Friday, 26 February 2021

सत्संग।


                                           परिचय

1. 
नमस्कार, वन्देश्वरम।  इस संदेश का आरम्भ करता हूँ ईश्वर के नाम से जो बहुत ही दयालु और कृपावान है। सबसे पहले मैं आपको अपना परिचय दे दूं। हमारा उद्देश्य राजनीतिक नहीं है। न ही हम कोई दान दक्षिणा लेते है। हम एक ______ नामक NGO से है जो समाज सेवा के कार्य करती है। हम अंतर धार्मिक सौहार्द के लिए भी काम करते है और लोगों के बीच जाके बातचीत करते है। हम सत्संग करते है, सत्संग का अर्थ होता है सत्य की संग बैठ कर बात करना।  
 
2. 
आप जानते है कि आज समाज में भेदभाव और दूरियां बहुत बढ़ गई है। आपस का भाईचारा, अपनापन और प्रेम समाप्त होता जा रहा है। समाज में इंसानियत कम होती जा रही हो तो वंहा हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम लोगों को एक दूसरे से जोड़े। लोगों के मतभेद तो स्वीकार है पर मनभेद न होने पाए। बातचीत से ही नफरतर की दीवारों में खिड़की खुलती है जिससे बाद में दिवार भी गिर जाती है। कंही आग लग रही हो तो क्या आप वंहा खड़े होकर तमाशा देखेंगे, बल्कि उसे बुझाने का प्रयास करंगे।
 
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                                                  समानता
 
1. 
इसलिए हुमें ये भेद और नफरते मिटानी है और ये तभी तभी समाप्त होंगी जब हम सभी मनुष्यों को समान और एक मानने लगेंगे।  

2.
प्रकृति के लिए हम सब समान है। प्रकृति हमें समान सुविधाएं देती है। पिता एक भाई को 2 बीघा जमीन दे दे और दुसरे को 10 तो अन्याय हो जाएगा।  मां की खोख से, दूध पीने तक और जमीन में अनाज उगाने तक हमारे लिए प्रकृति ने सभी प्रबंध समान रखे है।

हवा सबको सांस देती है। पानी सबकी प्यास बुझाता है। सूर्य सबको प्रकाश देता है। पेड़ सबको छांव देता है, हिन्दू हो या मुस्लिम। वर्षा किसी का खेत नहीं छोड़ती की ये इस जाती वाले का खेत है और ये उस जाती वाले का। 

उसकी सुविधाओं का महत्व तब पता लगता है जब खरीदनी पड़ती है जैसे बिसलेरी की बोतल 20 रुपए की मिलती है जबकि पानी फ्री मिला है। ऑक्सीजन का सिलिंडर हज़ारों रुपए का आता है जबकि हवा फ्री है। 

मीठा सबको मीठा लगता है, कड़वा सभी को कड़वा।  सर्दी और गर्मी सभी को लगती है। अगर प्रकृति के लिए सभी सम्प्रदाय बराबर नहीं होते तो एक धर्म वाले को एक आंख कम देता और दूसरे को एक कान ज़्यादा। किसी जाति वाले को एक हाथ कम देता और दूसरी जाति वाले को एक टांग ज़्यादा। 

पर प्रकृति ने कभी हम में भेदभाव नहीं किया। भेदभाव हमने कर लिया। खुद को धर्म, जाति, रंग, नस्ल, भाषा मे बाँट लिया।  इस पर बस नहीं चला तो धरती पर लकीरें खींच कर अलग अलग देशों में बांट लिया। हमें अपने कर्मों के आधार पर बड़ा बनना था। पर हम स्वार्थ के आधार पर बड़ा बनने लगे।
 
3.
जैसे प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने पर सुनामी और बाढ़ आती है। वैसे ही मानवता में छेड़छाड़ करने का नतीजा ये हुआ कि अब हम प्रकृति का प्रकोप झेल रहे है। इतनी प्रगति और मेडिकल साइंस के बाद भी आज किसी के मन मे चैन, सुख, शांति, सुकून नहीं है। 
 
शांति मिलेगी भी कैसे। इसी मुंह से ईश्वर का नाम जपते हौ और इसी मुंह से गालियां बकते है।  इसी आंख को बंद करके उससे याद करते हौ और इन्ही आँखों से गलत चीज़े देखते हौ। इन्ही मन मे उसे याद करते है और इसी मन में दूसरा का बुरा चाहते हौ। इन्ही हाथों को उसके आगे जोड़ते है और इन्ही से सभी बुरे काम करते है। ऐसी दोहरे व्यवहार से हमारी आत्मा कभी सुखी नहीं रह सकती।  
 
पेन तभी चलता है जब उसके अंदर रीफ़ील होता है। इसलिए अपने अंदर कि आत्मा को जगाइए। जो अंदर होगा वही बाहर आएगा। आत्मा में रंग, रस होगा तो बाहर भी दिखाई देगा।
 
4.
लोग अपने दुख से इतने दुखी नहीं है जितने दूसरे का सुख देख के दुखी है। 

आज जब थोड़ा सा दुख मिलता है तो कहते है अरे मैं ही मिला था क्या। और जब सुख मिलता है तब कोई नहीं कहता कि अरे मेरे पास पहले से बहुत सुख है, मुझे और सुख नहीं चाहिए, किसी और को दे दो सुख। 

लोग किसी के नए जुते देख कर जलने लगते है कि मेरे पास क्यों नहीं है। पर किसी बिना पैर वाले विकलांग को देख कर धन्यवाद नहीं करते। 

5.
प्रकृति ने हम सभी के चेहरे, अंगूठे और आंखें अलग बनाएँ पर हममें बहुत सी समानताऐं भी रखी। सबसे बड़ी समानता तो ये है कि हम सब आपस में रिश्तेदार और संबंधी है। 

दुनिया की आज आबादी लगभग 8 अरब है। 500 साल पहले ये सिर्फ 50 करोड़ थी। 2000 साल पहले सिर्फ 3 करोड़ थी और 10000 साल पहले दुनिया मे सिर्फ कुछ लाख लोग ही थे। यानी समय मे जितना पीछे जाते रहोगे, आबादी कम होती चली जाती है। पीछे जाने पर जीवन के आरम्भ में ऐसा समय आएगा जब धरती पर केवल एक जोड़ा अर्थात एक पुरूष और एक स्त्री थे जिनसे सारी मानव जाति फैली। हम सभी उन्ही की संताने है और इसलिय हम सभी आपस मे रिश्तेदार हुए। 

डीएनए विज्ञान यही इशारा करती है और दुनिया के लगभग सभी धर्म ग्रंथ यही बताते है कि समस्त मानव जाति इसी जोड़े से पैदा हुए है। इसलिए हम सब एक परिवार के सदस्य है। इन्हे ही स्वयंभू मनु या आदिम या आदिपिता और शतरूपा या हवव्यवती कहा गया है। इन्हें इस्लाम धर्म में आदम और हव्वा और ईसाई धर्म में एडम और ईव कहा जाता है।
 
6.
यही बात हमारे मन में बैठी हुई है की हम एक है। इसलिए आपदा में हम में से अधितकर एक दुसरे की मदद करने लगते है। किसी का एक्सीडेंट हो जाए तो बिना जाने उस तरफ मदद करने के लिए भागते है। कंही आग लग जाए तो बिना जाने उस तरफ पानी लेके भागते है। 

खून देना वाला नहीं कहता कि मेरा खून इसी जाति वाले को देना। खून लेने वाला भी कभी नहीं पूछता की देने वाले का धर्म क्या था। आखिर हम सभी का खून लाल है।

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7.
हम सभी एक हो जाएँ इसके लिए हुमें एक चीज़ समझनी होगी. वो ये है कि जैसे एक पिता की 4 संतान आपस मे कितनी ही लड़ाई हो पर वही पिता जब अपने नाम का वास्ता दे देता है तो अक्सर बेटे भी एक हो जाते है। उसी तरह सभी पिताओं का पिता, वो परमपिता, वो परमेश्वर भी तो एक ही है।  हिन्दू मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी ईश्वर के पैदा किए हुए है। तो फिर हम उसके नाम पर क्यों नहीं एक हो सकते। आखिर सब उसी के बंदे और भक्त है। ऐसे ही देश के नाम पर और युद्ध के समय में भी हम सब एक हो जाते है तो ईश्वर के नाम पर भी तो एक हो सकते है।

8.
हम लोगो में अंतर क्यों है, उसका कारण बताता हूँ । वही 4 बेटों का पिता अपने हर बेटे के जवान होने पर उन्हें कुछ शिक्षा देता है जैसे कि अच्छे कर्म करना, बुरे कर्म मत कारण और लोगों की सेवा करना आदि । पिता यही शिक्षाएं अपने दूसरे बेटे के जवान होने पर देता है। तीसरे और फिर चौथे बेटे को भी यही शिक्षाएं देता है।  बाद में चारों बेटे आपस में लड़ने लगते है। एक बेटा कहता है कि पिता केवल उससे ही प्रेम करता था, उहोंने केवल उसे ही शिक्षाएं दी और इसलिए वह केवल मेरा ही पिता है तुम्हारा नहीं। बाकी तीनों बेटे भी ऐसा ही दवा करते है। ये कोई नहीं समझता कि उनका पिता चारों से प्रेम करता था और चारों को एक ही शिक्षा दी। इसी तरह वह ईश्वर हम हिन्दू मुस्लिम ईसाई यहूदी सभी का स्वामी है। उसने अलग अलग समय पर हम सभी को एक ही शिक्षाएं दी जैसे अच्छे कर्म करो, बुरे कर्मों से बचो आदि। मगर हम भी यही कह कर एक दूसरे से लड़ने लगे की ईश्वर तो केवल मेरा है, वो तुम्हारा नहीं है।  जबकि कोई भी यह देखने को तैयार नहीं है कि सभी को दी गयी उसकी शिक्षाएं तो एक ही है।

9.
बच्चें अलग अलग रंग के कवर या रेपर वाली टॉफियों पर लड़ाई करते है की लाल वाली मैं लूंगा और हरी वाली मैं लूंगा। जबकि उनके अंदर एक ही तरह की चोकोलेट टॉफी होती है।  इसी तरह हम बड़े लोग भी अलग अलग धर्मों के नाम पर लड़ते है। यह पीला वाला मेरा, वो हारा मेरा, यह नीला वाला तेरा और वो सफ़ेद वाला उसका। जबकि उन धर्मों मे झांक कर कोई देखने को तैयार नहीं है कि उनमें एक जैसी ही बातें होती है कि सबका भला करो, किसी का बुरा न करो आदि। क्या कोई धर्म कहता है कि चोरी करो, लोगों को सताओ। कोई नहीं कहता। हमने उसके दिये एक धर्म को भी मेरा तेरा बना लिया हैं 

10.
आज बच्चे मोबाइल चलाते रहते हैं और बड़ो की बात नहीं सुनते क्यूंकि उनमें बड़ो का डर खत्म हो गया। बड़े, बुर्जगों की नहीं सुनते क्योंकि बुजुर्गों का डर खत्म हो गया है। इसी तरह लोगों के दिलो से ये डर खत्म हो चुका है की हमें किसी को अपने कर्मों का जवाब देना है इसलिए सभी अपनी मन मानी कर रहे है। हमारे दिलों से  ईश्वर का डर और जवाबदेही खतम हो गयी है। हम भुल चुके है कि कर्मों का फल मिलता है। इसलिए उसे याद रखना है। 

सभी मोबाइल प्रयोग करते है। क्या आप जानते है कि मोबाइल किसने बनाया है। नहीं जानते। मोटोरोला के मार्टिन कूपर 1972 में। इसी तरह हम हमारे बनाने वाले को भूल गए है पर उसका दिया जीवन रोज़ जीते है।
 
हम अपने को बनाने वाले ईश्वर को ही भूले बैठे है। कबीर ने कहा था दुख से सिमरन सब करे सुख में न करे कोई, जो सुख में सिमरन करे तो दुख काये को होये।  

11.
जब कोई चीज़ अपने स्रोत से कट जाती है तो वो काम करना या फायदा पहुंचना बंद कर देती है। पानी की बूंद नदी से अलग हो जाये तो फना हो जाती है।  पेड़ अपनी जड़ से कट जाए तो पनपता नही है। हमारी जड़े भी हमारे स्रोत ईश्वर से कट चुकी है। हमें वापस अपने स्रोत यानी ईश्वर से जुड़ना है। पंखे की तार बिजली बोर्ड से हटा दो वो हवा देना बंद कर देता है। उसी तरह हमारी तार भी ईश्वर से कटी हुई हैं इसलिए हम अपना भी नुकसान कर रहे हैं और दूसरों को भी फायदा नहीं दे पा रहे। हमें वापस अपनी तारें ईश्वर जोड़नी है।

12.
हममें लड़ाई झगड़े इसलिए है क्योंकि हम अपने ही धर्म और ग्रंथ को नहीं जानते। अधिकतर सनातन धर्मी वेद नहीं पढ़ते है और अधिकतकर मुसलमान क़ुरान को समझ कर नहीं पढ़ते है। अगर अपने धर्म को सही से मानना शुरू कर दें त लड़ाई झगड़े ही न हो। 
 
ईश्वर से उसके भक्तों को मिलवाना ऐसे है जैसे किसी मां को खोए हुए बेटे से मिलाना।  हम यही काम करते हैं।
 
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                                             तौहीद

1.
विज्ञान कहता है कि सभी जीव जंतु एक झुंड में रहते है। हाथी, चींटी, पक्षी और मनुष्य भी। इन गिरोह का एक लीडर होता है। क्योंकि आदेश देने वाला अगर केवल एक ही व्यक्ति हो तो संचालन सबसे बढ़िया होता है जिसे मैनेजमेंट की भाषा मे यूनिटी ऑफ कमांड कहा जाता है। जब 2 दिमाग काम करते है तो काम सही तरीके से नहीं चल पाता। कुछ घरों में शादी के बाद लड़ाई इसी लिए होती है। इसलिए देश का एक प्रधानमंत्री होता है। टीम का एक कप्तान होता हौ। घर का एक मुखिया होता है। अगर 2 प्रधामंत्री हो तो क्या देश चल जयगा। एक कहेगा कि मैं झंडा फेहराउंगा दूसरा कहेगा की मैं फेहराउंगा। दोनों अपनी मर्ज़ी से सरकार और देश चलाते। गाड़ी के दो ड्राइवर हो तो क्या गाड़ी चल जायगी। एक कहगा कि दाएं मोड़ो और दूसरा कहगा की बाएं मोड़ो। पर जबसे सृष्टि बनी है तब से सृष्टि सही तरीके से चल रही है। समय पर दिन निकलता है, समय पर रात हो रही है, समय पर मौसम बदल रहे है, धरती पर जीवन लगातार चालू है। क्योंकि इसे चलाने वाले एक ईश्वर है। अगर दो ईश्वर होते तो एक कहता कि मैं सूरज को पृथ्वी के चक्कर लगवाऊंगा।  दूसरा कहता कि मैं पृथ्वी को चांद के चक्कर लगवाऊंगा। दोनों अपनी मर्ज़ी की हिसाब से दुनिया बनाते और चलाते।

2.
एक ही पानी को लोग अलग अलग भाषाओं में अलग अलग नाम से पुकारते है। पानी, जल, वाटर, नीर, आब। पर इन नामों से उसका स्वभाव नही बदलता। हवा को वायु, पवन या एयर कहने से उसका भी अस्तित्व नहीं बदलता, केवल नाम बदला है।  उसी तरह ईश्वर को अलग अलग भाषाओं में अलग अलग नामों से पुकारते है जैसे ईश्वर, खुदा, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु, मालिक, दाता। इन नामों से ईश्वर नहीं बदलता। सारी भाषाएं ईश्वर की है। सारे रंग ईश्वर के है। सारी धरती ईश्वर की है। 

ख़ुदा को बुरा कहोगे तो ईश्वर को लगेगा और अल्लाह को बुरा कहोगे तो गॉड को लगेगा। क्योंकि वो है तो एक ही।

3.
सृष्टि मे हर वस्तु का एक उद्देश्य है। हर चीज़ ईको सिस्टम में और हर जीव फ़ूड चैन  में एक रोल निभा रहा है। हर प्राणी दुनिया मे अपनी एक भूमिका निभा रहा है। बच्चा बेग लटका स्कूल क्यों जाता है, पढ़ने। लोग पार्क में क्यो आते है, टहलने। इसी तरह मनुष्य का धरती पर क्या उद्देश्य है? आम नियम ये है कि वस्तु का निर्माता ही वस्तु का उद्देश्य बताता है। जैसे कंप्यूटर बनाने वाला बतायेगा की कंप्यूटर को क्या क्या काम करने के लिए बनाया है। हमनें हमें बनाने वाले पूछा कि हमारा क्या उद्दश्य है। उसने बताया कि उसने हमें अपनी पूजा और उपासना करवाने के लिए बनाया है क्यूंकि वो आरम्भ से है जब ये सृष्टि नहीं थी और सैदव रहेगा जब ये सृष्टि नहीं रहेगी। । 

4.
वही परम सत्य है। सत्य वह होता है जो कभी न बदले और ईश्वर कभी नहीं बदलता।  किसी के मरने पर कहते है कि राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य है यानी सत्य बोलने वाला कि गतिमान होगा। इसीलिए अपने कल्याण के लिए हमें सत्य का अपनाना है जो कड़वा होता है। जैसे डॉक्टर की दवाई कड़वी होती है पर इलाज के लिए खानी पड़ती है। तो सत्य क्या है। सत्य ये है कि ईश्वर एक है, निराकर है, अजन्मा है अमर है, अनदेखा है। 

5.
जैसे कोई बिना साइंस की बातें माने साइंटिस्ट नहीं हो सकता नही। वैसे ही वेदों की बातें माने बिना कोई सनातनी नहीं हो सकता है। वेद विरुद्ध आस्था रख कर सनातनी नहीं हो सकते। जो वेद की बातें माने वही धार्मिक है।

जैसे अपने बॉयोडाटा में हम अपना परिचय लिखते है। उसी तरह ईश्वर ने अपना परिचय अपने ग्रंथों में दिया है। पर हमने उसके परिचय और अस्तित्व में मिलावट कर दी। उसको आकर दे दिया, उसका चित्र बना दिया। उसके सत्य में मिलावट की कोशिश की। इस मिलावट को हमें दूर करना है। 

6.
ग्रन्थ कहते है कि.... मंत्र ...।
जैसे एकम ब्रह्म.. कुल हुव्वल्लाहु.. ईक ओंकार.. लार्ड इज़ वन..अनोखी.. स्विशतो..। 
 
7.
उसका कोई आकार ही नहीं तो चित्र कैसे हो सकता है। क्या हवा का कोई चित्र बना सकता है। क्या आत्मा का कोई चित्र बना सकता है।  हम चारो और फैली तंरगे नहीं देख पाते। उसके बनाये हुए सूर्य तक को हम देख नहीं पाते क्योंकि आंखें चौंधिया जाती है तो फिर उसका तेज और प्रताप कैसे इन आँखों से देख सकते है। नहीं देख सकते।

जैसे तोता जो सुनता है वही बोलने लगता है। बंदर जो देखता है वही नकल करने लगता है। उसी तरह हमें धरती पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ दिखाई दिए तो हम ये मानने लगे की ईश्वर भी मनुष्यों जैसा है। जबकि वो कतई भी हमारी तरह नहीं है। किसी बच्चे को बोलो की दारासिंह का चित्र बनाओ तो वो कार्टून से बना देगा। जिसने समुंदर न देखा हो उससे कहो कि समुंदर का चित्र बनाओ तो वो तालाब का चित्र बना देगा। इसलिए क्योंकि उनकी क्षमता ही इतनी है अभी। उसी तरह हम मनुष्यों ने अपनी क्षमता अनुसार ईश्वर को मनुष्य के रूप दे दिया।

8.
ईश्वर हमारे मन मे है। वो तो हमारी श्वासनली से भी निकट है इसलिए वो हमें कैसे दिख सकता है। जैसे हम अपना हाथ देख सकते है। पर जब वही हाथ बिल्कुल आंख के निकट ले आते है तो वही हाथ दिखना ही बंद हो जाता है। उसी तरह ईश्वर तो हमारे सबसे निकट है, वो कैसे हमें दिख सकता है।  

संकट के वक़्त मन में बैठे ईश्वर की याद आती है, न किसी रूप-आकार वाले कि और ऊपर, आसमान की तरफ देख कर हाथ जोड़ लेते है।

9.
हम अपने पिता को पिता ने कहे और पड़ोसी को बाप कहे तो पिता को कितना गुस्सा आएगा। इसी तरह हम ईश्वर की जगह किसी और को अपना पूज्य कहने लगे तो उसे कितना बुरा लगेगा।

कोई व्यक्ति अपने परिवार को छोड़ के कंही दूसरी जगह संबंध बना ले तो उसके परिवार को कितना बुरा लगेगा। ऐसे ही हम ईश्वर को छोड़ कर किसी और से सम्बंध बना ले तो ईश्वर को कितना गुस्सा आएगा। 

हमारे घर में  कोई काम करने वाला नौकर जिसको हम तनख्वाह दे खिलाये पिलाये। पर वो हमारा एक काम न करे तो हमें कितना गुस्सा आएगा। उसी तरह ईश्वर हमें पालता है और हम उसी की नहीं सुनते।

भारत की धरती हमें खिलाती और पिलाती है और हम अमेरिका की जय जय कार करे। तो ये देशद्रोह हो जयगा। उसी तरह ईश्वर को छोड़ कर हम किसी और कि जय जयकार करें तो वो भी तो ईश्वर से विद्रोह हो जाएगा।

बाजार में आलू खरीदते हुए भी उसे 10 बार अलट पलट झुक कर चेक करते है। जबकि हम किसके आगे सर झुका रहे है, उसे एक बार भी चेक नहीं करते कि क्या वह ईश्वर ही है।

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                                             आख़िरत

1.
हमारा जन्म मरण जब हमारी इच्छा से नही होता, होता तो मैं अंबानी के घर पैदा होता है, तो फिर ये जीवन हम कैसे अपनी इच्छा से बिता सकते है। ये जीवन एक परीक्षा है। एक अंतिम दिन आना है जिस दिन हमारे कर्मों का हिसाब होगा। इसे ही महाप्रलय का दिन कहा जाता है। इसे ही ईसाई भाई जजमेंट डे या डुमस डे कहते है और मुसलमान भाई इसे ही क़यामत या आख़िरत का दिन कहते है।  इस दिन अच्छे कर्म वाले स्वर्ग और बुरे कर्म वाले नरक में भेजें जांयगे। इन्हें ही ईसाई भाई हेवन और हेल कहते है और मुसलमान भाई जन्नत और जहन्नुम। हम बचपन से जानते हैं कि स्वर्ग में क्या क्या सुख सुविधाएं हैं और नरक में क्या क्या दुख और यातनाएं

2.
इसलिए अपनी मुक्ति और कल्याण के लिए हमें अच्छे कर्म करने है और बुरे कर्मों से बचना है। अच्छे बुरे कर्म क्या क्या है, ये आप अच्छी तरह जानते हो। ईश्वर ने हमारे मन में एक चिप फिट कर रखी है जो कर्मों के बारे में बता देती है। मन से आवाज़ आ जाती है कि ये पुण्य है, कर डाल और ये पाप है, मत कर। बस अक्सर स्वार्थ के कारण हम इस आवाज़ को दबा देते हैं की कुछ नहीं होता।    
 
अच्छे कर्म क्या है।  किसी को पानी पिला दिया, खाना खिला दिया, कपडे दे दिए, दवाई दिला दी। सड़क पार करवा दी। किसी की मदद कर दी, प्रेम से बात कर ली, मुस्कुरा दिए। बड़ो की आज्ञा मां ली, औरतों का सम्मान किया, किसी लड़की की शादी में मदद कर दी आदि आदि। ये सब अच्छे कर्म ही तो है। 
 
3.
जब हम ट्रैन की प्रतीक्षा करते हुए वेटिंग हाल में जाते है तो क्या वंहा साज सज्जा करते है, सोफा बेड लेके जाते है। नहीं न। क्योंकि हम जानते है कि हम थोड़ी देर के लिए यंहा आए है और ट्रैन का समय होते ही, यंहा से चले जायँगे। इसी तरह ये जीवन भी एक वेटिंग रूम है जंहा हम बहुत थोड़े से समय के लिए है। मृत्यु का समय आते ही यंहा से चले जांयगे। फिर यंहा कैसी साज सज्जा करना। पैसे और नाम के लिए इतनी हाय हल्ला और मार काट क्यों। यंहा बस अपने कर्म करने है और चला जाना है।

जब हम किसी यात्रा पर जाते है तो इतना बड़ा बैग पैक करते है। उसमे चादर, तौलिया, कपडे, पैसे आदि सब भरते है। पर मरने के बाद उस अन्तत काल की यात्रा की हम कोई तैयारी नहीं करते। कोई अच्छे कार्य नहीं करते। कोई ईश्वर की आज्ञा नहीं मानते।

हम बिजली प्रयोग करते है और एक महीने बाद बिजली बिल आता है। कम प्रयोग तो कम आता है वरना अधिक आता है। ऐसे ही इस जीवन के बाद कर्मों का बिल आना है। अच्छे कर्म किए अंतिम दिन अच्छा परिणाम आएगा वरना बुरा आएगा। बुरे कर्म वाले पर उस समय चौंक जाओगे और पछताने के सिवा कोई चारा न होगा।
 
बच्चों को समान लाने बाहर भेजते है वो अपने लिए भी चीज़ ले आता है। शुरू शुरू में हम ज़्यादा हिसाब नही पूछते क्योंकि बच्चों से प्यार करते है। पर एक दिन हम भी कहते है कि बेटा आज सारा हिसाब बताओ। ऐसे ही अभी हमे ईश्वर ने छूट दे रखी है जो मर्ज़ी करो पर एक दिन वो हमने सभी कर्मों का हिसाब लेगा और हमें देना मुश्किल हो जाएगा। 

जैसे परीक्षा के बाद मार्क्स का रिपोर्ट कार्ड आता है बिल्कुल ऐसे ही कर्मों का रिपोर्ट कार्ड आएगा।

4.
हिंदी में बहुत से शब्दों से पहले नि लगाने से अर्थ हो जाता है, नहीं। जैसे वस्त्र के आगे नि लगाने से हो जाता है निवस्त्र यानी जिसके पास कपड़े न हो। जैसे निशब्द यानी बिना शब्द वाला और निस्वार्थ यानी बिना स्वार्थ के। इसी तरह धरती पर हम मनुष्य के वास को निवास भी कहते है यानी जंहा उसका वास न हो। ये धरती मनुष्य का असली घर है ही नहीं।

5.
जैसे बार बार अलार्म बजता रहता है और अंत मे हमें सुबह उठते उठते देर हो जाती है। ऐसा न हो कि बार बार मन से आवाज़ आने पर भी हम अच्छे कर्म करने में इतनी देर कर दे और सत्य सामने के बाद भी ईश्वर की मानने में इतनी देर कर दें कि मौत ही आ जाये। 
 
6.
यह लोक न्याय के नहीं बल्कि परीक्षा के सिद्धांत पर बनाया गया है। यंहा पूर्ण न्याय नहीं है। पूर्ण न्याय तो इस जीवन के बाद है। शक्तिशाली पापी लोग यंहा बिना  दंड भुगते ही अच्छा जीवन बिता के चले जाते है। हिटलर ने 60 लाख लोगों को मारा पर उस मौत केवल एक बार आयी। न्याय कंहा हुआ। असली सज़ा तो ईश्वर ही देगा जब उसे 60 लाख बार मारा जाएगा।  

प्रकृति के अनुसार जो जीतन ऊपर होता है उसकी दृष्टि उतनी है पैनी होती है जैसे पक्षियों की। ईश्वर ने सबसे ऊपर है। उसकी दृष्टि से कुछ नहीं छुपता।

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                                              रिसालत

1.
सभी मनुष्य एक जोड़े यानि प्रथम पुरूष और प्रथम स्त्री की सन्तान है। इनके नाम इसलिए एक जैसे है क्योंकि ईश्वर ने ही अलग अलग क्षेत्रों में इनके नाम बताए जो वंहा की भाषा के अनुसार उच्चारण थोड़ा अलग हो गया। जब हम इन्ही की संतानें है तो आज तक पैदा हुआ सभी मनुष्य केवल मानव हुए और कोई भी ईश्वर नही हो सकता, न उसका रूप। क्योंकि ईश्वर मनुष्य का पैदा किया हुआ यानी मनुष्य की संतान थोड़ी है।

2.
ईश्वर हमें न तो दिखता है और न हम से बात करता है। इसलिए उसने हमें अपने आदेश देने के लिए हमने से कुछ सर्वोत्तम मानवों को चुना और उनके माध्यम से हम तक अपनी बातें पहुँचवाई। यह ईश्वर और हमारे बीच संपर्क हैं। ये महापुरष उसके संदेशवाहक और संदेष्टा होते थे। ईश्वर ने इन्हें  दुनिया के हर कोने में भेजे।  ये बताने आते थे कि आपके मन मे ही ईश्वर बैठा है और उसकी आज्ञानुसार जीवन व्यतीत करने में गलतियां न करो।  ये सभी हमे उसके धर्म का पाठ पढ़ाते थे। उसके आदेशानुसार जीवन को जी कर दिखाते थे। ताकि साधारण मानव यह न कह दें कि  हे ईश्वर ने तेरे आदेश तो बहुत कठिन थे और उन पर चलना असंभव था।  इसलिए ये सिद्ध करते थे कि ईश्वर में मार्ग पर चलना कठिन काम नही है, बहुत आसान है।  ये हमें शुभ समाचार देते थे कि अगर ईश्वर के आदेश अनुसार जीवन जिया तो स्वर्ग में हमारे लिए सभी सुख, आराम और सुविधाएं है। ये हमें चेतावनी देने भी आते थी कि ईश्वर की अवहेलना की तो नरक में हमारे लिए दुख, कष्ट और यातनाएं है।

3.
ये सभी महापुरष हमारे लिए आदरणीय और सम्मानीय है। पर पूजनीय नहीं है। आदरणीय और पूजनीय में अंतर होता है। ये समझ लीजिए की आदरणीय जिसका आदर किया जाए और पूजनीय जिसकी पूजा की जाए। आदरणीय सभी है पर पूजनीय केवल ईश्वर।  दोनों को अलग अलग स्थान पर रखना है। गडमड नहीं कर देना है। हमने दोनों को मिला दिया और पाप किया। हम उसके संदेशवाहको को ही ईश्वर का रूप कहने लगे। जैसे मैं आपके बीच संदेश देने आया और कोई मुझे ही कोई ईश्वर कहने लगे तो ये महापाप होगा। दीवाली पर मालिक का नौकर गिफ्ट/मिठाई देने आए तो हम उसका सत्कार करते है पर उसको मालिक नहीं कहते क्योंकि वो तो अपने घर बैठा हुआ होता है। जैसे डाकिया चिट्ठी देने आता मगर वो चिट्ठी का मालिक नहीं होता। क्या पत्नी को कोई मां कह सकता है। नहीं न।  दोनों का स्थान अलग है और अलग ही रखना चाहिए। जिसका जो स्थान है, उसे हमें वही देना है क्योंकि यही सत्य अपनाना है।

4.
आपको क्या लागत है कि ऐसे संदेशवाहक क्या सिर्फ भारत में में आये। क्या केवल भारत की धरती ही ईश्वर की है। नही। पूरी धरती ईश्वर की है। इसलिए वो धरती के प्रत्येक क्षेत्र में आए। ईश्वर ने किसी को भारत मे भेजा, किसी को येरूशलेम में, किसी को अरब में। जैसे शादी का कार्ड बांटने के लिए हम किसी को मुहल्ले में भेजते है, किसी को रिश्तेदारों में, किसी को दूसरे शहर में। ताकि सभी जगह संदेश चला जाए। जैसे भारत प्रत्येक देश में अपने अम्बेस्डर भेजता है। ये एक श्रृंखला, क्रम, चैन और सीरीज़ है। जैसे भारत मे श्रीराम और श्रीकृष्ण है। कंही ईसा मसीह आए। कंही मुहम्मद साहब आए। मोज़ेस, जर्थृष्ट, कन्फ़्यूशियस आदि आए। इन सभी ने एक ही संदेश दिया कि ईश्वर सर्वोपरि है। 
 
इन्होंने कहा.. 
राम -राम रामाय नमः राम नाम सत्यम अस्ति।
कृष्ण- ईश्वर सर्व भुतानाम हृदेशे अर्जुन तमेव शरणं गच्छ।

5.
जैसे किसी संदेशवाहक को प्रथम होना था, वैसे ही किसी को अंतिम भी होना था। सबसे पहले संदेशवाहक भारत मे आये थे यानी स्वयम्भू मनु। फिर वैवस्वत मनु आए, श्री राम, श्री कृष्ण आए। ईसा मसीह आए और अंतिम अरब में मुहम्मद साहब आये। अब ये संदेष्टा आने ईश्वर ने इसलिए बंद कर दिए क्योंकि दुनिया का अंत निकट है और ईश्वर से बेहतर ये बात कौन जानता है। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि हर बिजनसमेन या कंपनी किसी बंद होने जा रही मार्किट में अपने प्रोडक्ट भेजना बंद कर देती है।
 
6. उसका मुक्ति का मार्ग भी एक ही होगा। वर्ना भूत, वर्तमान और भविष्य काल के लोगो की मुक्ति कैसे होगी। ऐसा नहीं होगा कि 14 सौ साल पहले ईश्वर सिर्फ मुहम्मद साहब को मुक्ति का एक मार्ग बताए, अगर ऐसा होता तो उनसे पहले आने वालों लोगों की मुक्ति कैसे होगी। ऐसा नहीं होगा कि वह 2 हजार साल पहले जीसस को मुक्ति का एक दूसरा मार्ग बताए, क्योंकि फिर उनसे पहले आने वालों की मुक्ति कैसे होगी। ईश्वर ने जो धर्म श्रीकृष्ण को दिया, वही धर्म उनसे पहले श्री राम को दिया होगा। ईश्वर ने इन सभी महापुरुषों को एक ही धर्म देके भेजा। इन सभी ने आके एक ही धर्म, सत्य के मार्ग का अनुसरण किया। हमनें इनके नामों पर अलग अलग धर्म, मत, संप्रदाय बना लिए हैं।
 
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समानताएँ
 
1 .
इसी तरह, ईश्वर ने धरती पर अलग अलग समय और जगह वंही की स्थानीय भाषाओं में ग्रन्थ, संदेश, आदेश भेजे ताकि लोग उसे अपनी भाषा मे समझ सके। कंही संस्कृत में, कंही अरबी में, कंही हिब्रू में, कंही अरमाइक में। कंही वेद आये, कंही क़ुरान आया, कंही बाइबिल आई।  इन सभी ग्रंथों की भाषा अलग होने के बावजूद इनमें एक जैसा और समान ही संदेश होता है। जैसे अरबी में नूरूल हक़ को संस्कृत में सत्यप्रकाश कहंगे, उसी तरह इनमें भी संदेश एक, बस भाषा अलग होती थी।।
 
2. 
जैसे करेंसी नोट पर अलग अलग भाषाओं में मूल्य लिखा होता है। जैसे खांसी का सीरप एक ही होती है पर पैकेट पर उसकी डिटेल, इंस्ट्रक्शन जैसे कब कैसे खानी है, कितने की है, भारत में हिंदी में लिखी होती है और अमरीका में इंग्लिश और चीन में चीनी भाषा में।  जैसे किसी समान के साथ मैनुअल बुकलेट आती है जिसमे अलग अलग भाषाओं में उसकी सारो डिटेल लिखी होती है। हमारी इंस्ट्रक्शन बुक ईश्वर के विभिन्न भाषाओं में दिए गए ग्रन्थ है। 

3.
हर क्षेत्र और काल मे ऐसे आदेश या ग्रन्थ भेजे गए। सभी ग्रंथों का मूल वही रहा बस सामाजिक नियम रिन्यू कर दिए जाते थे जो समय के साथ होने वाली मानवों के विकास और समाज कि उन्नति के अनुसार होता था। क्षेत्र और काल के अनुसार उसके ग्रथों के विभिन्न वर्ज़न आते रहे लोगों को जीवन सिखाने और मार्गदर्शन करने। जैसे कंप्यूटर विंडो में वायरस आने उसे अपडेट किया जाता है। उसी तरह ईश्वर दूसरे अपडेटेड ग्रंथों को भेजता रहा. उसी तरह जैसे पुराने की जगह मोबाइल का एडवांस मॉडल आता है जो नए समय और टेक्नॉलजी के कंपेटिबल होता है। पर सबका मूल काम फोन करना ही होता है। जैसे समय के साथ किसी सॉफ्टवेयर या एप्प का लेटस्ट वर्ज़न आता है। नए वाले के बेसिक फीचर या मूल एक से ही रहते है पर यूजर इंटरफ़ेस रिन्यू कर दिया जाता है।

4.
सबसे पहले ईश्वरीय ग्रन्थ भारत में वेद आये, बीच में बाइबिल आई और अंत में कुरान आया। दुनिया के सभी मुख्य स्थानों में भी बहुत से ग्रँथ आये जो सीमित क्षेत्र, काल और समुदायों के लिए होते थे। स्वार्थी मनुष्य हमेशा से ही उसके ग्रंथो में मिलावट करता रहा। पहले ग्रंथो की सुरक्षा का प्रबंध नहीं होता था जैसे कागज़, वैश्वीकरण आदि नहीं था। परंतु जब ऐसा तकनीकी प्रबंध हो गया और दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन गयी तो संसार के लिए एक सुरक्षित अंतिम ग्रँथ भेज दिया गया जिसमे मिलावट संभव नहीं है। 

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5.
वह ईश्वर एक है तो उसका तो उसका धर्म भी एक ही होगासंसार के प्रत्येक भाग में उसके सिखाए मूल आदेश, सिद्धांत, नियम भी एक जैसी ही होंगी। तो सिंपल समाधान ये है कि अगर दुनिया के सारे धर्मों की शिक्षाएं इकट्ठी कर लो तो निःसंदेह उसके धर्म को पा लोगे।
 
जब उसका धर्म पहली बार आया तो उसे सनातन धर्म कहा गया और जब आखिरी बार आया तो इस्लाम कहा गया। ये दोनों धर्म असल में एक ही हैं, इनका मूल और निष्कर्ष एक ही हैं, बस समय के अनुसार इनकी व्याख्या और विस्तार बदल गया है।
 
6. 
आज सब कह रहे है मेरा धर्म सच्चा, मेरा धर्म सच्चा। अगर सब सच कह रहे हैं तो उसका धर्म कंहा गया। असल में सारे धर्म उसी के धर्म से निकले है जब लोगों ने धर्म में बदलाव किये। ईश्वर का एक धर्म समय के साथ साथ आगे बढ़ते बढ़ते बदल जाता रहा है है मगर उसका मूल वही रहता है। उसका असली धर्म जानना है तो सभी धर्मों की एक समान बातें ले लो। यही समान बातें उसका मूल धर्म है। विभिन्न धर्मों में जो मानवीय और तार्किक आदेश होगें केवल वही उसके आदेश होंगे।
 
7.
जैसे पानी छान कर सही हो जाता है। जैसे बाजार में लगी हुई SALE में से अच्छी चीज़ें उठा कर ले लेते है। जैसे रेड ब्लू ग्रीन rbg से सारे रंग बने है और ये आधार है। उसी तरह ये समान बातें उसके असल और मूल धर्म का आधार है। जैसे किसी खेल जैसे क्रिकेट या बॉक्सिंग के बेसिक्स नहीं बदलते, चाहे किसी भी देश में ट्रेनिंग ली जाए। उसी तरह विभिन्न धर्मों के बेसिक्स भी एक जैसे रहते है। बस लोगो बेसिक्स समझने में गलती करते रहते है। गणित के बेसिक्स नहीं बदलते है। कोई कहे कि प्लस का निशान जमा का नहीं बल्कि डॉक्टर का होता है। तो इसमे गलती का दोष गणित का नहीं बल्कि समझने वाले का माना जायेगा। सभी शाखों की जड़ एक होती है इसलिए हमें जड़ को पानी देना है क्योंकि पेड़ जड़ को पानी देने से फलता है।

ये मूलभूत और समान आदेश है कि वह एक अकेला निराकर उपासनीय है। उसके संदेशवाहकों के दिखाए मार्ग पर चलना है। ऐसे कर्म करने है जिनके आधार मृत्यु के बाद अंतिम दिन हिसाब होगा और नर्क और स्वर्ग का निर्णय होगा।

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                                                अन्य बातें 
 
 
लोग मूर्तियों पर जल, दूध, चुन्नी चढ़ाते हैं, मज़ारों पर फूल, इतर, चादर चढ़ाते हैं। जबकि ईश्वर की असल मूर्त इंसान हैं, इनको ये समान-दान दो। हम अपने भगवानों के चित्र बनाकर अखबार, अगरबत्ती, मिठाई के डिब्बों आदि पर छापते हैं और नदी में मूर्तियों का विसर्जन  कर देते हैं। फिर यही सब कुडे में पड़ा दिखाई देता है। तो हम ही तो इनका अपमान कर रहे हैं। मंदिर, मज़ारों पर दर्शन के लिए पैसे लेते हैं। कई जगह पिछड़ी जाती वाले ने मूर्ति को छू दिया तो उस पर भी झगड़े हो जाते हैं।

हमारा कोई बुजुर्ग मरने से पहले यह कह जाए कि मेरे नाम पर सेवा के कार्य करना। मगर हम केवल उनकी एक मूर्ति बना कर लगा दे तो क्या सेवा मानी जाएगी। नहीं। इसलिए हमें ऐसा भगवान के साथ भी नहीं करना चाहिए। 
{गमला, मूर्ति पर बीट}
 
1.
हर वस्तु ईश्वर नहीं है बल्कि हर वस्तु ईश्वर की है। कण कण में ईश्वर की कला मौजूद है।  अगर हर वस्तु ईश्वर होती तो क्या नालियों की गंदगी में भी ईश्वर हो सकता है। नहीं। हम फसल को जन्म देकर उगाते है  और उन्हें खाकर समाप्त कर देते है। इसलिए उनमें ईश्वर कैसे हो सकता है क्योंकि ईश्वर न तो पैदा होता है और न मरता है। 

प्रत्येक चीज ईश्वर नहीं है बल्कि प्रत्येक चीज ईश्वर की है। दुनिया मे किसी भी महापुरुष ने ये नही कहा कि वो ईश्वर है और उसकी पूजा करें। साईंबाबा तक भी यही कहके गए कि सबका मालिक एक।

2.
ग्रंथों में पाताललोक, इहलोक के बाद परलोक को तीसरा लोक कहा गया है। वेदों में धरती को परलोक या इस जीवन को ही स्वर्ग नर्क कंही नहीं कहा गया है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि वैदिक काल में इस धरती को परलोक मानने की धारणा नहीं थी। अगर ऐसा होता तो चित्रगुप्त का क्या रोल रह जायगा।  गरुडपुराण इस पर स्पष्ट है और उसके ऐसे प्रचलित फोटो भी यही सिद्द करते हैं कि ये लोग अलग अलग है। इसलिए मरने वाले को स्वर्गीय और स्वर्गवासी कहा जाता है या कि फला स्वर्ग सीधार गये।   

3.
पुनर का अर्थ होता है दुबारा, न कि बार बार।
पुनर्जन्म का अर्थ बार बार धरती पर जन्म लेना नहीं होता। इसलिए पुनर्जन्म का मतलब है दुबारा जन्म लेना यानी मरने के बाद अंतिम दिन कर्मों के हिसाब के लिए दुबारा जीवित होना जिसके बाद अनंत काल का जीवन है, स्वर्ग या नरक में। ग्रंथों में ऐसा ही अर्थ है। वेद के एक मंत्र का मूलार्थ बार बार जन्म का विरोध करता है। बार बार जन्म लेने को कहते है आवागमन या समसारा जो हमारी प्रथा नहीं है।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी ने कहा है कि बार बार जन्म लेने की धारण छान्दोग्य उपनिषद काल में गढ़ी गई और उस समय विद्वानों ने ये नहीं सोचा कि बाद में ये कितनी गलत धारणा बनती चली जाएगी।

किसी के मरने पर तेरहवीं होती है। पंडित जी आके गरुड़पुराण के उत्तरार्ध भाग के प्रेतकल्पखंड का संस्कृत में पाठ होता है। जिसमे कहा जाता है कि हे आत्मा अगर तूने अच्छे कर्म किये है तो तुझे स्वर्ग लेके जाया जाएगा और बुरे कर्म किए है तो नरक। अब हम लोग जीते जी तो ये कहते रहते है कि 84 लाख योनियों में बार बार जन्म होगा जबकि मरने के बाद बताया जा रहा है कि इसी जन्म में किये गए कर्मों के आधार पर सीधे स्वर्ग या नरक लेके जाया जायगा। तो किस की बात सही हुई। ग्रंथो की या जो लोग कहते है। इसलिए गरुडपुराण अनुसार इसी एक मानवीय जन्म के कर्म ही स्वर्ग नरक का मार्ग निर्धारित करेंगे।

4.
शब्द अवतार बना है 'अव' यानी नीचे और 'तरण' यानी उतरना, उतारना से अर्थात जो नीचे उतर। महान संस्कृत व्याकरण ज्ञाता पाणिनि अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी में भी यही अर्थ लिखता है। अवतार ईश्वर का संदशवाहक भक्त होता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा था कि समाज का उद्धार करने के वाले महापुरष और महामानव ही अवतार है। अवतार एक संज्ञा है जो ईश्वर के आदेशो को लागू करने के लिए धरती पर अवतरित हुए. स्वामी दयानंद सरस्वती भी अवतारवाद में नहीं विश्वास रखते थे और उन्हे केवेल महापुरुष कहते है। वेदों में अवतारवाद नहीं है।
ईश्वर अगर अवतार लेके आता तो केवल भारत में नहीं बल्की पुरे विश्व में आता और माना जाता. और अगर दूसरे देशों में ईश्वर अवतार लेके आता भी तो क्या हम उसका सम्मान कर पाते, हम तो नेपाल जैसे देश के लोगों का सम्मान नहीं करते। ओशो,सत्य साईं को ईश्वर का अवतार, भगवान माना जाता है जबकि ओशो एक देश से दूसरे देश भागते रहे थे और सत्य साई को कई बीमारियाँ थी।
 
5.
भगवान  का अर्थ है तृष्णा को भंजन, नष्ट करने वाला, या भाग्यवान, या इंद्रियों को काबू करने, जीतने वाला। जैसे कलावान, बलवान, धनवान या भाग्यवान। इसके अक्षरों से बनने वाला अर्थ मनमाना है।
आमतौर पर कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर चारों को भगवान कहा जाता है मगर इन्हें केवल महान इंसान भी माना जाता है। बल्कि बुद्ध और महावीर, इन दो को तो नास्तिक माने जाते हैं तो वो कैसे भगवान या अवतार हो सकते हैं। पहले कि तरह आज भी महान हैं लोगों को भगवान कह देते है जैसे पाणिनी, शंकराचार्य आदिमाता-पिता, डॉक्टर, अतिथि को भी भगवान कह देते हैं।
{तेंडुलकर}
 
6. देव का अर्थ है दिव्यावन यानि प्रकाशवान और प्रकाश किसी चीज़ में से निकलता है जैसे बल्ब से प्रकाश निकलता है। देवता ईश्वर ने प्रकाश से उत्पन्न किये और उसी के अधीन है. बाद में ईश्वर के गुणों आदि को ही पृथक देव मान लिया गया। फिर इनकी शक्तियों को ही इनकी पत्नी बना दिया गया। निरुक्त अनुसार देव का अर्थ है मनुष्यों को देने वाला और ईश्वर सबसे बड़ा देने वाला है। इसलिए भले मनुष्यों को भी देवता कहा जाता है। अगर यह सच में इंडीपेंडेंट होते तो फिर ईश्वर की आवश्यकता ही क्या होती?

7.
त्रीदेव या त्रीमूर्ति देवताओं को वेदो में ईश्वर के गुणनात्मक नाम कहे गए हैं जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, रुद्र, गणेश, सरस्वती आदि। सभी को ईश्वर महेश, गणों का ईश्वर गणेश, देवों का देव महादेव

8.
लिंग का अर्थ होता है प्रतीक या चिन्हवेद और उपनिषदों मेँ यह हर जगह इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है। जैसे स्त्रीलिंग में लिंग का अर्थ जेंडर नहीं है बल्कि निशानी है। पुराणों में शिवलिंग शब्द आता है। 
 
9. 
श्रीराम का नाम रामचन्द्र है यानि राम का चंद्र। ईश्वर का नाम राम है। भक्तिकाल में भी राम नाम ईश्वर को माना गया है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है यानि मनुष्यों में सबसे उत्तम, न कि भगवानों में। राम जी का तारक मंत्र कहता है कि यह राम उस राम को नमन करता है। शवयात्रा के दौरान के राम राम सत्य कहा जाता था यानि राम का राम ही सत्य है, जो कि बाद में बदल कर राम नाम सत्य हो गया। अभिवादन में कहा जाने वाला राम राम का यही अर्थ है कि राम के राम का जप करो।
 
इसी तरह श्रीकृष्ण को योगिराज कहा गया है क्योंकि वो एक महान योगी थे। वो भी एक मनुष्य थे जो जरा नामक शिकारी के द्वारा पाँव में तीर लगने के कारण स्वर्गधाम चले गए थे। बाली से मिली एक 70 श्लोकी गीता में श्रीकृष्ण को अवतार नहीं माना गया है। आर्य समाज श्रीकृष्ण को केवल एक महापुरुष मानता है। ब्रह्माकुमारी समाज गीता को नहीं मानता।


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                                                    निष्कर्ष

सब बातों का निष्कर्ष ये है की ईश्वर केवल एक है, निराकर है और उसके जैसा कुछ नहीं। केवल उसी की पूजा उपासना करनी है जैसा उसने स्वयं आदेश दिया। उसके भेजे संदेशवाहको का अनुसरण करना है। अच्छे कर्म करने है और बुरे कर्मो से बचना है। अंतिम दिन हमारे कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नर्क का निर्णय होगा।
 
जैसे क्लास में एक साल का समय औए सिलेबस होता है। जो पास करता है अगली  क्लास में भेज दिया जाता है। वैसे ही हमारी अगली क्लास परलोक में है। स्कूल के प्रिंसिपल की तरह ईश्वर इस दुनिया का प्रिंसिपल है। जैसे प्रिंसिपल टीचर को पढ़ाने क्लास में भेजता है। ऐसे ही ईश्वर अपने संदेशवाहकों को धरती पर भेजा। स्कूल की किताबो की तरह हमारे ग्रन्थ होते है। और सिलेबस की तरह ईश्वर के आदेश और आज्ञा होती है। ईश्वर सभी के कर्म देख रहा है जैसे प्रिंसपल CCTV से नज़र रखता है। ईश्वर ऊपर से हम सभी को देख रहा है। बुरे कर्म करते हुए लोगों की आंखों से तो बच जाओगे पर ईश्वर से नहीं बच पाओगे।

जैसे पिता पांव दबवाने के बहाने बस ये देखना चाहता है कि उसकी संतान के पास उसके लिए थोड़ा समय है कि नहीं उसी तरह ईश्वर भी अपनी भक्ति करवा कर यही देखना चाहता है कि क्या लोगों के पास उसके लिए थोड़ा सा भी समय नहीँ। तो आपको बनाने वाले ईश्वर के लिए भी थोड़ा याद करे। उसका ध्यान करें, उससे प्रार्थना करे। जब मिठाई का नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है तो उसका नाम लेने पर मन में करुणा भी आएगी।

ईश्वर से प्रथान करता हूं कि मेरी बताई सभी सही बात आप के मन में उतर जाए और कुछ गलत कह दिया हो तो उसे आप से दूर कर दे।  किसी भाई को कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमा चाहता हूँ। 

उंगली उठवाना, पंफ्लेट बांटना, पोस्टर, गले मिलना, प्रश्न हो तो पूछना, क्षमा याचना।
 
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