Friday, 9 September 2022

क्या इस्लाम दीन को नाफीज़ करने और इस्लामी रियासत बनाने का हुकुम देता है?

 

 

 

इकामते दीन का मतलब 

 

कुरान (42: 13) कहता है कि दीन को कायम करो या रखो (दोनों मायने निकालते हैं)।  इसमें आए लफाज इकामते दीन का मतलब दीन को नाफीज़ करो नहीं है बल्कि दीन को कायम करो है।  यानि दीन पर अमल करो, दीन पर खड़े रहो है।  जैसे नमाज़ कायम करो का मतलब नमाज़ पढ़ो या अदा करो।  इकामत का मतलब कायम करना, हिफाज़त करना होता है और नाफीज़ करना भी होता है। मगर कुरान की इस आयात मे नाफीज़ करने का कांटेक्स्ट नहीं है क्यूंकी किस पर नाफीज़ करना है, यह नहीं लिखा है।  इन्हीं आयतों में मूसा, ईसा की बात हुई हैं तो उन्होने किस पर दीन नाफीज़ किया था? इसका मतलब है जो दीन सबको दिया सो इस पर अमल करो। दीन कई चीजों का नाम है जैसे तलाक, निकाह, नमाज़, ज़कात आदि। आप कैसे ये लोगों पर थोपोगे? नाफीज़ होने की चीज़ें होंगी तो नाफीज़ होगी यानि अगर नाफीज़ करने के लिए होता तो तो कुरान खुद कहता कि फला फला चीज़ें नाफीज़ करो।  दीन में दिये गए ज़्यादातर हुकुम व्यक्तिगत हैं तो वो कैसे नाफीज़ करेंगे क्या नमाज़ को मार्किट बंद करके पढ़वाएंग यही आयात आगे कहती है कि तफरके मे न पड़ो तो यह अमल की बात हुई, न कि दूसरों पर नाफीज़ करने की। इसलिए यह हुकुम फर्ज़ नहीं है कि दीन कायम करो अगर होता तो उसके अहकाम पर्सनली करने होंगे क्योंकि दीन के अहकाम फर्ज़ है। असल में दीन के हुकुम जो फर्ज़ हैं वो अमल मे लाने है, न कि नाफ़िज़ करने है।

 

क्या इस्लाम मुस्लिमों को अपनी रियासत या इस्लामिक हुकूमत बनाने को कहता है?

 

इस्लाम आगे बढ़कर रियासत  बनाने का हुकुम नहीं देता। पर अगर ऐसी स्थिति आ जाए की रियासत बनानी पड़ जाये तो ऐसे हुकुम अपने आप बीच में आ जाएंगे जो इस्लाम रियासतों के लिए देता है जैसे इन्सानों के लिए व्यक्तिगत हुकुम देता है। रियासत चलाने के लिए उसूल पहले से ही तमाम इन्सानों को व्यक्तिगत तौर पर अमल करने के लिए बताए जा चुके थे।  कुछ उसूल रियासत से संबन्धित होते हैं तो उन्हे मुस्लिम रियासतों को मानना है जैसे चुनी हुई सरकार गिराने और फ़ितना फैलाने से बचना है आदि। इस्लाम की हिदायतें व्यक्तिगत और समूहिक, दोनों तरह की होती है।

 

कुरान (42:38) कहता है कि अमराहुम शुरा बयनाहूमयानि (जिन्होने अपने रब का आदेश माना) उनका मामला उनके पारस्परिक परामर्श से चलता है।  यही असली लोकतंत्र है।  कुरान (3:110) कहता है अमरबिलमारूफ़ वाअनिल मुंकरयानि (तुम हो वो बेहतरीन उम्मत जो लोगों की भलाई के लिए निकाली गई है) तुम अच्छाई का आदेश देते हो और बुराई से रोकते हो। (कुंतुम खैरा उम्मतिन उखरिजत लिन्नास ता मूरूना बिलमारूफ़ वा तनहवना अनिल मुंकरी)।  यह नाफीज़ करना है।  मारूफ़ का मतलब शरीयत के हुकुम नहीं हैं, बल्कि जानी - पहचानी अच्छी चीज़ें है और मुंकरात का मतलब जानी- मानी बुरी चीज़ें है। रियासत के लिए, ये दोनों कुरानी हिदायतें हैं। कोई भी निज़ाम शुरा वाली आया के खिलाफ नहीं बनाया जाना चाहिए।  यह ऐसा ही है जैसे पैसा कमाना या न कमाना, मेरा इख्तियार है पर अगर कमा लिया तो ज़कात अपने आप नाफीज़ हो जाएगी।

 

सहाबा ने निज़ाम कुरान पढ़ कर नहीं बल्कि ज़रूरत के मुताबिक बनाया था।  ऐसा हादसे पेश आते गए की रियासत बनती गयी। उस समय रियासत बनाने की ज़रूरत थी तो रियासत बनाई। अगर आवश्यकता नहीं होती तो यह रियासत कभी नहीं बनाई जाती।  यानि उस वक़्त अगर कोई आलमी निज़ाम होता तो मुस्लिम उसी में शामिल या ढल जाते।  पहले मदीना फिर मक्का में रियासत बनी। अल्लाह को भी दोनों क़ौमों (मदीना वासी और मक्का वासी) को किसी निज़ाम का पाबंद रखना था ताकि इस्लाम द्वारा शुरू हुआ सिलसिला आगे तेज़ी बढ़ता रहे। 

 

रियासत पर मुस्लिमों से संबंधित कौन से अहकाम की ज़िम्मेदारी है?

 

इकामते सलात का मतलब है नमाज़ कायम करो यानि लोग अपनी अपनी नमाज़ कायम करेंगे। रियासत भी कायम करेगी पर सिर्फ वही अहकाम जो रियासत पर सुन्नत से साबित होते हैं। सुन्नत में इन्हें ढूँढने पर 2 अहकाम मिलते हैं, जो है जुमा और ईदेयन की नमाज़े।  रियासत इनका इंतेजाम करेगी।  यानि सुन्नत यह इजाज़त देती है कि रियासत चाहे तो ये 3 नमाज़े मुस्लिम पर ज़बरदस्ती नाफीज़ कर सकती है और न चाहे तो नहीं करें, मतलब लाज़िम नहीं है पर इख्तियार हासिल है।  वैसे ही जैसे आज सरकारें जनता पर कोई योजना या नियम या आंकड़ें देना लाज़मी कर देती है।  मगर रियासत 5 नमाजों को नाफीज़ नहीं कर सकती क्योंकि वो उनका हक़ नहीं है।  दरअसल जुमा और ईद पर हाकिम या उसके नुमाइंदे को मिंबर और खुतबे का हक़ हासिल है इसलिए ऐसा निज़ाम या निफ़ास किया जा सकता है।  उन्हें ही इसकी जगह वगैरह तय करनी है। 5 नमाज़ तो अकेले इंसान पढ़ सकता है मगर जुमा-ईद अकेले नहीं पढ़ सकता।  रियासत को ज़कात लेते का हक़ भी है, मगर चाहे तो न लें, यानी दोनों इख्तियार हासिल है। अरब में 100 साल तक ज़कात नहीं ली गयी थी।  इसलिए ह. उमर ने कहा था कि ज़कात तो ज़रूर लूँगा।  यह आज के टैक्स की तरह ही लाज़मी चीज़ है जो 2.5%, 5%, 10%, 20% की चार दरों में होता है। ज़ाहिर है ये सब हुकुम मुस्लिम पर ही नाफीज़ होंगे, गैर मुस्लिम पर नहीं। अल्लाह का हुकुम है और इसलिए अल्लाह की बताए हुई सजाएँ भी नाफीज़ होंगी मुस्लिमो पर।  मुस्लिमों को दावत तबलीग़ करने का अधिकार होगा और कोई रोकेग या कोई मुस्लिम पर ज़ुल्मों सितम करेगा तो रियासतत को उन्हें ऐसी रुकवाट खड़ी करने पर उनसे लग सकती है और तलवार भी उठा सकती है। 

 

एक हदीस सुनाई जात है कि बुराई हाथ से नहीं तो ज़ुबान से रोको, अगर ताकत नहीं है तो दिल मे उसे बुरा जानो मगर यह सबसे कमोजर ईमान की निशानी है। इस हदीस को गलत अर्थों में लिया जाता है।  यह अपने दायरे या सीमाओं में लागू करने वाली बात है।  जैसे 50 गुंडों को लड़ाई के बाद मैं नहीं पकड़ सकता या ट्रेफिक लाइट तोड़ने वाले का चालान नहीं काट सकता, ये मेरा इख्तियार नहीं है। यह इख्तियार तो पुलिस वालों का है और उन्हे इस पर अमल करना है। अगर चोर मुस्लिम है तो उसका अल्लाह से अहद था की वो अल्लाह के मुताबिक ज़िंदगी बिताएगा मगर चोरी करके उसने दुनिया और अल्लाह दोनों का कानून तोड़ा है तो उसे सज़ा मिलेगी, अगर किसी भी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है तो।  अगर संगीन किस्म की चोरी या जुर्म या चोर ने बहुत बड़ी हिमाकत या जुर्म किया है तो उसके हाथ भी काटे जा सकते हैं ताकि समाज में संदेश जाये। यानि चोर और चोरी के हालातों, उनकी प्रकृति आदि पर निर्भर करता है की उसे माफ किया जाये, छोटी सज़ा दी जाये या बड़ी। 

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किसी भी मुस्लिम को उसकी दीन की बुनियादी हिदायतों को मानना फ़र्ज़ हैं, जिसमें सिर्फ इबादतें या हुकुकल अल्लाह ही नहीं बल्कि हुकुकुल इबाद और अखलाकियात से जुड़े हुए तमाम पहलू हैं। अगर लाखों करोड़ों मुसलमान रोज़ किसी न किसी (खासतौर पर गैरों के साथ) के  साथ गलत कर रहे हैं तो क्या उन्हें खुद को मुसलमान कहने का या मुसलमान दिखने का हक़ है? क्या उनकी हरकतें इस्लाम पर दाग नहीं लगा रही?

अगर मुसलमान अपने दीन को ही प्रक्टिअली फॉलो नहीं कर पा रहे (कोई उन्हें हुकुकल अल्लाह और हुकुकुल इबाद और अच्छे अखलाक वगैरह करने से कंही नहीं रोक रहा, चाहे मुस्लिम देश हो या गैर मुस्लिम) तो इसमें माहौल, एनवायरनमेंट वगैरह का क्या दोष? इन सबका वास्ता तो बंदे की अपनी ज़ात से है। समाज तो छोड़िए, वो अपने खानदान, घर, अपने अंदर, बल्कि अपने हर मामलात में इस तथाकथित 'इस्लाम का निज़ाम' नाफ़िज़ करके,  उन सभी मुसलमानों को दिखाना चाहिए जो दुनिया या किसी मुल्क में इसे नाफ़िज़ करना चाहते हैं। पहले खुद अमल करके दिखाया जाए तो दूसरों से उम्मीद करी जानी चाहिए।

इस्लाम का हुकूमती निज़ाम कोई है भी या नहीं, इस पर चर्चा कभी बाद में करंगे. इस पर भी कभी बाद में चर्चा करंगे कि आज का डेमोक्रेटिक सेटअप इस्लाम के खिलाफ है भी या नहीं? इस्लामी निज़ाम की परिभाषा क्या है? उसमें इलेक्शन, सरकार, जुडिशरी, एडमिनिस्ट्रेशन वगैरह बनाने क्या सिस्टम है? इस्लामिक निज़ाम नामक गवर्निंग सिस्टम का स्रोत क्या है? किस जगह से इस पूरे निज़ाम को डिटेल में डेडयूस किया जाता है? जिसे आम मुस्लिम इस्लामी निज़ाम समझता है (नबी, खुल्फा के राशिदून के वक़्त वाला) क्या वो नबी से पहले से ही चला आ रहा था या क़ुरान के साथ आया? ऐसे हज़ारों सवाल हैं, जिन पर चर्चा कर सकते है।
मुसलमानों की मज़हबी किताबों या मदारिस के सिलेबस में आम मुस्लिमों को सेकेंडरी लिटरेचर (न कि क़ुरान और सुन्नत से जो दीन के असल स्रोत हैं) से जिस तरह गैर मुस्लिमों, एक्स मुस्लिमों, मुल्हिदों, शतिमे रसूल, गुस्ताख वगैरह के बारे में गलत गलत बातें लिखी और बताई जाती हैं और इन से इंपसपायर हो कर वो अक्सर गलत काम कर बैठते हैं तो इसके लिए ऐसे मुसलमानों को दोषी क्यों न माना जाए जो मूल या असल इस्लाम से बैठकर अपना बनाया हुआ इस्लाम पेश और अमल कर रहे हैं?
 

जब भी तथाकथित इस्लामी हुकमती निज़ाम की बात होती है, सिर्फ एक/दो मिसालें दी जाती हैं। यानी कि जिस निज़ाम की लोग बात इतनी बात करते हैं वो 1400 साल में सिर्फ चंद बार ही नाफिज़ हो पाया। इसका मतलब है इसको नाफिज़ करना अधिकतर मुस्लिम पब्लिक और शासकों के लिए या तो फायदेमंद नहीं होता या फिर उनके बस में नहीं होता। इसलिए आइंदा भी इसे नाफिज़ करने वाले नहीं होंगे यह बात पक्की है। तो मुसलमानों को इन डेमोक्रेसी में ही रहना होगा और फिर उनको ही बुरा भी कहते रहंगे। अरे भई किसी के बस में है तो वे कर दिखाएं, किस ने रोका है। असल में लोग मुस्लिम खुद इसको करना नहीं चाहते।

मुसलमानों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि अपनी एक गलती तक नहीं देखना चाहते। अल्लाह ने कभी नहीं कहा कि इस्लाम के नाम पर हुकूमत बनाओ। चारों तरफ मुसलमान आतंक से लेके हिंसा, अपराध से लेके अनैतिकता में घिरे हुए मगर इसमें ज़रा सा भी दोष मुसलमानों का नहीं बल्कि बस गैरों का है, ऐसा सोचना और मानना, ज़मीन में शतर्मुर्ग की तरह गर्दन घुसाने जैसा है।

मुसलमान जितनी जल्दी से समझ जाएंगे उतना अच्छा है कि कोई नहीं आने वाला आसमान से उनके लिये इस्लाम को नाफिज़ करने के लिए, कोई ईमाम उनके लिये आके नहीं लड़ने वाला, कोई गज़वा नहीं होना। मुसलमान को इस्लाम खुद सबसे पहले अपने आप पर, अपने घर मे, अपने खानदान में, अपने कारोबार में, अपने मामलात में नाफिज़ करना है, तब जाके अल्लाह से उम्मीद लगाई जाए कि अल्लाह कोई मदद भेज दे। जो खुद अल्लाह से दूर है, अल्लाह क्यों उनके पास आएगा।

नबी ने जब इस्लाम की दावत शुरू करी तो सबसे पहले लोगो के इंटरनल मैटर्स पर ही काम किया जैस अक़ाइद और मामलात दुरुस्त करने की हिदायतें दी और ज़मीनी स्तर अपर करवाई भी। सहाबा ने ज्यों के त्यों अमल करके दिखाया। बल्कि अपनी नबूवत के आधे अरसे तक किसी निज़ाम, किसी हुकमत को स्थापित नहीं किया। इसलिए मुसलमानों को सबसे पहले अपने क़ुरान और सुन्नत से इतर अक़ाइद (जिनमें वो भी हैं, जो गैरो के बारे में निहायती दकियानुसी हैं), अपने किरदार, अखलाक, मामलात को दुरुस्त करना चाहिए। इसके बाद जाके निज़ाम वगैरह जो करना है करें क्योंकि कमज़ोर बुनियादों पर ऊँची इमारतें खड़ी नहीं होती। 

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