ईश्वरभक्त ऋषि- मुनियों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए अनेकों अनमोल चीज़ें सिखाई हैं। उनमें से एक है - योग। योग मानसिक और शरीरिक दोनों प्रकार से लाभदायक होता है। योग का अर्थ होता है जोड़ना या जुड़ना। किसी भी जानदार शय को उन्नति करने के लिए अपने मूल स्रोत से जुड़े रहना बहुत ही आवश्यक है जैसे पेड़ को फलने फूलने के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना बेहद आवश्यक है। योग भी प्रकृति के माध्यम से अपने मूलस्रोत ईश्वर से जुड़ने का साधन है। यह 3 चीज़ो का संगम है, मानसिक ध्यान, शारीरिक व्यायाम और मंत्र उच्चारण। योग, प्रार्थना और साधना का ही एक प्रकार है।
नमाज़ भी एक मानसिक और शारीरिक उपासना है। नमाज़ पर्शियन शब्द है जबकि अरेबिक में नमाज़ को सलाह कहते हैं और यह शब्द कुरान में आया है। सलाह शब्द बना है सिलह या सिल्ला से जिसका मतलब होता है जमा या to connect. इसलिए सलाह का अर्थ भी वही हुआ यानी जो ईश्वर से जोड़ दे। नमाज़ या सलाह भी उन्हीं 3 चीज़ों का संगम है - मश्क (ध्यान), कसरत (व्यायाम) और तिलावत (मंत्रोच्चारण)। विभिन्न धर्मों में ऐसी आध्यात्मिक क्रियाएँ व साधनाएं विद्यमान हैं। बौद्धधर्म में विपश्यना भी एक योग साधना है। पूजा, उपासना, संध्या, साधना, योग, प्रार्थना, नमाज़, सलाह, विपश्यना, अरदास, प्रेयर आदि लगभग सामान अर्थ में ही प्रयोग होते हैं।
हिन्दुधर्म में 5 बार भजन करने का विधान है:- सूर्योदय के पूर्व ब्रह्मुहुर्त में, स्नान के बाद, मध्यानकाल में, सायंकाल में, रात्री में निद्रा से पूर्व। इसी प्रकार मुख्यता त्रिकाल संध्या अर्थात 3 काल की संध्या मानी जाती है:- प्रातःकाल (जो सूर्योदय से पूर्व सर्वोत्तम है), मध्यानकाल में, सायंकाल में (सूर्यास्त के समय)। यधपि वैसे कुल 4 संध्या होती हैं:- चौथी संध्या है , तुर्य संध्या (मध्यरात्रि में)। चारों संध्या में से जितनी बार भी संध्या करें, भक्त को पूर्व स्नान (जैसे ग़ुस्ल) करना अनिवार्य है। ये सभी भजन या संध्या आदि के समय एंव प्रकार जगद्गुरू पुरी शंकराचार्य जी महाराज द्वारा भी धर्मादेश सिद्ध हैं।
इस्लाम धर्म में 5 वक्त पर नमाज़ पढने का विधान है। इनके अलवा कई समय पर स्वैच्छिक नमाजें होती हैं। स्वैच्छिक नमाज़ों में, रात के अंतिम पहरों में उठ कर पढ़ी जाने वाली तहज्जुद की नमाज़ को बहुत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी बताया गया है। इसी समय को हिन्दू धर्म में ब्रह्ममुहूर्त कहते है और इस काल में संध्या की भी बहुत महत्वता है। ब्रह्ममुहूर्त और तहज्जुद एक सामान ही हैं। नमाज़ से पहले भी वुज़ू (आंशिक गुसल या स्नान) अनिवार्य हैं।
मानवता की शुरवात से ही 5 समय की उपासना अनिवार्य रही है जिनको समय के साथ साथ लोग घटा कर 3 करते रहें हैं।
जैसे इस्लाम धर्म के शिया सम्प्रदाय में 3 वक़्त पर कुल 5 नमाज़ पढ़ी जाती है, सुबह, दुपहर और शाम। हालांकि खास हालातों में सुन्नी भी 5 वक़्त की नमाज़ को घटा कर 3 वक़्त पढ़ सकते हैं जो है, सुबह, दुपहर या शाम में और सूर्यास्त या रात में। क़ुरान के अनुसार मुहम्मद साहब से पहले से ही नमाज़ पढ़ी जाती रही है। हदीसों से पता लगता है कि अबु ज़र गिफ्फारि मुहम्मद साहब से मिलने से पहले ही नमाज़ पढ़ रहे थे।
चर्च द्वारा 7 समय प्रार्थना करने का आदेश दिया जाता रहा है, हालाँकि बाईबिल से ही संकेत मिलते हैं कि यीशु भी वही प्रचलित 5 समय प्रार्थना करते थे. हालांकि बाइबिल ये यीशु की जो दिनचर्या पता लगती है, उससे स्पष्ट है कि उनका जब मन करता था वह तब भी प्रार्थना कर लेते थे। हालांकि आज ईसाई व्यवहार में 3 समय ही प्रार्थना करते हैं।
यहूदी (Jews) 3 समय पूजा करते हैं, सुबह, दुपहर और रात में। पारसी धर्म में भी 5 समय की उपासना होती है जो हैं सुबह, दुपहर, शाम, सूर्यास्त और रात में। मेंडाइज़म में भी 3 समय की पूजा का विधान है। सिक्ख धर्म में 5 समय अरदास की जाती है जिसे नितनेम भी कहते हैं। बौद्ध धर्म (विशेषकर मठों में) 3 समय सुबह, दुपहर रात और ताओ में भी 3 समय की प्रार्थना करी जाती है
नमाज़ में सबसे अच्छा आसन होता है, सजदा। उसी तरह भारतीय संस्कृति में साष्टांग आसन का बहुत महत्व है। साष्टांग में 8 अंगों को धरती से स्पर्श करके ईश्वर को नमन किया जाता है, जो हैं 2 पैर, 2 घुटने, 2 हाथ, 1 नाक और 1 माथा। आम जन में दंडवत को साष्टांग माना जाता है जबकि दंडवत तो पुरे शरीर को धरती पर लिटाकर नमन को कहते हैं। सजदा और साष्टांग एक ही आसन के दो नाम है। इसी अवस्था को ईसाई ऑर्थोडॉक्स प्रोस्ट्रेशन, यहूदी कराईट बोविंग और सिख मत्था टेकना कहते हैं। बौद्धधर्म में यही पाली भाषा में पानीपता और जैनधर्म में णमोकार नाम से पहचाना जाता है।
■ स्कवेयर टेम्पल, मेसोपोटामिया (इराक़) से लगभग 2500-3000 BC काल की 12 मूर्तियां (सुमेरियन वरशिपर नामक) मिली हैं जिन्हें इबादत की मुद्रा में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में लोग एकाग्रता या सचेत मुद्रा में खड़े हुए हैं और उनका दायां हाथ, बाएं हाथ के ऊपर बांधने की स्तिथि में है और दोनों हाथ छाती के ऊपर टिकाए हुए हैं। ऐसी ही स्तिथि नमाज़ के प्रथम आसन में होती है। इसके अलावा निनेवेह व एस्सर (Nineveh & Assur, Iraq) में 3000 वर्ष पुराने चित्र बने हुए मिले हैं जैसे सन गॉड टेबलेट आदि जिनमें लोग दोनों हाथ ऊपर उठाकर दुआ - प्रार्थना करते हुए दिखाई देते हैं।
■ मिस्र की मूर्तियों और चित्रों में लोग Osiris Pose में दिखाई देते हैं, जिसमें हाथ छाती के पास होते हैं. Osiris जन्म और मृत्यु देवता है और उसकी यह अवस्था शायद एक ममीकृत कफन को दर्शाती है. इसी तरह Amarna art के चित्रों में विशेष रूप से सूर्य भगवान Aten की पूजा करते हुए लोगों की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिनमें वे हाथ उठाकर प्रार्थना कर रहे होते हैं।
पारसी धर्म की प्राचीन कलाकृतियों में "फरावहार" (Faravahar)की आकृति के साथ लोग हाथ उठाकर प्रार्थना करते हुए दिखते हैं।
यहूदी धर्म में भी दोनों हाथों को ऊपर उठाकर प्रार्थना करने की प्रथा मिलती है.
चीन की हान और तांग काल की मूर्तियों में भी लोग ध्यान मुद्रा में बैठे हुए दिखते हैं, विशेष रूप से बौद्ध धर्म के प्रभाव में। इस मुद्रा को "ध्याना मुद्रा" कहा जाता है, जो बाद में जापानी ज़ेन बौद्ध धर्म में भी देखी गई। जापान की शिंतो परंपरा में भी लोग हाथ जोड़कर और झुककर प्रार्थना करते हैं।
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इस्लाम में इसी नमाज़ रूपी प्रार्थना को करने से पहले अज़ान दी जाती है ताकि लोगों को पता लग जाए की ईश्वर की उपासना का समय हो गया है। अज़ान का अर्थ नीचे पिक्चर में दिया गया है।
● हे मनुष्यों। जिस परमेश्वर की योगी जन उपासना करते हैं, उस की आप लोग भी उपासना करो।
[ऋग्वेद: 6:16:46]
● ऐ मेरे रब मुझे नमाज़ क़ायम करने वाला बना; ...मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी और मेरा जीना, मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है...।
[क़ुरान : 14:40 ; 6:162]
● योगी अपने शरीर, गर्दन व सर को सीधा रखे और अन्य दिशाओं को न देखते हुए नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए।
[गीता : 6:13]
● पाबन्दी करो नमाज़ों की और पाबन्दी करो बीच की नमाज़ की और खड़े हो अल्लाह के सामने नर्म बने हुए।
[क़ुरान : 2 : 238]

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