इसाइयों ने अपना धर्म चिन्ह सलीब (क्रॉस) को बना रखा है क्योंकि उनका मानना है कि यहूदियों ने ह. ईसा को सलीब दे कर क़तल कर दिया था। क्योंकि इस्लाम और कुरान कहता है कि ईसा को सलीब नहीं दी गयी थी इसलिए मुस्लिम इस चिन्ह को अपनी किसी भी चीज़ पर छापने या दिखाने से गुरेज़ करते हैं। उन्हे लगता है कि इन चिन्ह को खुद दिखाना, इसाइयों के अकीदे को समर्थन देना और उनसे सहमत होना हैं। क्या ऐसा गुमान करना वाकई सही है?
सामान्य दलीलें।
1. अमल का दामोदर नियत पर होता है। ऐसे चिन्ह प्रदर्शित करने की नियत केवल यही होती है कि हर धर्म वाले हमारे साथ आ सके। किसी चीज़ का प्रदर्शन करना, समर्थन या सहमति नहीं होता। अगर उन्होने हमारा कलमा चिन्ह के रूप में लिख दिया तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि उन्होने मुहम्मद साहब को रसूल मान लिया।
2. अगर किसी इंटर फेथ डायलोग में विभिन्न धर्म गुरुओं के सामने या पीछे उन्हीं के चिन्ह लगा दिये जाए तो इसे उनकी पहचान माना जाएगा, न कि ऑर्गनाइज़र का अक़ीदा। किसी सर्वधर्म संभाव विषय की किताब में विभिन्न धर्म के विद्वानों के आर्टिकल के साथ उनके ही चिन्ह छपवाए जाएंगे तो ये पब्लिशर का अक़ीदा नहीं माना जाएगा। इसलिए दूसरे धर्म कि पहचान के तौर पर उनका ही चिन्ह प्रयोग होगा, न कि हमारा।
3. यंहा वर्क के लोगो (सिम्बल) की फ़िलॉसफ़ि समझने की भी ज़रूरत है जो यह है कि ईश्वर जड़ है और उससे बहुत सी शाखाएँ निकली और समय और बदलाव के बाद अलग अलग धर्म बनते चले गए। अगर पेड़ की जड़ एक है तो पेड़ की शाखाएँ भी समान होनी चाहिए। इसलिए एक दिन ये शाखाएँ जिन पर अलग अलग धर्म नुमा फूल (धार्मिक चिन्ह) लगे हुए हैं, ये भी एक हो जाएंगे। यानि ये रीप्रेज़ेंटेशन उनसे सहमति नहीं बल्कि उनकी पहचान ज़ाहिर करने के लिए करी गयी है। भले ही कोई इस फ़िलॉसफ़ि को न माने पर यही सत्य है कि सभी बड़े धर्म ईश्वर के धर्म से निकले है। बुद्ध और महावीर भले ही नास्तिक धर्म मालूम पड़ते हो मगर उनमें अच्छाई, भलाई और मार्गदर्शकों की श्रंखला आदि जैसे कान्सैप्ट यही ईशारा करते हैं। इतने लंबे समय तक इन धर्मो का जीवित रहना और इन महापुरुषों के इतने अनुयाई होना भी यही स्पष्ट करते हैं कि ये कोई ईश्वर भक्त ही रहे होंगे। जबकि चार्वाक जैसी स्वार्थी नास्तिक विचारधारा ज़्यादा नहीं चल सकी।
4. ह. ईसा खुदा का बेटा माना जाता है। हालांकि ईसा को सलीब नहीं दी गई थी। संभवतः उनके एक गद्दार शागिर्द को सलीब दी गयी थी और लोगों को खुदा के जरिये ही ऐसा भ्रम करवाया गया था कि ईसा को ही सलीब दी गयी है। इसलिए सलीब देने कि मान्यता होने से बड़ा जुर्म ईसा को खुदा का बेटा मानना (शिर्क) है। जब ईसाई हमारे साथ आएंगे तो इस पर बातचीत भी होगी। हो सकता है वो ईसा को खुदा को बेटा न होने की बात मान ले (जो ज़्यड़ा तार्किक है) और सलीब न देने कि बात न माने (जो तुलनात्म्क रूप से कम तार्किक या प्रामाणिक है), तो क्या यह कम बदलाव होगा? अगर यह सलीब और बेटे वाले जैसे मसले ही हल हो जाये तो फिर वो ईसाई ही कंहा रह जाएंगे, वो तो फिर मुस्लिम ही हो जायेंगे। परंतु जब तक वो हम से अलग हैं, तब तक उनकी पहचान और चिन्ह भी अलग है। वो जब हम जैसे हो जायेंगे तो हमारी पहचान भी एक हो जायगी। इसलिए तब तक एक दूसरे पर पर कुछ थोपा न जाये और एक दूसरे कि मान्यताओं का सम्मान किया जाये, भले ही उन्हे दिल से गलत समझें।
वर्क मुस्लिम के लिए दलीलें।
5. मुस्लिम दूसरे धर्मो के अन्य प्रतिकों को प्रदर्शित करने में कोई हर्ज नहीं समझते जैसे कि.... ॐ, इक ओंकार, धम्मचक्क, ब्रह्माकुमारी समाज का चिन्ह। हालांकि इनमें से अधिकतर के अर्थ भी किसी न किसी रूप में इस्लाम कि शिक्षाओं के विरुद्ध ही हैं जैसे:- ॐ शब्द को हिन्दू धर्म में बहुत से अर्थों में लिया जाता है जिनमें से कुछ हैं:- यह मंत्र है, कुछ प्रकृति तत्वों का प्रतिनिधित्व है, सृष्टि का सार है और ईश्वर का नाम है आदि। इसी तरह सिक्खों का इक ओंकार शब्द भी इसी ॐ से बना है। बोद्ध धम्मचक्क बुद्ध के धर्म और अष्टांगिक मार्ग को दर्शाता है। वैसे जैन धर्म के चिन्ह को सिद्धाचक्र (अक्सर परस्परोग्रहोजीवानाम प्रतीक में भी शामिल) कहते हैं जो निर्वाण प्राप्त करने या जीवन चक्र से मुक्ति पाने के लिए पूजा जाता है। इसके अलावा वर्क लोगों में ब्रह्माकुमारी समाज के चिन्ह को भी प्रदर्शित किया गया है जो ध्यान (में प्राप्त किरणें रूपी ज्ञान) या जीवन चक्र को इंगित करता है। ब्रह्माकुमारी समाज की मान्यताएँ इस्लाम धर्म से तो क्या हिन्दू धर्म के भी विरुद्ध है। इसलिए ऐसी संक्रीण मानसिकता से चले तो हम किसी भी धर्म चिन्ह का प्रयोग नही कर पायंगे और ऐसी स्थिति में किस चिन्ह का इस्तेमाल करेंगे, आवश्यकता पड़ी तो?
6. इसी तरह महादेव शब्द का इस्तेमाल कुछ मुस्लिम ईश्वर के लिए करते हैं जबकि यह शब्द हिन्दू, देवता शिव जी के लिए प्रयोग करते हैं। इसका अर्थ होता है देवों का देव (सबसे बड़ा देव), महादेव। देव या देवता की धारणा असल में फरिश्तों के समान हैं बस हिन्दू धर्म उनके अस्तित्व में मिलावट कर चुका है और उन्हें पूजनीय/उपासनीय बना चुका है। वैसे देव का मूल अर्थ होता है प्रकाशमान या देने वाला। ये मनुष्यों को बहुत सी नयमतें प्रदान करते हैं जो असल में ईश्वर के आदेश पर ही दी जाती हैं वर्ना इनकी अपनी कोई ज़ाती ताकत या हेसीयत नहीं। इसलिए देने वालों में सबसे बड़ा देने वाला ईश्वर है और कोई नहीं। तो इस तरह अगर कोई चाहे तो महादेव के अर्थ, ईश्वर से भी ले सकता है क्योंकि वही देवताओं का देवता हैं यानि इन्सानों और देवताओं, दोनों को देने वाला।
वैसे उसूलन किसी भी धर्म का कोई सिद्धान्त या शब्द आदि उसी अर्थों में लेना चाहिए जो अक्सर उस धर्म के मानने वाले लेते हैं या उसके ज्ञानीगण। कभी कभी इन दोनों के मतों मे विरोधाभास भी होता है। विरोधाभास कि स्थिति में दोनों में से कोई भी अर्थ लिए जा सकते हैं जो तर्कों या प्रमाणों पर या अक़ल और इल्म पर खरे उतरे। इसलिए यही सबसे बेहतर तरीका है दूसरे धर्मों की किसी धारणा को समझने और स्वीकारने का। हालांकि दावत या इसलाह के हिसाब से उनके ऐसे अर्थ भी लिए जा सकते है जो उस धर्म के मानने वालों से बिलकुल ही अलग हो मगर उन अर्थों को कोई आधार होना चाहिए, कोई मजबूत तर्क आदि होना चाहिए। यानि सिर्फ अपनी बात उंची करने के लिए उनमें कोई खायानत नहीं करनी चाहिए और आपकी नियत भी सही होनी चाहिए। जैसे पुनर्जन्म वाले मंत्र का अर्थ या कुंताप सूक्त के अर्थ भिन्न किए गए है मगर तार्किक किए गए हैं। हालांकि ऐसा भी हो सकता है कि आपके किए गए अर्थ भले ही तार्किक रूप से उचित हो मगर उनके ग्रन्थों से कुछ जगह विरोधाभासी भी हो जाए, तो इसमें कोई अजीब बात नहीं होगी क्योंकि विभिन्न धर्मों के ग्रन्थों में विरोधाभास कोई नयी बात नहीं हैं जैसे मनुस्मृति में ही मांस को लेकर विरोधाभासी मंत्र हैं। पर बिना किसी आधार के मन मर्ज़ी से हर हर शंभू गीत में आए शिरकीय शब्दों को तौहीद परास्त या अरबी शब्द कबीर और संस्कृत शब्द कवि को संत कबीर नहीं बनाना चाहिए।
7. अगर आप टूटी ही सलीब लगाते हो तो इसमे कोई परेशानी नहीं। पर अगर कोई ईसाई इस पर टोक दें कि यह टूटा हुआ क्यों है तो आपके पास कोई जवाब न होगा और वो आपसे जुड़ भी नहीं पाएगा क्योंकि आपने लगाया तो उसकी पहचान के लिए ही था कि हम सब साथ है।
आम मुस्लिम के लिए दलीलें।
8. मुस्लिम ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, ब्रह्म आदि शब्द का प्रयोग करते हैं जबकि उनका ईश्वर और ब्रह्म अवतार लेके ज़मीन पर आता है। ब्रह्म को ही ईश्वर कहते हैं और तिमूर्ति को भी ईश्वर माना जाता है। ईश्वर को लेके पौराणिकों और आर्य समाजियों की ऐसी बहुत सी मान्यता हैं जो इस्लाम के विरुद्ध हैं। जैसे वो कहते हैं कि ईश्वर सर्वव्याक (यानि वो कण कण में है - हालांकि इसके अर्थ अन्य भी होते हैं या लिए जा सकते हैं) या वो क्षमाशील नहीं है (यानि वो पाप का दंड देके ही रहता है और कभी क्षमा नहीं करता - इसका मत का आधार ज्ञात नहीं है)। ऐसी मान्यताएँ इस्लाम के विरुद्ध हैं। इसलिए मुस्लिमों को ईश्वर शब्द भी नहीं कहना चाहिए क्योंकि यह भी तो उनकी मान्यता का समर्थन या सहमति है। इसी तरह से स्वर्ग, नरक, धर्म आदि शब्द भी प्रयोग नहीं करने चाहिए क्योंकि इन के अर्थों या मान्यताओं में भी अंतर हैं। आपके द्वारा इन शब्दों के प्रयोग से सामने वाले इनसे वही अर्थ समझेंगे जो उनमें प्रचलित हैं।
9. ईसाई, ह. ईसा को खुदा का बेटा मानते हैं और इसके अलावा उनके बहुत से अकीदे इस्लाम के विरुद्ध हैं। इसलिए अगर हम सलीब कि जगह ईसा का फ़ोटो (ईसाइयों द्वारा बनाया गए हुलिये के ही फ़ोटो होते हैं, मुस्लिम के नहीं) लगा दे या कोई अन्य ईसाई चिन्ह लगा दें या केवल ईसाइयत नाम लिख दें तो क्या तब ये भी उनके इन अकीदों का समर्थन और सहमति माना जाएगा? क्या इससे यह माना जाएगा कि हम ने भी ईसा को खुदा का बेटा मान लिया है? इस तरह तो ईसाइयत के हर चिन्ह का प्रयोग शिर्क माना जाना चाहिए, मगर ऐसा होता नहीं है।
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