Wednesday, 10 March 2021

क्या वेदों में ईशवाणी और सनातनी परंपरा में एकेश्वरवादी धारणा कभी नहीं रही?


आजकल कुछ सवाल उठाये जाते हैं कि वेद, सनातन धर्म और भारतीय परंपरा में कभी एकेश्वरवाद रहा ही नहीं है और इसलिए लोग एकेश्वरवादी वेद भाष्य का गलत प्रचार करते हैं, जबकि उसमें केवल प्रकृति पूजा है और वेदो को ईश्वर ने नहीं बल्कि ऋषियों ने रचा है। कुछ हिंदू विद्वानों का भी ऐसा ही मत है।

ग्रंथों, विद्वानों और परम्पराओं से प्रमाण

यंहा फिलहाल प्रथम प्राथमिकता वेद को ईश्वरीय साबित करने की नहीं है। पर वेदों को ले कर प्राचीन काल और सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों या विद्वानों में क्या क्या मत पाए जाते हैं, इस पर पहले चर्चा कर लेते हैं।

यह मानना आधारहीन नहीं है कि संकलन करते हुए और स्मृति आगे बढ़ाते हुए वेद कभी भी प्रक्षिप्त नहीं हुए हो। हालांकि लगभग सभी सनातनी विद्वान यह मानते हैं कि वेदों में कोई मिलावट नहीं हो पाई है। 

एक बात जो बिल्कुल स्पष्ठ है कि वेदों के मूल अर्थात मंत्र संहिता में कंहीं भी मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है परन्तु प्रकृतिपूजा का अवश्य है। साथ ही इनमें एकेश्वरवाद भी उपलब्ध है। वेदों को हमेशा से अपौरुषेय कहा जाता रहा है, अनेकों जगह प्राचीन लेखन में इसका उल्लेख मिल जाता है।

यह सच है कि अधिकतर विद्वानों या संप्रदायों के वेदार्थ एक दूसरे से पूर्णत: या मूलतः अलग अर्थ रखते हैं और आपस में शत प्रतिशत नहीं मिलते। सायण (14वीं सदी) आदि प्राचीन भाष्यकार कर्मकांडी थे और इसलिए उनके वेद व्यख्यान भी उनकी विचारधारा से भिन्न नहीं हो सकते। इसलिये इनका वेदार्थ अन्य प्राचीन विद्वानों की तरह ही बहुदेववाद और कर्मकांडों के इर्द गिर्द ही अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्वामी दयानन्द (19वीं सदी) द्वारा किया गया वेदों का अर्थ पूरी तरह से एकेश्वरवादी है। इन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों को एक ही सिद्ध किया और कहा कि तीनों को बाद में अलग अलग देवता बना दिया गया। यह भी कहा कि इनकी शक्तियों को बाद में इनकी पत्नी बना दिया गया। वैसे भारतीय परम्परा में हर वस्तु (त्रिदेव को भी), एक ईश्वर से ही उत्पन्न माना जाता है। 

यह सत्य है कि स्वामी दयानंन्द ने सम्पूर्ण वेदार्थ को एकेश्वरवाद पर आधारित किया है। उनसे पहले किसी एक भी वेद का भाष्य सम्पूर्ण एकेश्वरवाद पर किसी भी विद्वान का नहीं मिलता है। शायद दयानंद जी के एकेश्वरवादी मान्यता के पीछे वजह ईसाइयत और इस्लाम रहा है। क्योंकि उनके समय तक हिन्दू इन दोनों धर्मों में शामिल होना नहीं रुक पा रहा था। इसलिए उन्होंने इन दोनों धर्मों की मूल मान्यता को वेद से ही निकाल कर सबके सामने रख दिया।

उन्होंने जो वेदों में आए अनेकों नामों या अस्तित्व को ईश्वर का नाम बताया है, इसका कारण यह हो सकता है कि वह ऐसे नामों को न्यायोचित ठहराने के लिए इसके अलावा कोई अन्य उपाय कर ही नहीं सकते थे। क्योंकि वह यह मानना ही नहीं चाहते थे कि वेद में इतिहास और मिलावट हो सकती है। वेदों को उन्होंने 4 ऋषियों को सृष्टि की अनादि में दिया हुआ माना है। वास्तव में वेदों में मनुष्यों के नाम आना उनमें इतिहास पाए जाने का सबूत है। उन्होंने इसलिए ये सभी नाम ईश्वर के नाम बना कर और उनकी मनमानी व्याख्या कर के, वेदों में नज़र आने वाली ऐसी सारी मिलावटों और इतिहास से पीछा छुड़ा लिया। 

यह भी सत्य है कि स्वामी दयानंन्द के सक्रिय होने तक या उनसे पहले भारतीय समाज में और वेदों में से एकेश्वरवाद लगभग गायब हो चुका था परन्तु ऐसा पूरी तरह नहीं से नहीं हुआ था। यानी दयानंद जी से पहले ही एक ईश्वर या ब्रह्म का विचार प्रचलन में था, कम मात्रा में ही सही। भले उस एक के नाम यंहा समय समय पर बदल कर ब्रह्म, परब्रह्म या ईश्वर कहे जाते रहे हों। स्वामी दयानंद के समकालीन रहे वेद विद्वान श्रीपद दामोदार सातवलेकर के वेदार्थ में भी एकेश्वरवाद का विचार मौजूद है।

1.
सबसे बड़ा उदाहरण है, अलबेरुनी (10वीं सदी), जिसने अपनी 'किताबउल हिन्द' में लिखा है कि "यंहा दार्शनिक, मोक्ष मार्ग पर चलने वाले, ब्रह्मविद्या अध्यनन करने वाले गण एकेश्वरवादी हैं, मूर्तिपूजा से दूर हैं और अशिक्षित जनता ही मूर्तिपूजा में संलिप्त है। ब्राह्मण वेदो को लिखे जाने के घोर विरोधी हैं क्योंकि इसको विशिष्ट उच्चारण से बोला जाता है और लेखन उन्हें कतई भली प्रकार नहीं संजो सकता। ये स्मरण के आधार पर आगे बढ़ाया जाता रहा है, इसीलिये ये कई बार स्मृति से खो भी चुके हैं"। (यंहा अलबेरुनी ने वेद मंत्रों के भूल या गुम जाने की बात भी करी है जो वेदों के शतप्रतिशत संजोयें जाने की मान्यता पर एक प्रश्नचिन्ह है)। 

डूबियस ने भी ऐसा ही बयान किया है। भारत यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं सदी) ने भी लिखा है ही वेदों को मैखिक रूप से प्रचलन में रखा जाता था।

इस तरह यह ठोस संकेत मिल जाता जाता है कि वेदों में कांट छांट हुई है, जिसे अब पूर्णत: ज्ञात करना लगभग असम्भव है।

ब्राह्मी लिपि के प्राचीनतम अभिलेख (6ठी सदी ईसापूर्व) के मिलते हैं। ब्राह्मी मतलब ब्रह्मा के मुख से निकली भाषा। ब्रह्मा शब्द बना ब्रह्म से। ब्रह्म या ब्रह्मा शब्द बौद्ध ग्रंथों में आता है जो लगभग 2 हज़ार वर्ष पुराने हैं। बुद्ध ने इस परमसत्ता का विरोध किया था।

2.
भारत में ईश्वर की मान्यता हमेशा से रही है। इंसान का मन भी उस सर्वशक्तिशाली को एक ही कहता है। सगुण और निर्गुण विचारधारा के रूप में दोनों भक्तियां यंहा सदियों से प्रचलित हैं। कैसी भी व्याख्या हो पर फिर भी वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, गीता, रामायण या तारक मंत्र, ब्रह्मसूत्र में एक ईश्वर होने के बीज हर जगह स्पष्ठ रूप से मिल ही जाते हैं। भक्तिकाल (14-17वीं सदी) में भी एकेश्वरवाद पाया जाता है और कबीर, रैदास, नानक, तुलसीदास आदि अनेकों कवियों की रचनाओं में भी।

ब्रह्म सूत्र में एक ईश्वर ही आशय है बस अन्तर इतना है कि वेदांत में ये ब्रह्मसूत्र ईश्वर के सर्व्यापक होने की विचारधारा के साथ साथ चलता है जो अहंब्रह्मास्मि, तत्वमसि आदि जैसे मत भी प्रतिपादित करता है। इसके अलावा उपनिषदों में भी वेदों जैसी तौहीद मौजूद है। कभी भी केवल देवताओं को ही यंहा एकमात्र या पूर्ण सत्य नहीं माना गया है। आज भी ईश्वर की धारणा आम है। 

वैशेषिक दर्शन में वेद को ईश्वरीय वचन माना गया है। आदि शंकराचार्य (8वीं सदी) ने बिना वेद ज्ञान प्राप्त किये अद्वैतवाद का सिद्धांत दिया और प्रकृति को नकारते हुए आत्मा परमात्मा को एक माना। उनके प्रतिपादित किये गए सूत्र ईश्वर की ओर इंगित है।

यजुर्वेद के अंतिम अर्थात 32वें अध्याय में मुख्यता ईश्वर के बहुत से गुणों की ही बात हुई है। बल्कि वंहा पहले मंत्र में ही ईश्वर शब्द का सीधा सीधा उल्लेख है।

3.
ऋग्वेद की ऋचाओं में एकम सद्विपरा मंत्र में आये देवताओं के नामों को लगभग सभी विद्वानों ने एक ईश्वर के नाम माने हैं। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी यही लिखा है। 

वंही सायण आदि प्राचीन भाष्यकारों ने इन्हें अग्नि के नाम बताए है। ऐसा माना गया है कि इस मंत्र में अग्नि को एक कहा गया और अग्नि को ईश्वर का नाम भी माना जाता है। वैदिक संस्कृत व्याकरण ज्ञाता यास्क (7-5वीं सदी ई.पु.) ने निरुक्त (वैदिक शब्दकोश निघंटु की व्याख्या) में लिखा है कि शब्द अग्नि, अग्रणी से बना है और यह पहले स्थूल अग्नि नहीं बल्कि वास्तव में अग्रणी थी अर्थात सर्वप्रथम या सबसे आगे (सबसे पहले). निरुक्त में ही यास्क कहता है कि ईश्वर को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बहुत बाद में यह अग्रणी शब्द अग्नि के अर्थों में प्रयोग होना शुरू हो गया। निघंटु में भी अग्रणी को सबसे पहला कहा है। हालांकि मुझे प्राचीन संस्कृत विद्वान पणिनी की अष्टाध्यायी में अग्नि पर कुछ मिल नहीं सका। यानी दयानंद जी से बहुत पहले ही यास्क एकेश्वरवादी मत के पक्ष में विचार रख गए है। 

सबसे आगे, सबसे ऊपर जो ईश्वर था और उसी की परिक्रमा होती थी और इसी को अग्रणी कहा जाता था जिससे अग्नि शब्द बना और बाद में अग्नि को ईश्वर के एजेंट के रूप में माना जाने लगा और उसकी परिक्रमा शुरू हुई। पारसियों ने भी अग्नि के साथ कुछ ऐसा किया (हालांकि एकेश्वरवादीयों ने अग्रणी या अग्नि को ईश्वर कहा है पर यह भी मान्यता है कि अग्रणी प्रथम सृष्टि थी यानी रुहेकुद्दुस और फिर उसे से ही ईश्वर माना जाने लगा और अंत में अग्नि को ईश्वर का एजेंट)।


4.
गंगा सहाय शर्मा अपने सायण आधारित वेदभाष्य की भूमिका में लिखते है कि वेदो में सूक्त के आरंभ में बातये गए देवता के नाम का अर्थ 'विषय' से है क्योंकि देवता विषय का नाम है। यही मत यास्क ने भी दिया है। यानी सूक्त देवता वह देवता नहीं है जो आम जन समझता है। विद्वान यह भी मानते हैं कि ऋषि मंत्र के दृष्टा हैं, रचयिता नहीं। महर्षि कात्यायन भी कुछ ऐसा ही मानते थे। हालांकि यास्क ने सूक्त ऋषिओं को मंत्र दृष्टा माना है और सायण ने मंत्र कर्ता।

बहुत से आधुनिक विद्वान जैसे वाचस्पति गैरोला भी वेद को ईश्वरीय मानते हैं और सूक्त ऋषियो को संकलनकर्ता मानते हैं यानी वे वेद मंत्र रचियता नहीं हैं।

5.
सायण स्वयं ही ऋग्वेद 10.90.9 की व्याख्या में बताता है कि उस पुरूष से ही ऋक, साम, यजु उत्पन्न हुए हैं। इससे ज्ञात होता है कि वेद ऋषि की रचना नहीं बताई गई है। श्वेतशवतरोउपनिषद 6.18 भी ऐसी ही बात करता है। 

वेदाचार्य रघुवीर वेदालंकार अपनी किताब 'वैदिक साहित्य के इतिहास' में पेज न. 183 पर बताते है कि निरुक्त 7.14 में यास्क एक ही शब्द यानी अग्नि के 3 निर्वचन करते हैं, पहला परमेश्वर, दूसरा यज्ञीक अग्नि और तीसरा भौतिक अग्नि। यह आगे ऋग्वेद के प्रथन मंत्र 'अग्निमीडे' के संदर्भ में बताते हैं कि शतपथ में 10.4.2.5 में परमेश्वर को अग्नि भी कहा गया है। वह यह भी कहते हैं कि भारतीय परंपरा वेदों को अपौरुषय मानती है और पाश्चात्य परंपरा इन्हें ऋषि निर्मित मानती है। 

रामप्रकाश वर्णी अपनी पुस्तक 'सायण और दयानंद की वेदभाष्य भूमिकाएं (परिमल प्रकाशक)' में लिखता है कि सायण और यास्क वेदों को अपौरुषेय मानते थे। यानी अपौरुषेय मानना प्रमाण है कि उसे ऋषि की रचना नहीं मानना। वह यह भी कहते हैं कि सायण इन्द्रादि की स्तुतियों के प्रसंग में परमेश्वर की स्तुति मानते है परंतु भाष्य में देवता के रूप में वर्णन किया है। लौगाक्षी भास्कर ने भी वेदों को अपौरुषेय बताया है। 

रामनाथ वेदालंकार ने अपनी पुस्तक  'वेद भाष्यकारों की वेदार्थ प्रक्रियाएँ' में कहा है कि सायण ने बहुत से मंत्रो को व्याख्या देवता और ईश्वर दोनों प्रकार से की है जैसे ऋग्वेद.9.50.4. वह ऐसी ही बात स्कन्दस्वामी के बारे में भी कहता है जो सायण के पूर्ववर्ती है और वेदों के भाष्यकार हैं।

प्रो. हरेंद्र प्रसाद सिंह पुस्तक 'धर्म दर्शन की रुप रेखा' में लिखते हैं कि "वैदिक काल में देवताओं का कोई स्पष्ठ व्यक्तितव नहीं है और न सुनिश्चित है। वैदिक ऋषि प्रफुल्लित होकर प्राकृतिक दृश्यों को देवताओं का रुप दे देते थे। देवताओं के अनेके असंख्या रहने के कारण वैदिक गण प्रश्न करते थे कि किस देवता को श्रेष्ठ मानकर आराधना की जाए। वेद में कंही कंही दो देवताओं की एक साथ उपासना की गई है। 

डॉ. राधकृष्णन ने 'भारतीय दर्शन' किताब में पृष्ठ 91 पर कहा है कि "हम अनेकेश्वरवाद को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि धार्मिक चेतना इसके विरोध में है। वेद में अनेकेश्वरवाद, हिनोथिज़म और एकेश्वरवाद के उदाहरण मिलते है। अनेकेश्वरवाद की अपेक्षा एकेश्वरवाद से हमारी बुद्धि को अधिक तृप्ति मिलती हैं।"

ऋग्ग्वेद 10.90.9 में 3 वेदों का उललेख है। वेदो और अन्य ग्रंथो में (मनुस्मृति में, गीता में/ महाभारत में, बौद्ध ग्रंथो में और शायद जैनी में भी) कई जगह इन 3 वेदों का ही नाम आता है और कई जगह 4 वेदों का भी आता है। इसलिए जंहा जंहा 3 नाम आते हैं, उन मंत्रों को अथर्ववेद के पूर्व काल के मंत्र माना जाता है और इस आधार पर ही अक्सर विद्वानों में 2 मत पाए जाते हैं कि मूल वेद 3 ही थे और चौथे वेद यानी अथर्ववेद को बहुत बाद में लिखा गया। इस बात में दम भी लगता है क्योंकि हम जानते हैं कि अथर्ववेद की भाषा अन्य 3 वेदों से सरल और कम जटिलता वाली है जिससे विद्वानो के इस मत को प्रबलता मिलती है कि उसे बहुत बाद में लिखा गया, क्योंकि भाषा समय के साथ अपनी प्राचीन शैली खोती चली जाती है। यह वैसे ही जैसे वेदों की संख्या को लेके भी कुछ मतभेद है। कुछ कहते है कि प्रारम्भ में एक ही वेद था जिसके व्यास ने 4 भाग कर दिये जबकि दुसरा मत यह है कि 4 वेद हमेशा से अलग अलग ही थे। हालांकि यह सिद्ध है कि ऋग्वेद की ऋचाओं अन्य 3 वेदों में पाई जाती हैं या उसमें दोहराई गई हैं। बाकी वेदों में भी कुछ मंत्र समान हैं।


बुद्धि, तर्कों और इतिहास से प्रमाण।

अब वेदों में ईश्ववाणी पाए जाने को साबित करने की ओर चलते हैं। कुछ इस्लामी रिवायतों से पता लगता है कि आदम यानी स्वयम्भू मनु भारत भूभाग में उतारे गए थे। भारतीय और इस्लामी ग्रंथों की तहक़ीक़ से पता लगता है कि नूह यानी वैवस्त मनु भारत के बाशिंदे थे। ह. नूह को पहली शरीयत अता की गई थी। यंहा भी मनुविधान या मनुस्मृति को प्रथम नियमावली माना जाता है। अधिकतर इसे स्वयम्भू मनु को दिया हुआ मानते है परन्तु इसमें वर्णित विस्तृत समाज और गहन नियमों का जायज़ा लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह वैवस्त मनु का ही ग्रंथ हो सकता है जिसमें बाद में संशोधन होते गए होंगे। वैवस्त मनु प्रलय से संवत भी जुड़ा है। मनुस्मृति में बेहद मिलावट हुई है क्योंकि कुल 14 मनु कहे जाते हैं और न जाने किसके काल में क्या क्या इसमें घुसाया गया होगा। इन 14 मनु में प्रथम और सातवें मनु ही मूल मनु हैं बाकी दोनों के बाद आने वाले 6-6 मनु दरअसल इन दोनों की ही संतति हैं। ये सब बातें वेदो में ईश्ववाणी होने की संभावना बताती हैं। 

इसके आलवा दुनिया में सिर्फ यही क़ौम है जो सबसे प्रथम ईश्वरीय ग्रंथो के होने का दावा करती है। हालांकि प्रथम एकेश्वरवादी धर्म जरथुस्त्र धर्म माना जाता है। इन दोनों धर्मों, समुदायों में क्या समानता या भिन्नता है, इस पर कभी और चर्चा करंगे। वेदों को सर्वप्रथम धर्मग्रन्थ माना जाता हैं और ईश्वरीय भी। इसीलिए वेदो को आदिग्रन्थ भी कहते हैं। क़ुरान आदिग्रंथों की तरफ इशारा करता है और उन्हें ज़बूरुल अव्वलीन कहता है जिसका मतलब होता है प्राचीनतम ग्रन्थ, वो भी बहुसंख्या में। ये अरबी का शुद्ध संस्कृत अनुवाद है।

ईश्वर ने सभी समुदायों को ग्रँथ दिए हैं। किसी समुदाय के ग्रन्थ पूर्णतया या तो बचाये नहीं गए या हमें कभी ईश्वर की तरफ से उनकी पुष्टि नहीं कि गयी कि फलां क़ौम की मौजूद ग्रंथ पूर्णतया मेरी वाणी है। यही ईश्वर का विधान था और उसे यही स्वीकार्य था। क्योंकि क़ुरान सुरक्षित होना था सैदव के लिए। इसलिए उसे बचाया गया और इसकी पुष्टि भी की गई। आरंभिक काल में अवतरित होने के बाद, इतने लंबे समय तक यानी वर्तमान तक वेदों या किसी भी ग्रंथ का शुद्ध रूप में बच पाना सम्भव ही नहीं है।

वैसे कुछ विद्वानों का मानना है कि बाइबिल में आज भी तौरेत और इंजील सही शक्ल में मौजूद है। हालांकि बाइबल को पूर्णतया कोई भी गैर ईसाई व्यकि, ईश्वरवाणी नहीं मानता। जबकि उसमें बहुत से नबियों के सहिफे, हिदायत और किताबें हैं। बाइबिल में इंसानी गॉस्पेल, ईसाईयों की कहानियां भी मिक्स है। बाइबिल एक मिलवाटी ग्रन्थ है। फिर भी आमतौर पर हज़रत ईसा को दी गई किताब को बाइबिल कह दिया जाता है। उसी तरह वेदो को भी ईश्वरीय कहा जा सकता है जबकि उसमें बहुत मिलावट मौजूद है। बाइबिल की तरह वेदों में मिलावट ढूंढना उतना आसान नहीं है। क़ुरान इसके लिए कसौटी है।

क़ुरान के अलावा आज किसी भी ईश्वरीय ग्रन्थ में तौहीद शुद्ध रूप से उपलब्ध नहीं है। पर फिर भी ये माना जाता है कि उनमें असलतन पहले तौहीद रही थी। तो यही बात वेदों के बारे में क्यों नहीं कही जा सकती? वैसे भी वेदों को कोई भी मुसलमान पूरा का पूरा इल्हामी नहीं मानता। यंहा तक कि कुछ सनातनी विद्वान भी इनमे मिलावट मानते हैं। वेदो में यक़ीनन मिलावट हुई है, ऐसा बहुत से हिन्दू विद्वान भी मानते हैं। जैसे अधिकतर बाइबिल (नए विधान) को हज़रत ईसा के साथियों ने लिखा है और उसमें इंजील भी है। उसी तरह वेदों को ऋषियो ने ही अधिकतर लिखा है पर हो सकता है उसमें थोड़ी ईश्वरवाणी हो।

हर धार्मिक का मन हमेशा कहता है कि ईश्वर एक है। ईश्वर किसी क़ौम के साथ ऐसा कर ही नहीं सकता कि अपना परिचय या संदेश न दे। यक़ीनन भारत जैसे बड़ी क़ौम को भी दिया होगा। यही कारण है बहुदेववादी होने के बावजूद हिन्दू क़ौम एक सर्वोपरि ईश्वर को जानती है, भले ही व्यवहारिक तौर पर उसे पूजती न हो। आज भी अधिकतर हिन्दू जनता सभी देवताओं को पूजने के बावजूद ईश्वर को सबसे ऊपर स्थान देते हैं और यही मानते हैं कि बाकी सब उससे ही बने या उसके ही रूप है। त्रिदेव को भी एक ईश्वर से ही उपजा माना जाता है।

कहा जाता है कि वेदों में ईश्वर का ज़ाती नाम नहीं है। पहली बात ईश्वर का ज़ाती नाम होता ही नहीं है। दूसरी बात मान लिया कि ईश्वर का व्यक्तिगत नाम वेदों में नहीं है पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तो वेदों में हैं।  वैसे आर्य समाजी कहते हैं कि ओम उसका निजनाम है और ब्रह्म भी उसका के नाम है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी ये एक ही ईश्वर के गुणवाचक नाम मानते हैं। वेद में उसके पुरूष और प्रजापति आदि जैसे नाम भी बातए गए हैं। ये हो सकता है कि प्राचीन समय में जब हमारी जैसे समृद्ध भाषा नहीं थी, ईश्वर को ऐसे ही नामों से पुकारा जाता हो और बाद में इन नामों को अन्य अर्थों में भी प्रयोग होना प्रारम्भ हो गया हो। ये भी संभव है कि वेदों में ईश्ववाणी रही हो और हज़ारों वर्षों के अंतराल में उसकी व्याख्या बदल कर बहुदेववादी हो गई हो। इस्लामी फ़िक़्ह की तरह सनातनी विद्वान या पम्परायें भी अपने मतानुसार वेदार्थ कर सकती हैं। जैसे अल्लाह को भी अकबर और कबीर कहा जाता है। ढेरों नाम ईश्वर के कहे जाते हैं। इनमें कौन सा नाम वाकई वैदिक काल में ईश्वर का था कोई यकीन से नहीं कह सकता और न इनकार कर सकता है।

वेदों में 'इलास्पद नाभा पृथ्वी' वाला मंत्र क़ुरान में क़ाबा के ज़िक्र वाली आयात से मेथेमैटिकली टेली होता है। वेदो में क़ुरान की तरह ही एक दुनिया और आसमान के विच्छेद होने की बात कही जाती है। मनुस्मृति में प्रथम मानव भ्रूण का अंडे जैसा अस्तितव वैसा ही बताया जैसे क़ुरान बताता है। दोनों ग्रंथों की आयतों और मंत्रो के अर्थों में ऐसी अनेकों समानता हैं। यानी अगर यह मान भी लें कि वेदों को मनुष्य ने रचा है तो वेदों को लिखने वालों तक ईश्वर की बात कैसे न कैसे पहुंची तो थी, भले ही सीधी नहीं तो गुरुओं के द्वारा ही सही।

अल्लामा सय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब पर राय।

तारिक़ साहब ने वेदों में खुद आस्था रखने की बात कही है। साथ ही 'वृश्च्य' वाले मंत्र को भी स्वीकार है। जब वह सारी की सारी हदीसों को ही शतप्रतिशत सही नहीं मानते हैं तो वेदों को कैसे पूरा सही मान सकते हैं। वह क़ुरान के ज्ञाता हैं। उन्होंने शब्दार्थ के साथ वेदों के 3 भाष्य पढ़े हैं, सभी उपनिषदों को भी पढ़ा है। उन्हें वेदों में कुछ न कुछ तो ऐसी समानता मिली होंगी जो ईश्ववाणी में मिलना आम है या संभव है।

तारिक़ साहाब ट्रांस की हालत में रहते हैं, हम और आप उनका इन चीज़ों में मुकाबला नहीं कर सकते। 2026 के वक़्त पर इख़्तेलाफ़ हो सकते हैं पर यंहा तब्दीली तो आनी ही है। राजनैतिक और सामाजिक परिवेश पर नज़र बनाये रखने वाले भी ऐसा अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हैं। तारिक़ साहाब की अभी तक बहुत सी भविष्यवाणीयां सच निकलती आ रही हैं और उनके तरीके पर लोग समानता या ईश्वर के सच्चे धर्म की ओर आते भी हैं। हिन्दू भाइयों को उन्हीं की किताबो से पैग़ाम देना ज़ुरूरी है और आसान भी। मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब ने तारिक़ साहाब को शायद अपनी एक्सटेंशन बताया है। वैसे लोग उन्हें उनका रूहानी शागिर्द मानते ही हैं। अल्लाह का पैगाम दूसरों को देने से बेहतर भला और क्या काम हो सकता है और भारत में जारी माहौल में यही एकलौती आशा भी है।

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वेदादि और भारतीय सभ्यता में एकेश्वरवाद की धारणा रही है और ये आज भी मौजूद है और हमेशा रही है। यहाँ इतिहास, हिन्दू ग्रंथो, विद्वानों के कई सबूत दिए गए हैं और एक उदाहरण अलबेरुनी का दिया गया है। इसी तरह भक्ति काल  के कई कवियों का नाम का वंहा ज़िक्र है जो अधिकतर गैर मुस्लिम ही थे, बल्कि कई भक्तिकाल काल के कवियों आदि के नाम नहीं हैं, उन्हें भी सब जानते ही होंगे जैसे कबीर। मुस्लिम कम से कम इन दोनों नामों के विचारों को तो मानेंगे की वेदों में क्या है, गैर मुस्लिम की तो मानने से रहे।

मूल आस्थाओं में परिवर्तन और बिगाड़ तो समय के साथ आ ही जाता है चाहे मुसलमान ही क्यों न हो। सवाल था कि वेद और यंहा की संस्कृति में दयानन्द जी पहले एकेश्वरवाद था या नहीं? वेदों और अन्य ग्रंथो में यह था। अद्वैतवाद वेदों में सीधा सीधा मौजूद ही नहीं लगता है, यह तो बाद में दर्शन की उपज है। ज़ाहिर है बाद में बिगाड़ हुआ है। 

गंगा गप्रसाद को आर्य समाजी कहकर कोई उसके तथ्य भले ही नहीं माने मगर सायण विरोधी होने के बावजुद उसने सायण के बारे में बनाये गए कई आर्य समाजी भ्रम स्वयं तोड़े हैं जैसे कि एक तो यही है कि सायण ने वेदार्थ करने के लिए निरुक्त को आधार नहीं बनाया था। हम सभी जानते हैं कि निरुक्त में ईश्वर की स्पष्ठ धारणा मौजूद है। खैर मतलब ये था कि इनके सिर्फ आर्य समाजी होने से इनके प्रमाण खारिज नहीं हो जाते। नहीं तो फिर मुझे पहले ही कॉमेंट में आपके सारे वेदों पर दिये तर्क खारिज कर देने चाहिए थे क्योंकि आप एक मुस्लिम हो, न कि हिन्दू।

इसलिए अब मैं आपको एक सनातनी संस्कृत विद्वान डॉ रामप्रकाश वर्णी की किताब, 'आचार्य सायण और स्वामी दयानंद सरस्वती की वेद भाष्यभूमिकायाएं' से कुछ बातें और संदर्भ दे रहा हूँ। आप खुद इनसे संदर्भ लेके मूल संस्कृत में ढूंढ लीजिए। या इनकी मान लीजिये क्योंकि ये भी संस्कृत और वेद विद्वान हैं। इसी किताब में एक और तथ्य ये भी लिखा है कि यजुर्वेद (17:91) के जिस मंत्र में अनेकों अंगों वाले वृषभ का उल्लेख है, उस वृषभ को रामानुज (10-11वीं सदी) ने ईश्वर माना है। सायण वेदार्थ संस्कृत में है और विशुध्द हिंदी में उनका पूर्ण अनुवाद मिलना बेहद मुश्किल है। जगह जगह कुछ मंत्रों के अनुवाद तो मिल जाते हैं। 

मगर हम जैसों को तो सीधा उनके हिंदी अनुवाद की बजाय अन्य विद्वानों की उनके बारे में किये गए लेखन, किताबो से जानकारी लेनी पड़ती है। अब या तो आप यह कहना चाह रहे हैं कि आप इन सभी लोगों से बड़े विद्वान या संस्कृत ज्ञाता हैं या फिर आप ये तथ्य किसी भी हाल में मानना ही नहीं चाहते। 

रही बात सूक्तों कि तो ये दावा तो हम में से किसी ने किया ही नहीं  है कि पौराणिकों के वेदार्थों में ऐसे अनेकों एकेश्वरवादी सूक्त हैं। मैंने पहले भी लिखा है, ऐसे मंत्र हैं, मगर कम मात्रा में। हालांकि दयानंद जी ने हर सूक्त ही ईश्वर से जोड़ा है। ये तो ऐसा ही जैसे कोई कहे कि मुझे हलवे में से चीनी निकाल कर दिखाओ।

वेदों में एक ईश्वरवाद नहीं है और दयानंद से पहले यंहा यही भावना विद्यमान भी नहीं थी, ये दोनों ही सवाल के जवाब वही हैं कि ये धारणाएं थी मगर कम। एकेश्वरवाद यंहा पर कोई नई बात नहीं, हां मगर ये आम जन में आम बात नहीं थी, पिछली कई सदियों से।

सायण एकश्वरवाद की धारणा से अनजान नहीं थे और उन्होंने भी बहुत से वेदों में आए नामों को ईश्वर का नाम माना है, वैसे ही जैसे यास्क आदि अनेकों ऋषियों ने माना है। सिर्फ आर्य समाजी होने के नाते उनके विद्वानों को भी ठुकरा रहे हैं जबकि आप खुद एक मुस्लिम हो कर सनातनी मान्यतों पर अपने विचार प्रचारित कर रहे हैं जबकि आप से पहले ये अधिकार अगर किसी गैर सनातनी को देना ही हैं तो वो आर्य समाजी तो हो सकते हैं मगर कोई मुस्लिम कतई नहीं। इसलिए मैं भी उन्ही के विचार रख रहा हूँ। 

वृषभ वाला उदाहरण आप फिर से गलत समझे हैं। वो इसलिए रखा था कि वह यह सपष्ट रूप से सिद्ध कर रहा है कि  ईश्वर कि मान्यता और वैदिक नामों को ईश्वर के नाम मानने की मान्यता स्वामी दयानन्द से पहले ही यंहा चलन में है।

रही बात श्रीराम शर्मा जी के वेदार्थ कि तो उससे प्रमाण मैं आपको जल्दी ही देता हूँ,  बल्कि आप कहे तो सायण आधारित अन्य वेद विद्वानों के भी ऐसे ही प्रमाण दे दूंगा।

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पतंजलि के योगसूत्र या योग दर्शन में ईश्वर का उल्लेख मुख्य रूप से दूसरे पाद (साधनपाद) में किया गया है। यहाँ ईश्वर के संदर्भ में एक प्रमुख सूत्र है:-

 
योगसूत्र 1.23
ईश्वरप्रणिधानाद्वा।
ईश्वर प्रिणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) से भी समाधि प्राप्त की जा सकती है।

योगसूत्र, समाधिपाद, 1.24
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।
ईश्वर को विशेष पुरुष (अद्वितीय आत्मा) कहा गया है, जो क्लेश (दुःख), कर्म (कर्मफल), विपाक (कर्मों के फल का परिपक्व होना) और आशय (अंतरात्मा के संस्कार) से परे है।
[जो अविद्यादि क्लेश, कुशल अकुशल, इष्ट-अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष 'ईश्वर' कहाता है।]
 
योगसूत्र 2.45
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।
ईश्वर प्रिणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) से समाधि की सिद्धि प्राप्त होती है।
 
पुरुषः पुरिषादः पुरिशयः पुरयते वा । पूरयत्यत्तरित्यन्तर पुरुषम् अभिप्रेत्य।।
(निरुक्त २/३)
इस भौतिक शरीर में रहने से जीवात्मा पुरुष है, ब्रह्माण्ड में व्यापक होने से ईश्वर पुरुष है।

इन सूत्रों से स्पष्ट होता है कि पतंजलि ने ईश्वर को एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में स्वीकार किया है और उसकी भक्ति या समर्पण से योग साधना में उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

चित्त की वृतियों (मन की गतिविधियां या गतियां) को निरोध करना ही योग है। पतंजलि अनुसार वो हैं, प्रमाण (सही ज्ञान), विपर्यय (भ्रांति), विकल्प (अवास्तविकता), निद्रा, स्मृति। इन पांचों वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण करना ही योग का मुख्य उद्देश्य है, जिससे मन को शांत और स्थिर किया जा सके। यह स्थिति समाधि कहलाती है, जिसमें आत्मा का साक्षात्कार होता है और अंतिम मुक्ति प्राप्त होती है। पतंजलि का योगसूत्र योग की विभिन्न विधियों, जैसे ध्यान, धारणा, और समाधि के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर मार्गदर्शन करता है। 

चित्त की वृत्तियों का निरोध योग का मुख्य उद्देश्य है, और इसके द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण लाभ और अवस्थाएं प्राप्त होती हैं:

समाधि: समाधि एक ऐसी अवस्था है जहां मन पूरी तरह से एकाग्र और स्थिर हो जाता है, और आत्मा का साक्षात्कार होता है। इसमें व्यक्ति अपनी सच्ची स्वाभाविक अवस्था का अनुभव करता है, जिसे "स्वरूप" कहा जाता है। इसीलिए ये समझना बेहद आसान है कि आत्म साक्षात्कार ही आत्मा के मूल से जुड़ना है और वो मूल ही ईश्वर है।

कैवल्य: योगसूत्र के अनुसार, चित्त की वृत्तियों का निरोध अंततः कैवल्य या मोक्ष की ओर ले जाता है। यह आत्मा की स्वतंत्रता की स्थिति है, जहां आत्मा सभी प्रकार के कष्टों और बंधनों से मुक्त हो जाती है। आस्तिक दर्शन में मोक्ष से ही ईश्वर प्राप्ति है।

ज्ञान: चित्त की वृत्तियों का निरोध करके व्यक्ति गहरे आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की स्थिति प्राप्त कर सकता है। यह स्थिति व्यक्ति को संसारिक भ्रम और अज्ञानता से ऊपर उठाकर वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाती है। दर्शन शास्त्रों में वास्तविक ज्ञान उस एक परमसत्य को ही कहा गया है।

ईश्वर की प्राप्ति भी पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित है। जैसा ऊपर बताया गया है कि योगसूत्र में पतंजलि कहते हैं: ईश्वर की प्राप्ति योग के अभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसके माध्यम से व्यक्ति उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर सकता है।

इस प्रकार, चित्त की वृत्तियों के निरोध से समाधि, कैवल्य, आत्म-साक्षात्कार, और ईश्वर की प्राप्ति जैसी उच्चतर आध्यात्मिक अवस्थाएं प्राप्त होती हैं।

ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, आत्मा में अंतर है। मगर आम जन में पहले 3 को एक ही मानते हैं। दूसरी बात है कि किसी भी प्रामाणिक ग्रंथ में आपको ईश्वर और परेमेश्वर में भेद करने वाली व्याख्या नहीं मिलेगी। ईश्वर के लिए परमात्मा शब्द प्राचीन ग्रंथों में ही नहीं है। 

योगसूत्र में ईश्वर शब्द मौजूद है जैसे ऊपर संदर्भ दिए गए हैं। और उन सभी संदर्भों में ईश्वर की वही परिभाषा बताई जा रही है, जिसे लोग आमतौर उस एक सर्वशक्तिमान की ही मानते हैं। सो यह तो सिद्ध हो गया कि योग में ईश्वर या परेमेश्वर की धारणा स्पष्ट मौजूद है। 

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सबसे प्राचीन शब्द ब्रह्म है, अगर ईश्वर के लिए सीधे अर्थों में समझे तो। मैं अभी दर्शन या इसकी व्याख्या में नहीं जा रहा। वैदिक साहित्य में ब्रह्म शब्द आया है। इसके बाद जब दर्शन, फलसफा आदि का समय आया तो भिन्न भिन्न व्याख्या और मत उभरे और फिर ब्रह्म से परब्रह्म हुआ। परब्रह्म, का शाब्दिक अर्थ है सर्वोच्च ब्रह्ममोटे मोटे  तौर पर दोनों एक ही है। जैसे अल्लाह की सिफ़त पर अलग अलग मसलक/फिरके थोड़ी बहुत अलग राय रखते हैं। बस हिन्दू धर्म में नाम में भी जोड़ तोड़ कर दी गई, यही फ़र्क़ है। 
 
इसी तरह प्राचीन ग्रंथों में ईश्वर शब्द आया है परंतु फिर बाद में जब ईश्वर शब्द को इंसानी गुणों के समानांतर प्रयोग होना शुरू हुआ तो, योगेश्वर, वानेश्वर,  लंकेश्वर जैसे शब्द बने। इस तरह ईश्वर को इन मानवीय चरित्रों से अलग करने के लिए ईश्वर में परम जोड़ कर परमेश्वर कर दिया गया। हालांकि साधारणत: दोनों शब्द उसी के लिए प्रयोग होते आए हैं। 

किस ग्रंथ का क्या काल रहा होगा, इसे आप इससे समझ सकते हैं कि दर्शन के ग्रंथों (न्याय दर्शन, मीमांसा दर्शन आदि) में रामायण और महाभारत के चरित्रों का उल्लेख है जैसे ब्रह्मसूत्र में राम, हनुमान और योग दर्शन में कृष्ण का।
  
वेदों, उपनिषदों , सांख्य सूत्र/दर्शन (3.82) आदि में ब्रह्म शब्द मौजूद है। दर्शन शास्त्र में परब्रह्म शब्द है। न्याय सूत्र/दर्शन (2.1.11), वाल्मीकि रामायण में (1.2.30) में, महाभारत (12.110.36) में, गीता (10.12) में भी परम ब्रह्म शब्द आया है। 

यजुर्वेद 40:1 में ईश्वर शब्द आया है। योगसूत्र में (1.23-24) में ईश्वर शब्द मौजूद है। वाल्मीकि रामायण (अरण्य कांड 3.30.3) में ईश्वर शब्द आया है। मनुस्मृति में (12.123) में ईश्वर शब्द आया है और उसके गुण भी। गीता (18.61) में भी ईश्वर शब्द आया है। महाभारत में परमेश्वर शब्द और उसके गुण आए हैं, जैसे शांतिपर्व 12.204.13, 12.201.15, अनुशासन पर्व 13.14.41. 



● Al Beruni:

1 comment:

  1. हज़रत अल्लामा सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब की ट्राँस और उनकी भविष्यवाणियों के बारे में मेरी राय

    मोहतरम अल्लामा सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब एक ग्रेट स्कालर हैं, मुख़्लिस हैं और इस दौर में बहुत लोगों का एक बड़ा सहारा हैं। अल्लामा साहब बहुत सी ख़ूबियों के मालिक हैं और यह बात मैं अपने ज़ाती तजुर्बात से जानता हूँ। बरसों मुझे उनकी शफ़क़्क़्त और इल्मी सोहबत हासिल रही है। इस ऐतराफ़ के बावुजूद मैं यह कहना चाहूंगा कि

    इस लेख में लिखा गया है कि अल्लामा सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब ट्राँस में रहते हैं और उनकी अधिकतर भविष्यवाणियां सत्य सिद्ध हुई हैं।

    हज़रत जी किस प्रकार की ट्राँस में रहते हैं? यह ब्लाग लेखक ने क्लियर नहीं किया है। दूसरी बात यह है कि ट्राँस का सत्य से कोई यक़ीनी संबंध नहीं है। ऐसा नहीं है कि एक व्यक्ति ट्राँस में रहता हो और जब भी वह अपने मन की दुनिया में जाए तो वहाँ से वह हमेशा कोई सच लेकर ही लौटे। अगर ऐसा होता तो सारे हिप्नोटिस्ट ट्राँस में जाकर भविष्य देख लेते।

    राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात जुड़े हुए हैं और संघ आदि संगठनों के बहुत से विचारकों ने 80 वर्ष पूर्व ही अपनी किताबों में लिख दिया था कि उनके अनुयायियों को भविष्य में क्या करना है? उनके अनुयायी आज वही कर रहे हैं और उनके पुराने लेख पढ़कर कोई भी बता सकता है कि कौन क्या करने का संकल्प रखता है। इसके लिए ट्राँस में जाने की ज़रूरत नहीं है।

    जैसे कि मैं 30 साल पहले अख़बारों में पढ़ता था कि भविष्य में अंधाधुंध वृक्ष कटने के कारण हिमालय पर जमे ग्लेशियर्स पिघल जाएंगे और पहाड़ों पर बनी झीलें फटेंगी और उनका पानी नीचे आएगा।

    मैंने 8 साल पहले पुराने वैज्ञानिकों के अनुमान पर भविष्यवाणी की और सबने ऐसा होते देखा। मैं किसी ट्राँस में नहीं गया बल्कि पुराने लेख पढ़े कि पुराने समय में एक्सपर्ट भविष्य के विषय में क्या कहते थे?

    एक्सपर्ट्स के अधिकतर अनुमान सच होते हैं। सो कोई भी व्यक्ति दुनिया का भविष्य जिस क्षेत्र में जानना चाहे तो वह उस क्षेत्र के एक्सपर्ट के 30-40 साल पुराने लेख पढ़े। फिर उनका बुद्धिपूर्वक विश्लेषण करके बता दे कि भविष्य में यूँ होगा।

    इससे भी आसान मिसाल यह है कि अगर आप 2 लोगों को लड़ते देखो तो यह देखो कि कौन सा आदमी लड़ने में ज़्यादा शक्ति रखता है, किसके पास डंडा है और कौन निहत्था है। इसके बाद अनुमान से ठाडै (ताक़तवर) के पक्ष में विजय की भविष्यवाणी कर दो। डंडे वाला कमज़ोर को 2-4 डंडे जमा ही देगा।

    आपके ट्रेंड वर्कर्स सब जगह फैला देंगे कि हज़रत जी ट्राँस में रहते हैं। इसलिए सच्ची भविष्यवाणी करते हैं जबकि यह बिल्कुल साफ़ नज़र आने वाली हक़ीक़त है।

    इसी तरह ब्लाग लेखक ने यह नहीं बताया है कि हममें आर्य समाजी और हिंदुत्ववादी विचारधारा की पुस्तकों के सबसे अधिक ज्ञानी हज़रत जी ही हैं। उन्होंने सभी पुराने विचारकों की पुस्तकें पढ़ रखी हैं। उन्होंने हेडगेवार और सावरकर आदि सबके संकल्प पढ़ रखे हैं कि वे भविष्य में कैसे भारत का निर्माण करना चाहते थे और उसमें मुस्लिमों का क्या स्थान सोचते थे!
    और अब तो इस तरह के नारे खुलेआम लगाए जा रहे हैं कि जब मुल्ले काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे।
    ऐसे में हज़रत जी वहीं से पढ़कर ठाडै (ताक़तवर) के पक्ष में भविष्यवाणी कह देते हैं।

    हज़रत जी की एक भी बड़ी भविष्यवाणी का संबंध ट्राँस से नहीं है। कई बार ट्राँस में झूठ और कचरा हाथ आता है जैसा कि सपनों में होता है। हर सपना सच्चा नहीं होता। ऐसे ही ट्राँस में जो बात पता चले वह हमेशा सच नहीं होती।

    अब सब कर सकते हैं भविष्यवाणी।
    शुक्रिया!
    -Anwer Jamal

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