मुहम्मद साहब के द्वारा किये गए बहुविवाह किन परिस्थियों और आवश्कताओं के कारण हुए थें?
सबसे पहले उस समय के अरब के समाज और परिवेश को समझ लेते हैं। मुहम्मद साहब, ह. अबु बकर, ह. उमर, ह. उस्मान, ह. अली के आपस मे वैवाहिक सम्बन्ध थे। इनके बहू विवाह भी हो रखे थे। इस तरीके से आपस में रिश्तेदारी और बहू विवाह इत्यादि का अरब में एक आम रिवाज़ था जिस के पीछे अक्सर कबिलियाई निज़ाम, सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामाजिक, राजनैतिक, व्यापारिक अनेकों कारण होते थे। बल्कि अरब में गैर मुस्लिम भी कई पत्निया रखते थे। उस समय भारत में भी बहुपत्नी रिवाज चलन में था। यंहा तक कि दुनिया भर मे बहुपत्नी रिवाज था। राजे रजवाड़ों और शाही खानदानों में बहुपत्नी चलन अधिक था। हर जगह बहुपत्नीवाद के पीछे इसी तरह के कारण और हालत होते थे। उस समय पूरी दुनिया मे और खासतौर पर काबिलियाई समाजों मे जिसके जितने बच्चे होते थे, कमाई के लिए उतने अधिक हाथ माने जाते थे, ज़्यादा शादिया तो ज़्यादा बच्चे यानि बड़ा खानदान और ज़्यादा रिश्तेदार जो समाज मे रुतबा बनाए और सुरक्षा के लिए अच्छे माने जाते थे। उस समय दुनिया भर में कज़िन से विवाह जायज़ था और आज भी बहुत जगह स्वीकार है। अरब के समाज में विवाह प्रस्ताव खुद ही भेजना आम चलन था, चाहे पुरुष हो या स्त्री। अरब का समाज वैसे पुरुषप्रधान था और बाप-माँ की निसबत पर आधारती था और इसीलिए लोगों को माँ बाप के नामों से पुकारा जाता था। वंहा उस व्यक्ति को ही बेटी देना पसंद किया जाता था जिसके अभिवावक ज़िंदा हो और समाज में स्थापित हो।
मुहम्मद साहब अनाथ थे तो
आप ने अपने चाचा की बेटी से विवाह करने का प्रस्ताव चाचा को दिया था। पर इन्ही कारणों से आपके चाचा ने अपनी बेटी का
निकाह आप से करने माना कर दिया। इसके बाद आपका पहला निकाह बाहर घराने मे हुआ। अगर मुहम्मद साहब की शादियाँ केवेल शारीरिक इच्छाओं की
पूर्ति के लिए की होती तो आप के लाखों अनुयायी यूं ही नहीं बन जाते। मुहम्मद साहब ने अपनी नफस के लिए सिर्फ एक शादी
की थी जो उनकी पहली शादी थी, इसके अलावा बशरी हैसियत से 2 और
शादिया की थी। बाकी की 11 शादिया किसी ज़रूरत, मसले आदि के
कारण की थी
पहला विवाह – हजरत खादीजा (विवाह 595 AD लगभग).
ह. खदिजा एक व्यापारी थी और मुहम्मद साहब भी व्यापार करते थे। नबी के आला किरदार आदि को देख कर, इन्होंने नबी से विवाह की इच्छा जताई और प्रस्ताव भेजा। मुहम्मद साहब ने स्वीकार किया जबकि दोनों की आयु में 15 वर्ष का अंतर था। विवाह के समय आपकी आयु 25 वर्ष थी और पत्नी की आयु 40 वर्ष। जब मुहम्मद साहब 50 वर्ष की आयु के हुए तो आपकी पत्नी की मृत्यु हो गयी, यानि साथ मे 25 वर्ष तक रहे। अगर मुहम्मद साहब ने यह शादी पैसो या व्यापार के लिए की होती तो कुछ साल मे ही अलग हो गए होते बल्कि इतिहास से पता लगता है की पत्नी की मृत्यु के बाद आप बहुत ही उदास और अकला महसूस करने लगे थे। मुहम्मद साहब ने अपनी पूरी जवानी एक ही पत्नी के साथ बिताए। आपकी पत्नी सबसे पहले इस्लाम अपनाने वाली इंसान थी, ज़ाहिर है अगर मुहम्मद साहब का बर्ताव उनके साथ बहुत ही भला रहा होगा।
दूसरा व तीसरा विवाह – हजरत सौदा (619 AD) और हज़रत आएशा (619 - विदाई 623 AD).
ह. ख़दीजा रज़ी० की मृत्यु के बाद नबी थोड़े मुरझाये से रहने लगे थे. क्यूंकि बीवी के जाने का दुःख, बच्चों का पालन पोषण, रोज़ी रोटी कमाना, धर्म का प्रचार जैसे जिम्मेदारियां अकेले निभा रहे थे. इस तरह ह. खावला नामक एक सहाबिया ने महसूस किया कि मुहम्मद साहब के घर में बच्चे थे जिनको माँ की ज़रूरत थी और एक जीवन साथी की भी. इसलिए उन्होने एक दिन ने नबी से कहा कि आप शादी क्यों नही कर लेते जिससे आपको एक साथी मिल जाए और आपके बच्चों की देखभाल भी हो जाये। यानि आपने खुद दूसरी शादी के पहल न की बल्कि लोगों ने आपकी हालत देख कर आपकी शादी करवानी चाही। नबी ने खुद कोई स्त्री का नाम भी प्रोपोज नहीं किया बल्कि लोगों ने ही किया। दो नाम सामने आए आपने कहा रिश्ता भेज के देख लो। ह. आएशा (नवयुवती) से चली बात बीच में अटकी हुई थी की दूसरी ओर ह. सौदा (उम्र दराज़) ने रिश्ता कुबूल कर लिया। इसके बाद ह. आएशा ने भी रिश्ता कुबूल कर लिया। अब मुहम्मद साहब पीछे नहीं हट सकते थे, क्योंकि लोग सवाल उठा सकते थे वो अपनी बात से मुकर गए। अपने सबसे करीबी दोस्त की बेटी का रिश्ता भिजवाने और स्वीकार होने के बाद ठुकराना गलत काम माना जाता। इसलिए आप ने दोनों से शादी कर ली।
चौथा, पांचवा, छठा विवाह - हज़रत हफसा (625 AD), हज़रत ज़ेनब (625 AD), हज़रत उम्मे सलमा (625 AD).
नबी एक मिशन पर आतें हैं और उसी में लगे रहते हैं। इस मिशन के विरुद्ध लड़ाइयाँ हुई, शहादतें हुई। नबी, इस्लाम और अल्लाह के लिए साहबा ने आगे बढ़कर जानें दी। ऐसे मुश्किल हालातों में इन शहीदों की बेवाएँ और बच्चे अकेले पड़ गए। तो अल्लाह ने कुरान में कहा कि यतीमों का ख्याल रखो और बेवाओं को सहारा दो। इस हिदायत पर लोगों के सामने सबसे पहले नबी ने ही अमल करके दिखाया। इसलिए आप ने 3 और शादियाँ की, हज़रत हफसा (ह. उमर के बेटी), हज़रत ज़ेनब बिंत खुज़यमा, हज़रत उम्मे सलमा के साथ, ये तीनों बेवाएँ थी। आप इन्हे और उनके बच्चों को घर ले आयें।
असल में उस समय रियासत या इदारें नहीं थे बेसहाराओं को संभालने के लिए। अनाथों के लिए यतीम खानें नहीं थे, बेवाओं के लिए इंतजाम नहीं थे। अगर होते भी तो यतीमों का कौन ख्याल रखता, उन्हें बाप का साया कैसे मिलता, बाप कि कमी कौम पूरी करता, विधवाओं को पति का प्यार कैसे मिलता, शारीरिक जरूरतें कैसे पूरी होती, ज़िंदगी जीने के लिए किसका साथ और सहारा होता। इसलिए लोगों ने आगे बढ़ कर ऐसी बेवाओं से शादी करी।
उम्मे सलमा, उनके पति ने बच्चे के साथ हिजरत करके मदीना जाने का इरादा किया। उनके ख़ानदान को पता लग गया औ बच्चे को कब्जा लिया ताकि ये हिजरत न कर पाये। पति अल्लाह के हुकुम को सबसे ऊपर रखते हुए बीवी और बच्चे को अल्लाह के निगहबानी मे छोड़ कर हिजरत कर गए क्योंकि आखिर बच्चा था तो उनके ख़ानदान वालों के पास ही। उम्मे सलमा गमगीन होकर और बाल बिखेरे हुए पागल सी रहने लगी। ये देख के जब खानदान वालों को पछतावा हुआ तो दोनों को ऊंट पर बैठा कर मदीना के ओर रवाना कर दिया। लंबे सफर के बाद ये मदीना पहुँच कर एक साथ रहने लगे। इनके पति उहुद की लड़ाई मे शहीद हुए। नबी और इस्लाम के लिए ऐसे जज़्बे और शाहादत के बाद नबी का इनसे शादी करना बिलकुल सही फैसला था।
सातवाँ विवाह - हज़रत जैनब बिंत जहश (627 AD).
उस वक़्त गुलामी आम थी। ज़ैद बिन हारिस को बचपन में गुलाम व्यापारियों ने किडनैप करके ह. खदीजा के घर वालों को बेच दिया था और उन्होने शादी के बाद मुहम्मद साहब की खिदमत मे दे दिया था। नबी इनका इतना ख्याल रखते थे की जब इनके घरवाले इन्हें कई साल बाद ढूंढते हुए आए तो उन्होने मुहम्मद साहब को छोड़कर जाने से मना कर दिया और आपके साथ ही रहा। इस पर आप ने उन्हे अपना बेटा घोषित कर दिया। उस समय गोद लिया बेटा भी असल बेटा माना जाता था। मगर यह बेटा गुलाम था। इसलिए समाज पर उनके रुतबे पर कोई खास फर्क न पड़ा और न ही उन्हे ऊंचे खानदान (नबी का खानदान, कबीले सबसे ऊंचा माना जाता था) का माना गया। इस्लाम आने के बाद उन्होने भी इस्लाम कुबूल किया और आप ने उसकी शादी अपनी रिश्तेदार (कज़िन) जैनब बिंत जहश से करवा दी ताकि गुलामी खतम करने और गुलामों के स्थिति सुधारने के हुकुम को समाज में आम किया जा सके। मगर सामाजिक और मनोवेज्ञानिक कारणों से शादी सफल न हो सकी। असल में ज़ैद बिन हारिस अपनी पुरानी मानसिकता के बाहर नहीं निकाल पाए थे। उंच -नीच, गुलाम -मालिक में विवाह, बनू हाशिम खानदान के घर मे विवाह, कुरेश कबीले का दामाद जैसे मेंटल प्रैशर से वो कभी भी बाहर न आ पाये। ज़ैद ने इस बारे में नबी से शिकायत भी की मगर नबी ने उन्हें शादी निभाने के लिए ही कहा। दोनों के झगड़े भी होते थे। पर फिर एक साल तक कोशिश करने के बाद ज़ैद ने जैनाब को तलाक दे दिया। कुरान की सूरह अहज़ाब ने इनकी तरफ इशारा किया कि इन लोगों कि साल भर गुजरने के बाद भी मुलाक़ात (जिस्मानी ताल्लुक) नहीं हुई थी।
दोनों ने ये शादी नबी कि ख़्वाहिश पर की थी। इसलिए शादी टूटने पर नबी को बहुत दुख और पछतावा था। नबी जानते थे कि अब ऐसे हालत बन गए हैं कि उन्हें जैनब से शादी करनी पड़ सकती है क्योंकि वही शादी के लिए जिम्मेदार थे और वही जैनब के साथ हुए इस हादसे कि भरपाई कर सकते थे। मगर नबी भी, लोगों के कारण, जैनब से शादी करने के इच्छुक नहीं थे क्योंकि वो उनके गोद लिए बेटे कि पूर्व पत्नी थी। इसलिए कुरान अल्लाह ने कुरान में आयात उतारी कि आप जो नहीं चाह रहे थे, हमने वही चाहा है, यानि आपको उनसे शादी करनी पड़ेगी। इसलिए आपने उनसे शादी की. इस मौके पर खातूम्न नबी वाली आयात आई कि आप को ये सारे रिवाज भी खत्म करने पड़ेंगे क्योंकि अब आप ही आखिरी नबी हो। असल मे उस समय मे अरब मे बहुत से गलत रिवाज प्रचलित थे। इनमे से एक रिवाज था कि मुंह बोला बेटे भी असल बेटा माना जाता था। इस्लाम ने खून के रिश्तो और मुंह बोले रिश्तो में और सगी औलादों और गोद ली औलादों के रिश्तों और अधिकारों मे फर्क रखा है जिसके पीछे कई कारण और मसलिहत है जो समाज और अधिकारों आदि से संबन्धित है। इसका अर्थ ये नहीं है कि उससे प्रेम करना कम कर दो, या उसके साथ परायों से सुलूक करो। इस्लाम ने बेटे कि पत्नी से शादी करना हराम है। मगर मुंह बोले बेटे कि पत्नी से शादी कर सकते हैं। ये फ़र्क लोगों को बताने के लिए और यह रिवाज खतम करने के लिए कुरान ने नबी की इस शादी की बात करी। भारत में भी इस तरह का एक रिवाज था जब पति के मरने के बाद जेठ या देवर से विधवा की शादी कर दी जाती थी, आज भी यह बाज़ जगह प्रचनल में है।
अगर मुहम्मद साहब को अपने गोद लिए बेटे ज़ैद बिन हारिस की बीवी से शादी ही करनी होती तो आप पहले उन दोनों की खुद शादी ही नहीं करवाते और न ही इतना घूम –फिर कर खुद इस तरफ शादी करते। पर आपने खुद उनसे शादी करने कि कोशिश ही नहीं करी।
आठवाँ, नवां, दसवां, ग्यारवां विवाह - हज़रत जुवेरिया (628 AD), हज़रत उम्मे हबीबा (628 AD), हज़रत सफ़ीया (629 AD), हज़रत मयमूना (629 AD).
फिर कुरान मे (सूरह अहजाब: 50-55) नबी के लिए शादी का नया कानून बतया गया, ये कानून उम्मत के लिए नहीं था। जंगों के इक़दाम या नतीजे में आई स्त्रियों से विवाह कर सकते हैं। इस कानून में 3 पॉइंट्स थे। अरब मे रिवाज था की जंग मे आने वाली स्त्री का विवाह टूटा हुआ माना जाता था। अल्लाह ने नबी से कहा कि (पॉइंट 1) जंग में जीत जाने पर आने वाली मोज़ीज़ स्त्रियॉं ने वंहा के लोग विवाह कर सकते हैं। जो लोग जंग हार जाते थे और अधीन आ जात थे, वो खुद चाहते थे की जीतने वाले से पारिवारिक संबंध बना कर सियासत और राजपाट आदि को स्थिर किया जा सके। दुनिया में हमेश से ही राजाओ द्वारा ऐसे विवाह होते रहे हैं और आज भी राजनेता करते हैं। सिकंदर ने भी ऐसे विवाह किया थे पर दुनिया उसे आज भी उसकी ऐसी शादियों पर कोई ऐतराज नहीं करते। हारने वाले देश की फ़र्स्ट लेडी से जीतने वाला राजा ही शादी कर सकता है। किसी आम आदमी के साथ इनका गुज़ारा संभव ही नहीं हैं। ऐसी शादिया होनी ही है। ह. जुवेरिया (आठवीं पत्नी) और साफिया (दसवीं पत्नी) दोनों ही बड़े घरानों और सरदारों की बेटियाँ थीं और उनसे ऐसे ही कारणों से विवाह हुए थे।
कुरान ने कहा की (पॉइंट 2) आप अपनी फूफी, मामू, चाचा, खाला ज़ात स्त्रियॉं से शादी कर सकते हो। जिहोने आप के लिए कुरबनिया दी है, आपका साथ दिया है, आपसे निस्बात चाहती हो, आपके साथ क़यामत मे उठने की चाह रखती हो, उनकी दिलदारी के लिए ऐसी स्त्रियॉं से शादी कर सकते हैं । इसलिए उनका भी हक़ था की आपसे शादी करने का। इसलिए नबी ने कुरान के आदेश अनुसार उम्मे हबीबा (नवीं पत्नी – आपकी रिश्तेदार, तलाक़शुदा) से भी शादी की। इसी तरह हज़रत मयमूना (ग्यारवीं पत्नी - आपकी रिश्तेदार, बेवा) से भी शादी हुई थी जिन्होने खुद आपसे शादी करने की इच्छा जताई थी।
उम्मे हबीबा ने नबी के लिए कई कुरबानिया दी थी और ज़ुल्म सहे थे। दुश्मनों के ज़ुल्म से परेशान होकर यह अपने पति को साथ लेके हबशा मे हिजरत कर गयी थी। दोनों इस्लाम कुबूल कर चुके थे। वंहा जाकर इनके पति मूरतद हो गए थे और मसीही बन गए थे। यानि इस्लाम के लिए इन्होने पहले तो अपना घर छोड़ा और फिर पति ने इन्हे छोड़ दिया और यह अकेले रह गयी। ये बहुत बड़ा दर्द और झटका था।
इसके साथ ये भी कह दिया की (पॉइंट 3) इसके बाद आप कोई और निकाह नहीं कर सकते और आप पर बराबर इंसाफ करने का कायदा भी लागू नहीं होता। क्योंकि यह निकाह तो आप ने अल्लाह के हुकुम पर किया, न कि अपने लिए। पर अपने फिर भी सभी के साथ इंसाफ किया। किसी एक भी पत्नी ने यह नहीं कहा कि आप इंसाफ नहीं करते थे या बुरा बर्ताव करते थे और न ही कोई शिकायत करी। बल्कि इन बीवियों ने उम्मत का मार्गदर्शन किया। ये सभी मुस्लिमों की उस्ताद हुईं और उम्मत की माँ कहलाई गईं।
बाहरवां, तेहरवां विवाह - हज़रत रेहना (627 AD), हबीबा मारिया किबतिया (628 AD).
ह. रेहाना (बाहरवी पत्नी) और ह. मारिया (तेहरवी पत्नी) की शादियों पर मतभेद हैं। एक तबका यह मानता है कि आप ने इनसे शादी कि थी और दूसरा तबका ये मानता है कि आप ने शादी नहीं की थी।
पहल मत वाले इसके लिए कुरान से आयात रखते थे और कहते हैं की नबी ने इनसे शादी करके ही रिश्ता बनाए थे। क्योंकि कुरान (33:50, 4:25 ) में नबी से कहा गया है कि आप अपने अधीन आई स्त्रियॉं (गुलाम महिलाएं) से निकाह कर सकते है। इसलिए यह हो ही नहीं सकता कि आप ने उनसे निकाह न किया हो। ये सच है कि किताबों में सारी बातें सही प्रकार से नोट नहीं हुई हैं जिनमें से ये शादिया भी हैं जिसके पीछे ये भी वजह हो सकती है कि ऐसी शादिया बहुत ही मामूली रसुमात के साथ हुई हो।
फारस के साथ लड़ाई के समय, सिकंदरिया के ईसाई गवरनर मुकोसिस ने मारिया (मिस्री गुलाम – ईसाई) को (बहन सिरिन के साथ) आपके पास तोहफे में भेजा था जिसके बाद आप ने मारिया शादी कर ली थी और सिरिन को दूसरे साहबी (हसन बिन थाबित) की खिदमत में दे दिया था। उस वक़्त भी किसी के दिये भेंट को दूसरों को पकड़ा देना बुरा माना जाता था, इसलिए मुहम्मद साहब ने एक को रख लिया और दूसरी को दे दिया ताकि दोनों ही काम हो जाये और मिस्र वालों को बुरा न लगे। इनसे आपको एक बेटा इब्रहीम भी हुआ था जो बाद मे इंतकाल कर गया था। मुसतदरक अल हाकिम: 6819, मुस्लिम: 2543/ 6494, तारीखे तबरी, ईब्ने कसीर सीरत, शाह वलिउल्लाह दहलवी की अल फ़ौजूल कबीर, शिबली नोमानी ने, रोबर्ट हेनेरी चार्ल्स (बिबलिकल थेओलोजियन) से साबित होता है की मुहम्मद साहब ने मारिया अल किबतिया से शादी की थी। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं की मारिया गुलाम थी हैं नहीं, क्योंकि रोमन लेटर में इनके लिए जारिया शब्द आया है जिसका अर्थ होता है नव युवती, न की गुलाम।
जबकि दूसरे मत वाले कहते हैं की आप ने इनसे शादी नहीं की थी. गुलमों से अपना नेक बर्ताव करने वाले और गुलामी को खतम करने के लिए उतरने वाले आदेशों को ज़मीन पर अमल मे लाने और लोगों को दिखाने के लिए मुहम्मद साहब ने इन्हे अपने पास रखकर यही करके दिखाया था ताकि लोग यह न कहें की मुहम्मद साहब गुलामों के बारें में केवल आदेश देते हैं, खुद इनके साथ अच्छा व्यवहार करके नहीं दिखाते।
इसी तरह रेहाना (यहूदी, पैदाइश कबीला बनु नादिर पर शादी हुई बनु कुरेजा में) से शादी करी थी, (तबकात इबने साद, अल वाक़िदी से रिवायत 8/130). यह बनु कुरेजा की जंग की कैदी थी और आपने इन्हें मेहर भी दिया था।
■■■
ह. ख़दीजा, विधवा, आयु 40 वर्ष, विवाह 595 AD, नबी की आयु 25 वर्ष.
ह. सौदा, विधवा, 50 वर्ष, विवाह 620 AD, नबुवत का दसवां साल.
ह. आयशा, कुँवारी, 16-19 वर्ष
(अनुमानित), विवाह 620 AD.
ह. हफ़्सा
पुत्री हज़रत उमर, विधवा, आयु
21 वर्ष, विवाह 625 AD
ह. ज़ैनब, विधवा, 50 वर्ष, विवाह 626 AD.
ह. उम्मे
सलमा, विधवा, 29
वर्ष, विवाह 626 AD.
ह. जैनब, तलाक़शुदा, 38 वर्ष, विवाह 626 AD.
ह. ज़वेरिया, आज़ाद बांदी विधवा, 20
वर्ष, विवाह 627 AD.
ह. ऱमला
उम्मे हबीबा, पुत्री ह. अबु सुफ़ियान, विधवा, 36 वर्ष, विवाह 628
AD.
ह. सफ़िया, आज़ाद बांदी, 17 वर्ष, विवाह 628 AD.
No comments:
Post a Comment