसाई यहूदी सभी का स्वामी है। उसने अलग अलग समय पर हम सभी को एक ही शिक्षाएं दी जैसे अच्छे कर्म करो, बुरे कर्मों से बचो आदि। मगर हम भी यही कह कर एक दूसरे से लड़ने लगे की ईश्वर तो केवल मेरा है, वो तुम्हारा नहीं है।  जबकि कोई भी यह देखने को तैयार नहीं है कि सभी को दी गयी उसकी शिक्षाएं तो एक ही है।

9.
बच्चें अलग अलग रंग के कवर या रेपर वाली टॉफियों पर लड़ाई करते है की लाल वाली मैं लूंगा और हरी वाली मैं लूंगा। जबकि उनके अंदर एक ही तरह की चोकोलेट टॉफी होती है।  इसी तरह हम बड़े लोग भी अलग अलग धर्मों के नाम पर लड़ते है। यह पीला वाला मेरा, वो हारा मेरा, यह नीला वाला तेरा और वो सफ़ेद वाला उसका। जबकि उन धर्मों मे झांक कर कोई देखने को तैयार नहीं है कि उनमें एक जैसी ही बातें होती है कि सबका भला करो, किसी का बुरा न करो आदि। क्या कोई धर्म कहता है कि चोरी करो, लोगों को सताओ। कोई नहीं कहता। हमने उसके दिये एक धर्म को भी मेरा तेरा बना लिया हैं 

10.
आज बच्चे मोबाइल चलाते रहते हैं और बड़ो की बात नहीं सुनते क्यूंकि उनमें बड़ो का डर खत्म हो गया। बड़े, बुर्जगों की नहीं सुनते क्योंकि बुजुर्गों का डर खत्म हो गया है। इसी तरह लोगों के दिलो से ये डर खत्म हो चुका है की हमें किसी को अपने कर्मों का जवाब देना है इसलिए सभी अपनी मन मानी कर रहे है। हमारे दिलों से  ईश्वर का डर और जवाबदेही खतम हो गयी है। हम भुल चुके है कि कर्मों का फल मिलता है। इसलिए उसे याद रखना है। 

सभी मोबाइल प्रयोग करते है। क्या आप जानते है कि मोबाइल किसने बनाया है। नहीं जानते। मोटोरोला के मार्टिन कूपर 1972 में। इसी तरह हम हमारे बनाने वाले को भूल गए है पर उसका दिया जीवन रोज़ जीते है।
 
हम अपने को बनाने वाले ईश्वर को ही भूले बैठे है। कबीर ने कहा था दुख से सिमरन सब करे सुख में न करे कोई, जो सुख में सिमरन करे तो दुख काये को होये।  

11.
जब कोई चीज़ अपने स्रोत से कट जाती है तो वो काम करना या फायदा पहुंचना बंद कर देती है। पानी की बूंद नदी से अलग हो जाये तो फना हो जाती है।  पेड़ अपनी जड़ से कट जाए तो पनपता नही है। हमारी जड़े भी हमारे स्रोत ईश्वर से कट चुकी है। हमें वापस अपने स्रोत यानी ईश्वर से जुड़ना है। पंखे की तार बिजली बोर्ड से हटा दो वो हवा देना बंद कर देता है। उसी तरह हमारी तार भी ईश्वर से कटी हुई हैं इसलिए हम अपना भी नुकसान कर रहे हैं और दूसरों को भी फायदा नहीं दे पा रहे। हमें वापस अपनी तारें ईश्वर जोड़नी है।

12.
हममें लड़ाई झगड़े इसलिए है क्योंकि हम अपने ही धर्म और ग्रंथ को नहीं जानते। अधिकतर सनातन धर्मी वेद नहीं पढ़ते है और अधिकतकर मुसलमान क़ुरान को समझ कर नहीं पढ़ते है। अगर अपने धर्म को सही से मानना शुरू कर दें त लड़ाई झगड़े ही न हो। 
 
ईश्वर से उसके भक्तों को मिलवाना ऐसे है जैसे किसी मां को खोए हुए बेटे से मिलाना।  हम यही काम करते हैं।
 
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                                             तौहीद

1.
विज्ञान कहता है कि सभी जीव जंतु एक झुंड में रहते है। हाथी, चींटी, पक्षी और मनुष्य भी। इन गिरोह का एक लीडर होता है। क्योंकि आदेश देने वाला अगर केवल एक ही व्यक्ति हो तो संचालन सबसे बढ़िया होता है जिसे मैनेजमेंट की भाषा मे यूनिटी ऑफ कमांड कहा जाता है। जब 2 दिमाग काम करते है तो काम सही तरीके से नहीं चल पाता। कुछ घरों में शादी के बाद लड़ाई इसी लिए होती है। इसलिए देश का एक प्रधानमंत्री होता है। टीम का एक कप्तान होता हौ। घर का एक मुखिया होता है। अगर 2 प्रधामंत्री हो तो क्या देश चल जयगा। एक कहेगा कि मैं झंडा फेहराउंगा दूसरा कहेगा की मैं फेहराउंगा। दोनों अपनी मर्ज़ी से सरकार और देश चलाते। गाड़ी के दो ड्राइवर हो तो क्या गाड़ी चल जायगी। एक कहगा कि दाएं मोड़ो और दूसरा कहगा की बाएं मोड़ो। पर जबसे सृष्टि बनी है तब से सृष्टि सही तरीके से चल रही है। समय पर दिन निकलता है, समय पर रात हो रही है, समय पर मौसम बदल रहे है, धरती पर जीवन लगातार चालू है। क्योंकि इसे चलाने वाले एक ईश्वर है। अगर दो ईश्वर होते तो एक कहता कि मैं सूरज को पृथ्वी के चक्कर लगवाऊंगा।  दूसरा कहता कि मैं पृथ्वी को चांद के चक्कर लगवाऊंगा। दोनों अपनी मर्ज़ी की हिसाब से दुनिया बनाते और चलाते।

2.
एक ही पानी को लोग अलग अलग भाषाओं में अलग अलग नाम से पुकारते है। पानी, जल, वाटर, नीर, आब। पर इन नामों से उसका स्वभाव नही बदलता। हवा को वायु, पवन या एयर कहने से उसका भी अस्तित्व नहीं बदलता, केवल नाम बदला है।  उसी तरह ईश्वर को अलग अलग भाषाओं में अलग अलग नामों से पुकारते है जैसे ईश्वर, खुदा, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु, मालिक, दाता। इन नामों से ईश्वर नहीं बदलता। सारी भाषाएं ईश्वर की है। सारे रंग ईश्वर के है। सारी धरती ईश्वर की है। 

ख़ुदा को बुरा कहोगे तो ईश्वर को लगेगा और अल्लाह को बुरा कहोगे तो गॉड को लगेगा। क्योंकि वो है तो एक ही।

3.
सृष्टि मे हर वस्तु का एक उद्देश्य है। हर चीज़ ईको सिस्टम में और हर जीव फ़ूड चैन  में एक रोल निभा रहा है। हर प्राणी दुनिया मे अपनी एक भूमिका निभा रहा है। बच्चा बेग लटका स्कूल क्यों जाता है, पढ़ने। लोग पार्क में क्यो आते है, टहलने। इसी तरह मनुष्य का धरती पर क्या उद्देश्य है? आम नियम ये है कि वस्तु का निर्माता ही वस्तु का उद्देश्य बताता है। जैसे कंप्यूटर बनाने वाला बतायेगा की कंप्यूटर को क्या क्या काम करने के लिए बनाया है। हमनें हमें बनाने वाले पूछा कि हमारा क्या उद्दश्य है। उसने बताया कि उसने हमें अपनी पूजा और उपासना करवाने के लिए बनाया है क्यूंकि वो आरम्भ से है जब ये सृष्टि नहीं थी और सैदव रहेगा जब ये सृष्टि नहीं रहेगी। । 

4.
वही परम सत्य है। सत्य वह होता है जो कभी न बदले और ईश्वर कभी नहीं बदलता।  किसी के मरने पर कहते है कि राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य है यानी सत्य बोलने वाला कि गतिमान होगा। इसीलिए अपने कल्याण के लिए हमें सत्य का अपनाना है जो कड़वा होता है। जैसे डॉक्टर की दवाई कड़वी होती है पर इलाज के लिए खानी पड़ती है। तो सत्य क्या है। सत्य ये है कि ईश्वर एक है, निराकर है, अजन्मा है अमर है, अनदेखा है। 

5.
जैसे कोई बिना साइंस की बातें माने साइंटिस्ट नहीं हो सकता नही। वैसे ही वेदों की बातें माने बिना कोई सनातनी नहीं हो सकता है। वेद विरुद्ध आस्था रख कर सनातनी नहीं हो सकते। जो वेद की बातें माने वही धार्मिक है।

जैसे अपने बॉयोडाटा में हम अपना परिचय लिखते है। उसी तरह ईश्वर ने अपना परिचय अपने ग्रंथों में दिया है। पर हमने उसके परिचय और अस्तित्व में मिलावट कर दी। उसको आकर दे दिया, उसका चित्र बना दिया। उसके सत्य में मिलावट की कोशिश की। इस मिलावट को हमें दूर करना है। 

6.
ग्रन्थ कहते है कि.... मंत्र ...।
जैसे एकम ब्रह्म.. कुल हुव्वल्लाहु.. ईक ओंकार.. लार्ड इज़ वन..अनोखी.. स्विशतो..। 
 
7.
उसका कोई आकार ही नहीं तो चित्र कैसे हो सकता है। क्या हवा का कोई चित्र बना सकता है। क्या आत्मा का कोई चित्र बना सकता है।  हम चारो और फैली तंरगे नहीं देख पाते। उसके बनाये हुए सूर्य तक को हम देख नहीं पाते क्योंकि आंखें चौंधिया जाती है तो फिर उसका तेज और प्रताप कैसे इन आँखों से देख सकते है। नहीं देख सकते।

जैसे तोता जो सुनता है वही बोलने लगता है। बंदर जो देखता है वही नकल करने लगता है। उसी तरह हमें धरती पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ दिखाई दिए तो हम ये मानने लगे की ईश्वर भी मनुष्यों जैसा है। जबकि वो कतई भी हमारी तरह नहीं है। किसी बच्चे को बोलो की दारासिंह का चित्र बनाओ तो वो कार्टून से बना देगा। जिसने समुंदर न देखा हो उससे कहो कि समुंदर का चित्र बनाओ तो वो तालाब का चित्र बना देगा। इसलिए क्योंकि उनकी क्षमता ही इतनी है अभी। उसी तरह हम मनुष्यों ने अपनी क्षमता अनुसार ईश्वर को मनुष्य के रूप दे दिया।

8.
ईश्वर हमारे मन मे है। वो तो हमारी श्वासनली से भी निकट है इसलिए वो हमें कैसे दिख सकता है। जैसे हम अपना हाथ देख सकते है। पर जब वही हाथ बिल्कुल आंख के निकट ले आते है तो वही हाथ दिखना ही बंद हो जाता है। उसी तरह ईश्वर तो हमारे सबसे निकट है, वो कैसे हमें दिख सकता है।  

संकट के वक़्त मन में बैठे ईश्वर की याद आती है, न किसी रूप-आकार वाले कि और ऊपर, आसमान की तरफ देख कर हाथ जोड़ लेते है।

9.
हम अपने पिता को पिता ने कहे और पड़ोसी को बाप कहे तो पिता को कितना गुस्सा आएगा। इसी तरह हम ईश्वर की जगह किसी और को अपना पूज्य कहने लगे तो उसे कितना बुरा लगेगा।

कोई व्यक्ति अपने परिवार को छोड़ के कंही दूसरी जगह संबंध बना ले तो उसके परिवार को कितना बुरा लगेगा। ऐसे ही हम ईश्वर को छोड़ कर किसी और से सम्बंध बना ले तो ईश्वर को कितना गुस्सा आएगा। 

हमारे घर में  कोई काम करने वाला नौकर जिसको हम तनख्वाह दे खिलाये पिलाये। पर वो हमारा एक काम न करे तो हमें कितना गुस्सा आएगा। उसी तरह ईश्वर हमें पालता है और हम उसी की नहीं सुनते।

भारत की धरती हमें खिलाती और पिलाती है और हम अमेरिका की जय जय कार करे। तो ये देशद्रोह हो जयगा। उसी तरह ईश्वर को छोड़ कर हम किसी और कि जय जयकार करें तो वो भी तो ईश्वर से विद्रोह हो जाएगा।

बाजार में आलू खरीदते हुए भी उसे 10 बार अलट पलट झुक कर चेक करते है। जबकि हम किसके आगे सर झुका रहे है, उसे एक बार भी चेक नहीं करते कि क्या वह ईश्वर ही है।

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                                             आख़िरत

1.
हमारा जन्म मरण जब हमारी इच्छा से नही होता, होता तो मैं अंबानी के घर पैदा होता है, तो फिर ये जीवन हम कैसे अपनी इच्छा से बिता सकते है। ये जीवन एक परीक्षा है। एक अंतिम दिन आना है जिस दिन हमारे कर्मों का हिसाब होगा। इसे ही महाप्रलय का दिन कहा जाता है। इसे ही ईसाई भाई जजमेंट डे या डुमस डे कहते है और मुसलमान भाई इसे ही क़यामत या आख़िरत का दिन कहते है।  इस दिन अच्छे कर्म वाले स्वर्ग और बुरे कर्म वाले नरक में भेजें जांयगे। इन्हें ही ईसाई भाई हेवन और हेल कहते है और मुसलमान भाई जन्नत और जहन्नुम। हम बचपन से जानते हैं कि स्वर्ग में क्या क्या सुख सुविधाएं हैं और नरक में क्या क्या दुख और यातनाएं

2.
इसलिए अपनी मुक्ति और कल्याण के लिए हमें अच्छे कर्म करने है और बुरे कर्मों से बचना है। अच्छे बुरे कर्म क्या क्या है, ये आप अच्छी तरह जानते हो। ईश्वर ने हमारे मन में एक चिप फिट कर रखी है जो कर्मों के बारे में बता देती है। मन से आवाज़ आ जाती है कि ये पुण्य है, कर डाल और ये पाप है, मत कर। बस अक्सर स्वार्थ के कारण हम इस आवाज़ को दबा देते हैं की कुछ नहीं होता।    
 
अच्छे कर्म क्या है।  किसी को पानी पिला दिया, खाना खिला दिया, कपडे दे दिए, दवाई दिला दी। सड़क पार करवा दी। किसी की मदद कर दी, प्रेम से बात कर ली, मुस्कुरा दिए। बड़ो की आज्ञा मां ली, औरतों का सम्मान किया, किसी लड़की की शादी में मदद कर दी आदि आदि। ये सब अच्छे कर्म ही तो है। 
 
3.
जब हम ट्रैन की प्रतीक्षा करते हुए वेटिंग हाल में जाते है तो क्या वंहा साज सज्जा करते है, सोफा बेड लेके जाते है। नहीं न। क्योंकि हम जानते है कि हम थोड़ी देर के लिए यंहा आए है और ट्रैन का समय होते ही, यंहा से चले जायँगे। इसी तरह ये जीवन भी एक वेटिंग रूम है जंहा हम बहुत थोड़े से समय के लिए है। मृत्यु का समय आते ही यंहा से चले जांयगे। फिर यंहा कैसी साज सज्जा करना। पैसे और नाम के लिए इतनी हाय हल्ला और मार काट क्यों। यंहा बस अपने कर्म करने है और चला जाना है।

जब हम किसी यात्रा पर जाते है तो इतना बड़ा बैग पैक करते है। उसमे चादर, तौलिया, कपडे, पैसे आदि सब भरते है। पर मरने के बाद उस अन्तत काल की यात्रा की हम कोई तैयारी नहीं करते। कोई अच्छे कार्य नहीं करते। कोई ईश्वर की आज्ञा नहीं मानते।

हम बिजली प्रयोग करते है और एक महीने बाद बिजली बिल आता है। कम प्रयोग तो कम आता है वरना अधिक आता है। ऐसे ही इस जीवन के बाद कर्मों का बिल आना है। अच्छे कर्म किए अंतिम दिन अच्छा परिणाम आएगा वरना बुरा आएगा। बुरे कर्म वाले पर उस समय चौंक जाओगे और पछताने के सिवा कोई चारा न होगा।
 
बच्चों को समान लाने बाहर भेजते है वो अपने लिए भी चीज़ ले आता है। शुरू शुरू में हम ज़्यादा हिसाब नही पूछते क्योंकि बच्चों से प्यार करते है। पर एक दिन हम भी कहते है कि बेटा आज सारा हिसाब बताओ। ऐसे ही अभी हमे ईश्वर ने छूट दे रखी है जो मर्ज़ी करो पर एक दिन वो हमने सभी कर्मों का हिसाब लेगा और हमें देना मुश्किल हो जाएगा। 

जैसे परीक्षा के बाद मार्क्स का रिपोर्ट कार्ड आता है बिल्कुल ऐसे ही कर्मों का रिपोर्ट कार्ड आएगा।

4.
हिंदी में बहुत से शब्दों से पहले नि लगाने से अर्थ हो जाता है, नहीं। जैसे वस्त्र के आगे नि लगाने से हो जाता है निवस्त्र यानी जिसके पास कपड़े न हो। जैसे निशब्द यानी बिना शब्द वाला और निस्वार्थ यानी बिना स्वार्थ के। इसी तरह धरती पर हम मनुष्य के वास को निवास भी कहते है यानी जंहा उसका वास न हो। ये धरती मनुष्य का असली घर है ही नहीं।

5.
जैसे बार बार अलार्म बजता रहता है और अंत मे हमें सुबह उठते उठते देर हो जाती है। ऐसा न हो कि बार बार मन से आवाज़ आने पर भी हम अच्छे कर्म करने में इतनी देर कर दे और सत्य सामने के बाद भी ईश्वर की मानने में इतनी देर कर दें कि मौत ही आ जाये। 
 
6.
यह लोक न्याय के नहीं बल्कि परीक्षा के सिद्धांत पर बनाया गया है। यंहा पूर्ण न्याय नहीं है। पूर्ण न्याय तो इस जीवन के बाद है। शक्तिशाली पापी लोग यंहा बिना  दंड भुगते ही अच्छा जीवन बिता के चले जाते है। हिटलर ने 60 लाख लोगों को मारा पर उस मौत केवल एक बार आयी। न्याय कंहा हुआ। असली सज़ा तो ईश्वर ही देगा जब उसे 60 लाख बार मारा जाएगा।  

प्रकृति के अनुसार जो जीतन ऊपर होता है उसकी दृष्टि उतनी है पैनी होती है जैसे पक्षियों की। ईश्वर ने सबसे ऊपर है। उसकी दृष्टि से कुछ नहीं छुपता।

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                                              रिसालत

1.
सभी मनुष्य एक जोड़े यानि प्रथम पुरूष और प्रथम स्त्री की सन्तान है। इनके नाम इसलिए एक जैसे है क्योंकि ईश्वर ने ही अलग अलग क्षेत्रों में इनके नाम बताए जो वंहा की भाषा के अनुसार उच्चारण थोड़ा अलग हो गया। जब हम इन्ही की संतानें है तो आज तक पैदा हुआ सभी मनुष्य केवल मानव हुए और कोई भी ईश्वर नही हो सकता, न उसका रूप। क्योंकि ईश्वर मनुष्य का पैदा किया हुआ यानी मनुष्य की संतान थोड़ी है।

2.
ईश्वर हमें न तो दिखता है और न हम से बात करता है। इसलिए उसने हमें अपने आदेश देने के लिए हमने से कुछ सर्वोत्तम मानवों को चुना और उनके माध्यम से हम तक अपनी बातें पहुँचवाई। यह ईश्वर और हमारे बीच संपर्क हैं। ये महापुरष उसके संदेशवाहक और संदेष्टा होते थे। ईश्वर ने इन्हें  दुनिया के हर कोने में भेजे।  ये बताने आते थे कि आपके मन मे ही ईश्वर बैठा है और उसकी आज्ञानुसार जीवन व्यतीत करने में गलतियां न करो।  ये सभी हमे उसके धर्म का पाठ पढ़ाते थे। उसके आदेशानुसार जीवन को जी कर दिखाते थे। ताकि साधारण मानव यह न कह दें कि  हे ईश्वर ने तेरे आदेश तो बहुत कठिन थे और उन पर चलना असंभव था।  इसलिए ये सिद्ध करते थे कि ईश्वर में मार्ग पर चलना कठिन काम नही है, बहुत आसान है।  ये हमें शुभ समाचार देते थे कि अगर ईश्वर के आदेश अनुसार जीवन जिया तो स्वर्ग में हमारे लिए सभी सुख, आराम और सुविधाएं है। ये हमें चेतावनी देने भी आते थी कि ईश्वर की अवहेलना की तो नरक में हमारे लिए दुख, कष्ट और यातनाएं है।

3.
ये सभी महापुरष हमारे लिए आदरणीय और सम्मानीय है। पर पूजनीय नहीं है। आदरणीय और पूजनीय में अंतर होता है। ये समझ लीजिए की आदरणीय जिसका आदर किया जाए और पूजनीय जिसकी पूजा की जाए। आदरणीय सभी है पर पूजनीय केवल ईश्वर।  दोनों को अलग अलग स्थान पर रखना है। गडमड नहीं कर देना है। हमने दोनों को मिला दिया और पाप किया। हम उसके संदेशवाहको को ही ईश्वर का रूप कहने लगे। जैसे मैं आपके बीच संदेश देने आया और कोई मुझे ही कोई ईश्वर कहने लगे तो ये महापाप होगा। दीवाली पर मालिक का नौकर गिफ्ट/मिठाई देने आए तो हम उसका सत्कार करते है पर उसको मालिक नहीं कहते क्योंकि वो तो अपने घर बैठा हुआ होता है। जैसे डाकिया चिट्ठी देने आता मगर वो चिट्ठी का मालिक नहीं होता। क्या पत्नी को कोई मां कह सकता है। नहीं न।  दोनों का स्थान अलग है और अलग ही रखना चाहिए। जिसका जो स्थान है, उसे हमें वही देना है क्योंकि यही सत्य अपनाना है।

4.
आपको क्या लागत है कि ऐसे संदेशवाहक क्या सिर्फ भारत में में आये। क्या केवल भारत की धरती ही ईश्वर की है। नही। पूरी धरती ईश्वर की है। इसलिए वो धरती के प्रत्येक क्षेत्र में आए। ईश्वर ने किसी को भारत मे भेजा, किसी को येरूशलेम में, किसी को अरब में। जैसे शादी का कार्ड बांटने के लिए हम किसी को मुहल्ले में भेजते है, किसी को रिश्तेदारों में, किसी को दूसरे शहर में। ताकि सभी जगह संदेश चला जाए। जैसे भारत प्रत्येक देश में अपने अम्बेस्डर भेजता है। ये एक श्रृंखला, क्रम, चैन और सीरीज़ है। जैसे भारत मे श्रीराम और श्रीकृष्ण है। कंही ईसा मसीह आए। कंही मुहम्मद साहब आए। मोज़ेस, जर्थृष्ट, कन्फ़्यूशियस आदि आए। इन सभी ने एक ही संदेश दिया कि ईश्वर सर्वोपरि है। 
 
इन्होंने कहा.. 
राम -राम रामाय नमः राम नाम सत्यम अस्ति।
कृष्ण- ईश्वर सर्व भुतानाम हृदेशे अर्जुन तमेव शरणं गच्छ।

5.
जैसे किसी संदेशवाहक को प्रथम होना था, वैसे ही किसी को अंतिम भी होना था। सबसे पहले संदेशवाहक भारत मे आये थे यानी स्वयम्भू मनु। फिर वैवस्वत मनु आए, श्री राम, श्री कृष्ण आए। ईसा मसीह आए और अंतिम अरब में मुहम्मद साहब आये। अब ये संदेष्टा आने ईश्वर ने इसलिए बंद कर दिए क्योंकि दुनिया का अंत निकट है और ईश्वर से बेहतर ये बात कौन जानता है। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि हर बिजनसमेन या कंपनी किसी बंद होने जा रही मार्किट में अपने प्रोडक्ट भेजना बंद कर देती है।
 
6. उसका मुक्ति का मार्ग भी एक ही होगा। वर्ना भूत, वर्तमान और भविष्य काल के लोगो की मुक्ति कैसे होगी। ऐसा नहीं होगा कि 14 सौ साल पहले ईश्वर सिर्फ मुहम्मद साहब को मुक्ति का एक मार्ग बताए, अगर ऐसा होता तो उनसे पहले आने वालों लोगों की मुक्ति कैसे होगी। ऐसा नहीं होगा कि वह 2 हजार साल पहले जीसस को मुक्ति का एक दूसरा मार्ग बताए, क्योंकि फिर उनसे पहले आने वालों की मुक्ति कैसे होगी। ईश्वर ने जो धर्म श्रीकृष्ण को दिया, वही धर्म उनसे पहले श्री राम को दिया होगा। ईश्वर ने इन सभी महापुरुषों को एक ही धर्म देके भेजा। इन सभी ने आके एक ही धर्म, सत्य के मार्ग का अनुसरण किया। हमनें इनके नामों पर अलग अलग धर्म, मत, संप्रदाय बना लिए हैं।
 
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समानताएँ
 
1 .
इसी तरह, ईश्वर ने धरती पर अलग अलग समय और जगह वंही की स्थानीय भाषाओं में ग्रन्थ, संदेश, आदेश भेजे ताकि लोग उसे अपनी भाषा मे समझ सके। कंही संस्कृत में, कंही अरबी में, कंही हिब्रू में, कंही अरमाइक में। कंही वेद आये, कंही क़ुरान आया, कंही बाइबिल आई।  इन सभी ग्रंथों की भाषा अलग होने के बावजूद इनमें एक जैसा और समान ही संदेश होता है। जैसे अरबी में नूरूल हक़ को संस्कृत में सत्यप्रकाश कहंगे, उसी तरह इनमें भी संदेश एक, बस भाषा अलग होती थी।।
 
2. 
जैसे करेंसी नोट पर अलग अलग भाषाओं में मूल्य लिखा होता है। जैसे खांसी का सीरप एक ही होती है पर पैकेट पर उसकी डिटेल, इंस्ट्रक्शन जैसे कब कैसे खानी है, कितने की है, भारत में हिंदी में लिखी होती है और अमरीका में इंग्लिश और चीन में चीनी भाषा में।  जैसे किसी समान के साथ मैनुअल बुकलेट आती है जिसमे अलग अलग भाषाओं में उसकी सारो डिटेल लिखी होती है। हमारी इंस्ट्रक्शन बुक ईश्वर के विभिन्न भाषाओं में दिए गए ग्रन्थ है। 

3.
हर क्षेत्र और काल मे ऐसे आदेश या ग्रन्थ भेजे गए। सभी ग्रंथों का मूल वही रहा बस सामाजिक नियम रिन्यू कर दिए जाते थे जो समय के साथ होने वाली मानवों के विकास और समाज कि उन्नति के अनुसार होता था। क्षेत्र और काल के अनुसार उसके ग्रथों के विभिन्न वर्ज़न आते रहे लोगों को जीवन सिखाने और मार्गदर्शन करने। जैसे कंप्यूटर विंडो में वायरस आने उसे अपडेट किया जाता है। उसी तरह ईश्वर दूसरे अपडेटेड ग्रंथों को भेजता रहा. उसी तरह जैसे पुराने की जगह मोबाइल का एडवांस मॉडल आता है जो नए समय और टेक्नॉलजी के कंपेटिबल होता है। पर सबका मूल काम फोन करना ही होता है। जैसे समय के साथ किसी सॉफ्टवेयर या एप्प का लेटस्ट वर्ज़न आता है। नए वाले के बेसिक फीचर या मूल एक से ही रहते है पर यूजर इंटरफ़ेस रिन्यू कर दिया जाता है।

4.
सबसे पहले ईश्वरीय ग्रन्थ भारत में वेद आये, बीच में बाइबिल आई और अंत में कुरान आया। दुनिया के सभी मुख्य स्थानों में भी बहुत से ग्रँथ आये जो सीमित क्षेत्र, काल और समुदायों के लिए होते थे। स्वार्थी मनुष्य हमेशा से ही उसके ग्रंथो में मिलावट करता रहा। पहले ग्रंथो की सुरक्षा का प्रबंध नहीं होता था जैसे कागज़, वैश्वीकरण आदि नहीं था। परंतु जब ऐसा तकनीकी प्रबंध हो गया और दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन गयी तो संसार के लिए एक सुरक्षित अंतिम ग्रँथ भेज दिया गया जिसमे मिलावट संभव नहीं है। 

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5.
वह ईश्वर एक है तो उसका तो उसका धर्म भी एक ही होगासंसार के प्रत्येक भाग में उसके सिखाए मूल आदेश, सिद्धांत, नियम भी एक जैसी ही होंगी। तो सिंपल समाधान ये है कि अगर दुनिया के सारे धर्मों की शिक्षाएं इकट्ठी कर लो तो निःसंदेह उसके धर्म को पा लोगे।
 
जब उसका धर्म पहली बार आया तो उसे सनातन धर्म कहा गया और जब आखिरी बार आया तो इस्लाम कहा गया। ये दोनों धर्म असल में एक ही हैं, इनका मूल और निष्कर्ष एक ही हैं, बस समय के अनुसार इनकी व्याख्या और विस्तार बदल गया है।
 
6. 
आज सब कह रहे है मेरा धर्म सच्चा, मेरा धर्म सच्चा। अगर सब सच कह रहे हैं तो उसका धर्म कंहा गया। असल में सारे धर्म उसी के धर्म से निकले है जब लोगों ने धर्म में बदलाव किये। ईश्वर का एक धर्म समय के साथ साथ आगे बढ़ते बढ़ते बदल जाता रहा है है मगर उसका मूल वही रहता है। उसका असली धर्म जानना है तो सभी धर्मों की एक समान बातें ले लो। यही समान बातें उसका मूल धर्म है। विभिन्न धर्मों में जो मानवीय और तार्किक आदेश होगें केवल वही उसके आदेश होंगे।
 
7.
जैसे पानी छान कर सही हो जाता है। जैसे बाजार में लगी हुई SALE में से अच्छी चीज़ें उठा कर ले लेते है। जैसे रेड ब्लू ग्रीन rbg से सारे रंग बने है और ये आधार है। उसी तरह ये समान बातें उसके असल और मूल धर्म का आधार है। जैसे किसी खेल जैसे क्रिकेट या बॉक्सिंग के बेसिक्स नहीं बदलते, चाहे किसी भी देश में ट्रेनिंग ली जाए। उसी तरह विभिन्न धर्मों के बेसिक्स भी एक जैसे रहते है। बस लोगो बेसिक्स समझने में गलती करते रहते है। गणित के बेसिक्स नहीं बदलते है। कोई कहे कि प्लस का निशान जमा का नहीं बल्कि डॉक्टर का होता है। तो इसमे गलती का दोष गणित का नहीं बल्कि समझने वाले का माना जायेगा। सभी शाखों की जड़ एक होती है इसलिए हमें जड़ को पानी देना है क्योंकि पेड़ जड़ को पानी देने से फलता है।

ये मूलभूत और समान आदेश है कि वह एक अकेला निराकर उपासनीय है। उसके संदेशवाहकों के दिखाए मार्ग पर चलना है। ऐसे कर्म करने है जिनके आधार मृत्यु के बाद अंतिम दिन हिसाब होगा और नर्क और स्वर्ग का निर्णय होगा।

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                                                अन्य बातें 
 
 
लोग मूर्तियों पर जल, दूध, चुन्नी चढ़ाते हैं, मज़ारों पर फूल, इतर, चादर चढ़ाते हैं। जबकि ईश्वर की असल मूर्त इंसान हैं, इनको ये समान-दान दो। हम अपने भगवानों के चित्र बनाकर अखबार, अगरबत्ती, मिठाई के डिब्बों आदि पर छापते हैं और नदी में मूर्तियों का विसर्जन  कर देते हैं। फिर यही सब कुडे में पड़ा दिखाई देता है। तो हम ही तो इनका अपमान कर रहे हैं। मंदिर, मज़ारों पर दर्शन के लिए पैसे लेते हैं। कई जगह पिछड़ी जाती वाले ने मूर्ति को छू दिया तो उस पर भी झगड़े हो जाते हैं।

हमारा कोई बुजुर्ग मरने से पहले यह कह जाए कि मेरे नाम पर सेवा के कार्य करना। मगर हम केवल उनकी एक मूर्ति बना कर लगा दे तो क्या सेवा मानी जाएगी। नहीं। इसलिए हमें ऐसा भगवान के साथ भी नहीं करना चाहिए। 
{गमला, मूर्ति पर बीट}
 
1.
हर वस्तु ईश्वर नहीं है बल्कि हर वस्तु ईश्वर की है। कण कण में ईश्वर की कला मौजूद है।  अगर हर वस्तु ईश्वर होती तो क्या नालियों की गंदगी में भी ईश्वर हो सकता है। नहीं। हम फसल को जन्म देकर उगाते है  और उन्हें खाकर समाप्त कर देते है। इसलिए उनमें ईश्वर कैसे हो सकता है क्योंकि ईश्वर न तो पैदा होता है और न मरता है। 

प्रत्येक चीज ईश्वर नहीं है बल्कि प्रत्येक चीज ईश्वर की है। दुनिया मे किसी भी महापुरुष ने ये नही कहा कि वो ईश्वर है और उसकी पूजा करें। साईंबाबा तक भी यही कहके गए कि सबका मालिक एक।

2.
ग्रंथों में पाताललोक, इहलोक के बाद परलोक को तीसरा लोक कहा गया है। वेदों में धरती को परलोक या इस जीवन को ही स्वर्ग नर्क कंही नहीं कहा गया है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि वैदिक काल में इस धरती को परलोक मानने की धारणा नहीं थी। अगर ऐसा होता तो चित्रगुप्त का क्या रोल रह जायगा।  गरुडपुराण इस पर स्पष्ट है और उसके ऐसे प्रचलित फोटो भी यही सिद्द करते हैं कि ये लोग अलग अलग है। इसलिए मरने वाले को स्वर्गीय और स्वर्गवासी कहा जाता है या कि फला स्वर्ग सीधार गये।   

3.
पुनर का अर्थ होता है दुबारा, न कि बार बार।
पुनर्जन्म का अर्थ बार बार धरती पर जन्म लेना नहीं होता। इसलिए पुनर्जन्म का मतलब है दुबारा जन्म लेना यानी मरने के बाद अंतिम दिन कर्मों के हिसाब के लिए दुबारा जीवित होना जिसके बाद अनंत काल का जीवन है, स्वर्ग या नरक में। ग्रंथों में ऐसा ही अर्थ है। वेद के एक मंत्र का मूलार्थ बार बार जन्म का विरोध करता है। बार बार जन्म लेने को कहते है आवागमन या समसारा जो हमारी प्रथा नहीं है।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी ने कहा है कि बार बार जन्म लेने की धारण छान्दोग्य उपनिषद काल में गढ़ी गई और उस समय विद्वानों ने ये नहीं सोचा कि बाद में ये कितनी गलत धारणा बनती चली जाएगी।

किसी के मरने पर तेरहवीं होती है। पंडित जी आके गरुड़पुराण के उत्तरार्ध भाग के प्रेतकल्पखंड का संस्कृत में पाठ होता है। जिसमे कहा जाता है कि हे आत्मा अगर तूने अच्छे कर्म किये है तो तुझे स्वर्ग लेके जाया जाएगा और बुरे कर्म किए है तो नरक। अब हम लोग जीते जी तो ये कहते रहते है कि 84 लाख योनियों में बार बार जन्म होगा जबकि मरने के बाद बताया जा रहा है कि इसी जन्म में किये गए कर्मों के आधार पर सीधे स्वर्ग या नरक लेके जाया जायगा। तो किस की बात सही हुई। ग्रंथो की या जो लोग कहते है। इसलिए गरुडपुराण अनुसार इसी एक मानवीय जन्म के कर्म ही स्वर्ग नरक का मार्ग निर्धारित करेंगे।

4.
शब्द अवतार बना है 'अव' यानी नीचे और 'तरण' यानी उतरना, उतारना से अर्थात जो नीचे उतर। महान संस्कृत व्याकरण ज्ञाता पाणिनि अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी में भी यही अर्थ लिखता है। अवतार ईश्वर का संदशवाहक भक्त होता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा था कि समाज का उद्धार करने के वाले महापुरष और महामानव ही अवतार है। अवतार एक संज्ञा है जो ईश्वर के आदेशो को लागू करने के लिए धरती पर अवतरित हुए. स्वामी दयानंद सरस्वती भी अवतारवाद में नहीं विश्वास रखते थे और उन्हे केवेल महापुरुष कहते है। वेदों में अवतारवाद नहीं है।
ईश्वर अगर अवतार लेके आता तो केवल भारत में नहीं बल्की पुरे विश्व में आता और माना जाता. और अगर दूसरे देशों में ईश्वर अवतार लेके आता भी तो क्या हम उसका सम्मान कर पाते, हम तो नेपाल जैसे देश के लोगों का सम्मान नहीं करते। ओशो,सत्य साईं को ईश्वर का अवतार, भगवान माना जाता है जबकि ओशो एक देश से दूसरे देश भागते रहे थे और सत्य साई को कई बीमारियाँ थी।
 
5.
भगवान  का अर्थ है तृष्णा को भंजन, नष्ट करने वाला, या भाग्यवान, या इंद्रियों को काबू करने, जीतने वाला। जैसे कलावान, बलवान, धनवान या भाग्यवान। इसके अक्षरों से बनने वाला अर्थ मनमाना है।
आमतौर पर कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर चारों को भगवान कहा जाता है मगर इन्हें केवल महान इंसान भी माना जाता है। बल्कि बुद्ध और महावीर, इन दो को तो नास्तिक माने जाते हैं तो वो कैसे भगवान या अवतार हो सकते हैं। पहले कि तरह आज भी महान हैं लोगों को भगवान कह देते है जैसे पाणिनी, शंकराचार्य आदिमाता-पिता, डॉक्टर, अतिथि को भी भगवान कह देते हैं।
{तेंडुलकर}
 
6. देव का अर्थ है दिव्यावन यानि प्रकाशवान और प्रकाश किसी चीज़ में से निकलता है जैसे बल्ब से प्रकाश निकलता है। देवता ईश्वर ने प्रकाश से उत्पन्न किये और उसी के अधीन है. बाद में ईश्वर के गुणों आदि को ही पृथक देव मान लिया गया। फिर इनकी शक्तियों को ही इनकी पत्नी बना दिया गया। निरुक्त अनुसार देव का अर्थ है मनुष्यों को देने वाला और ईश्वर सबसे बड़ा देने वाला है। इसलिए भले मनुष्यों को भी देवता कहा जाता है। अगर यह सच में इंडीपेंडेंट होते तो फिर ईश्वर की आवश्यकता ही क्या होती?

7.
त्रीदेव या त्रीमूर्ति देवताओं को वेदो में ईश्वर के गुणनात्मक नाम कहे गए हैं जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, रुद्र, गणेश, सरस्वती आदि। सभी को ईश्वर महेश, गणों का ईश्वर गणेश, देवों का देव महादेव

8.
लिंग का अर्थ होता है प्रतीक या चिन्हवेद और उपनिषदों मेँ यह हर जगह इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है। जैसे स्त्रीलिंग में लिंग का अर्थ जेंडर नहीं है बल्कि निशानी है। पुराणों में शिवलिंग शब्द आता है। 
 
9. 
श्रीराम का नाम रामचन्द्र है यानि राम का चंद्र। ईश्वर का नाम राम है। भक्तिकाल में भी राम नाम ईश्वर को माना गया है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है यानि मनुष्यों में सबसे उत्तम, न कि भगवानों में। राम जी का तारक मंत्र कहता है कि यह राम उस राम को नमन करता है। शवयात्रा के दौरान के राम राम सत्य कहा जाता था यानि राम का राम ही सत्य है, जो कि बाद में बदल कर राम नाम सत्य हो गया। अभिवादन में कहा जाने वाला राम राम का यही अर्थ है कि राम के राम का जप करो।
 
इसी तरह श्रीकृष्ण को योगिराज कहा गया है क्योंकि वो एक महान योगी थे। वो भी एक मनुष्य थे जो जरा नामक शिकारी के द्वारा पाँव में तीर लगने के कारण स्वर्गधाम चले गए थे। बाली से मिली एक 70 श्लोकी गीता में श्रीकृष्ण को अवतार नहीं माना गया है। आर्य समाज श्रीकृष्ण को केवल एक महापुरुष मानता है। ब्रह्माकुमारी समाज गीता को नहीं मानता।


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                                                    निष्कर्ष

सब बातों का निष्कर्ष ये है की ईश्वर केवल एक है, निराकर है और उसके जैसा कुछ नहीं। केवल उसी की पूजा उपासना करनी है जैसा उसने स्वयं आदेश दिया। उसके भेजे संदेशवाहको का अनुसरण करना है। अच्छे कर्म करने है और बुरे कर्मो से बचना है। अंतिम दिन हमारे कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नर्क का निर्णय होगा।
 
जैसे क्लास में एक साल का समय औए सिलेबस होता है। जो पास करता है अगली  क्लास में भेज दिया जाता है। वैसे ही हमारी अगली क्लास परलोक में है। स्कूल के प्रिंसिपल की तरह ईश्वर इस दुनिया का प्रिंसिपल है। जैसे प्रिंसिपल टीचर को पढ़ाने क्लास में भेजता है। ऐसे ही ईश्वर अपने संदेशवाहकों को धरती पर भेजा। स्कूल की किताबो की तरह हमारे ग्रन्थ होते है। और सिलेबस की तरह ईश्वर के आदेश और आज्ञा होती है। ईश्वर सभी के कर्म देख रहा है जैसे प्रिंसपल CCTV से नज़र रखता है। ईश्वर ऊपर से हम सभी को देख रहा है। बुरे कर्म करते हुए लोगों की आंखों से तो बच जाओगे पर ईश्वर से नहीं बच पाओगे।

जैसे पिता पांव दबवाने के बहाने बस ये देखना चाहता है कि उसकी संतान के पास उसके लिए थोड़ा समय है कि नहीं उसी तरह ईश्वर भी अपनी भक्ति करवा कर यही देखना चाहता है कि क्या लोगों के पास उसके लिए थोड़ा सा भी समय नहीँ। तो आपको बनाने वाले ईश्वर के लिए भी थोड़ा याद करे। उसका ध्यान करें, उससे प्रार्थना करे। जब मिठाई का नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है तो उसका नाम लेने पर मन में करुणा भी आएगी।

ईश्वर से प्रथान करता हूं कि मेरी बताई सभी सही बात आप के मन में उतर जाए और कुछ गलत कह दिया हो तो उसे आप से दूर कर दे।  किसी भाई को कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमा चाहता हूँ। 

उंगली उठवाना, पंफ्लेट बांटना, पोस्टर, गले मिलना, प्रश्न हो तो पूछना, क्षमा याचना।
 
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Monday, 8 February 2021

सर्वधर्म एकता के आधार।




 [एकेश्वरवाद]
 
 
बच्चें अक़्सर टॉफी पसंद करते हुए आपस में रैपरों पर लड़ाई करते है कि मैं लाल वाली लूँगा और मैं हरी वाली। जबकि उनके अंदर एक तरह की चॉकलेट होती है। 'बड़े बच्चें' आपस में धर्मों के नाम पर लड़ते है जबकि उनके अंदर भी एक ही जैसी चीज़ होती है। 

एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ते। नेह न नास्ते किञ्चन।।
ईश्वर एक है, दूसरा नहीं है। अंशमात्र भी नहीं है।
[सनातन धर्म : ब्रह्म सूत्र : संस्कृत]

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
एक परमेश्वर को बहुत से नामों से पुकारा जाता है।
[सनातन धर्म : ऋग्वेद: 1:164:46]

एकमेवाद्वितीयम।
वह एक है, बिना किसी दूजे के।
[छान्दोग्योपनिषद: 6:2:1]

لَا إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّٰهُ مُحَمَّدٌ رَسُولُ ٱللَّٰهِ‎
ला इलाहा इल्लल्लाह। मुहम्मदुर रसूलुल्लाह।।
ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य प्रभु नहीं है। मुहम्मद सल्लo ईश्वर के संदेष्टा है।
[इस्लाम धर्म : कालिमा ए ख़ुदा : अरबी]

             قُلۡ ہُوَ  اللّٰہُ  اَحَدٌ  اَللّٰہُ  الصَّمَدُ لَمۡ  یَلِدۡ وَ  لَمۡ  یُوۡلَدۡ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ
कहो कि अल्लाह ए
क़ुल हुवललाहु अहद अल्लाहुससमद लम यलिद वलम यूलद वलम यकुल लहू कुफुवन अहद।
कह दो की ईश्वर एक है। वह बेनियाज़ है और सब उसके मोहताज है। न उसकी कोई औलाद है और न वो किसी की औलाद है। उसके जैसा कोई नहीं।
[इस्लाम धर्म : क़ुरान : 112]

एक ओंकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु।
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।
परमात्मा एक है। उसी का नाम सत्य है। वही सृष्टि का रचयिता है। वह भय और वैर से रहित है। वह अकाल, अजन्मा और स्वयंभू है। सतगुरु की कृपा से उसकी प्राप्ति है।
[सिक्ख धर्म : गुरुग्रंथ मूलमंत्र : गुरुमुखी]
[सिक्ख धर्म : गुरुग्रंथ साहिब : जपुजी: 1]

 
Adonai Eloheinu/Ilahayno, Adonai Echad/Ikhad
Yehowah, Elohainoo, Yehowah Aichod
 
The Lord our God, the Lord is one.
 
कुरिओस हो थेओस हैमान। कुरिओस हेयस अस्तिन।।
 
प्रभु, हमारा परमेश्वर, एक ही प्रभु है।
[ईसाई धर्म : बाइबिल : ग्रीक]
[ईसाई धर्म : बाइबल : मरकुस : 12:29 ] 

אָנֹכִ֥י   אֵל֙    וְאֵ֣ין    ע֔וֹד    אֱלֹהִ֖ים    וְאֶ֥פֶס    כָּמֽוֹנִי

Anohi   El    Ve ein   Od    Elohim Va efes   Camoni.  (tr. by Gan)
Anoki el ayin od elohim Ephes kemo (transliteration)  
Awnokee ale ahyin ode eloheem ehfes kemo (phonetic spelling)
änokhiy ël w'ëyn ôd élohiym w'efeš Kämôniy
anoki el weyn owd elohim wep̄es kāmōwnî
 
ऑनोखी एल आयिन ओद एलोहीम ऐफेस कमो।
आनोखी एल आयिन ओद एलोहीम एफेस केमो (perfect)

मैं ही ईश्वर हूँ, दूसरा कोई नहीं। मैं ही परमेश्वर हूँ और मेरे तुल्य कोई भी नहीं।
[यहूदी धर्म : तनख : हिब्रू]
[यहूदी धर्म : तनख : यशायाह : 46:9]
 

य सविश्तो अहुरो। मज़दोस-चा आर्मइतिश-चा।।
हे प्रभु। तू (एक) सर्वशक्तिमान और सर्वप्रज्ञावान है।
[पारसी धर्म : जेंद अवेस्ता : अवेस्तन]
[पारसी धर्म : जेंद अवेस्ता : यस्न : 33:11]


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【समानता के आधार. Golden Rules】
 

हर नदी एक उद्गम स्थल से शुरू होती है। आगे चलकर वो विभाजित होते हुए छोटी छोटी नदियों में बदलती चली जाती है। उसका रंग और स्वाद भी बदलता रहता है। पर उसका पानी अंत तक पानी ही रहता है। पानी का अस्तित्व नहीं बदलता। 

संसार की सारी अच्छी शिक्षाओं का स्रोत एक निराकर ईश्वर ही रहा है। समय के साथ साथ उसकी शिक्षाओं पर अलग अलग धर्म बनते गए। शिक्षाओं के शब्द और भाषा भी बदलती गई। पर शिक्षाओं का मूल कभी न बदल सका जो आज भी विभिन्न रूपों में प्रवाहित है।



समस्त प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम अपने लिए चाहते है।
[सनातन धर्म : महाभारत : 12:167:9]

तुम में से कोई तब तक आस्तिक नहीं है जब तक वह दूसरों के लिए वही पसंद नहीं करता जो वह स्वयं लिए पसंद करता है।
[इस्लाम धर्म : सहीह बुखारी : 13]

जो तुम्हें प्रिय है वही दूसरों को भी प्रिय है। जिस चीज़ से तुम्हें दुख पहुँचता है, उससे दूसरों को भी दुख न दो।
[ बौद्ध धर्म : उदानवर्ग : 5:18]

मनुष्य को चाहिए कि वह प्रत्येक जीव के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह स्वयं के लिए चाहता है।
[जैन धर्म : सूत्रकृतांग : 1:11:33]

किसी से बैर न करें। प्रत्येक हृदय में ईश्वर बसता है।
[सिक्ख धर्म : श्रीगुरुग्रंथ : 259:17-18]

Or

मेरे लिए न कोई दुश्मन है और न कोई अजनबी। मेरी सबके संग बनती है।
[सिक्ख धर्म : श्रीगुरुग्रंथ : 1299:14]


जैसा व्यवहार अपने लिये तुम दूसरे लोगों से चाहते हो, वैसा ही व्यवहार तुम भी उनके साथ करो। 
[ईसाई धर्म : बाइबल : मैथ्यू : 7:12]

जिससे तुम्हें घृणा हो, वैसा किसी के साथ न करो।
[यहूदी धर्म : तलमूड : शब्बात : 31a]

जो स्वयं तुम्हारे लिए आपत्तिजनक हो, वो दूसरों के साथ न करो।
[पारसी धर्म : शयस्त न शयस्त : 13:29 ]

दूसरों के साथ वो मत करो, जो तुम अपने साथ नहीं होने देना चाहते।
[कन्फ्यूशियसनिज़्म : एनालेक्ट्स : 12:2]

अपने पड़ोसी के लाभ को अपना ही लाभ मानो और उसकी हानि को अपनी हानि।
[ताओइज़्म : ताइ शांग कन यिइंग पिअन : 213-218]

सामने वाले व्यक्ति का मन आईना है, उसमें अपनी ही छवि देखो। सभी जीवों के प्रति दयालु बनो। 
[शिंतोइज़्म : कोजीकी]

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[ युद्द और शांति ]

जंग से शांति नहीं बल्कि अशांति आती है क्योंकि जंग सिर्फ ज़मीन जीत पाती है पर अमन इंसानों को जीत लेता है।  जंग से ज़्यादा अमन सस्ता पड़ता है और इसीलिए अमन क़ायम करना जंग लड़ने से ज़्यादा आसान है क्योंकि जंग की एक क़ीमत होती है जबकि अमन अनमोल होता है। सच बात ये है कि असल जीत जंग में नहीं बल्कि अमन में छुपी होती है। जंगे बच्चों को बड़ा कर देती है और बड़ो को मुर्दा। जंग बुड्ढो के लिए फैसले है और जवानों के लिए मौत। जंगे कभी नहीं बताती की कौन सच्चा है बल्कि वो सिर्फ ये बताती है की कौन बचा है। अगर किसी सवाल का हल जंग है तो वो सवाल ही गलत है क्योंकि जंग से ऐसा कुछ भी हासिल नहीं होता जो हम बिना जंग के हासिल न कर सके। अक्सर कायर लोग अमन से बचने के लिए ही जंग लड़ते है। नास्तिक हो या आस्तिक, हिन्दू हो या मुस्लिम अमन हासिल करना और क़ायम करना हर किसी का हक़ और धर्म है।


ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप:...ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात हे परमेश्वर द्युलोक में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हों...ओ३म् शांति शांति शांति भव।
[यजुर्वेद शांतिपाठ मंत्र - सनातन धर्म]


वह ख़ुदा है..अमन देने वाला; जो ख़ुदा की ख़ुशी चाहते है, उन्हें वह शांति का मार्ग दिखाता है; अगर दो लोग आपस में लड़ रहे हो तो उनमें शांति करवाओ।
[क़ुरान - इस्लाम धर्म]


सौभाग्यशाली है वो लोग जो शांति फैलाते है, इन्हीं को परमेश्वर की संतानें कहा जाता है।
[बाइबल - ईसाई धर्म]


अर्थरहित और निर्वाण की अनुभूति से असंबंधित हज़ार शब्दों से वह एक सार्थक शब्द श्रेष्ठ है जिसे सुन कर किसी को शांति मिल जाए।
[धम्मपद - बोद्ध धर्म]


यंहा एक से बढ़ कर एक अस्त्र और शस्त्र उपलब्ध है परन्तु निरस्तीकरण और अहिंसा से बढ़कर कुछ नहीं है।
[आचारांग सूत्र - जैन धर्म]


स्वार्थ रहित सेवा के द्वारा ही अनंत शांति प्राप्त होती है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब - सिख धर्म]


● धन्य है शांति स्थापित करने वाले लोग, वही धरती पर आनंद उठायँगे। - स्वामी विवेकानंद।

● सबसे बड़ा संघर्ष अपनी इच्छाओं से और अपने अंदर की बुराइयों से जंग करना है- पैग़म्बर मुहम्मद साहब।

● जंग में सब कुछ खो जाता है जबकि अमन में सब कुछ पा लेते है - पोप फ्रांसिस।

● युद्ध कुरूप है। इसकी प्रकृति त्रासदी और पीड़ा है - दलाई लामा।

● अहिंसा से अधिक शक्तिशाली इस दुनिया में कुछ भी नहीं है - जैन गुरुदेव चित्रभानु

● सबसे बड़ा सुख और स्थायी शांति तभी मिलती है जब कोई अपने भीतर से स्वार्थ को मिटा देता है। - श्री गुरु गोबिंद सिंह।


वही वह ख़ुदा है...अमन देने वाला..! (Qur’an 59:23)

जो अल्लाह की ख़ुशी चाहते है, अल्लाह उन्हें शांति का मार्ग दिखाता है। (Quran: 5:16).

अगर दो आस्थावान आपस में लड़ रहे हो तो उनमें शांति करवाओ। (Quran 49.9)

Do you know what is better than charity and fasting and prayer? It is keeping peace and good relations between people, as quarrels and bad feelings destroy mankind. (Hadith)

O people, spread peace, feed the hungry, and pray at night when people are sleeping and you will enter Paradise in peace.” (Sunan Ibn Majah)

Abu Umamah reported: The Messenger of Allah said Whoever made peace between two, Allah gives him for every word the [reward of] freeing a slave.

“The best among you is the one who doesn’t harm others with his tongue and hands.” Prophet Muhammad (peace be upon him)

Dhammapada Verse 100

Tambadathika Coraghataka Vatthu

"Sahassamapi ce vaca anatthapadasamhita ekam atthapadam seyyo yam sutva upasammati."

Better than a thousand words that are senseless and unconnected with the realization of Nibbana, is a single word of sense, if on hearing it one is calmed.

 

Chapter 8, The Thousands, 100. 

Better than a thousand useless words is one useful word, hearing which one attains peace.


It is better to conquer yourself than to win a thousand battles. Then the victory is yours. It cannot be taken from you, not by angels or by demons, heaven or hell. (Buddha)

A man may conquer a million men in battle but one who conquers himself is, indeed, the greatest of conquerors. (Buddha)

Lord Mahavira in Acharanga sutra proclaimed "Atthi sattham parenaparam, Natthi asattham parenaparam" i.e. There are weapons superior to each other, but nothing is superior to disarmament or non-violence. It is the selfish and aggressive outlook of an individual or a society that gives birth to war and violence.

Non-injury to all living beings is the only religion.” (first truth of Jainism) “In happiness and suffering, in joy and grief, we should regard all creatures as we regard our own self, and should therefore refrain from inflicting upon others such injury as would appear undesirable to us if inflicted upon ourselves.” “This is the quintessence of wisdom; not to kill anything. All breathing, existing, living sentient creatures should not be slain, nor treated with violence, nor abused, nor tormented, nor driven away. This is the pure unchangeable Law. Therefore, cease to injure living things.” “All living things love their life, desire pleasure and do not like pain; they dislike any injury to themselves; everybody is desirous of life and to every being, his life is very dear.

Yogashastra (Jain Scripture) (c. 500 BCE)

The Giver of peace is eternally blissful. (Sri Guru Granth Sahib Ji)

Those who serve You find peace. (Guru granth sahib)



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[  प्रकृति की सुविधाएँ ]


प्रकृति सब के लिए समान है। वह सभी को समान सुविधाएं देती है। हवा सभी को सांस देती है। पानी सभी की प्यास बुझाता है। आग सभी को ताप देती है। सूर्य सभी को प्रकाश देता है। पेड़ सभी को छांव देता है। मीठा सभी के लिए मीठा है तो कड़वा सभी के लिए कड़वा। गर्मी और सर्दी भी सभी के लिए समान अनुभव है। मुफ्त में मुहैया करवाई गई प्रकति का महत्व हमें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पता नहीं लगता। इन सुविधाओं का महत्व हमें तब पता लगता है जब बाज़ार से खरीदनी पड़ती है जैसे बिसलेरी की बोतल, ऑक्सीजन का सिलिंडर और बिजली की यूनिट। प्रकृति न जाति का भेद करती है और न ही धर्म का। प्रकृति ने हम में कभी कोई भेदभाव नहीं किया। भेदभाव तो हमने कर लिया है। खुद को अमीर- गरीब, जाति- धर्म, भाषा-क्षेत्र में बांट कर। इस पर भी बात नहीं रुकी तो ज़मीन पर लकीरें खींच कर, उसके टुकड़े कर दिए और खुद को देशों में बांट लिया। हमें तो अपने कर्मों के आधार पर बड़ा बनना था पर हम स्वार्थ के आधार पर एक दूसरे को को छोटा-बड़ा मानने लगे। ईश्वर ने प्रकृति में और दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के लिए पानी और अन्न का पूरा प्रबंध किया है। जिसको जितनी आवश्यकता है उतना खोज ले। पर मनुष्यों ने उन पर अपना कब्जा जमा जमा कर, दूसरों के लिए उनकी फाल्स शॉर्टेज पैदा कर दी है। प्रकृति ईश्वर की वह रचना है जो ईश्वर की तरह ही न दिखाई देते हुए भी मनुष्यों को समन रूप से हर वह चीज़ उपलब्ध कराती है जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं है क्योंकि ईश्वर के लिए समस्त मानव समान है तो मनुष्यों के लिए सम्पूर्ण धरती एक परिवार।

"उदारचरितानां तू वसुधेव कुटुंबकम।"
उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।
[सनातन धर्म: महोपनिषत: 6: 71-72]

"अल खलक़ो अयालुल्लाह।"
सभी प्राणी ख़ुदा का परिवार है।
[इस्लाम धर्म: हदीस मुसनद अलबज़्ज़ार:  जिल्द 13: पेज 332]

"द अर्थ इज़ द लॉर्ड्स एंड एवरिथिंग इन इट, द वर्ल्ड एंड आल हु लिव इन इट"
पृथ्वी और जो कुछ उसमें है परमेश्वर का है। जगत और उसमें निवास करने वाले भी।
[ईसाई धर्म: बाईबिल: भजन संहिता: 24:1]

The Lord looks from heaven, He sees all the sons of men.
ईश्वर स्वर्ग से दृष्टि करता है, वह सभी मानव सन्तानों को निहारता है।
[बाइबिल : Psalm :33:13]

"मानस की जाति सभै, एकै पहिचानबो।"
सभी की एक मानव जाति है और एक ही पहचान है।
[सिख धर्म: श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दी बाणी (गुरबाणी): अकाल उसतत: 15:85]
 
 
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ब्रह्मसूत्र: एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ते नेह न नास्ते किञ्चन।
ईश्वर एक है, दूसरा नहीं है। अंशमात्र भी नहीं है।


वह निराकार और अकाय है।
उसका न रंग है और न रूप।
वह अजन्मा और अमर है।
वह अनादि और अनंत है।
वह अजर और अनीश्वर है।
वही एकमात्र पूजनीय और उपासनीय है।


सबका मालिक एक है।
ईश्वर केवल एक है।
ईश्वर के समान कोई नहीं।

वह अकाल और असीम है।
वह नित्य और निरंतर है।
वह सर्वाधार और सर्वज्ञ है।
वह सर्वेश्वर और स्वयंभू है।
वह सृष्टा और पालनहार है।
वही सबसे महान और सर्वशक्तिशाली है।


कलिमा ए ख़ुदा: ला इलाहा इल्लल्लाह...।
ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य प्रभु नहीं है..।


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जनं मनुजातं। 
सब मनु की संतान है।
मनु की संतानों का सत्कार करें।
[ऋग्वेद 1:45:1]

स्वयंभू मनु और सतरूपा जिनतें भय नर सृष्टि अनुपा।
[रामचरितमानस 1 : 141: 1]

व लक़द कर्रमना बनी आदमा।
और अवश्य हमनें आदम की संतानों को श्रेष्ठता प्रदान की।
[क़ुरान : 17: 70]

The man (Adam) called his wife's name Eve, because she was the mother of all living.
एडम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा क्योंकि वही सभी प्राणियों की माता हुई।
[Bible: Genesis 3:20]



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The gist of the Vedas is called 'Brahamsutra' which says "Ekam Braham Dwitiya Naasti", means that there is only One God and not the second.
 
 
The more you search, the more you find that...
"The Lord our Lord the Lord is One"
[Bible: New Testament: Mark: 12:29]
【in Christianity】
 
"I am God and there is none else"
[Hebrew Bible: Old Testament: Isaiah: 46:9]
【in Judaism】
 
"He (the One) is the Greatest"
[Zend Avesta: Yasna: 33:11]
【in Zoroastrianism/ Parsi-ism】
 
The Guru Granth Sahib begins with the Mool Mantra which says...
Ik Onkaar Satnaam Kartaa Purakh (He is One, the Truth and the Creator).
Nirbhau Nirvair Akaal Moorat (He is Timeless, without Fear and Enmity).
Ajoonee Saibhan (He is Birthless, Immortal and Self Existent).
 
एक ओंकार सतनाम करतापुरख। अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे। मानस की जात सभै एकै पहिचानबो
  
To be a true disciple of Buddha, one needs to devoutly recite Trisharan Mantra i.e.
बुद्धम शरणं गच्छामि: धम्मम शरणं गच्छामि: संघम शरणं गच्छामि:
I surrender to the Awakened One (जागृत, ज्ञान प्राप्त मनुष्य).
I surrender to the Law of Nature (प्रकृति, जीवन का महानियम).
I surrender to the Group of Enlightened People (संगी, साधकों का समूह).
 


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इक्कम एवंद्वितीयम - ईश्वर एक है ( छन्दोग्या उपानिषद-6:2:1 )
ना तस्या प्रतिमा अस्ती - उसकी कोई प्रतिमा कोई आकार नहीं ( उपानिषद-4:19 )
ना चस्या कसीज जनिता ना चधिपाह - न उसके माता पिता हैं न उसका कोई ईश्वर ( उपानिषद-6:9 )
या एका इत्तामुश्तुही - वो अकेला और उस जैसा कोई भी नहीं ( रीग वेद-6:45:16 )

कूल हो वल्लाहु अहद - कहो के अल्लाह एक है,
अल्लाहुस समद - वो बेनियाज़ है,
लम यलिद वलम यूलद - ना वो किसी से जना और ना उससे कोई जना,
वलम यकुल लहू कोफ़ो वन अहद - उस जैसा कोई भी नहीं ( क़ुरान-112:1-4 )


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ईश्वर:  सर्वभूतानां   ह्रद्देशेऽर्जुन  तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।
अर्थात्:- हे अर्जुन! शरीररूपी यन्त्र में आरूढ़ हुऐ सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से भ्रामण कराता है।
(श्रीमद्भगवद्गीता- अध्याय-18 श्लोक-61)

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्माद्गुह्मतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण  यथेच्छसि  तथा कुरु।।
अर्थात्:- इस प्रकार गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभांति विचारकर जैसे चाहता है वैसे ही कर।
(अध्याय-18 श्लोक-63).
 
 
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संगठन संज्ञान सूत्र, ऋग्वेद अंत में,  तआला इला कलिमतन
 
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय। 
हम असत्य से सत्य की ओर जाएं,  अंधकार से प्रकाश की ओर जाएं, मृत्यु से अमरता की ओर जाएं। 

इब्राहिम ('Ibrahim):1 - अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसे हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, ताकि तुम मनुष्यों को अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले आओ, उनके रब की अनुमति से प्रभुत्वशाली, प्रशंस्य सत्ता, उस अल्लाह के मार्ग की ओर
 
 
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1. ज्ञानी लोग एक ईश्वर को अलग-अलग नामो से पुकारते है.
 - ऋग्वेद 1:164:46

कह दो तुम अल्लाह कह कर पुकारो या रहमान कह कर पुकारो उसे जो भी कह कर पुकारो, उसके सभी अच्छे नाम है.
- कुरान 17:110

2. ईश्वर के विधान नही बदलते.
- ऋग्वेद 1:24:10

अल्लाह की बातो में कोई परिवर्तन नहीं हुआ करता.
- कुरान 10:64 ,,,

3. ऋषियों के द्वारा स्तुतिये (पूज्य) परमेश्वर ने परस्पर जुड़े हुए प्राचीन आसमान और पृथ्वी को अलग-अलग किया फिर उत्तम कर्म वाले ने सूर्ये के समान उन दोनों को स्थित  किया.
- ऋग्वेद 1:162:7

क्या इंकार करने वालो ने नही देख लिया की ये आसमान और धरती पहले परस्पर जुड़े हुए थे फिर हमने उन्हें अलग-अलग किया.
- कुरान 21:30

4. इस संसार के बनाए वाले के लिये स्तुति है.
- ऋग्वेद 5:81:1

स्तुतियो का पात्र अल्लाह ही है जो सब संसारो का प्रभु है.
- कुरान 1:01

5. जो देने वाला और दयावान है.
- ऋग्वेद 03:34:01

जो असीम कृपावान और दयावान है.
- कुरान 01:02

6. हमको हमारे कल्याण के लिये सदमार्ग पर ले चल.
- यजुर्वेद 40:16

हे परमेश्वर हमारा सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन कर.
- कुरान 1:05

7. वह ईश्वर सारे जगत को भली प्रकार जानता है.
- ऋग्वेद 10:187:4

और अल्लाह आसमानों और धरती मुझे जो कुछ है उसे जानता हैं, अल्लाह हर वास्तु का ज्ञान रखता   है.
- कुरान 49:16

8. ईश्वर  के नियम कोई नहीं बदल सकता.
- अर्थर्ववेद 18:01:05

और तुम ईश्वर के विधान मुझे कोई परिवर्तन नहीं पाओगे.
- कुरान 48:23

9. संसार का सृष्टा आगे, पीछे, ऊपर, नीचे सब जगह है.
- ऋग्वेद 10:34:14

सो तुम जिधर भी मुंह करो उधर ही अल्लाह का रुख है, अल्लाह बेशक बड़ा सर्वविस्तृत और जानने  वाला है.
- कुरान 2:115

10. चंद्रमा सहित ये सब नक्षत्र उसी के वश में हैं.
- अर्थर्ववेद 13:428

उसी ने पैदा किए सूर्ये, चन्द्रमा और तारे, (ये) सब उसके आदेश के अधीन है.
- कुरान 7:54


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【ईद मुबारक】

 
"अन्वारभेथामनुसरंभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते।"
श्रध्दा वाले लोग परलोक का ध्यान रखते हुए सत्कर्मों को निरन्तर मिलकर करते रहें।
[अथर्ववेद 6:122:3]
تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَمِنكُم
हमार और आपके द्वारा किये गए (अच्छे कर्मों और इबादतों) को ख़ुदा क़ुबूल फरमाएँ। or
हम से और आप से (अच्छे कर्मों और इबादतों) ख़ुदा क़ुबूल फरमाएँ।
[दुआ / हदीस]



【ईद उल अज़हा मुबारक़】

"अध्दा देव महां असि"
ईश्वर निश्चय ही महान है।
[अथर्ववेद 20:58:3]

"मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः"
संसार को बनाने वाले के लिए स्तुति है।
[ॠगवेद 5:81:1]

                "اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وَاَللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْد"
अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह के सिवा कोई और ख़ुदा नहीं। और अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह सबसे महान है। तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है।
                                                      [تكبير التشريق\तक़बीर ए तशरीक़]

اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وَاَللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْد
(تكبير التشريق)



 
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[व्रत, उपवास, रोज़ा, सौम]

 
●  "उपावृत्तस्तु पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह।

उपवास: स विज्ञेयो न शरीरस्य शोषणम्॥"

(स्क० पु०, वै० मा० मा० १२।३०)

-पापों से उपावृत्त (निवृत्त) होकर जो गुणों के साथ वास किया जाय, उसी को 'उपवास' समझना चाहिये। शरीर को सुखा डालने का नाम 'उपवास' नहीं है।
 
 
 
● वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।।

शरीर शोषणं यत्तत्तप इत्युच्यते बुधैः ।।

अर्थात :- वेदों में जिस प्रकार कहा गया है, व्रत और उपवास के नियम-पालन से शरीर को तपाना ही तप है।
 
(जाबालदर्शन उपनिषद : खण्ड २ : ३)
 
 
● कबीर के शब्द भी देखें — ( करवा चौथ के व्रत के विषय में )
राम नाम को छाडिके राखै करवा चौथि !सो तो हवैगी सूकरी तिन्है राम सो कौथि !!
जो इश्वर के नाम को छोड़कर करवा चौथ का व्रत रखती है , वह मरकर सूकरी बनेगी

 
 
 
● 【वेद - क़ुरान एक सारांश】

[ब्रह्म - ईश्वर के प्रति व्रत रखो]
व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो ।   
हे यजमानों, ब्रह्म के प्रति व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद : 4 : 11)   
    
[ख़ुदा - ईश्वर के अनुसार रोज़े रखो]
...कुतिबा अलैकुमुस्सियामु...।
हे आस्थावानों, तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं जैसे तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे।
(क़ुरान : 2 : 183)


[नवरात्रि]
व्रतं कृणुत ।   
व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद : 4 : 11)   
    
[रमज़ान]
कुतिब अलैकुमुस्सियामु ।
तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं।
(क़ुरान : 2 : 183)
 
 



 


 
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[हिन्दु धर्म और इस्लाम आदि धर्मों में समानताएं]
 
 
 
हिन्दू धर्म का मूल नाम सनातन धर्म है जिसका अर्थ है जो आरंभ से सीधा चला आ रहा हो.  इस्लाम का कुरान में  एक और नाम आता है जिसे दीने क़य्यिम कहा गया यानी जो शुरू से कायम हो.
यही शाश्वत धर्म और दीने हनीफ है.
गीता में सनातन धर्म को ही स्वधर्म व स्वभावनियतकर्म कहा गया है और इस्लाम को भी दीने फितरत कहा गया है.
धर्म और दीन समानांतर शब्द है, दोनों का अर्थ है जो धारण करने के और अपनाने के लायक हो. धर्म आचरण को ही ताओ  (ताओइज़्म में), हुकुम (सिखइज्म में) कहते है.  रिलिजन का अर्थ होता है बांधना, सृष्टा से.

धर्म का सार ब्रह्मसूत्र कहा गया और दीन का जुज़ कालिमा ए खुदा.  दोनों का नाम नहीं बदला जो है कि एकं ब्रहम और लाइलाहा. दोने के अर्थ भी नहीं बदले.
छोटा सा ब्र्हम्सुत्र और एविद्वितियम और वादहू लाशरिका लहू.
एकं सद विप्रा, कूल हुव्वलाहू अहद.

आदिग्रंथ - ज़बूरे अव्वलीन.
ऊर्ध्व मुख अरणी -प्रथम ज्ञान,  नीचे मुख वाली अरणी - अंतिम ज्ञान।

स्वर्ग -जन्नत, हेवेन, पैराडाइस     
नरक - जहनुम, दोज़ख, हेल  
बरज़ख - पृतलोक, संध्या, प्रद्यौ
लोक, लोकम, स्थानम  - भूलोक, इहलोक - परधाम, देवलोक, परलोक, बैकुंठ.
पुल सिरात और वैतरणी नदी पार करना।

महाप्रलय (प्राकृत प्रलय) का दिन - क़यामत का दिन - डुमस डे
बदले का दिन - हश्र का दिन - हिअरआफ्टर
अंतिम दिन - आख़िरत का दिन - जजमेंट डे

पुण्य - सवाब, वर्च्यु,  
पाप - गुनाह, सिन

मुक्ति का मार्ग, भक्ति, ज्ञान, कर्म.  फलाह का रास्ता, तौहीद, आखिरत और रिसालत को मिलाकर अपनाना, यानी Submission, Divine Guidance, Deeds or Acts.
मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, उद्धार, फलाह, निजात, रिडेम्पशन

नमाज़ का असल शब्द है सलाह जिसका अर्थ है जुड़ना, योग का अर्थ है जुड़ना,
सजदा का अर्थ साष्टांग (दण्डवत नहीं),, मत्था टेकना, ऑर्थोडॉक्स प्रोस्ट्रेशन, कराईट बोविंग, पानीपता, णमोकार।
नमाज़, संध्या, उपासना, साधना, योग, विपश्यना, अरदास
कुल 4 संध्या हैं, चौथी संध्या है तुर्य संध्या (मध्यरात्रि में) - पूरी शंकराचार्य अनुसार भी .
प्रमुख्य त्रिकाल संध्या - पूरी शंकराचार्य अनुसार भी  (1. प्रातःकाल - सूर्योदय से पूर्व सर्वोत्तम है, 2. मध्यानकाल में, 3. सायंकाल में - सूर्यास्त के समय)
5 बार भजन- पूरी शंकराचार्य अनुसार भी  (1. सूर्योदय के पूर्व ब्रह्मुहुर्त में, 2. स्नान के बाद, 3. मध्यानकाल में, 4. सायंकाल में, 5. रात्री में निद्रा से पूर्व ) और 5 वक्त की नमाज़.
वुजू गुसल या स्नान (4 संध्या में से जितनी बार भी भक्त संध्या करें, उससे पूर्व स्नान करना अनिवा है -पूरी शंकराचार्य अनुसार भी)
ब्र्हमुहुर्त और तहज्जुद सामान काल में होते है.

एकेश्वरवाद और तौहीद
रोजा और उपवास
ज़कात और दान दक्षिणा
हज और तीर्थ
बिनासिले 2 कपड़े, बाल मुंडवाना या छोटे,  मुंडन, चोटी। नंगे पैर या पंजा खुली हुई, खड़ाऊ पहनते आये है। तवाफ़. परिक्रमा

सत्य, हक़
तथास्तु, अमीन, आमेन

जीवात्मा और रूहे कुद्दुस
आत्मा और रूह
भूत प्रेत और जिन्न

शैतान और कलि
देवता और फ़रिश्ते
यमराज मालाकुल मौत, यमदूत और मुनकर नकीर जो कब्र में सवाल करंगे. नाज़िअत और नाशिअत मौत से संबंधित फ़रिश्ते है को मलाकुल मौत के तहत रहते है।
किरामीन कातिबीन और चित्रगुप्त, नारद और जिब्राईल. या फरिश्ता हबीब जो मुसलमानों को सलाह देने और दुआ करने का काम करते है।

कल्कि और मेहदी
याजूज माजूज और कोक विकोक
अंधकासुर या अंधकआसुर और दज्जाल
इलायास्पद, दारू काबन, नाभा पृथिव्या, नाभि कमल, नाफ़े ज़मीन, मक्तेश्वर
वेदों में इलास्पद नाभा पथ्वी का उल्लेख है, क़ुरान की तरह कोड मैच करता है।

मंदिर द्वार पूर्व में, कब्रे उत्तर दक्षिण में।
वेदों में बिगबैंग का उल्लेख कहा जाता है।
मनुस्मृति में अंडे से ब्रह्मा के जन्म का उल्लेख है।
ब्रह्मा द्वारा अपने शरीरी से स्त्री बनाने का ज़िर्क है।

◆◆◆
   
अवतार, ऋषि, मनु -  प्रोफेट, मैसेंजर.
ईशदूत, संदेष्टा, संदेशवाहक - अम्बिया, पैग़म्बर, नबी, रसूल,
सूथसेयर,सोइश्यान्त - बुद्ध, तीर्थंकर,

◆◆◆

अथर्ववेद में ब्रह्मा इब्राहिम है, अथर्वा इस्माइल है, अंगरिका इसहाक का नाम है। अबिराम भी नाम आया है। अथर्ववेद में पुरूषमेध यज्ञ का भी उल्लेख है।

ब्रह्मा - आदम के लिए इस्तेमाल हुआ है हरिवंश पुराण में।
ब्रह्मा से इब्राहीम बना हो सकता है.
नोहा के बेटे का नाम है शेम, शेम के बेटे का नाम है अरम जिसे रेम भी कहते है.
शेम का वंशज है अब्राहम जो की एब्रम (एब्रम  - एक जनजातीय नाम जिसका अर्थ है रेम का एक) नाम है या अब्राह नाम है, हिब्रू में.
एब्रम का अर्थ रेम के वंशज भी होता है. एब्रम के मूल निवास स्थान का नाम है अरम अर्थात रेम की भूमि या स्थान है.

◆◆◆

संस्कृत में आदम की धातु आद्य आज भी पाई जाती है। इसी से आदि शब्द बना है जिसका अर्थ है प्राचीनतम। आदि से आदीं बना है जिसका अर्थ है प्रथम, पिछला या प्राचीनतम। ऐसे ही आदिमयुग, आदिमानव, आदिकाल जैसे शब्द बने। आदीं से आदम शब्द बना है और फिर उससे एडम.  हव्वा मतलब जीवन है, शतरूपा का अर्थ है सौ रूपों वाली और ईव नाम इसलिए रखा गया क्यूंकि वह समस्त जीवितों की माता हुई. मनु बना हैं नु से जिसका अर्थ होता हैं नौका. नु से ही न्यूह, नुह और नोहा बने हैं. मनु शब्द से ही मनुष्य और मानव शब्द बने है। मनु के मानने वालों को मानव कहा जाता था। अंग्रेज़ी का मैन शब्द मानव से ही बना है।

◆◆◆

स्वयम्भूमनु, स्वायंभुवमनु, आदमो, महर्षिमनु, आदिपुरुष, आदिपिता, आदम, एडम, आधाम, आदम (सिक्ख), मश्य (पारसी), इज़ानागी (शिंतो) इत्यादि.
शतरूपा, सतरूपा, हव्यवती, आदिमाता, हव्वा, ईव, ख़व्वाह, हव्वा( सिक्ख), मश्यान (पारसी), इज़ानामी (शिंतो) इत्यादि.

रामसेतु - एडम्स ब्रिज है. एडम्स पीक पर एक जोड़ी पाँव के निशान हैं. बुद्ध, मुस्लिम, ईसाई और हिन्दुओ के लिए पवित्र स्थान है. आदम को हिन्द (श्रीलंका - जो उस समय भारत का ही हिस्सा था) में उतारा गया था और ये उनके निशान माने जाते हैं. हिन्दू इसे शिवजी के पांव के निशान मानते है (पुराणों में शिवजी और आदम की कहानी में कई समानता है)। बुद्धिस्ट इसे बुद्ध के पांव के निशान मानते है.

न्यूह या मनु, महामनु, महाराज मनु, वैवस्वत मनु, सप्तऋषि वाले मनु, महाजल प्लावन (महाजल प्रलय) वाले मनु, नौका वाले मनु, मछली वाले मनु, मत्स्यावतार वाले मनु, श्राद्धदेव मनु या सत्यव्रत मनु।
नूह, नोवाह, नोअख़।  पारसी धर्म में यीमा।  सुमेरियन गाथाओं में ज़ियासुद्र। अक्काडीन महाकाव्य ( सेमेटिक भाषा) में अत्राहासीस।  मेसोपोटामिया (बेबिलियोन महाकाव्य या कविता) के गिलगमिश महाकाव्य में उतनापिशटिम।  ग्रीक मायथोलॉजी में ड्यूकेलियन इत्यादि.
Yima Kshaeta/Jameshed/Mithra in Mithraism (an offshoot of Zoroastrianism)

मनु एक पदवी या टाइटल है जैसे सीज़र, फेहरो, जार, व्यास या इंद्र। जैसे कई राजा विक्रमादित्य और राजा भोज हुए है, वैसे ही यंहा 14 मनु हुए है.  ये 7वें मनु थे. ,मनु  की नौका पर केवल 7 नर-नारी ऋषि अनुयायीयों बचे थे और कुरान के मुताबिक थोड़े से लोग बचे थे, जिनसे बाद में धरती पर दुबारा मानव जीवन फैला। इनके समय में वेदों का पुनः परवर्तन हुआ. वैवस्त मनु प्रलय से संवत भी जुड़ा हुआ है। नूह को पहली शरीयत अता की गई थी। यंहा भी मनुविधान या मनुस्मृति को प्रथम नियमावली माना जाता है। तहक़ीक़ से पता लगता है कि नूह यानी वैवस्त मनु भारत के बाशिंदे थे जैसे जातपात, नक्षत्रशास्त्र, देवताओं के नाम, मूर्तिपूजा आदि. तन्नुर से तूफान शुरू हुआ, करेल में, जूदी पर नाव रुकी, जूदी इराक में है, जूदी के पास नेहबंधन जगह है, माहाभारत ने नौका रुकने के स्थान को नौबंधन कहा है.
वैवस्त मनु के बड़े पुत्र इक्षवाकु से क्षत्रिय में दो वंश चले सूर्यवंश और चंद्रवंश चले। अनुमान है कि नूह के दो बेटों हेम या हाम (सूर्य) और सेम या साम (चंद्र) से जो दो वंश चले थे वो यही थे।   

◆◆◆

एमिड (बोद्ध), आदिनाथ (जैन), शिवजी (हिन्दू) और आदम में कुछ समानता हैं.

जैन धर्म इन्ही 14 मनु को कुलकर कहा जाता है और अंतिम कुलकर नाभिराज या नाभिराय थे जिनके पुत्र प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ या आदिनाथ थे। नाभिराज को प्रथम मनु अर्थात स्वयम्भू मनु का पढ़पोता कहा गया है।

सिक्खों के दशम ग्रन्थ में भी मनु नामक राजा का उल्लेख आता है जो 24 अवतारों में से एक है पर ये स्वयम्भू मनु नहीं है बल्कि कोई राजा है जिनका संबध मनुस्मृति से है।

◆◆◆

अबिराम, इब्राहिम, अब्राहम, राम.     प्रहलाद - यूसुफ (प्रसंग).
कृष्णा, मूसा, Moses,हेर्कुलिस, अखिलीस, कहन (काला).  एक नबी हिन्द में भी है जिनका रंग काला है और नाम कहान है यानी कृष्णा। (कमज़ोर रिवायत)
ईशा, मसी,  ईसा, मसीह, Jesus
नराशंस, कल्कि अवतार, महामद, सुश्र्व, कल्किराजा, मैत्री बुद्धा, अंतिम ऋषि, Comfortor, पैराक्लीट, Paraecletus, फ़ारकलीत, स्तवेतएरेता, सोइश्यान्त, Astvast Ereta, Astvat Erat, Soeshyant, वर्कलीतुस, मूनहमन्ना, मूनहामन्ना.

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...