Sunday, 30 May 2021

क़ुरान की अंदुरनी हिफाज़त और अन्य ईश्वानी में बदलाव।

 
 

हम किसी की ग्रन्थ को नीचा नहीं दिखा रहे. हम तो हर इलाही और आसमानी किताब में यकीन रखते है. खुद कुरान और इस्लाम ने इसे शर्त बनायीं है. इस अकीदे के बिना हम मुसलिम ही नहीं होंगे. अब हम सभी ईश्वरीय ग्रंथों के अन्दुरी सबूत देखते हैं.

कुरान तब आया जब साइंटिफ एक्स्प्लोसन आने वाला था. आज हर ग्रंथ महफूज है। उस वक्त तक दुनिया में साधन नहीं थे। इसलिए अंतिम ग्रन्थ को इस वक्त तक महफूज किया जाना था। कुरान ईश्वर का आखरी edition है सो कई किताबों से बेहतर होगा. किसी किताब के आखिरी version में खूबियाँ बढ़ जाती है।  कुरान कहता है आखिरी है. इसे मेफुज़ किया गया. कुरान  कहता है कि हम ही इसकी हिफाजत करेंगे।

कुरान 15.9: यह अनुस्मरण निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं/बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं

वेदों में उनके आखिरी होने का या उनमें बदलाव कभी नहीं किया जा सकेगा, ऐसा कोई दावा नहीं मिलता है. इनके अपने लोग इन ग्रंथों में मिलावट मानते हैं। वेद के अन्दरूनी सबूत यह है कि इसके सूक्तों के ऋषि होते हैं. पंडित रामगोविंद त्रिवदी ने ऋग्वेद अनुवाद किया और जो बहुत प्रचलित है, उन्होंने उसकी भूमिका में लिखा कि ऋग्वेद का 10:114:8 से ये बात निकल रही है ऋग्वेद में 15000 मंत्र है जबकि आज 10467 मिल रहे हैं. पतंजलि ने महाभाष्य में लिखा कि चारों वेदों की 1131 शाखाएं थी। शाखा अर्थात जिसमें मंत्र संहिता थी, कैसे पढ़ा जाए, उच्चारण कैसा हो, पूजा कैसे हो यह सब होता था। आज सिर्फ 11 शाखाएं मिल रही है, इनमें बहुत अंतर है। शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद की तरतीब यानि क्रम और मतंर संख्या अलग अलग है।

अथर्ववेद 20.127.3 :  शब्द इषाय को स्वामी दयानंद ने बदल दिया जिससे अर्थ बदल गए। स्वामी जी ने ये 150 साल पहले किया ।

यजुर्वेद 26.26: अय शब्द को बदल दिया जिससे अर्थ बदल गए।

यजुर्वेद 25 अध्याय में 45 मंत्र थे, स्वामी जी ने 46 कर दिए।

यजुर्वेद 23.25: गंदे अर्थ को अच्छे अर्थ में बदल दिया, स्वामी जी ने।

बाइबिल में उसके आखिरी होने का या उनमें बदलाव कभी नहीं किया जा सकेगा, ऐसा कोई दावा नहीं मिलता है. बाइबिल की असली जुबान ग्रीक या लैटिन नहीं थी. असल जुबान मे मौजूद नहीं है। यूनानी और लातनी जुबान के नुस्खे चल रहे है, ये ईसा मूसा को नहीं आती है। बाइबिल के हर अध्याय के मुसन्निफ़ का नाम आते हैं. इन संतो के नाम से गोस्पेल है. 4 इंजील है, मैथ्यू, mark, luke, जोहन. ये चारों एक दुसरे से अलग है. बाबिले में तोरते की 5 बुक हैं, आखिरी किताब में कहा गया की मूसा मुआब की पहाड़ी पर गए और वही पर इन्तेकाल हुआ और उनकी कब्र वंहा पर किस जगह है, यह किसी को नहीं पता. यानि इस बारे में कोई और बयान कर रहा है, कोई और लिख रहा है.

John 10.17-18: The only begotten son of God

इसाई अब इसका 'जन्मा हुआ' अर्थ नहीं करते हैं क्योंकी नुस्खों में ऐसा नहीं लिखा हुआ था।

Book of  Ezekiel के 23 chapter को घर में, माँ-बहनों के सामने नहीं पढ़ सकते। असल में यह तमसीली जुबान में है। मगर चलन यही है कि गंदे लफ्जों से अच्छे अर्थ नहीं बल्कि अच्छे लफ्जों में कोई बुरी बात कही जा सकती है।

Mathew 5.18: Jesus himself said: untill heaven and earth pass away, not the smallest letter or stroke shall pass from the law untill all is accomplished/ Until heaven and earth disappear, not even the smallest detail of God’s law will disappear until its purpose is achieved (जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, व्यवस्था (मूसा की) का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।)

अथर्ववेद 10 : 8 : 32: अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति। देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति. (परमात्मा के  वेदरूप काव्य को  देख  मरता नहीं और न ही बूढ़ा होता है।/ परमात्मा के वेदरूपी काव्य न कभी मरता है और न कभी पुराना होता है।/ यह परमात्मा अजर-अमर है उसका काव्य वेद भी सदा अजर-अमर है।)

क़ुरान 15:9: बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं

 
 
 
 
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लेखक असोक कुमार पांडेय कि क़ुरान में बदलाव हुए है कहनी वाली पॉस्ट का जवाब।

आपने अब तक सिर्फ एक किताब पढ़कर कोट की और 3 बड़ी गलती कर दी। जो इस प्रकार है।

1. अबु सुफियान की बेटी का शादी मुहम्मद सल्ल. से हुई थी। न कि मुहम्मद साहब ने उससे अपनी बेटी की शादी की थी।
2. हिन्दा ने ह. हमजा का कालेज कच्चा चबाया था, न कि पका के।
3. क़ुरान में कलमे का कंही एक जगह ज़िक्र नहीं है। कंही ला इलाहा इलल्लाह लिखा है तो कंही मुहम्मदुर रसूलुल्लाह। इन दोनों को मिलाकर क़ुरान के बाद में इसे कलमा कहा गया क्योंकि ये क़ुरान का निचोड था। बाद के वक़्त में जब कोई इस्लाम कुबूल करता था तो उसे ये कलमा पढ़वा दिया जाता थी कि ये इस्लाम और क़ुरान का मूल है, पहले इस मानलो बाकी तफसीलि बातें तो बाद में समझते रहना और मानते रहना। हालांकि नबी के वक़्त इस्लाम कुबुल करने वालो को अन्य कलमा पढ़ाया जाता था...अशहदु अल्लाह...। ये भी नीचोड था क्योंकि इसमें भी अल्लाह के एक और मुहम्मद सल्ल. उसका नबी होने की गवाही है। दोनों का मूल सन्देश एक ही है।

आप गैर मुसलमानों की किताबो से क़ुरान में बदलावट साबित करने की कोशिश कर रहे है। जो दरअसल क़ुरान के मूल टेक्स्ट में नहीं बल्कि उसकी स्क्रिप्ट में हुए बदलाव थे ताकि नॉन अरबी उसे आसानी से पढ़ सके।

अगर मुस्लिम (बहुत से गैर मुस्लिम, ओरेंटलिस्ट) स्कॉलर या हिस्टोरियन को पढ़ोगे तो वंहा आपको ये बात साबित हो जायगी सबूतों के साथ कि  क़ुरान टेक्स्ट में बदलाव नही हुआ।

गैर जानिबदार रिसर्च के लिए दोनों स्रोतों को पढ़ना जरुरी है और उनके दिए प्रमाणों को खंगालना भी। किसी ने किसी किताब या इतिहास में कुछ लिख दिया तो वो सत्य नही हो गया। उसकी दलीले देखी जायगी।

वैसे विलियम मूर (इस्लाम का क्रिटिक) ने मुहम्मद सल्ल. की बायोग्राफी में लिखा है कि क़ुरान आज भी उसी हालत में मौजूद है जैसे तब था और दुनिया में इस तरह की कोई और महफूज़ किताब नहीं पाई जाती।

मान लीजिए कि 1400 साल पहले एक राजा एक खास पत्थर की बहुत ही मजबूत दीवार बनाये और कहे कि यह पत्थर, सीमेंट कभी नहीं बदलने चाहिए और ये दीवार हमेशा ऐसे ही क़ायम रहेगी। इसके लिए वो सारे शहर वासियों और आने वाली पीड़ियों को ज़िम्मेदारी दे जाता है कि आप लोगों को इसका ख्याल रखना है। लोगों सुबह शाम, दिन रात, सोते जागते उस दीवार को देखते, निहारते, संवारते और संभालते हुए ज़िंदगी बिताते जाते और इसी तरह उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी भी यही काम करती रही। शुरू में एक दो बार लोगों ने दीवार पर रंगाई भी कर दी ताकि लोगों को देखने मे अच्छी लगे। अब कोई ये नहीं कह सकता कि ईंटे बदल गयी है या दीवार बदल गयी है क्योंकि उस पर केवल ऊपरी रंग करा गया था ल। अगर कोई इतिहास में ऐसी बात लिख कर भी गया तो उसका आशय केवल रंग से है। दरअसल दीवार अंदर से वैसे की वैसे है, वही ईंटे और वही सीमेंट है।

यही बात क़ुरान के साथ है।  1400 साल पहले क़ुरान को सही सलामत रखने की ज़िम्मेदारी हफीज़ो को दी गयी थी जो इसे याद कर लेते थे और उसी परम्परा से ये आज भी लाखों लोगों को याद है। उसी समय इसको मुहम्मद सल्ल. की बताए अनुसार लिखा भी लिया जाता था। पर इसके मुख्य संरक्षक हाफ़िज़ ही थे। आज भी क़ुरान की प्रूफ रिडिंग हाफ़िज़ करते है। आज क़ुरान में बदलाव होने के इल्जाम लगाए जाते है वो क़ुरान के महफूज़ होने के बाद जोड़ी गई मात्राओं से है जिन्हें ग़ैर अरबी लोगों को पढ़ने में होने वाली आसानी की वजह से जोड़ा गया था। और अरब में अरबी के कई डाइलेक्ट होने के कारण (जो हर भाषा मे होते है) क़ुरान को उन डाइलेक्ट में लिखा भी जाता था जिसे बाद में जला दिया गया।

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