◆ एक साहित्यकार (हजारी प्रसाद द्विवेदी) कहता है कि बहुत कम लोग जानते है कि वे बहुत कम जानते है।
ये
दर्शन की बात है। थोड़े इल्म पर फैसले करना इंसान की आदत है इसलिए थोड़े से
इल्म की बुनियाद पर कुछ लोग ये फैसला कर लेते है कि खुदा नहीं है। ये
इंसानी मनोविज्ञान की बात हुई। जबकि विज्ञान भी ऐसी ही बात सामने रखता हैं
क्योंकि वैज्ञानिकों का खुद ये मत है कि इंसानों का इल्म अधूरा (पार्शियल)
है। पर यह बात जिसने सबसे पहले बार कही थी वो मज़हब था। क़ुरान में अल्लाह ने
फरमाया कि अपनी हुदूद (सीमाओं) में रहो और तुमको बहुत थोड़ा इल्म दिया गया
है।
◆ पहले क़ुदरत को खुदा मानने की वजह से लोग क़ुदरत पर साइंसी तहक़ीक़ करने से अक्सर दूरी इख्तियार किया करते थे। जब क़ुदरत को इबादत के लायक़ मानना बंद किया गया तब जाकर क़ुदरत पर तहक़ीक़ शुरू हो सकी। क़ुरान के बाद खालिक और खलक में फर्क वाज़ेह हुआ। खुदा और कुदरत को अलग अलग तस्लीम किया गया। इस तरह कुदरत की हर शय पर तहक़ीक़ शुरू हुई जिसके नतीजे में इंसानों ने साइंस की गोल्डन एज देखी।
◆
खुदा का तसव्वुर नहीं माना तो क़ायनात में सवाल ही सवाल है और सारे सवालों
के जवाब गलत मिलेंगे। अगर खुदा का तसव्वुर मान लिया तो सारे सवाल हल हो
जायँगे।
◆ साइंस और मज़हब साथ साथ चलने वाली चीज़े हैं। बस मरने के बाद साइंस साथ छोड़ देता है और मज़हब साथ देता है.
◆ ईश्वर कंहा है। वह हम सब में है और नहीं भी है। वह साथ भी है और साथ नहीं भी है। ढूंढो तो मिल जायेगा और न ढूंढो तो गुम जायगा।
◆ अगर इस बात का पता लगाना चाहते हो की तुम्हारी ज़िंदगी पे कौन हुक्म चला रहा है तो उस शख़्स को ढूंढो जिससे तुम इख्तिलाफ नहीं कर सकते!
◆ नास्तिक सिर्फ वही नहीं होता जो ईश्वर को नहीं मानता वह भी नास्तिक है जो ईश्वर को जैसा है वैसा नहीं मानता.
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◆
मानव इतिहास इस बात पर गवाह है की इंसान ने हर दौर में और हर इलाके में
दुनिया के एक मालिक को स्वीकार किया है। इस ऐतिहासिक सच को इंसानियत ने हर
दौर में कलेक्टिव हैसियत से कबूल किया है। एक पहले से साबित चीज़ को साबित
नहीं किया जाता बल्कि उसको रद करने वालों से सबूत मांगा जाता है। अब अगर
कुछ लोग उठते हैं और इंसानियत के इस कलेक्टिव फैसले को रद करते हैं तो उन
से पूछा जाएगा की दीलील दो की कोई ईश्वर नहीं है।
◆ ममता का
जज़्बा मां में हमेशा से रहा है चाहे कोई भी जीव हो। अब कोई ये कहे कि
ममता नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। तो उससे यही कहा जायगा की तुम्हे नहीं
महसूस होती होगी पर ये है और हमेशा से रही है जिसकी पूरी इंसानी तारीख़ गवाह
है इसलिए सबूत तुम लाओ की ममता नहीं होती है। उसके पास सबूत नहीं होगा
सिर्फ उसकी अपनी मान्यता होगी। वो कहेगा कि आज बहुत से ऐसी मां होने लगी है
जिनमें ममता नहीं दिखाई देती। तो इसका जवाब यही दिया जाएगा कि हां ठीक है
पर फिर भी अधिकतर मां आज भी ममता रखती है। जैसे आज कुछ लोग आस्तिकता नहीं
मानते है पर हमेशा से अधितकर लोग आस्तिक हुए और आज भी है। हो सकता कि
भविष्य में में कभी आध्यात्मिकता इतनी कम हो जाये कि अधिकतर लोग नास्तिक हो
जाए। पर फिर भी कुछ लोगों में आस्तिकता हमेशा बाकी रहेगी। भले ही इंसान न
करें पर सृष्टि की हर शय साबित करती रहेगी की उसे किसी ने बनाया है। इसी
तरह हो सकता है कि भविष्य में कभी खुदगर्ज़ी इतनी बढ़ जाए कि अधिकतर माँ की
ममता खत्म हो जाए। पर फिर भी कुछ में ममता हमेशा बाकी रहेगी। भले ही इंसान
इसे दबा दे पर संसार के अन्य जीवों में ममता दिखती रहेगी।
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◆ सोचता हूँ मैं अक्सर कि ख़ुदा एक बार तो नज़र बख़्शे।
लेकिन सफ़र से पहले ही आख़िर क्यों वो शहर बख़्शे।
◆ नज़र में जो नहीं अभी अगर हुआ तो क्या होगा।
खुदा को मानता नहीं मगर हुआ तो क्या होगा।
◆ दो सोच, दोनों गलत।
मुल्हिद:- अक्ल के मामलों में ख़ुदा को न लाओ।
मौलवी: - खुदा के मामलों में अक्ल को न लाओ।
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◆ दुनिया में बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनका नाम लेने से ही ज़ेहन में चाह और मुंह में पानी आ जाता है। फ़िर ये कैसे हो सकता है कि पूरी क़ायनात के ख़ुदा का नाम लिया जाए और जिस्म-रूह पर कुछ असर न हो। यक़ीनन उसका नाम लेने में भी बहुत बरक़त है।
◆ मैंने कहीं पढ़ा कि दुनिया की खूबसूरत हक़ीक़तें, आंखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस की जाती हैं। और फ़िर मुझे अल्लाह याद आया। तो फिर लोग क्यों ख़ुदा का इनकार इसलिए करते है क्योंकि उसका वजूद आंखों से नहीं दिखता।
◆ ख़्वाब धोखा नहीं बल्कि एक छोटी हक़ीक़त होते है। क्योंकि ख़्वाब के मुताबिक़ हमारा जिस्म और ज़हन रिस्पॉन्स कर रहा होता है। ख़्वाब से जागने के बाद एहसास होता है कि यह ज़िंदगी बड़ी हक़ीक़त है। जब छोटी से बड़ी हक़ीक़त में आते है तो पिछली के छोटे होने का एहसास होता है। इस दुनिया के बाद जब उस दुनिया में आंख खुलेगी तो एहसास होगा कि यह यंहा की हक़ीक़त पिछली सारी हक़ीक़तों से बड़ी है। ख़्वाब के मुक़ाबले, दुनिया बड़ी हक़ीक़त है और दुनिया के मुक़ाबले, आख़िरत.
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