प्रश्न:
इस्लाम के जन्म से पहले भी अरबी भाषा में अल्लाह शब्द था। जिसका अर्थ निराकार सर्वव्यपाक परमात्मा ही लिया जाता था। पंजाबी भाषा में रब शब्द का भी यही अर्थ है। अलग-अलग भाषाओं में एक ही ईश्वर के अनेक नाम हैं। आपके सब कुतर्को का उत्तर सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में हैं, समय निकाल कर पढ़ लीजिएगा। पूर्वाग्रह दुराग्रह का कोई उपचार नहीं। कुछ दम नहीं है इसमें । पर मुझे अवकाश नहीं है ऐसे लेखों का खंडन करके समय बेकार करने का। यह आपको भी पता है कि कर्मफल,आवागमन, पुनर्जन्म आदि पर मुल्लों ने सदैव हमसे पटखनी खाई है। अब सौ बार बेशर्मी से वही वही सवाल करते रहे, उससे कुछ बदलने नहीं वाला। और मृतक श्राद्ध, नरक स्वर्ग आदि पर सवाल करना मूर्खता है। हम इन पौराणिक गप्पों का वैसे ही खंडन करते हैं,जैसा इस्लामी जन्नत व जहन्नुम का। क्या सोचे थे, कोई संज्ञान नहीं लेगा तो कुछ भी सच-झूठ का कॉकटेल बनाकर चेप दोगे? केवल ये बताओ कि ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका में एक ईश्वर को छोड़कर दूसरे को पूजने वाले नरकगामी और पशु हैं ऐसा पाठ दिखा दो। अथर्ववेद ४/१/६ में ईश्वर सोया था, यह कैसे ग्रहण किया? बस, इन दो पर ही जवाब दे दो। जहां तक हमको पता है, विपश्यी मंडल और यहां के आर्यसमाजी तो कम से कम इनमें नहीं मानते। उपरोक्त लेख में यू टू यानी हममें गलती है तो तुममें भी गलती है यह नीति बनाई गई है। मुल्ले सदा यही करते हैं। वो सोचते हैं कि दो बुराई जोड़कर वो अपनी बुराई को जायज़ सिद्ध कर देंगे। कहां गये, अपने कॉपीपेस्ट ग्रुप में पूछने चले गये? वैसे आप शायद ही कभी बोलते हो। परंतु आज बोलना भारी पड़ गये। क्योंकि हम बहुत बुरी बला हैं। आसानी से प्राण नहीं छोड़ते । यकीन नहीं होता तो किसी से भी पुछ लीजिये।
उत्तर:
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1250209198335210&substory_index=0&id=288736371149169
ये लिंक वाला आपका ही पेज है। इसमे ऋग्वेदादिभाष्य में पशु वाले मत का उलखे है। अपने दयानन्दू भाइयों को पेलिये अब। या तो वो झूठे है या आप। निर्णय कर लो कौन सच्चा दयायनन्दू है।
प्रश्न:
कभी भाष्यभूमिका खोलकर न पढ़ी होगी। दुनिया भर के झूठ सच बिना जांचे यहां न लाया करो। माफी मांगो, झूठा तथ्य रखने के लिये । अरे भैया, यह मुझे मत बताओ कौन क्या है। किसी ने गलत लिखा, आप उसको कॉपी करो इससे आप सही नहीं हो जाते। ऐसे हम किसी मुस्लिम वेबसाइट से कुछ आपत्तिजनक लेकर यही बात कह देंगे कि तुम्हारी फलाँ-फलाँ साइट या पेज पर ऐसा-ऐसा मोहम्मद साहब के विरुद्ध लिखा है। ये नहीं चलेगा समूह में, कुछ भी अंड-बंड कहकर निकल लेंगे, हम देखते रहेंगे? अरे भैया, भाष्यभूमिका में से वो पाठ पेश करो, वरना अपनी गलती मानो।
उत्तर:
वाह दोगली रणनीति। आपके लोग ही अपने गुरु के बारे में में झूठ लिखे। उनका गला पकड़िए अब। हो सकता हो आप झूठ लिख रहे हों। आप लोग आपने गुरु के मत पर ही एकमत नहीं। और दुनिया को ज्ञान देने निकले हुए है। वाह। पेज वाले को पकड़िए। हम तो आर्य समाजी को सच्चा मानकर उनके लेख पढ़ते है। आज जाना वो झूठा प्रचार भी करते है। वो भी अपने पेज पर। फिर तो आर्य समाजी और पौराणिकों में कंहा अंतर रहा। दोनों पेट से बातें घड़ कर पेज पर डाल रही। धयनवाद आज के बाद किसी आर्य समाजी पर ज्ञान के लिए भरोसा नहीं करूंगा
प्रश्न:
नरकगामी तो उस फेसबुक लेख में भी नहीं है। बकवास बंद करो। हम भी इस्लामी पेजों से बहुत कुछ आपत्तिजनक लाकर यहां पर पटक सकते हैं। फिर मत कहना कुछ। भाष्यभूमिका में अन्योपासक *नरकगामी* है ऐसा कहां लिखा है? ऐसा फेसबुक लेख तक में नहीं है। मूल में क्या लिखा है, उस पर बात करो। बाकी लंतरानी न बताओ।
उत्तर:
ऐसे ही आर्य समाज अपने पेजों पर झूठ परोसता रहा तो कौन उनपर भरोसा करेगा। अब तो आपका झूठ का भांडा फुट चुका। अब आपमें और पौराणिकों में कोई फर्क नहीं रहा।
प्रश्न:
चुप करो,बकलोली बंद करो। अन्योपासक नरकगामी है यह पाठ उस पेज-लेख में भी नहीं है। न भाष्यभूमिका में। झूठे पर परमात्मा की सौ सौ धिक्कार है। और बरेलवी,देवबंदी वगैरह फिरके कैसे एक दूसरे की छीछालेदर करते हैं। शिया लोग कुरान हदीस आदि का क्या अर्थ करते हैं, अहमदी क्या करते हैं यह सब बताने लगेंगे तो कोई मतलब नहीं होगा। क्योंकि मुख्य बात यह है कि मूल पाठ में क्या लिखा है। रही मतभेद की, तो इसी समूह में वो हदीसों को मानते ही नहीं ।कुरान को अलग तरह से मानते हैं। बकरीद में पशुबलि का निषेध करते हैं। इस समूह में ही मतभेद है, आप तो पेज बताने लगे । यह कहां से ले आये? हकप्रकाश से या किसी मदरसा किताब से? नहीं है उसके पास, तब ही तो इधर-उधर की हांक रहा है। नरकगामी तो इनके लेख तक में नहीं है। उनको तो कुछ बोलो। व्यर्थ में विषयांतर कर रहे हैं। और आर्यसमाज को झूठ परोसने वाला कह रहे हैं। ये नहीं कि मूल पाठ मेरे मुंह पर पटक कर बोले,कि ये देखो- यह लिखा है। महर्षि दयानंद पौराणिक नरक मानते ही न थे,तब क्यों नरकगामी कहेंगे? न ही वे इस्लामी जन्नत या जहन्नुम मानते थे।
उत्तर:
अब आपकी बैचैनी देखी नही जा रही। प्रमाण मैंने रख दिया आर्य समाज का ही। हमारे लिए आर्य समाजी ही आर्य ज्ञान का आधार है। हमने तो उस पेज वाले आर्य समाजी की बात पर विश्वास किया। जो हो सकता है झूठ हो। हो सकता है आपकी बात झूठ हो। क्योंकि हमारे लिए तो आप दोनों ही आर्य समाजी हो। सच्चा झूठ अब आप उससे सेटल कीजिये। जैसे दयानंद वेद की कोई बात अपने लेखन में लिखा गए, तो हम उससे यही मानते है कि ऐसा वेद में लिखा होगा। अब बाद में पता चले कि दयानद जी झूठ लिख गए है। वेद में ऐसा है ही नही। तो या तो ये बात कहने वाला झूठा हुआ या दयानद। यही केस इस पेज वाले ने कर दिया है। आप दोनों में कौन झूठा है। नही पता।
प्रश्न:
पेज में नरकगामी दिखा दो , इतना अंगुलियां टपटपाकर क्या लाभ? इनका खोखलापन तो प्रकट हो गया न! और आप कहि रहे थे कि हम उस बकवाद लेख का संज्ञान लें!
उत्तर:
ये लो पढ़ो। और कितने आपके झूठ का पर्दा फाश करु।
सोया हुआ सा क्यों प्रतीत होता है। क्या कोई प्राणी है? जीव ही तो सोते है या निर्जीव भी??
प्रश्न:
सोता हुआ-सा प्रतीत होता है- बुध्यते। असलियत में नहीं सोता, जैसे अल्लाह तख्त पर बैठता है और आठ फरिश्ते उसको उठाते हैं। यहाँ पर सामान्य सा उपमा अलंकार इनकी खोपड़ी में नहीं घुसता। चले हैं वैदिक ईश्वर का खंडन करने। बल्कि अपनी अक्ल का दीवाला निकलवा दिया है। तुमको सामान्य सा अलंकार तक न समझ आया। इस्लामी रेगिस्तानी खोपड़ी में वैदिक अलंकार नहीं जा सकता। परमात्मा को पुरुष कहते हैं पुरि शेते यानी पूरे ब्रह्मांड में ही वो बसता है, मानो शयन कर रहा है। यही उसकी सर्वव्यापकता बताता है। पर तुम्हारे बस का रोग नहीं है। तुम्हारी अक्ल का फोटू दिख गया। तुम जैसों के लिये डॉ मुमुक्षु बहुत है। हमको ऊर्जा खपाने की जरूरत नहीं। अतः यहीं पर बस। असुविधा के लिये खेद नहीं है! तात्पर्य यही है कि प्रलयावस्था में सृष्टिनिर्माण आदि मुख्य काम परमात्मा नहीं करता। इसलिए मानो वो सोता-सा था। वो असली में सोता था,यह भाव नहीं है। तुमने मेरा कोई झूठ नहीं खोला है। नरकगामी तो अब तक न दिखा सके, न तुम्हारा..... भी दिखा सकता है। इतनी ज़िल्लत के बाद भी इतनी थेथरई कैसे कर लेते हो?
उत्तर:
बात आपके झूठ को झूठ साबित करने की थी। सो मैन कर दिया। बिना ज्ञान के आप मुझ पर आरोप लगा रहे थे कि फला दिखाओ कंहा लिखा है। फलां दिखाओ कंहा लिखा है। मैन दिख दिया। बस अब आप लगे रहो अलंकार रूपक में। मैं चला चैन की नींद लेने। अब आप लगें रहो अपने दयानंदी वेद भाष्य को ठीक करवाने में (जिसे वैसे भी सभी गैर आर्य समाजी विद्वान गलत बताते है) और अपने दयानंन्दू भाई का पेज बंद करवाने में। और ये लो नरकगामी लिखा हुआ आर्यमंतव्य पर।
प्रश्न:
तुम लोग लगे रहो भई, हमारे तो भाष्य सही हैं। पर कुरान के अनुवाद सेनेटाइज करो। इंटरनेट पर से हदीस व सीरत गायब करो। उसकी जगह कपोलकल्पित साहित्य बांटो। यही करो! इसी तकिय्या में रेगिस्तानी अल्लाह खुश होगा। इतनी बेशर्मी लाते कहां से हो रे? बेशर्मी में तो तुमने अपने रसूल तक को पीछे छोड़ दिया है। नरकगामी शब्द न तुम मूल भाष्यभूमिका में दिखा सके, न पेज पर। बकलोली करने को बस कह दो। दुखरूपी नरक - नरक का अर्थ कोई लोक नहीं,दुखमय स्थिति है। यहाँ कोई इस्लामी काल्पनिक जहन्नुम का कोई मतलब नहीं है, न पौराणिक नरक से। अच्छा, और ये भाष्यभूमिका का पाठ है क्या? देख लीजिये,ये लोग कैसे महर्षि दयानंद का नाम लेकर तोड़-मरोड़कर इस्लामी जहन्नुम साबित करना चाहते हैं और अथर्ववेद का नाम लेकर वेदोक्त ईश्वर को अल्लाह की तरह सिंहासन पर पसरने वाला बता रहे हैं। और प्रमाण भी दिया तो वेबसाइट का, नाकि मूल पुस्तक से। उसके बाद भी थेथरई करना नहीं भूलते। क्या फालतू थेथरई करके बस अपने लेख का कलेवर बढ़ा रहे थे, ताकि लगे कि तगड़ा कॉपीपेस्ट मारा है! हमको महर्षि दयानंद के ग्रंथों व सिद्धांतों का पूरा पता है। हम तो बस दिखाना चाहते थे कि मुल्ले किस तरह तोड़-मरोड़कर इस्लामी रेगिस्तानी कबिलाई सिद्धांतों का दोषारोपण महर्षि के लेख से करते हैं। जब थेथरई पकड़ी गई, तो बेशरमी से कहने लगे कि हमको इससे मतलब नहीं कि कहां क्या लिखा है? मतलब नहीं था तो डॉ मुमुक्षु के खंडन में काहे लिखे थे? भेज दिया पर उसस रेगिस्तानी कबिलाई किताब की कोई मान्यता सही साबित नहीं होती। तो डॉ मुमुक्षु आर्य के प्रत्युत्तर में उनको देने का औचित्य क्या था बिलौटा महाशय.
उत्तर:
खिसयानी बिल्ली खंबा नोचे। हमे फर्क नहीं पड़ता दयानद या आर्य समाज नरकगामी क्या मानता है। आप ने नरकगामी लिखा हुआ पूछा। मैंने दिखा दिया। आपने पशु के बारे लिखा हुआ प्रमाण मांगा। वो भी दिया। आपने सोया हुआ ईश्वर के बारे में पूछा। वो भी दिया। तो सच्चाई ये है चाचा चौधरी की आपको अपने ही मत, गुरु, ग्रन्थ का ज्ञान नहीं। झूठ बोलते है। दूसरा झूठ साबित कर दे । विषय बदलते हो। साधुवाद आप जैसे अनार्य समाजी को । आपने 3 प्रश्न किये तीनों झूठे निकले। मैंने तीनो के सबूत दिए। दयानंद खुद नरक भोगी लिख के गए है। आपके आर्य समाज वाले ही कहे रहे है। पढ़ लो आर्यमंतव्य। बहुत से आर्य समाजी वेबसाइट के लिंक दे दु जंहा ऐसी ही बात कही गई है। आर्य समाजी को आर्य समाजी के ही लेख कोट कर रहा हूँ। पकड़ो अब एक दूसरे के कॉलर।
आपने कहा कि दयानंद नरक नही मानते थे। हाहाहाहा। अरे माने न माने मेरी बला से। पर ऐसा लिखा कर गया है दयानंद। जो आपको पता ही नहीं। आप कंहा से आर्य समाजी हो? झंडू आर्य समाजी हो आप जिसे अपने मत के बारे में ही कुछ पता ही नहीं की कौन क्या लिख गया। आप कितना झूठ बोलगे।
मतलब सभी आर्य समाजी और उनकी वेबसाइट झूठी, केवल आप ही सच्चे हो, वाह। असल मे उन्होंने सही लिखा है। ये सभी लेख वाले सच्चे दयानंन्दू है और आप झूठे। आप दयानिन्दनीय अधिक लग रहा है। जो दयानद की बातें झुठला रहे है। आपको न आपके धर्म का ज्ञान नहीं है (आर्य समाज जो असल मे किसी धर्म का नाम ही नहीं है, मुट्ठीभर हठधर्मी सींग मारक अज्ञानियों की गैंग है। सनातनी विद्वान जिसके वेदार्थ को संस्कृत भाषा और व्याकरण की मृत्यु मानते है जिसमें सभी नाम वाले अस्तित्वों को यूरेशियन ओम या वैदिक ब्रह्म बना दिया गया, जिसका कारण बताते है ईसाईयो से प्रभावित होके और अंग्रजी सरकार स्व लाभ लेने के लिए)।
न आपको दयानंद का ज्ञान है। आप जिस को स्वामी कहते है वो क्या क्या लिख के गया है आपको पता ही नहीं। मैने बताया तो आपने दयानद की बातों को ही अंटशंट और बकलोली
कहने लगे। आर्य समाजी रेफरेन्स भी दिए। अपने गुरु की लेखनी पढ़ो पहले फिर हमें ज्ञान देंना। वरना खिसयानी बिल्ली की तरह खंबा ही नोचते रहोगे।
प्रश्न:
वेबसाइट से ही कॉपीपेस्ट करेंगे , पर मूल किताब न पढ़ेंगे। कटुवों की यही औकात है । इन गदहों को समझ ही नहीं आ रहा है जवाब देकर ये खुद अपनी ऐसी-तैसी करवा चुके हैं। उसके बाद भी रस्सी जल गई पर मोहम्मदी अकड़ नहीं टूटी। करते रहो थेथरई! हम चले अपने काम से। बाकी जनता देख रही है, कौन कितना पानी में है. देख लीजिये इन लोगों के लेख कितने पानी में हैं, जिनका संज्ञान लेने आप हमें कह रहे थे। आपक लगता है कि इनके घासलेटी कॉपीपेस्ट का हम लेखबद्ध उत्तर देंगे?
उत्तर:
तू तड़ाक पर आगये। यही दयानंन्दू संस्कार है आपके? आपके सारे झूठ साबित कर दिये है। अगली बार यंहा बकनन्दी के फॉर्म भरने से पहले आर्य समाजी लेख पढ़ के आना। मूर्खता और पखण्डता कि मिसाल बन गए हो अब आप। आप बुरी बला नहीं झूठी बला हो। हाहाहाहा।
अगली बार मुझे से सबूत मांगने से पहले अपनी दयाझंडू खोपड़ी में अपने ही गुरु घंटाल की लेखनी स्टोर करो। वरना ऐसे ही झूठ परोसते राहोगे और ज़लील होते रहोगे, सच सामने आते ही। बिना ज्ञान के.. झूठ बोलने में और बेशर्मी में दयानंद को भी पीछे छोड़ दिया तुमने। मुबारक आज आप उसके असली शिष्य बन ही गए इस संदर्भ में। अब आगे आप से आप जैसे झूठे प्रचारकों से बात नहीं हो पाएगी क्योंकि न आपको वेदो का ज्ञान (सोया हुआ सा वैदिक ईश्वर जो दिन रात के बाद जागता है) है, न आर्य समाज का (जो भाष्यभूमिका का पशु वाला मत मानते है ) और न ही दयानंद का (जो नकगामी बता कर गया है) इन सबको आप ने झुठलाया।
और प्रमाण देने पर अलग ही राप अलाप रहे है। आपकी यूरेशियन चुतूरवर्णीय खोपड़ी में सत्य नहीं घुसेगा। मुझे पता है मैने दुम पर पांव रख दिया है अब आप मेरे बाद फिर से पिनक भरे मेसेज करंगे। धन्यवाद। कभी फिर। तब तक आप अपनी किताबें पढ़िए। आज्ञा दीजिए।
प्रश्न:
तुम नंबर एक के बेवकूफ हो। पता नहीं कौन सा गांजा फूंककर आते हो। वो लेख भी तुमने किसी से कॉपीपेस्ट किया है। नरकगामी आदि बातें क्यों लिखी, ये तुम खुद नहीं जानते ।
रही बात प्रचार की, तो हम शठे शाठ्यम् समाचरेत्वा ले आदमी हैं । मैं कुछ नहीं झुठला रहा था। बस ये देखना चाह रहा था कि तुम मूल पढ़ते हो, या कॉपीपेस्ट करते हो। जो साबित होना था, वो हो लिया।
दहेज किधर हराम लिखा है ?? अगर नही तो यकीन मानिए अल्लाह कोई दूरदर्शी नही सिर्फ काल्पनिक पात्र है. यह
"किसी"का दायरा, मुसलमानों तक ही सीमित होता है, काफिर को इन्सान ही नहीं मानता आपका सेल्फ अटेस्टेड प्रॉफेट!
उत्तर:
क़ुरान ने सुरहः अराफ में किसी का हक़ मारने और किसी कि जान,माल,आबरू के खिलाफ ज़्यादती को हराम करार दिया है। अगर दहेज से किसी के माल के साथ ज़्यादती हो रही है या दहेज़ इकट्ठा करने, लेने, देने में किसी का हक़ मर रहा है तो ये हराम ही है। दहेज की और भी कई सूरत हो सकती है जो इन आयात में फिट बैठे।
क्या आप मुझे कोई कोई ऐसा रेफेरेंस दे सकते है जहां किसी एक व्यक्ति विशेष को मुहम्मद साहब ने काफ़िर कहा कहो? नहीं मिलेगा क्योंकि काफ़िर डिक्लेअर करने की अथॉरिटी उनके पास नहीं थी। काफ़िर के जो मायने आम मुसलमान समझता है, वो ग़लत है। काफ़िर के क़ुरान में 3 मायने है। रही बात इंसान न मानने की तो ऐसा नहीं है। बल्कि उल्टे आपके लगभग 2 अरब वर्ष पुराने सेल्फ अटेस्टेड वेद, वेदनिन्दक को इंसान नहीं मानते है। “वृशच प्र वृशच सं वृशच दह प्र दह सं दह” (दुश्मन - वेद निंदक को काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे। [अथर्वेद 12:5:62]
प्रश्न:
मेरे लिए वेद पुराण के कंटेंट मायने नहीं रखते, मैं बस दस धर्मलक्षणों पर चलता हूँ। मैं किताब का बंधा नही हूँ जैसे कोई मुसलमान होता है। रही बात कुर'आन लिखने की, यह मैने मौलानाओं के तफसीरों से ही लिया है। वैसे मुसलमानों में तक़फिरी भरपूर है, एक दूसरे को काफिर तक कह देते हैं अलग अलग मसलक, तो कहना ही क्या? बाकी कुर'आन और मोहम्मद में फर्क क्या, सभी एक्स मुस्लिम तो अल्लाह को मोहम्मद की फेक आइडी ही कहते हैं।
क्या और क्यों बात घुमा रहे हैं? क्या काफिर शब्द कुर'आन में नहीं है? और क्या मुशरिक नहीं है ? उसके मायने क्या हैं, बताईये। बाकी अथर्ववेद भी ठीक लिख नहीं पाते और IRF वाले किसी ने पकड़ाया हुआ एक कॉपी पेस्ट सभी जगह सभी ज़ॉम्बी चेपते रहते हैं।
उत्तर:
यही होता है जब अंधविरोध में। आदमी मेसेज पढ़ने में अपना दिमाग प्रयोग नहीं करता। ऊपर मेसेज में साफ लिखा है कि क़ुरान में काफ़िर के मायने है। और आप फिर भी पूछ रहे हो कि क्या काफिर क़ुरान में है।
बाकी क़ुरान को तो ठीक से आप लिख नहीं पा रहे। और दूसरे से उम्मीद कर रहे है वो सही लिखे। टाइपो होता है। वेद कंटेंट पर बात आप कर नहीं रहे। तो बात तो आप घुमा रहे है। कंहा से कॉपी करते हो। राहुल,अंकुर आर्य से।
प्रश्न:
रही बात कुर'आन लिखने की, अरब कुर'अन, कुर'आन और कुर'अँन (अनुनासिक नही, लेकिन यहाँ बिंदु के बिना उपलब्ध नही) भी कहते मिलेंगे । इराणी शिया क़ुरान या क़ोरान कहते हैं।
उत्तर:
आपके लिए ग्रन्थ के मायने नहीं। 10 धर्मलक्षणों को मानते है। तो ये मनु के धर्मलक्षण कंहा से लिये (वेद में तो एक जगह नहीं है/ मनुस्मृति में शायद हैं मगर वो तो आपके अनुसार मिलवाटी है और स्वयम्भू की है, क्योंकि स्वामी जी अनुसार वैवस्त का काल तो अभी चल रहा है)? उनकी स्मृति से न? तो फिर आप ये कैसे कह सकते है कि आप किताब के बंधे नही। कंट्राडिक्ट कर गए। और मुसलमान क्या, सारे आर्य समाजी वेद से बंधे है, पौराणिक से तो बहुत ज़्यादा। तो आप बंधे होने का उदाहरण सिर्फ केवल मुसलमान का क्यो दे रहे है। अपने समुदाय पर आंख बंद क्यो।
क़ुरान हिंदी में कई तरीकों से लिखा जाता है। क़ुरान क़ से है ना कि क से। आपकी मूल भूल ये है। जिसे पहले आप खुद सुधारे फ़ीर दुसरो की भाषा पर उंगली उठाए।
सनातन धर्म में आरोप प्रत्यरोप कम कंहा है। सनातनी, दयानंद और अनेक वेद भाष्य के एकेश्वरवाद को मिथ्या कहते है और धर्मभ्रष्ट करने वाला। आर्य समाजी उन्हें यही कहते है। सबके मत अलग किसी का एक सा नहीं। कोई कृष्ण को ईश्वर कहता है, कोई राम को। कोई साईबाबा को। कोई किसी और को। वैष्णव और शैव एक दूसरे को क्या कह कर गए है?
बाकी दलित, अम्बेडकरवादी और बुद्धिस्ट लोग अपने छोड़े हुए सनातन धर्म, वेद को फेक, पतनकारी और न जाने क्या क्या मानते है। इसकिये पीछा छुड़ाते आये है हज़ारों सालों से।
प्रश्न:
आपको मनु ही पता है, ये धर्म लक्षण मनु से भी पुरातन हैं। आप लोगों की खामी यह है कि दुनिया की सबसे गंदी और खूंख्वार विचारधारा को दैवी साबित करने निकले हैं क्योंकि अब पुराने तरीके मुमकिन नही। इसलिये आप लोग केवल दूसरों को गलत बताने की गंदे से गंदी कोशिश करते रहते हैं।
कभी सच्चाई से भी मुखातिब होईये, इस्लाम हमेशा एक disaster रहा है। फैलाव और सफलता अलग होते हैं। वह केवल एक रोग है जो इन्फेक्शन फैलाकर अधिकाधिक बलि लेने में सफल रहा है, बाकी कुछ नही।
काहे का बौद्ध खूनी इतिहास! बड़ी वकालत कर रहे हो टकलों की? क्यों न हो! मुहम्मद बिन कासिमआदि मुल्लों के साथ टकलों ने दलाली तो करी ही थी।
औऱ सुनो, बदले में उनको भी इस्लाम ने केवल मौत दी। बख्तियार खिलजी अहिंसक बौद्ध भिक्षुओं को काटता हुआ बिहार उड़ीसा से निकल पड़ा था। ये तकिय्या की दुकान कहीं और जाकर चलाना। मुल्लों ने सदा इस दुनिया में मारकाट और आतंकवाद के सिवा कुछ नहीं दिया है। और आज भी वो यही कर रहे हैं। कौन सा ५००० साल का इतिहास बता रहे हो? तुम्हारे ही लोग कहते हैं कि २००० साल तक मुल्लों ने बाकियों ने शासन किया, तब बौद्धों पर उस समय कौन अत्याचार कर रहा था?
उत्तर:
मनु से भी पुराने लक्षण है तो मनु तो प्रथन मनुष्य था, स्वयंभू। उससे पहले किसने दिए लक्षण जब आरम्भ ही वही है? और वैवस्त मनु ने दिए तो फिर तो ये कहा जा सकता है कि मनु से पुराने है। मनुस्मृति से पहले के है तो उससे पुराने वेदो में दिए है क्या? क्या 4 ऋषियों ने दिए है? फिर वो 4 क्या स्वम्भू मनु से पहले के है?
इस्लाम को तो आप लोग 1400 साल कहते है पर सनातन कितना खूंखार है ये जग जाहिर है। बौद्ध 5 हज़ार वर्ष पुराना इसका खूनी इतिहास बताते है जो आज भी बढ़ता जा रहा है। जो आपके साथ पिछले 5 हज़ार वर्ष से रहते आ रहे है वही ये यह विचार रख रहे तो उनकी बात क्यो न मानी जाए?
प्रश्न:
असहमति,खण्डन,विरोध अवश्य हुआ पर कोई क़त्लेआम नहीं किया गया बौद्धों का ये असत्य है,. यद्यपि कहीं कहीं बौद्धों को शूद्रों में सम्मिलित किया गया था बलपूर्वक ,हाँ, यवन आक्रान्ताओं ने सर्वप्रथम इनका ही नरसंहार किया ऐसा वर्णन मिलता है। झूठे इतिहास के नाम पर ब्राह्मण को विदेशी और झूठा अत्याचार बताकर विक्टिम कार्ड खेलना, इस काम में मुल्ले और टकले दोनों एक हैं। और जब वह किसी मत विशेष का पक्ष ही नहीं लेते, तब काहे ये ५ हजार साल का शोषण कार्ड बता रहे हो? उनको इससे कोई मतलब नहीं। उनको आज इस्लामी जिहाद का खूनी इतिहास और वर्तमान दिख रहा है, इसलिए वो उसका विरोध करते हैं। उनको इससे फरक भी नहीं पड़ता कि बौद्धों का इतिहास क्या था। उनको अभी इस्लामी राक्षसीपन दिख रहा है, इसलिए वो उसकी आलोचना करते हैं।
उत्तर:
दयानद ही लिख के गया है। ये वैवस्त मनु का वर्त्तमान है। सबसे पहला स्वयम्भू मनु का था। इसे ही सभी सनातनी प्रथम मनुष्य कहते है। क्योंकि ये स्वयं से उत्पन्न है, किसी अन्य मनुष्य से नहीं। अब ये बातए दीजिए कि ये 10 लक्षण वेद में कंहा है? मनुमसृति से पहले कंहा पाए गए?
वो तो बाहरी है पर आप तो इसी धर्म के है। आर्य समाजियों पर आरोप आपके ही सनातनी भाई लागाते है कि आप लोग और आपके गुर सनातनी ग्रंथो में खयानत करते है। मनुस्मृति, पुराणों में मिलावट बताते है। वेदों में क्योंकि मिलावट, इतिहास मानना, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना होगा, इसलिए भी वेदो के मनमाने अर्थ निकालते है और एकेश्वरवादी बना देते है। सभी नामों को ईश्वर बना दिया गया।
प्रश्न:
मनु प्रथम मनुष्य कौन कहता है. सुना है आप के लोग गल्फ के हिंदुओं में बाँटने के लिये हिंदु ग्रंथोंमें खयानत कर के छापते हैं और वहाँ विक्रय करते हैं। सबूत नही हैं, लेकिन जिस तरह के फ्रॉड दावे मुस्लिम करते आये हैं कुछ वर्षों से, यह अवश्य कर सकते हैं।
उत्तर:
काहे बिदक रहे हो। फिर मैंने दुम पर पांव रख दिया क्या। बात किसी और से हो रही थी आप फिर कंही से टपक पढ़े जैसे वेद 4 ऋषियो पर पता नहीं कंहा से टपके थे। बेगामी शादी में पंडा दीवाना।
मुल्ल्ले और टकले दिख गए पर अपनी टांट पर उगी सर्पीली चोटी नहीं दिखती, और न पाजामे में डालने वाला नाड़े का यग्योपवित बनना दिखता है।
वो तो कहते है हमेशा से ही विदेशी नस्ल आर्य, हिन्दू और पुष्पमित्र शुंग जैसे कालों में उनका दमन होता आया है। जबकि बाकियों जैसे अंग्रेज़ आदि में उन्हें बमानराज से थोड़ी राहत ही मिली है। धीरे धीरे आपका 5 हज़ार साल का भांडा फोड़के वो दुनिया के सामने लाते ही जा रहे है। जैसे मिथ्या और झूठ और नफरत आप फैलाते हो आपका नाम कुतर्की अय्यार होना चाहिए।
प्रश्न:
कोई उसे प्रथम मनुष्य नही मानता, यह प्रथम मनुष्य की कहानी अब्राहमी है। वैसे भी खुद को अल्लाह और मोहम्मद के गुलाम ही मानते हैं आप लोग और इस्लाम, असल में Mway है, गुलामी का मल्टिलेवल मार्केटिंग। आप को आप के कोल्हू के गधे और बैल मौलाना लोगों ने एक ही पट्टी पढाई है, अपनी फ्रॉड किताब को सब से श्रेष्ठ साबित करो अन्यथा दूसरों की किताबों में मीनमेख निकालो, और कुछ भी कर के चर्चा किताब के विषयपर ही रखो क्योंकि किताब के सिवा इस्लाम के पास मौलिक सोचने की क्षमता ही नही है। दिमागी गुलाम हैं। इन लोगों को इनके कोल्हूके गधे और बैल मौलाना लोगों ने एक ही पट्टी पढाई है, अपनी फ्रॉड किताब को सब से श्रेष्ठ साबित करो अन्यथा दूसरों की किताबों में मीनमेख निकालो, और कुछ भी कर के चर्चा किताब के विषयपर ही रखो क्योंकि किताब के सिवा इस्लाम के पास मौलिक सोचने की क्षमता ही नही है। रही बात मैं केवल भेड़ियों को एक्सपोज करता हूँ। एक तो मैं नार्य समाजी नहीं हूँ, और ना ही पौराणिक हूँ। इसलिए दयानन्द को आप कुछ भी कहें, मुझपर कोई फर्क नहीं पड़ता। आप किसी देवताओं को भी कुछ भी कहें, मुझपर उसका भी कोई असर नहीं होता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप उन्हें काल्पनिक मानते हैं और उनको जो भी कहते हैं, आप का कल्पना विलास मात्र है। लेकिन आप का मोहम्मद कल्पना नहीं है। ये व्यक्ति हो गया था और आज दुनिया के दुखडर्ड का कारण ही उसका जबर्दस्ती से फैलाया हुआ अंधविश्वास है।
उत्तर:
जब से इस ग्रुप में देख रहा हूँ। आप लोगो को आप दूसरे की ग्रंथो,धर्म में कमियां निकाल रहे हो, वर्षों से। सत्यार्थ प्रकाश में यही तो किया है आपके मौलाना दयानद ने। अभी तक मैंने तो क़ुरान को श्रेष्ठ साबित करने के लिए एक शब्द यंहा नहीं कहा। आपने सीधा गढ़ के आरोप लगा दिया। मुझे तो किसी ने पट्टी नहीं पढ़ाई। पर आप लोग एक ही पट्टी और ढर्रे पर चलते दिखायी दे रहे है क्योंकि सारी बातें झुठलाते जा रहे हो सभी। अब मनु की बात भी झुठला दी। जबकि यही सनातनी मत है। हमारी क्या गलती। मैं सभी उत्तर और प्रमाण देता आ रहा हूँ। पर आप ने अपने ही किसी भी मत का जवाब नही दिया। 10 लक्षण वेद में या मनु से पहेले कंहा लिखे है। जवाब हो तो दे दीजिएगा। वरना अब चलता हूँ। किसी ज्ञानी से इसका जवाब लेने। आपके दिए मतों पर मेरे किये गए प्रश्नों का उत्तर की प्रतीक्षा अभी भी रहेगी। गर उत्तर नही थे, तो यंहा रखने भी नहीं थे। जितने भी आरोप लगा रहे है, उसके जैसे आरोप सनातन और आर्यो पर इस्लाम से पहले से ही लग रहे है।
आप जिस तथाकथित नफ़रत का उल्लेख कर रहे है। मुझे आपमें भी वही दिखाई दे रही है। धन्यवाद। प्रश्न उतर समाप्त।
प्रश्न:
इस्लाम एक भेड़िया सोच है, जो देता कुछ नहीं, केवल wanton desruction में माननेवाली एक parasitic predatory विचारधारा है। यह दैवी नहीं है इसका प्रमाण यह है कि यह केवल हिंसा और छल कपात से कब्जा से ही फैला है। इंडोनेशिया का उदाहरण देनेवाले यह नहीं बताते कि राजा को हानी trap करके कन्वर्ट किया था और बाद में जो प्रजा ने जहां प्रतिकार किया वहाँ हिंसाचर किया। यह कभी भी शांति का धर्म नहीं रहा। अगर वाकई ये दैवी होता तो अल्लाह रेगिस्तान में बरसात कराता, मोहम्मद के लिए, सभी खुशी से कन्वर्ट हो जाते. अविश्वासनीय और अतार्किक बातें हर धर्म में निकालेंगी। लेकिन भारत का कोई भी देशज धर्म खुद को दूसरों पर नहीं थोपता, वह भी हिंसाचर से। इस्लाम वही करता है। अगर झूठ हजम नहीं हुआ तो हिंसा का मौका देखता है या फिर और कोई छल कपात से गलबा और दायरा बढ़ाने की हिकमत खोजता है, कुल मिलाकर एक malignant fraud है इसलिए उससे लड़ना कर्तव्य है। आरोप में असत्य हो सकता है, मैने कोई आरोप लगाये ही नही, जो साफ सत्य है वही लिखा है। और मैंने आप कौ उत्तर देने में नफरत का कहाँ उल्लेख किया ?
उत्तर:
धन्यवाद। प्रश्न उतर समाप्त।
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