क्या इस्लाम में संगीत, फिल्म, मूर्तिकारी, चित्रकारी, अदाकारी करना अपनी ज़ात में ही नाजायज़ है?
आज की नसल ऐसे दीन को नहीं मानेगी जिसमें इंसानी मिलावट हो चूकी हो. नयी पीढ़ी इन्ही वजहों से मुल्हिद होने के किनारे पर खड़ी है. खालिस दीन ही आज लोगों को खुद से जोड़े रख सकता है. इसलिए ये इंसानी मिलावट हमें दीन से निकालनी ही पड़ेगी. यंहा हम दीन को बदलने के लिए नहीं कह रहे हैं बल्कि जिस दीन को बदला और बिगाड़ा जा चूका है, उस बिगाड़ को दूर करके या नाहक को हक़ से बदल कर दीन को वापिस शुद्ध करने को कह रहे हैं. असल में संगीत, चित्रकारी, मूर्तिकारी, अदाकारी आदि को हराम कहने वाले खुद विरोधाभासी हैं. क्योंकि ज़्यादातर मुस्लिम पहले इन चीज़ों (मौसिक़ी, चित्रकारी, अदाकारी वगैरह) को जुबान से हराम कहते हैं और फिर अमल में इन्हें करते भी है. जबकि हम जैसे कुछ मुस्लिम इन अमल को जायज़ कहते हैं और इसलिए करते भी हैं. तो अब सोचिये कि दोनों में से कौन सा रव्वैया मुनाफिकत जैसा है. यह
ऐसा ही है जैसे जंग में कैदी के साथ इस्लाम के अनुसार व्यवहार करने पर बहस
हो रही हो मगर ये कोई नहीं सोच रहा की अव्वल तो जंग भी तो इस्लाम के
अनुसार करनी ही नहीं थी. होता यह है कि पहले हम खुद ही किसी चीज़ को हराम कर लेते हैं फिर उसके लिए बेजान दलीलें लातें हैं. कुरान सुरह अराफ में कहता है हमनें तुम पर बस ये 5 चीज़ें हराम की है और उनके नाम गिना दिए. ये ब्रॉड कटेगरी हैं जिनमें चीज़ें रख कर हलाल, हराम को परखा जा सकता है. सूद ज़ुल्म का नाम है इसलिए इसकी एक केटेगरी ज़ुल्म में आने के कारण हराम है. इनके अलवा किसी भी चीज़ को हलाल हराम कहना, खुद एक हराम काम है क्योंकि अल्लाह ने यंही पर फरमाया है कि मेरी तरफ कोई बात मंसूब करना जो मैंने न कही हो, हराम है. दीन को दीन से स्रोत यानी कुरान और सुन्नह से लिया जायगा.
अक्सर मुसलमानों में मौसिक़ी (संगीत), तस्वीर बनाना, मूर्ति बनाने और अदाकारी को हराम कहा जाता है. जबकि कुरान में इन्हें कंही भी हराम नहीं कहा गया है. कुरान तो शिर्क और नग्नता को हराम या नाजायज़ कहता हैं तो ज़ाहिर है अगर संगीत, तस्वीर, मूर्ति, अदाकारी (या फिल्म) वगैरह में ये चीज़ पायी जायगी तो वो भी ओटोमेटिकली हराम हो जायगी. उम्मत में हमेशा से ही इन मसलों पर इख्तेलाफ रहा है. मेजोरिटी इन्हें नाजायज़ और माय्नोरिटी इन्हें जायज़ मानती रही है. बस हमारे सामने हमेशा मेजोरिटी के मौकिफ को ही रखा जाता रहा है इसलिए कभी हम दुसरे मौकिफ की हकीकत नहीं जान पाएं. इमाम गजाली मौसिक़ी के बारे में आदाब बता कर गए हैं. शाह वलीउल्लाह देहलवी के पास गवैय्ये अपने साज़ सेट करवाने आते थे. आज भी अरब वर्ल्ड में पिक्चर, कैमरे, वीडियोग्राफी, टीवी वगैरह पर इतना बवाल और तशद्दु नहीं है जितना भारतीय उपमहाद्वीप में है. वंहा आज भी बहुत से उलेमा इसे जायज़ कहते हैं.
कुरान (34:10) में पहाड़ों और परिदों को हज़रत दावूद के साथ गीत हमद करने को कहा है. बाइबिल से पता साफ़ पता लगता है कि हज़रत दावूद अल्लाह की हमद गीत गा कर करते थे. ज़बूर या Psalm का मतलब ही गीत होता है. बुखारी 5048 और मुस्लिम 793 में नबी ने ह. मुसा अशरी से फरमाया की अल्लाह ने तुम्हे दावूद की तरह मज़ामीर (बांसुरी जैसे आवाज़) दी है. आम मुस्लिम यंहा इसका मतलब मीठी आवाज़ करते हैं जबकि अरबी लिसानीयात में इस लफ्ज़ के मायने ह. दावूद के नगमों से हैं जिन्हें फ्लूट (बांसुरी) साज़ के साथ गया जाता था. यह लफ्ज़ ज.म.र. से बना है जिसके मायने फूंक मारने के हैं. इससे यही पता लगता है साफ़ सुथरे संगीत की मनाही नहीं है. कुरान (34:13) में बताता है कि हजरत सुलेमान ने तमाथिल (मुजसमे, तस्वीर) बनवाएं. इस लफ्ज़ का मतलब मुजसमे या तस्वीर किया जाता है. इसी तरह हदीसों से पता लगता है की उस वक़्त मिटटी के बने हुए जानदार प्राणियों खिलोने, गुड्डे, गुडिया वगैरह भी होते थे. बल्कि ह. आयेशा के पास भी कुछ थे जिन में से एक बुर्राक नुमा पंखदार घोडा था. ज़ाहिर हैं ये सभी मुर्तिया और चित्र शिर्किया नेचर के नहीं होते थे. इसी तरह की बात रेशम के लिए, पायचें ऊँचे रखने के लिए कही जाती है जिनके पीछे कारण तकब्बुर आदि है और तकब्बुर करना जायज़ नहीं हैं.
असल में यह मान्यता कुरान में आये लफ्ज़ लहवल हदीस को गलत मायने यानी मौसिक़ी, अदाकारी वगैरह से लेने सी हुई है. कुरान (31:6) में कहा गया है कि जो फ़िज़ूल बातों (लहवल हदीस) का ख़रीदार बनता है, ताकि अल्लाह के मार्ग से भटकाए, उनके लिए अपमानजनक यातना है। लोगों ने इससे मायने संगीत, अदाकारी वगैरह से ले ली है जबकि आयात में उन फालतू बातों से बचने को कहा गया है जिन में पड़ने की वजह इन्सान अल्लाह या उसके हुकुमों की तरफ से गाफिल हो जाए. कुरान में एक अन्य जगह भी तिजारत के साथ लफ्ज़ लहवल इस्तेमाल हुआ है जिसका महफुम कुछ इस तरह है कि जब नबी दीन सीखा रहा हैं हो और कोई तिजारत की तरफ चल दे या ध्यान दे तो यह लहवल है. यानि ऐसी बात जो इस्लाम की बात से दूर ले जाए वो फ़िज़ूल है और उसे छोड़ दें. ज़ाहिर है तिजारत नाजायज़ नहीं मगर अल्लाह के दीन के सामने खडी होगी तो फ़िज़ूल ही मानी जाएगी. सबसे पहली बात इस लफ्ज़ के मायने मौसिखी से ह. इबने अब्बास रज़ी. ने जोड़ थे. फिर कुछ सहाबा के नज़रिए और हदीसों की बुनियाद पर यही मत प्रसिद्द हो गया. हालाँकि हदीसो में संगीत की मुमानियत का ज़िक्र है मगर गीत गाने, संगीत बजाने का भी ज़िक्र है. इसलिए ज़ाहिर है दोनों में तालमेल बिठाना पड़ेगा और इससे यही बात निकल कर आती है संगीत असल में अपने आप में नाजायज़ नहीं है बल्कि कुछ ख़ास प्रकार संगीत ही नाजायज़ होगा. अगर ऐसा कोई काम है, चाहे संगीत हो, अदाकारी हो, खेलकूद हो, राजनीती हो, गपशप्प हो, मनोरंजन हो, शायरी हो या आपके ख़यालात ही क्यों न हो. और उनमे पड़ने पर आप अल्लाह को भूल जाए, या नमाज़ को भूल जाए, या अपने फ़र्ज़ भूल जाये तो वो उनसे बचना बेहद ज़रूरी है, पर अगर इन बातों में पड़ने के बाद भी इन्सान अल्लाह और हुकुमों का हक अदा करता हैं तो ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं. ऐसे सभी काम जायज़ है अगर उनमें किसी भी तरह का कोई हराम या गैर अखलाकी पहलु शामिल नहीं है. यानी कि अगर इनमें शराब, ब्याज, नग्नता, फूहड़पन वगैरह शामिल है तो उस काम से बचना है या ऐसे कामों से दूसरों को परेशानी होती हो. यह वैसे ही जैसे जिंसी ताल्लुकात गलत हैं मगर शादी के बाद जायज़ है या रोज़े के दौरान जिंसी ताल्लुकात मना है मगर बाकी वक़्त में जायज़ हैं.
उलेमा डफ़ (एक साइड वाले साज़) को जायज़ कहते हैं क्योंकि डफ का इस्तेमाल उस वक़्त हुआ करता था. मगर सवाल यह है की डफ और डफली, ढोल आदि इंस्ट्रूमेंट की आवाज़ में ऐसा क्या अंतर है कि एक जायज़ है और दुसरा नाजायज़ है? यानी दावूद अलैह. के गीत, नातें, सुरीली किरातें, मुर्कियों वाली अज़ाने, डफ, नगाड़े, मुंह से निकाले गए इंस्ट्रूमेंटल साउंड, राष्ट्रगान जायज़ हैं, मगर बाकी सब हराम, क्यों? ऐसे ही क्या बिना संगीत के गाने गाये जा सकते हैं? कहते हैं कि जानदार का चित्र बनाने इजाज़त नहीं है मगर कुदरत के चित्र बना सकते हैं, पर आज हम जानते हैं की पेड़ पौधे भी जानदार होते हैं तो क्या उनके चित्र बनाना भी नाजायज़ नहीं हो गया. क्या पेड़ पौधों के चित्र में भी जान डालने को हमसे कहा जायगा? कहते हैं कि जानदारों की चित्रकारी मना है मगर कैमरे के फोटो जायज़ है, मगर आज तो ऐसे कलाकार और ऐसी चित्रकला तकनीक मौजूद हैं जो केमेरा से भी रियल पेंटिंग बना सकते हैं तो फिर वो चित्र क्यों नहीं जायज़ होंगे?
इन फील्ड्स में अपना करियर बनाने वालो को कुरान के बताए हुदूद का ख्याल रखना पड़ेगा. आज के माहौल में ऐसी क्षेत्र में शोषण, व्याभिचार, फूहडपन, सीमाओं को तोड़ने के अक्सर मौके मिलते हैं इसलिए इन चीज़ों का ख्याल किया जाये. इसलिए अगर हद में नहीं रह सकते तो इनमें करियर न बनाए, यही बेहतर है. क्यूंकि ये अवसर तो दुसरे बहुत से करियर में भी है जैसे राजनीती, खेल, कोर्पोर्ट और यंहा तक की एक दीनी या कौमी रहनुमा बनने में भी होते है इसलिए उसूलों पर खरा उतरने का माद्दा होना चाहिए, फील्ड कोई भी हो. अगर इन फील्ड में आपने इस्लाम के मुताबिक काम किया और उससे इंसानों का, दीन का, दुनिया का फायदा हुआ तो यही काम आपके लिए सदका ए जारिया बन जायगा.
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अक्सर मुस्लिम कला, इतिहास, ज्ञान की फील्ड में आगे नहीं है, जिसकी वजह है। गैर मुस्लिम इसमें आगे है, इनसे प्यार है। हमारी दिक्कत यह है कि अक्सर मुसलमानों ने यह मान लिया है कि क़ुरान के बाद अब किसी ज्ञान, इतिहास, कला वगैरह ज़रूरत नहीं। यही वजह रही है नबी के कुछ सदियों बाद ही दूसरों की किताबें, ग्रंथ जलाना, मूर्तियां तोड़ना, इबादतगाहें तोड़ना वगैरह जैसे काम काफी हुए है, भले ही मुसलमान माने या न माने। अफगान में बुद्ध की मूर्ति को ढहा देना जिसे न ईश्वर माना जाता है और न कोई देवता। बुद्ध बौद्धों के लिए एक तरह से वही स्थान रखते हैं जो पैगम्बर मुसलमानों के लिए रखते हैं। फर्क इतना है कि बुद्ध के पास ईश्वर नहीं थे। हज़रत इब्राहीम और नबी के सहाबा ने अपनी क़ौम के बुत तोड़े थे, किसी और के नहीं। वैसे ही जैसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने देवी देवताओं की मूर्तियां तोड़ी थी, जैसे अम्बेडकर साहब ने अपने धर्म की किताब जलाई थी, इसीलिए इन पर अक्सर सवाल नहीं उठाए जाते। किसी और के साथ करते ही सवाल तो उठने लाज़मी है। मुसलमानों ने मक्का, मदीना की आर्कियोलॉजीकल वैल्यू को कम्प्लीटली साइडलाइन करते हुए कांक्रीट के शहर बना देना। वजह एक यह भी है आम मुसलमानों के हिसाब से आर्किईलोजी की ज़रूरत किसे है? ऐसे ही माज़ी में नबी से पहले के।इतिहास आदि को और मुसलमानों से अलग दुनिया के इतिहास, अचीवमेंट को हम मुस्लिम खास वैल्यू नहीं देते। जब यह कहा जाता है कि हमारे नबी की नबूवत से पहले पूरी दुनिया अज्ञानता या जहालत में डूबी थी, तो इसका मतलब मुसलमान तमाम दुनियावी इल्म से लेते हैं कि सब पिछड़े थे। जबकि ऐसा नहीं है। असल मे इससे मुराद अल्लाह की किताब, दीन से है जो उस वक़्त तक दुनिया से गायब था जब तक आपको नबूवत नहीं मिली। इस बरतरी की भावना ने अब तक बहुत नुकसान किया है, सुधार नहीं किया गया तो हालात और ज़्यादा बिगड़ेंगे।
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जिन घरो में जीवित प्राणियों की मूर्ति या तस्वीर होती है उनमें फरिश्ते नहीं आते हैं, यंहा मतलब उन जीवित दिखने वाली प्राणियों की बात है जिन का इबादत करी जाती है, चाहे उनकी तस्वीर डिजिटल हो या पेंटेड या कोई मूर्ति. हम ये सब घर में रख सकते हैं बस ये उनकी नहीं होनी चाहिए जिनकी गैर मुस्लिम इबादत करते हैं.
उलेमा का मानना है कि हाथ से बनायीं गई तस्वीर जायज़ नहीं है, क्योंकि वो असल इमेज और फील नहीं देती। मगर आज कल तो ऐसे कलाकार पैदा हो गए जो असल से भी असली पेंटिंग बना देते हैं। इस तरह उलेमा हज़रत का ये नियम बेबुनियाद हो जाता है।
रही बात नमाज में जीवित प्राणियों की तस्वीर वाले कपड़े पहनने की तो इसमे नमाज हो जाएगी बस वो तस्वीर ध्यान ना भटकाए किसी का भी, नमाज जैसी अल्लाह के दरबार में पाक हाजरी में अजीब ना लगे, इसीलिये बड़ी ना हो, भड़काऊ ना वगैरह वगैरह का ख्याल रखना चाहिए, वरना सवाब की बाजय गुनाह मिल सकता है, इस तरह नमाज़ में दाख़िल होने का।
तस्वीर बनाने की मनाही नहीं है। इबादत के लिए बनाई जाने वाले तस्वीरों की मनाही। आप जो फ़सबूक और आईडी ईस्तमाल कर रहे हैं, उसमें तस्वीरों की भरमार है। उसी तरह जन्मदिन मनाने में कोई हर्ज नहीं। कंहीं मना नही। सिर्फ हुदूद में रहा जाए।
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जन्मदिन
जन्मदिन मनाने में भी कोई हर्ज नहीं। कंहीं मना नही करा गया है। सिर्फ हुदूद में रहने का ख्याल रखना है. जन्मदिन मनाना अपनी ज़ात में ममनू नहीं है। हमें जन्मदिन मनाने के तौर तरीकों में सही चीज़ का चुनाव करना चाहिए, अगर किसी को मनाना ही है तो। बाकी जन्मदिन मनाने के फायदे, नुकसा, मक़सद भी ध्यान रखे तो अच्छी बात हैं, मगर ये चीज़ें, जायज़ नाजायज़ का मसला नहीं हैं. किसी एक भी ज़रूरी नहीं है, जब दिल करे तब मनाओ, कोई रोक नहीं है। नबी हर हफ्ते अपनी पैदाइश के दिन अच्छा काम करके यानी रोज़ा रख कर मानते थे। जो मसलक नबी का जन्मदिन मनाते हैं, उसमे कोई बिदत नहीं है, वो जायज़ है। हाँ, उनके तौर तरीकों पर सवाल उठाया जा सकता है बस।
इस्लाम को उल्टा पकड़ना इसे ही कहते हैं कि जब चीज़ों को जायज़ होने की दलील या फतवे मांगे जाते हैं। जायज़ होने के लिए दलील नहीं बल्कि नाजायज़ साबित करने के लिए दलील मांगी जानी चाहिए। जो कुछ अल्लाह ने हराम या ममनू किया है, उसके अलावा हर चीज़ जायज़ है। और फतवा कोई आखिरी हकूम नहीं होता है, फतवा एक राय है जिसमे देने वाले का मौकिफ़ शामिल होता है, जो गलत और सही दोनो हो सकता है। किसी भी चीज को नाजायज़ होने के लिए उसकी मुमानियत क़ुरान या रिसालत में साबित होनी चाहिय। अगर ऐसा वंहा कुछ नहीं है तो हर वो चीज़ जायज है। नबी ने कभी नहीं कहा कि जन्मदिन मनाना हराम है। बाकी वाकई इसके लिए क़ुरान सुनन्त की बजाए कोई फतवा चाहिए तो ये लीजिय मिस्र के दारुल इफ्ता (सवा सौ साल पुराना, सबसे बड़ों में से एक) का फतवा जंहा इसे सेलिब्रेट करना जायज़ बताया गया है, क्योंकि किसी ने सवाल किया था। बाकी हो सकता है कोई इसे इसलिय न माने कि ये देवबंदी का फतवा नहीं है। यानी फतवे भी अपनों वाले से अपने मुताबिक चाहिए होते हैं, लोगों को।
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क़ुरआन में अल्लाह ने लोगों को लाह्व अल-हदीस में लिप्त होने से आगाह किया है— जिसका अर्थ है व्यर्थ की बातें या चीज़ें, जो अल्लाह के मार्ग से विचलित करती हैं। यह संगीत सहित किसी भी अनावश्यक या विचलित करने वाली चीज़ पर लागू हो सकता है। वास्तव में, क़ुरआन इस शब्द का प्रयोग व्यापार के लिए भी करता है (जबकि तिजारत जयाज है) जब लोग पैगंबर को सुनने के बजाय इसे प्राथमिकता दे रहे थे (62:11)। इसलिए, संदर्भ के आधार पर, लाह्व (व्यर्थ गतिविधि) की अवधारणा में ऐसी कोई भी चीज़ शामिल हो सकती है जो किसी को अल्लाह के मार्ग से विचलित करती हो। हालाँकि हमारे उलेमा ने बिना उचित विचार-विमर्श के सभी प्रकार के संगीत पर इस शब्द को लागू कर दिया है।
इस्लाम में संगीत वर्जित नहीं है। क़ुरआन में संगीत पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है। हालाँकि, ऐसा संगीत जिसमें शिर्क, कुफ़्र, अनैतिकता या गैर-इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देने वाले तत्व शामिल हों, वर्जित माना जाता है। हदीस साहित्य में, हमें संगीत की अनुमति और निषेध दोनों के उदाहरण मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि पैगंबर मुहम्मद ने संभवतः केवल उसी प्रकार के संगीत को वर्जित माना जो इस्लाम द्वारा निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन करता हो। जब हम संगीत और दाढ़ी जैसे मुद्दों के लिए क़ुरान में जाते हैं, तो वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है जो इन्हें क्रमशः हराम या फ़र्ज़ बनाता हो। इसी प्रकार दाढ़ी बढ़ाना न तो इबादत है और न ही अनिवार्य और न ही जारी करी गयी कोई सुन्नत है। इसके अलावा, नशा (कम या ज़्यादा) उम्मत में कहीं भी विवादास्पद नहीं है। इस्लाम में शराब, चाहे कम मात्रा में ही क्यों न हो, वर्जित है, क्योंकि कुरान में इसके निषेध का स्पष्ट और स्पष्ट उल्लेख है। क़ुरान के अनुसार इनमें से कुछ भी विवादास्पद नहीं है। क़ुरान मीज़ान है। यह हमारे लिए फ़ैसला करेगा, कोई मसलक नहीं। क़ुरान हराम और हलाल के बारे में बहुत स्पष्ट है। क़ुरान हिदायत के लिए है, फलाह के लिए चाहे कोई मसला हो, दीन या दुनिया का।
पैगंबर मुहम्मद अपने समुदाय की प्रवृत्तियों और व्यवहारों से गहराई से वाकिफ थे। इसीलिए उन्होंने बड़े नुकसान से बचने के लिए शुरुआती दौर में ही कुछ कार्यों को मना कर दिया था—उदाहरण के लिए, किसी गैर-महरम महिला के साथ अकेले रहना या किसी भी कारण से उसके साथ शारीरिक संपर्क। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी चीज़ें सभी परिस्थितियों में स्वाभाविक रूप से हराम हैं। बल्कि, ये समय, संदर्भ और संभावित परिणामों के आधार पर निवारक उपाय थे। चूँकि कुरान में ऐसे मामलों पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर या कुछ शर्तों के तहत इनकी अनुमति दी जा सकती है।
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