Saturday, 13 August 2022

क्या ईशनिंदा या स्वधर्मत्यागी की सज़ा मौत है?



■  ईश्वर, धर्म और धार्मिक महापुरुषों की निंदा।
 

इस्लाम के अनुसार धर्म के अपमान (बेहूरमती), ईशनिंदा, मुर्तद, शातिमे रसूल या तौहीने रिसालत की सज़ा मृत्युदंड कतई नहीं है और न ही दीन को लेकर कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की जा सकती है। क़ुरान से ये बात साबित है। हालाँकि मुसलमानों ने ऐसा समझ रखा है। ऐसे मामलों में मृत्यदंड देने के लिए कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी भी इंसान को नहीं है, ज़रा सा भी नहीं। ये सभी हिमाक़तें अल्लाह के दिए इख्तियार से सम्बंधित हैं तो इसकी असल सज़ा का अधिकार भी उसी को है। हालांकि ज़रूरत के मुताबिक हर देश और समाज को संविधान के अनुसार विधिपूर्वक और इंसानियत के दायरे में रहते हुए धर्म या ईशनिन्दा से संबंधित कानून बनाने का पूरा इख्तियार है, बिल्कुल उसी प्रकार, जिस प्रकार वे अन्य मामलों में सर्वसम्मति से अपने कानून बनाते हैं। अगर कोई किसी के धर्म या इष्टों का निरादर करता है तो कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान आज भी लगभग हर देश में पहले से ही मौजूद है और इसी तरीके को इस्तेमाल करना एक सभ्य समाज और इंसान की पहचान है।
 

किसी भी कुरानिक आयात में यह हकूम नहीं दिया गया है कि कोई तौहीन करे या इस्लाम छोड़ दे या दीन को नहीं माने तो उसे मौत की सज़ा दी जाए। बल्कि उल्टा ये कहा गया है कि ऐसे लोगों के लिए ईश्वर ही काफी है और वही दंड निर्धारक है। गुस्ताख़ी और दीन से फ़िर जाने वाले मामलों में क्या सज़ा दी जाए, इस पर क़ुरान ख़ामोश है। इसके अलावा, नबी ने भी कभी नहीं कहा कि फलां को मार डालो क्यूंकि उसने मेरी बेअदबी की है। बल्कि बहुत से मौकों पर मुहम्मद सल्ल. का अपमान किया गया परन्तु उन्होंने ऐसे मामलों में स्वयं करुणा और रहम दिली के बेहतरीन नमूने दिखाए इसलिए यह कतई नहीं हो सकता हैं कि वो अपने अपमान के बदले किसी की हत्या करवा दें।
 

ताज़ीर (ताज़ीराते हिन्द) के मायने है कानून. बहुत से देशो में धार्मिक प्रतीकों के अपमान पर कानूनी सजा मुक़र्रर है जिनमें भारत भी है. कई देशों में जीसस की तौहीन पर सजा है मगर दूसरों मज़हबों की तौहीन पर सजा नहीं है।

असल में कुरान ने किसी अकाईद (शिर्क, कुफ़र वगैरह) की सजा नहीं रखी, बल्कि आखिरत में रखी है। हालाँकि कुछ सजाएँ अल्लाह ने कुरान में रखी हैं मगर सिर्फ जुर्म, गुनाह की जिनसे समाज पर प्रभाव पड़ता हो यानि जिनसे दूसरों को नुकसान होत हो। हालाँकि स्टेट खुद भी जुर्म, गुनाह की सजाएँ मुकरर कर सकता है। मगर नमाज़, रोज़े छोड़ने की सजा नहीं दी जा सकती। जमात से नमाज़ छोड़ने वालों पर नबी ने यह ज़ुरूर कहा की दिल चाहता है किऐसे लोगो के घरो में आग लागा दूँ, मगर लगाई नहीं, यह बात सिर्फ लोगों को जमात की अहमियत समझाने के लिए थी।

■  कुरान (31.13) में हज़रत लुकमान अपने बेटे से कहते हैं कि  शर्क न करना, शर्क बहुत बड़ा जुर्म है। इस्लाम के अनुसार शर्क सबसे बड़ा जुर्म है। इसलिए सबसे पहले मौत की सज़ा तो इसकी राखी जानी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं है.  

■  कुरान (4.16) कहता है किजो ज़िना करें उन्हे यातना दो, तौबा करे तो छोड़ दो। यानी बाकी सजा समाज अपने हिसाब से तय कर ले

 


■  नीचे दी गई क़ुरान की आयतों में कंही नहीं कहा गया कि नबी या क़ुरान का अपमान करने वालो को मार डालो।
 

कुरान इस बात की पुष्टि करता है कि नबियों (मुहम्मद साहब का भी) का अधर्मियों द्वारा मज़ाक उड़ाया जाता रहा है.  उन्हें बुरे लफ्जों से जैसे झूठा, जादूगर, दीवाना, शायर वगैरह से पुकारा जाता रहा है और झूठी तोहमतें भी लगायी जाती रही हैं (36:30, 37:12, 13:32; 15:11; 21:41, 16:101; 25:4, 17:47; 25:8, 37:36, 38:4, 9:58).  कुरान ही बताता है कि कुरान को भी अधर्मियों द्वारा ऐसे ही गलत लफ्जों से पुकारा गया है (21:5, 16:103, 38:7, 25:5). यंहा तक कि कुरान ये भी पुष्टि करता है कि अधर्मी लोग अल्लाह को भी बुरा भला कहते थे (7:180).  मगर कुरान फिर भी उनसे बदला लेने को नहीं कहता बल्कि बड़ी ही संतुलित और अच्छी हिदायतें देता है जैसे:
 
• जो भी रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक ही उड़ाते रहे। [क़ुरान 36:30]
 
• मज़ाक उड़ाने वालों के लिए तुम्हारी ओर से हम ही काफ़ी है। [क़ुरान 15:95]
 
वे जो कुछ कहते हैं उस पर धैर्य से काम लो। [कुरान 38:17, 20:130] 

 
जिन्होंने तुम्हारे धर्म को हँसी-खेल (मज़ाक का विषय) बना लिया है, उन्हें अपना मित्र न बनाओ। [कुरान 5:57]

•  जहाँ तुम सुनो की अल्लाह की आयतों का इंकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है तो जब तब वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ, तब तक उनके साथ न बैठो। [क़ुरान 4:140, 6:68]

•  और तुम्हें उन लोगों से जिन्हें तुमसे पहले किताब प्रदान की गई थी और जिन्होंने शिर्क किया, बहुत सी कष्टदायक बातें सुननी पड़ेंगी। परन्तु यदि तुम जमे रहे और अवज्ञा से बचो तो यह बड़े हौसले का काम है. [क़ुरान 3:186]

•  और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं , जो नबी को दुख देते हैं और कहते हैं कि वह तो निरा कान (बस ये कान ही हैं) है। कह दो कि वह सर्वथा कान (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई (सुनने) के लिए है... रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते हैं, उनके लिए दुखद यातना है। [क़ुरान 9:61]

•  जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुख पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन पर दुनिया और आख़िरत में लानत की है और उनके लिए अपमान जनक यातना तैयार कर रखी है। [क़ुरान 53:57]

एहले किताब में एक गिरोह कहता है कि ईमान वालो पर जो नाजिल हुआ है उस पर सुबह ईमान लाओ और शाम को इंकार कर दो ताकि वो फिर जाएँ. [क़ुरान 3:72 ]


■   बाज़ वक़्त नबी के लिए कुछ लोग अपमानजनक शब्द बोलते थे। ऐसे वाकयात और शब्दों का ज़िक्र कुरान करता है जो नीचे आयात में दिये गए हैं। परंतु फिर भी ऐसे मुनाफिकों को आप ने न तो उसी भाषा में जवाब दिया और न ही सज़ा। इसके अलावा इस बारे में एक हदीस में अल्लाह का आदेश भी रिकॉर्ड है। यंहा तक की आपकी बीवी ने भी आपका यही चरित्र बयान किया है. 
 

•  वे कहते हैं कि यदि हम मदीना लौटकर गए तो जो अधिक शक्तिवाला है, वह हीनतर को वहाँ से निकाल बाहर करेगा। हालाँकि शक्ति अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों के लिए है, किन्तु वे मुनाफ़िक़ जानते नहीं। [क़ुरान 63:8]
 
•  अल्लाह ने अपने पैगंबर को लोगों के दुर्व्यवहार (उनके प्रति) को माफ करने का आदेश दिया। [बुखारी 4644]

ह० आयशा ने कहा है कि अल्लाह के रसूल ने कभी किसी से अपने लिए (अपनी खातिर) बदला नहीं लिया. [बुखारी 3560, 6126, दावूद 4785, मुवत्ता  47:2/1637]



■  नबी के साथ करी गयी ज़्यादतियों और बुरे बर्ताव के बाद भी आप ने किसी को बुरा नहीं कहा। 

•  आप को बुरा भला कहने वाले लोगों के हक़ में आपने दिल से दुआएं की जैसे ह. अबु हुरैरा की माँ। 
हज़रत अबु हुरैरा की माँ जब इस्लाम धर्म की अनुयायी नहीं थी तब एक दिन उनकी माँ से उनसे मुहम्मद साहब के बारे में कुछ नापसंददीदा बात कही। हज़रत अबु हुरैरा ने जब मुहम्मद साहब को यह बात बताई तो मुहम्मद साहब ने उनकी माँ के लिए दुवा की और कहा ऐ अल्लाह, उन्हें सही मार्ग दिखा। [सहीह मुस्लिम 2491]
• एक आदमी ने आपको बुरा भला कहा, आप चुप रहें, फिर कहा, तब भी आप चुप रहें। तीसरी बार जब उसने अपमान किया तो ह. अबु बकर ने पलट कर जवाब दिया। इस मुहम्मद सल्ल उठ कर चल दिये। अबु बकर के वजह पूछने पर फरमाया कि जब तक वो बोल रहा था, उसे एक फरिश्ता जवाब दे रहा था और जब तुमने जवाब देना शुरू किया तो एक शैतान हमारे बीच में आ गया और जंहा शैतान आ जाये वंहा मैं नहीं बैठना चाहता। [अब दावूद 4878/4896]
• ताइफ में जब आप दीन की तबलीग़ के लिए गए तो वंहा के लोगों ने आप के पीछे बदमाश बच्चे लगा दिये और अनाप शनाप कहलवाया गया। यहा तक कि आप पर पत्थर फिकवाए गए जिनसे आप लहू लुहान हो गए और और आप कि चप्पलें तक खून से भर गयी।  इसके बाद भी आप ने पत्थर मारने वालों को बद्दुवा तक नहीं दी। बल्कि उनके हक में दुवा करी कि इनकी नसले इस्लाम ले आयें. [सीरत ए रसुलुल्लाह]
ताकत हासिल होने के बाद भी ताइफ़ और मक्का में आप के साथ बदसलूकी और जिस्मानी चोट पहुंचाने वालों को माफ कर दिया। फतह मक्का के मौके पर सभी मुखालिफों को माफ़ी दे दी, जो घरों में रहे.
आपके कत्ल की साजिश करने वाले अबु सुफियान जैसे दुश्मनों को माफ कर दिया। 
आप के ऊपर और आपके घर पर मरे हुए जानवरों की ओजड़ियां, खून, गंदगी आदि फेंकने वालों को भी आपने कुछ न कहा। 
आपकी मस्जिद-घर में गन्दगी (पेशाब वगैरह, बुखारी 6128) करने वालों को भी आपने माफ़ कर दिया। 
आप को खुलेआम नाऊज़ूबिल्लाह पागल, झूठा, फरेबी, जादुगर वगैरह कहने वालों को भी एक लफ्ज़ तक नहीं कहा। 
• आपको कर्जा देने वाले एक आदमी ने जब एक गलत मौके पर क़र्ज़ वापिस मांगते हुए आपके साथ बदतमीजी करी तो सहाबा को गुस्सा आया, इस पर आपने कहा कि उसे कहने दो, उसे अपनी बात कहने का हक है.

 

यंहा तक कि आपके छुपे हुए कट्टर दुश्मन अब्दुल्लाह बिन उबई को मरने के बाद अपना कुर्ता पहनाया और उसकी नमाज़े जनाज़ा तक पढायी।
एक आदमी ने आपको थोडा घुमावदार शब्दों में सलाम किया जो आपके लिए असल में एक बद्दुआ थी. इस पर सहाबा ने कहा सलाम उस पर जो हिदायत की पैरवी करे। यह सुन कर नबी मुस्कुरा दिए. आपने उस आदमी को पलट कर कुछ न कहा.

एक यहूदी ने नबी को सलाम किया नबी ने कहा तुम पर भी। फिर नबी ने सहाबा से पुछा कि तुम जानते हो उसने क्या कहा था, उसने कहा था कि तुम पर मौत हो. इस पर सहाबा ने कहा कि या रसूलुल्लाह क्या इसका कत्ल कर दें तो आपने मना कर दिया और कहा कि जब वो यहूद तुम्हें ऐसे सलाम करें तो वालेकुम कह दिया करो. [बुखारी 6926]

 
आपने तो खाने में ज़हर मिलाकर परोसने वाली यहूदी स्त्री (जो आपकी नबी होने का कन्फर्म करना चाहती थी) तक को माफ कर दिया था। आपने अपने चाचा के कातिल वहशी को भी माफ़ कर दिया था.

एक बार आप गालिबन सफर में कंही पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे. इतने में एक दुशमन ने आप पर तलवार से हमला करने की कोशिश करी. जिससे आपकी अचानक नींद खुल गयी तो डर के मरे उस आदमी के हाथ से तलवार छुट गयी. आपने फोरना तलवार उठा ली और उससे पुछा कि अब तुझे कौन बचाएगा. फिर आपने उसे यूंही छोड़ दिया। 

• जंग में जिसने नबी के दांत तोड़े थे, वो कहता फिरता था कि मुहम्मद उसे माफ कर देंगे। वाकई ऐसा हुआ और आपने उसे माफ़ कर दिया जिसके बाद वो मुस्लिम हुआ।

• नबी का एक दुश्मन था जिसकी 5 बेटियाँ थी, इसी वजह से वो भी कहता फिरता था कि मुहम्मद उसे छोड़ देंगे. आपने उसे भी इसी वजह से छोड़ दिया।

 
आप पर रोज़ कूड़ा फेंकने वाली बुढिया जब बीमार हुई तो आप उसका हाल-चाल पूछने उसके घर चले गए (इस रिवायत के स्रोत पर प्रश्नचिन्ह है)। 

 


■  इस्लाम छोड़ने पर या धर्मांतरण करने वालों (मूर्तद) की सज़ा मौत कतई नहीं है। 
 
 
बहुत से मुस्लिम का कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर मानना है कि अगर कोई मुस्लिम इस्लाम छोड़ या धर्मांतरण कर ले तो उसे मौत कि सज़ा दी जाये या मार डाला जाये। फिर यही लोग हिन्दुओ द्वारा बनाए जाने वाले एंटि कनवर्ज़न लॉ का विरोध करते हैं और कहते हैं कि धर्म मानने या बदलने कि छूट होनी चाहिए। यही पाखंड है।  जब कोई इस्लाम अपनाता है तो मुसलमान फुले नहीं समाते मगर जब कोई इस्लाम छोड़ता है तो अक्सर आग बबूला हो जाते हैं.
 
हालांकि कुरान की आयतों में इस्लाम अपनाने और छोड़ने वालों का ज़िक्र किया गया है और कहीं भी यह नहीं कहा कि इस्लाम छोड़ने वालों को मार डालना है। अगर इस्लाम छोड़ने की सज़ा मौत होती तो बार बार इस्लाम में दाखिल होने और निकल जाने की बात क़ुरान क्यों करता? बल्कि धर्म को मानने कि स्वतंत्रता और मानवता आदि पर क़ुरान की बहुत सी आयतें हैं।
 
• निस्संदेह, वे लोग जो ईमान लाए, फिर इंकार किया, फिर ईमान लाए, फिर इंकार किया, फिर इंकार की दशा में बढ़ते चले गए तो अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा और न उन्हें राह दिखाएगा। [क़ुरान 4:137]

अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखाएगा, जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात कुफ्र (अधर्म और इंकार ) किया जबकि वे स्वयं इस बात की गवाही दे चुके थे कि यह रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट प्रमाण भी आ चुके थे... उन लोगों का बदला यही है कि उन पर अल्लाह और फरिश्तों और सारे मनुष्यों की लानत हो... इसी दशा में वे रहेंगे, न उनकी यातना हल्की होगी और न उन्हें मुहलत दी जाएगी... हाँ, जिन लोगों ने इसके पश्चात तौबा कर ली और अपनी नीति को सुधार लिया तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दयावान है। [क़ुरान 3:86-89]

जिन्होंने ईमान के बाद इंकार किया और इसमें आगे बढ़ते चले गए, उनकी तौबा नहीं कुबूल होगी. जिन लोगो ने कुफ़्र इख़्तियार किया और कुफ़्र ही की हालत में जान दी, उनमें सेकोई अगर अपने आप को सज़ा से बचाने के लिये ज़मीन भरकर भी सोना बदलेमें दे तो उसे क़ुबूल ना किया जायेगा। [ क़ुरान 3:90-91]

 

• धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। हिदायत गुमराही वाज़ह हो चुकी है। अब जो कोई बढ़े हुए सरकश को ठुकराए। [क़ुरान 2:256]

• तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन है और मेरे लिए मेरा दीन। [क़ुरान 109:6]
 
•  कह दो कि वह सत्य है तुम्हारे प्रभु की ओर से, अब जो चाहे माने (ईमान लाये) और जो चाहे इंकार करे. [क़ुरान 18:29]
 
• यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने लोग हैं, वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या अब तुम लोगों को विवश करोगे कि वो मोमिन हो जाएँ। [क़ुरान 10:99] {इसका मतलब मुसलमानों की जंगे भी दूसरे कारणों से हुई थी.}

•  ऐ नबी, याद दिहानी करवाते रहो। तुम तो बस एक नसीहत करने वाले हो। तुम उन पर कोई दरोगा नहीं हो। जो कोई मुंह मोड़ेगा और इंकार करेगा तो अल्लाह उसे बड़ी यातना देगा। निस्संदेह, हमारी ओर ही उनका लौटना है और फिर हमारे ज़िम्मे ही उनका हिसाब लेना है। [क़ुरान 88:21-26]
 
•  उसको रास्ता भी दिखा दिया, अब वह चाहे शुक्रगुज़ार हो चाहे नाशुक्रा। [क़ुरान 76:3]
 


•  उन्हें बुरा न कहो, जिनकी वे अल्लाह के सिवा इबादत करते हैं। कहीं ऐसा न हो कि अज्ञानता के कारण अति करके वे अल्लाह को बुरा कहने लगें। [क़ुरान 6:108]

•  इंसाफ की निगरानी करने वाले बनो। ऐसा न हो कि किसी की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इंसाफ छोड़ दो। इंसाफ करो। [क़ुरान 5:8]

•  पैग़म्बर मुहम्मद साहब से किसी ने पूछा कि साम्प्रदायिकता किसे कहते हैं। तो  मुहम्मद साहब ने फरमाया कि अपने लोगों की गलत कामों में मदद करना ही साम्प्रदायिकता है। [सुनन अबु दावूद 5119]

•  जिसने किसी एक निर्दोष की हत्या करी तो उसने मानो समस्त मानवता की हत्या करी और जिसने किसी एक मानव की जान बचाई तो उसने मानो समस्त मानवता की जान बचाई। [क़ुरान 5:32]

•  भलाई और बुराई एक जैसी नहीं हैं। तुम बुराई को अच्छाई से दूर करो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारे साथ जिसकी दुश्मनी है, वो जिगरी दोस्त बन गया है। [क़ुरान 41: 4]


■   ऐतिहासिक संदर्भ 

 
हालांकि लगभग 15 हदीसों की बुनियाद पर बहुत से लोग ऐसे मामलों में 10 लोगों को मौत की सज़ा मिलने की बात मानते हैं। सही हादिसो के मुताबिक इनमें से 2 थे, काब बिन अशरफ, अबु राफे। इन दोनों को आम तौर पर ब्लासफेमि से जोड़ कर देखा जाता है मगर इनका गुनाह फितना-फसाद फैलना, जंग करना-करवाना, सरकश हो जाना यानी राजद्रोही-बलवाई आदि हो जाने से संबंधित था और हम जानते हैं कि ऐसे जुर्म के लिए आज भी ज़्यादातर देशों में कानून के मुताबिक मृत्युदण्ड ही निर्धारित है।  
 
 काब आदतन एक मुजरिम था और उसका ननिहाल मदीना था। काब लोगों को हमले के लिए भड़काता था। बहुत से लोग नबी के खिलाफ बुरा कहते थे मगर मारा सिर्फ इसको गया क्योंकि वजह अपमान करना नहीं बल्कि अपराध था.  इसी तरह अबू राफे को भी मारने की इजाजत दी गई क्योंकि वो लोगों को भड़काता था। यह स्टेट के लिए बहुत बडा खतरा था और स्टेट का मुजरिम था। इसके कत्ल की वजह भी तौहीन नहीं थी।
 
जबकि बाकी 8 लोगों के बारे में जो भी ऊपर बताई गई हदीसें हैं, वो या तो ज़ईफ (कमज़ोर) हैं या मौज़ू (मनघड़ंत)। इसके अलावा इन हदीसों की घटनाओं में सहाबा ने खुद अपने डिस्करेशनरी डिसीज़न पर क़त्ल का इरादा किया है या अंजाम दिया है जिनका पूरा पसमंज़र या सन्दर्भ क्या था इन्हीं हदीसों से स्पष्ट पता नहीं लगता। विद्वानों का मानना है कि इन हदीस के बुनियाद पर और क़ुरान के इस मसले पर कोई सज़ा जारी न करने के कारण, इस जुर्म की सज़ा मौत बिल्कुल नहीं ठहराई जा सकती।
 

बुखारी 2510, 3031, 3032, 4037 & दावूद 2768, 3000 (अलबानी ने सहीह  कहा): काब को मारा गया क्योंकि उसने अल्लाह और नबी को दुख पहुंचाया (काब के कत्ल  की वजह भी मिलती है).

 
बुखारी 6785: मेरे बाद एक दूसरे की गरदने उतारने के बाद ईमान से बाहर मत हो जाना।

बुखारी 3017: अगर कोई दीन बदले तो उसे कतल कर दो।

बुखारी 6878: जो इस्लाम और मुस्लिम को छोड़ दे उसका कतल किया जा सकता है।

बुखारी 6923: यहूदी से मुस्लिम और फिर यहूदी हुआ, उसे मार दिया गया।

नसाई 4059-65: जो कोई भी अपना धर्म बदले,उसे मार डालो।
 
दावूद 4361, बुलुग अल मराम, नसाई 4070 (अलबानी ने सहीह कहा): एक अंधे साहबी द्वारा अपनी गुलाम बीवी (दो बच्चों की माँ, गर्भवती भी, दयालु, नरम शब्द इस्तेमाल हुए हैं इसके लिए) को मार दिया क्योंकि आपको बुरा बोलती थी, बहुत समझाने के बाद भी। जब उसने पेट में चाकू मार तो एक बच्चा बीच में खड़ा था जो खून से रंग गया।

I went and got a dagger which I thrust into her stomach and leaned upon it, and killed her. In the morning she was found slain. Mention of that was made to the Prophet, and he gathered the people and said: "I adjure by Allah; a man over whom I have the right, that he should obey me, and he did what he did, to stand up." The blind man started to tremble and said: "I am the one who killed her.I mentioned your name and she slandered you, so I went and got a dagger which I thrust into her stomach, and leaned on it until I killed her. The Messenger of Allah [SAW] said: "I bear witness that her blood is permissible.

Asma bint Marwan - She composed poems that publicly criticized the local tribesmen who converted to Islam and allied with Prophet, calling for his death. In her poems, she also ridiculed Medinians for obeying a chief not of their kin.

Zaynab bint Al-Harith - was a Jewish  woman who attempted to assassinate Prophet in the aftermath of the battle of Khaybar.The Muslims asked if they should kill her, but Prophet replied, No. (Bukhari 2617)

[The writings of the later commentators such as al-Zamakhshari, al-Tabarsi, al-Razi, al-Baydawi, and al-Asqalani provide another distinct report according to which Ka'b was killed because Gabriel had informed Muhammad about a treaty signed by himself and Abu Sufyan creating an alliance between the Quraysh and forty Jews against Muhammad during Ka'b's visit to Mecca]

हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा से मरवी है कि उन्होंने फ़रमाया कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताख़ी की वजह से किसी ग़ैर मुस्लिम शहरी को क़त्ल नहीं किया जाएगा क्यूंकि जिस शिर्क पर वो पहले से है वो सब बड़ा जुर्म है (मआलिमुस सुनन शरह अबू दाऊद जिल्द 3 पेज 296).
 
Link:

https://al-mawrid.org/Question/60a204a3923f0b12074d877f/punishment-of-blasphemy-based-on-a-hadith-narrative

https://www.newageislam.com/islamic-personalities/grace-mubashir-new-age-islam/the-prophet-killing-ka-b-ibn-al-ashraf/d/128237

https://www.islamweb.net/en/article/157545/eliminating-anti-islamic-state-instigators-ka%E2%80%98b-bin-al-ashraf-assassinated-ii

https://muslimcentral.com/yasir-qadhi-seerah-44-assassination-of-ka-b-ibn-al-ashraf/

https://discover-the-truth.com/2015/01/24/kab-bin-al-ashrafs-killing-deception-was-the-prophet-p-annoyed/

https://islamqa.info/en/answers/103739/regarding-the-hadeeth-about-the-blind-man-who-killed-his-slave-woman-who-had-borne-him-a-child-umm-walad-because-she-reviled-the-prophet-peace-and-blessings-of-allaah-be-upon-him

https://wikiislam.net/wiki/List_of_Killings_Ordered_or_Supported_by_Muhammad

https://islamqa.org/hanafi/seekersguidance-hanafi/31644/a-balanced-explanation-of-the-banu-qurayza-controversy/


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