स्वर्ग- नर्क पर विभिन्न मान्यताएं है। सामान्यतः स्वर्ग और नर्क कोई अलग लोक नहीं हैं बल्कि केवल अलेगोरिकल और मेटाफोरिकल माने जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि मरने के पश्चात कर्मानुसार स्वर्ग या नर्क में समय बिताकर आत्मा वापिस धरती पर जन्म लेती है और जन्म मरण चक्र फिर आरम्भ हो जाता है जैसे जैन धर्म। बहुत से धर्म जैसे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध मानते हैं की स्वर्ग नरक इसी धरती के सुखों और दुखों के समयकाल या भोगन अवस्था को ही कहते हैं यानी स्वर्ग नरक केवल जीवन के दुख सुख या मानसिक अवस्था का ही नाम है, न कि अलग लोकों का। इनकी मान्यता है कि पाप पुण्य का निर्णय यंही हो जाता है और यंही फल भी मिल जाता है, न कि स्वर्गलोक या नरकलोक में जा कर। एक यह भी मत है कि केवल यही धरती लोक है और दूसरा या तीसरा लोक नहीं है। कुछ ये मानते हैं कि मरने के बाद जीवन कर्मानुसार केवल स्वर्ग या नर्क में बिताना है। इनके अलावा कई अन्य मत भी पाए जाते हैं।
वेदों और उपनिषदों आदि ग्रंथों में धरती के जीवन सुख दुख को या मानसिक अवस्था को स्वर्ग नहीं कहा गया है जैसा कुछ लोग दावा करते हैं। बल्कि उसे इस धरती से भिन्न तीसरा लोक कहा गया है और स्वर्ग - नरक में मरने के बाद कर्मानुसार मिलने वाले आनंद और दंड का भी उल्लेख है।
वेदों में बहुत जगह स्वर्ग नाम आता है। परंतु वेद और वैदिक काल मे नरक को अंधकारमय लोक कहा जाता था। नरक शब्द की तो बहुत बाद में उत्पत्ति हुई और ये संभवतः प्रथम बार जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण में आया है। कई पुराणों में नरक का भरपूर वर्णन है। गरुड़ पुराण में आए 84 लाख नरकों का उल्लेख है और किस कर्म का क्या दंड और क्या पुरस्कार है, यह भी उल्लेखित है। यमराज और दूतों के द्वारा मरने के बाद आत्मा को परलोक लेके जाना, उसे उसके कर्म बताना, स्वर्ग- नर्क का विवरण देना, ये सब गरुड़पुराण में विस्तार से लिखा हुआ है।
यम कर्मो के आधार पर ही निर्णय करता है और चित्रगुप्त कर्मो का लेखा जोखा यम के सामने रखता है। अगर मरने पर अंतिम दिन कर्मों लेखा जोखा न होगा तो का चित्रगुप्त का कोई महत्व नहीं रह जायेगा, वो क्यों कर्मो को हिसाब लिख कर रहा है? यंहा तक कि शोक संदेश में भी यही सूचित किया जाता है कि इस व्यक्ति का स्वर्गवास हो गया है और बाद में उसके नाम के आगे स्वर्गीय लिखा जाता है। क्योंकि लोगों के मन में ये छुपी हुई धारण है कि वह अब वापिस जन्म नहीं लेगा और स्वर्ग में ही निवास करेगा। सनातन संस्कृति में सदैव से ऐसे चित्र प्रचलित है जिनमें पापियों को नरक में उबाला या तला जा रहा है या भयंकर दंड दिया जा रहा है। स्वर्गे के मनोहर दृश्य चित्र भी प्रचलित हैं क्यूँकि लोग के लिए स्वर्ग व नरक वास्तविक स्थान है।
परलोक का अर्थ ही होता है यंहा से परे जो लोक है. भले ही इस पर विभिन्न धर्मो और लोगों की अलग अलग मान्यताएं हों मगर एक बात सत्य है कि चाहे परलोक में जाए या वापिस ईहलोक में आयें, यह होगा सभी के साथ. जो भी गलत हुआ वो पछताएगा. इसलिए बेहतरी इसी में है कि अच्छे कर्म करें और उसके प्रतिफल में विश्वास रख कर जीवन जियें.
पूर्व राष्ट्रपति और विद्वान डॉ सर्वेपल्ली राधकृष्णन ने भारतीय दर्शन के प्रथम अध्याय के पेज 113-116 में कहा है कि वैदिक आर्यो के पास कुछ धुंधली स्वर्ग और नर्क की धारणा अवश्य थी। वैदिक आर्य ये मानते थे कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है बल्कि मृत्यु के बाद भी जीवन है। जो प्राणी जन्मा है, उसका कभी अंत नहीं होता बल्कि वो किसी अन्य जगह जीवित रहता है शायद वंहा जहाँ यम का राज है। वैदिक आर्य एक अदृश्य लोक की यथार्थता में विश्वास रखते थे। वह आगे कहते है कि मुझे नहीं लगता कि मरने के बाद दुख भोगने के अंधकारमय लोक, केवल यही संसार है।
यंहा वो मंत्र लिखे गए हैं, जो आमतौर पर स्वर्ग-नरक पर चली आ रही निराधार मान्यताओं को तोड़ते हैं:-
■【कर्म, सत्यकर्म, पुण्य, पाप】
पापी लोग सत्य के मार्ग से चलकर पार नहीं पहुँचते।
[ऋग्वेद : 9:73:6 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
परलोक के हित को लक्ष्य में रखकर सत्कर्म प्रारम्भ करो, उसमें सतत लगे रहो।
[अथर्ववेद : 6:122:3 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
कर्मफल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग आदि लोकों में श्रद्धा रखते हुए तुम दोनों, सेवा करो।
[अथर्ववेद : 6:122:3 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
हे सर्वोत्तम यमदेव। आप सभी मनुष्यों के पाप रूपी दुष्कर्म और पुण्य रूपी सत्कर्मों को जानने में समर्थ हैं।
[ऋग्वेद 10:14:2 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
..जंहा हर्षदायी सम्पदाएँ और ऐश्वर्य है, जंहा सारी कामनाओं की पूर्ति होती है, वंहा आप हमें अमरत्व प्रदान करें।
[ऋग्वेद 9:113:11 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
..अपने सत्कर्मो के फलस्वरूप से ही उसकी (स्वर्ग की) प्राप्ति होती है।
[महाभारत : 3: 261: 10-12]
पुण्य प्रबल होता है पाप नहीं।
[शतपथ ब्राह्मण:11:2:7:33]
■【स्वर्ग】
एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वा: स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना।
..स्वर्ग में दूध जल दही से पूर्ण ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचे।
[अथर्ववेद : 4:34:7 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
स्वर्गलोक में दुग्ध आदि की धाराएं मधुरता को पुष्ट करती हुई, आपको प्राप्त हों और जल से पूर्ण सरिताएं भी आपको प्राप्त हों।
[अथर्ववेद : 4:34:7 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
ये सब धाराएं शक्तियां स्वर्ग लोक में मधु नाम ज्ञान की पूर्णता से तुझको सींचती हुई, आदर से मिले।
[अथर्ववेद : 4:34:7 - स्वामी दयानंद सरस्वती भाष्य]
स्वर्ग में जाकर सुख तथा आनंद प्राप्त करेंगे।
[ऋग्वेद:10:95:18 - प. श्रीराम शर्मा आचार्य]
तू स्वर्ग में आनंद प्राप्त करेगा।
[ऋग्वेद:10:95:18 - दयानंद सरस्वती]
स्वर्ग में आनंद पाओगे।
[ऋग्वेद:10:95:18 - गंगा सहाय शर्मा]
■【नर्क】
इंद्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अंतरनारंभणे तमसि प्र विध्यतं।
यथा नातः पुनरेकश्च॒नोदयत्तद्वामस्तु॒ सहसे मन्यु॒मच्छवः ॥
...जो वेद विरुद्ध कर्म करने वाले दुराचारी हैं, उनको महादुखों से आवृत जिसमें कोई आलम्बन नहीं है ऐसे घोर नरक में प्रविष्ट कर ऐसा ताड़न कीजिये जिसमें कि इस यातना से फिर एक भी दुष्कर्म न करें...।
[ऋग्वेद : 7:104:3 - स्वामी दयानंद सरस्वती भाष्य]
...वाचिक सत्य रहित लोग नरक को प्राप्त होते हैं।
[ऋग्वेद : 4:5:5 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
■【परलोक】
यम के दूत रूप मृत्यु ने इसके प्राणों को पितर के रूप में करने के लिए ले लिया है।
[अथर्ववेद : 18:2:27 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
{इस मंत्र की पंडित श्रीराम शर्मा ने इसी समान व्याख्या लिखी है। }
■【स्वर्ग नर्क विवरण】
नरक में सदा दुख ही दुख है और स्वर्ग में सदा सुख ही सुख।
[महाभारत : अनुशासनपर्व/13: अध्य्याय 145: भाग 23]
इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मन में ही आते हैं। मन से ही मनुष्य बंधता है और मन से ही मुक्त होता है। यदि मन को वश में कर लिया जाए तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाए तो नरक की प्राप्ति अवश्यम्भावी है।
[महाभारत : अनुशासनपर्व/13: अध्य्याय 145: भाग 8]
(किन किन कर्मों से नरक और स्वर्ग मिलता है, यंहा उनका वर्णन है।)
[महाभारत: अनुशासन पर्व/13: 23:59-103]
स्वर्ग भय रहित, मृत्यु रहित और प्रसन्नता से भरा है।
[कठोपनिषद 1:12 - महात्मा नारायण स्वामी व्याख्याकार, आर्य समाज]
■【स्वर्ग नर्क मरने पर】
वे आत्मा (आत्मा चेतना के निर्देशों) का हनन करने वाले लोग, प्रेतरूप में (शरीर घुटने पर) भी वैसे ही (अंधकारयुक्त) लोकों में जाते हैं।
[यजुर्वेद : 40:3 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
जो आत्मा का हनन करने वाले हैं, वे लोग प्रेत रूप में वैसे ही लोको को प्राप्त होते हैं।
[यजुर्वेद : 40:3 - डॉ. रेखा व्यास भाष्य]
शरीर का त्याग करके मनुष्य स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।
[महाभारत : अनुशासनपर्व/13: अध्य्याय 145: भाग 54]
■【स्वर्ग आकाश में, पृथ्वी से अलग स्थान, अमरतायुक्त, यम।】
अंतरिक्ष के ऊपर वर्तमान लोक को पार करके भोगों से युक्त होते हैं।
[अथर्ववेद : 4:34:4 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
{इस मंत्र में पंडित श्रीराम शर्मा और संपादक सत्यवीर शास्त्री ने धूलोक शब्द प्रयोग किया है।}
मैं पृथ्वी (भूलोक) से अन्तरिक्ष पर, वंहा से स्वर्गलोक पर चढ़ता हूँ।
[अथर्ववेद : 4:14:3 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
{इस मंत्र में भी पंडित श्रीराम शर्मा और संपादक सत्यवीर शास्त्री ने धूलोक शब्द प्रयोग किया है।}
हे प्रेत, तू सत्य के कारण रूप मार्गों को भली भांति जानता हुआ महर्षि अंगिरस आदि के स्वर्ग को जा।
[अथर्ववेद : 18:4:3 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
{इस मंत्र की पंडित श्रीराम शर्मा और संपादक सत्यवीर शास्त्री ने इसी समान व्याख्या लिखी है। }
स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा..।
अपने कर्मों से प्राप्त होने वाला यह स्वर्ग लोक अमृत से सम्पन्न है। यह स्वर्ग यज्ञ कर्म का अनुष्ठान करने वाले प्रेत को मनचाहा अन्न व रस देने वाला है।
[अथर्ववेद : 18:4:4 - डॉ. गंगा सहाय शर्मा भाष्य]
स्वर्गलोक सुधारस से परिपूर्ण है।
[अथर्ववेद : 18:4:4 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य]
स्वर्गलोक अमरता से व्याप्त है।
अथर्ववेद : 18:4:4 - संपादक सत्यवीर शास्त्र]
यमदेव पुण्य कर्मियों को सुखद धाम में ले जाते हैं।
[ऋग्वेद 10:14:1 - पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य]
परलोक यंहा से भिन्न तीसरा लोक है।
[छान्दोग्योपनिषद: 8:5:3]
वह मरकर ऊपर उठता हुआ पापों से छूट जाता है।
[बृहदारण्यक उपनिषद 4:3:8 - महात्मा नारायण स्वामी व्याख्याकार, आर्य समाज]
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विभिन्न धर्मों में परलोक, न्याय का दिन और क़यामत का उल्लेख।
करणी बाझहु भिसति न पाइ।
अच्छे कर्मों के बिना, स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 952]
बैकुंठ नगरु जहा संत वासा।
स्वर्ग का नगर वंही है जंहा संत बसते है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 742]
कुफर गोअ कुफराणै पइआ दझसी।
जो झूठ बोलता है वह नरक में गिर कर जलेगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 142]
संत कै दूखनि नरक महि पाइ।
संतों को बदनाम करने वाला नरक में गिरता है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 279]
जो सिमरंदे सांईऐ नरकि न सेई पाईऐ।
जो मालिक पर ध्यान लगाते है, उन्हें नरक में कभी नहीं धकेला जाएगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 132]
नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ।
उसे पकड़ के सबसे भयंकर नरक में डाला जाता है, जो दुख और पीड़ा का कुंवा है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 309]
गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ।
केवल बातें करने से स्वर्ग का मार्ग नहीं मिलता। मुक्ति केवल सत्य के अभ्यास से मिलती है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 141]
जो झूठ बोलता है वह नरक में गिर कर जलेगा। अच्छे कर्मों के बिना, स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
[सिक्ख धर्म : श्रीगुरुग्रंथ : 142 एवं 952]
जब हम एक दिन (महाप्रलय के दिन) उनको एकत्र करेंगे, प्रत्येक व्यक्ति ने जो किया है, उसका पूरा फल दिया जाएगा।
[क़ुरान : 3:25]
निस्संदेह महाप्रलय आने वाली है।
[क़ुरान: 15:85]
महाप्रलय निकट आ गयी है।
[क़ुरान : 54:1]
वह (महाप्रलय) तुम पर अवश्य आएगी।
[क़ुरान : 34:3]
जो ईश्वर और अंतिम दिन पर आस्था रखते है.. वे भले लोग है; निश्चित हो चुका न्याय (निर्णय) का दिन; निस्संदेह महाप्रलय आने वाली है; जब हम बदले के दिन सबको (पुनर्जीवित कर) एकत्र करेंगे..।
[इस्लाम धर्म : क़ुरान : 3:114; 44:40, 15:85; 3:25]
पापकारी यंहा भी संतापित होता है और मरणोपरांत परलोक में भी। पुण्यकारी इस लोक में भी आनंदित होता है और मरणोपरांत परलोक में भी।
[बौद्ध धर्म : धम्मपद : 1:17-18]
अधोलोक (नरक), मध्यलोक (धरती) और ऊधर्वलोक (स्वर्ग) तीन लोकों का वर्णन।
[जैन धर्म : तत्त्वार्थसूत्र : अध्याय 3-4]
वे नरक नित्य.. दुखवाले है; सौधर्म से अच्युत तक बारह स्वर्ग है..।
[तत्त्वार्थसूत्र: 3 : 3-4; 4:3]
आरंभ में परमेश्वर ने आकाश (हैवन) और पृथ्वी की रचना की।
[तनख : उत्पत्ति : 1:1]
मेरे कोप की आग भड़क उठी है, जो पाताल की तह तक जलती जाएगी।
[तनख : व्यवस्था विवरण : 32 :22]
दृष्ट लोग अधोलोक में लौट जायँगे।
[तनख : भजन संहिता : 9:17]
किंतु हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है।
[बाइबिल : फिलिप्पियों :3:20]
उससे डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्ट कर सकता है।
[बाइबिल : मत्ती : 10:28]
नरक के बीच उस आग में डाला जाए जो कभी नहीं बुझती।
[बाइबिल : मरकुस : 9:43]
न्याय के दिन प्रत्येक व्यक्ति को अपने हर व्यर्थ शब्द का हिसाब देना होगा।
[ईसाई धर्म : बाइबिल : मत्ती : 12:36]
हमेशा के लिए झूठ कपट के नरक धाम में रहना पड़ेगा।
[जेंद अवेस्ता : यस्न : 46:11]
हे ईश्वर मुझे स्वर्ग प्रदान करो।
[जेंद अवेस्ता : यस्न : 68:5]
Come on, so that we may show unto thee heaven and hell and the splendor and glory and ease and comfort and pleasure and joy and delight and gladness and fragrance which are the reward of the pious in heaven. We shall show thee the darkness and confinement and ingloriousness and misfortune and distress and evil and pain and sickness and dreadfulness and fearfulness and hurtfulness and stench in the punishments of hell, of various kinds, which the demons and sorcerers and sinners perform
[Arda Viraf : Chapter 5 : 7-8]
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कर्मों के आधार
[पुण्य एवं पाप का फल स्वर्ग एवं नरक के रूप में प्राप्त होता है।]
एकेश्वरवादी हो, अनीश्वरवादी हो या बहुदेववादी, विश्व के लगभग सभी धर्मों में कर्मफल और परलोकवाद का सिद्धांत किसी न किसी रूप में पाया जाता है। भले ही इनकी धारणाएं विभिन्न प्रकार की हो। इस जीवन में अच्छे कर्म करने वाले या पुण्य-सवाब कमाने वाले इंसान, मृत्यु के पश्चात स्वर्ग के अधिकारी होंगे और बुरे कर्म वाले या पाप-गुनाह करने वाले नरक के अधिकारी होंगे। इन लोकों को ही जन्नत- जहन्नुम, हेवन- हेल या पैराडाइस- दोज़ख कहते है। ये जीवन एक टेस्ट है और इसका टर्म पूरा होने पर रिज़ल्ट आना है। एक दिन हमारे कर्मों का हिसाब किताब होगा। इसे ही विभिन्न धर्मों में अंतिम दिन, महाप्रलय का दिन, न्याय का दिन, बदले का दिन, आख़िरत, क़यामत, फैसले का दिन, हश्र का दिन, फाइनल डे, डुमस डे, जजमेंट डे आदि कहते है। जैसे माँ की कोख में पल रहे बच्चे के लिये गर्भावस्था के लघु जीवन के बाद बाहर एक अन्य लंबा और आश्चर्यजनक जीवन इंतज़ार करता है।
■
परलोक के हित को लक्ष्य में रखकर सत्कर्म प्रारम्भ करो..।
[सनातन धर्म : अथर्ववेद : 6:122:3]
नरक में सदा दुख ही दुख है और स्वर्ग में सदा सुख ही सुख।
[महाभारत : 13:145:23]
■
पापकारी यंहा भी संतापित होता है और मरणोपरांत परलोक में भी। पुण्यकारी इस लोक में भी आनंदित होता है और मरणोपरांत परलोक में भी।
[बौद्ध धर्म : धम्मपद : 1:17-18]
■
अधोलोक (नरक), मध्यलोक (धरती) और ऊधर्वलोक (स्वर्ग) तीनों लोकों का वर्णन।
[जैन धर्म : तत्त्वार्थसूत्र : अध्याय 3-4]
■
जो झूठ बोलता है वह नरक में गिर कर जलेगा। अच्छे कर्मों के बिना, स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
[सिक्ख धर्म : श्रीगुरुग्रंथ : 142 एवं 952]
■
जो ईश्वर और अंतिम दिन पर आस्था रखते है.. वे भले लोग है; निश्चित हो चुका न्याय (निर्णय) का दिन; निस्संदेह महाप्रलय आने वाली है; जब हम बदले के दिन सबको (पुनर्जीवित कर) एकत्र करेंगे..।
[इस्लाम धर्म : क़ुरान : 3:114; 44:40; 15:85; 3:25]
■
किंतु हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; नरक के बीच उस आग में डाला जाए जो कभी नहीं बुझती; न्याय के दिन प्रत्येक व्यक्ति को अपने हर व्यर्थ शब्द का हिसाब देना होगा।
[ईसाई धर्म : बाइबिल : फिलिप्पियों:3:20; मरकुस:9:43 व मत्ती : 12:36]
■
आरंभ में परमेश्वर ने आकाश (हैवन) और पृथ्वी की रचना की; दृष्ट लोग अधोलोक में लौट जाएंगे।
[यहूदी धर्म : तनख : उत्पत्ति : 1:1 व भजन संहिता : 9:17]
■
हमेशा के लिए झूठ कपट के नरक धाम में रहना पड़ेगा; हे ईश्वर मुझे स्वर्ग प्रदान करो।
[पारसी धर्म : जेंद अवेस्ता : यस्न : 46:11 व 68:5]
मेंडाइज़्म (साबीइन) धर्म में भी स्वर्ग नरक की मान्यता पाई जाती है। ग्रीक माइथोलॉजी में एलीज़ियम (Elysium) स्वर्ग का और टार्टर्स (Tartarus) नरक का ही नाम है। कन्फ्यूशियनिज़्म, ताओइज़्म और चीनी पौराणिक मान्यताओं में स्वर्ग को टीआन (Tian) और नरक को दीऊ (Diyu) कहा गया है। फ़ारसी माइथोलॉजी में स्वर्ग को पेरेडाज़ा या पेरीडाज़ा और नरक को दुज़ख कहा गया, इन्ही से बाद में नए शब्द बने। विश्व की बहुत सी मायथोलॉजी और सभ्यताओं में स्वर्ग का कॉन्सेट पाया जाता है जैसे मेसोपोटामिया, हत्ती, मेक्सिकन, माओरी और पोलीनिशियम आदि। नरक का कांसेप्ट यूरोपियन सभ्यताओं जैसे केल्टिक -नॉर्स, अमेरिकी सभ्यताओं जैसे माया- एज़्टेक, प्राचीन मिस्री, अफ्रीकी और सुमेरी सभ्याताओं में भी पाया गया है।
न्याय इंसान की दृढ़ इच्छा और मूल आवश्यकता है। इसलिए अगर इस लोक में पूर्ण न्याय नहीं है तो किसी अन्य लोक में होगा। कर्म की जानकारी और फल की संतुष्टि होना पूर्ण न्याय मिलने का आधार है। पर इन दोनों बातों का इस लोक में आभाव है इसलिए यंहा पूर्ण न्याय या पूर्ण कर्मफल मिलना संभव ही नहीं है। मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, फलाह या साल्वेशन सभी एक अंत की ओर ले कर जाते है इसलिए जीवन और समय चक्र नहीं बल्कि एक रेखा है।

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