सबसे पहली बात सारे रंग अल्लाह के है। क़ुरान किसी रंग को मना नहीं करता। अल्लाह ने किसी रंग को हराम नहीं किया। किसी भी रंग का ताल्लुक मज़हब से नहीं है, चाहे हरा हो या भगवा। दुनिया में सिर्फ वही 5 चीज़ें हराम है जो क़ुरान ने बताई है और उसमें किसी रंग का ज़िक्र नहीं है। हालांकि किसी खास काम या मौके पर किसी खास रंग को तरजीह दी जा सकती है। जैसे सफेद रंग एहराम और कफन के लिए मुस्तहब है। जैसे अल्लाह ने क़ौम मूसा से सुर्ख रंग की गाय ज़िबा करने को कहा था।
पूरे लाल रंग (बिना किसी और रंग के) के कपड़े, लाल प्लस जाफरानी रंग के कपड़ो, भगवा रंग के कपड़ों को पहनना हराम माना जाता है। हालांकि हदीसे बताती है कि नबी ने खुद लाल व जाफरानी रंग पहना है। ईसा अलैह अपनी वापिसी की वक़्त जाफरानी कपड़े पहने होंगे। हदीसो से ये भी पता चलता है कि नबी ने भी लाल रंग के कपड़े पहने थे पर उस पर कहा जाता है कि वो पूरे लाल नही थे। वैसे भी दोनों कपड़ो (उपर और लोअर) को इन रंग में होने से मना किया है। एक हदीस में (माजह 4077) में बताया गया है की दज्जाल और उसके साथी यहूदी हरे रंग का चोगे पहने हुए आयंगे.
जिस तरह मर्दों को सलवार ऊपर रखना (ट्रैन क्लॉथ), सोना न पहनना और रेशन न पहनना मना था जिसका मुख्य कारण तकब्बुर, दिखावा, फिजूल खर्ची वैगरह था। उसी तरह कुछ रंगों को मना करने के पीछे भी तकब्बुर, दिखावा, दूसरे मज़हबों का पहनावा, औरतों से समानता, अरब के गर्म मौसम जैसे कई कारणों से था, न कि कोई दीनी हकुम। नबी के तरीके उसवा ए हसना है यानी सबसे बेहतरीन मिसाल है। नबी की सफेद पसंद था जिसकी कई वजह हो सकती है जैसे सूरज की रोशनी कम खींचना, सफेद कपडे आसानी से मिलना, रंगदार कपड़े आम न होना, सफेद की पवित्रता होना वगेरह। वैसे भगवा रंग पहन कर भी कोई दूसरे मज़हब का न लगे तो फिर भी क्या कुछ हर्ज है?
ज़ाफ़रान एक पौधा है जो खाने में डालने, इतर बनाने में, कपड़ो को चमकदार पिला करने के काम आता था। सेफरन से पीला और नारंगी रंग होता है और सेफफ्लावर को रंगने से लाल रंग होता है।
ईसा अलैह. के जाफरानी कपड़े।
नबी द्वारा खुद इस्तेमाल।
● नबी ने जाफरानी पुताई भी करवाई थी मस्जिद की दीवार पर जब कुछ लोगों ने दीवार पर थूक थूक कर गंदा कर दिया था।
जाफरानी कपड़ो को मना बाज़ लोगो को करना या बाज़ कपड़ो की बनावट पर ऐतरज़ात करना।
जाफरान से कपड़े रंगना या ज़ाफ़रान बदन पर लगना या जाफरानी खुशबू लगना।
मुहरिम यानी एहराम बांधने वालो के लिए।
हदीसो का टकराना या मंसूख हो जाना।
ह. फातिमा की हदीस बिना संदर्भ के बयान करना
दूसरे मनाही रंगों को इस्तेमाल करना।
Jaabir said: “I saw the Messenger on the day of the Conquest of Makkah, wearing a black turban.” (Reported by Muslim). Aaishah said: “I made a black burdah (cloak) for the Messenger and he wore it, but when he sweated in it he detected the smell of wool on it, so he took it off, because he used to like pleasant smells.” Reported by Abu Dawood. Al-Haakim (4/188) said: it is saheeh according to the conditions of the two shaykhs. Al-Dhahabi agreed with him. Shaykh al-Albaani said in al-Saheehah (5/168, no. 2136): It is as they said. Abu Dawood named a chapter in his Sunan “Bab fi’l-Suwaad (chapter on black clothes)”. The author of ‘Awn al-Ma’bood (11/126) said: The hadeeth indicates that it is permissible to wear black and that there is nothing makrooh in doing so.
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