हम किसी की ग्रन्थ को नीचा नहीं दिखा रहे. हम तो हर इलाही और आसमानी किताब में यकीन रखते है. खुद कुरान और इस्लाम ने इसे शर्त बनायीं है. इस अकीदे के बिना हम मुसलिम ही नहीं होंगे. अब हम सभी ईश्वरीय ग्रंथों के अन्दुरी सबूत देखते हैं.
कुरान तब आया जब साइंटिफ एक्स्प्लोसन आने वाला था. आज हर ग्रंथ महफूज है। उस वक्त तक दुनिया में साधन नहीं थे। इसलिए अंतिम ग्रन्थ को इस वक्त तक महफूज किया जाना था। कुरान ईश्वर का आखरी edition है सो कई किताबों से बेहतर होगा. किसी किताब के आखिरी version में खूबियाँ बढ़ जाती है। कुरान कहता है आखिरी है. इसे मेफुज़ किया गया. कुरान कहता है कि हम ही इसकी हिफाजत करेंगे।
कुरान 15.9: यह अनुस्मरण निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं/बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं
वेदों में उनके आखिरी होने का या उनमें बदलाव कभी नहीं किया जा सकेगा, ऐसा कोई दावा नहीं मिलता है. इनके अपने लोग इन ग्रंथों में मिलावट मानते हैं। वेद के अन्दरूनी सबूत यह है कि इसके सूक्तों के ऋषि होते हैं. पंडित रामगोविंद त्रिवदी ने ऋग्वेद अनुवाद किया और जो बहुत प्रचलित है, उन्होंने उसकी भूमिका में लिखा कि ऋग्वेद का 10:114:8 से ये बात निकल रही है ऋग्वेद में 15000 मंत्र है जबकि आज 10467 मिल रहे हैं. पतंजलि ने महाभाष्य में लिखा कि चारों वेदों की 1131 शाखाएं थी। शाखा अर्थात जिसमें मंत्र संहिता थी, कैसे पढ़ा जाए, उच्चारण कैसा हो, पूजा कैसे हो यह सब होता था। आज सिर्फ 11 शाखाएं मिल रही है, इनमें बहुत अंतर है। शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद की तरतीब यानि क्रम और मतंर संख्या अलग अलग है।
अथर्ववेद 20.127.3 : शब्द इषाय को स्वामी दयानंद ने बदल दिया जिससे अर्थ बदल गए। स्वामी जी ने ये 150 साल पहले किया ।
यजुर्वेद 26.26: अय शब्द को बदल दिया जिससे अर्थ बदल गए।
यजुर्वेद 25 अध्याय में 45 मंत्र थे, स्वामी जी ने 46 कर दिए।
यजुर्वेद 23.25: गंदे अर्थ को अच्छे अर्थ में बदल दिया, स्वामी जी ने।
बाइबिल में उसके आखिरी होने का या उनमें बदलाव कभी नहीं किया जा सकेगा, ऐसा कोई दावा नहीं मिलता है. बाइबिल की असली जुबान ग्रीक या लैटिन नहीं थी. असल जुबान मे मौजूद नहीं है। यूनानी और लातनी जुबान के नुस्खे चल रहे है, ये ईसा मूसा को नहीं आती है। बाइबिल के हर अध्याय के मुसन्निफ़ का नाम आते हैं. इन संतो के नाम से गोस्पेल है. 4 इंजील है, मैथ्यू, mark, luke, जोहन. ये चारों एक दुसरे से अलग है. बाबिले में तोरते की 5 बुक हैं, आखिरी किताब में कहा गया की मूसा मुआब की पहाड़ी पर गए और वही पर इन्तेकाल हुआ और उनकी कब्र वंहा पर किस जगह है, यह किसी को नहीं पता. यानि इस बारे में कोई और बयान कर रहा है, कोई और लिख रहा है.
John 10.17-18: The only begotten son of God
इसाई अब इसका 'जन्मा हुआ' अर्थ नहीं करते हैं क्योंकी नुस्खों में ऐसा नहीं लिखा हुआ था।
Book of Ezekiel के 23 chapter को घर में, माँ-बहनों के सामने नहीं पढ़ सकते। असल में यह तमसीली जुबान में है। मगर चलन यही है कि गंदे लफ्जों से अच्छे अर्थ नहीं बल्कि अच्छे लफ्जों में कोई बुरी बात कही जा सकती है।
Mathew 5.18: Jesus himself said: untill heaven and earth pass away, not the smallest letter or stroke shall pass from the law untill all is accomplished/ Until heaven and earth disappear, not even the smallest detail of God’s law will disappear until its purpose is achieved (जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, व्यवस्था (मूसा की) का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।)
अथर्ववेद 10 : 8 : 32: अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति। देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति. (परमात्मा के वेदरूप काव्य को देख मरता नहीं और न ही बूढ़ा होता है।/ परमात्मा के वेदरूपी काव्य न कभी मरता है और न कभी पुराना होता है।/ यह परमात्मा अजर-अमर है उसका काव्य वेद भी सदा अजर-अमर है।)
क़ुरान 15:9: बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं
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