लोगो को यही नहीं पता कि अबु जहल और एक आम इस्लाम के मुख़ालिफ़ या दुश्मन में क्या फर्क है। इसका सबसे बड़ा फर्क नहीं जानना मुसलमानों की कम इल्मी और कहिलियात में छुपा हुआ है।
अबु जहल को हमारे नबी ने दावत पेश की थी।
अबु जहल नबी का आला किरदार देख चुका था।
अबु जहल क़ुरान का पैगाम सुन चुका था।
अबु जहल इस्लाम की सच्चाई जान चुका था।
अबु जहल अल्लाह को वाहिद हक मान चुका था।
अब जहल के दिलो दिमाग पर अल्लाह, इस्लाम और नबी का फरमान हक़ साबित हो चुका था।
पर इसके बावजूद उसने अपनी अना, आन, बान, शान और दुनयावी फायदों आदि के मद्देनजर हक़ का इनकार किया, खुद को हक का दुश्मन ज़ाहिर किया और यंहा तक कि उसके खिलाफ दुनिया भर की बड़ी से बड़ी से ज़्यादतियां की।
नबी की दावत की शिद्दत, शुद्धता और ऑथरोटी और अन्य मुसलमानों की दावत में ज़मीन आसमान का फर्क है। अल्लाह का पैगम्बर दावत दे और उनका कोई समकालीन व्यक्ति उसको ठुकरा दे बल्कि उल्टा हक़ के ख़िलाफ़ जी जान से लड़ाई छेड़ दे। ये बहुत बड़ी गुमराही और हक का जानभूझ कर इनकार है।
यही वजह थी कि उसके कुफ्र की अल्लाह ने तस्दीक की और नबी और सहाबा को इसे वाज़ेह किया गया। यही वजह थी उसे क़यामत तक मुसलमानों के लिए एक निशानी बना दिया गया।
पर अब वो मुसलमान सामने आए जो सरदाना को ये सारी दावत उसके दिलो दिमाग के लेवल पर जाकर दे चुका हो। अगर किसी ने नहीं दी तो तुम्हे कोई हक नहीं उसकी तुलना उससे से करने की जिसे अल्लाह ने काफिर ठहराया हो।
किसी को काफिर घोषित करने का हक़ सिर्फ और सिर्फ अल्लाह को है। हमारे नबी ने कभी किसी को काफिर नहीं पुकारा। काफिर का अर्थ गैर मुसलमान नहीं होता। बल्कि हक को भली भांति जान कर और मान कर ठुकराने वाला काफिर होता है। और इस दिलो दिमागी डिनायल को सिर्फ अल्लाह ही जानता है। क़ुरान काफिर की 3 व्याख्या करता है जिसमे से 2 खुद मुसलमानों की तरफ भी आती है।
अगर कोई इस्लाम का खुला दुश्मन था तो उसकी मौत पर अफसोस न करे या दुख न प्रकट करे तो अच्छा है। खुशी जाहिर करना चाहे तो उसकी भी इजाज़त है। पर चिढ़ाने के लिए खूशी ज़ाहिर करना या जश्न मनाना सही नहीं जबकि दूसरी क़ौम आपको देख रही हो जिसका आप पर मुख्य इलजाम ही यही हो कि मुसलमान कट्टर होते है और गैर मुसलमानों से नफरत करते है। पर हम तो यंहा तो उल्टा ऐसी मौत पर खुले आम बढ़ चढ़ कर मज़ाक उड़ाया और जश्न मनाया जा रहा है। जबकि आप उसकी मौत पर खमोश भी तो रह सकते है। कोई बहुत बुरा आदमी मर जाए तो उसके बुरे कर्मों की आलोचना की जानी चाहिए, मरने वाले दिन भी कर सकते है ताकि वो उसके जैसे दूसरे लोगों के लिए एक सबक बने पर ये काम सलीके से होना चाहिए। ये काम हसीं उड़ाते या चिढ़ाते हुए कभी नही किया जा सकता। वैसे भी हंसी ठिठोली और चिढ़ाने से दूसरों में सुधार नहीं बल्कि और ढीढता आती है।
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