Monday, 8 August 2022

क्या इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाने के लिए मुस्लिम पहचान ज़ाहिर होना ज़रूरी है?

 



अक्ल के मुताबिक आज क्या तरीक़ा होना चाहिए।


1.  कुछ लोग पैगाम के उसूलों में से एक उसूल यह बताते हैं कि इस काम को करते हुए सामने वाले को आपका मुस्लिम होना वाज़ेह हो जाना ज़ुरूरी है। पहली बात ये उसूल इन्सानों द्वारा काम को बेहतर तरीके से अंजाम देने के लिए बनाए गए थे और इनमें तबदीली की पूरी गुंजाइश मौजूद है। बल्कि एक उसूल तो यही है कि सामने वाले इंसान, मौका, महल के मुताबिक अपनी अक़ल की रोशनी में हिकमत से काम करना है। इसलिए ज़रूरत के मुताबिक इन उसूलों को बदल भी सकते हैं ताकि काम को नए हालातों में और बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सके। किसी शख्स की मर्ज़ी है पहचान छुपाने और न छुपाने की। भले ही आप अपनी पहचान छुपाने कि कोशिश करें पर नाम पूछे जाने पर पहचान बिल्कुल नहीं छुपानी चाहिए। वैसे मुस्लिम की असल पहचान उसका लिबास, हुलिया या नाम नहीं बल्कि उसका ईमान, तकवा और अक़ीदा है। 


2.  आज माहौल बदल चुका है और अब ये काम पहले की तरह खुल्लम खुल्ला करने का वक़्त नहीं है क्योंकि आज गैर मुस्लिमों को हमारे दीन से, हमसे, हमारे हुलिये से, हमारे पहनावे से नफरत हो चुकी है। अगर कोई मुस्लिम के आम माने जाने वाले हुलिए या लिबास में यह काम खुलम खुल्ला करता है तो बहुत इमकान है की उसे बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कलीम साहब, उमर साहब को किस तरफ झूठा फंसाया गया है, हम सब जानते हैं।  बहुत से राज्यों में खासतौर पर कट्टर पार्टी द्वारा शासित राज्यों में मुस्लिम तंजीमो का काम या तो बंद किया जा चुका है या ठंडा पड़ चुका है।  अब वे भी ज़्यदातर खिदमत में ही लगे हुए नज़र आते है।  इसलिए आज ढके छुपे अंदाज़ में या इंडरेक्ट्ली या अपनी पहचान दिखाने पर ज़्यादा फोकस न करते हुए, यह काम करना बेहद महफ़ूज तरीका है और यही किया भी जाना चाहिए क्यूंकी मक़सद तो हक़ बात उन तक पहुंचाने का है। बाकी कोई खुल कर काम करना चाहे तो उसकी मर्ज़ी है जैसा दिल चाहे करे। 


हमारा तरीका। 


3.  हमारे कुछ लोग, इसी वजह से हमें छोड़ कर जा चुके हैं की यह नया तरीका ठीक नहीं है और यह काम तो पुराने तरीके से ही होना चाहिए।  पर अब आप जब ऐसे लोगों से पूछते हैं कि हमें छोड़कर अब आप कैसे और कितना काम कर पा रहे हैं यानि पहले वाले तरीके पर ही चलते हुए, तो आपको पता लगता है कि उनका काम या तो बंद हो चुका है या मंदा पड़ चुका है। तो क्या फाइदा हुआ? काम बंद करने से तो बेहतर है कि तरीका बदलकर या हल्का हाथ रखते हुए काम किया जाये।


4.  अगर हमारा कोई साथी ऐसी पुराने तरीके पर काम करना चाहे तो वो आज़ाद है और जाके खुद कर लें, पर हमारे बैनर के अंडर काम न करें वरना नाम हमारा ही खराब होगा और उसे हमारा ही साथी मान जाएगा। हमने किसी को इंडिपेंडेंटली अपने नाम से काम करने से नहीं रोका है।  पर यकीन मानिए शायद ही किसी की हिम्मत होगी आज के माहौल मे जाके पुराने तरीके पर काम करने की। न जाने लोग यह बात क्यों नहीं समझ पा रहे कि खुद ऐसा करेंगे नहीं और हमसे उम्मीद करेंगे की हम पहले की तरह काम करें या यही लोग हम पर तनकीद करेंगे की आपका नया तरीका तो बिलकुल बेकार है। यह तो डबल स्टैंडर्ड है।


कुरान, सुन्नत, इस्लाम का तरीका। 


5.  कुरान के मुताबिक नेकी खुल कर और छुपके दोनों तरह से हो सकती है। यह बात साफ है कि इशतेमाई सोशल वर्क अक्सर खुले आम ही हो सकता है, न की छुप के। इस्लाम का पैग़ाम भी छुप कर और खुले आम दोनों तरह दे सकते हैं यानी अपनी मुस्लिम पहचान दिखा कर और छुपा कर, दोनों तरीको से। कुरान और सुन्नत इस काम को करते हुए अपनी पहचान बताने की कोई शर्त नहीं लगाते।  


6.  ज़रूरी नहीं हम मुस्लिम दिखे तभी यह काम मुकम्मल होगा। आपको बात तो इस्लाम की ही पहुंचानी है, अगर आपकी भाषा उनके जैसी है या आपकी पहचान उनके जैसी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा। आपका मक़सद तो हक़ बात पहुंचाने का है।  मक्का में इस्लाम के शुरवाती दौर में मुस्लिम हुए लोगों का हुलिया और पहनावा, मुशरीकों की तरह ही था।  साहबा उन्हीं की जैसी पहचान के साथ उन्हीं की ज़ुबान (पूरे अरब की ज़ुबान अरबी ही थी) मे यही काम किया करते थे। शुरवात मे तो मुस्लिम लफ्ज भी नहीं आया था, तो सोचिए ज़रा क्या साहब जा कर कैस कह सकते होंगे कि वो मुस्लिम है और हमारी बात सुनो।  ज़ाहिर है वो सिर्फ पैगाम देने पर ज़्यादा तवज्जो देते होंगे और लोग भी बात पर ही ध्यान देते होंगे। मुहम्मद साहब भी एक बार एक ऐसी बुढ़िया की मदद करने के लिए उसका सामना सर पर लाद कर चल दिये थे जो आप ही का नाम लेके लगतार कोसे जा रही थी, पर अपने आखिर मे बतया कि मैं वही मुहम्मद हूँ, यह सुनकर वो ईमान ले आई। यानि आप ने आपने शुरू मे नाम बताना सही न समझा और सही मौके पर बताया। 


7.  आज यंहा भी मक्की दौर के अव्वल वक्त जैसे हालत चल रहे है।  हम यंहा के लोगों की पहचान लिए हुए ही उन तक हक़ बात पहुँचाते हैं, उनकी ज़ुबान में पहुँचाते हैं (यंहा भी पूरे मुल्क की यही ज़ुबान है)। उस वक्त मुशरीकों को अल्लाह का नाम तो मालूम था पर वो उससे बेहद दूर थे, उन्हें अल्लाह के बारे में याददिहानी करवाई गयी।  उसी तरह यंहा लोगो को ईश्वर का नाम तो मालूम है पर वो उससे बहुत दूर है सो उन्हे भी ईश्वर की याददियानी करवाई जाएगी। मुशरीकों को लगता था की मुस्लिम उन्हे उनके बाप दादाओ के दीन से दूर लेके जाना चाहते हैं पर सहाबा फिर भी इस काम मे लगे रहते थे क्यूंकी वो जानते थे कि उन सभी के पूर्वजों का दीन भी इस्लाम था।  यंहा भी लोगों को लगता है की हम उन्हे, उनके बाप दादाओ के धर्म से दूर लेके जाना चाहते है तो हमे फिर भी इसी मे लगे रहना चाहिए क्योंकि हम भी जानते हैं कि सभी के पूर्वजों का धर्म सनातन (दीने कय्यिम) था।


8.   इस्लाम का पैगाम शुरुवात में छुप कर ही दिया गया जब तक की क़ुरान में खुल कर देने का हुकुम न आ गया। यंहा तक की अव्वलीन मुस्लिमो ने अपनी पहचान को छुपाते हुए यह काम किया। साहबा का खुद का दीन या पहचान छुपाना और इस्लाम का पैगाम ढके छुपे अंदाज़ में लोगों को पहुंचाने के पीछे भी वही वजूहात थी, जो आज हमारे यंहा है जैसे दुश्मनी, कट्टरता, हिंसा, नफरत से भरे लोग और माहौल। इसलिए इस इस सुन्नत और उसूल को लेकर आप भी बिना पहचान ज़ाहिर करते हुए या ढके छुपे अंदाज़ मे काम कर सकते हो, बल्कि वक़्त की ज़रूरत है की ऐसे किया जाए। 


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