Friday, 21 January 2022

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 5 (चंद कारगर बातें, मिसालें)।



नास्तिकों के साथ क्या अप्रोच स्टेप बाई स्टेप अपनाएँ।

शुरुवात से ही इंसान, क़ायनात के मुताल्लिक़ दो ही रास्ते चुनता आया है। पहला की मैं इस क़ायनात की तशरीह जानना और ढूँढूना चाहता हूँ। दूसरा की मेरा इस क़ायनात से कोई वास्ता या कनसर्न नहीं है यानी कि आँखों पर पट्टी बांध कर जीना।

क्योंकि दुनिया में सिर्फ इंसानों को ही ऐसी कन्साइन्स, इंटेलिजेंस, रीजनिंग, एनालीटिकल और एस्थेटिक सेंस,  वैगेरह ख़ुसूसियात दी गयी तो अपने वजूद के बारे में सवाल उठने की और उसके जवाब पाने की कोशिश होनी ही थी, हुई भी और होनी भी चाहिए।

● ये क़ायनात और ये जिंदगी क्यों है। इस सवाल का जवाब, जब से ये क़ायनात बनी है सिर्फ दो ही सूरतों में निकल कर आया है। पहली की इसका कोई बनाने वाला है और दूसरी ये की यह अपने आप बनी हुई है। तीसरी कोई तशरीह आज तक सामने नहीं आ पाई है।

क़ायनात के बने होने होने से कोई इनकार नहीं करता। ज़्यादातर साइंसदान कहते है कि क़ायनात ने ही खुद को बनाया है। दुसरे लोग कहते हैं कि क़ायनात को भी बनाने वाला मौजूद है।

साइंसदान कहते हैं सब चीज़ को बनाने वाला यह क़ायनात ही है। जबकि खुदा को मानने वाले यह कहते हैं कि इस क़ायनात का भी एक खुदा है। बस यही फ़र्क़ है। आज तक किसी साइंसदान ने इसका इनकार ही नहीं किया कि क़ुदरत ख़ालिक़ नहीं है। जो सिफात वो कायनात की बताते हैं, हम वही खुदा की बताते हैं जैसे अनादी, अनंत, खुद-ब-खुद वगैरह.

क़ुदरत की सिफत क्या है। क़ुदरत खुद का तार्रुफ़ करवाती है कि वो क्या है, कैसी है, पालती-पोसती है, समझ रखती है। यह सारी सिफत खुदा की भी है या यूं कहें कि असल में खुदा की ही है। पर खुदा किसी शय की तरह सामने नहीं है। देखा जाए तो क़ुदरत को भी उसकी असली शक्ल से नहीं बल्कि उसकी सिफ़तों से पहचाना जाता है। कुदरत की कोई जाती शक्ल है भी नहीं.

● साइंस की पैदाइश के वक़्त में साइंस दरअसल फलसफे का ही भाग था जिसमे माद्दा यानी मेटर के होने की वजह क्या है, क्यों है, कैसे है, इसका भी जवाब ढूंढा जाता था। पर इस क्यों का जवाब, माद्दे पर तजुर्बे करके नहीं जाना जा सका। फिर फैसला हुआ कि इसका जवाब अक्ल से सुलझा लिया जाएगा कि हम और क़ायनात क्यों है, क्या मक़सद है, ज़िंदगी मौत क्यो है। इसलिए साइंस और फलसफा दो अलग अलग हुनर बन गए। पर साइंस फिर भी इस क्यों का जवाब माद्दे पर काम करके नहीं पा सका। तो फिर इस सवाल पर काम करना ही बंद कर दिया। वैसे फलसफे को आज भी एक साइंस ही माना जाती है। मध्ययुग में मॉडर्न साइंस की पैदाइश ही इस बुनियाद पर हुई थी कि साइंस सिर्फ माद्दे पर काम करेगा। सिर्फ ये पता लागयेगा कि वो क्या है, कैसे है और तजुर्बों के बाद वो क्या क्या कर सकता है और किस किस काम में आ सकता है। पर वो क्यों (मकसद) है, इसका जवाब नहीं तलाशेगा। इसलिए साइंस, क्या है, कैसे है का जवाब तो देता है पर क्यों है, का नहीं। साइंस अभी तक इस क़ायनात की तशरीह नही दे पाया है कि ये क्यों है? 

साइंस ये बता सकता है कि अंडों से चूज़ा कैसे निकलता है, पर क्यों (कारण नहीं बल्कि उद्देश्य) निकलता है, इसका जवाब नहीं दे पाता।

● क़ायनात और इंसान दोनों के पास गैर मामूली क़ुव्वत है पर फिर भी वो अपने आप की निश्चित तशरीह नहीं कर सकते, जैसे कि उनका वजूद क्यों है। इस क्यों को जानने के लिए ही  3 तरीके उभर कर आये थे। 
 
पहला साइंस या फलसफे से। यानी अक़ल के ज़रिये. तजुर्बों और सोच-विचार के ज़रिये. इस हुनर में से साइंस ने इस सवाल पर बहुत पहले ही काम करना छोड़ दिया था। 

दूसरा तरीका। इस क्यों का जवाब पाने के लिए ही बहुत पहले तसव्वुफ़, सूफीवाद, मिस्टिसिज़्म, रहस्यवाद की पैदाइश हुई। यानी क्यों का जवाब अपने बातिन से, इनरसेल्फ से लिया जाएगा। यानी बाहर की बजाय अपने अंदर की सैर की जाएगी। ये फ़न, बुद्ध और महावीर के वक़्त में मक़बूलियत पाते हुए, फिर यूनानी फलसफे का सफर तय करते हुए, इस्लामिक देशों में सूफ़ीइज़्म की शक्ल में अपने चरम पर पहुंचा।

तीसरा और आखिरी तरीका है कि बनाने वाले से ही पूछ लिया जाए कि क्यों बनाया है। यंही से खुदा, मज़हब और रिसालत का कांसेप्ट सामने आ जाता है। जैसे कोई नया प्रोडक्ट बनाने के बाद उसका एक मैन्युअल तैयार किया जाता है और उसे क्या करने के लिए बनाया गया है, उसका डेमो देने के लिये एक रिप्रेजेन्टेटिव को एग्जिबीशन में खड़ा कर दिया जाता है। उसी तरह किताब एक मैन्युअल का काम करतती है और पैग़म्बर, रिप्रेजेन्टेटिव का। सबसे सही तरीका यही है, इस क्यों का जवाब पाने के लिए। आमतौर एक आम आदमी का पहले दो तरीकों से न तो कोई खास राबता होता है और न उनके लिए वक़्त-रूचि.

● साइंस ने अभी तक ख़ुदा को अपनी रिसर्च का टॉपिक नही बनाया है। आज तक ख़ुदा का वजूद जानने के लिए कोई रिसर्च शुरू नहीं कि गई है। क्योंकि साइंस अभी इतनी एडवांस नहीं हो पाई है कि उसे देख या सुन सके। और जब रिसर्च कर ही नहीं पाए है तो फिर वो खुदा का इनकार भी कैसे कर सकते है, जबकि अभी तो हमने इस क़ायनात का 1% भी नहीं जाना है। धरती और समुंदर के ज़्यादातर अंदरूनी भाग आज भी हमसे अनजान है। सच्चाई ये है कि साइंस ने ख़ुदा को कभी नकारा ही नहीं है।

कुछ साइंसदान ज़रूर खुदा का इनकार करते है पर इसके लिए वो कोई सबूत देने की बाजाए अपना मौकिफ़ बताते है। और साइंस मौकिफ़ से नहीं बल्कि तजुर्बों से चलता है जिसे लेबोरेटरी में टेस्ट किया जा सके और खुदा के मामले ये फिलहाल नामुमकिन है। जब तक ऐसे कोई तकनीक हम हासिल नहीं कर लेते तब तक इनको भी गैर जानिबदार रहना चाहिए। न्यूटन, आइंसटीन, पास्चर, कलाम वैगरह जैसे साइंसदान ना-खुदा नहीं रहे है।

● असल में साइंस भी ख़ुदा और क़ायनात को जानने का एक तरीका ही है। ख़ुदा के बनाये क़ुदरत के वो कानून जो हमने खोज लिए है वही साइंस है। और बहुत से कानून आइंदा भी खोजे जाएंगे। 

आज मजीद तहक़ीक़ात के बाद साइंसदान ये कह रहे है कि यह क़ायनात एक इंटेलिजेंट डिज़ाइन है.

जैसे हम बाहर की दुनिया का मुआयना करते है कि क्यों, कब, कैसे चीज़े बनी है ऐसे ही जब कोई अपने अंदर झांकता है तो जान जाता है कि वो बना हुआ है, बेबस और ज़हीन है। 

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खुदा, किताब, मज़हब, बातिन, ख्वाहिशहात, अमरता में रिश्ता


कोई 'मज़हब के ख़ुदा' का इनकार कर सकता है मगर कायनात के खालिक़ का नहीं।
 
◆ फूलों को समझने के लिए बोटनिस्ट को फूल को बर्बाद करना पड़ेगा। वो उसपर काम करेंगे और जानकारी हासिल हो जायेगी। पर फूल खत्म हो जाएगा। इलहाम इस कमी को पूरा करता है और बिना किसी नुकसान हुए जानकारी देता है।
 
 ◆ वैज्ञानिक पहले एक ह्यपोथसीसी बनाते हैं यानी फ़र्ज़ करते है। फिर उस पर रिसर्च करते हैं। ऐसे ही फ़र्ज़ कर लो कि खुदा है। अब रिसर्च करो। क़ुरान को खुदा की किताब फ़र्ज़ करो। अब इसके मौजज़ात देखो।
 
●  मज़हब से हमरा ताल्लुक़ ज़िंदगी की वजह से नहीँ बल्कि मौत की वजह से है। जैसे डॉक्टर बीमारी से नही बल्कि सेहत से जुड़ा हुआ होता है। मज़हब मौत से इस तरह जुड़ा हुआ है क्योंकि सवाल पैदा होता है कि मौत पर ज़िंदगी खत्म होती हैं या नहीं। मौत के बाद भी दो ही रास्ते है। पहला की मर कर भी ज़िंदगी आगे चलेगी। दूसरा मौत के बाद दुबारा ज़िन्दगी नहीं है। दोनों ही सूरतों में आस्तिक फायदे में हैं और नास्तिक असमंजस में. 

● कायनात में मौजूद हर चीज़ अपना अस्तित्व रखती है, वो सभी सच हैं तभी तो पाई जाती हैं। जैसे उड़ने का ख्याल मौजूद था, तो क़ायनात में भी उसके लिए एक कानून मौजूद था, जिसे हमनें पा लिया। जैसे प्यास है तो पानी भी मौजूद है। यानी पानी की बजाए अगर इंसान को जीने के लिए कुछ और चाहिए होता तो वो भी इस कायनात में मौजूद होता। मुझ में खैर और शर का शऊर मौजूद है अगर उससे दुनिया में कुछ हासिल नहीं होना था तो वो होता ही नहीं यानी इस कायनात में उसका वजूद ही नहीं होता। जो भी आप सोच/विचार कर पा रहें, उसको पूरा करने की चीज़ें इस कायनात में मौजूद होनी चाहिए और हैं. यही खुदा का कानून है। 
 
हमारी इन्साफ पाने की और अमर होने की ख्वाहिश है जो दुनिया पूरी नहीं होती दिखती। हर इंसान चाहता है कि वो न मरे, हमेशा जिये। ऐसी ही और भी कई खवाहिशें हैं। अगर 'मौत के बाद ज़िन्दगी ना होना'  सही है तो ये साबित हो जाएगा कि हम इस जिंदगी से कंपेटिबल नहीं है, हम बेबस है,  ये ख्वाहिश/विचार कभी पुरी नहीं होने हैं. अगर ऐसा है तो दुनिया में ये ख्वाहिश/विचार/चाहने की ताकत होती ही नहीं. ये हैं तो यकीनन इसी कायानात में इनका पूरा होना भी मुमकिन है. 

● मौत के बाद ज़िंदगी न होने के, केस में मेरा बातिन यानी इनर्सेलफ मर जाएगा है जिसमें ख्वाहिश/चाहतें मौजूद हैं। इसीलिए इनके पूरा होने के लिए मरने के बाद भी बातिन ज़िंदा रहना चाहिए। 

क्या हमारा बातिन हमारे पैदा होने से पहले भी मरा हुआ था? हाँ, मगर इस्लाम कहता है कि हमारा बातिन पहले भी जिंदा हुआ था (अहदे अलस्त में) । बल्कि जिंदगी की शुरुआत तो यंही से मानी जाएगी। 
 
● अगर किसी की खुदा बनने की ख्वाहिश हुई तो ज़ाहिर है वो अपनी जन्नत/दुनिया के लिए खुदा समान ही होगा. जो चाहेगा, वो कर पायेगा. मगर वो असली खुदा जैसे नहीं होगा क्योंकि इम्तिहान का लेवल उस लायक नहीं रखा गया था और ना रखा जा सकता. इन्सान की अक़ल महदूद है. बहुत कुछ उसे वँही समझ आएगा.   

बाकी कभी और...
 
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सनातन धर्म के 5 आधार: आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग और नरक.

इन्हें हम विज्ञान की भाषा में समझेंगे. साइंस में थ्योरी, लॉ, ह्य्पोथिसिस होते हैं. लॉ बिलकुल कन्फर्म सिद्धांत होते हैं. थ्योरी अक्सर स्वीकार्य और स्थापित थ्योरी होती है हालंकि कुछ अन-कनफर्म्ड लॉ भी होते हैं. ह्य्पोथिसिस अपने नाम से ही स्पष्ट है.

धार्मिक ग्रंथों के वो अंश जो विज्ञान के नियमों के विरुद्ध नहीं है यानी जिन पर दोनों ओर से सहमति हैं, उन तथ्यों को धर्म समझाने के लिए आस्तिकों से सामने रखने में किसी को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.

सबसे पहले हम ये मान लेते हैं कि धर्म या ईश्वर नहीं हैं और केवल विज्ञान है. इन्सान एक बायोलोजिकल मशीन है और फंक्शन कर रही है. अचानक ये मशीन रुक जाती है और काम करना बंद कर देती.  पार्ट्स में खराबी के कारण मशीन में डिफेक्ट आ गया है यानी एक इंसान ब्लड क्लोटिंग या हार्ट फैल के कारण मर गया. डॉक्टर से कहा गया कि इस मशीन को रिपेयर कर दीजिए यानी इसकी खराबी (वीन्स से ब्लड क्लॉट)  निकाल दीजिए या फैल हुआ पुर्जा (हार्ट ट्रांसप्लांट) बदल दीजिए.  डॉक्टर ओपरेशन करता है मगर फिर भी इन्सान ज़िंदा नहीं होता.  डॉक्टर कहता है कि अब इसे दुबारा चालु स्तिथि में नहीं लाया जा सकता जैसे इन्सान की बनायीं हुई मशीनों को लाया जा सकता है (पार्ट्स रिपेयर या रिप्लेसमेंट के बाद). डॉक्टर से कहा जाता है कि जब बिजली कट होने पंखा बंद हो जाता है और बिजली आने पर चालू हो जाता है तो इसको भी हो जाना चाहिए.  आखिर हम मशीन भी तो एनर्जी इस्तेमाल करते हुए काम कर रहे हैं. असल में शरीर से निकल गयी है वो आत्मा है दुबारा नहीं आ सकती.  विज्ञान के अनुसार यही आत्मा ऊर्जा है.  कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं.  पुराने ज़माने में ऊर्जा नाम का शब्द या कांसेप्ट नहीं था तो उर्जा को ही आत्मा कह देते हैं.  इसे ऊर्जा, आत्मा, रूह, सोल कुछ भी कह सकते है. इसी शक्ति से ही शरीर चल रहा है.  धर्म के अनुसार ये शक्ति आत्मा है.  

जब ऊर्जा है तो परम ऊर्जा भी होगी. यानि एनर्जी है तो सुप्रीम एनर्जी भी होगी.  जैसे बिजली है तो बिजली का मुख्य उत्पादक या स्रोत भी होता है.  जैसे बिजली जेनरेटर या ट्रांसफारमर होता है.   तमाम ऊर्जा को स्रोत परम ऊर्जा है.  ऊर्जा आत्मा है तो परम ऊर्जा या सुप्रीम एनर्जी ही परम आत्मा है यानी परमात्मा.  

विज्ञान कहता है कि उर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है और न ही उसे समाप्त किया जा सकता है, उसे बस रूपांतरित किया जा सकता.  यानि ऊर्जा या आत्मा, शरीर से निकल कर कंही न कंहीं तो रहेगी. इस यूनिवर्स में रहेगी तो कभी mass में  भी बदलेगी जो कि साइंटिफिक लॉ है E=MC2(Square). इसलिए ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होगी और कभी मैटर की फॉर्म लेगी. यही पुनर्जन्म है.

इस ब्रह्माण्ड में दूसरी जगह भी जीवन हो सकता है, विज्ञान इसका इंकार नही करता बल्कि उसे ढूँढने में लगा है.  दुसरे गृह पर जीवन होने की शर्त है की उसका सूरज उससे उचित दूरी पर हो और वंहा पानी उपलब्ध हो. यही जीवन परलोक (स्वर्ग व नरक) है.

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माँ के पेट में जुड़वाँ बच्चों की चर्चा

एक मां के पेट में जुड़वा बच्चे थे। एक ने दूसरे से पूछा: क्या तुम इस गर्भावस्था के जीवन के बाद के जीवन में विश्वास रखते हो?

दूसरे ने कहा: बिल्कुल क्योंकि हम यहां इसलिए है ताकि ख़ुद को आने वाली जीवन के लिए तैयार कर सके। वंहा पैरों से चल सके, मुंह से खा सके और खुली सांस ले सके। वंहा ऐसी चीज़ें होंगी जिनके बारे में हमें अभी कुछ समझ नहीं है और जो हमनें आज तक देखी भी नहीं है जैसे शायद जहाज़, फ़ोन या बिल्डिंग्स, पहाड़, समुद्र, आसमान, सूरज, चांद, कपड़े, स्वादिष्ट खाना आदि।

पहले ने कहा: अगर बाहर ज़िन्दगी है तो कभी कोई वहां से वापस क्यों नहीं आया?

दूसरा बोला: यंहा वापिस आना नामुमकिन है। ये जगह थोड़े समय बाद समाप्त हो जायेगी। पर वंहा असल जीवन है। वंहा हमें हमारी मां मिलेगी और वही हमारी देखभाल करेगी।

पहला ने कहा: अगर माँ जैसी कोई चीज़ है तो वो कहां है? न नजर आती, न बात करती। वो हमें ऐसे अकेला ना छोड़ती।

दूसरा बोला: मां हमारे चारों तरफ है। हम उसकी वजह ही से यंहा है। वो न होती तो हम भी नहीं होते। अभी दिख नहीं रही पर ध्यान से महसूस करो तो उसका अहसास होता है। खामोशी से सुनो तो उसकी धड़कन और आवाज़ भी सुनाई देती है।

पहले ने कहा: ये सब फालतू बाते हैं। मेरी तजुर्बा ये नहीं मानता। ये बातें अवैज्ञानिक और अंधविश्वास है।

दूसरे ने कहा: ठीक है। न मानों। कुछ महीने बाद अपने आप पता चल जाएगा।
 
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How Energy is not the Creator?
 
There are two narratives on the creation of universe. One is that it has a creator. The second is that it is the creator of its own. The basic element of universe is energy. The energy has power to create the universe. Matter, light, heat all are energy. Is energy self sufficient, self conscious? No, because energy can be controlled by humans in numerous ways. It cannot save itself from the grip of humans. Energy can not be created or destroyed. It means that no scientific mechanism about creating it has been found. So it means that universe is not created and it is eternal as energy is uncreated but the creation of universe is said to be begun. The issue is that where is the mind behind this creation process. If you have not find such mind till date, it means that you are just discovering the laws of nature how its running. Humans are able to convert energy forms because there is a mind, intellect, conscious behind this work. Only religion give its answer, you can raise question on it but you can not give another explanation.
 
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● Science deals with what is tangible and observable—it explains things that can be tested and experimented upon. Paranormal events, creatures, or experiences, such as Jinns or Spirits, currently lie outside the scope of scientific investigation because they cannot be reliably observed, measured, or replicated in controlled settings. However, this doesn't mean they are definitively false—only that they haven't been scientifically verified yet. Perhaps in the future, as science advances, we may develop the tools or understanding needed to explore such phenomena more deeply. Presently, science does not have an answer to Jinns or Spirits. But scientists have it, they say that all this is a lie. This means that scientists have surpassed science this way.
 
● New research suggests death may not be the end, but a shift in consciousness within a multiverse shaped by the observer. Biocentrism theory suggests that life and consciousness are not accidental byproducts of the universe, but rather its very foundation. Proponents argue that what we perceive as death is only a transition—a change in our conscious experience—within a reality shaped by the observer. Life may persist in a dimension beyond time—within an interconnected multiverse where all possibilities coexist. This view is hinting at a universe where death isn’t final but part of a broader, ongoing continuum of awareness.
 

● The anti-universe theory suggests that there might be a "mirror universe" that is the opposite of ours. This idea comes from a rule in physics called CPT symmetry, which says that if you flip certain things—like charges (positive to negative), directions (left to right, like a mirror), and time (running backward)—the laws of physics would still work.The anti-universe could be like a reflection of our universe, running backward in time. While our universe is mostly made of matter (like the stuff we're made of), the anti-universe would be made of antimatter, which is the "opposite" of matter. Anti-universe might have existed "before" the Big Bang or even exists alongside our universe, balancing things out.

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Big Crunch theory says that after expansion, the universe may collapse inward, like a folded scroll.
Quran: The Day We will fold the heaven like the folding of a (scroll) for the books.
 
● Scientists have now found all of the DNA and RNA bases in meteorites. The discovery strengthens the idea that some of life’s fundamental building blocks may have arrived on Earth via space rocks. Alongside the crucial genetic bases, they also found amino acids and nucleobase isomers, compounds not present in nearby soil samples—supporting their extraterrestrial origin. The findings suggest Earth may have inherited life’s raw ingredients from interplanetary debris. 
 
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कुरान 2:97: जिबरील ने तो उसे (कुरान) अल्लाह ही के हुक्म से तुम्हारे (नबी) दिल पर उतारा है. जो उसी के अनुकूल है जो तुम्हारे दिल में पहले से मौजूद थी.

कुरान 41:30-31: उन पर फ़रिश्ते उतरेंगे... और कहेंगे हम सांसारिक जीवन में भी तुम्हारे सहायक थे और आख़िरत में भी हैं। और जो कुछ तुम्हारा जी चाहेगा, वह उसमें तुम्हारे लिए होगा और जो कुछ तुम चाहोगे, वह उसमें तुम्हारे लिए होगा। 

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