क्या वेदों में पुनर्जन्म (आवागमन) का उल्लेख है?
पुनर्जन्म पर मान्यताएं।
पुनर्जन्म पर विभिन्न मान्यताएं हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि आत्मा अनंत काल तक कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियों में विचरण करती रहती है क्योंकि सृष्टि भी अनंत काल के लिए है। कुछ मानते हैं कि कर्मानुसार स्वर्ग नर्क में अत्यधिक लंबा समय बिताकर आत्मा वापिस धरती पर जन्म लेती है और आवागमन फिर आरम्भ हो जाता है। कुछ मानते हैं की स्वर्ग नरक इसी धरती के सुखों और दुखों के समयकाल या भोगने को ही कहते है। कुछ ये मानते हैं कि कर्मानुसार स्वर्ग नरक में जाने के बाद वंही पर अनंत काल तक रहना है। कई अन्य मत भी पाए जाते है।
सनातन धर्म में पुनर्जन्म का सिद्धांत बहुत अधिक व्यापक है। वैसे शाब्दिक तौर पर पुनर्जन्म का अर्थ है दुबारा जन्म है अर्थात मर के एक बार फिर से जन्म लेना। परन्तु कमाल की बात ये है कि हिन्दू पुनर्जन्म का अर्थ आवागमन या समसारा (यानी बार बार जन्म लेना) को मानते है जिसमें में पशु योनि में भी जन्म होना माना गया है। ये आवागमन या समसारा सिद्धान्त जैन और बोद्ध धर्म के है और अनुमान लगाया जाता है कि वंही से सनातन धर्म में भी आ गए। शायद गरुड़ पुराण में आए 84 लाख नरकों के उल्लेख से आवागमन मानने वालों ने इन 84 लाख योनियों में जन्म लेना समझ लिया। वैसे समान्यतः 84 लाख योनियों या देहधारी माने जाते है। रामचरितमानस में भी 84 लाख पशु योनियों के प्रकार बताए गए है।
हालांकि गरुड़पुराण के प्रेतकल्प खंड में आत्मा को मरने के बाद कहा जाता है कि तुझे यमदुत कर्मानुसार सीधा स्वर्ग या नरक लेके जायँगे अर्थात वापिस बार बार धरती पर आने की बात नहीं कही गयी है। मिस्र और चीन में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं थी। प्राचीन मिस्रवासी, प्राचीन यूनानी और पारसी एक ही जीवन में विश्वास करते थे।
हिंदुओं में पुनर्जन्म (आवागमन) की मान्यता इतनी प्रबल होने की पीछे शायद यही कारण है कि मरने के बाद मृतक का शरीर पंचतत्व यानी भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर में सम्मिलित हो जाते है या कर दिए जाते है। उसके शरीर के तत्व वंहा से वापिस पानी, मिट्टी, हवा से विभिन्न घास फूस, पेड़ पौधे बनाने में काम आते है, जिन्हें खा कर विभिन्न जीव जीवित रहते है। इसी आधार पर कहा जाता है कि मृतक का कोई न कोई अंश विभिन्न रूप में संसार में चलता ही रहता है क्योंकि इस सृष्टि का कोई वस्तु इस सृष्टि के बाहर कुछ नहीं जाती है। शायद इसलिए लोगों में अनंत काल तक पुनर्जन्म की विभिन्न योनियों में जन्म लेने का सिद्धांत मानना प्रारंभ हुआ हो।
वेदो एंव वैदिक काल में पुनर्जन्म।
वेदों में पुनर्जन्म शब्द कंही भी इसी प्रकार नहीं आया है। न ही वेदों में पुनर्जन्म का आवागमन के अर्थों में कंही सीधा सीधा उल्लेख है। वेदों में इस धरती पर पशु, वनस्पति या किसी अन्य योनी में जन्म लेने का भी उल्लेख नहीं है। बहुत से विद्वान विभिन्न वेद मंत्रो से अपने मतानुसार अपने मनमाने व्याख्यान से उन मंत्रो का अर्थ पुनर्जन्म संबधित समझते है। पाश्चात्य विद्वान कहते है की ऋग्वेद में तो बिल्कुल भी पुनर्जन्म (आवगमन) के प्रमाणिक संदर्भ नहीं है हालांकि बाद में आने वाले अन्य 3 वेदों में थोड़ी संभवना हो सकती है क्योंकि बाद के वेदों का काल और प्रारंभिक उपनिषदों का काल लगभग साथ ही था। मगर अंतिम तौर पर किसी वेद से भी स्पष्ट रूप से पुनर्जन्म सिद्ध नहीं होता है।
वेदों में कुछ जगह ऐसे मंत्रो पुनः शब्द आया है जिसकी व्याख्या आवागमन मानने वालों ने 'बार बार' कर ली है। जबकि पुनः का अर्थ केवेल 'दुबारा' होता है, न कि 'बार बार'। 'बार बार' अर्थ तभी लिया जायगा जब पुनः शब्द दो बार लगातार आये. जैसे पुनर्विवाह या पुननिर्माण शब्द का अर्थ दुबारा से संबंधित है, न कि बार बार से।
इसका उदाहरण कठोपनिषद 2:6 में है जंहा दो बार लगातार 'पुनः पूनः' शब्द आया है और इसिलए उसका अर्थ 'बार बार' किया गया है। अर्थात एक बार पुनः शब्द का अर्थ दुबारा होता है, न की बार बार. ऐसे ही ऋग्वेद 1:92:10 में दो बार पुनः शब्द आया है और वंहा भी इसका अर्थ वही बार बार किया गया है।
वैदिक काल के बाद सनातन धर्म में आवागमन की अवधारणा बनी। विद्वान कहते है कि सर्वप्रथम छान्दोग्योपनिषद और ब्रह्दराणायक उपनिषद में पुनर्जन्म (यानी आवागमन) का सिद्धांत पाया गया और वंही से बाद के ग्रंथों जैसे गीता, पुराण आदि में ये जगह पाता गया। अगर ये सिद्धान्त वाकई सच था तो ये असंभव है कि पुनर्जन्म (आवागमन) जैसी मान्यता जो धर्म का मूल आधार हो, और उसका सीधा और साफ उल्लेख ईश्वर की वाणी माने जाने वाले वेदों में न हो। इसका अर्थ यही हुआ की ईश्वर का ऐसा कोई सिद्धांत था ही नही वरना इसे वेदों में स्पष्ट रूप से बताया जाता।
महाभारत
के अनुशासनपर्व में शिव जी को समझाते हुए दिखाया गया है, उनके अनुसार,
"पुनर्जन्म होता है या नहीं, इसको बड़े बड़े विद्वान भी तर्क से बिल्कुल
समझ नहीं पाते। यह ब्रह्मा कि रची हुई माया है इसको असुर और देवता भी नहीं
समझ सकते। बस वेदों में श्रद्धा करके मान लेना चाहिए कि परलोक और पुनर्जन्म
होता है। ईश्वर के कामों में तर्क काम नहीं करता। (यंहा पुनर्जन्म और
परलोक का सीधा सम्बन्ध दिखा कर यही स्पष्ट किया गया है की अगला जन्म परलोक
में ही होना है.)
विद्वानों के मत।
पूर्व राष्ट्रीपति और विद्वान डॉ सर्वेपल्ली राधकृष्णन ने भारतीय दर्शन के प्रथम अध्याय के पेज 113-116 में कहा है कि वैदिक आर्य पुनर्जन्म के सिद्धांत से अनजान थे। आर्यो के पास जन्म मरण की कोई विशेष धारणा नहीं थी यद्दपि कुछ धुंधली स्वर्ग और नर्क की धारणा अवश्य थी। पुनर्जन्म (आवागमन) धारणा की तो बहुत दूर की बात थी। वैदिक आर्य ये मानते थे कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है बल्कि मृत्यु के बाद भी जीवन है। जो प्राणी जन्मा है, उसका कभी अंत नहीं होता बल्कि वो किसी अन्य जगह जीवित रहता है शायद वंहा जहाँ यम का राज है। वैदिक आर्य एक अदृश्य लोक की यथार्थता में विश्वास रखते थे। वह आगे कहते है कि मुझे नहीं लगता कि मरने के बाद दुख भोगने के अंधकारमय लोक, केवल यही संसार है। उन्होजे अपनी एक अन्य किताब उपनिषदों की भूमिका में भी यही लिखा है कि ऋग्वेद में इस धरती पर पुनर्जन्म का उल्लेख नहीं है।
प्रसिद्ध संस्कृत और दर्शन विद्वान सुरेंद्रनाथ दासगुप्ता ने अपनी भारतीय दर्शन का इतिहास पुस्तक में वैदिक काल में आवागमन न होने की बात साफ कही है।
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी किताब दर्शन दिग्दर्शन के पुनर्जन्म अध्याय में कहा है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत छान्दोग्यउपनिषद से आया है और इसके लिखने वाले को कदा भी एहसास नहीं हुआ कि ये आगे जाके कितना भयंकर साबित हो जायेगा।
इनके अलाव के.एन तिवारी अपनी किताब कम्पेरेटिव रिलीजन में, डॉ रमेन्द्र ने अपनी किताब धर्म दर्शन के अंदर, वेदों व वैदिक काल में पुनर्जन्म (आवगमन) का सिद्धांत पाए जाने को नकारा है।
सत्यप्रकाश विद्यालंकर ने, प. दुर्गाशंकर सत्यार्थी, डॉ सत्यदेव शर्मा, संस्कृत के विद्वान एंव प्रोफेसर ने भी वेदों में पुनर्जन्म (आवागमन) सिद्धांत न पाए जाने की बात कही है। डॉ फरीदा चौहान ने वेदों में इस जन्म के बाद केवल एक जन्म का उल्लखे माना है, न की हज़ारों जन्म का।
बहुत से विद्वान और मुख्यता आर्य समाजी जिन वेद के संदर्भों को पुनर्जन्म (आवागमन) से संबंधित बताते है, उनकी व्याख्या वैदिक संस्कृति से अधिक अपनी विचारधारा के आधार पर रखी है। सभी मतों के वेदार्थ एक दूसरे से व्याख्या में भिन्न है। दयानंद सरस्वती इन मंत्रो की व्याख्या पुनर्जन्म (आवागमन) आधारित करते है और बड़े सनातनी दयानंद वेदार्थ को गलत अनुवाद मानते है। जबकि सायण और अन्य सनातनी विद्वानों ने इन मंत्रों में अधिकतर की व्याख्या पुनर्जन्म (आवागमन) से सम्बंधित की ही नहीं है। और जिन मंत्रो का अनुवाद सही है, उनमें कंही से भी ये प्रमाणित नहीं होता कि वे बार बार जन्म लेने की बात कर रहे है बल्कि वे पुनर्जन्म (दुबारा जन्म) की तरफ तो इशारा करते है। इन मंत्रो को समझ कर ये बात तो कही जाती सकती है कि वेद मरणोपरांत एक बार फिर से दुबारा जन्म लेने की इशारा तो करते है पर बार बार जन्म लेने की और कतई नही।
स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश :7:86-88 में लिखा है कि प्रथम सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन ऋषियों की आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया और वे ही चार सब जीवों से अधिक पवित्रात्मा थे, अन्य कोई उनके सदृश नहीं था। यहाँ सवाल यह है कि सृष्टि के आदि में पूर्व पुण्य कहाँ से आया? इस सवाल का कोई तर्कपूर्ण और न्यायसंगत जवाब स्वामी जी ने अपने ग्रंथों में कहीं नहीं लिखा। स्वामी जी ने स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, परलोक की गलत और भ्रामक व्याख्या की है। नवम समुल्लास:79 में लिखा है कि सुख विशेष स्वर्ग और विषय तृष्णा में फंसकर दुःख विशेष भोग करना नरक कहलाता है। जो सांसारिक सुख है वह स्वर्ग और जो सांसारिक दुःख है वह नरक है। जबकि वैदिक धारणा और शब्दकोष के अनुसार स्वर्ग और नरक स्थान विशेष का नाम है। इसी प्रकार पुनः का अर्थ दोबारा है न कि बार-बार। जैसे पुनर्विवाह, पुनर्निर्माण वैसे ही पुनर्जन्म। चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति के कुछ ‘लोकों द्वारा परलोक के सुख हेतु उपाय बताए हैं। यहाँ स्वामी जी ने परलोक और परजन्म दोनों को एक ही अर्थ में लिया है। (4-106) मनुस्मृति के जो श्लोक उन्होंने उद्धरित किए हैं वे परलोक की सफलता पर केन्द्रित हैं न कि आवागमनीय पुनर्जन्म पर। स्वामी जी की धारणाओं और तथ्यों में प्रचुर विरोधाभास पाया जाता है।
ऋग्वेद के एक मंत्र में बार बार जन्म लेने को धारणा को ध्वस्त किया गया है।
■ ऋग्वेद 1:92:10:
"पुनः पुनः जायमाना पुराणी समान वर्णमाभि/वर्णम भि शुम्भमाना, शवघ्नीव कृतनुविरज आमिमाना/आमिनाना”
वेदार्थ: पुन:पुनः प्रकट होने वाली पुरातन देवी उषा प्रतिदिन एक समान वर्ण को प्राप्त कर अति सुशोभित होती हैं। ये देवी उषा मनुष्य की आयु को उसी प्रकार क्षीण करती जाती हैं, जैसे व्याधिनी पक्षियों की संख्या क्षीण करती जाती है।
(ये निष्पक्ष विद्वानों द्वारा की गयी इस मंत्र की व्याख्या है। वैसे प्रत्येक आम विद्वान ने इसकी व्याख्या भिन्न भिन्न की है। ग्रिफ्फिथ की भी कुछ ऐसी ही है। ये मंत्र उषा के बारे में माना जाता है।)
शब्दार्थ: बार बार उत्पन्न होने का वर्णन प्राचीन काल जैसा है, पापियों के समान इस प्रकार मानने वालों को विजित करो।
(यद्दपि जब इस मंत्र के शुध्द शाब्दिक अर्थ करते हैं तो ये मंत्र पुनर्जन्म का विरोध करता है और संस्कृत विद्वान इन अर्थ को भी गलत नहीं बताते बस यह कह देते हैं कि यह अर्थ बहुत संक्षेप हो गया और कुछ आशय छूट रहे है या अधूरा सा लग रहा है। स्पष्ट है कि केवल शब्दों अनुवाद किया जायेगा तो बात संक्षिप्त होगी और अर्थ की व्याख्या की जायगी तो बात विस्तृत होगी। )
आइये, अब उन वेद मंत्रो को देखते हैं जिन्हें पुनर्जन्म (आवागमन) में आस्था रखने वाले प्रस्तुत करते हैं।
■ ऋग्वेद : 1:24:1-2
विद्वानों का मानना है कि इस मंत्र में मुक्ति जैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व ही नहीं है और यहाँ पुनः (अर्थ दुबारा) शब्द आने भर से ही आवागमन की व्याख्या कर ली गयी है। यहां माता पिता को मृत्यु के बाद मिलने का उल्लेख है जो परलोक में होना है। एक ब्राह्मण संस्कार (जो तमिल ब्राह्मणों में अभी भी जारी है) में बताया जाता है कि आकाश के किस तारे वाले भाग में मृतक का स्वागत होता है।
वैसे निष्पक्ष दृष्टि से देखने से यही पता लगता है कि इसमें पुनः शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ दुबारा होता है, न कि बार बार। इसमें ये भी कहा गया कि मैं मरने वाला हूँ अर्थात यंहा मरने वाला अपने लिए और अधिक जीवन मांग रहा है जिससे वह अपने मां बाप को देख सके। देखें गंगा सहाय और श्रीराम शर्मा के भाष्य।
गंगा सहाय शर्मा:
श्रीराम शर्मा आचार्य:
दयानंद सरस्वती:
■ ऋग्वेद :1:164: 30, 31, 37, 38.
मंत्र 30 पुनर्जन्म पर नहीं है क्योंकि ये केवल जीवत्मा के विचरण करने की बात कहता है। गंगा सहाय शर्मा भाष्य में बाकी बचे 3 मंत्रों की व्याख्या पुनर्जन्म पर नहीं है। श्रीराम शर्मा आचार्य की भी नहीं है सिवाए मंत्र 38 के।
■ ऋग्वेद : 4:26:1
विद्वान कहते है कि इस मंत्र का संदर्भ जानना आवश्यक है। मनु प्रथम नश्वर मानव था जो सूर्य का पुत्र था यानी अंदर का सूर्य या स्वयं। काक्षीवान एक ऋषि थे और आयुर्वेद ज्ञाता भी थे यानी धन्वंतरि (जो एक देवता, चिकित्सक, विष्णु के अवतार थे)। इस मंत्र का का संबध अपने अंदर के स्वयं से है जो हमें अपने अंदर के स्वयं से जोड़ता है जैसे अहम ब्रह्मास्मि (बृहद्रराणायक अनुसार) जोड़ता है। इन ऋषि का सम्बंध आयुर्वेद और इनके देवता धन्वंतरि से है और इनके स्वयं के सूर्य होने से है, जिससे लगता है कि सूर्य देवता अश्विन से इस ऋषि को आयुर्वेद रचने का वरदान लिया है।
गंगा सहाय शर्मा:
श्रीराम शर्मा आचार्य:
■ ऋग्वेद : 8: 1/23 : 1-7.
इसका रेफरेन्स ही सही नहीं है। और जो रेफरेन्स मिलते जुलते है उन मंत्रो का मूल ही पुनर्जन्म से संबंधित नहीं है।
■ ऋग्वेद 10:14:1-8.
गंगा सहाय शर्मा, श्रीराम शर्मा आचार्य और श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की इन मंत्रों की व्याख्या पुनर्जन्म पर नहीं है।
■ ऋग्वेद: 10:59:6-7
कुछ विद्वानों का मानना है कि यंहा केवल जीवन शक्ति या प्राण शक्ति मांगी जा रही है जो खो चुकी है। ये मंत्र शीघ्र शक्ति, स्वास्थ्य, औषधि और दीर्घायु के बारे में है, न कि मृत्यु के बारे में।
वैसे निष्पक्ष दृष्टि से देखने से यही पता लगता है कि यंहा संस्कृत टेक्स्ट में पुनर्जन्म शब्द ही नहीं है और इसमें केवल पुनः शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ दुबारा होता है, न कि बार बार।
यंहा दुबारा आंख, प्राण, शरीर पाने का अनुरोध किया गया है। अर्थात मृत्यु के बाद दुबारा मिलने वाले जीवन की बात तो हो सकती है जिसके आधार पर स्वर्ग नरक का निर्णय होगा पर इसमें बार बार जीवन मिलने का उल्लेख कतई नहीं है। दखें गंगा सहाय शर्मा, श्रीराम शर्मा और श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के भाष्य।
गंगा सहाय शर्मा:
श्रीराम शर्मा आचार्य:
श्रीपाद दामोदर सातवलेकर :
दयानन्द सरस्वती:
■ यजुर्वेद : 4:15.
विद्वानों का मानना है कि यंहा पुनर्जन्म का उल्लेख ही नहीं है। ये कहता है कि सांस, जीवन, चेतना वापिस आ गई पर ये नहीं कहता कि मृत्यु के बाद आई। एक भाष्यकार ने इसे जागृत होने से संबंधित बताया है।
यंहा भी पुनः शब्द आया है यानी दुबारा। यंहा पुनर्जन्म या मरने का उल्लेख नहीं है। यंहा मर कर दुबारा एक बार फिर जीवित होने की और तो संकेत ले सकते है पर आवागमन नहीं। देखें रेखा व्यास भाष्य।
यंहा प्रबुद्धवस्था या जाग्रत अवस्था की बात हो रही है अर्थात जब हम दुबारा प्रबुद्ध या जाग्रत होते है तो ये दुबारा सब कुछ नया पाने जैसा होता है। देखें श्रीराम शर्मा भाष्य।
रेखा व्यास:
ग्रिफ्फिथ:
दामोदर सातवलेकर:
देवीचंद:
जयदेव शर्मा (आर्य समाजी):
हरिशंकर सिद्धांतलानकर:
तुलसीराम:
■ यजुर्वेद : 12:38.
यह अग्नि के बारे में मंत्र है और मानव पुनर्जन्म से सम्बंधित नहीं है।
■ यजुर्वेद : 19 : 47
विद्वानों के मानना है कि कुछ वेदार्थ में यंहा आयी धारणा, प्रारंभिक उपनिषदों में भी आती है जिनमें इस धारणा को अवश्य घुसाया गया है। कुछ वेदार्थ में यह मंत्र कहता है कि या तो हम परलोक जाते हैं या पितरों की तरह वापिस आते हैं।
हालांकि निष्पक्षता से देखने पर पता चलता है कि यंहा पुनर्जन्म का कोई उल्लेख या संबध ही नहीं है। पितरों में मनुष्य आते है, जो अच्छे बुरे दोनों होते हैं। जबकि देवता केवल अच्छी प्रकृति के ही होते हैं। कोई बहुत ही भला मानव, देवता समान भी हो सकता है। इसलिए दोनों के मार्ग ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न है। नीचे देखें 3 भाष्य।
रेखा व्यास:
यंहा पुनर्जन्म का उल्लेख नहीं है।
श्रीराम शर्मा आचार्य:
यंहा पुनर्जन्म का उल्लेख नहीं है।
दयानंद सरस्वती:
यहाँ केवल एक बार दुबारा जीवित होने से अर्थ है।
■ अथर्ववेद : 5: 1:1: 2 या 5.1.1
पहले वाला रेफरेन्स नम्बर ही गलत है। दूसरा वाला मंत्र पुनर्जन्म पर नहीं है।
■ अथर्ववेद : 5: 1 :2
विद्वानों का मानना है कि इस मंत्र में पुनर्जनम का उल्लेख ही नहीं है और इसे अमरता सम्बंधित मंत्र कहते है जिसका अर्थ आवागमन से नहीं है।
निष्पक्षता से देखें तो इसमे जीवात्मा द्वारा शरीरों को जीवन देने से है। जीवात्मा एक ही होती है जो ईश्वर की सर्प्रथम सृष्टि है। इस मंत्र में जीवात्मा (एकवचन) की कई शरीरों में घुसने की बात कही गयी है। यंहा इसका अर्थ प्राणियों की अलग अलग आत्मा से नहीं है बल्कि सृष्टि की प्रथम आत्मा से है जो सभी को जीवंत करती है। आत्मा या जीवात्मा सबकी एक होती है और प्राण सबके अलग। जैसे रूह एक है और नफ़्स अलग अलग। सत्यवीर शास्त्री वाले भाष्य में जीवात्मा का ही उल्लेख नही है। दयानंद भाष्य में पुनर्जन्म का उल्लेख ही नहीं है।
गंगा सहाय शर्मा:
श्रीराम शर्मा आचार्य:
दयानंद सरस्वती:
■ अथर्ववेद : 7:67:1
विद्वानों का मानना है कि ये मंत्र एक औषधि से स्वास्थ्य, दीर्घायु प्राप्त करने की प्राथना है। अथर्ववेद के बहुत से मंत्र औषधियों, जीवन रक्षा, लंबी आयु से संबंधित है, न कि आवागमन से।
निष्पक्षता से देखें तो ये भी दुबारा जीवित किए जाने के बारे में हो सकता है, न कि आवागमन से। ये स्वास्थ्य संबधी मंत्र है और श्रीराम शर्मा भाष्य में आत्माचेतना लिखा है।
गंगा सहाय शर्मा:
इसमेें सूक्त संख्या अलग है।
श्रीराम शर्मा आचार्य:
इसमेें सूक्त संख्या थोड़ी अलग है।
सत्यवीर शास्त्री:
दयानंद सरस्वती:
■ अथर्ववेद : 10: 8: 13.
इसमे प्रजापति को गर्भ विचरने वाला बता कर नाना रूपों से प्रकट या उत्पन्न होने वाला बताया गया है। यंहा आत्मा की नहीं बल्कि प्रजापति की बात करी गयी है जिसे आर्य समाजी ईश्वर का ही नाम कहते है। गंगा सहाय शर्मा, श्रीराम शर्मा आचार्य, सत्यवीर शास्त्री, दयानंद सरस्वती भाष्य में इसकी व्याख्या पुनर्जन्म पर नहीं की गई है।
■ अथर्ववेद : 10: 8: 27-28.
मंत्र आत्मा को नाना प्रकार के रूपों (स्त्री पुरुष आदि) में प्रकट होना बताता है यानी ये पुनर्जन्म से संबंधित नहीं है।
■ अथर्ववेद : 14: 4: 20.
इसका रेफरेन्स नम्बर ही गलत है। चौदहवें मंडल में चौथा सूक्त ही नहीं है।
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