Friday, 11 February 2022

हिन्दू धर्म में घूंघट या पर्दा।


जो हिजाब का विरोध केवल धर्म के आधार पर करते है, उन्हें सबसे पहले अपने धर्म में देखना चाहिए और बाद में दूसरे धर्म में कमियां निकालनी चाहिए। हिन्दू धर्म के विभिन्न ग्रंथों जैसे वेद, रामायण, महाभारत, पुराणों आदि में मुख - पांव आदि ढकने और घूंघट करने के आदेश, उल्लेख और संस्कृति मिलती है।


■ वेद में।

ऋग्वेद : 8 : 33 : 19



दामोदर सातवलेकर (चित्र 1) और श्रीराम शर्मा आचार्य (चित्र 2) ने इस मंत्र के भाष्य में आए काशपलकौ आदि शब्दों का अर्थ मुख व पिंडलियां किया है जबकि हरिशंकर सिद्धान्तलंकार और जयदेव शर्मा ने काशपलकौ शब्द का अर्थ टखने व निचले अंग किया है और स्वामी दयानंद (चित्र नीचे) ने इस शब्द का अर्थ निचले अंग किया है। रामायण महाभारत आदि में घूँघट से लेके, वेदों में टखनों व निचले अंगों को ढकने के आदेश से ये सिद्ध है की वैदिक या प्राचीन काल में स्त्री का पूर्ण पर्दे में रहने का चलन था। अगर क्षण भर के लिए आर्य समाजी मत अनुसार ये मान भी ले कि वेद केवल निचले अंगों को ढकने की बात कर रहे है तो इस आधार पर यही तर्कशील आभास होता है कि उस समय सिर ढकना भी अवश्य ही अनिवार्य होगा जिसे बाद के रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रथं पूर्ण प्रमाणित कर देते है क्योंकि ये ग्रंथ वेद आधारित है और वैदिक संस्कृति की झलक देते है।


■  वाल्मीकि रामायण में।


रामायण : 6: 114 : 28 -30 (गीताप्रेस)


रामायण : 6 : 111 : 61 - 62  (गीताप्रेस)



रामायण : 6 : 114 : 60 - 64 ( संस्कृति साहित्य प्रकाशन)


 

रामायण : 4 : 6: 11 - 22
आत्मना पञ्चमम् माम् हि दृष्ट्वा शैल तले स्थितम् |
उत्तरीयम् तया त्यक्तम् शुभानि आभरणानि च || 
इसमें सीता जी द्वारा जंगल में अपने आभूषण और अपना उत्तरीया फेंकने का उल्लेख आता है ताकि पीछा करके उन्हें खोजा जा सके। उत्तरीया के कई अर्थ है जैसे कि शॉल, स्कार्फ, ऊपरी कपड़ा आदि। परन्तु अगर ये मान लिया जाए कि वह साड़ी पहनती थी तो यंहा इस शब्द का अर्थ ओढ़नी से लिया जा सकता है जिससे वे स्वयं का मुख ढकती होंगी। मनमथ नाथ दत्त (एम.एन. दत्त) ने रामायण के अपने अंग्रेज़ी अनुवाद में इसका अर्थ स्कार्फ ही किया है। वंही हिंदी के अनुवादों में इसका अर्थ चादर लिया गया है। यंहा दो बातें सिद्ध होती है, पहली की लक्षमण, सीता जी के आभूषणों और चादर को नही पहचानते थे क्योंकि या तो वो आभूषण घूँघट में ढके रहते होंगे या वह ऊपर की और दृष्टि डालते ही नही होंगे (अर्थात चादर या ओढ़नी कि ओर). वह कहते है कि मैं तो उनके पांव पहचानता हूँ कि क्योंकि मैं उनके पांव छूता था। यंहा ये भी ज्ञात होता है कि लक्ष्मण अपनी भाभी या पराई स्त्री को नज़र उठा के नहीं देखते है जो उस समय के पुरूषों के उच्चतम चरित्र का उदाहरण है।




सीता जी और रावण की पत्नियां घूंघट आदि करती थी। रावण की पत्नी पर कुछ लोग ये तर्क देते है कि रावण तो राक्षस था तो उनसे क्यों धर्म का आचरण सीखना। दरअसल वो लोग ये बात भूल जाते है कि रावण बहुत बड़ा विद्वान, वेदों का ज्ञाता व ब्राहाण था। वह और उसका परिवार सनातन धर्म के अनुयायी ही थे। बस आचरण में भ्रष्ट हो गए थे। उसके यहाँ तो घूंघट आदि तो सीता हरण से पूर्व ही करते आ रहे थे। फिर सीता जी द्वारा घूंघट भी यही सिद्ध करता है कि ये एक सामान्य प्रथा या परम्परा थी। रामायण काल में तो वैसे भी रामराज्य था जंहा वैदिक धर्म और वैदिक शिक्षाओं का पालन किया जाता था। राम जी और सीता जी वेद अनुसार ही आचरण करते थे।


महाभारत में।

महाभारत: आदिपर्व : अध्याय 210 : श्लोक 14



पुराणों में।


तुलसी रामायण या रामचरितमानस।

रामचरितमानस: दोहा 116 : चौपाई 3




संस्कृत नाट्य।


शूद्रक की मृच्छकटिका (3 -4 शताब्दी).

● कालिदास की अभिज्ञानशाकुनतलम (4 - 5 शताब्दी).



● पंडित विश्वनाथ की साहित्य दर्पण (14 शताब्दी).




● 'प्रतिमानाटकम्' में  सीता  वन - गमन  के  समय  मार्ग  में  घूघँट  निकाल  कर  चलती  है। 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' में  शाकुन्तला  तपस्वियों  के  साथ  दुष्यन्त  के  दरबार  में  अवगुण्ठनवती  होकर  जाती  है।  उसको  देखकर  राजा  दुष्यन्त  'कास्विदव - गुष्ठनवती  नाति  परिस्फुट  शरीर  लावण्या ' कहता  है। जब  दुष्यन्त  शकुन्तला  से  विवाह  करने  की  बात  को  स्मरण  नहीं  करता  तो  गौतमी  ने  शाकुन्तला  को  लज्जा  का  त्याग  कर  घूँघट  हटाने  के  लिए  कहा। हर्षचरित में है कि राजकुमारी राज्यश्री, जिसे उसका भावी पति ग्रहवर्मा विवाह के पूर्व देखने आया था, ने अपने मुख पर सुन्दर लाल परिधान डाल रखा था। एक स्थान स्थाण्वीश्वर (थानेश्वर) का वर्णन करते समय बाण कहता है कि नारियां अवगुण्ठन डाले हुई थीं। कादम्बरी में बाण ने पत्रलेखा को लाल अवगुण्ठन के साथ चित्रित किया है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में दुष्यन्त की राजसभा में शकुन्तला को अवगुण्ठन डाले चित्रित किया गया है।  सांख्यतत्त्वकौमुदी से प्रकट है कि नारियां परदा करके बाहर निकलती थीं। स्मृतिग्रन्थ में परदा प्रथा के प्रचलन के विषय में बौद्ध ग्रन्थों से निर्देश दिए गए हैं

● इसी तरह एक रामकथा में भी राम चन्द्र जी भी सीता जी से पराये आदमियों (परशूराम) से परदा करने को कहते हैं :- जब श्रीराम चन्द्र ने परशुराम को आते देखा तो वे सीता जी से बोले ''हे सीता वह हमारे बड़े है, अपने आपको घूंघट में छिपा लो और चक्षुओं को झुका लो, '' (8वी शताब्दी में भवभूति द्वारा रामकथा आधारित महावीरचरित्र, एक्ट 2, पेज 71).  

● 7वी शताब्दी में माध नामक कवि ने (शिशुपालवध , व. 17 में) श्रीकृष्ण के घर की स्त्रियों के घूंघटधारी होने का उल्लेख किया है।


अन्य



वैसे विरोध करने वालों से सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि विरोध के आधार क्या हैं? क्या धर्म का आदेश है इसलिए? तो ऐसा आदेश तो दुसरे धर्मो में भी है? क्या ये इस्लाम द्वारा जन्मा है? मगर हिन्दू ग्रंथो में इसका प्रथम उल्लेख है.  क्या ये पुराना रिवाज हो चूका है? पर कई दुसरे सम्प्रदायों में अभी भी चलन में है.क्या इससे गर्मीं  लगती है? तो फिर सर्दी में कर सकते हैं? क्या इससे सुरक्षा में खतरा हैं? तो फिर जंहा खतरा न हो या जंहा पूरी चेकिंग होती या जिस हिजाब स्टाइल से सुरक्षा का कोई नियम न टूटता, तब कर सकते हैं. इसके अलावा, सिक्खों की पगड़ी,  राजस्थानी पगड़ी व घूँघट,रानी एलिज़ाबेथ का हिजाब का क्या करोगे? साड़ियों से सुरक्षा खतरा नहीं है? सर्दियों में छोटी साड़ी ब्लाऊज मौसम में परेशान नहीं करते? ऐसे अनेकों सवाल है?

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