क्या महाशिवरात्रि आरंभ में एक धार्मिक त्योहार था या सांस्कृतिक भौगोलिक ?
विज्ञान बताता है कि अगर चांद न हो तो पृथ्वी पर बहुत सी चीज़ें खत्म हो जाए जैसे वनस्पति आदि। पृथ्वी और चांद की परस्पर स्तिथि का प्रभाव धरती पर अनेकों रूपों में पड़ता है। चांद की ग्रेविटशनल फ़ोर्स पृथ्वी पर मौजूद पानी को ऊपर खींचता है। इसलिए पृथ्वी की चांद की विशेष स्तिथि से ही समुद्र में ज्वारभाटा आता है। वैज्ञानिक बताते है कि मंगल ग्रह पर पानी था पर कंहा गया पता नहीं। पृथ्वी का पानी भी चांद खींचने की कोशिश करता है पर बहुत से अन्य का कारणों के चलते वापिस छोड़ देता है। यानी अगर छोड़े न तो ऊपर चला जाएगा।
चन्द्र या लूनर कलेंडर के प्रत्येक महीने के मध्य में एक रात ऐसी आती है जब पृथ्वी और चांद की स्तिथियों के कारण चांद की ग्रेविटशनल फोर्स पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रभाव दिखाती है। रिसर्च में पाया गया है कि इसका सर्वाधिक प्रभाव पानी पर पड़ता है और इस रात धरती पर पानी ऊपर की तरफ उठता है। और फरवरी-मार्च महीने में आने वाली एक रात को सबसे अधिक फ़ोर्स प्रभाव दिखाती है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस समय लहरें 5-7 फ़ीट ऊपर उठती है। इसलिए एनीमल बेहवीयरिस्ट ने ये पाया है कि इन दिनों में कमज़ोर जानवरों को बड़े जानवरों पर हमला करते हुए भी पाया गया है।
हज़ारों वर्षों से महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। महाशिवरात्रि कोई धार्मिक त्योहार नहीं है। ये एक खगोलीय घटना है। ये मूलतः एक एस्ट्रोनॉमिकल और जियोग्राफिकल इवेंट है। हर महीने आने वाली इसी रात को ही शिवरात्रि कहा गया और साल में सबसे बड़ी ऐसी रात को महाशिवरात्रि कहा गया। पूरे साल में 12-13 शिवरात्रि आती है। हर महीने एक शिवरात्रि आती है। ये महीने की 14वीं रात को आती है। अमावस्या से ठीक एक दिन पहले जिस दिन चांद बिल्कुल बारीक़ नज़र आता है उसे ही शिवरात्रि कहा गया। यानी जब चंद्र कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष में जा रहा होता है (the last day of wanning moon and the first day of waxing moon). फरवरी के अंत और मार्च के आरंभ में आने वाले शिवरात्री को महाशिवरात्रि कहा गया। क्योंकि इस दिन चाँद की ग्रेविटशनल फ़ोर्स अत्यधिक होती है। इस दिन के बाद ही सर्दियों का मौसम गर्मियों में बदल जाता है।
भारतीय पंरपरा में मनुष्य को पंचतत्व से बना माना गया है जो है मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। हमारे शरीर में 72% पानी है। क्योंकि सभी जीवों का शरीर में पानी से बना है। प्राणियो के शरीर में मौजूद पानी शिवरात्रि वाले दिन ऊपर की और उठता है। इससे शरीर में शक्ति और ऊर्जा बढ़ती है। इस दिन विभिन प्रकार के लोगों पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है। विवाहित, अविवाहित, सन्यासी पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है। तभी सन्यासी लोग इस दिन ध्यान या योग करते है। पेड़ पौधों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
इस रात में शरीर को सीधा रखना है लिटाना नहीं है। लेटने से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और सीधे बैठेने से सकारात्मक क्योंकि ऊर्जा नीचे से सर तक पहुंचती है। स्पाइन सीधी रहनी चाहिए यानी नैचुरल, न ज़्यादा ढीली न ज़्यादा तंग। आसन में स्थिर रहने से प्रभाव पड़ता है। ये इसलिए किया जाता है ताकि हमारा कांशसनेस, यूनिवर्स की कांशसनेस के कांटेक्ट में आ जाए या जुड़ जाए। हर महीने इसका अभ्यास करने के बहुत फायदे है और इससे होता ये है कि वर्ष में एक बार आने वाली महशिवरात्री की तैयारी हो जाती है।
भारत सदैव से ही खगोल और ज्योतिष शास्त्र में अग्रणी रहा है इसलिए भारतवासियों को इस रात के लाभों और समय का ज्ञान था। इस रात्रि की यंहा बहुत प्रतीक्षा की जाती थी और इस रात में यंहा लोग योग और ध्यान किया करते थे जो हज़ारों वर्षों बाद में एक धार्मिक अवसर बन गया।
दरअसल शिव एक निराकर ईश्वर की संहार करने के गुण का नाम था जिस पर बाद में एक देवता बना लिया गया। वैदिक काल में शिव एक निराकर ईश्वर का ही नाम था। जैसे ब्रह्मा नाम ईश्वर के रचना करने के गुण का नाम है और विष्णु संचालन करने के गुण का। ब्रह्मा विष्णु शिव कोई अलग अलग देवता नहीं बल्की एक निराकर ईश्वर में निहित शक्तियों या गुणों के नाम है जिन नामों पर बाद में अलग अलग देवता गढ़ लिए गए। क्योंकि इस दिन विशेष ऊर्जा का उत्सर्जन होता है इसलिए ये बहुत संभव है कि इसे रात को शिव की शक्ति का प्रदर्शन होने के कारण ही शिवरात्रि नाम रखा गया हो। बाद में इस दिन के साथ भिन्न भिन्न कथाएं जोड़ दी गयी जैसे कि इस दिन सृष्टि का निमार्ण हुआ था या इस दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था या इस दिन शिव ने ज़हर पिया था या इसी दिन ज्योतिर्लिंग रुप में शिव प्रकट हुए थे आदि आदि। ये भी हो सकता है कि पहले इसे कुछ और नाम से पुकारा जाता हो और बाद में धार्मिक महत्व बढ़ने के कारण या शिव देवता से जोड़े जाने के कारण इसे शिवरात्रि कहा जाने लगा हो।
और अधिक जानकारी के लिए आप सदगुरु जग्गी वसुदेव और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ सय्यद तारिक़ मुर्तजा की रिसर्च भी देख सकते है।
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