1.
क़ुरान कहता है:-
ऐ नबी तुम कहो कि एकसमान बातों पर इकठ्ठा हो जाओ।
तुम्हारे पर जो भेजा गया उस पर ईमान रखते है और ...(कई नबियों के नाम) पर भेजा गया उस पर भी ईमान रखते है। फिर क्यों हम से बुग्ज़ रखते हो।
जो तुम पर भेजा गया और जो हम पर किताब भेजी गई, उस पर ईमान लाते है।
2.
दुसरो की मुशाबिहत करने वाली हदीस जंग के माहौल और पसमंज़र में है।
"इब्न
उमर रज़ी अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने
फरमाया : मैं तलवार के साथ मब'ऊस किया गया हूं यहां तक कि अल्लाह वहदहू -
ला - शरीक की इबादत की जाए , मेरा रिज़्क मेरे नेज़े के साए में रख दिया
गया है जिसने मेरी मुख़ालिफ़त की अल्लाह ने ज़िल्लत और रुसवाई उसके हक़ में
लिख दी है और जो जिस कौम की मुशाबहत इख़्तियार करेगा वो उनमें से होगा।"
(मुसनद अहमद, मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा)
3.
हातिब बिन अबी बलताह को शाहे मिस्र मुकौसिस के पास भेजा नबी का पैग़ाम लेके। उसने पढ़ा और कहा कि हम अपना दीन कैसे छोड़ दे। हातिब ने कहा जैसे मूसा के बाद इसा आये तो तुम उनकी दावत देते हो, इसी तरह ईसा के बाद आये मुहम्मद सल्ल की तुम्हे दावत देते है। हम तुम्हे ईसा के दीन पे चलने से कंहा मना कर रहे है बल्कि उसी दीन कि तालीम देने आए है। (अल रहिकुल मख्तूम)
4.
मुसलमानों ने मिस्र की राजधानी को घेर रखा था। मुसलमानों को मुखबिरों ने बताया कि ये मिस्री इस्लाम अपनाना चाहते है पर डरते है कि अरबी बद्दुओं की तरह रहना पड़ेगा, कबिलाई लोग हुकूमत करँगे, उनकी संस्कृति बर्बाद हो जायेगी।
मुसलमानों ने मिस्रियों को दावत पर बुलाया। वंहा मिस्री कपड़े पहने, मिस्री खाना बनवाया, बावर्चियों को मिस्री लिबास पहनवाया, मिस्री आदाब इस्तेमाल किए यानी सब कुछ मिस्री संस्कृति में किया। वो चौंक गए। मुसलमानों ने तकरीर में कहा कि तुम हमें अपने बीच ऐसा ही पाओगे जैसा देख रहे हो, सेहरा में ऐसा पाओगे जैसा सुनते हो और जंग में ऐसे पाओगे जैसा पाया या आज़माया है। (ये वाकया या तो हज़रत उमर का है या हज़रत खालिद बिन वालिद का।)
5.
ए रसूल तुम कहो, ए अहले किताब जब तक तुम तौरेत पर ईमान नहीं रखते तुम बेबुनियादी हो (यानी उस वक़्त ये किताबे सही सलामत थी). ये बात हदीसों में नहीं मिलती की लोगों को कहा, आखिर क़ुरान में है तो ज़रूर कहा होगा। बादशाहों को खुतूत में तो इसका एक हिस्सा मिलता है पर ये बात 50-100 हदीसो में तो होनी चाहिए थी न।
6.
यहूदी के रास्ता रोकने पर उसका रास्ता तंग कर दो कहने वाली हदीसे मिलती है।
जैसे जनाज़ा दफनाने तक न बैठने का रिवाज था। यहूदी ने ये देखकर कहा कि हमारे यंहा भी ऐसा ही होता है। तभी नबी जल्दी से बैठ गए और कहा इसकी मुख़ालफ़त करो।
7.
कितने लोग नबी की तरह पठ्ठे वाले बाल रखते है। कुर्ता पजामा,शेरवानी उन्होंने पहना ही नहीं। शेरवानी तो हिंदुस्तानी राजपूतों का पहनावा था। टाई 18वीं सदी में फ्रांस से शुरू हुई। पादरियों के वेशभूषा में टाई है ही नहीं और न ही ईसाई इसे सलीब की निशानी मानते है, पर मुसलामन मानता है।
8.
क़ुरान हमें उनसे दोस्ती करने को मना नहीं करता जिन्होंने तुमसे दीन के कारण जंग न की और न ही तुम्हे घर से निकला।
9.
अल्लाह ने हुबेदिया से वापस जाने को कहा क्योंकि खुफिया ईमान वाले तबाह हो जाते। क्योंकि वो मजबूरन लड़ने खड़े हो जाते पर हाथ न उठाते और इस तरह मारे जाते। उन्हें पहचान नहीं पाते। लिबास वैगरह एक जैसा था मुसलामन और गैर मुसलमानों का।
10.
मुसलमानों को हकुम दिया गया कि जंग में सलाम का जवाब देने वाले को मुसलमान मान लेना।
11.
सहाबियों ने ह. अब्दुल्लाह इब्ने मसूद का हुलिया बताया (पीछे से देखा) जब वो तवाफ़ कर रहे थे कि उनकी चोटी थी (किताब फ़िकह अस सुन्नाह)।
12.
हदीस में आता है कि ईसा अलैह जब वापस आयंगे तो भगवा रंग का ऊपरी कपड़ा पहने होंगे।
13.
नबी ने अपने पहनने आदि की तौर तरीक़े नबी बनने के बाद बदले नही। वैसे ही रहे जैसे बाकी अरबी पहले से ही रह रहे थे।
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गैरों को दोस्त न बनाओ
कुरान (5.51) यहूद ईसाइयों को दोस्त न बनाओ (अवलिया लफ़्ज़ का मतलब दोस्तकर रखा है).
कुरान (60.8) अल्लाह नहीं रोकता कि तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार और न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हारे घरों से निकाला।
कुरान (4.82) यह कुरान किसी और की तरफ़ से आता तो उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते.
कुरान (22:40) ये वे लोग हैं जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए, केवल इसलिए कि वे कहते हैं कि "हमारा रब अल्लाह है।" यदि अल्लाह लोगों को एक-दूसरे के द्वारा हटाता न रहता तो मठ और गिरजा और यहूदी प्रार्थना भवन और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह का अधिक नाम लिया जाता है, सब ढा दी जातीं। (कुरान कहता है कि अगर ताकत मिल जाए तो भी दूसरों की इबादतगाहें नहीं तोड़ोगे. )
आम तरजुमों से चले तो आयतें एक दूसरे के against लगती हैतो इसका मतलब यंहा अवलिया लफ़्ज़ का मतलब गार्जियन, कसटोडियन है।
Tirmidhi (1602) Messenger of Allah (ﷺ) said: "Do not precede the Jews and the Christians with the Salam. And if one you meets one of them in the path, then force him to its narrow portion."[He said:] There are narrations on this topic from Ibn 'Umar, Anas, and Abu Basrah Al-Ghifari the Companion of the Prophet (ﷺ).[Abu 'Eisa said:] This Hadith is Hasan Sahih. And regarding the meaning of this Hadith: "Do not precede the Jews and the Christians": Some of the poeple of knowledge said that it only means that it is disliked because it would be honoring them, and the Muslims were ordered to humiliate them. For this reason, when one of them is met on the path, then the path is not yielded for him, because doing so would amount to honoring them.
कुरान (5.51) यहूद ईसाइयों को दोस्त न बनाओ (अवलिया लफ़्ज़ का मतलब दोस्तकर रखा है).
कुरान (60.8) अल्लाह नहीं रोकता कि तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार और न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हारे घरों से निकाला।
कुरान (4.82) यह कुरान किसी और की तरफ़ से आता तो उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते.
कुरान (22:40) ये वे लोग हैं जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए, केवल इसलिए कि वे कहते हैं कि "हमारा रब अल्लाह है।" यदि अल्लाह लोगों को एक-दूसरे के द्वारा हटाता न रहता तो मठ और गिरजा और यहूदी प्रार्थना भवन और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह का अधिक नाम लिया जाता है, सब ढा दी जातीं। (कुरान कहता है कि अगर ताकत मिल जाए तो भी दूसरों की इबादतगाहें नहीं तोड़ोगे. )
आम तरजुमों से चले तो आयतें एक दूसरे के against लगती हैतो इसका मतलब यंहा अवलिया लफ़्ज़ का मतलब गार्जियन, कसटोडियन है।
Tirmidhi (1602) Messenger of Allah (ﷺ) said: "Do not precede the Jews and the Christians with the Salam. And if one you meets one of them in the path, then force him to its narrow portion."[He said:] There are narrations on this topic from Ibn 'Umar, Anas, and Abu Basrah Al-Ghifari the Companion of the Prophet (ﷺ).[Abu 'Eisa said:] This Hadith is Hasan Sahih. And regarding the meaning of this Hadith: "Do not precede the Jews and the Christians": Some of the poeple of knowledge said that it only means that it is disliked because it would be honoring them, and the Muslims were ordered to humiliate them. For this reason, when one of them is met on the path, then the path is not yielded for him, because doing so would amount to honoring them.
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