Thursday, 13 January 2022

दूसरे पति से तलाक से पहले अनिवार्य सहवास बताने वाली हदीस का जायज़ा।



3 तलाक और हलाला।

क़ुरान में 3 अलग अलग तलाक और बाद चौथे तलाक के लिए ये शर्त है की वो सामान्य हो या प्राकृतिक कारणों से हो यानी किसी फायदे के, अनुबंध, प्री प्लान आदि के तहत न हो। क़ुरान ने इस चौथे तलाक के लिए सेक्स होना ज़ुरूरी जैसी कोई शर्त नहीं बताई हैं। इसलिए ये बिना सेक्स के भी हो सकता है। पर नबी ने एक हदीस में बात कह दी है जिसे बाद में मुस्लिम ने शर्त बना लिया जबकि नबी ने खुद अपने मुंह से शर्त जैसे अल्फाज़ नहीं कह थे। कुरान में (2:232) अल्लाह ने फरमाया कि जब तुम्हारी बीवियाँ इदत खतम होने के करीब पहुँचें तो उन्हें उनके भावी पतियों से शादी करने से न रोको।


तलाक के लिए सहवास के अनिवार्य कहने वाले हदीस का जायज़ा।

हदीस की विभिन्न किताबों और सही मुस्लिम में ही इस हदीस के कई तुर्क या संस्करण है। इस हदीस के सारे तुर्क और पसमंज़र जानना ज़रूरी है।  मैं उन सभी हदीस के शब्द यंहा रख रहा हूँ। उसमें कहा गया है की...

एक औरत तमीमा  मुहम्मद साहब के पास आके कहती है कि उसके पति रिफात ने उसे 3 तलाक दे चुके थे (3 अलग अलग) और उसने एक दुसरे मर्द ज़ुबैर से शादी कर ली पर ज़ुबैर के पास जो कुछ है वो इस कपडे के झालर या डोरी के समान है (यानी यौन रूप से कमज़ोर है - ये बात एक कहने की स्टाइल है)। इसे सुन के नबी ने मुस्कुराते हुए पूछा कि यानी तुम वापिस रिफात से शादी करना चाहती हो। और फिर आगे कहा कि पर ये तुम तब तक नही कर सकती जब तक तुमने उसकी (वर्तमान पति) और उसने तुम्हारी मिठास या शिरिनी न चख ली हो (यानी जब तक अकृत्रिम, विशुद्ध और संतोषजनक शारीरिक संबंध न बना लो)। [सहीह मुस्लिम]


बुखारी का एक और तुर्क बताता है की इस शिकायत के वक़्त जुबेर नबी के पास आते है, अपने दोनों बच्चो को साथ लेके जो उनकी दूसरी बीवी से हुए थे. तमीमा की बात पर जुबेर ने कहा की यह झूठ बोल रही है और मैं इतनी कुव्वत वाला हूँ की इसको भली भाँती संतुष्ट कर सकता हूँ पर यह एक अवज्ञाकारी पत्नी है और अपने पूर्व पति के पास वापिस जाना चाहती है. इस पर नबी ने तमीमा से कहा की अगर यह तुम्हारी मंशा है तो तुम तब तक पूर्व पति से विवाह नहीं कर सकती जब तक जुबेर से शारीरिक संबध न बना लो। [बुखारी : 5825]


हदीस का निष्कर्ष। 

इससे स्पष्ट है की तमीमा झूठ का सहारा लेके शादी तोडना चाहती थी, यंहा तक की अपने वर्तमान पति का चरित्र हनन तक कर रही थी और झूठ का सहारा लेके उनकी मर्दानगी का मज़ाक उड़वा कर.  इसी झूठ और बुरी मंशा के कारण नबी ने ऐसी शर्त रखी. शुध्द इच्छा से शारीरिक संबंध बनाने को क्यों कहा गया है, ये बात सहीह मुस्लिम में शरह (व्याख्या) में ही बताया गया है की जुबेर के पहली बीवी से बच्चे थे यानी उनके कमज़ोर होने की बात में सच्चाई कम थी और उनकी पत्नी द्वारा ऐसी बात कहने के पीछे अन्य कारण थे। दूसरी बात, तमीमा का दिल दूसरी शादी के बावजूद अपने पहले पति रफात पर अभी भी था।  इसीलिए वह दूसरे पति के साथ खुशदिली के साथ संबध नहीं बनाती थी और उन्हें दिल से पति भी नहीं मान पाई थी जिससे उसे शारीरिक तसल्ली नहीं होती थी। यानी ये मालूम हुआ की उस औरत की पहले पति से मुहब्बत खतम नहीं हुई थी और उसका मन पहले पति पर ही अटका था। वह शादी (वो भी दूसरी) की पवित्रता नही समझ पा रही थी और अपनी मानसिक स्तिथि के कारण शारीरिक सुख से दूर थी। इसलिये नबी ने फरमाया की तुम भी मिठास चखो और पति को भी चखने दो ताकि एक दूसरे को करीब से जान पाओ और दिल से एक दूसरे को पति पत्नी मान पाओ और फिर उसके बाद भविष्य में साथ रहने या न रहने का फैसला करो। न कि दूसरे पति को करीब से जाने बिना या उसकी अच्छाईया आदि जाने बिना ही उससे तलाक ले लो। हो सकता है दुसरा पति, पूर्व पति से हर लिहाज से अच्छा हो। और ये तभी पता लग सकता है जब शादी के रिश्ते को सच्चा व्यवहारिक रूप दे सको। इसलिय हदीस के एक तुर्क (बुखारी: 1433f) में आता है की नबी ने फरमाया की जब तक तुम्हारा पति वैसे ही मिठास न चख ले जैसे की पूर्व पति ने चखी थी.

हदीस में एक दूसरे की मिठास यानी हलावत चखने (तर्जुमे में लुत्फ शब्द है) की बात आई है यानी दोनों की खुशनुमा वांछित सेक्स की, जो अरबी ज़ुबान का एक तरीका है। जैसे कुरान में इसी संदर्भ में आदम और हव्वा के साथ शजरे की बात कही गई है। दूसरी बात ये बात 1400 पहले कई मर्दो के सामने कही जा रही एक औरत से तो इससे बेहतर और कैसे कह सकते है, ये शैली कोई गैर अरबी ज़ुबान वाला जल्दी से नही समझ पायेगा। 

इस वाकये के वक़्त दरवाज़े पर खालिद बिन बाज़ खड़े थे जो अपने मुक़द्दमे की बारी का इंतेजार कर रहे थे। उस औरत की सेक्स के बारे में नबी के सामने इतनी बेबाकी से कही बात सुन के उन्होंने अबु बकर से ऊंची आवाज में कहा कि तुमने सुना ये औरत कैसे नबी से खुल्लम खुल्लम ऐसी बात कह रही है, तुम उसे डांटते या रोकते क्यो नही। यानी वंहा मौजूद लोगों को तमीमा एक अशालीन और बोल्ड स्त्री लगी जो सबके सामने तलाक के लिए ऐसा कारण दे रही थी। इसीलिए इन चीजों से ये बात साफ हो जाती है कि शादी तोड़ने का असल मक़सद शारीरिक संबंध नहीं बल्कि कुछ और ही था।
 
इस हदीस पर एक मत यह है कि असल में यह हदीस तो उलट हलाला को रोकने के खिलाफ है क्योंकि इसमें कोई शर्त नहीं लगाई गई है बल्कि एक असंभवता बताई गई है। असल में पत्नी को अपने पति से संबंध बनाने को कहा जा रहा है जो कि असंभव होगा क्योंकि पत्नी का ही कहना है कि उसका पति नामर्द है।
 
हम जानते है कि फैसले के वक़्त नबी सभी पक्षों को देखते थे, अपने साथियों के चरित्र व्यक्तित्व को समझते थे, अपने आस पास के लोगो के जीवन मे हो रही समस्याओं आदि को जानते थे, इसलिए उन्होंने इन जोड़े को ऐसी हिदायत दी, न कि सीधा सीधा अलग हो जाने को कहा।  इन सब बातों से यही ज़ाहिर है कि नबी, उनके साथीयो, वंहा मौजूद अन्य लोगों को तमीमा, रिफात और जुबेर के व्यकितगत जीवन आदि की जानकारी थी कि कौन, कैसा क्या है और उनकी मंशा समस्या आदि क्या है।

मुहम्मद साहब की रुचि किसी की शादी टुटवाने में नहीं थी और न ही जबरस्ती चलवाने में। वो शादी ब्याह को मामूली कॉन्ट्रैक्ट नहीं मानते थे और न ही वह अपने साथियों और परिचितों के चरित्र, जीवन आदि से अंजान थे। वो मुकद्दमों के दोनो पक्षों की पूर्ण जानकारी रखते थे या मालूम करके ही फैसले देते थे। आप 1400 साल पूर्व के एक पिछड़े समाज में ढके छुपे और खुले अल्फ़ाज़ दोनो तरह से, मौका और महल देख के ईस्तमाल करते थे जिनमें अक्सर अरबी ज़ुबान के कहावते, मुहावरे आदि का भी इस्तेमाल होता था जो आज गैर अरबी लोगों को अजीब लग सकते है। पर हर भाषा मे बात कहने के ऐसे तरीके या अंदाज़ होता है। 


नतीजे और फतवे।

बाद में मुस्लिम लोगों ने इस हदीस से ये रिज़ल्ट निकाला कि सेक्स के बाद ही तालक हो सकता है। कुछ ने ये भी माना है कि सेक्स में संतुष्टि या पतन भी अनिवार्य है। हालांकि ये मत बिल्कुल गलत और अतार्किक है। क्योंकि ये केस टू केस तो निर्भर करता है कि इसे अनिवार्य करें या वैकल्पिक। बुखारी (5792) के ही एक तुर्क में आता है की इसके बाद यह शर्त एक परम्परा बन गयी. यानि की इसके पहले ऐसा कोई प्रावधान नहीं था.  ज़ाहिर है की ये परम्परा लोगो की गलत समझ के कारण शुरू हुई.

सईद बिन मुसय्यब जो नबी की अगली ही पीढ़ी में एक ताबेईन और विद्वान थे। उन्होंने इस हदीस को मद्देनजर रखने के बावजूद, तलाक के लिए सेक्स करना अनिवार्य नही माना है। यानी सिर्फ निकाह के बाद चौथा तलाक हो जाय तो पूर्व सपॉउस से शादी कर सकते है। 

महान विद्वान शेख इब्ने तैमिया ने अल फतवा अल कुबरा (6/301) में इस हदीस पर लिखा है कि समान्यता औरत पति से तलाक नहीं चाहती और अगर हो जाये, तो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहने की बजाय पूर्व पति के पास ही वापिस जाना चाहती है।

विद्वान इमाम अल क़य्यिम ने ईलाम अल मुवक़्क़ीईन (4/45-46) में लिखा है कि पूर्व पति के पास वापिस जाने की ऐसी इच्छा स्त्री की दूसरी शादी से पहले से भी हो सकती है और बाद में भी उतपन्न हो सकती है। कोई दूसरा पति एक तलाकशुदा से शादी करके पत्नी को पूर्व पति के पास जाने देता है या पूर्व  पति, अपनी तलाक़शुदा पत्नी की शादी दूसरे से सिर्फ इसलिए करवाता है कि फिर वो उसके पास वापिस आ जायेगी (यानी कॉन्ट्रेक्चुअ या प्री प्लांड हलाला) तो ये हराम या दंडनीय है। 

अल क़य्यिम का अर्थ ये है कि जब शादी एक पवित्र रिश्ता है और दूसरे व्यक्ति ने किसी दुर्भावना से शादी नही की है तो उसका अधिकार है कि वो अपनी शादी को न टूटने दे और पूरी कोशिश  करे उसे निभाने की। यानी बात बात पर तलाक ने दे, हालांकि बहुत मजबूरी हो जाय तो फिर अलग हो सकता है। यही कारण है जुबेर ने तलाक नहीं देनी चाही और न ही नबी ने दिलवाई क्योकी शादी कोई मज़ाक नही की पहले 3-3 तलाक दे दो और फिर चौथे तलाक के बाद वापिस उसी 3 तलाक दिए बंदे के साथ रहना चाहो। ऐसा व्यवहार या तो नासमझी है या चालाकी। हो सकता है, तमीमा या उसके पूर्व पति की भी ये कोई चालाकी रही हो, ईश्वर जाने।

इब्न अब्दुल बर्र ने भी अल तमहीद (13/227) में इस हदीस पर यही राय रखी है कि स्त्री की दूसरी शादी के बाद पूर्व पति के पास जाने की इच्छा का दूसरी शादी या रिश्ते पर फर्क नहीं पड़ता और इसमें दूसरे पति का कोई दोष नही माना जायेगा। 

यानी विवाह की पवित्रता के आधार पर अब रिश्ता दिल से निभाया जान चाहिए और उसकी इच्छा मात्र पर नया रिश्ता यूंही खत्म न कर दिया जाय। हाँ, अगर सारे प्रयत्नों के बावजूद न निभाया जा सके तो अलग हो जाय।


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