ज़कात
का मतलब है बढना, फलना, फूलना यानी अखिरत में इसका अजर बढ़कर मिलेगा. इसका
मतलब तज़किया भी है यानि इससे आपकी दौलत पाक हो जाती है. ज़कात देना निसाब वाले के लिए फ़र्ज़ है। अरब में ज़कात पहले से ही जारी थी इसलिए कुरान ने ज़कात देने को कहा, इसकी तफसील नहीं बताई. ज़कात के मसाइल पर बहुत इख्तिलाफ हैं क्योंकि ये एक अमली मसला है. इसलिए बाज़ केसेस में इज्तिहाद होगा और इसलिए इखितलाफ़ भी होगा। अगर पहले आप से कम इल्मी की वजह ज़कात देने में कोई कमी रह गयी थी (जानबूझ कर नहीं), तो बदले में अब बकाया ज़कात देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अल्लाह इल्म के हिसाब पकड़ करेगा बाकी तकवे की बात अलग है.
इस्लाम ने 1400 साल पहले सबसे नीचली गरीबी रेखा फिक्स करी जो कि 7.5 तौला सोना है. यानि जिसके पास जाती ज़रूरत का समान छोड़कर इससे कम माल है वो गरीब है. ज़कात
को हकीर नहीं समझना चाहिए जैसी अन्य इबादतों को हकीर नहीं समझना चाहिए. जो
ज़कात को हकीर समझे, उसे समझाया जाना चाहिए. अक्सर ज़कात रमजान में निकालते
हैं पर यह कभी भी निकाली जा सकती है. ज़कात में डंडी मारने से बेहततर है कि ज्यादा दे दी जाए. ज़कात के मामलों में बचने से फंसने अच्छा है.
नबी
के दौर में जो माल इस्तेमाल में नहीं आ रहा अगर वो 7.5 तौले सोना या
52.5 तौले चांदी के बराबर है तो ज़कात देनी होती थी. सोना चांदी तब दोनों
करेंसी थे. उस वक़्त 5 ऊंट या 30 गाय या 40 बकरिया पर ज़कात थी. ये सब उस
वक़्त बराबर वैल्यू के थे. सोना आज भी केरेसी का बेस है मगर चांदी नहीं है.
इसी वजह से आज चांदी की वैल्यू गिर गयी है. बाकी चीज़ें तब के हिसाब से.आज
भी सोने के बराबर ही हैं. इसलिए आज सोने को ही निसाब मानना सबसे बेहतर है.
सोना आज भी अपनी अहमीयत वैसी ही रखता है.
आम तौर पर इस्लामी हुकूमत की 3 इनकम सौर्स मानी जाती हैं:-ज़कात, जिजिया (4 दीनार सालाना), माले गनीमत.
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ज़कात की क़ुरानी मदें और शर्तें।
कुरान ने 8 हेड (9.60) बताये हैं जिनको ज़कात दी जा सकती है। पहले
4 मदों वालों को मालिक बनाया जाना ज़रूरी है (भले वो अपनी मर्ज़ी से आपसे
खर्च करवा दें) क्योंकि यह लफ्ज़ ली के साथ आयें है. दूसरी 4 मदों वालों को
ज़कात इंडरेक्टली दी जा सकती है या उन मदों में खर्च करी जा सकती है क्योंकि ये लफ्ज़
फी के साथ आयें हैं. इन सभी मदों से बहार ज़कात देने के लिए हीले नहीं
निकाले जा सकते. अन्य जगह जहाँ मदद करने की ज़रूरत है, वंहा ज़कात से इतर
सदका- खैरात देना है. इन मदों में 2 जगह बहुत गड़बड़ है, एक आमीलीन और दूसरा
फीसबिलिल्लाह में.
1. फुकरा/फ़कीर: गरीब, ज़रूरतमंद. वैसे गरीब नहीं बस ज़रूरतमंद होना चाहिए, जिनके पास ज़रूरत का समान भी नहीं है, जो खुलके मांगते है।
2. मिस्कीन: जिसकी
ज़िंदगी ठहर गयी हो, चाल रुक गयी हो, कमाई जम गई हो, भले ही थोड़ा अमीर हो
या दिखता हो, जो इज़्ज़त की वजह से खुलके न मांग सकते हो। या वो जो सरवाईव तो
कर पा रहा हो पर दूसरी ज़रूरतें पूरी न कर पा रहा हो.
{ये लफ्ज़ स.क.न. माद्दे से जिसका मतलब है ठहराना, रुकना. इसी से सुकुन लफ्ज़ बना है. आम तौर पर फुकरा और मिस्कीन को थोड़े से फर्क के साथ एक सा तर्जुमा कर दिया जाता है मगर दोनों में फर्क है.}
3. अमीलीन: ज़कात वसूलने-इकठ्ठा करने वाले, हिसाब-किताब रखने वाले या नाफ़िस करने वाले। ये चाहे गरीब न हो पर ले सकते हैं.
{अब ये 40-60% तक कमीशन के तौर पर ज़कात लेने वाले रख लेते हैं. ये बात सबको पता नहीं है, अगर सबको पता लग जाये तो अक्सर लोग ज़कात नहीं देंगे. लाखो-करोड़ों
की रकम में यह कमीशन बहुत बड़ा हो जाता है. असल में यह एक मुनासिब रकम होनी
चाहिए और एक मेक्सिमम सीलिंग फिक्स होनी चाहिए.}
4. मुलत्तुल कुलूब: वो लोग जिनके दिलों को (इस्लाम के प्रति) नर्म करना (जीतना, कायल करना, करीब लाना) मकसद हो. आम
तौर पर ये गैर मुस्लिम होते है. इन्हें तो ज़ुरूर दें. इनमे वो लोग शामिल
हैं, जो इस्लाम अपनाना चाहते हो पर माली ज़रूरत के तहत ऐसा न कर पा रहे हो
या जो मुसलमान बनने माली परेशानी झेल रहे हों या जिनके दिल इस्लाम के
करीबतर हों. ये चाहे बहुत गरीब न हो फिर भी ले सकते हैं.
5. जिनकी गर्दने फंसी हो यानी ग़ुलामी से छुड़ाने के लिए. आज के दौर में जैसे जेल में बंद बेगुनाह या सिस्टम के सताए कैदी, झूठे कोर्ट केस में फंसे लोग, बंधुआ
मजदूर, जिस्मफरोशी में फंसी हुई औरतें, ब्लैकमैलिंग में फंसे हुए लोग आदि.
6. जो कर्ज़ में दबे हो. जो ज़रूरत पर लिया कर्जा न चुका पा रहे हो. ये उनके लिए नहीं है जिन्होंने शौक पूरा करने के लिए कर्जा लिया हो।
7. फीसबिलिल्लाह यानी अल्लाह (द.व.त) के रास्ते में. ये आम नहीं बल्कि मखुसूस मतलब है जैसे अल्लाह की राह में जहद वैगरह। पहले के दौर में उलेमा ने इसे सिर्फ ज.हद समझा था.
{ज़कात के सम्बन्ध में 'फीसबिलिल्लाह' हर नेक काम को नहीं कहते अगर ऐसा होता तो 8 हेड बताये ही नहीं जाते.}
8. मुसाफिरों के लिए. जो सफर पूरा करने में असमर्थ हो जाए.
हिंदुस्तान में हर
साल 25-40 हजार करोड़ ज़कात निकलने का अनुमान है. इसका लगभग 70% मदरसों को
जाता है, 20% इदारो को जाता है, 10% खुद लोगों को डायरेक्ट मिलती है.
मस्जिद,
मदरसे में ज़कात नहीं देनी चाहिए क्योंकि कुरान में इसका नाम नहीं है.
मस्जिद में ज़कात न देने पर उम्मत में इज्मा है. हर जगह मस्जिदे दीगर इम्दात
से बनती हैं. अभी जो मदरसों को ज़कात लोग इसलिए दे देते हैं क्योंकि वंहा
गरीब पढ़ते हैं. ज़कात के पैसे मदरसे के बच्चों को थमा कर वापिस मांग लेने का हीला भी किया जाता है. सही तरह जकात दी तो 8 साल में यही बच्चें खुद फीस देके पढगें. हज़रात उमर के दौर में ज़कात
लेने वाले नहीं बचे थे. ज़कात का सही सिस्टम बनने नहीं दिया जा रहा है. जो
ज़कात रख लेते हैं, वो भी बनने नहीं दे रहे है. सबको मिलकर एक सिस्टम बनाना
चाहिए. एक इदारा पर्सनल लॉ बोर्ड वगैरह की तरह बनाया जा सकता है, जो गलत तरह से ली-दी जा रही ज़कात को रोके, खुद ज़कात
मैनेज करे (करप्शन या बदनीयती के कारण अगर सरकार इसके पीछे पड़ जाए तो लोग
इसे ज़कात देने से इगनोर करके फिर से जाती तौर पर अपनी अपनी ज़कात देना शुरू
कर सकते हैं?). खुद तहकीक करके दीजिये कि सही जगह जा रही है या नहीं.
फिलहाल जारी ज़कात व्यवस्था के खिलाफ जो बोलता है, वो निशाने पर आ जाता है.
शरियत यह नहीं चाहती कि ज्यादा से जयादा लोग ज़कात दे बल्कि यह ज़रूरी है कि
उसकी रूह बाकी रहे.
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ज़कात की दरें
बाइबिल में भी ज़कात की एक यही दर मौजूद है जैसे मुसलमानों में हैं. नबी
ने जमा और पैदावार पर निसाब मुक़र्रर किया था जैसे आज टेक्स के लिए होता
है। जकात तीन चीज़ों पर होती है. रसूल के वक़्त में तीनों चीज़ माल-दौलत की निशानियाँ थी.
1. माल पर:-
सबसे पहले बचत या जमा की ज़कात है यानि माल या एसेट्स की, चाहे किसी भी शक्ल में हो. आपके पास जो भी एसेट्स होगी जैस पैसे (बैंक या घर में), सोने, चांदी, हीरे, जवाहरत, तिजारत का माल, प्लाट, एसेट्स (लिक्विड, नॉन लिक्विड), प्लाट रखा हुआ है, उस पर ज़कात दी जाएगी. एसेट्स की ज़कात के लिए एक तारीख तय करनी चाहिए जैसे 2 अप्रैल. इस पर यानि माल पर 2.50% ज़कात है. इसमें जाती इस्तेमाल की चीज़ें शामिल नहीं होगी चाहे कितनी भी तादात या मेहँगी हो जैसे घर, फेक्ट्री, गाड़ी, मशीनरी वगैरह. दुसरे शेहर या दुसरे देश में कभी कभी रहने के लिए खारीदा हुआ मकान भी ज़कात फ्री है.
इसमें जाती इस्तेमाल के ज़ेवर (रूटीन वियर) भी शामिल नहीं होंगे, भले ही कितने भी हो. जेवर अगर इस्तेमाल हो रहे हैं तो उन पर ज़कात नहीं है। क्योंकि इरादा कमाई से ज्यादा श्रृंगार का है. बल्कि बाज़ वक़्त तो ये जेवरात आगे नस्लों के हवाले कर दिया जाता है. अगर इरादा सेविंग्स का है तो ज़कात होगी। लड़की
की शादी के लिए इक्कट्ठा किये जा रहे ज़ेवर पर ज़कात नहीं है, जो वाकई उसके
पहनने के लिए हैं। इरादा सोने की जमाखोरी है तो अल्लाह देख रहा है। वैसे साल भर तक कोई जेवर नहीं पहना तो ज़कात देनी चाहिए. हनाफ के मुताबिक इस्तेमाल के जेवर पर ज़कात है जबकि दूसरों के मुताबिक जकात नहीं है. उस वक़्त हीरों-नगीनों पर ज़कात लेना मुमकिन नहीं था क्योंकि करेंसी नहीं थी और इन्हें काट कर वैल्यू खत्म हो जाती. मगर आज इन पर ज़कात लेना मुमकिन है क्योंकि करेंसी का दौर है. सोना, ज्वेल्स पर ज़कात लगती है क्योंकि इनकी वैल्यू बढती रहती है. [हालाँकि इस्तेमाल की चीज़ का मतलब यही होना चाहिए जितना किसी शख्स के लिए उपयुक्त है?]
कैश, बैंक बेलेंस पर भी ज़कात है क्योंकि वो भी माल है. हालाँकि उसकी वैल्यू बहुत हल्की रफ्तार से कम होती रहती है पर अगर कैश कंही लगा दिया जाये तो वो बढता है.
आम मत अनुसार इक्कट्ठा हुए माल पर एक साल बीतने के बाद ही ज़कात देनी होगी (हदीस में सोने और जायदाद पर साल भर बाद ज़कात देने का हुकम मौजूद है). जबकि दुसरे मत अनुसार ऐसा नहीं होगा बल्कि जिस तारीख को तय किया है, उससे एक दिन पहले आने वाला माल ज़कात
में आयेगा और एक दिन पहले जाने वाला माल ज़कात में नहीं आएगा [इससे हीलें पैदा हो सकते हैं?]।
पुराने ज़माने में शेहरो में सोना, चांदी ही माल था इसलिए इन पर ज़कात लगती थी. इसीलिए इन पर ज़कात का हुकूम अपने आप माल पर भी लग गया यानी जमा माल पर भी ज़कात देनी होगी. नबी के वक़्त में सोने, चांदी पर जकात देते थे मगर आज हम पैसों पर भी देते हैं क्योंकि ये आज की करेंसी है. यही वो वजह हैं, जिनके कारण बाज़ उलेमा खेती की पैदावार का हुकुम फक्ट्रियों की पैदावार पर भी लगाते हैं।
माल पर दी ज़कात पूरी ज़कात नहीं है क्योंकि पैदावार माल नहीं है और इसलिए पैदावार के लिए अलग मद चलेगी जैसे नबी ने ज़मीन की पैदावार पर अलग मदें बतायी थी (5/ 10/ 20%). हालांकि प्रोडक्शन के बाद बचा हुआ सामान (लेफ्ट आउट स्टॉक) माल या सेविंग है और इसलिए उस पर 2.5 ज़कात है. इसमें जो माल बिकने लायक नहीं है, वो ज़कात में नहीं आयेगा.
2. पैदावार पर:-
नबी
ने फरमाया था कि अगर किसी ने खेत में पानी का इन्तेजाम किया है तो उसकी 5%
ज़कात है, अगर आसमान की बारिश से खेती हरी हो गयी तो 10% और अगर खेत से
खज़ाना निकल आया तो 20%. खेती से होने वाली पैदावार पर नबी की तय की गयी ज़कात के सभी उलेमा कायल है मगर आम उलेमा फैक्ट्रीयों-कारखानों में होने वाले उत्पादन की कमाई को माल समझता है, न कि खेती की पैदावार कि मानिंद.
दुसरे मत अनुसार इसी उसूल को आज के वक़्त में हर तरह
के कारोबार, व्यवसाय पर लागू किया जायेगा यानी खेती के उसूलों से दूसरे प्रोडकशन पर ज़कात का निफाज़, इज्तिहाद से किया गया है क्योंकि नबी
के वक़्त में फक्ट्रियां नहीं होती थी बल्कि इंडस्ट्रियल रेवोलुशन के बाद
फक्ट्रियाँ बड़े स्तर पर बनी है. इसलिए एसेट्स के बाद आमदन या पैदावार पर ज़कात है यानी उत्पादन, प्रोडक्शन पर. क्योंकि जंहा से आपकी आमदनी हो रही है, वो आमदनी एक प्रोडक्शन ही है. जैसे आपकी कोई जरई पैदावारी यूनिट है, जैसे कोई फैक्ट्री, काम्प्लेक्स, ज़मीन, प्लाट है (जिसका किराया आता है), कोई स्कूल, इदारा है (जिसकी फीस लेते हैं), आप कोई प्रोफेशनल जैसे डाक्टर, वकील है (जिसकी चार्जेस लेते हैं), आप नौकरी करते हैं (तनख्वाह मिलती है). जैसे ही इनकी आमदनी, प्रोडक्शन होती है, उस पर 5% या 10% या 20% ज़कात लागू हो जाती है. यानी यह रोज़ भी लागू हो जाती है. एक मतानुसार यह ग्रोस पर दी जायगी, नेट पर नहीं यानि बिना खर्चे निकाले।
अगर प्रोडक्शन, सरमाये (माल) और मेहनत दोनों से हो रही है तो 5% (निफ्स उशर). अगर सिर्फ सरमाये या सिर्फ मेहनत से हो रही है तो 10% (उशर). अगर दोनों के बिना हो रही है तो 20% (ख़ुम्स) जैसे ज़मीन से खज़ाना, तेल निकल आना. उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले समान पर ज़कात नहीं होती है. कितनी महंगी एसेट्स हो, अगर उसे प्रोडूक्शन में लगा दिया है तो उसके किराए पर 10% ज़कात है। किराये या तख्खाव्हो पर 10% जकात है. अगर आपका कंही (बैंक) डिपाजिट पर रिटर्न आ रहा है तो यह प्रोडूक्शन का टूल बन गया है, इसलिए सिर्फ रिटर्न पर 10% ज़कात होगी [सरकार इसे टेक्स काट आपको दे तो अलग बात हो सकती है?].
3. मवेशियों पर:-
तीसरी चीज़ है, पशु पालन, डेरी फार्म. उस वक़्त देहात, कबीलों में पशु माल ही माने जाते थे. इस पर एक अलग निसाब है जैसे 5 ऊँटों या 30 गायों या 40 बकरियों पर ज़कात होगी.
[इसे गाड़ियों पर लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि गाड़ियों की डेप्रिसिएशन लगती है?]
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Wealth and Income Tax as of Today
1.
Wealth/Savings/माल (including Cash and left out stock but except that of Personal Use) = 2.5%.
Difference of Opinion:- Due after one year OR the date as fixed,
As per one view if a date has been fixed then on this date whatever is in will be accountable and whatever out, won't but this can make people to be manipulative?
If one is generating revenue after investing Wealth then revenue (from Production/Investment) will Zakat-able and not Wealth. Only blocked wealth is Zakat-able.
2.
Production/Farming/Income = 5/10/20%.
Difference of Opinion:- Due on daily basis too but can be given at the end of year on Gross Profit and not on Net Profit, after deducting main expenses like electricity, fare, daily office expenses but must not deduct personal expenses. Deduct leftout stock and unsalable products.
{On Factory, Complex, Rent, Fee Charges, Deposit Return, Salary after deducting fare, too}
But how can one give 5% tax, if the product's profit margin is less than 5%???
As per one view, Production is also wealth but how???
How to fix Nisab on different types of products as Dates & Wheat used to have?
3.
Zakat/Tax to Govt
Difference of Opinion:- One view is that all the taxes will be included as Zakat like Income, GST, Property, Direct & Indirect, Road & Toll, Capital Gain, Stamp duty etc. Second view is that categories of Tax and Zakat are different, Tax rates are variable (Govt. has made so but its not necessary for them), one year period not compulsory for tax (so does for Zakat in Wealth & Production), Tax does not facilitates poor/needy only but all (on the contrary, Zakat is for poor/needy only as Quran categorizes so it seems valid point), Zakat is not paid by Non-Muslims (but today tax is paid by them. Jazya
was not there as a tax for Non Muslims but for protection and Quran has not prescribed expenditure categories for it. Zakat was not there as a tax but for certain welfare and Quran has prescribed expenditure categories for it. For Muslims & Non- Muslims both, some other tax may be there as Quran has not limited us on it), Prophet established Zakat collection system as Allah ordered and not Tax collection system (seems that Zakat is a religious concept and not a tax).
It appears that Govt can utilize Zakat only as per Quranic categories and for other purpose, Govt. should utilize other taxes or Jazya (which is not applicable now).
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माल और आमदनी पर ज़कात
एक मत अनुसार फैक्ट्रियों-कारखानों के उत्पादन को माल या वेल्थ ही माना जाता है [माल या पैदावार के निसाब के बराबर?].
माल
को लगा कर इनकम हो रही है तो माल पर नहीं बल्कि इनकम पर ज़कात देगा. जो माल
कमाने में लगा है, उस पर ज़कात नहीं होगी. जो बेकार पड़ा है, उस पर ज़कात
होगी ताकि स्टेगनेशन न हो जाए. इस्लाम के मुताबिक़ माल ब्लोक नहीं होना चाहिए बल्कि माल से आमदनी होनी चाहिए. अगर माल को रोका तो उस पर ज़कात लगती रहेगी और कुछ सालों में ही खतम हो जाएगी क्योंकि माल रुकने से कीमते बढती हैं. इसीलिए माल इस्तेमाल में लाने से यानी आगे मार्किट- धंधों में लगाने से ज़कात अपने आप कम हो जाती है क्योंकि इससे माल सर्कुलेशन में आता है, इकॉनमी बढ़ती है, लोगों को एम्प्लॉयमेंट मिलता है. इसलिए
सोने चांदी के बर्तन रखना मना थे, मर्दों को सोना पहनना भी मना था क्योंकि इससे माल जमा हो जाता था. मगर औरतों को
सोना पहनने की इजाज़त दे दी थी क्योंकि ये उनके मिजाज़ के हिसाब से उनकी फितरती ज़रूरत थी, उनके जेनब
का हिस्सा था.
नए ज़माने में जैसे इनकम टैक्स आमदनी पर होता है, वैसे ही वेल्थ टैक्स माल पर होता है. माल और आमदनी दोनों पर ज़कात है. असल में माल तो अल्लाह का है. खेती में निफ्स और ख़ुम्स (मिकदार) ज़कात दी जाती है [अल्लामा इससे इत्तेफाक रखते हैं].
वक़्त के साथ जिनकी वैल्यू बढती है, उन पर ज़कात होती है. जिनमें बढ़ने की सलाहियत हो, उन पर जकात लगेगी. जैसे रखा हुआ पैसा इस्तेमाल करेगा तो वो बढेगा या जैसे जानवर पालेंगे तो वो भी बढ़ेंगे. वैसे जानवर की भी एक उम्र तक कीमत बढती रहती है.
कुरान ने कहा कि फसल की कटाई के दिन ज़कात दे दो. वैसे ही जब सैलरी आ जाये तो ज़कात दे दो. फिक्सड इनकम आने पर तभी ज़कात देना आसान है वरना बाद में इकट्ठी देना भारी लगेगा. इसे साल भर नहीं जोड़ें. सैलरी वाले अपना आने-जाने का किराया या पेट्रोल आदि का खर्चा इसमें से घटा सकते हैं क्योंकि वो मुख्य खर्चा है.
आज बिजनेस पहले जैसे नहीं है. बड़े- छोटे बिजनेस सभी में कैपिटल (कैश/माल) और इन्वेंटरी (स्टॉक) दोनों लगातार घटते-बढ़ते रहते हैं, नुकसान-फायदे होते रहते हैं. इसलिए बैलेंस शीट के हिसाब से ज़कात साल के अंत में दें. अगर कैपिटल और अन्य चीज़ो से बिजनेस चल रहा है और इनकम जनरेट हो रही है तो ग्रोस प्रॉफिट पर ज़कात देंगे मगर ट्रेडिंग अकाउंट के ग्रोस प्रॉफिट में से बिजनेस को चलाने वाले ज़रूरी मुख्य खर्चे निकालने के बाद जैसे बिजली का बिल, गाड़ी का किराया, ऑफिस के रोजमर्रा खर्चें वगैरह. पर इसमें से जाती या घेरलू खर्चे नहीं निकालने है क्योंकि पर्सनल नेचर के खर्चे प्रॉफिट एंड लोस अकाउंट में से घटाने पर नेट प्रॉफिट आता है और नेट प्रॉफिट पर ज़कात नहीं देनी होती है. अगर कोई गलत आईटीआर डिक्लेअर कर रहे हैं तो अपने लिए सही बनाकर ज़कात दें.
Balance Sheet shows financial position. It include Assets (Right Side) like Cash, Debtors, Stock, Fixed Assets and Liabilities (Left side) like Capital, Creditors, Loans [Capital=Assets−Liabilities OR Assets=Liabilities+Capital]
Trading Account shows Gross Profit or Gross Loss. It include only Direct income and Direct expenses (Before goods are ready like Wages, Carriage or Freight Inwards, Power & Fuel for Production, Factory Rent, Packing) related to buying and selling goods like Opening stock, Purchases, Wages, Carriage inwards (Dr. side) and Sales, Closing stock. (Cr. side)
[Gross Profit=Sales−Cost of Goods Sold]
Profit & Loss (P&L) Account (after Trading Account) shows Net Profit. It includes Indirect incomes and Indirect expenses (After goods are ready like Office Rent, Staff Salaries, Stationery, Advt., Depr., Insurance, Post, Telephone) like Rent, Salaries, Advertising, Depreciation and Commission received, Interest received.
[Net Profit=Gross Profit+Other Incomes−Indirect Expenses]
सरकार को दिए टैक्स में ज़कात
एक मत अनुसार ज़कात माल पर टैक्स है। ज़कात कोई चैरिटी नहीं है. यह इश्तेमायी नज़म का हक है. पुराने ज़माने में कबीलाई निजाम के बाद रियासतें बनना शुरू हुई. हालाँकि कबीलाई निज़ाम के भी अखराजात होते थे. ज़कात हुकूमत का हक है क्योंकि हुकूमत चलाने के लिए टैक्स की ज़रूरत होती है. हुकूमत इसके लिए बहुत ज़ुल्म करती रही है जैसे बादशाह किसानो पर ज़ुल्म करते थे. आज तो अवाम टैक्स बचाने के लिए हर हथकंडे अपनाती है. अल्लाह का हुकुम है कि किसी की जान, माल, आबरू पर ज़बरदस्ती नहीं कर सकता. इसलिए अल्लाह ने इसकी मिकदार खुद तय कर दी. यानि मुसलामों की हुकुमतो के लिए ज़कात ही टैक्स है.
ये असलन हुकूमत का हक़ है जैसे जुमे की नमाज़ हाकिम का हक है। जैसे जुमे की नमाज़ हुकमत से जोड़ दी गयी है वैसे ही ज़कात भी हुकूमत से जुडी है. हुक्मतों को ज़कात लेने, नमाज़ों का एह्त्मान करना और जुमे का खुतबा देने की ज़िम्मेदारी है. उनको अमर बिल मारूफ वा (और) नही अनिल मुनकर पर काम करना. उनको ज़ुल्म के खिलाफ जहद, कताल, जंग करना है. उन्हें मुजरिमों को अल्लाह की तयशुदा सजाए देनी है.
अल्लाह ने इसे इबादत बना दिया. यानी अपने माल की ज़कात निकाल कर उसे अल्लाह को नजर कर देता हूँ और फिर आगे इसे हुकूमत को दे देता हूँ. अगर हुकूमत न ले तो मैं खुद माशरे को दे दूंगा यानी हुकूमत ज़कात न ले तो खुद ही ज़कात निकालनी है। ये बन्दे की तरफ से ज़कात है मगर हुकुमत के लिए टैक्स है.
नबी के वक़्त में हाकिम ज़कात लेता था. ज़कात पर पहला हक रियासत है इसलिए वो आपसे ज़बरदस्ती भी ले सकते हैं. उलेमा में इज्तिमा है कि हुक्मरान ज़बरदस्ती ज़कात ले सकते हैं. जैसे माँ बाप, बीवी बच्चो के साथ रिश्ता कायम होने पर उनके खर्चा उठाना पड़ता है, वैसे ही हुकूमत से भी नज़्म का रिश्ता कायम होने पर ज़कात लाज़मी है. सुरह तौबा में बताया गया है कि हर शहरी शक्श को हुकूमत को ज़कात देनी होगी. रसूल के बाद लोगो ने हुकूमतों को देने से इंकार कर दिया. इसलिए हज़रत अबू बकर ने कार्यवाही करके जबरदस्ती ज़कात ली थी. नबीं ने भी फरमाया है कोई न दे तो हम ज़कात ले लेंगे.
हुकूमत को चाहिए कि इसे इस्लाम अनुसार ले. रियासत को अल्लाह की तय मिकदार लेने का ही हक़ है. अगर कोई हुकूमत इस्लामी निसाब से ज़कात नहीं ले रही है तो जैसे ले, वैसे दे दें. हम अपनी ज़कात का इस्लाम अनुसार हिसाब लगा कर उसे टैक्स में एडजस्ट कर सकते हैं. जितनी ज़कात बनती है अगर इतना सरकार को टैक्स दे चुके हैं, तो ज़कात अदा हो गयी. अगर ज़्यादा बैठ रही है तो बाकी अदा कर दें. टेक्स देने के बाद ज़कात किसी भी मुस्ताहिक को दी जा सकती है, गैर मुस्लिम मुस्तहिक को भी.
[बेहतर रहेगा कि बाकी रकम को सरकार की बजाए ज़रूरतमंदों को दे दें क्योंकि सरकार ज़कात के इस्लामिक नियम पहले फोलो नहीं कर रही है?]
नबी ने अपने वक़्त के हिसाब से निसाब तय किया था. हुकूमत ज़रूरत के मुताबिक़ ज़कात का निसाब, कम या ज्यादा कर सकती है और चीजों को ज़कात से एग्ज़ेम्प्ट भी कर सकती है पर वो ज़कात की मदें नहीं बदल सकती. जिस चीज़ के निसाब पर नबी का हुक्म मौजूद न हो तो सरकार द्वारा तय किये गए निसाब को भी मान सकते हैं. जंग, सैलाब, भूकंप वगैरह की वजह से या जरूरत पड़ने पर अगर कोई सरकार बढ़ाकर टेक्स लेना चाह रही है तो हुकूमत को बातचीत के ज़रिये अवाम की रजामंदी लेनी होगी.
ये वैसे ही जैसे किसी को आपके पैसे देने थे पर वो दे नहीं रहा था, आपके पास उसके कुछ पैसे आ गए और आपने रख लिए. बनू उमय्या ने जब कुछ टैक्स लगाये थे तो सहाबा और ताबयीन ने यही किया था. नबी ने फरमाया कि क़यामत के दिनी टैक्स लेने वालो अल्लाह के हुजुर में खड़े होंगे यानि उसूलन हुकूमतों को सिर्फ ज़कात लेने का हक है.
चाहे कोई भी देश हो, हुकूमतें ज़बरदस्ती टैक्स रुपी ज़कात ले लेती हैं. इसमें यह नहीं देखा जायगा कि सरकारी कामों से सिर्फ मुस्ताहिक ही फायदा उठाये, कोई भी उठा सकता है. हुकमत इस पैसे से पब्लिक वेलफेयर के काम करेगी जैसे अस्पताल, सड़के, स्कूल बनाना, फौज और सरकारी मुलाज़िमों का तनख्वाह देना.
इस मतानुसार ज़कात
को टैक्स में एडजस्ट करने के लिए सभी तरह के टैक्स शामिल किये जायेंगे
जैसे सेल्स, इनकम, वेलद, प्रॉपर्टी, डायरेक्ट, इनडायरेक्ट टैक्स.
जबकि दुसरे मत अनुसार टैक्स से ज़कात अदा नहीं होगी क्योंकि ज़कात टैक्स नहीं है और जकात की मदें और टैक्स की मदें अलग अलग हैं. टैक्स रेट कम-बढ़ाई जा सकती है जबकि ज़कात की नहीं. एक साल गुजरने की कोई शर्त टैक्स में नहीं होती है. टैक्स से ऐसे काम किये जा रहे होते हैं जिनसे सबको फैसिलिटी मिल रही होती है जबकि ज़कात तो मुख्यता गरीब का हक था. कुरान (9.103) में अल्लाह ने नबी को ज़कात लेने का हुकुम दिया, इसलिए नबी ने इसे कलेक्ट करने का निज़ाम बनाया, न कि टैक्स के लिए. आज जकात इकट्ठा करने के लिए हमारे पास ऐसा निजाम नहीं है. हमारी बनायीं हुई मदें, अल्लाह की कुरान में बताई मदों से ज्यादा बड़ी नहीं हो सकती.
ज़कात के मसाईल और हल
● नेक कामों में ज़कात?
एक मत अनुसार, सभी नेकी-खैर के काम में ज़कात खर्च करी जा सकती है जबकि दुसरे के अनुसार नहीं.
एक मत अनुसार, सभी नेकी-खैर के काम में ज़कात खर्च करी जा सकती है जबकि दुसरे के अनुसार नहीं.
● गैर मुसलामानों से जकात लेना?
ज़कात मुसलमानों के लिए एक महज़बी फ़र्ज़ है. गैर मुसलमानों से ज़कात नहीं ली जा सकती. उन्हें बातचीत के बाद कुछ और मुनासिब टैक्स देना होगा. बेहतर लगे तो ज़कात भी दे सकते हैं. उनसे जिज़िया नहीं लिया जा सकता.
● गैर मुसलिम सरकार को टैक्स के रूप ज़कात देना?
गैर
मुस्लिम हुकूमत भी ज़बरदस्ती आप से टैक्स ले रही हैं और वो भी वही काम कर
रही है जो मुस्लिम हुकुमत ज़कात से करती तो उन्हें भी जकात देने में कोई
हर्ज़ नहीं. कोई सरकार गैर इस्लामी कामों में खर्च कर रही है तो हमें सिर्फ
यह देखना है कि मज्मुयी तौर पर वो सही जगह खर्च कर रही है या नहीं. क्योंकि
माइनर लेवल पर तो मुस्लिम हुक्मते भी गलत कामों में खर्च कर सकती है.
● गैर मुस्लिम इदारे को ज़कात देना?
ज़कात
को देते हुए देखना चाहिए कि वो कंहा इस्तमाल होगी. अगर किसी दीनी इदारे को
दोगे तो देखना होगा कि मज्मुयी तौर पर वो क्या करती है जैसे फिरकावारियत,
बिदत, शिर्क, फितने तो नहीं फैलाती मतलब उसका मकसद क्या है. चर्च वगैरह को
भी देते हुए यही ख्याल रखंगे कि उनका मुख्य मकसद या कार्य क्या है. जैसे
किसी शिर्क में शामिल अफराद को दीनी नहीं बल्कि उसकी गरीबी की बुनियाद पर
ज़कात दी जाती है. इदारे और अफराद के मक़सद और ज़रूरत में फर्क है.
● ज़कात का मालिक बनाना?
बाज़ उलेमा की राय है कि ज़कात
देने के लिए मालिक बनाना लाज़मी है मगर इस पर इख्तिलाफ भी है. यह कोई शर्त
नहीं है. बिना मालिक बनाये भी ज़कात दी जा सकती है. क्योंकि आप अस्पताल
बनाये या मरीज़ को दे दे, दोंनो एक ही बात है. कंही
नहीं लिखा हुआ कि ज़कात देते हुए बताया जाय कि ज़कात का पैसा है. कुरान में
जो पहली 4 ज़कात के लिएय मदें बताई गयी है वो लफ्ज़ ली के साथ आती है इसलिए
उनके लिए मालिक बनाना ज़रूरी माना जाता है पर यंहा इस ली के मायने उन्हें देने से नहीं बल्कि उनके
लिए देने से है (in/for the benefit of them) यानी उन्हे मालिक बनाना
ज़रूरी नहीं है.
● मर चुके क़र्ज़ को ज़कात मानना?
कर्ज़
वापिस नहीं आ रहा है क्योंकि वाकई देनदार की हैसियत नही है, तो उसे ज़कात
मानने की नियत करके छोड़ा जा सकता है, उसे यह बताए बिना भी। वो देने के लायक
है मगर नहीं लौटा रहा तो फिर इसे ज़कात नहीं माना जा सकता।
● ज़कात के हक़दार?
जो
जितना करीब है, उसका उतना हक है (अज़ीज़, करीब, गिर्दोपेश वाले, पडोसी,
रिश्तेदार). ज़कात देने के बाद भी आप अपने करीबियों की ज़रूरतों में मदद
करंगे. पहली ज़िम्मेदारी आस पास वालो का ख्याल रखना है.
● मां-बाप, भाई-बहन, मियाँ-बीवी, औलाद को ज़कात?
बाज़
वक़्त बहार वालों से ज्यादा ज़कात की जरूरत घरवालों को होती है. कुरान ने
घरवालों को जकात से महरूम नहीं किया है.
वालिदैन को ज़कात दी जा सकती है। उन्हें इसका पहला
हक़ हासिल है। अगर वो बूढ़े, बीमार है, तो उनकी ख़िदमत करें, पर अगर उन्हें
इससे ज़्यादा की ज़रूरत है तो ज़कात भी दे सकते हैं जैसे किसी गैर को ज़कात की
ज़रूरत होती है। बच्चे बड़े होकर अलग रह रहे हैं और उन्हें ज़रूरत पड़ती है तो उन्हें भी ज़कात दी जा सकती है. बाप
का बच्चों का और बच्चों का बाप का खर्चा उठाना फ़र्ज़ है. मगर इसे खर्चे के
अलावा भी इनकी बाज़ ज़रूरतें पैदा हो जाती है जैसे कर्जा, बिजनेस लोस वगैरह.
ऐसे में इन्हें जकात दी जा सकती है.
बच्चो की और बीवी शौहर की भी इसी तरह मदद कर सकती हैं। ज़रूरत में मदद के तौर पर मिया बीवी एक दुसरे को ज़कात दे सकते हैं. बाहर वालों की तरह ही भाई बेहन को ज़कात दे सकती है। घर में किसी का ज़रूरी ओपरेशन करवाना है और ज़कात के ही पैसे रखे हैं तो वंहा ज़कात लगायी जायगी, बल्कि देखा जाये तो आप उन पर पहले पैसे खर्च करेंगे और फिर निसाब का हिसाब लगायेंगे या पैसे न होने पर आप खुद ओपरेशन के लिए ज़कात के हक़दार हो जायंगे
[इन सभी की ज़कात देने वाले पर डिपेंडेंसी देखी जानी चाहिए?]
● बीवी के बदले पर खाबिन्द द्वारा ज़कात देना?
अगर कोई हाउसवाइफ है या किसी लेडी का काम छोटा सा है तो खाबिन्द ज़कात देगा।
● दीनी मकासीद में ज़कात?
आपकी
दौलत पर पहला हक़ आपके करीबी ज़रूरतमंदों का है फिर दीन के काम में. दीन के
नुसरत के काम में खर्च करना एक नफिल काम है और इसे अल्लाह को दिए क़र्ज़ का
नाम दिया गया है. दीन के लिए देने से पहले अपने करीबियों की राय ले लीजिये कंही आप किसी का नाहक तो नहीं कर रहे.
● मस्जिद/मदरसे/इस्लामी स्कूल, तालीम के लिए ज़कात?
एक मत अनुसार मस्जिद,
मदरसे, इस्लामी स्कूल बनाने या इनके बच्चे की तालीमी खर्चे उठाने के लिए
ज़कात इस्तेमाल करी जा सकती है. इसी तरह इस मत अनुसार आज तालीम बहुत महंगी हो गयी है इसलिए किसी
बच्चे की तालीम के लिए भी ज़कात दी जा सकती है। अभी जो मदरसों को ज़कात लोग इसलिए दे देते हैं क्योंकि वंहा
गरीब पढ़ते हैं.
● तंजीमों, अस्पतालों को ज़कात?
एक अनुसार तंजीमों
को ज़कात नहीं देनी चाहिए क्योंकि वो हीलो के ज़रिये ज़कात इस्तमाल कर लेते
हैं. ऐसी तंजीमों की कमाई के लिए दुसरे इंतज़ाम होने चाहिए.
इसी तरह अस्पताल की बजाये मरीजों को ज़कात देना बेहतर है क्योंकि अस्पताल मरीज़ को ज़लील करते हैं.
● किस्तों, किराये या खरीद-फरोख्त पर ज़कात?
इन्वेस्टमेंट के तौर पर किस्तों पर घर लिया है तो जितनी क़िस्त जा चुकी है, उतनी रकम पर ज़कात जायेगी. अगर किस्तों पर ज़ाती ईस्तमाल के लिए घर लिया है ताकि बाद में उसे बेचकर बढ़ा घर लेना है तो इस पर ज़कात नहीं होगी। पैसे जोड़ जोड़ कर, घर में में कुछ न कुछ
तामीर करवाते रहते हैं ताकि रहा जा सके तो इस पर भी जकात नहीं होगी.
जगह खरीदते- बेचते रहते हैं ताकि आखिर में रहने लायक उचित घर लिया जा
सके तो इस पर जाकत नहीं होगी. कमाई के लिए ज़मीन बेचते-
खरीदते रहते हैं तो जो फायदा होता है उस पर जकात होगी. पर अगर ज़मीन या जगह
लेके यूँही डाल रखी है तो उसकी वैल्यू पर ज़कात होगी. जगह खरीद कर भाड़े पर चलाते हैं तो किराये पर ज़कात होगी.
● डिपॉजिट्स पर ज़कात?
जो आपके मालिक, सरकार ने आपके पैसे डिपॉजिट्स, स्कीम, PF
वगैरह के तहत जमा करके रखा है, उस पर तब ज़कात होगी, जब वो पैसा आपको
मिलेगा। किसी स्कीम में रखे गये फण्ड पर ज़कात नहीं मगर उससे मिलने वाले
जायद पर ज़कात होगी. जकात किसी ट्रस्ट को फंडिंग के लिए दी जा सकती है, उससे
मिलने वाले प्रॉफिट खुद नहीं लिया जाएगा.
● बार्टर फॉर्म में ज़कात?
नबी
के ज़माने में बार्टर सिस्टम मौजूद था, कोमोडोटीज़ पर कोमोडोटीज़ की फॉर्म
में ही आमतौर पर ज़कात दी जाती थी। ईज़ी करेंसी मौजूद नहीं थी। पर आज करेंसी
का ही दौर है। इसलिए करेंसी ही बेहतर है। मगर कोमोडोटी फॉर्म पर भी कोई रोक
नहीं है। यही अल्लाह की हिकमत लगती है। इसलिए ज़कात के बदले सामान लिया जा
सकता है जिन समान की ज़रूरत है. माज बिन जबल ने नजरान वालों से यमनी चादरें
और कपडे लिए थे जिनकी मदीना में ज़रूरत थी. ऊँटो पर ज़कात के बदले बकरी दी जा
सकती है. हालांकि देने वाले को अपने मुताबिक नहीं बल्कि ज़रूरत (ज़कात
इस्तेमाल करने वाले के हालात, आदतें, जारी आपदा वगैरह) के मुताबिक फॉर्म ऑफ
पेमेंट अपनानी चाहिए क्योंकि उसे जवाब दुनिया को नहीं अल्लाह को देना
होगा। ज़कात पाने वाले से भी मशवरा भी किया जा सकता है।
● क़र्ज़ पर जकात?
दिए
हुए कर्जे पर ज़कात नहीं है मगर लिए हुए कर्जे पर ज़कात है अगर इसे मिलाकर
कोई साहिबे निसाब हो गया है तो. माल वो माना जाएगा जो आपके कब्ज़े में हो और
उसका आप जैसा चाहे इस्तेमाल कर सकते हो.
[ये अल्लामा का मौकिफ है. मगर ये तो उसका है ही नहीं, इसके ज़रिये तो उसे कमाई करनी है तो कमाई पर ज़कात होनी चाहिए?]
गैर मुसलमानों को ज़कात देना
क्या
भूख और गरीबी भी हिन्दू-मुस्लिम होती है। फकीर कोई भी हो सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई
जानकार या पड़ोसी ग़ैर मुस्लिम गरीब, भूखा और पाई-पाई को परेशान है। और हम ये
बात जानते हुए भी उसे छोड़ कर किसी गरीब भूखे मुसलमान को खोजने निकले हुए
ताकि उसे ज़कात दे सके। उस गरीब गैर मुस्लिम को कैसा लगेगा कि करीब में
मौजूद मुस्तहिक़ को छोड़ कर ये बाहर किसी मुसलमान मुस्तहिक़ को ढूंढता फिर रहा
है। ऐसा अल्लाह दीन हो ही नहीं सकता जिसमें ज़रूरत भी मुस्लिम और गैर
मुस्लिम हो जाए।
एक मौकिफ़ अकलियत में ये भी पाया जाता है कि अगर ज़कात के मुस्तहिक़ मुसलमान नहीं हो तब तो गैर मुसलमानों को दी जा सकती है. वरना ज़्यादातर आलिम यही कहते है कि ज़कात गैर मुसलमानों को नहीं दे सकते और उन्हें मदद के तौर पर आम सदक़ा दे। हालांकि फितरा ग़ैर मुस्लिमो को दिया जाता है इसलिए आम नफिल सदक़ा या खैरात ग़ैर मुस्लिमो दी ही जा सकती है। जबकि क़ुरान में ऐसी कोई बात नहीं कही गयी है कि गैर मुस्लिम को ज़कात नहीं दी जा सकती
है.
(1) ज़कात
किसी को भी दे सकते है चाहे मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम हो बस वो सच में
मुस्तहिक़ होना चाहिए। क़ुरान ज़कात के बारे में ज़िक्र करता हुआ ये शर्त नहीं
रखता की इसे सिर्फ मुस्लिमो को देनी है।
(2) पिछली
शरीयतों में भी ज़कात का हकुम था। बाइबल और यहूदी तारीख़ में ज़कात की निसाब
और मिक़दार का ज़िक्र है। हज़रत मूसा और ईसा के मानने वाले ज़कात देते थे। यंहा
भी गैर मज़हबी लोगों को ज़कात देने से कंही भी मना नहीं किया गया है। यही सुन्नत मुसल्मानों को भी जारी की गई।
(3) एक
बार सैयदना अस्मा ने हुज़ूर से पूछा कि उनकी मां मुस्लिम नहीं है तो क्या
वो उन्हें सदक़ा दे सकती तो आपने फरमाया बिल्कुल दे सकती हो।
(4) इस
मौकिफ़ के खिलाफ एक हदीस पेश की जाती है जिसमें हज़रत माज़ बिन जबल को जब
अहले किताब के पास यमन की ओर भेजा तो नबी ने फरमाया की अगर वो दीन कुबूल
करले तो उनको कहना कि ज़कात दो क्योंकि ये तुमहारे अमीरों को लेके तुम्हारे
गरीबो को दे दी जाती है। इससे उलेमा ने गलत मतलब निकाला की मुसलमानों से
ज़कात लेके सिर्फ मुसलमानों को दी जाएगी। जबकि इसका असल मतलब ये हुआ कि जो
इमाम लाएंगे उनसे ज़कात लेके उन्ही के लोगो को दी जायेगी भले ही उनमें
मुसलमान हो या अहले किताब। यंहा ये नही कहा कि तुमसे लेके मुसलमानों को दी
जायगी।
(5) बाज़
सहाबा के वाक्यों से ये एहसास होता है कि कुछ ग़ैर मुस्लिमो को ज़कात नहीं
देना चाहिए जबकि यंहा ये समझना जरूरी है कि सहाबा के सामने गैर मुस्लिम
काफ़िर और मुश्रिक लोग थे जो अल्लाह के अज़ाब के मुस्तहिक़ हो चुके थे और गर्त
में जाने वाले थे इसलिए उनको ज़कात देना तो अल्लाह के खिलाफ अमल करना था।
इसलिए इन वाक्यों को क़ुरान और रसूल के ऊपर लिखे गए हुकुम के मद्देनजर देखा
जायेगा जंहा ये साफ हो जाता है कि गैर मुस्लिमों की कोई शर्त नहीं है।
(6) एक दलील दी जाती है कि हज़रत उमर ने ये फैसला करा कि वो गैर मुस्लिम को ज़कात नहीं देंगे। इसका मतलब हुआ कि हज़रत उमर के इस फैसले से पहले ज़कात गैर मुस्लिमों को दी जाती रही होगी। ये उनका एक हूकूमती फैसला लगता है जो कुछ मसलिहत के तहत किया गया होगा जैसे उस वक़्त मुसलमानों को ज़कात की ज्यादा ज़रूरत हुई होगी।
(7) ये बात आम तौर पर मानी जाती है कि ज़कात इकट्ठा करने वाला अगर कोई गैर मुस्लिम है तो उसको ज़कात का हिस्सा दिया जा सकता है जैसे बैंक मनी ट्रांसफर चार्ज लेता है या एजेंट एक्सचेंज रेट लेता है। इस तरह ज़कात वाकई गैर मुस्लिमों को हासिल हो रही है.
(8) क़ुरान ने खुद गैर मुसलमानों के लिए एक खास मद (जिनका दिल इस्लाम के प्रति नर्म करना हो) बना कर दी है। हो सकता है ज़कात के जेस्चर के बदले उसका इस्लाम की तरफ रुझान पैदा हो जाए।
हज़रत मुजाहिद इब्न जबर का मौकिफ़ है जो ताबइन और ह. इब्न अब्बास के शागिर्द थे। इसकी बुनियाद मुसन्नफ इब्ने शयबा की (3.177) हदीस है जिसमका महफूम है कि नबी ने फरमाया की सभी मज़हब वालों की इज़्ज़त करो, परवाह करो और उन्हें दान दो।
एक बार हज़रत उमर से किसी ने पूछा कि क्या दान केवल बेसहारा के लिए है, उन्होंने कहा की वो अहले किताब के पंगु लोग है। जाबिर इब्न ज़ैद जो एक ताबाईन आलीम थे, उन्होंने कहा है कि मुस्लिम और जिम्मी लोगों के बेसहारा लोगों को ज़कात देनी चाहिए क्योंकि नबी ने ज़िममियो के बेसहारा को ज़कात और ख़ुम्स दोनों में से दिया है। ऐसा ही मौकिफ़ कुछ इमाम ज़ुफर हनफ़ी का था। इसकी बुनियाद मुसन्नफ इब्ने शयबा की (3.178) हदीस है।
एक बार हज़रत उमर से किसी ने पूछा कि क्या दान केवल बेसहारा के लिए है, उन्होंने कहा की वो अहले किताब के पंगु लोग है। जाबिर इब्न ज़ैद जो एक ताबाईन आलीम थे, उन्होंने कहा है कि मुस्लिम और जिम्मी लोगों के बेसहारा लोगों को ज़कात देनी चाहिए क्योंकि नबी ने ज़िममियो के बेसहारा को ज़कात और ख़ुम्स दोनों में से दिया है। ऐसा ही मौकिफ़ कुछ इमाम ज़ुफर हनफ़ी का था। इसकी बुनियाद मुसन्नफ इब्ने शयबा की (3.178) हदीस है।
औरतों के ज़ेवरात पर ज़कात देने की हदीसें
नबी इस्तेमाल की चीज़ों पर जकात नहीं लेते. सहाबा में इस पर इखिलाफ़ हो गया था और उन्होंने इस मसले पर इश्तेहाद किया. इश्तेहादी मसले पर शिद्दत इख़्तियार नहीं करनी चाहिए. इसलिए अमीर लोग चाहे तो दे सकते हैं और गरीब चाहे तो न दें. गरीब घरबार जो मुश्किल से पहनने के लिए जेवर बनाते हैं, उनके लिए इन पर हर साल ज़कात देना बहुत भारी पड़ जाता है.
औरतों के जेवर पर जकात देने पर 3 हदीसें है और तीनों पूरी तरह साबित नहीं है.
अबू दावूद की एक रिवायत में हज़रात आयेशा द्वारा सजावट के तौर पर नबी के लिए पहने जेवरात पर नबी ने फरमाया कि अगर तुमने इस पर जाकत नहीं दी है तो आग के लिए तैयार रहना.
ज़्यादातर मुहद्दिसों ने इसे जईफ करार दिया है जैसे ईमाम तिरमिज़ी, ईमाम ज़हबी, ईमाम दारकुतनी, इबने अब्दुल हाबी. हालांकि कुछ मुहद्दिसों ने इसे सहीह भी बताया है जैसे हजर अस्कालानी.
अबू दावूद की एक दूसरी रिवायत में नबी ने उम्मे सलमा से फरमाया हर वो जेवर जो वो पहनती है अगर उस ज़कात नहीं देती हो तो इस पर अज़ाब है. इसकी सनद में भी कलाम है. ज्यादातर मुहद्दिसों ने इसे जईफ कहा है.
अबू दावूद की एक तीसरी रिवायत में और नसाई में भी है कि सोने-चांदी के कढ़े पहनी हुई एक खातून को नबी ने फरमाया कि अगर तुम्नसे इसे पर ज़कात नहीं दी है अल्लाह तुम्हें आग के कढ़े पहनायेगा.
ज्यादातर मुहद्दिसों ने इस जईफ करार दिया है जैसे ईमाम तिरमिज़ी, ईमाम नसाई, ईमाम बेयहक़ी, ईमाम जौज़ी, ईमाम इबने कसीर, इबने हिब्बान, इबने हज़म. हालाँकि इमाम ज़ेलवी ने इसे हसन करार दिया है.
औरतों के जेवर पर जकात देने पर 3 हदीसें है और तीनों पूरी तरह साबित नहीं है.
अबू दावूद की एक रिवायत में हज़रात आयेशा द्वारा सजावट के तौर पर नबी के लिए पहने जेवरात पर नबी ने फरमाया कि अगर तुमने इस पर जाकत नहीं दी है तो आग के लिए तैयार रहना.
ज़्यादातर मुहद्दिसों ने इसे जईफ करार दिया है जैसे ईमाम तिरमिज़ी, ईमाम ज़हबी, ईमाम दारकुतनी, इबने अब्दुल हाबी. हालांकि कुछ मुहद्दिसों ने इसे सहीह भी बताया है जैसे हजर अस्कालानी.
अबू दावूद की एक दूसरी रिवायत में नबी ने उम्मे सलमा से फरमाया हर वो जेवर जो वो पहनती है अगर उस ज़कात नहीं देती हो तो इस पर अज़ाब है. इसकी सनद में भी कलाम है. ज्यादातर मुहद्दिसों ने इसे जईफ कहा है.
अबू दावूद की एक तीसरी रिवायत में और नसाई में भी है कि सोने-चांदी के कढ़े पहनी हुई एक खातून को नबी ने फरमाया कि अगर तुम्नसे इसे पर ज़कात नहीं दी है अल्लाह तुम्हें आग के कढ़े पहनायेगा.
ज्यादातर मुहद्दिसों ने इस जईफ करार दिया है जैसे ईमाम तिरमिज़ी, ईमाम नसाई, ईमाम बेयहक़ी, ईमाम जौज़ी, ईमाम इबने कसीर, इबने हिब्बान, इबने हज़म. हालाँकि इमाम ज़ेलवी ने इसे हसन करार दिया है.
जबकि मुवात्ता इमाम मलिक की सहीह रिवायत में हज़रत आयेशा ने फरमाया कि पहनने वाले जेवर पर ज़कात नहीं है.
ज्यादातर सहाबा ने पहनने वाले जेवरात पर ज़कात नहीं मानी जैसे अब्दुल्लाह इबने उमर. इमाम शाफाई ने इसी की ताईद करी. जबकि कुछ सहाबा जैसे हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद ने इस सोना होने की हैसियत से सभी तरह के जेवर पर ज़कात देना लाज़मी माना है. क्योंकि इस राय में अहतियात और बेहतरी शामिल है, इसलिये, इमाम अबू हनीफा ने इसकी ताईद करी.
ज्यादातर सहाबा ने पहनने वाले जेवरात पर ज़कात नहीं मानी जैसे अब्दुल्लाह इबने उमर. इमाम शाफाई ने इसी की ताईद करी. जबकि कुछ सहाबा जैसे हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसूद ने इस सोना होने की हैसियत से सभी तरह के जेवर पर ज़कात देना लाज़मी माना है. क्योंकि इस राय में अहतियात और बेहतरी शामिल है, इसलिये, इमाम अबू हनीफा ने इसकी ताईद करी.
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औरतों के ज़ेवरात पर ज़कात होने की ताईद में तीन रिवायात पेश की जाती हैं, एक जिसमें माँ आयशा रज़ि के चांदी के कंगनों को देखकर आप सल्ल० ने उनसे पूछा कि इसकी ज़कात निकाली? दूसरी जिसमें एक औरत एक बच्ची के साथ आप सल्ल० के पास जाती हैं और उनके हाथों में सोने के कंगन देखकर आप सल्ल० उन ज़ेवरों पर ज़कात निकालने का हुक्म देते हैं और तीसरी, उम्मे सलमा रज़ि० के अपने सोने के कंगनों की बाबत पूछने पर आप सल्ल० उन्हें ज़कात निकालने के लिये कहते हैं. इन तीनों में से कोई भी रिवायत सनद के एतबार से सहीह के दर्जे पर नही पहुँचती.
इमाम तिर्मिज़ी रहीमाहुल्लाह ज़ेवरात पर ज़कात वाली रिवायात नक़्ल करने के बाद ख़ुद फरमाते हैं:
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से (ज़ेवरात की ज़कात के बारे में) कोई चीज़ साबित नहीं।"
(जामे अल तिर्मिज़ी: 3/29)
इब्न अल जौज़ी फरमाते हैं:
"इस बारे में तमाम की तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।"
(अल तहक़ीक: 3/71)
बद्र अल दीन अल मूसिली फरमाते हैं:
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस बाबत कुछ साबित नहीं।"
(अल मुग्नी अन हिफ़्ज़ वल क़िताब: सफ़्हा 313)
इब्न रजब हंबली फरमाते हैं:
"इस मसले में तरफ़ैन की अहादीस मरफ़ू'अन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कुछ साबित नहीं।"
(मज्मू रसाइल: 2/708)
काज़ी शौक़ानी के नज़दीक भी तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।
(अल सईल अल जर्रार: सफ़्हा 233)
फ़ज़ीलत उल शेख़ मुहम्मद बिन इब्राहीम के नज़दीक भी तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।
(फतावा व रसाइल समाहा अल शेख़ मुहम्मद बिन इब्राहीम आल अस शेख़: 4/97)
जबकि इसके बरअक्स, "अल-मुवत्ता", जिसे बुखारी और मुस्लिम के बराबर ही ऑथेंटिक माना जाता है, उसमे ये रिवायात मौजूद हैं कि हज़रत आयशा रज़ि० अपनी यतीम भतीजियों की देखभाल करती थीं, भतीजियों के पास सोने के गहने थे जिनकी ज़कात हज़रत आयशा कभी नही निकालती थीं
(मुवत्ता इमाम मालिक: 1/196 सहीह)
इसी तरह मुवत्ता, दार ए कुतनी और बैहक़ी में ये रिवायत भी है कि इब्ने उमर रज़ि० ने अपनी बेटियों और बांदियों के लिये सोने के गहने बनवाये थे जिनकी ज़कात वो नही निकालते थे
(मुवत्ता इमाम मालिक: 1/196 सहीह)
अल-बैहकी में रिवायत है: "जाबिर इब्न अब्दुल्ला से पूछा गया कि क्या औरतों के ज़ेवरात पर ज़कात है? इस सवाल के जवाब में जाबिर इब्न अब्दुल्लाह ने कहा कि "नहीं, ज़ेवरों पर ज़कात नही है"। उनसे पूछा गया, 'भले ही उनकी क़ीमत एक हज़ार दीनार हो?' उन्होंने कहा: 'इससे भी ज़्यादा हो तो भी ज़ेवरों पर ज़कात नही है।'
(अल सुनन अल कुबरा लिल बैहकी: 7539 सहीह)
अल-बैहकी ने यह भी रिवायत नक़्ल की है कि अस्मा बिन्त अबू बकर ने अपनी बेटियों को 50,000 दीनार की क़ीमत के सोने के गहने दिए और इसके लिए ज़कात नहीं निकालती थीं. ये रिवायत भी सहीह है
इन्ही मज़बूत रिवायात की वजह फ़िक़्ह के शाफ़ई, मालिकी और हनबली मज़हब यह फैसला देते हैं कि औरतों के पहनने के जेवर ज़कात से मुक्त हैं।
इमाम तिर्मिज़ी रहीमाहुल्लाह ज़ेवरात पर ज़कात वाली रिवायात नक़्ल करने के बाद ख़ुद फरमाते हैं:
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से (ज़ेवरात की ज़कात के बारे में) कोई चीज़ साबित नहीं।"
(जामे अल तिर्मिज़ी: 3/29)
इब्न अल जौज़ी फरमाते हैं:
"इस बारे में तमाम की तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।"
(अल तहक़ीक: 3/71)
बद्र अल दीन अल मूसिली फरमाते हैं:
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस बाबत कुछ साबित नहीं।"
(अल मुग्नी अन हिफ़्ज़ वल क़िताब: सफ़्हा 313)
इब्न रजब हंबली फरमाते हैं:
"इस मसले में तरफ़ैन की अहादीस मरफ़ू'अन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कुछ साबित नहीं।"
(मज्मू रसाइल: 2/708)
काज़ी शौक़ानी के नज़दीक भी तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।
(अल सईल अल जर्रार: सफ़्हा 233)
फ़ज़ीलत उल शेख़ मुहम्मद बिन इब्राहीम के नज़दीक भी तमाम रिवायात ज़ईफ हैं।
(फतावा व रसाइल समाहा अल शेख़ मुहम्मद बिन इब्राहीम आल अस शेख़: 4/97)
जबकि इसके बरअक्स, "अल-मुवत्ता", जिसे बुखारी और मुस्लिम के बराबर ही ऑथेंटिक माना जाता है, उसमे ये रिवायात मौजूद हैं कि हज़रत आयशा रज़ि० अपनी यतीम भतीजियों की देखभाल करती थीं, भतीजियों के पास सोने के गहने थे जिनकी ज़कात हज़रत आयशा कभी नही निकालती थीं
(मुवत्ता इमाम मालिक: 1/196 सहीह)
इसी तरह मुवत्ता, दार ए कुतनी और बैहक़ी में ये रिवायत भी है कि इब्ने उमर रज़ि० ने अपनी बेटियों और बांदियों के लिये सोने के गहने बनवाये थे जिनकी ज़कात वो नही निकालते थे
(मुवत्ता इमाम मालिक: 1/196 सहीह)
अल-बैहकी में रिवायत है: "जाबिर इब्न अब्दुल्ला से पूछा गया कि क्या औरतों के ज़ेवरात पर ज़कात है? इस सवाल के जवाब में जाबिर इब्न अब्दुल्लाह ने कहा कि "नहीं, ज़ेवरों पर ज़कात नही है"। उनसे पूछा गया, 'भले ही उनकी क़ीमत एक हज़ार दीनार हो?' उन्होंने कहा: 'इससे भी ज़्यादा हो तो भी ज़ेवरों पर ज़कात नही है।'
(अल सुनन अल कुबरा लिल बैहकी: 7539 सहीह)
अल-बैहकी ने यह भी रिवायत नक़्ल की है कि अस्मा बिन्त अबू बकर ने अपनी बेटियों को 50,000 दीनार की क़ीमत के सोने के गहने दिए और इसके लिए ज़कात नहीं निकालती थीं. ये रिवायत भी सहीह है
इन्ही मज़बूत रिवायात की वजह फ़िक़्ह के शाफ़ई, मालिकी और हनबली मज़हब यह फैसला देते हैं कि औरतों के पहनने के जेवर ज़कात से मुक्त हैं।
एक सवाल और उसका जवाब: पर्सनल इस्तेमाल के लिए सोना (पहनने लायक) ज़कात के लायक नहीं है। लेकिन अगर पहनने लायक नहीं है, तो यह एसेट है तो यह ज़कात के लायक होगा। लेकिन एक नज़रिया यह है कि अगर ऐसा एसेट कहीं या किसी चीज़ में इन्वेस्ट किया गया है और उससे या उसकी वजह से इनकम हो रही है, तो यह एसेट ज़कात के लायक नहीं है, लेकिन रेवेन्यू ज़कात के लायक होगा। तो अगर सोना पहनने लायक है और पर्सनल इस्तेमाल के लिए है, लेकिन मुश्किल समय में कभी-कभी लोन लेने के लिए रखा जा रहा है, तो यह सोना ज़कात के लायक नहीं होगा, इंशाअल्लाह।
ज़कात, सदक़ा, फितरा, खैरात क्या हैं?
ज़कात के मायने हैं बढना, तरक्की, परवरिश. सदका के मायने हैं, नेकी, सच्चाई. खैरात के मायने हैं, खैर, भलाई. इस्लाम में तीन माली मदद के नाम हैं जैसे ज़कात (लाज़मी सदका), सदका (हर नेकी सदका है), खैरात (नेकी, माल देकर करी गयी नेकी). ये तीनो एक ही हैं. ज़कात लाज़मी सदके को कहते हैं. मोटे तौर पर हदीसों में सदक़ा
अल्लाह की राह में किया गया कोई अमल है। माली तौर पर सदका फ़र्ज़ और नफिल
दोनों होता है। ज़कात, फितराह और मन्नत का कहा, फ़र्ज़/वाजिब सदक़ा है। कुर्बानी का
गोश्त देना नफिल या आम सदक़ा है। ऐसे ही आम मदद करना ही आम सदक़ा या खैरात
है। आम तौर पर किए गए सदके को ही खैरात कहते है। फ़ितराह जान का सदक़ा है। सदका
या खैरात या फ़ितराह किसी को भी दे सकते है।
ईद उल फ़ित्र के मौके पर हर घर में खाने पीने के इंतज़ाम के लिए ज़कातउल फितर दिया जाता है जो हर जान पर लाज़मी है, चाहे एक दिन का बच्चा क्यों न हो. यह ईद की नमाज़ से पहले देना होता है. अगर किसी बड़ी वजह से नहीं दे पाए तो नमाज़ के बाद अता कर देना है. हम 3 वक़्त का खाना खाते हैं तो जो हम खाते हैं, उसी कवालिटी के जैसा 3 वक़्त के खाने के बराबर का समान या पैसा दिया जायगा. जैसे आटा, चावल, दाल वगैरह. नबी के वक़्त में ये खजूर, गंदुम की शक्ल में था. फित्राह समान के तौल से हिसाब से (महीने के खर्चे के हिसाब से भी) तय किया जा सकता है. नबी के वक़्त ये एक सॉ की मिकदार थी जो आज के हिसाब से 2-3 किलो की बनती है (वजन पर इख्तिलाफे राय है, 2.5 किलो सबसे दुरुस्त है). बेहतर है ज़्यादा ही दिया जाए.
ईद के करीब फितराह देना है जैसे 2 दिन पहले से लेके ईद की नमाज़ तक. नमाज़ के बाद फितराह देने पर गुनाह है. हालाँकि मज़बूरी की हालत में बाद में अदा हो जायगा. फितराह मिस्कीन-फ़कीर को देना है. नबी फितराह देने वालों के लिए कोई निसाब नहीं दिया. ज़कात का निसाब फितराह पर नहीं लगेगा. इसलिए उलेमा ने इश्तिहद किया कि जिसने रोज़े रखे और जिसकी फितराह देने कि इस्तितात हैं, उसे फितराह देना है. क्योंकि फितराह से रोजों की छोटी-मोटी खताएं भी माफ़ हो जाती हैं.
अहले बयत के लिए ज़कात
नबी
के घरवालों के लिए ज़कात नाजायज़ नहीं है. क्योंकि तब रिसालत और हुकूमत की
ज़िम्मेदारी नबी पर आ गयी थी, इसलिए उस वक़्त की जंगों (खैबर के दौरान, फदक
का बाग़) में आने माल में से एक हिस्सा नबी और नबी के घरवालों के लिए मुकर्र
कर दिया गया. इसके बाद नबी ने कहा कि अब हम पर ज़कात का पैसा जायजा नहीं
क्योंकि इंतज़ाम हो चूका था. इसके अलावा, नबी के पास ज़कात और दूसरी तरह का
माल आपके पास ही रखा जाता. जब हज़रत हसन ने एक खजूर उठा के खायी तो नबीं ने
उनके मुंह से निकाल दिया क्योंकि ये माल उम्मत की अमानत के तौर पर आपके पास
रखी थी. आपने यह भी कहा कि हम सदके का माल नहीं खाते. यानि वो माल जो
ज़कात, के तौर पर रियासत का हक हैं, नबी का नहीं. यानि ये अमानत है और
ज़िम्मेदारी की बात है.
माले गनीमत
सुरह अन्फाल में ज़कात के नहीं बल्कि माले गनीमत की तकसीम के बारे हिदायत दी गई है. जंग में या जंग के बाद दुशमन जो माल छोड़ के भाग जाए तो वो माले गनीमत है.
8.41: 20% अल्लाह, रसूल, उनके रिश्तेदार, यतीम, मिस्कीन और मुसाफिर को दी जाएगी. बाकी 80% रसूल बाँट देंगे.
59:6: जंहा जंग हुए बिना ही दुशमन माल छोड़ के भाग गया वो माले फ़य है. ये सारा ज़कात के हेड में जायेगा
8:1: यंहा अन्फाल के माल का ज़िक्र है, यंहा कोई गिफ्ट किसी हुकूमत ने भेज दिए, यह अल्लाह और रसूल का है.
8:1: यंहा अन्फाल के माल का ज़िक्र है, यंहा कोई गिफ्ट किसी हुकूमत ने भेज दिए, यह अल्लाह और रसूल का है.
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कम्पेरेटिव अनालिसिस
पहले मौकिफ के मुताबिक़ सेलरी, आमदनी पर फ़ौरन ज़कात (5-20% जकात) देनी है.
दुसरे मौकिफ के मुताबिक़ सैलरी, आमदनी (फिक्स्ड इनकम) आने पर फ़ौरन ज़कात देनी है (मगर कितनी?).
पहले मौकिफ के मुताबिक़ पैदावार (प्रोडक्शन/उत्पादन) पर भी फ़ौरन ज़कात देनी है.
दुसरे मौकिफ के मुताबिक़ आज बिजनेस की केपिटल-प्रोडक्ट्स की वैल्यू घटती-बढती (घाटा-फायदा) रहती है और बहुत सी चीज़ों को बिजनेस में लगा कर बिजनेस चल रहा होता है, इसलिए प्रोडक्शन की बजाय ग्रोस प्रॉफिट (प्रोडक्शन के मुख्य ज़रूरी खर्चे निकाल कर) साल के अंत में जकात देनी है (मगर कितनी?) .
पहले मौकिफ के मुताबिक़ पैदावार के बिना बिके प्रोडक्ट्स को भी माल (2.5% जकात वाला) माना गया है.
दुसरे मौकिफ में ऐसे प्रोडक्ट्स पर वजाहत नहीं है. क्योंकि इसमें प्रोडक्शन की बजाय ग्रोस प्रॉफिट पर ज़कात देनी है, इसलिए शायद इसका ज़कात पर कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा.
पहले मौकिफ के मुताबिक़ सरकारी टैक्स में ज़कात को एडजस्ट करने के लिए सभी तरह के टैक्स शामिल किये जा सकते हैं.
दुसरे मौकिफ में सरकारी टैक्स में एडजस्ट करने का कोई प्रावधान नहीं मिलता है.
दुसरे मौकिफ के मुताबिक़ सैलरी, आमदनी (फिक्स्ड इनकम) आने पर फ़ौरन ज़कात देनी है (मगर कितनी?).
पहले मौकिफ के मुताबिक़ पैदावार (प्रोडक्शन/उत्पादन) पर भी फ़ौरन ज़कात देनी है.
दुसरे मौकिफ के मुताबिक़ आज बिजनेस की केपिटल-प्रोडक्ट्स की वैल्यू घटती-बढती (घाटा-फायदा) रहती है और बहुत सी चीज़ों को बिजनेस में लगा कर बिजनेस चल रहा होता है, इसलिए प्रोडक्शन की बजाय ग्रोस प्रॉफिट (प्रोडक्शन के मुख्य ज़रूरी खर्चे निकाल कर) साल के अंत में जकात देनी है (मगर कितनी?) .
पहले मौकिफ के मुताबिक़ पैदावार के बिना बिके प्रोडक्ट्स को भी माल (2.5% जकात वाला) माना गया है.
दुसरे मौकिफ में ऐसे प्रोडक्ट्स पर वजाहत नहीं है. क्योंकि इसमें प्रोडक्शन की बजाय ग्रोस प्रॉफिट पर ज़कात देनी है, इसलिए शायद इसका ज़कात पर कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा.
पहले मौकिफ के मुताबिक़ सरकारी टैक्स में ज़कात को एडजस्ट करने के लिए सभी तरह के टैक्स शामिल किये जा सकते हैं.
दुसरे मौकिफ में सरकारी टैक्स में एडजस्ट करने का कोई प्रावधान नहीं मिलता है.
कुछ सवाल
ज़कात टैक्स होती तो सब पर बराबर लगती जबकि ज़कात सिर्फ मुसलमानों को देना लाजमी है, गैर मुसलामानों को नहीं.
कुरान में ज़कात का हुकुम है मगर हुकूमत के खर्चो के लिए ज़कात देना का खुला ज़िक्र कंही नहीं है . अमीलीन की जगह हुकूमत, हाकिम जैसे लफ्ज़ होने चाहिए थे.
क्या नबी के वक़्त में कारोबार पेशी, मुलाजिम पेशा लोग बिलकुल भी नहीं, जो हमें नबी की तरफ से कारोबारी कामी और तन्खवाह पर ज़कात का ज़िक्र बिलकुल भी नहीं मिलता?
अमीर और गरीब दोनों ही बराबर टैक्स दे रहा हैं. मगर ज़कात में यह शर्त नहीं है.
तमाम तरह के टैक्स पहले से ही दे रहे हैं जैसे इनकम टैक्स, जीएसटी, एक्साइज या कस्टम ड्यूटी, प्रॉपर्टी टैक्स, रोड और टोल टैक्स, स्टाम्प ड्यूटी, एंटरटेनमेंट टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स वगैरह? ऊपर से ज्यादततर टैक्स करप्शन में में ख़त्म हो जाता है. ऐसे में टैक्स की शक्ल ज़कात सही तरीके से दी जाना कितना सही है?
अल्लाह की कुदरत की वजह से फसल काफी हद तक अपने आप पैदा होती है जबकि फक्ट्रियाँ में सारे इन्तेजाम खुद करने होते हैं. ऊपर से अगर खेती (हदीस में खजूर-गेंहूँ पर निसाब दिया हुआ है) में निसाब है तो दुनिया भर के प्रोडक्ट्स में कैसे निसाब तय होगा? ऐसे में कैसे खेती वाली ज़कात प्रोडक्शन पर लागू की जा सकती है?
जिन धंधों में प्रोडक्ट की वैल्यू बहुत ज्यादा होती है या जिनमें प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम होता है, उनमें 5-10% तो बहुत भारी टैक्स होगा. ऐसे में टैक्स की शक्ल ज़कात कितनी सही है?
क्या नबी के वक़्त में कारोबार पेशी, मुलाजिम पेशा लोग बिलकुल भी नहीं, जो हमें नबी की तरफ से कारोबारी कामी और तन्खवाह पर ज़कात का ज़िक्र बिलकुल भी नहीं मिलता?
अमीर और गरीब दोनों ही बराबर टैक्स दे रहा हैं. मगर ज़कात में यह शर्त नहीं है.
तमाम तरह के टैक्स पहले से ही दे रहे हैं जैसे इनकम टैक्स, जीएसटी, एक्साइज या कस्टम ड्यूटी, प्रॉपर्टी टैक्स, रोड और टोल टैक्स, स्टाम्प ड्यूटी, एंटरटेनमेंट टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स वगैरह? ऊपर से ज्यादततर टैक्स करप्शन में में ख़त्म हो जाता है. ऐसे में टैक्स की शक्ल ज़कात सही तरीके से दी जाना कितना सही है?
अल्लाह की कुदरत की वजह से फसल काफी हद तक अपने आप पैदा होती है जबकि फक्ट्रियाँ में सारे इन्तेजाम खुद करने होते हैं. ऊपर से अगर खेती (हदीस में खजूर-गेंहूँ पर निसाब दिया हुआ है) में निसाब है तो दुनिया भर के प्रोडक्ट्स में कैसे निसाब तय होगा? ऐसे में कैसे खेती वाली ज़कात प्रोडक्शन पर लागू की जा सकती है?
जिन धंधों में प्रोडक्ट की वैल्यू बहुत ज्यादा होती है या जिनमें प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम होता है, उनमें 5-10% तो बहुत भारी टैक्स होगा. ऐसे में टैक्स की शक्ल ज़कात कितनी सही है?
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आयतें और हदीसें
9.103: आप उनके माल से सदकात लें, जिससे आप उन्हें शुद्ध करें.
9.60: जो कुछ भी तुम कमाते हो, उसमें से सदकात दो.
51.19: उनके मालों में मांगने वालो और गरीबों का हक है.
2.271: खुले रूप से सदका दो तो अच्छा है और छिपाकर दो तो और अच्छा है.
2.264: अपने सदके को एहसान जताकर नष्ट मत करो और न उसकी तरह दुखी होकर, जो लोगों को दिखा कर माल खर्च करता है.
30.39 ज़कात देने वाले (अल्लाह के यंहा) अपना माल बढाते हैं.
9.60: जो कुछ भी तुम कमाते हो, उसमें से सदकात दो.
51.19: उनके मालों में मांगने वालो और गरीबों का हक है.
2.271: खुले रूप से सदका दो तो अच्छा है और छिपाकर दो तो और अच्छा है.
2.264: अपने सदके को एहसान जताकर नष्ट मत करो और न उसकी तरह दुखी होकर, जो लोगों को दिखा कर माल खर्च करता है.
30.39 ज़कात देने वाले (अल्लाह के यंहा) अपना माल बढाते हैं.
2:215: Whatever good you spend should be for parents, relatives, orphans, the needy, and the traveler.
2:267: Donate from the best of what you have earned and of what We have produced for you from the earth. Do not pick out worthless things for donation, which you yourselves would only accept with closed eyes.
51.19: from their properties was [given] the right of the [needy] petitioner and the deprived.
ज़मीनी पैदावार होने के दिन ही ज़कात देने को कहा गया है (कुरान 6.141)
नबी ने ज़ीमन की पैदवार की 5%, 10% मद बताई थी (बुखारी 1483)
शहद पर 10% ज़कात (दावूद 1601)
रिकाज़ (दबे ख़ज़ाने) पर 20% (ख़ुम्स) ज़कात (बुखारी 1499)
ह. अबु बकर ने ज़बरदस्ती ज़कात लेने को कहा (दावूद 1556)
5 ऊँटों पर, 5 वस्क्स या ऊँटों के लोड (600-653/540 किलो) यानि खजूरों (653 किलो पर) या गेंहू, 5 उक़ियास (ounces/600-625/642 ग्राम) चांदी से कम किसी भी सम्पति पर ज़कात नहीं है (मुस्लिम 979a, दावूद 1558, बुखारी 1405)
अपने घोड़े (जिस पर सवारी करता हो) और गुलामों पर ज़कात नहीं है सिवाए ज़कातउल फ़ित्र के (बुलुग अल मराम 4:6)
घर, घोड़े, गुलाम पर ज़कात नहीं. चांदी के 40 दिरहम पर 1 दिरहम. 190 दिरहम पर कोई ज़कात नहीं मगर 200 पर 5 दिरहम (तिरमिजी 620, मुसनद 711)
When you have 200 Dirhams (642 grams of silver) then 5 Dirhams as Zakat is to be paid. When you have 20 Dinars (85 gram gold), 1/2 Dinar is to be paid. No zakat on gold or property before one years has passed (Dawood 1573, Majah 1791)
The Prophet used to order us to pay the sadaqah (zakat) on what we prepared for trade (Dawood 1562)
If one evades Zakat, we shall take it from him. No share for in zakat for descendants of Prophet Muhammad (Dawood 1575)
The Prophet used to order us to pay the sadaqah (zakat) on what we prepared for trade (Dawood 1562)
If one evades Zakat, we shall take it from him. No share for in zakat for descendants of Prophet Muhammad (Dawood 1575)
Prophet send Muadh to Yemen and told him to inform them that Allah has enjoined upon them charity (Zakat) from their wealth, to be taken from the rich and given to their poor. If they obey that, then beware of (taking) the best of their wealth (Majah 1783).
Aslam told that Umar imposed as Jizya four dinars on those who possessed gold and forty dirhams on those who possessed silver along with provisions for the Muslims and three days’ hospitality (Masabih 4041)
Umar ibn Abd al-Aziz wrote to his governors telling them to relieve any people who payed the jizya from paying the jizya if they became muslims. Malik said, "The sunna is that there is no jizya due from women or children of people of the Book, and that jizya is only taken from men who have reached puberty. The people of dhimma and the magians do not have to pay any zakat on their palms or their vines or their crops or their livestock. This is because zakat is imposed on the muslims to purify them and to be given back to their poor, whereas jizya is imposed on the people of the Book to humble them. As long as they are in the country they have agreed to live in, they do not have to pay anything on their property except the jizya. If, however, they trade in muslim countries, coming and going in them, a tenth is taken from what they invest in such trade. This is because jizya is only imposed on them on conditions, which they have agreed on, namely that they will remain in their own countries, and that war will be waged for them on any enemy of theirs, and that if they then leave that land to go anywhere else to do business they will have to pay a tenth. Whoever among them does business with the people of Egypt, and then goes to Syria, and then does business with the people of Syria and then goes to Iraq and does business with them and then goes on to Madina, or Yemen, or other similar places, has to pay a tenth. People of the Book and magians do not have to pay any zakat on any of their property, livestock, produce or crops. The sunna still continues like that. They remain in the deen they were in, and they continue to do what they used to do. If in any one year they frequently come and go in muslim countries then they have to pay a tenth every time they do so, since that is outside what they have agreed upon, and not one of the conditions stipulated for them. This is what I have seen the people of knowledge of our city doing." (Muwatta Book 17, Hadith 46)
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