पहली बात तो हमें यह समझ लेनी चाहिए कि आम लोगों की मदद, राहगीरों की ख़िदमत और इम्दात वगैरह करने में फर्क होता है। इंफ्रादी मदद छुप कर ही करी जाए यह बेहतर है पर इश्तेमाई मदद खुले आम ही की जाती है। लोगों की खुले आम ख़िदमत खुले आम ही की जायेगी और उसकी फोटोग्राफी करने में भी कोई हर्ज नहीं है क्योंकि:-
1. क़ुरान 2.271 में कहता है कि अल्लाह सब कुछ जनता है, तुम्हारी दिए गए सदके जो खुले में दिए हो या छुपके। अगर खुले आम देते हो तो अच्छा है और अगर छिप कर देते हो तो बेहतर है। (यंहा अल्लाह ने खुले आम सदक़ा करने को मना नहीं फरमाया है, बल्कि उसे अच्छा ही कहा है।)। ऐसी ही बात क़ुरान एक दूसरी जगह भी कहता है।
2. नबी ने फ़रमाया अमल का दामोदर नियत पर है। दिलों का हाल या नियत अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता और जब तक पक्का यकीन न हो तब तक किसी पर ऐसा इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहिए कि वो दिखावे में ख़िदमत कर रहा है। जो फोटोग्राफी कर रहे हैं उनकी नियत वो जानते है और फोटोग्राफी का मक़सद भी वो हो बेहतर जानते है।
3. जब किसी संस्था के बजट पर सामाजिक कार्य किया जाता है तो संस्था या दान देने वालों तक काम अंजाम दिए जाने के बारे में अपडेट या स्टेटस फ़ोटो या वीडियो के द्वारा दिया जाता है। कई बार उन्हें ये दिखाना ज़रूरी हो जाता है कि उनका पैसा वाकई कंहा, कब और कैसे खर्च हो रहा है ताकि गबन वगैरह के इल्जाम न लग पाएं जो आजकल एक आम बात है।
4. इन फ़ोटो से मुसलमानों की इमेज गैर मुसलमानों में साफ सुथरी बनती है कि मुसलमान देश, जनता की भलाई के काम करता है जिससे मुल्क में अच्छी आबो हवा बनती है कि मुस्लिम कोई दुश्मन नही है, बल्कि लोगों का खैरख्वाह है।
5. इन्हें देख कर दूसरे लोग खासतौर पर हमारे नौजवान मुतासिर होते है और ख़िदमत करना शुरू करते है। अगर ख़िदमत के फोटो के पीछे नियत नेकी को फ़ैलाना है तो यकीनन अजर और ज़्यादा मिलेगा।
6. जो लोग पूरे साल भर ख़िदमत या दीन का काम करता है उस पर ऐसे इल्ज़ाम लगाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए क्योंकि जब वो दीन के बाकी काम करता है तब वो फ़ोटो नहीं लेता। इसलिए अगर ऐसे लोग खिदमत के दौरान किसी मक़सद के तहत फ़ोटो ले ले तो उसमें कोई हर्ज नहीं। कोई नया बंदा साल में एक बार ख़िदमत करे और फ़ोटो ले तो उस पर तो ये सवाल किया जा सकता है पर 12 महीने दीन का काम करने वाले पर यह सवाल उठाना गलत और जल्दबाज़ी होगा।
7. ज़्यादतर इस तरह के इल्जाम लगाने वाले लोग खुद ख़िदमत में बहुत पीछे होते है और जो ज़मीनी स्तर पर काम कर रहा है, उस पर सवाल उठाते रहंगें। बल्कि ऐसे लोग खुद साल भर खुद दिखावा करते है जैसे अल्लाह के लिए ईद पर नमाज़ पढ़ने गई जगह पर सेल्फी डालना, हज जाने का ढिंढोरा पीटना, बकरा ईद पर बकरों की नुमाइश करना। लोग शबेरात, बारह वफात, मुहर्रम पर क्या क्या दिखावा नहीं करते है। दुनियावी कामों जैसे साल भर में आने वाले डे जैसे जन्मदिन, फादर डे, मदर डे आदि पर हर तरह कि सेल्फियां और स्टेटस डालते है।
इन लोगों की मिसाल डिब्बे में डाले गए उन केकड़ों की तरह है जो बाहर निकलने की कोशिश करने वाले केकड़े की टांग पकड़ कर खुद बाहर उससे ऊपर से पहले निकलने की कोशिश करते हैभ नतीजतन न खुद निकल पाते और दूसरे को निकलने देते।
8. हां यह बात ध्यान देने वाली है कि ख़िदमत करते हुए रैंडम और कैजुअल फ़ोटो लेने चाहिए, न कि पोज़ बनाके या फिल्मी अंदाज में। हो सके तो लेने वाले के चेहरा न आए। देने वाला भी कैमरे की तरफ न देखे। कैमरामैन भी थोड़ा कैमरा छुपाते हुए फ़ोटो ले न कि ऐसे सबको पता चल जाये कि शूटिंग हो रही है।
बाकी जो लोगो खुले आम दूसरों का ठीक करने का ठीकरा उठाये हुए हैं, उनके लिये आखिरी बात यह है कि गलती या कमी बताना भी अकेले में किया जाता है, सबके सामने नहीं। यह अदब के कायदे हैं।
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The God is one. We all are his Children. It is his choice that some of us have been born as Hindu or Muslim or Sikh or Christian. He wants us to be Human first. If we think we are his true devotees then we must follow his instructions and must not discriminate with each other. We should serve people irrespective of their Faith, Religion, Cast, Creed or Colour. Because We respect his choice. We all are humans and equal. May God guide us to help each other and have mercy on all of us.
Nice
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