Tuesday, 15 June 2021

सिक्ख धर्म का परिचय और इस्लाम से समानता।


सिक्ख धर्म का परिचय और इस्लाम से समानताएं।

ये तो सभी जानते है कि सिक्ख धर्म एक अकाल अजन्में निराकर ईश्वर में विश्वास रखता है जिसे वो वाहेगुरु (यानी अद्भुत गुरु) या सत्य श्रीअकाल (जो सत्य और काल रहित है) कहता है। लगभग 500 साल पहले बाबा गुरु नानक देव ने इस धर्म की शुरुआत की थी। वो पहले गुरु थे। इनके कुल 10 गुरु हुए जिनमें आखरी गुरु गोबिंद सिंह थे। गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी जो दीक्षा प्राप्त अनुयायियों के एक समूह है।  इनके धर्मस्थल को गुरुद्वारा कहते है यानी गुरु का द्वार या घर। सिक्ख धर्म में 5 तख्त बनाये हुए हैं जैसे हिन्दू धर्म में पीठ है। यंहा से पूरी क़ौम के लिए धार्मिक आदेश पारित होते है। परमात्मा, धर्म और गुरुओं की शिक्षाओं को ये हकुम कहते है।

सिक्खों का धर्मग्रन्थ श्रीगुरुग्रंथ साहिब है जिसे आदिग्रंथ भी कहते है। इसे गुरुवाणी या गुरुशब्द भी कहते है। गरूग्रंथ का पहला पाठ जपुजी कहलाता है जो गुरु नानक द्वारा रचित है। 
गुरबाणी का पाठ बिना संगीत यानी किसी म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट के बिना नहीं किया जा सकता। गुरुग्रन्थ के सामने या गुरीद्वारे के भीतरी मुख्य भाग में, सिर खुला नहीं होना चाहिए। 

गुरुग्रंथ में 1430 पृष्ठ है और हर पृष्ठ में कई वचन है। इसमें इनके गुरुओं की वाणी और शिक्षाएं लिखी हुई है। उसमें कबीर, रविदास और बाबा फरीद जैसे भक्तिकाल के बहुत से कवियों के काव्य भी मौजूद है। इसमें परमात्मा के लिए अल्लाह, ख़ुदा, रब और परब्रह्म लफ्ज़ का भी इस्तेमाल हुआ है।  ये अपने गुरुग्रंथ को इतनी ज़्यादा इज़्ज़त देते है कि उसे खोलकर पढ़ना तो दूर बल्कि उसे छूने के लिए भी बहुत सी फॉर्मेलिटी पूरी करनी पड़ती है।

सिखधर्म में गुरुओं का बहुत महत्व है जिनके बिना उद्धार संभव नहीं। ये सद्गुरुओं को ईश्वर और अपने बीच मध्यस्त मानते है। सिक्ख अपने 10 गुरुओं को छोड़कर अन्य किसी देहधारी को गुरु नहीं मानते है। हालांकि इनके ग्रन्थ और परम्परा के अनुसार सद्गुरु केवल सिख गुरु नहीं है बल्कि जिनमें बाबा नानक ने श्रद्धा रखी वो भी सद्गुरु ही है। 

गुरु नानक की वाणी से बिल्कुल स्पष्ट है कि वह अवतारवाद का विरोध करते थे और रामावतार और कृष्णवतार का खंडन करके गए है। गुरुग्रंथ कहता है कि परमात्मा ने ही ब्रह्मा विष्णु महेश को पैदा किया है। सिक्ख धर्म इन तीनो को अपूर्ण और ईश्वर की ही रचना मानता है और इन्हें पूजने को कभी नहीं कहता। हालांकि इनका मानना है कि परमात्मा की इच्छा से ही अवतार मानव रूप में प्रकट हुए थे और सारे अवतार उसका ही अंश है। सिक्ख मान्यता है कि परमात्मा निर्गुण और सगुण दोनों है पर वह अवतार नहीं लेता। सिक्ख धर्म मूर्तिपूजा विरोधी है।
 
सिक्ख धर्म में 5 समय अरदास की जाती है जिसे नितनेम भी कहते हैं। 
 

■  सिक्ख धर्म के प्रसिद्ध वचन।

●एक ओंकार सतनाम कर्तापुरख निर्भय निरवैर अकालमूरत अजूनी सैभं गुरप्रसाद।
परमात्मा एक है, उसी का नाम सत्य है। वही।जगत निर्माता है। वह बिना भय के, बिना बैर के है। वह काल रहित, अजन्मा और स्वयं से ही स्थापित है। गुरु के द्वारा ही उसकी प्राप्ति है।
[गरूग्रंथ :  जापुजी: मूलमंत्र/1]

● अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे,
एक नूर ते जग उपजया कौन भले कौन मंदे।
सर्वप्रथम अल्लाह ने नूर को पैदा किया। सभी प्राणी परमात्मा के ही बनाए है। जब उस नूर से ही सब जग बना है तो फिर कौन अच्छा और कौन बुरा।
[गरूग्रंथ : 1349-19]

● जो बोले सो निहाल, सत्य श्रीअकाल।
जो परमात्मा को सत्य कहेगा, वह आनंदित व संतुष्ट होगा।
[गुरु गोबिंद सिंह का युध्द जयकारा]

● वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतेह।
खालसा पंथ परमात्मा का है। परमात्मा की ही जीत है।
(परमात्मा पवित्र है और उसी की जीत है।)
[गुरु गोबिंद सिंह का जयकारा]

● चिड़ियानाल बाज़ लड़ावा, तां गुरुगोबिंद नाम धारावा।
चिड़िया को बाज़ से लड़वाता हूँ। तभी गुरु गोबिंद कहलाया जाता हूँ।
[गुरु गोबिंद सिंह का जयकारा]


हज़रत मुहम्मद सल्ल. का ज़िक्र कई जगह आता है जैसे:-

● अठे पहर भोंदा, फिरे खावन, संदड़े सूल! 
दोज़ख़ पौंदा, क्यों रहे, जां चित न हूए रसूल!
अगर कोई मनुष्य दिन रात भोजन के दुख में भटकता फिरे और उस के मन में पैगम्बर (या गुरु) न  हो तो वह दोज़ख में पड़ने से कैसे बच सकता है?
[गुरु ग्रन्थ साहब, पेज नम्बर 319-320]


स्वर्ग नरक का सिद्धांत।

स्वर्ग नरक का उल्लेख गरूग्रंथ में बार बार आता है। पर सिक्ख धर्म में स्वर्ग और नर्क कोई अलग मान्यता नहीं है बल्कि वही है जो सभी भारतीय धर्मों में पाई जाती है जैसे सनातन, बोद्ध और जैन। सिक्ख धर्म यही मानता है कि स्वर्ग नरक कोई अलग लोक नहीं बल्कि केवल अलेगोरिकल और मेटाफोरिकल है यानी जीवन के सुख दुख ही स्वर्ग नरक है। हालांकि कुछ वचनों में इनके अलग लोक होने का इनकार नहीं किया जा सकता। कुछ गुरु वचनों में इनके वास्तविक लोक होने के संकेत भी मिलते है और यंहा तक कि मृत्यु पश्चात कर्मो के हिसाब के भी।

पर गुरबाणी में साफ कहा गया है कि संत लोग स्वर्ग व नरक दोनों को रद्द करते है। ये भी कहा गया है स्वर्ग में वास की इच्छा न करो और नरक में रहने से न डरो। इसमें 84 लाख योनियों में भ्रमण करने को भी कहा गया है। 

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दसमग्रन्थ नामक सिक्ख ग्रन्थ में कल्कि अवतार वाले अध्याय में भी स्वर्ग नरक का भी उल्लेख है। इसमें लिखा है कि पापी लोग नरक में जायँगे (उदाहरण: नरक में जाएंगे, बहुत पछताएंगे, नरक में ही बसेंगे) और योद्धा स्वर्ग में। 

● करणी बाझहु भिसति न पाइ।
अच्छे कर्मों के बिना, स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 952]

● बैकुंठ नगरु जहा संत वासा।
स्वर्ग का नगर वंही है जंहा संत बसते है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 742]

● कुफर गोअ कुफराणै पइआ दझसी।
जो झूठ बोलता है वह नरक में गिर कर जलेगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 142]

● संत कै दूखनि नरक महि पाइ।
संतों को बदनाम करने वाला नरक में गिरता है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 279]

● जो सिमरंदे सांईऐ नरकि न सेई पाईऐ।
जो मालिक पर ध्यान लगाते है, उन्हें नरक में कभी नहीं धकेला जाएगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 132]

● नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ।
उसे पकड़ के सबसे भयंकर नरक में डाला जाता है, जो दुख और पीड़ा का कुंवा है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 309]

● गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ।
केवल बातें करने से स्वर्ग का मार्ग नहीं मिलता। मुक्ति केवल सत्य के अभ्यास से मिलती है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 141]

● चित्रगुप्त कर्मों का लेखा रखता है और मरने के बाद लेखा मांगेगा। 
[गुरुग्रन्थ : 393 व 616]


सिख धर्म में आदम और हव्वा को स्वीकार गया है।

● बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई। 
उनि भी भिसति घनेरी पाई।
परमात्मा ने आदम को कुछ नज़र दिखाई। फिर उन्होंने भी बड़ी विहिश्त पाई।
(परमात्मा ने आदम जो मानवता के पिता है पर अपनी दया की और फिर वह हव्वा संग लंबे समय तक स्वर्ग में रहे।)
[श्री गुरूग्रंथ साहिब : अंग 1161 : 7]


ग्रंथो में अवतारों का ज़िक्र।

सिक्ख धर्म का एक ग्रन्थ है जिसे दशमग्रन्थ कहते है।  ये गुरु गोबिंद सिंह की वाणी और लेखन है। हालांकि इस ग्रन्थ पर मतभेद भी है। कुछ लोग मानते है कि इसे उन्होने खुद नहीं लिखा बल्कि अपनी देखरेख में लिखवाया। कुछ कहते की इसमें उनके और अन्य लोगों के भी काव्य है। कुछ कहते है कि ये उनका है ही नहीं। 

दशमग्रंथ में चौबीस अवतार नामक अध्याय में  विष्णु के प्रसिद्ध 10 और विष्णु के अन्य 14 अवतार मिलाकर 24 अवतारों का वर्णन है। इसमें राम, कृष्ण, जैन अरिहंत, बुद्ध, मनु और कल्कि को अवतार बताया गया है। सिक्ख का मानना है कि ये परमात्मा के अवतार नहीं है बल्कि परमात्मा की एक रचना विष्णु के अवतार है। हालांकि इस पर कुछ लोगों का ये भी कहना है कि दशमग्रंथ में आए इन अवतारों का केवल हिन्दू मान्यता के अनुसार जीवन चरित्र लिखा गया है, न कि उन्हें सिक्ख धर्म का हिस्सा माना गया है। ये सत्य है कि चौबीस अवतार अध्याय की विशेषता ये है कि ये एकेश्वरवाद की ही बात करता हुआ चलता है और अवतारों (विष्णु को भी) को केवल परमात्मा के एजेंट्स और अंश की तरह देखता है. सिक्ख धर्म में इन चौबीस अवतारों को केवल मनुष्य मात्र माना गया है।कुछ सिक्ख इन अवतारों को नहीं मानते है। वैसे गुरुवाणी में ईश्वर, विष्णु, शिव आदि के अवतारों व रूपों का उल्लेख है जिसका कारण संभवतः आवागमन सिद्धांत है।


●  हे ईश्वर तू ही नरसिंह अवतार, कृष्ण अवतार और तू ही वामन रूप है।
[गरूग्रंथ: 1082]

● कई कोटि होए अवतार।
कई करोड़ो हुए है दिव्य अवतार।
[गरूग्रंथ : 276]


मनु का ज़िक्र।

दशमग्रन्थ के चौबीस अवतार नामक अध्याय में 16वा अवतार मनु राजा है। इसमें बताया है कि जब सबने सरावग मत (श्रावक मत यानी जैन धर्म) को अपना लिया, धर्म को छोड़ दिया, सबने हरी (परेमश्वर) को त्याग दिया, तब कालपुरख (परमेश्वर) ने विष्णु से कहा और विष्णु ने मनु राजा का अवतार लिया। उन्होंने मनुस्मृति का पूरे विश्व में प्रचार किया और वो सभी को सही मार्ग पर ले आए। पापियों को मृत्य दी। जो अधर्मी राज्य को छोड़ गए वो श्रावक बने रहे पर बाकी सब धर्म के मार्ग पर आ गए। इसके लिए मनु को विश्व भर में बहुत सम्मान मिला। 

इससे यही प्रतीत होता है कि ये जिस राजा मनु की बात कर रहे है वो जैन धर्म के काल में होगा और ज़रूरी नहीं कि वह महावीर के काल में हुआ हो। क्योंकि हम जानते है कि जैन धर्म महावीर स्वामी से पहले के 23 अन्य तीर्थंकर को मानता है जिससे जैन धर्म का काल 6th Cent BC से कई सौ सदियों पहले तक का हो सकता है बल्कि वह तो अपने प्रथम तीर्थंकर को ही लाखों वर्षों पूर्व का सिद्ध करते है। दशमग्रन्थ अनुसार राजा मनु ने मनुस्मृति का प्रचार किया था। अब अगर प्रथम मनु मनुस्मृति का रचयिता था तो मनु राजा प्रथम मनु हो ही नहीं सकता क्योंकि प्रथन मनु के समय कोई भी अन्य धर्म था ही नहीं। मगर राजा मनु को वैववस्त मनु माना जा सकता है क्योंक एक मत ये है कि मनुस्मृति की रचना वैवस्वत मनु ने ही कि थी। और राजा मनु कोई अन्य मनु हो नहीं सकते क्योंकि 7 मनु में से सबसे अंतिम आये मनु, वैवस्वत ही थे। अन्य 7 को अभी आना बाकी है। कोई भी मनु महावीर स्वामी के समय नहीं हुआ।

● मनु सिमिरितहि प्रचुर जगि करा।
मनु ने मनुस्मृति का जग में प्रचार किया।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 3 : 2]

● पंथ कुपंथी सब लगे स्रावग मत भयो दूर।
सभी कुपंथी पंथ पर चल पड़े, श्रावक मत (जैन धर्म) को छोड़ दिया।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 8: 1]

● मनु राजा को जगत मो रहियो सुजसु भरपूर।
इसके लिए मनु को पूरे विश्व में भरपूर सम्मान मिला।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 8 : 2]


कल्कि अवतार का ज़िक्र।

दशम ग्रन्थ में जिस अंतिम अवतार कल्कि का उल्लेख है, उसको अभी आना बाकी है। सिक्ख लोग कल्कि अवतार को नेहक-लंक अवतार कहते है। कल्कि अवतार के अध्याय में लिखा है की उस समय विश्व में बुराई ही बुराई होगी, लोग क़ुरान, वेद आदि पढ़ना छोड़ चुके होंगे। ये आयरन युग का अंत और सतयुग का आरम्भ काल होगा।  फिर नेहकलंक शंभल नामक स्थान में जन्म लेगा। उसकी आंखें काली होंगी। वह हाथ में तलवार लिए होंगे। वह चीन और मंचूरिया जाएगा और दोनो को जीत लेगा। वो फिर उत्तर की ओर आगे बढ़ेगा। तब आयरन ऐज (लौह युग) का अंत होने वाला होगा और उसे महसूस हो जाएगा कि सतयुग आने वाला है। उसके युद्ध में हाथी, महावत, घोड़े, रथ, रथसवार, तीर कमान, तलवार, कवच, धारदार हथियार, सेना होगी और राजा भी होंगे। वो मंचूरिया के राजा को हराएगा और युध्द नगाड़े बजाए जाएंगे। वह सभी राजाओं को जीत लेगा। इससे साफ प्रतीत होता है कि नेहकलंक अवतार की विशेषताएं वही है जो हिन्दू ग्रन्थ व मान्यता अनुसार कल्कि की है क्योंकि ये वही से प्रेरित है। दोनो धर्मो में दिए संकेतों के अनुसार ये स्पष्ठ है कि कल्कि या नेहकलंक को किसी पुराने समय में आना था जब ये सब चीज़ें युद्ध मे प्रयोग होती थी, न कि किसी आधुनिक समय में आएगा जब इन वस्तुओं का युद्ध में कोई प्रयोग ही नहीं होता है। 

पाप का सर्वनाश करने के कारण वह कल्कि अवतार कहलाया जाएगा।
[दसम ग्रन्थ : चउबीस अउतार: निहलंकि चौबिसवो अवतार : 141] 


राम का ज़िक्र।

हम जानते है कि राम नाम ईश्वर का था और राजा राम यानी रामचंद्र जी दशरथ के पुत्र का। ये बात रामचंद्र नाम के अर्थ, राम तारक मंत्र, कबीर के दोहों, भक्ति काल के कवियों और परंपरा आदि से सिद्ध है। गुरुग्रंथ में राम शब्द बहुत बार आया है जो अधिकतर ईश्वर के लिए ही आया है. रामचंद्र नाम भी आया है जो दशरथ पुत्र राम के लिए है, कुछ अपवाद के साथ। कंही कंही राम शब्द रामचन्द्र के लिए भी आया है जो संदर्भ से, रामायण की किसी कथा या पात्र के उल्लेख आदि से साफ हो जाता है जैसे गरूग्रंथ पेज 205, 521 में।

घटि घटि रमईआ रमत राम राइ गुर सबदि गुरू लिव लागे।
हर घट घट (शरीर) में सुंदर राम व्यापक है, गुरु के शब्द के द्वारा उससे लगन लगती है। 
[गरूग्रंथ : 172]

निरगुण रामु गुणह वसि होइ।
निर्गुण राम के वश में गुण होते है।
[गरूग्रंथ: 222]

हे प्रभु तू वह श्रीरामचंद्र है जिसका ना कोई रूप है ना रेख। (यंहा निराकर परमेश्वर की ही बात हो रही है.)
[गरूग्रंथ: 1082]


गुरु नानक जीवनी।

मुहम्मद सल्ल., अल्लाह की किताबों, इस्लाम संबधित बातों आदि का ज़िक्र जन्म सखि ग्रंथो में प्रचुरता से मिलता है। जन्म सखी का अर्थ जन्म कहानियां है। इनमें गुरु नानक की जीवनी है जो उनकी मृत्यु के बाद अलग अलग समय और चरणों पर लिखी गईं। भाई बाला वाली जन्म सखी सबसे प्रचलित जन्म सखी है। यह बाला संधू द्वारा 1592 में लिखी गई थी। यह जन्म सखी आमतौर पर गुरु नानक देव जी के जीवन की आधिकारिक खाते के रूप में स्वीकार की गई है। हालांकि इसकी प्रामाणिकता कभी सिद्ध नहीं हो सकी है। प्रमुख जनम सखी है:- भाई बाला वाली जन्म सखी, विलायत वाली जनम सखी (एक सेवादार द्वारा लिखी), हाफिज़ाबाद वाली जनम सखी, भाई मनी सिंह जनम सखी, मिहरबान जनम सखी।  पुरानी जन्म सखियों में जहां नानक के बगदाद और मक्का की यात्रा के बारे में बखान है वहीं नई जनम सखियों में चाइना और रोम की यात्राओं के बारे में भी बताया गया है। वैसे प्रमाणिक सिक्ख इतिहास से तो केवल यही मालूम होता है कि गुरु नानक मक्का और बनारस जैसे कुछ हिन्दू तीर्थ (मूर्तिपुजा के लिए नहीं) गए थे।


गुरु नानक मुस्लिम फ़क़ीर थे या सूफी फ़क़ीर।

नानक एक खत्री थे। वो हिन्दू धर्म से निकले एक तसव्वुफ़ के ईमाम थे. उन्होंने नहीं, उनके खलीफाओं ने बाद में सिक्खी को एक धर्म बनाया।
 
भक्तिकाल के अधिकांश गुरु व कवि आदि विभिन्न धर्मों की मिली जुली संस्कृति के सूत्रधार थे। गुरु नानक असल में एक सूफी फकीर थे। उनको क़ुरान, पुराण आदि का अच्छा ज्ञान था। उनके जीवन, घटनाओ, वस्तुओं आदि से ये साबित हैं। जो उनके अंदर था वही उनके बाहर दिखाई देता था। वो कतई झूठा दिखावा नहीं कर सकते थे। उनके चोले पर कलमा, फातिहा, आयात और दूसरी दुवाएं लिखी हुई थी जो आज भी बाबा नानक में देखा जा सकता है। उन्होंने पंडित और मुल्ला के खिलाफ बहुत कुछ कहा है। उन्होंने वेदों के खिलाफ भी कहा है पर क़ुरान के खिलाफ उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। ये एक सत्य है।

भाई मर्दाना मुसलमान थे और उनके प्रथम शिष्य थे। उनके कई शागिर्द मुसलमान थे। उस वक़्त मुल्लावाद हावी था पर फिर भी एक वाक़या नहीं मिलता जब किसी मुल्ला ने इनके किसी मुसलमान शागिर्द पर मुर्तद का इल्ज़ाम लगाया हो। मतभेद तो गुरु नानक के बहुत बाद औरंगज़ेब के वक्त में शुरू हुए जो बुनियादी तौर पर सियासी लड़ाई थी पंजाब पर पूर्ण अधिकार कायम करने की। यही वजह थी कि औरंगज़ेब के वक़्त से सिक्ख मुसलमानों से दूर होते गए जो कि लाज़मी था क्योंकि उनके विरोधीयो का मज़हब इस्लाम था।

गुरु नानक अपने पास एक किताब रखते थे हमेशा जिसे पोथी साहिब कहा जाता है। इसमें उनके द्वारा एकत्र वचन होते थे। ऐसा कहा जाता है की उसमें ज़यादातर क़ुरान ही मौजूद था। इसे उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को सौंप दिया था। भाई गुरुदास बताते है कि अकसर क़ाज़ी और मौलवी गुरु नानक से कहते थे कि अपनी पोथी खोलके देखिए और बता दीजिए की हिन्दू और मुसलमान में कौन महान है। धीरे धीरे ऐसी ही कई पोथियाँ बनती गयी जिनमें पहले गुरु नानक की वाणी, फिर उनकी जीवनी आदि और फिर अन्य गुरुओं की शिक्षा भी नोट की जाती रही और ये पोथियाँ एक गुरु अगले गुरु को सौंपता जाता था। आज ऐसी कई पोथिया पाई जाती है।

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