क्या कलियुग के अंत के लिए कल्कि अवतार का आना आवश्यक है या कल्कि की वास्तविकता कुछ और है?
कल्कि अवतार।
● (1) कल्कि अवतार के आगमन से कलियुग का अंत कैसे हो सकता है? वास्तव में कुछ पुराण व कवि, कल्कि के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं और मानते है कि ये घटना हो चुकी है। इसका भी उल्लेख मिलता है कि उनका जन्म कलियुग के चरमोत्कर्ष पर हो चुका है। कल्कि की विशेषताएं इंगित करती है कि वह प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में रहे होंगे। इतिहासकार ऐसे एक- दो ऐतिहासिक व्यक्तियों की ओर संकेत करते है (इन व्यक्तियों पर कभी और चर्चा करंगे)। कल्कि
द्वारा घोड़े, तलवार का प्रयोग और उनका योद्धा होना, उन्हें आधुनिक काल से
पहले का ही व्यक्ति सिद्ध करता है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि पुराणों
के निर्माण काल में हुए अनेकों बाहरी आक्रमणों से मुक्ति की तीव्र इच्छा और भारत के संपर्क में
आई भावी मसीहा में आस्था रखने वाली कई विदेशी मान्यताओं के प्रभाव में
कल्कि की अवधारणा जन्मी है। पुराणों के निर्माण के काल के समय हुन, मंगोल
शासक भारत पर आक्रमण कर रहे थे। उनके आक्रमण से त्रस्त लोगों में ये
अवधारणा जन्मी की उनका भी कोई रक्षक आएगा जो उन्हें इनसे मुक्ति दिलवाएगा।
साथ ही नए संपर्क में आये मुस्लिम ईसाई और यहूदी लोगों के मसीहा आने के मत
से प्रभावित होकर भी ये धारणा जन्म ली हुई हो सकती है। इसके साथ ही बोद्ध
धर्म में भी भावी बुद्ध की धारणा है। अर्थात ये एक बाहरी प्रभाव ही है।
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(2) ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों की
संकल्पना ग्यारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अपना निश्चित आकार ले चुकी थी|
भगवान विष्णु के दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, क्रुमु, वराह, नरसिंह,
वामन, पशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि| पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार
भगवान विष्णु के दस अवतारों में अंतिम हैं जोकि भविष्य में जन्म लेकर
कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा| ब्राह्मण ग्रन्थ, अग्नि पुराण
(सौलहवें अध्याय) ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किये हुए एक
घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती
हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा
बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित करेगा| परन्तु कुछ पुराण ओर कवि, कल्कि
अवतार के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं| वायु पुराण के अनुसार कल्कि अवतार
कलयुग के चर्मौत्कर्ष पर जन्म ले चुका हैं| मतस्य पुराण, बंगाली कवि जयदेव
(1200 ई.) ओर चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी हैं| अतः
कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकता हैं| जैन पुराणों में भी एक
कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन हैं| जैन विद्वान गुणभद्र नवी शताब्दी
के उत्तरार्ध में लिखता हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के एक
हज़ार वर्ष बाद हुआ| जिन सेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखता हैं कि कल्किराज ने
40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई| कल्किराज
अजितान्जय का पिता था, वह बहुत निरंकुश शासक था, जिसने दुनिया का दमन किया
और निग्रंथो के जैन समुदाय पर अत्याचार किये| गुणभद्र के अनुसार उसने दिन
में एक बार दोपहर में भोजन करने वाले जैन निग्रंथो के भोजन पर भी टैक्स लगा
दिया जिससे वो भूखे मरने लगे | तब निग्रंथो को कल्कि की क्रूर यातनाओ से
बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे
मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द ओर यातनाये झेलने के लिए
रत्नप्रभा नामक नर्क में भेज दिया| प्राचीन जैन ग्रंथो के वर्णनों के
अनुसार कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु
(470 ईसा पूर्व) के एक हज़ार साल बाद, यानि कि गुप्तो के बाद, छठी शताब्दी
ई. के प्रारभ में, होना चाहिए चाहिए| गुप्तो के बाद अगला शासन हूणों का
था| जैन ग्रंथो में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के
साथ समानता रखते हैं| अतः कल्कि राज ओर मिहिरकुल (502- 542 ई.) के एक होने
की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता| इतिहासकार के. बी. पाठक ने सम्राट
मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की हैं, वो कहते हैं कि कल्किराज
मिहिरकुल को दूसरा नाम है| चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु हेन सांग मिहिरकुल की
मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया| उसके द्वारा लिखित सी यू की नामक
वृतांत इस मामले में कुछ और प्रकाश डालता हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल कि
मृत्यु के समय भयानक तूफ़ान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारो ओर
गहरा अँधेरा छा गया| बौद्ध पवित्र संतो ने कहा कि अनगिनत लोगो को मारने ओर
बुध के धर्म को उखाड फेकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा जहाँ वह
अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा| जैन धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश
कल्कि के गहरे नर्क में जाने ओर अनगिनत युगों तक दुःख ओर यातनाये झेलने का
वर्णन, बौद्ध धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश मिहिरकुल के नर्क में
गिरने के वर्णन से बहुत मेल खाता हैं| अतः जैन ग्रन्थ में वर्णित कल्कि राज
के मिहिरकुल होने की सम्भावना प्रबल हैं| इतिहास में हूण कल्कि की तरह
श्रेष्ठ घुडसवार ओर धनुर्धर के रूप में विख्यात हैं तथा कल्किराज/
मिहिरकुल हूण ने भी कल्कि की तरह जैन ओर बोद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन
किया था| कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ब्राह्मण
धर्म का अनुयायी था| वह अनीश्वरवादियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ता था। कल्हण
ने राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में मिहिरकुल का वर्णन ब्राह्मण समर्थक शिव भक्त
के रूप में किया हैं| कल्हण कहता हैं कि मिहिरकुल ने कश्मीर में
मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया ओर ब्राह्मणों को 1000 गांव
(अग्रहार) दान में दिए| हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं वरन पूरे
भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था| भारत में बौद्ध धर्म के अवसान ओर सनातन
धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका
हैं। मिहिरकुल की संगति कल्कि अवतार के साथ करने में एक कठनाई ये हैं कि
कुछ इतिहासकार हूणों को विधर्मी संस्कृति का विदेशी आक्रांता मानते हैं|
किन्तु हूणों को विधर्मी ओर विदेशी नहीं कहा जा सकता हैं| ऐतिहासिक
प्रमाणों के अनुसार हारा हूण (किदार कुषाण) लगभग 360 ई. में भारत के
पश्चिमीओत्तर में स्थापित राजनेतिक शक्ति थे| श्वेत हूण भी पांचवी शताब्दी
में पश्चिमीओत्तर भारत के शासक थे| 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के
नेतृत्व में जब हूणों ने मध्य भारत में साम्राज्य स्थापित किया तब वो सनातन
संस्कृति ओर धर्म का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध
धर्म का अनुयायी था| अतः हूणों ओर गुप्तो टकराव राजनैतिक सर्वोच्चता ओर
साम्राज्य के लिए दो भारतीय ताकतों का संघर्ष था| भारत के प्रथम हूण सम्राट
तोरमाण के शासन काल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्य भारत के एरण नामक
स्थान से वराह मूर्ति से मिला हैं| हूणों के कबीलाई देवता वराह का सामजस्य
भगवान विष्णु के वाराह अवतार के साथ कर उसे सनातन धर्म में अवशोषित किया
जा चुका था| कालांतर में हूणों से सम्बंधित माने जाने वाले गुर्जरों के
प्रतिहार वंश ने मिहिर भोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिंदू
साम्राज्य का निर्माण किया ओर ब्राह्मण संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी
प्रभावी भूमिका निभाई| गुर्जर प्रतिहारो की राजधानी कन्नौज संस्कृति का
उच्चतम केंद्र होने के कारण महोदय कहलाती थी| तोरमाण हूण के तरह
गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वराह का उपासक था ओर उसने आदि वाराह की
उपाधि भी धारण की थी| संभवतः आम समाज के द्वारा मिहिरभोज को भगवान विष्णु
का वराह अवतार माना जाता था| गुर्जर- प्रतिहारो ने सातवी शताब्दी से लेकर
दसवी शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत ओर उसकी संस्कृति की जो रक्षा
की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं| समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर
सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु कहा हैं| मिहिरभोज
ने आदि वराह की उपाधि सनातन धर्म ओर संस्कृति के रक्षक होने के नाते ही
धारण की थी| मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को उसके गुरु राजशेखर ने आर्यवृत्त
का सम्राट कहा हैं| गुर्जर सभवतः हूणों ओर कुषाणों की नयी पहचान थी| अतः
हूणों ओर उनके वंशज गुर्जरों ने सनातन धर्म ओर संस्कृति के संरक्षण एवं
विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल
हूण ओर मिहिरभोज गुर्जर को समकालीन ब्राह्मण/हिंदू समाजो द्वारा अवतारी
पुरुष के रूप में देखा गया हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं|
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(3) इसके विपरीत कुछ अन्य पुराण और बौद्धकाल के कवियों की कविता और गद्य
में ऐसा उल्लेख व गुणगान मिलता है कि कल्कि अवतार हो चुका है। 'वायु
पुराण' (अध्याय 98) के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मोत्कर्ष पर जन्म
ले चुका है। इसमें विष्णु की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय, व्यास, कल्की
विष्णु के अवतार कहे गए हैं, किन्तु बुद्ध का उल्लेख नहीं हुआ है। इसका
मतलब यह कि उस काल में या तो बुद्ध को अवतारी होने की मान्यता नहीं मिलती
थी या फिर बुद्ध के पूर्व कल्कि अवतार हुआ होगा। मत्स्य पुराण के द्वापर और
कलियुग के वर्णन में कल्कि के होने का वर्णन मिलता है। प्राचीन जैन
ग्रंथों के अनुसार 'कल्कि' एक ऐतिहासिक सम्राट था जिसका शासनकाल महावीर की
मृत्यु के 1 हजार साल बाद हुआ अर्ताथ महावीर के एक हजार वर्ष बाद यानी
कल्कि हुए थे अर्थात 739 ईसा पूर्व। महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व
हुआ था। इसका मतलब महावीर के 1 हजार वर्ष बाद कल्कि हुए थे यानी कि तब भारत
में गुप्त वंश का काल था। मौर्य और गुप्तकाल को भारत का स्वर्णकाल माना
जाता है। गुप्तकाल के बाद ही भारत में बौद्ध और जैन धर्म का पतन होना शुरू
हो गया था। आधे भारत पर राज्य करने वाले बौद्ध और जैनों का शासन आखिर
हर्षवर्धन के काल तक समाप्त होकर शून्य क्यों हो गया? तब क्या हम यह मानें
कि गुप्त वंश के पतन के बाद ही कल्कि का अवतार हुआ जिसने शक, कुषाण आदि को
ही नहीं मार भगाया बल्कि जिसने बौद्ध और जैनों के प्रभुत्व को भी समाप्त कर
दिया? यदि हम प्राचीन तारीख निर्धारण के अनुसार कल्कि का जन्म 739 ईसा
पूर्व मानते हैं तो इसका मतलब कि जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ (877-8777 ईसा
पूर्व) ईसा पूर्व के बाद कल्कि का जन्म हुआ होगा। पार्श्वनाथ के काल में
जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था और निश्चित ही तब हिन्दुओं के लिए जैन धर्म
एक खतरा जान पड़ा होगा। यदि गुप्त काल के बाद कल्कि का होना मानें तो
गुप्तों के बाद हूणों ने भारत पर कब्जा कर लिया था। जैन ग्रंथों ने
कल्किराज के उत्तराधिकारी का नाम अजितान्जय बताया है। मिहिरकुल हूण के
उत्तराधिकारी का नाम भी अजितान्जय था। कुछ विद्वानों के अनुसार मिहिरकुल को
कल्कि मानना इसलिए ठीक नहीं होगा, क्योंकि हूण तो विदेशी आक्रांता थे।
उनको तो इतिहास में विधर्मी माना गया है। 'विधर्मी' का अर्थ होता है ऐसे
व्यक्ति जिसने या जिसके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर दूसरों का धर्म
अपना लिया हो। लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हूण विदेशी नहीं थे।
उन्हें प्राचीनकाल में यक्ष कहा जाता था। वे सभी धनाढ्य लोग थे। हूण, कुषाण
और शक सभी मूलत: भारतीय ही थे। ये सभी भारत से निकलकर बाहर गए और फिर पुन:
भारत में आकर राज करने लगे। भारत के प्रथम शक्तिशाली हूण सम्राट तोरमाण के
शासनकाल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्यभारत के एरण नामक स्थान से वाराह
मूर्ति से मिला है। हूणों के देवता वाराह थे। कालांतर में हूणों से संबंधित
माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिरभोज के नेतृत्व में
उत्तर भारत में अंतिम हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया और हिन्दू संस्कृति
के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई। कलयुग की शुरुआत
3000 विक्रम संवत् पूर्व अर्थात 2942 ईसा पूर्व में हुई। 3114 विक्रम
संवत् पूर्व अर्थात 3056 ईसा पूर्व को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
इसके बाद कोई बड़ी घटना है तो वह है भगवान बुद्ध का जन्म। बुद्ध के पूर्व
ही जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। बुद्ध के बाद
ही कल्कि अवतार होने की बात कही जाती है। शंकराचार्यों के अनुसार कलयुग
में दो ही अवतार हैं- बुद्ध और कल्कि। पुराणों और भारत के धार्मिक इतिहास
को जानने वाले जानकार मानते हैं कि भगवान कृष्ण के पूर्व 'अवतार' जैसा शब्द
प्रचलन में तो था लेकिन विष्णु, शिव आदि के अवतार होते हैं, यह नहीं था।
भगवान कृष्ण के बाद जब धर्म का पतन होना शुरु हुआ तो धर्म को पुन: स्थापित
करने के लिए अवतारवाद को स्थापित किया गया। वेदव्यास ने कुछ ही पुराण लिखे
थे। अधिकतर पुराण बौद्धकाल में ही लिखे गए हैं कुछ मध्यकाल में लिखें गए।
सबसे दुखदाई बात यह कि पुराणों में मध्यकाल और फिर अंग्रेज काल में संसोधित
कराया गया था। उसे भ्रमित करने वाले बनाया गया। पुराणों में विष्णु के 10
अवतार बताए गए हैं- मत्स्य, क्रुमु, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम,
कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। कल्कि अवतार भगवान विष्णु के 10 अवतारों में अंतिम
हैं, जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा।
स्कंद पुराण के दशम अध्याय में स्पष्ट वर्णित है कि कलियुग में भगवान
श्रीविष्णु का अवतार श्रीकल्कि के रुप में सम्भल ग्राम में होगा। लेकिन
बौद्ध ग्रंथों और जैन पुराणों में इतिहास की सही जानकारी संरक्षित है।
कल्किराज (मिहिरकुल हूण) ने भारत से बौद्ध धर्म को उखाड़कर बाहर फेंक दिया
और शक्य मुनियों को जंगल में ही रहने पर मजबूर कर दिया। इस संबंध में एक
कहानी है कि मिहिरकुल बौद्ध धर्म अपनाना चाहता था। इस इच्छा से उनने बौद्धा
के सर्वोच्च धर्मगरु को संदेश भेजा की आप मुझे बौद्ध धर्म के संबंध में
जानकारी दें और बताएं कैसे मोक्ष पाया जा सकता हैं। उस सर्वोच्च गुरु ने
खुद संदेश न भेजकर और न आकर एक भिक्षु को भेजा और कहा कि आप इससे सीख लें।
मिहिरकुल ने इसे अपना अपमान समझा और शपथ ली की भारत से शाक्यों को
नामोनिशान मिटा दूंगा। कल्कि पुराण में लिखा भी हैं कि कल्कि आएंगे और
अनिश्वरवादी धर्मों (जैन और बौद्ध) का नाश कर देंगे। मिहिरकुल का शासन ईरान
से लेकर बर्मा और कश्मीर से लेकर श्रीलंका तक था। इतिहासकारों के अनुसार
वराह हूण और कुषाण लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमोत्तर में एक प्रमुख
राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे थे। उन्होंने पंजाब से मालवा तक अपना शासन
स्थापित कर लिया था। श्वेत हूण भी 5वीं शताब्दी में पश्चिमोत्तर भारत के
शासक थे। 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने
मध्यभारत में साम्राज्य स्थापित किया, तब वे वैदिक धर्म और संस्कृति का एक
हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इससे
पहले मौर्य वंश भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे अतः हूणों और गुप्तों का टकराव
दो भारतीय ताकतों का टकराव था।
:- संदर्भ : मत्स्य पुराण, वायु पुराण, उत्तर पुराण आदि।
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(4) Devdutt Pattanaik: - In Vishnu’s last avatar, Kalki, he appears to
take on the form of the destroyer as well. Kalki is the tenth and
final avatar of Vishnu, visualised as a warrior who rides a white horse
and brandishes a flaming sword. The story of Kalki starts appearing in
Hindu scriptures at the time when India was overrun by a whole host of
foreign marauders from Central Asia. These were brutal and barbaric
tribes such as the Huns and later the Mongols. The story was a clear
response to their brutality. These new invaders were destroying the old
way of life and it was hoped that Vishnu, as Kalki, would destroy the
new ways, and restore life to the old ways. Kalki was probably inspired
by messianic thoughts that are prevalent in Judaism, Christianity and
Islam. He was the deliverer and the saviour. Across India, there are
many folk heroes who ride a horse and brandish a sword much like Kalki.
He is thus almost a guardian god in folk imagination. But in the
scriptures, he is the one who will close the Kalpa, the world-cycle, so
that a new one can begin. Even the Buddhists had a similar idea, of a
Bodhisattva of the future, Manjushri, who yields a flaming sword. In the
Tibetan Buddhist tradition, this wrathful manifestation Manjushri is
called Yamantaka. Yamantaka is an epithet associated with Shiva in Hindu
tradition and means the destroyer of death. Thus, metaphysically, Kalki
will destroy everything, even death. He will destroy all structures so
that none exist. In other words, he will herald Pralaya. The
horse is a highly revered animal in Hinduism right from Rig Vedic times
even though, strangely, the horse is not a native Indian animal. It
does not thrive in the subcontinent except in parts of Gujarat and
Rajasthan. Since the horse came into India from the North West frontier,
along with traders and marauders, Vishnu’s horse-riding form, Kalki,
has been associated with warlords who overran India in medieval times.
Vishnu not only rides a horse. He also becomes a horse. One form of
Vishnu with the head of a horse that is highly revered especially in
south India is Hayagriva. This form of Vishnu is associated with
education. From the horse’s head emerges Saraswati, goddess of
knowledge. Vedic mythology is full of tales where wisdom reaches the
world through horse-headed beings. The sun, for example, appeared with a
horse’s head to reveal the wisdom of the Veda to Rishi Yagnavalkya.
Rishi Dadichi replaced his human head with a horse’s so that he could
share Vedic wisdom with the Ashwini twins.
● (5) असत्य, अधर्म और पाप बढ़ने पर अवतार आते हैं। अर्थात जब पाप कम होंगे तो अवतार कम आने चाहिए थे और जब पाप अधिक होंगे तो अवतार अधिक आने चाहिए। परंतु इसका उल्टा हुआ है। सतयुग में 4 अवतार हुए हैं, त्रेतायुग में 3 और द्वापरयुग में 2 अवतार। जबकि कलयुग में 1 अवतार आने की धारणा है। इससे यही ज्ञात होता है कि या तो युगकाल धारणा में कोई त्रुटि है या फिर अवतारवाद की धारणा में।
● (6) कल्कि आगमन से कल्कि पुराण भरा हुआ है। इसके अलावा महाभारत में कल्कि के आगमन का उल्लेख देखिये।
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