एक हिन्दू भाई का सवाल है कि येरूशलम एक हिन्दू मंदिर था और अगर नहीं था तो साबित करो?
मूल धर्म
उत्तर देने से पहले इस संबंध में यंहा कुछ बातें स्पष्ट करनी ज़रूरी है। जैसे की ये सत्य है कि सनातन धर्म प्राचीनतम धर्म माना जाता है। ये ईश्वर द्वारा प्रदत्त भी माना जाता है जिसका स्वरूप लागतार बदलता रहा है और आज मूल से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। वैदिक धर्म मूल धर्म में मूर्तिपुजा नहीं थी केवल एक नीराकार ईश्वर की उपासना थी। उत्तर वैदिक काल से ये बिगड़ना शुरू हुआ और प्रकृति या देवी देवतावाद की पुजा से भरपूर हो गया।
ये सर्वमान्य तथ्य है। स्मृतिग्रन्थ कहते है कि वेदों अखिलो धर्म मूलम अर्थात धर्म का आधार वेद है। इसलिए हमें सनातन धर्म की मूल धारण वेदों से जाननी चाहिए न कि 2 हज़ार वर्ष पुराने पुराणों से। यजुर्वेद कहता है न तस्या प्रतिमा अस्ति अर्थात ईश्वर की प्रतिमा नहीं है और ये भी कहता है कि अंधतम प्रविशन्ति असंभुति मुपासत... संभुतायं रतां अर्थात बनाई हुआ वस्तु की उपासना अंधकारमय है। उपनिषद बताते है न चुक्षुषा गहयते अर्थात उसे आंखों से नही देखा जा सकता और ये भी कहता है की यतत अद्रश्यम अर्थात वह तो अदृश्य है। एक वैदिक सूक्ति में उसे सपर्य्यगाच्छूक्रमकायम् कहा गया यानी वह जिसकी कोई काया नहीं। गरुड़पुराण में कहा गया है कि भावे हि विधते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम् अर्थात जंहा भाव है वह वहीं विद्दमान रहता है यानी मन में। यही बात वेद में इस तरह कही गई है कि वेनस्त पश्यम निहितम गुहायाम यानी विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है।
वैदिक काल
वेदों और वैदिक साहित्य से बात प्रमाणित है कि वैदिक काल में मंदिर नहीं होते थे। ईश्वर से सीधा संपर्क साधा जाता था। इसके लिए ध्यान, आसान और मंत्रोच्चारण का उपयोग होता था जिसे योग कहा जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये घरों में या खुले वातावरण में किया जाता था। बाद में कर्मकांड संबंधित रस्मों आदि के लिए यज्ञ किए जाते थे जिसका मुख्य आधार आहुति था। आर्य लोग घुमंतू प्रजाति होने के कारण आरम्भ में स्टोन स्ट्रक्चर बनाने में विश्वास ही नहीं रखते थे। यंहा तक कि नॉन आर्य संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जो एक वेल एस्टेब्लिशड सभ्यता थी उसमें बहुत तरह के पत्थरों से बने भवन आदि पाए गए है जैसे स्नानघर, कम्युनिटी हाल आदि पर उनके मंदिरों का भी कोई प्रमाण नहीं मिला है। ये बात स्पष्ट है कि वैदिक काल के बाद जब यंहा लोग अन्य सभ्यताओं के संपर्क में आये और समाज और तकनीक का विकास हुआ तो मंदिर बनना आरम्भ हुए पर छोटे स्तर पर और ये ऐसे भव्य और शैलीदार मंदिर कतई नहीं थे जैसे कि आम तौर पर मंदिर होते है। ये सामान्य भवन और आवासों की तरह होते थे जो मूर्ति रहित होते थे। ये संभव है कि पहले मंदिर टेम्पररी स्ट्रक्चर ही बनाये जाते हो।
इतिहासकार और धार्मिक विद्वान कहते है की मूल सनातन धर्म मे मूर्तिपूजा नहीं थी और बौद्धधर्म, जैनधर्म और ग्रीक सभ्यताओं के भारत में उत्थान के बाद ही यंहा मूर्तिपुजा का प्रचलन बढ़ा। क्योंकि सर्वप्रथम इन 3 में ही मूर्तिकारी का चलन आरंभ हुआ था और इन्ही की देखम देख ये शुरू हुआ। बोद्ध और जैन मंदिरों के तीव्र प्रसार के कारण सनातन मंदिरों की स्थापना भी एकदम से बढ़ी जो एक सामान्य धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवहार है। कुछ विद्वान ये मानते है कि मूर्तिपूजा तथाकथित शुद्र वर्ग और द्रविडों के कारण आया।
सबसे पहले मूर्ति, मंदिर और पुजारी का उल्लेख एक ब्राह्मणग्रन्थ और कुछ सूत्रग्रंथों में मिलता है जो ईसा बाद काल के है। इसीलिए जितने भी आज प्राचीन मंदिरों का उल्लेख मिलता है या पाए जाते है वो सभी के सभी ईसा काल के बाद के है। यंहा तक कि मंदिरों के संबंध में प्राचीनतम लिखित प्रमाण भी ईसा काल बाद के है। हालांकि आर्कियोलॉजिकली बहुत से बौद्ध धर्मस्थलों के मंदिरों से प्राचीन होने पर कोई दो राय नहीं है।
येरूशलम।
जेरुसलेम में बने यहूदीयों के धर्म स्थल का काल उसी काल का है (लगभग हज़ार वर्ष ईसा पूर्व) जब सनातन धर्म में मंदिर होते ही नहीं थे। अधिकतर गैर धार्मिक विद्वान और इतिहासकार इस काल को वैदिक काल ही या उसके बिल्कुल उपरांत का मानते है। यहूदी धर्मग्रन्थ तोराह में मूर्तिपूजा तो क्या, किसी का मूर्ति या चित्र बनाना भी मना है। सो प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति वाला मंदिर येरूशलेम में होने की दूर दूर तक संभावना नहीं है।
हालांकि ऐसा ज़ुरूर हुआ कि यहूदियों की आस्था अक्सर एकेश्वरवाद से बिगड़ कर ख़राब हुई पर फिर भी वो कभी ऐसी शुद्ध प्राकृतिक देवतावादी नहीं हुई जैसा हिन्दू धर्म में है।
हालांकि ऐसा हो सकता है कि सनातन धर्मियों के लिए ये कभी तीर्थ या आस्था आस्था का स्थान रहा हो क्योंकि ये एक नीराकार ईश्वर कि उपासना का स्थान था। और उस समय नीरकार ईश्वर और उसके एकमात्र धर्म सम्बंधित स्थान दुनिया के कोने कोने में होते थे जैसे श्रीलंका और वेदों में बातए गए इलास्पद या नाभापृथ्वी आदि।
वास्तु और शिल्पकारी संबंधी समानता भी दोनों स्थलों में हो सकती है जिसका कारण ये है कि मिडिल ईस्ट और भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबध प्राचीन काल से ही रहे है जो दोनों जगह इनके धार्मिक किर्याकालापों और रीति रिवाजों में भी देखे जा सकते है। इन्ही कारणों से बहुत से भारतीय, प्राचीन अरबी, यूनानी संस्कृति के देवताओं और पूजनियों में समानता पाई जाती है। यमन में आज भी राम, श्याम नामके किले और खण्डरात पाए जाते है। इसका अर्थ यही है कि इन संस्कृतियां आपस में मेल जोल और लेन देन था।
इसका एक उदाहण ये है कि भारत में 1920 से पहले के बने लगभग सभी बड़े मंदिरों (हनुमान मंदिरों के अलावा) का गर्भगृह पश्चिम की और रुख रखता है और मंदिरद्वार पूर्व की और से खुलता है। यही दिशा स्तिथि और रुख मस्जिदों में नमाज़ के दौरान पाई जाती है। यंहा तक कि सिंधु घाटी सभ्यता में बहुत से निकली कब्रों में मुर्दो का सिर उत्तर में, पांव दक्षिण में और गर्दन पश्चिम की तरफ मुड़ी हुई पाई गई है। इस्लाम धर्म में मुर्दे इसी स्तिथि में दफनाए जाते है।
इसराइल में अब्राहिमिक आस्था वाले धर्मों का बोलबाला रहा है जबकि भारत में सनातन और मूलनिवासी संस्कृति का। हालांकि दोनों के बीज एक दूसरी संस्कृति में कंही न कंही साफ तौर पर दिख ही जाते है पर किसी स्थान पर एक दूसरे से भिड़ती या वर्चस्व बनाती हुई नहीं दिखती है जैसे एक ने दूसरे के धर्मस्थल पर इतिहास में कभी कब्ज़ा कर लिया हो।
मनु महाराज, आर्य नस्ल, बनावटी इतिहास।
आर्य बाहर से आए या यंहा से बाहर गए इस बहस में यंहा पड़ना बेकार है। पर ये सत्य है कि मध्य एशिया के कई समुदाय, ईरानी और भारत के ब्राह्मण एक ही नस्ल थे यानी आर्य। महाजल प्लावन वाले मनु जिनके कई नाम है और जिन्हें वैवस्त मनु भी कहा जाता है उनके समय आयी महाजलप्रलय के बाद मानवता 3 भागों में बंट गयी थी। जिनसे विश्व के 3 भूभाग में जीवन फेला, कुछ अपवाद के साथ। ये सप्तऋषि वाले या नौका वाले मनु स्वयं प्रलय के बाद मिडिल ईस्ट में जाके रुके थे। महाभारत इस स्थान का नाम नौबन्धन बताती है और इसी नाम के अपभ्रंश वाला स्थान आज भी इराक के पास उसी नाम से मौजूद है।
PN ओक और राम स्वरुप जैसे RSS के इतिहासकार ही येरूशलम और मक्का आदि को मूर्ति पूजक हिन्दू धर्म स्थल या मंदिर बताते आ रहे है। ऐसे लेखक ही भ्रामक तथ्य पेश करके ये साबित करना चाहते है कि विश्व भर में देवतावादी धर्म माना जाता था। इसके लिए ये उल्टे-सीधे तथ्य अपने मन और मत के अनुसार इधर उधर से जोड़ते है। जबकि उन्हें ये भी नहीं पता कि वैदिक सनातन धर्म और हिन्दू धर्म मे ज़मीन आसमान का अंतर है। ये क्रिश्चियनिटी को कृष्णनीति कहते है और मक्का को मक्तेश्वर आदि जिन्हें सुनके ही हंसी आ जाती है। ऐसे लेखको के लिए एक ही कहावत सत्य है। कंही की ईंट कंहीं का रोड़ा, भानुमति ने नाता जोड़ा।
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