हिन्दू धर्म के कुछ शब्दों - रिवाजों का अर्थ जैसे उपासना, संध्या, ध्यान, योग, सूर्य नमस्कार, पूजा, आराधना, अर्चना, आरती, भजन, कीर्तन, फूल अर्पण करना, ज्योत, टीका-तिलक लगाना, सिंदूर लगाना, घंटा बजाना, शंख बजाना, यज्ञ करना समझने का प्रयास करते हैं।
मूर्तिपूजा का इतिहास
वैदिक काल में मूर्तियां या मूर्तिपूजा नहीं थी. बल्कि उस समय मंदिर भी नहीं हुआ करते थे. हालांकि उत्तर वैदिक काल तक एकेश्वरवाद में मिलावट होने के कारण धर्म बदल चूका था. बुद्ध और महावीर के समय तक भी मूर्तिपूजा आरंभ नहीं हुई थी. हालाँकि कुछ देवी देवताओं की मुर्तिया थी मगर फिर भी ये बहुत कम थी. बुद्ध और महावीर के बाद, इनके अनुयायियों ने अपने धर्म का प्रचार - प्रसार आरंभ किया और इन दोनों की मुर्तियां बनाना आरंभ करी. उसी समय भारत में यूनानियों का आक्रमण हुआ और वो यंहा आकार बस गए। फिर उन्होंनेबौद्ध धर्म धारण कर लिया। यूनान से वो अपनी संस्कृति लाये थे जिसमें उनके देवी- देवताओ की मुर्तिया बनाना मुख्य अंग था. सो उन्होंने बुद्ध की मूर्तियां निर्माण करना भी आरम्भ किया। इसी तरह फिर अन्य बोद्ध अनुयायियों में बुद्ध मूर्तियां बनाना शुरू किया। इनकी देखम देख जैनियों ने भी महावीर की मुर्ति निर्माण करने को बढ़ावा दिया। फिर बौद्ध और जैन धर्मों में मूर्ति निर्माण की स्पर्धा शुरू हो गयी क्योंकि दोनों धर्म एक दूसरे के प्रतियोगी थे। जब कुछ ही समय में दोनों धर्मों ने हिन्दुधर्म को भारत में पीछे छोड़ दिया तो हिन्दू धर्म वालों ने भी अपने धर्म की रक्षा में अपने देवी, देवताओं, अवतारों (अपने धर्म के महापुरुषों आदि) की मुर्तिया बनाना आरंभ किया. ईश्वर का आकार नहीं हैं तो उसकी मूर्ति भी न बनायीं जा सकी. इन मुर्तिओं की पूजा (उचित व्यवहार) करते करते, इनकी उपासना भी शुरू हो गयी.
स्वयं हिन्दुओ द्वारा उपासना, पूजा, आरधना, अर्चना से आज क्या तात्पर्य लिया जाता है.
सगुण और निर्गुण ब्रह्मा का चिन्तन, ध्यान करना उपासना कहलाता है (इसमें कर्मकाण्ड निभाना सम्मिलित नहीं है).
ईश्वर का धूप-दीप आदि से सत्कार - स्मरण करना पूजा कहलाती है (इसमें ध्यान लगना सम्मिलित नहीं है).
अपने प्रभु का ध्यान, मनन करना व भक्ति के अध्यात्मिक स्वरुप को आराधना कहते हैं.
अपने ईष्ट की परम्परागत विधि द्वारा श्रद्धा, लगन, निष्ठा के साथ कर्मकांड विधि से पूजन करना अर्चना कहलाई जाती है.
हिन्दू धर्म में जितनी भी उपासना, पूजा, योग, आरती आदि होती हैं, उन सभी में पौराणिक हिंदुओं ने शिर्क शामिल कर रखा है जबकि आर्य समाजी इन्हें करते हुए बिलकुल भी शिर्क शामिल नहीं करते हैं। कहा जाता है कि वैदिक काल में इनमें शिर्क नहीं था।
उपासना, संध्या, ध्यान, योग, पूजा, आरती का अर्थ।
वेदों में स्तुति, उपासना आदि शब्द आयें हैं। उपनिषदों में संध्या, उपासना आदि शब्द आया है। रामायण आदि में भी संध्या का उल्लेख है। महाभारत, मनुमस्मृति में पूजा का उल्लेख है। पुराणों में आरती का उल्लेख है।
उपासना का अर्थ है, निकट आसान करना यानी बैठना। बैठना थोड़े समय के लिए होता है। यानि उपासना का अर्थ इबादत है जो वैदिक काल में केवल ईश्वर की हुआ करती थी। उपासना मूल रूप से निराकार ईश्वर का ध्यान लगा कर की जाती थी। उपासना का अन्य नाम योग भी था जो शारीरिक अभ्यास सहित ध्यान लगा कर ईश्वर से जुडने को ही कहते थे।
ऐसा लगता है कि बाद में ध्यान के समय किए जाने वाले व्यायाम को ही योग कहा जाने लगा और वो केवल एक शारीरिक व्यायाम रह गया। फिर योग को भी प्रकृति पूजा से जोड़ दिया गया और अंत में विस्तार होते हुए योग एक अलग शाखा बन गया। हो सकता है कि उपासना और योग यानि ध्यान, मंत्र, व्यायाम का मिश्रित रूप कुछ नमाज़ जैसा ही रहा हो।
संध्या उपासना खास समय में की जाने वाली उपासना थी यानि उपासना और संध्या समान ही थे। इसके बाद पूजा शब्द प्रयोग होना आरंभ हुआ और उपासना को पूजा कहा जाने लगा। जबकि पूजा का अर्थ किसी के साथ उचित व्यवहार, उसका सत्कार करना, उसका सही प्रयोग करना आदि होता है। यही अर्थ महाभारत और मनुमस्मृति में दिए हुए हैं।
यज्ञ के बाद उसकी लौ- अग्नि से आरती की जाती थी जिसका उद्देश्य आशीर्वाद
देना या नज़र उतारना होती था। पारसी, हिन्दू आदि धर्मों में अग्नि का बेहद महत्व है। परंतु अब आरती भगवान-देवताओं आदि की उपासना समझ कर की
जाने लगी है।
क्या योग करना जायज़ है?
योग करना बिलकुल जायज़ है अगर आप इसमें गैरुल्लाह के लिए कोई मंत्रोच्चारण या कोई धार्मिक क्रियाक्लाप आदि नहीं करते हैं तो। शारीरिक व्यायाम की दृष्टि से इसे करने में कोई हर्ज नहीं बस इसका खयाल रखें कि इसमें कोई शिरकिया अमल शामिल नहीं होना चाहिए. योग करते हुए ॐ शब्द का उच्चारण सर्वधिक होता है आप चाहे तो इसे भी इस्तेमाल कर सकते हैं (बहुत से विद्वान ओम को ब्रह्म यानी निराकार ईश्वर का ही नाम मानते हैं)। आप चाहे तो योग के दौरान क़ुरान का क़ुन लफ्ज़ भी पुकार सकते हैं (कुछ विद्वान ओम और कुन को समानांतर मानते हैं)। पर अगर किसी का मन योग न करने को कहता है तो न करें, जिसकी जैसी इच्छा हो।
सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार (या सूर्य प्रणाम) एक योगाभ्यास है जो सूर्य के उगने के समय और सूर्य के सामने किया जाता है। इसके कई आसन होते हैं जिनमें आगे और पीछे झुका जाता है. व्यायाम के तौर पर इसके कोई शिर्क नहीं है क्योंकि यह सूर्य की किरणों से फायदा उठाते हुए व्यायाम है. मगर क्योंकि इसके माध्यम से हिन्दू भाईयों का उद्देश्य सूर्य की ऊर्जा को ग्रहण करना और उसकी पूजा करना भी होता है, इसलिए यह उनके लिए शिर्क है क्योंकि उनकी नियत ऐसी है.
सूर्य नमस्कार का उल्लेख सीधे तौर पर वेदों में नहीं है परन्तु सूर्य की पूजा और महिमा का वर्णन वेदों में है, सूर्यनारायण या आदित्य के रूप में। सूर्य पुराण में कहा गया है कि सूर्य के दर्शन से शरीर, आत्मा दोनों शुद्ध हो जाते हैं और सूर्य की पूजा से पापों का नाश होता है। सूर्य नमस्कार से संबंधित आसनों का उल्लेख सबसे पहले हठयोग प्रदीपिका (15वीं सदी) में हुआ है. स्पष्ट है कि सूर्य नमस्कार व्यायाम और पूजा का मिश्रण है जो योग के अंतर्गत बाद में विकसित हुआ है। कुछ ग्रंथों में सूर्य अर्घ्य का उल्लेख है, जो सूर्य को जल चढ़ाने का एक प्रकार है। यह उपासना, पूजा, ध्यान से जुडा हुआ है जो सूर्य के लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता था पर यह कोई शारीरिक व्यायाम नहीं है
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क्या पूजा करना जायज़ है?
पूजा का अर्थ होता है, उचित व्यवहार करना, सम्मान करना, सत्कार करना, अभिवादन करना आदि अर्थात जो जिस व्यवहार को पाने के योग्य या अधिकारी है, उसके साथ वैसा ही आचरण करना। महाभारत (अनुशासन पर्व : 145 अध्याय) में मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को पूजा कहा गया है। मनुस्मृति (3: 58-59) में स्त्रियों की आभुषण, वस्त्रों और भोजन आदि से सत्कार करने को पूजा कहा गया है।
आर्य समाजी भी इसकी यही व्याख्या करते हैं। यह तो बहुद बाद में जा कर उपासना की बजाए पूजा शब्द प्रयोग होना शुरू हुआ। जबकि पूजा किसी इंसान की, किसी वस्तु की, किसी पर्दाथ की ही हो सकती है। जैसे माता पिता का सम्मान करना और उनकी बात मानना, उनका पूजन है, अपने पुरखों के लिए प्रार्थना करना और उनके नाम पर भोज खिलना पितृपूजा है, गुरु को सम्मान देना गुरुपूजा है, कन्याओं को उनके अधिकार, उपहार आदि देना कन्यापूजा है, भूमि में हल जोतना भूमिपूजा है, सूर्य के साथ या सामने योग - व्यायाम करना सूर्यपूजा है, तुलसी के पौधे को आगंन में लगा कर शुद्ध हवा लेना तुलसीपूजा है, प्रकृति के साथ व्यायाम करना और उसका ख्याल रखना प्रकृतिपूजा है, मूर्ति बना कर अपने महापुरुषों को स्मरण करना और यादगार बनाए रखना या उन्हें श्रद्धान्जलि देना मूर्तिपूजा है।
अब इन उचित व्यवहारों में कर्मकांड मिलाकर उपासना जैसा बना दिया गया है और ऐसी चीज़ों को भी ईष्ट बना दिया गया है. इसलिए इन चीज़ों की पूजा (उचित व्यवहार) करना शिर्क नहीं है पर इनकी उपासना करना निश्चित तौर पर शिर्क है। यानि हिन्दू समाज में अब पूजा का अर्थ, उपासना कर दिया गया है। भगवान-देवता की मूर्तियों की उपासना करना, उनसे प्रार्थना करना, उन्हें नमन करना, उनके साथ विभिन्न कर्मकाण्ड करना आदि को पूजा कहा जाने लगा है। इसलिए चीज़ों (ईष्टों की मुर्तिया नहीं) की पूजा यानि उनके साथ उचित व्यवहार करने में कोई हर्ज नहीं है। पर इसे उपासना समझ कर या इन चीज़ों को ईष्ट बनाकर या इसमें शिरकिया अमल शामिल करके इसे कभी न करना चाहिये। ईष्टों की मुर्तियों के साथ ऐसा कभी नहीं करना चाहिए.
क्या आरती जायज़ है?
आरती शब्द संस्कृत के आर्तिका शब्द से बना है जिसका अर्थ है, कष्ट, विपत्ति, आपत्ति, क्लेश। इसे नीराजन भी कहा जाता है जिसका अर्थ है किसी स्थान को विशेष रूप से प्रकाशित करना। इसे धार्मिक समारोह एवं त्यौहारों में पूजा के अंत में करते हैं। कहते हैं की स्कंद पुराण में लिखा है कि अगर कोई मंत्र - पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उस आरती को स्वीकार कर लेते हैं। आरती की सामग्री जलने के बाद सकरात्मक या ऊर्जावान वातवरण होने की दलील दी जाती है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी माने जाते है, हो सकता है हो भी, परंतु यह रीसर्च का विषय है।
एक मान्यता अनुसार इष्ट की शक्ति उस ज्योत में समा जाती है, जिसे भक्त अपने मस्तक पर लगा लेते हैं। दूसरी मान्यता अनुसार इष्ट की नज़र उतारी जाती है या बलाएं ली जाती हैं, और भक्त उसे अपने ऊपर लेने का आह्ववान करते हैं। ये सांकेतिक होता है जिसका उद्देश्य इष्ट के प्रति समर्पण व प्रेम होता है। मगर असल में देखा जाये तो ईष्ट/ईश्वर पर न तो बलाएँ आती है और न उन्हें नज़र उतरवाने की आवश्यकता है इसलिए इनकी आरती से क्या फायदा? इष्टों की आरती उतारना कंही से भी जायज़ नहीं है। आरती में थाली/कलश आदि में ज्योत/लौ के साथ कुछ सामग्री रख कर किसी के सामने गोलाकार घुमाई जाती हैं। इसमें घी, तेल, धूपबत्ती आदि जलायी जाती है और इसकी सामग्री में जल, नारियाल, जड़ी बूटी, चन्दन, सिंदूर आदि का प्रयोग होता है। घुमाने की संख्या भिन्न भिन्न होती है। मंदिर आदि में कई बार यह ॐ के आकार में भी घुमाई जाती है और इसके साथ वाद्य, गीत, मंत्र, श्लोक भी प्रयोग होते हैं। आरती होने के बाद ज्योत को भक्तों की ओर घुमाया जाता है और वे अपने हाथों को ज्योत पर घुमा कर अपने मस्तक पर हाथ लगाते हैं। इसमें इष्ट का गुणगान किया जाता है और इसे भक्त के हृदय में भक्ति दीप जलाने और इष्ट का आशीर्वाद ग्रहण करने का माध्यम माना जाता है।
अपने आराध्यों के सामने पूजा - उपासना के अलावा, किसी इंसान पर पड़ी बुरी नज़र या उसकी बलाएं उतारने के लिए भी आरती की जाती है। अक्सर दूसरों की आरती उतारने से पहले, आरती की थाल को अपने इष्ट को चढ़ाया जाता है या इष्ट को चढ़ाई गयी सामग्री से आरती की थाल बनाई जाती है। इसलिए इस तरह की मनुष्यों की आरती उतरवाने में शिर्क शामिल है।
इसके अलावा कई अवसरों पर आरती की थाल बिना चढ़ावे आदि के भी बनाई जाती है। इसका उद्देश्य केवल नज़र उतारना होता है इसलिये इसे करवाने में कोई हर्ज
नहीं है। हो सकता है इसका संबंध किसी
नफ्सियाती इलाज या इल्म से हो। पर अगर ऐसा नहीं है या इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है
तो इसे टोटका समझ कर कोई कर लें तो उसकी मर्ज़ी। पर अगर इस आरती में ज़रा सा भी शिर्क
किसी तरह से भी शामिल है तो इसे कभी नहीं करवाना चाहिए जैसे किसी देवता को
आपकी बलाएँ हरने को पुकारा जाये। इसी तरह आपके कंही पहुंचने पर स्वागत और सम्मन में आपकी आरती (बिना चढ़ावे वाली) उतारी जाती है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है क्योंकि यह आपकी बलाएँ दूर करने की आस्था से किया
जा रहा है, भले ही आपको यह टोटका लगे। अगर आपको यकीन है कि
यह नफ्सियाती इलाज जैसा है तो आप चाहे तो लौ पर हाथ फेर
कर चेहरे पर ले सकते हैं। असल में देखे तो ऐसी आरती, पूजा
(उचित व्यवहार) का ही अंग लगता है। पर अगर किसी का मन आरती बिलकुल भी करवाने का नहीं हो तो वो बिल्कुल न करवाएं, मगर समझदारी से इसे बचने की कोशिश करे।
भजन, कीर्तन, यज्ञ करना।
भजन का अर्थ है अपने आराध्यों के लिए गीत संगीत करके उनका गुणगान, प्रशंसा करना।
कीर्तन भजन का एक रूप है। कीर्तन को पूजा के रूप में लगभग 15वीं शताब्दी में बंगाल ने लोकप्रिय बनाया और इसका विकास मुख्य रूप से वहीँ हुआ ।
यज्ञ करना एक प्राचीनतम शुद्ध हिन्दू धार्मिक गतिविधि है इसलिए इसे नहीं कर
सकते। इसका ये मतलब नहीं कि जंहा यज्ञ हो रहा है वंहा से उठ कर भाग जाओ। वैदिक काल
में यज्ञ ईश्वर के लिए होते थे। वैसे आज भी आर्य समाजी ईश्वर के लिए ही यज्ञ करते हैं। असल में यज्ञ वो स्थल होते थे जंहा ईश्वर के लिए मांस, फल, फूल आदि अर्पण (ऑफर) किए जाते थे। यज्ञ के लिए मंत्र आदि पढ़े जाते थे। इसमें कर्मकांड भी जुड़े हुए थे या समय के साथ जुड़ गए थे। यज्ञ में जानवरो की सामूहिक बलि दी जाती थी और फल, फूल इत्यादि को भी ऑफर किया जाता था। बलि के बाद अग्नि में मांस, चावल, कच्चे फल फूल आदि पकाए जाते थे। अग्नि हमेशा से हिन्दू रीति रिवाज़ों का मुख्य अंग रही है और अन्य कई धर्मों में भी।
यग्योपवित, उपनयन, जनेऊ।
जनेऊ को यग्योपवित भी कहते हैं जिसका अर्थ है यज्ञ का पवित्र धागा। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। इसमें तीन धागे होते हैं। इसको धारण करने वाला द्विज अर्थात दुबारा जन्म लेने बनता है। यह सवर्णों यानी तीनो उच्च वर्णों के लिये होता था। वेदों में तो नहीं परन्तु शतपथ ब्राह्मण, उपनिषदों, स्मृतियों में इसका उल्लेख है।
फूल अर्पण करना, ज्योत जलाना, टीका-तिलक लगाना, सिंदूर लगाना, घंटा बजाना, शंख बजाना।
फूल अर्पण करना पूजा (उचित व्यवहार) का ही हिस्सा है जो सम्मान के लिए किए जाता है जैसे मरने वाले के शरीर या फोटो के सामने फूल या हार चढ़ाते हैं या रखते हैं जिसके पीछे का कारण सम्मान, आदर दिखाना या श्रद्धांजली देना होता है।इसीलिए घर, दफ्तरों में मृतक की फ़ोटो पर हार टांग कर भी रखा जाता है। यह सब भारतीय संस्कृति हैं क्योंकि यंहा यह रिवाज आर्य समाजी (हिन्दू एकेश्वरवादी), सिक्ख (गैर हिन्दू एकेश्वरवादी), बोद्ध (नास्तिक), जैन (नास्तिक) आदि सभी करते हैं। इसे बुद्ध, महावीर, अम्बेडकर, गांधी आदि की मूर्तियों के सामने करना शिर्क नहीं है क्योंकि इन्हें वे ईश्वर या इष्ट नहीं मानते बल्कि महापुरुष मानते हैं. इनकी मुर्तिया भी वे उपासना के लिए नहीं बल्कि श्रद्धा व प्रेम पूर्वक बनाते हैं, यादगार के तौर पर. इनका उनसे जुडाव, लगाव है. वे तो खुल कर कहते हैं कि मूर्तिपूजा (उपासना) पाखंड है। इसका मतलब वे उनकी उपासना के लिए नहीं बल्कि उनमें श्रद्धा व आस्था रखने के कारण मूर्तियां बनाते हैं।
इसलिए मजबूरी या आवयश्कता होने पर, सम्मान में आप इनके सामने हाथ जोड़ कर नमस्कार (शिष्टाचार आदि के रूप में) कर सकते हो और सलामी या सलाम के के तौर पर ईशारतन हल्का सा सिर भी झुका (जैसे टोपी उतार कर करते हैं या जैसे अंग्रेज़ी परंपरा चली आ रही है) सकते हो. मगर इन कार्यों को हिन्दू धर्म के इष्टों (देवी देवता आदि की मूर्तियों) के सामने करना शिर्क ही माना जाएगा।
मृतक के शरीर या फ़ोटो के आगे ज्योत, दिया या मोमबत्ती जलाने में भी कोई हर्ज़ नहीं है। ये प्रतीकात्मक तौर पर किया जाता है। ये एक संस्कृतिक चीज़ है। क्योंकि प्रकाश को दिव्यता, शुद्धि, आशा, आत्मा, ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। यह किसी धर्म विशेष का अंग नहीं है।
शुरवाती दौर में मांस पकाने, जानवरो को रात में दूर रखने के लिए, रोशनी करने के लिए, सर्दियों में गर्माहट आदि के लिए आग या बोन फायर का इस्तेमाल करते थे। लोगों ने अपनी इबादतगाहों में लगतार रोशनी जलाए रखना शुरू किया क्योंकि वंहा अंधेरा रखना अनुचित था और प्रकाश का धार्मिक तौर पर हमेशा से ही महत्व रखता है। कबिलियाई या पैगन मतों में ये रिवाज के तौर पर चलन में आया। कई धर्मो में अग्नि की पूजा भी शुरू हुई। पारसीयों द्वारा अपनी अतशकदा/गाह, दारे महर, अगियारी में, ईसाई द्वारा चर्चो में और यहूदीयों द्वारा अग्नि का प्रयोग भी हुआ।
हम जानते हैं कि बहुत से त्योहार रोशनी जला कर मनाए जाते हैं जैसे दीवाली-होली आदि, पूजाओं और मौसमी त्योहारों में भी अग्नि का केंद्रीय प्रयोग होता है। ।
ज्योत दरअसल पूजा (सत्कार) का अंग है, न कि उपासना (इबादत) का। इन दोनों में अंतर है। भारत में दीवाली हिन्दू, बौद्ध, जैनी, सिक्ख अपने अपने कारणों से मनाते हैं, न कि रामकथा आधार पर। सांस्कृतिक महत्व होने के कारण ही मुसलमानों ने दरगाहों-कब्रो पर रोशनी करना शुरू किया। यंहा तक कि लोग अपने जन्मदिनों पर केक वगैरह पर भी मोमबत्तियां लगाते हैं जो प्रतीक है। यूनानी लोग अपने केक पर मोमबत्तियां लगा कर उसे चांद की चमकीली शक्ल दे देते थे।
वेदों, उनपनिषदो में तिलक, टीका का उल्लेख नहीं है हालांकि शरीर के ऐसे स्थानों का उल्लेख है जंहा से चेतना, आत्मा जागृत होती है जैसे माथे की बीच का भाग। इसी तरह शरीर की पवित्रता के लिए कुछ सामग्री शरीर पर लेप के रूप लगाने का भी उल्लेख है जैसे चंदन आदि। मगर वैदिक साहित्य में धार्मिक चिन्ह के रूप में इन तिलक, टीके का उल्लेख नहीं है। सबसे पहले तिलक आदि का उल्लेख रामायण, महाभारत में आता है जंहा यह धार्मिक नहीं बल्कि संस्कृति व परंपरा के तौर पर उल्लेखित है जैसे सिंहासन संभालने पर राजतिलक करना, वनवास से वापिस लौटने पर स्वागत के समय में लगाना, विवाह के समय लगाना, युध्द में जाने से पहले शक्ति के प्रतीक के तौर पर लगाना। जैन धर्म में, कंही कंहीं बौद्ध धर्म व सिक्ख धर्म में भी तिलक को शुद्धि, शान्ति के चिन्ह के रूप में लगाया जाता है। सीक्खों के गुरु गोबिंद सिंह के राज्याभिषेक के समय तिलक लगाने का उल्लेख मिलता है। इससे यही प्रतीत होता है कि तिलक, टीका आदि धार्मिक चिन्ह नहीं था। इसीलिए रामायण महाभारत के काल के बाद रचे गए पुराणों में तो धार्मिक तिलक आदि का उल्लेख मिलता है जैसे वैष्णव, रुद्राक्ष तिलक आदि मगर उनसे पहले नहीं।
तिलक या टीका का अर्थ होता है, चिह्न या निशान। इसे माथे पर सांस्कृतिक तौर पर और धार्मिक तौर पर भी लगाया जाता है। यह केसर, चंदन, हल्दी, सिंदूर या कुमकुम आदि से लगाया जाता है। इसके कुछ मेडिकल और स्प्रिचुअल फायदे बताये जाते हैं, जो कि शायद हो भी जैसे मस्तिष्क या मन का शांत रहना।
इसी तरह टीका-तिलक लगाना भी संस्कृति का हिस्सा है जिसके पीछे वैज्ञानिक कारण दिये
जाते हैं। असल में यह सब चीज़ें पूजा का अंग है। पूजा यानी उचित व्यवहार, सम्मान करना और उपासना यानी इबादत, वरशिप करना, इन सभी में अंतर होता है. भारतीय संस्कृति और परंपरा के रूप के रूप ये तिलक आदि बहुत पहले से ही प्रचलती है। इस तिलक, टीका को लगवाने में कोई हर्ज नहीं है।
धार्मिक तौर पर मंदिरों में पूजा के बाद भक्तों को भी तिलक लगाया जाता है। भस्म या राख आदि का तिलक खास प्रकार की धार्मिक अनुष्ठानों में लगाया जाता है। धार्मिक प्रथा के रूप में तिलक, टीका आदि बहुत बाद में शुरू हुई है। स्पष्ट है इससे आम हालातों में बचने में ही फायदा है, बाकी मजूबरी वगैरह में बात अलग है। इसलिए किसी आराधना के बाद आपके किसी ने टीका लगा दिया तो उसे एक बार को शिर्क माना जा सकता है.
मगर स्वागत में सम्मान के तौर पर भारत में यह बहुत आम है। इसके लिए अक्सर एक थाल में तिलक, चावल, मिठाई, ज्योति आदि तैयार करी जाती है और उसके ज़रिए अतिथियों, पुरस्कार विजेताओं आदि को लगाया जाता है। इसमें कोई धार्मिक पक्ष शामिल नहीं होता। आपके कंही पहुँचने पर आपके सम्मान और स्वागत में आपके टीका (बिना चढ़ावे वाली थाली से) लगा दिया जाये तो ये शिर्क कतई नहीं होगा।
सिंदूर लगाना एक सांस्कृतिक,
भौगोलिक, स्थानीय रिवाज है जो केवल एक धर्म वालों का
हिस्सा बना हुआ है। हालांकि दूसरे भारतीय धर्म वाले कुछ लोग भी सिंदूर लगाते हैं। इसके पीछे
भी वैज्ञानिक कारण दिये जाते हैं। वैसे यह एक सांस्कृतिक चीज़ अधिक है। फिर भी इसे बिना मज़बूरी या आवश्यकता के न किया जाए। हड़प्पा स्थलों के पुरातत्व से पता चलता है कि 5,000 साल की सभ्यता में सिन्दूर, चूड़ियों का प्रयोग होता था। शायद सिन्दूर, चूड़ियां आज की तरह ही प्रजनन क्षमता से जुड़ा था.
घंटा या शंख बजाना एक सामान्य सांस्कृतिक कार्य है जो कोई भी कर सकता है। मगर मंदिर आदि में, किसी इष्ट के लिए करना शिर्क होगा। इससे निकालने वाली ध्वनि के वैज्ञानिक फायदें हो सकते हैं. असल में इस तरह की ध्वनियां वातावरण में एक सकारात्मक और शरीर व आत्मा पर असर डालने वाली तरंगे पैदा करती हैं और शायद इसलिए इनका प्रयोग शुरू हुआ होगा पूजा (उचित व्यवहार) के समय. घंटा बजाना या शंख बजाना एक आह्वान है जैसे अज़ान एक आह्वान है।
ऐसा कहा जाता है कि देवदासियों, नर्तकियों आदि ने संभवतः बिंदी और श्रंगार का आविष्कार किया. बिंदी महिलाओं के लिए शक्ति की देवी (शक्ति) की क्षमता बिंदू के रूप में समझा गया है. प्राचीन भारत में एकमात्र महिलाएं जिनके पास शक्ति थी, वे वेश्याएं थीं। पहले गणिकाएँ स्वतंत्र सार्वजनिक महिलाएँ या नगर-वधू होती थीं। बाद में, जब विवाह महत्वपूर्ण हो गया, तो उसने खुद को देवदासी घोषित कर दिया, गाँव के "भगवान" से शादी कर ली और गाँव के सभी पुरुषों में अपने "पति" को खोजने के लिए स्वतंत्र हो गई। वह सदैव बिंदी लगाती थी और नित्य-सुमंगली कहलाती थी। पतियों की मृत्यु हो गई, लेकिन वह कभी विधवा नहीं हुई क्योंकि ग्राम देवता अमर थे। युवा लड़कियाँ, विधवा, संयासन बिंदी नहीं पहनती थीं। बिंदी बताती थी कि आपके जीवन में एक आदमी है यानी आप सुमंगली हो, अशुभ नहीं. प्रारंभिक बौद्ध कला में महिलाओं को सजावटी टीका तो दिखाया गया है, लेकिन माथे पर बिंदी नहीं लगाई गई है। शरीर को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए चेहरे और अंगों पर कस्तूरी का चिन्ह का लगाने का संदर्भ भी मिलता है, लेकिन इसमें आध्यात्मिक या धार्मिक कुछ भी नहीं है।
वेदों और वैदिक काल में हल्दी को बेहद फायदेमंद बताया गया है और उसके प्रयोग का भी ज़िक्र है बहुत जगह। इसलिए तब से अब तक हल्दी का प्रयोग भारत में पूजा, संस्कार, घरेलू नुस्खों में हो रहा है। इसके फायदे से किसी भी धर्म का इंसान इनकार नहीं कर सकता। शादी से पहले हल्दी की रस्म का हिन्दू ग्रंथों में कोई जिक्र नही है। यदि धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक है। शायद वजह है हल्दी का एन्टी बैक्टीरियल और स्किन टोन इम्प्रूवर वगैरह होना।
इसलिए इस्लाम में इस रस्म की कोई मुमानियत नहीं है, ये लोकल रिवाज है। इसमें शिर्क, कुफ्र जैसे कुछ नहीं है। शादी में अपने पारम्परिक रिवाजो में कोई हर्ज नहीं है, बस वो अख़लाक़ी (जैसे बेहयाई, फिजूलखर्ची, दिखावा वगैरह) तौर पर गलत नहीं होने चाहिए। अगर इनमें कोई शिरकीया चीज़ है तो उससे बचना चाहिए। ये बिदअत भी नहीं है। बिदअत दीन के कामों में होती है। इस्लाम ने दीन के तौर पर निकाह में जो चीज़े करना ज़रूरी या अहम बताई गयी हैं, वो हैं- इजार, कुबूल, वली, मेहर, गवाह, वलीमा खुतबा, दुवा। इनके अलावा बाकी आपके लोकल रीति रिवाज मानने न मानने का आपको हक़ है, बस उसमें कोई गैर इस्लामी चीज़ शामिल नहीं होनी चाहिए। ये वैसे ही जैसे मुस्लिम शादियों में छुआरे बांटने या फेंकने का रिवाज तब आया जब इस्लाम सेंट्रल एशिया में फैला (फारस, अफगान, मुग़ल आदि)। नबी ने जब ह. सफिया से निकाह किया तो खाने की बजाए दस्तरख्वान पर खजूर वगैरह पेश किए थे क्योंकि ये निकाह सफर के दौरान हुआ था। जैसे मुस्लिम नवजात बच्चे को सबसे पहले खजूर खिलाते हैं, इसका ताल्लुक दीन से नहीं बल्कि क़दीम तिब्ब से है।
बाकी वल्लाहु आलाम।
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#सनातन धर्म - भाग 2 (ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, शिवलिंग, देवता, भगवान, अवतार का अर्थ)। http://ekambraham.blogspot.com/2020/06/blog-post_30.html
#सनातन धर्म - भाग 3 (अस्तित्व, धारणाएं और प्रथाएं - इस्लाम के समानांतर) देवता फ़रिश्ते, भूत प्रेत आत्मा जिन्न, लोक परलोक, प्रलय क़यामत, माईथोलोजिकल कैरेक्टरस, इस्लाम के 5 ख़म्बे, मक्का मक्तेश्वर।
http://ekambraham.blogspot.com/2020/06/blog-post_29.html
#नमाज़, योग, संध्या, सज्दा, अष्टांग आदि पर चर्चा।
http://ekambraham.blogspot.com/2022/08/blog-post_30.html
#मुस्लिमों के हिन्दुधर्म पर सवाल और उनके जवाब
http://ekambraham.blogspot.com/2020/06/blog-post_51.html
# पूजा का अर्थ और मूर्तिपूजा का आरंभ।
https://ekambraham.blogspot.com/2024/04/blog-post_45.html
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