अलैहिस्सलाम एक दुआ है जिसका मतलब है अल्लाह की सलामती हो। नबी के नाम आने पर दरूद पढ़ने का हकुम है और इसलिए उनके नाम के साथ अलैहo पढ़ा जाता है।
किसी भी अहले बैत के साथ अलैहo कह सकते है जैसे हज़रत अली, ह.फातिमा, ह. हसन, ह. हुसैन। कई हदीसों में (अरबी मत्न में) इसका जिक्र है।
किसी साहाबा को भी अलैहo कह सकते है। ये तो शिया सुन्नी के टकराव के बाद शिया इसको अहले बैत के लिए ईस्तमाल करने लगे और सुन्नी रज़ीअल्ल्लाहतालाअन्हु लफ्ज़ को।
हज़रत मरयम के साथ अलैहo कहते है, रज़ीo नहीं। जबकि उन्हें पैगम्बर नहीं माना जाता है। अगर ये किसी पैगम्बर की मां के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है तो किसी पैगम्बर की बेटी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
किसी की कब्र पर जाके उसके लिए सलामती की दुआ की जाती है। हर नमाज़ में अपने लिए भी सलामती की दुआ की जाती है। एक दूसरे के लिए हम रोज़ अस्लामुअलैकुम कहते हुए सलामती की दुआ करते है।
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रज़ीअल्ल्लातालाअन्हु किसी भी शख्स के लिए ईस्तमाल किया जा सकता है। न कि सिर्फ साहाबा के साथ। इमाम मुस्लिम के शागिर्द ने इमाम मुस्लिम के नाम के आगे रज़ीo लिखा है। क़ुरान 5.119 में तो अल्लाह ने हर नेक शक्स के लिए रज़ीo इस्तेमाल किया है।
वैसे साहाबा एक दूसरे की फौत होने के बाद उनके लिये रहमतुल्लाहअलैह इस्तेमाल करते थे। लफ्ज़ रज़ी० तो बाद में मुहद्दिसीन ने ईजाद किया था।
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मौला लफ्ज़ के कई मायने है। जैसे मुश्किल कुशा, मददगार, मालिक, सरपरस्त, आका, सरदार, दिली मेहबूब और मालिक द्वारा खुश होके आज़ाद किये गए गुलाम को भी मोला कहा गया है। अरबी में मोला लफ्ज़ अल्लाह, नबी, अहले बैत, साहाबा, फरिश्तों और ग़ुलामों के लिए भी इस्तेमाल हुआ है। सबके मायने अलग अलग है। इनके पसमंज़र के मुताबिक मायने लिए जाते है.
क़ुरान 66:4 में नबी के मौला (संरक्षक) अल्लाह को, जिब्राइल को, सच्चे मोमिनों को और फरिश्तों को मददग़ार कहा गया है।
क़ुरान 33:6 की आयत में कहा गया है नबी को मोमिन की जानों से बढ़कर (यंहा मौला लफ्ज़ कहा गया है जिसके यंहा मायने क़रीबतर, सरपरस्त के है) उनपर हक रखते है। ये आयात ग़दीरे खुम के वक़्त नबी ने तिलावत की और हज़रत अली का हाथ पकड़ कर ऊपर उठाया और कहा कि जिसका मौला (आका, मालिक, सरपरस्त, मेहबूब, लीडर) मैं, उसका मौला अली।
क़ुरान में अल्लाह के लिये आये मोला के मायने मुश्किल कुशा से है। क़ुरान में नबी के लिए आये मोला के मायने सरपरस्त और आका के है। एक दरूद में मुहम्मद सल्ल. के लिए मौला लफ्ज़ आता है।
हदीसों में जंहा किसी को मोला कहने को मना किया गया है वंहा खुदा के तौर पर कहने से मना किया गया जो उसकी बाद कि हदीसों से साफ जाहिर है।
ह. अली को मौला भी कह सकते है। नबी ने ह. अली को मोमिनों का मौला कहा है। मुस्लिम शरीफ में एक (हदीस न. 6225-28 के) बाब का नाम ही फ़ज़ाईले मौला है। मौला खूदा और मोला अली कहने में ज़मीन आसमान का फर्क है। हालांकि या अली मदद कहना खुला शिर्क है क्योंकि मदद अल्लाह से मांगनी है, न कि किसी फौत हो चुके इंसान से।


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