गैर मुस्लिमों के मृत शरीर को न जलाने के लिए दो हदीसें पेश की जाती है। दोनों हज़रत अली के वाकये है। एक में हुज़ूर द्वारा दी जानदारों को न जलाने की हिदायत है और दूसरी ह. अबु तालिब के कफन दफन के वक्त की है की जब हुज़ूर ने उन्हें दफनाने के लिए कहा था।
1. पहली हदीस के वाकये में हज़रत अली कुछ सरकाशों को जला के मार देने की सज़ा देते है। जिसके बाद एक सहाबा ह. अली को बताते है कि नबी ने किसी जानदार को जलाके आज़ाब देने को मना फरमाया था, जिस पर ह. अली ने अफसोस जताते हुए कहा कि काश मुझे ये बात पहले पता चल जाती तो मैं कतई ऐसा न करता। पहली बात इस हदीस में आज़ाब के तौर जलाने पर या किसी ज़िंदा जान को जलाने को मना किया गया है। क्योंकि ज़िंदा को जला के आज़ाब देने का हक़ सिर्फ अल्लाह को हे। इस हदीस का ताल्लुक मुर्दा जलाने से नहीं है।
2.
दूसरी हदीस में रसूलुल्लाह सल्ल. फरमाते है कि ह. अबु तालिब को दफनाया जाए। इससे उलेमा ये परिणाम निकालते है कि गैर ईमान वालों को।भी दफनाना जाएगा। पर सच बात ये है कि हज़रत अबु तालिब को दफनाया ही जाना था। वो अरब में थे और अरब में रसूलुल्लाह से पहले से ही दफनाने की रस्म चली आ रही थी (आदम अलैह. से). अबू तालिब को शिया लोग, मुस्लिम मानते है। शिया मानते है कि उनका खात्मा इमाम पर हुआ था। भले ही सुन्नी न माने। मुमकिन है भले ही बहुत कम ही सही की वो ईमान लाये थे। अगर इसमे ज़रा भी सच्चाई है तो अबु तालिब की ज़िंदगी और दफनाना इस पसमंज़र में भी एक बार देखना चाहिए। हालांकि अबू तालिब के कलमा पढ़ने के कोई सबूत नहीं मिलते पर मौत तक उनके मुश्रिक होने के भी सबूत नहीं मिलते। क़ुरान बताता है कि ईमान बातिन में भी होता और है जाहिर में भी। अबू तालिब ने अपने बेटे हज़रत अली को हुज़ूर की खिदमत में दे दिया था और नबी से इतनी मुहब्बत करते थे कि अपने वक़्त की बड़ी से बड़ी ताकतों और दबावों के बावजूद नबी के रक्षक रहे, ऐसे अमाल उनके ईमान के बारे में सोचने पर मजबूर करते है। यंहा उनकी मौत के वक़्त के माहौल पर नज़र डालनी चाहिए। उनके आखिरी वक्त में नबी ने उनसे तौबा करने और कलमा पढ़ने को कहा था। मक्का से सभी ताक़तवर जैसे अबु जहल उस वक़्त वंही मौजूद थे और वो बार बार दबाव उन पर डाल कर कहते रहे कि क्या तुम मरने से पहले अपने बड़ो का, अबू मुत्तलिब का दीन छोड़ दोगे। जिसपर अबू तालिब ने कहा कि नहीं। उस वक़्त के माहौल का अंदाज़ा लगया जा सकता है की क्या टेंसड सिचुएशन रही होगी।
3.
तीसरी बात, ये सच है कि अबु तालिब का जनाज़ा नहीं पढ़ाया गया था। पर उसी साल फौत हुई हज़रत ख़दीजा का जनाज़ा भी नहीं पढ़ाया गया था। क्योंकि उस वक़्त तक नामज़े जनाज़ा पढ़ने के अहकाम नाज़िल नही हुए थे। इसलिए अबु तालिब का सिर्फ जनाज़ा न पढ़ाये जाने से ये परिणाम नहीं निकाला जा सकता कि वो गैर ईमान वाले ही थे।
4.
अक्सर ये बात कही जाती है कि कुछ जंगों में मुसलमान ने कुफ्फरों - मुशरिकों को लाशें भी खुद दफनाई है जैसे बदर और उहद में। फिर हिन्दुओ की अर्थी और किर्याक्रम करने में क्या रुकावट है।
5. हमारे नबी तो गैर मुसलमानों के जनाज़े को देख कर अदब में खड़ा हो जाया करते थे और कहते थे कि ये भी एक इंसान ही तो था।
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मुस्लिम मृतक को जलाया नहीं जा सकता। गैर मुस्लिम मृतक को दफनाया भी जा सकता है बशर्त अगर आप किसी जंगल
या बियाबान में रहते हो जंहा कोई समाज ही नही है जिसको इस पर आपत्ति हो। इसलिए इसकी संभावना तो न के बराबर है। अगर गैर मुस्लिम अपने शव को दफनाने की वसीयत करके गया है तब तो हर स्तिथि में उसे दफनाया ही जाना चाहिए।
और अगर गैर मुस्लिम वसीयत करके गया है कि उसे जलाया जाय तो उसे जलाया ही जायगा भले ही वो मुस्लिमों के बीच मरा हो। अगर मरने वाला हिन्दू है और वसीयत न भी करें कि मरने के बाद उसे जलाना है तो भी उसे जलाया ही जायगा बशर्ते उसने मरने तक अपना धर्म या परम्पराओं को नहीं छोड़ी था। क्योंकि यही इंसानियत का फर्ज और सामाजिक नियमो का तकाज़ा की ज़िंदा रहते हुए जिस व्यक्ति की जी मान्यताएं थी उन मान्यताओं का उसके मरने के बाद भी ध्यान में रखा जाएगा, जब तक की वो इसके उलट कुछ कह के न गया हो या कुछ और मसलिहत पैदा न हो जाए।
मुझे सीधे तौर पर गैरो के मुर्दे न जलाए जाने की हिदायत करने वाली कोई हदीस या आयात नहीं मिली। और न ही कोई आलीम कोई सीधा रेफरेन्स देता है जंहा ऐसा करने को मना किया गया हो। सभी डेडयूस करते है अलग अलग रिवायतों से जो इसके मुतालिक असलन है ही नहीं। डायरेक्ट, क्लियर या रिलेटेड कोई रिवायत नहीं मिलती।
चिता को आग देने का प्रथम अधिकार रिश्तेदार का है। अगर शमशान में मृतक का कोई गैर मुस्लिम करीबी, परिचित मौजूद है तो उसे ही अग्नि देनी चाहिए। या डोम राजा जो लावारिसों को अग्नि देता है, वो भी दे सकता है। पर एक मुसलमान भी हिन्दू भाइयो के पार्थिव शरीर को अग्नि दे सकता है अगर ऐसी मसलिहत पैदा हो जाये कि आपको ये करना पड़े, वो भी कोरोना जैसे आपदा काल में और मुसलमानों पर जारी आज़ाब के बीच में। भारत एक हिन्दू बहुल देश है और यंहा ऐसे वाकये बिल्कुक पेश आ सकते है जब आपको ऐसा करना पड़ जाए। हालांकि मुस्लिम मुखाग्नि न दे यानी आग न लगाये तो बेहतर है पर मजबूरी हो तो आग दे सकते है।
मृतक के अंतिम संस्कार का इंतज़ाम करना और उन्हें परफॉर्म करना आदि जैसे लकड़ी घी आदि लाना, अर्थी को कांधा देना, मटकी लेके अर्थी के आगे चलने आदि में तो कंही से कंही तक कोई दिक्कत ही नहीं है। यंहा तक कि राम नाम सत्य भी बोल सकते है क्योंकि अर्थी में लिया जाने वाला राम का नाम, श्रीरामचंद्र का नहीं बल्कि ईश्वर का नाम है, पर ये बात अगर बोलने वालों को मालूम हो तो।
एक सत्य ये भी है कि सनातन धर्म मे मृतक के शरीर को पार्थिव शरीर कहते है और पार्थिव का अर्थ होता है पृथ्वी से सम्बंधित यानी भूमि से संबंधित। ये नाम यही बताता है कि शायद कभी सनातन धर्म में भी दफनाने की प्रक्रिया रही होगी। सिंधु घाटी सभ्यता में जलाने और दफनाने दोनों की परम्पराएं थी और वंहा निकली बहुत सी कब्रो की पोजीशन और मुर्दे की गर्दन का रुख क़ाबा के मुताबिक ही पाई गई है जैसा मुसलमान दफनाते है। सनातन धर्म मे आज भी छोटे बच्चों की मृत्यु होने के बाद उन्हें जलाया नहीं जाता बल्कि दफनाया जाता है। बड़े साधु- संतो को भी दफना के समाधि दी जाती है। यंहा तक कि हमने कोरोना की दूसरी वेव में देख चुके है कि हिन्दुओ बहुत से कारणों के तहत अपने परिचितों को दफनाया भी है। विज्ञान के आधार पर हम आज जानते है कि जलाने से वातावरण प्रकति (वायु, पेड़ आदि) को नुकसान होता है जबकि दफनाने से मिट्टी उपजाऊ होती है और कीड़े आदि को भोजन भी मिलता है।
ये कुछ तथ्य है जिन्हें आप परखिये। समझ आये तो मानिए नहीं तो आप की मर्ज़ी जैसा दिल कहे वैसा करिए। आप को मानने न मानने की पूरी आजादी है.
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