सवाल-जवाब
क्या मुस्लिम/सनातनी/हिन्दू हैं?
यंहा किसी धर्म या इस्लाम को रिप्रेसेंटन नहीं किया जा रहा है, न उनकी वकालत की जारी है। किसी समुदाय से जोड़ कर ने देखिए। आज्ञा लेके ही सन्देश शुरू किया गया था, इसलिए थोड़ा सुनना तो चाहिए। मैं सनातन धर्मी भी हूँ और मुस्लिम भी, बल्कि सनातनी मुस्लिम हूँ। सनातन धर्म वो धर्म है जो ईश्वर द्वारा दिया गया है और सदा से चला आ रहा है और सदा चलता रहेगा। हिंदुस्तान का रहना वाला हूँ तो हिन्दू भी हूँ। भौगलिक तौर पर हर भारतीय हिन्दू है चाहे किसी भी धर्म में जन्मा हो. प्राचीन काल में हिन्दू उसे कहते थे जो सिन्धु नदी के के इस पार सिंन्धु या हिन्द में रहता थे.
सनातन है तो इस्लाम क्यों? सनातनी हो तो मुस्लिम क्यों?
ये वैसा ही मत है जैसे कोई कहे कि ईश्वर हिन्दुओं का और ख़ुदा मुस्लिमों का होता है। या गाय हिन्दुओं की और बकरा मुस्लिमों का होता है. या नारियल हिन्दुओं का और खजूर मुसलमानों की होती है. या नारंगी रंग हिन्दुओं का और हरा रंग मुसलमानों का होता है. अरे भई हर रंग, हर चीज़ ईश्वर की है, उसने कोई विभाजन नहीं किया, तेरा मेरा तो हमनें कर रखा है.
हिन्दू धर्म का असली नाम है. सनातन धर्म भी
असली नाम नहीं है, यह तो एक गुण है अर्थात सबसे
आदि धर्म. धर्म का असली नाम है, वैदिक धर्म.
धर्म कहते हैं धारण करने को। बहुत कम लोग हैं
जिन्होंने उस ईश्वर की इच्छा को धारण कर रखा है. कितनो ने उसकी इच्छा को धारण कर
रखा है? आज बहुत कम लोग धार्मिक है,
अधिकतर नाम मात्र के धार्मिक है। ग्रंथों को मानने वाले धार्मिक हैं, न मानने वाले नहीं।
ईश्वर का प्रथम ग्रन्थ वेद हैं। वेद अपोरुषय हैं, वेदों अखिलो धर्म मूलम है। बहुत कम लोग वेदों को पढ़ते हैं। दुनिया में अधिकतर हिन्दू वेदों को पढ़ना तो दूर, दर्शन भी नहीं करपाते। बहुत से लोग वेदों के अनुसार जीवन नहीं जीते हैं। वेदों को अनुसार कर्म न करने वाले खुद को धार्मिक नहीं कह सकते हैं। वेदों के विरुद्ध कर्म करने लोग खुद सनातन धर्मी नहीं कह सकते। वेदों पर क्या किसी एक समुदाय का अधिकार है। वेद तो सभी के लिए। मेरे पास वेद है, वेद पढ़ता हूँ और उन पर आस्था रखता हूँ, उसे ईश्वर का ज्ञान मानता हूँ, उनकी बहुत सी बातों पर अमल करता हूँ। तो फिर क्या सनातन धर्मी नहीं हुआ, सनातन धर्मी ही हुआ।
इस्लाम का मतलब है समर्पण। कोई ईश्वर के आगे समर्पण नहीं करे तो वो मुस्लिम नहीं होगा. इसी तरह कोई मुस्लिम क़ुरान अनुसार कर्म नहीं करे तो वो भी मुस्लिम नहीं होगा। दुनिया के अधिकतर मुस्लिम कुरान पढ़ते तो मगर अरबी में पढ़ते हैं, उसका अनुवाद नही जानते। मैं कुरान का अनुवाद भी पढ़ता हूँ, कुरान पर आस्था रखता हूँ जो ईश्वर का अंतिम ग्रन्थ हैतो फिर मुसलमान भी हुआ.
(स का अर्थ है साथ और अनंत का अर्थ है सदैव. सनातन का अर्थ हुआ वो धर्म जो सदैव के लिए हैं. दीने क़य्यिम वो धर्म जो हमेशा कायम रहे). सनातन धर्म का अर्थ है जो धर्म सदा से सीधा चला
आ रहा हो। इस्लाम का दूसरा नाम है दीने क़य्यिम है यानी जो सदा से क़ायम हो। दोनो नामों
का एक ही अर्थ हुआ. गीता में इसे ही स्वधर्म कहा गया है यानी स्वाभाविक धर्म और
क़ुरान में इसे ही दीने फितरत कहा गया है यानी फितरत पर आधारति धर्म। तो ये दोनों
धर्म तो एक ही हुए। असल में ये एक ही धर्म के दो नाम हैं. जब ईश्वर का धर्म पहली
बार आया तो उसे सनातन कहा गया और जब अंतिम
बार आया तो उसे इस्लाम कहा गया. भारत भूमि से धर्म की प्रथम शुरूवात हुई, फिर बिगाड़ के बाद अंतिम बार
धर्म अरब में आया। इस्लाम भारत का ही धर्म है.
हिन्दू क्यों नहीं बन जाते?
जैसा कि सरसंघचालक माननीय भागवत जी कहते हैं कि सभी सांस्कृतिक तौर पर हिन्दू हैं, केवल पूजा पद्धति भिन्न भिन्न है। हिन्दू साकार को पूज रहे हैं और मुस्लिम निराकार को पूज रहे हैं। हिन्दू सगुण को पूज रहे हैं और मुस्लिम निर्गुण को पूज रहे हैं। आज भी आर्य समाजी निराकार को पूजते हैं। भक्तिकाल में निर्गुण को पूजते थे. वेदों में साकार की नहीं बल्कि निराकार की पूजा है। सब उससे जुड़े हुए मगर जुडने का माध्यम अलग अलग है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सभी का DNA भारतीय है। किसी के पूर्वज बाहर से नहीं आए थे। बाहर से तो केवल कुछ आक्रमणकारी आए थे। हुममे से किसी के पूर्वजों ने 200 साल पहले, किसी ने 500 साल पहले इस्लाम धर्म अपना लिया। जैसे इतिहास में किसी ने बुद्ध धर्म, किसी ने जैन धर्म और किसीने सिक्ख धर्म अपना लिया था। हमारा केवल मार्ग बदला है जाना तो उसी की ओर है। सभी रास्ते भगवान के पास जाते हैं।
भारतीय संस्कृति की छाप आज भी मुस्लिम के दिलो से नहीं निकली है. पहले मूर्तिपूजा करते थे तो आज मजारो पर भी सजदे करते हैं. पहले यात्राएं निकालते थे तो आज भी मोहर्रम के झूलुस निकालते है. ये दोनों गुण सबसे अधिक केवल भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम में पाए जाते है. दिल से सभी भारतीय है.
राम या रामराज्य?
हम तो दोनों राम को मानते हैं. एक साकार राम है और वो निराकार राम है. श्रीराम चन्द्र को आदर्श और मर्यादा पुरुषोत्तम मानते है। हम गर्व से कहते हैं की हम राम के प्रदेश/देश से है। राम पिता के कहने वनवास को चले गए थे, और हम पिता के कहने पर 14 दिन बकवास करना नहीं छोड़ सकते। जय श्री राम, राम नाम सत्य कहते है। श्लोक, चौपाई पढ़ते है। वो इमामे हिन्द है यानि भारत के राजा। हिन्दू राष्ट्र से भी बढ़कर राम राज्य चाहिए जंहा अन्याय, कष्ट, दुख, पीड़ा, गरीबी, भ्रष्टाचार न हो. क्योंकि धर्म का असली नाम हिन्दू नहीं सनातन है. रामराज्य तो त्रेतायुग में था और त्रेतायुग से पहले सत्ययुग था। इसीलिए हमें सतयुग चाहिए. जैसे हम पहले सतयुग,अखण्ड भारत, विश्वगुरु स्थान था, उन्हें ही ही वापिस पाने का हम प्रयास करते है।
विभीषण ने राम का नाम लिया राक्षस से देवता बन गए।
हनुमान ने राम का नाम लिया रामभक्त हनुमान बन गए।
वाल्मीकि ने राम का नाम लिया, महाऋषि तुलसीदास बन गया।
तुलसीदास ने राम का नाम लिया, महाकवि तुलसीदास बन गए।
गांधी ने राम का नाम लिया, महात्मा गांधी बन गए।
मुहम्मद साहब और कुरान पर आरोप?
हम मानते हैं कि मुहम्मद साहब ईश्वर अंतिम दूत थे तो पहला भी कोई होगा। पहले दूत आदम थे जिन्हें यंहा स्वयम्भू मनु कहा जाता है. उनकी पत्नी का नाम हव्वा था जिन्हें यंहा हव्य्वती/शतरूपा कहा जाता है. पहला संदेष्टा सबसे बड़े भूभाग यानी अखंड भारत में (श्रीलंका में एडम पीक और एडम ब्रिज, जन्हा पाँव के निशान है जो आदम, बुद्ध, शिव के माने जाते हैं) आखिरी संसार के मध्य में हुआ। इन पहले और अंतिम दूत के बीच मे भी कुछ होंगे। इनके बीच में एक दूत थे नुह जिन्हें यंहा मनु महाराज कहा जाता है. और भी कई अन्य दूत हुए हैं. ये सभी नाम और उनकी कथाएं यह बताती है की ईश्वर का धर्म तो शुरू से आज तक चलता आ रहा है और चलता रहेगा.
आज मुहम्मद साहब पर अनेकों आरोप लगाये जाते हैं. पर अगर वो गलत इन्सान होते तो उनके मानने वाले आज करोड़ों में न होते. इसी तरह आज श्रीराम जी पर भी शम्बूक की हत्या के आरोप लागाये जाते हैं, कुछ श्री राम पर वर्णवादी होने का आरोप लगाते हैं, कुछ लोग रावण को महात्मा साबित करके श्री राम को गलत सिद्ध करने में लगे हुए हैं. जबकि श्री राम ऐसे बिलकुल नहीं थे. स्पष्ट है कि लोग अपने हित अनुसार ऐसे दिव्यपुरुषों के चरित्र हनन करने की कोशिश करते हैं. मगर वो ऐसा करके आसमान पर थूकने की कोशिश करते हैं.
वेद और क़ुरान पढ़ कर देखिए। दोनों में मूल सन्देश सामान मिलेगा, दोनों के कई अर्थ समान मिलेंगे। कमियां ढूंढने वाले कुछ लोग क़ुरान में गलती निकाल देते हैं और कुछ लोग वेद में। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूर्त देखी तिन तैसी. जिसकी जैसी नियत होती है उसकी वैसी ही नियति होती है. इसलिए अच्छी नियत से इन ग्रंथों का अध्यनन करें, सत्य मार्ग मिलेगा.
अपने धर्म के ठेकेदारों की गड़बडी?
आज हम में हर चीज़ को लेके विभाजन बढ़ता जा रहा है। जाती में भी जातियाँ बढ़ती जा रही है। धर्म अनेकों बढ़ते जा रहे हैं। कितने देश बन चुके हैं। धर्म के नाम पर भी बहुत कुछ गलत हो रहा है। बहुत से लोग उससे फायदा उठा रहे हैं। हमने धर्म उनके हवाले कर दिया है। हमने धर्म के ठेकदार बना दिए हैं.
ईंट पत्थर की बनाई इबादतग़ाहे असल में हमारी है, उसकी नहीं। अगर इनकी वजह से मौतें होने लगे, दुश्मनीयां होने लगे तो कंही और बना लो.
हमने खुद धर्म को सही से समझा ही नहीं है। जिसे धारण किया जा सके वो धर्म है। गीता में स्वधर्म बताया गया है। क्या बलात्कार, हत्या, तीन तलाक, सती प्रथा आदि को स्वधर्म या धर्म कह सकते हैं, क्या इन्हें धारण कर सकते हैं,नहीं न? इसलिए जो मानवीय बात नहीं है वो धर्म ही नहीं है भले ही हमारे पंडित-मौलवी उसे धर्म का भाग बताते रहे. हर कार्य करने से पहले सोचिये क्या इस कार्य को देख कर ईश्वर प्रसन्न होगा, अगर मन से आवाज़ आये कि हाँ, तो यकीन मानिये यही धर्म है और इसे फ़ौरन कर डालिए. कोई देखें या देखें, उस ईश्वर को दिखाने की खातिर बुरे कार्यों से रुके और अच्छे काम करें.
हिन्दुओ को सन्देश क्यों ?
देखिये, इस काम के लिए हमें कोई तंखवाह नहीं मिलती है, उल्टा हम ही खुद इसके लिए दान करते हैं और समय निकाल कर आते हैं। हम यह काम क्यों कर रहे हैं, क्योंकि हम भारत को विश्वगुरु और इस युग को सतयुग बनाना चाहते हैं। सब चाहते हैं कि ऐसा हो जाये। मगर सभी प्रयास नहीं करते हैं, हम करते हैं. सब अपना एक तरीका बताते हैं। हम भी इसके लिए एक तरीका बताते हैं। हम सिर्फ प्रोब्लम बताने नहीं, बल्कि उसका सोलुशन भी बताने आए है। क्या आज तक कोई ऐसे अपना काम धाम छोड़ कर ऐसी बात करने आया, क्या आज तक आपके बीच आकार किसी ने सारी मानवता के एक माता पिता की संतान होने की बात करी हो या धर्म के मार्ग से ही समाज में सद्भाव लाने की बात करी हो. जबकि आज इंसानियत इंसानियत का नाम अलापने वाले ही सबसे अधिक इंसानों को बाँट रहे हैं और धर्म-मज़हब का नाम लेने वाले ही सबसे अधिक एक दुसरे के बीच नफरत फैला रहे हैं.
सतयुग लोगों के प्रयास से आएगा, हम सब को अपना स्वभाव बदलने से आएगा। क्या सिर्फ सनातन धर्म के लिए सतयुग आएगा। नहीं बल्कि सभी धर्म, मत, पंत मानने वालों के लिए आयेगा। भारत की धरती पर बहुत से सम्प्रदाय है जो एक दुसरे से बेहद भिन्न है मगर इनमें कुछ समानताएं भी है. असमानताओं पर पर बात करने लगे तो पुरे दिन में भी बात ख़त्म नहीं होगी। बाप-बेटे, भाई-भाई, पति-पत्नी में मतभेद हो जाते है। इंसानों में मतभेद या असमानता तो होती ही है। इसलिए असमानताओ पर नहीं बल्कि समानताओं पर बात की जाए। मतभेद हो मगर मनभेद न हो. देश के भले के लिए जब अंग्रेजों के सामने सभी लोग एक हो गए थे, तो अब क्यों नहीं हो सकते।
मुस्लिम को संदेश क्यों नहीं?
प्राचीन काल में यंहा सतयुग हुआ करता था. यंही से फिर से सतयुग वापिस आना है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ग्रंथों में बताया गया है कि सतयुग भारत से शुरू से होगा और भारत वासीयों द्वारा शुरू होगा। भारत वासियों में पोटेन्शल हैं। जिसमे क्षमता होती है ईश्वर उसे ही मौका देता है। यह क्षमता आज हिंदुओं में हैं, मुस्लिम में नहीं। सतयुग मुसलमान नहीं लाएंगे, सतयुग तो हिन्दू ही लायंगे. मगर सच्चे नेक मुसलमान आदि सभी इसमें साथ आयंगे.
मुस्लिम को लगता है सतयुग तो हिन्दुओ की कल्पना है। जबकि सतयुग की धारणा तो सभी धर्मों में मौजूद है और सतयुग सभी धर्म वालो के लिए हैं. इसलिए हमें आपसे आशा है, उनसे नहीं है। उन्हे तो दंड मिलेगा और आज मिल भी रहा है, कोई उन्हें पूछने को तैयार नहीं है। हम उन्हें भी समझाते हैं, उन्हे भी यही संदेश देते हैं,मगर उन्हें जल्दी से समझ नहीं आता। वो मौलाना, मौलवियों के चक्कर में पड़े हुए हैं कि जो वो कह देते हैं, वो उसे ही पकड़े रहते हैं। हिन्दू समाज दुनिया का सबसे उदारवादी और सबके अनुरूप ढल जाने वाला रहा है. हिन्दू और कट्टरता नदी के दो अलग अलग किनारे रहे हैं.
मुस्लिम के साथ एक्शन का रिएक्शन?
एक्शन का रीएक्शन हो रहा है, सही बात है। मगर ऐसे ही चलते रहे तो बात कंही भी जा कर नहीं रुकेगी। एक्शन का रीएक्शन होगा और फिर रीएक्शन का रीटैलियशन होगा। इसलिए इसका रुकना ज़रूरी है। जैसे अंधेरे को सिर्फ उजाला मिटा सकता है, उसी तरह बुराई को अच्छाई ही मिटा सकती है। उजाला करने के लिए टोर्च जलाई जाती है अन्धेरा करने के लिए नहीं.
इस्लाम की थ्योरी, प्रैक्टिकल अलग?
थीओरी और प्रेक्टिकल में अंतर होता है। यही अंतर तो कम करना है। यह अंतर तो हर जगह है, हर धर्म में पैदा हो चुका है, कंही कम कंही ज़्यादा। कंही एक प्रकार का है, कंही दूसरी प्रकार का। दोनों जगह काम करने की ज़रूरत है। अच्छे लोग हर धर्म में हैं और बुरे लोग भी हर धर्म में है, उन बुरे लोगों की वजह से उनका धर्म बुरा नहीं हो जाता. जिसकी जैसे बीमारी, उसका वैसा इलाज किया जाना चाहिए। हार्ट पेशंट को केंसर की दवाई नहीं दी जा सकती है और केन्सर पेशंट को हार्ट की। मुस्लिम समाज में सदियों से कट्टरता है तो आज अन्य समाजों में भी कट्टरता पाँव फैलाना शुरू कर चुकी है। इसलिए हुमें सबको एक जगह, एक पॉइंट पर, एक जड़ पर ले कर आना है।
कौन से गुरु, आश्रम से?
सभी गुरुओं के गुरु, उस परम महागुरु, ईश्वर से जोड़ने आये हैं, जिसके सभी भक्त है. ये दुनिया उसका आश्रम है. उसके और हमारे बीच में न कोई नहीं है, उससे हमारा सीधा सम्पर्क है. वो तो कहता है मेरे पास सीधा आओ. जैसे अगर कोई बच्चा अपने पिता या मां से न मांगे और पड़ोसी से कहलवाए कि मेरे माता पिता से कहो कि मुझे यह चाहिए तो उन्हें कितना बुरा लगेगा। वैसे ही ईश्वर से न मांगे, किसी और से मांगे तो ईश्वर को भी बुरा लगेगा. इसलिए सीधा ईश्वर से माँगों और सीधा उससे सम्पर्क बनाओ. ईश्वर को अपना सबसे बड़ा गुरु बनाओ.
देवी देवताओं को छोड़ दे?
सबसे ऊपर वो ईश्वर है। ईश्वर के अतरिक्त जिसे भी हम मान रहे हैं, वो कोई भी हो, ईश्वर के बराबर नहीं हो सकते. ईश्वर सबसे शक्तिशाली, संसार का अकेला स्वामी। तो फिर हम सीधा उसी के पास क्यों नहीं जाते। जैसे किसी घर में हम न्योता देने जाए और घर के मुखिया से न मिले, बल्कि किसी बच्चे या नौकर को कार्ड देके आ जाए तो मुखिया को बुरा नहीं लगेगा. वैसे ही ईश्वर से मिलने का, जुड़ने का प्रयास करे नहीं और बाकी सभी से मिलने का करते रहे तो ईश्वर को भी बुरा लगेगा. इसलिए पहले ईश्वर से जुडने की जरूरत है, वो तो हमारे सबसे निकट है, वो हमारे अंदर है, वो हमारे मन के भीतर है।
निम्न वर्ग को ही क्यों सुनाना?
इंसान जैसे जैसे अमीर होता चला जाता है, धर्म कर्म से दूर होता चला जाता है। गरीब आज भी ईश्वर धर्म, कर्म से जुड़ा हुआ है। अमीर नहीं जुड़ा हुआ. जैसे आप धर्म कर्म की बात करने के लिए इकट्ठे हो गए, कोठी, ऊँची बिल्डिंग वाले कभी ऐसे नीचे उतर के इक्कट्ठे नहीं होते. समाज में सुधार, बदलाव हमेशा नीचे से ही आता है, ऊपर से तो केवल तबाही, बर्बादी आती है.
[आईडी रीवील]
■ वंदेमातरम, जयश्रीराम, भारतमाता की जय, जयहिंद, जयभारत जैसे वाक्य.
■ डॉ हेडगेवार, गुरु गोवालकर, वीर सावरकर जैसे बड़े नाम.
■ हम वेदों उपनिषदों पुराणों का अध्यनन किया है और करते हैं। सबको समझाते है कि सनातन धर्म पर आये यानि ईश्वर के मूल प्राचीनतम धर्म पर. ईश्वरीय ग्रन्थ जैसे वेदो की ओर लौटने को कहते हैं. सनातन प्रथम धर्म, वेद प्रथम ग्रन्थ, संस्कृत प्रथम भाषा है, का प्रचार करते है।
■ सबसे पहले यंहा से ज्ञान, धर्म, मानवता की शुरवात हुई। प्रथम मानव यंहा आए थे, स्वयम्भू मनु, वैवस्वत मनु यंहा हुए हैं। कुछ इस्लामी रिवायतों में कहा गया है कि आदम आये थे यानी प्रथम मानव। भारत हमारी पूज्य/पुण्य, कर्म भूमि है।इस्लाम में भी भारत को दिव्य भूमि कहा गया है। मुसलमानो तक के ग्रंथों में कहा गया है की यंहा से स्वर्ग की खुशबू /ठंडी हवा आती है और अरब में स्त्रियों का नाम हिंदा रखा जाता था जिसका अर्थ होता है, सुंदर।
■ कई मुस्लिम शब्दों की यंहा संस्कृत से उत्पत्ति हुई जैसे आदम, नु, नमाज़, हिन्द। इन शब्दों को अच्छे से समझ लें.
■ हमेशा से ही हजारों सालों से विदेशी भारत की
धरती पर आते रहे हैं. यंहा सभी धर्मों के लोग इकठ्ठे हुए और आज भी हैं।यंहा आर्य,शक, कुशान, यवन, मुस्लमान, ईसाई, अँगरेज़/फ़्रांसिसी/पुर्तगाली/डच आये, कुछ चले गए, कुछ यहीं रुक गए जो यंही बस गए वो यंही के हो गए.
■ असल में जो सत्यवादी होगा, वही सतयुग लाएंगे भले ही वो किसी धर्म में पैदा हुआ हो. यही लोग सतयुग में नेतृत्व करंगे और जो हटधर्मी हैं, वो पीछे चलेंगे या बर्बाद हो जायंगे। मगर यह तब तक नहीं होगा जब तक हम अपने मूल ग्रंथों और मूल धर्म के निकट नहीं आयंगे जिसका मूल उदेश्य ईश्वर से जुड़ना है।
■ भारत वापिस विश्व गुरु बनना है। दुबारा अखण्ड भारत बनना है।विश्व को दुबारा ज्ञान देने के लिए भूले गए ज्ञान को सीखना पड़ेगा और उस पर क्रियान्वन करना पड़ेगा।इच्छा के बाद प्रयास किया जाता है। यह अध्यात्म के मार्ग पर चलकर ही संभव हो पायेगा क्योंकि पूरा विश्व अध्यात्मिकता से दूर हो चूका है. एक समय आएगा जब भारत से सब कहेंगे की हमें भी साथ ले लो, तुम ही विश्वगुरु हो।
■ मुस्लिम मूर्तिपूजा कभी नहीं करेंगे और हिन्दू अपनी संस्कृति कभी नहीं छोड़ेंगे. पर सब ईश्वर पर और अच्छे कर्मों पर एक हो जायँगे.
■ साष्टांग और सजदा, भक्ति, ज्ञान, कर्म, आदम, नुह की कथा, हज के अरकान
सनातन और कय्यिम, स्वधर्म और दीने फितरत, ब्रह्मसूत्र शब्द- एकम ब्रहम/एविदित्यम
अर्थ-एकं सद विप्रा/कूल हुव्वलाहू आदि
ऋग्वेद संगठन -संज्ञान सूत्र/ तआला इला कलिमतन/ सामानो मंत्र समिति: समानी समानम मन: सह चित्तमेषाम।समानं मंत्रमभि मंत्रये व: समानेन.
सुहुफे इब्राहिम, 4 वेद, आदिग्रंथों, जुबुर अव्वलीन. केवेल यंही के लोगों का दावा इशवाणी.
We believe in One God, One Dharma, One humanity.
[बुज़ुर्ग]
यंहा हमारे कुछ बड़े बुजुर्ग भी मौजूद हैं। वो कई ज़माने और पूरी दुनिया देख चुके है। वो अच्छी तरह जानते हैं कि पहले के समय में और अब के समय में कितना अंतर आ चुका है। हमारे अपने घरों के बड़े बुजुर्ग भी बताते हैं कि उनके समय में समाज में इतनी बुराई और बेशर्मी नहीं थी जितनी कि आज है। हम तो उनसे यही सुनते आए है की समाज को बदलने के लिए युवाओं को आगे आना होगा और किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगा। इसलिए वो तो हमसे यही कहते हैं की बेटे हम तो अपना जीवन जी चुके है, अब तुम्हारा समय है और तुम्हे ही कुछ करना होगा। जाओ घर से बाहर निकलो और समाज सुधार के काम मे लगो। हमारे बड़ों ने हमे फुल सपोर्ट किया और हमारे सरों पर अपना हाथ रखा। उन्ही के आदेश पर हम इस तरह जगह जगह जाकर समाज को बेहतर बनाने के काम मे लगे हुए है। अगर आपको लगता है कि हमारा काम से समाज को थोड़ा सा भी भला हो सकता है तो हमें आपका भी आशीर्वाद, ब्लेसिंग, मार्गदर्शन चाहिए ताकि इस काम को और आगे बढ़ा सकें। बस यही आपसे विनती है। हमारे बड़े कहते हैं बाहर तुम्हे बहुत से लोग सवाल करने वाले मिलेंगे, कहँगे कि जो तुम कर रहे हो, इससे कुछ नहीं होगा। मगर तुम घबराना नहीं। क्योंकि बाहर तुम हम जैसे बड़े बुज़रगों को भी पाओगे, जो तुम्हारी इस मुहिम को समझेंगे वो तुम्हे हौंसला और मार्गदर्शन देंगे। बड़प्पन सत्य बात को स्वीकारना है चाहे कोई छोटा ही यह बात कहे। छोटी से चींटी से एकजुटता से काम करना सीखा जा सकता है। छोटा बच्चा जब कोई अपनी उम्र से बड़ी बात कह देता है तो बड़े लोग खुश होते है, कहते हैं कितने अच्छे संस्कार है, उसे आशीर्वाद देते हैं, बेटा जीते रहो। इसी तरह आप हमारे बड़े हैं, हम आप के बच्चे हैं, हमारी बात भी अच्छी लगे तो आशीर्वाद देना (सतयुग कब आएगा पैराग्राफ का अंग)।
[जुवारि]
जीवन को लेकर अलग अलग दृष्टिकोण पाये जाते हैं। हर व्यक्ति अपनी स्तिथि और माहौल के हिसाब से जीवन को जज करता है। ज्ञानी लोग कहते है कि ये जीवन एक परीक्षा है, कभी सुख है और कभी दुख। जबकि खिलाड़ी लोग कहते हैं कि जीवन एक खेल है, कभी जीत है और कभी हार। जीवन में हार जीत का क्या महत्व है यह आप सब जानते हैं। दुनिया का कोई भी खेल हो, कोई भी खिलाड़ी नहीं चाहता कि वह हर जाए। इसलिए जीतने के लिए वो मेहनत करता है। आप भी एक तरह से खिलाड़ी हैं, (पुलिस के खतरों के बीच) अपना खेल खलते हो। मगर आपके खेल में भी एक बात बहुत महत्वपूर्ण है। वो है पत्ते अच्छे आना। पत्ते अच्छे हो तो अच्छी चालें चलते है क्योंकी आप जानते है कि आना वाला समय हमारे हित में निर्णय करेगा। बुरे पत्ते आते हैं तो चालें भी बेकार हो जाती है क्योंकि जानते है भविष्य में निर्णय हमारे विरुद्ध जायँगे और चाल उल्टी पड़ेगी। कहने का मतलब ये है कि एक पत्तेबाज़ आने वाले समय या भविष्य को देखते हुए ही पत्ते और चालें चलता है।
भविष्य को देखते हुए जीवन जीना ही ज़िंदादिल लोगों की निशानी है। भविष्य के लिए अभी से तैय्यार रहना ही एक असली इंसान की पहचान है। मगर ये नियम केवल जुवे या खेल तक सीमिति क्यों। जीवन तक ही सीमित क्यों, केवल इस दुनिया तक ही सीमित क्यों । अगर ये जीवन एक परीक्षा या खेल है तो इस दुनिया से जाने के बाद मिलने वाले जीवन की यानी परलोक के जीवन की तैयारी तो भी यंही करके जानी होगी। एक समझदार व्यापारी हर जगह केवल अपना फायदा देखता है और सिर्फ वही काम करता है जिससे उसका नुकसान न हो केवल फायदा हो। इसी तरह आप भी खेल के व्यापारी है आप भी ऐसे काम करिये जिनसे यंहा भी फायदा हो और मरने के बाद भी। यंहा तो खेल में एक बार जीत है और उसके बाद बार बार हार मिलती है। मगर अच्छे कर्म ऐसी चीज़ है जिनसे यंहा भी जीत है और उस ईश्वर के दरबार मे जाकर भी जीत ही जीत है।
स्टॉक मार्केट में शेयर के दाम कभी कम होते है कभी ऊंचे। कभी कभी फायदा होता है और अक्सर पैसे डूब जाते हैं। जुवे में भी अक्सर ऐसा हो होता है। इन्हें कुछ खेल बताते हैं। जो भी कहें मगर ये सत्य है कि दुनिया के अधिकतर पैसो के ऐसे खेल में फायदा कम और नुकसान ज़्यादा होता है। क्या मैं आपको एक ऐसा खेल बताऊं जिसमें कभी हार नही होती। वो है अच्छाई और बुराई के बीच जारी खेल। अगर आप अच्छाई के साथ है तो ये दुनिया आपको प्रणाम करेगी और परलोक में ईश्वर इसका फल देगा, सो अलग।
पत्तो की गड्डी में बादशाह और बेगम है। भले ही आप बादशाह हो अपने जीवन के और आपकी पत्नी आपकी बेगम। मगर तुरुप का इक्का केवल एक होता है। उसी तरह इस सृष्टि का इक्का भी केवल एक है और वो है ईश्वर। उसके आगे न किसी बादशाह की चलती हैं और न ही किसी बेगम की। अगर वो आप के साथ है तो आपको कोई नही हरा सकता। इस लोक से लेके उस लोक तक आपकी जीत ही जीत है।[शराबियों/ गरीब परिवारों/ महिलाओं/ वृद्धों/बुद्धिजीवी/इसाई ]
■ नशेबाजों को स्तिथि अनुसार शांत रखने की कोशिश।
■ BPL परिवारों को कुपोषण से बचने, बच्चों को शिक्षा या हुनर दिलवाने, मज़दूरों का आपना
खुदा का स्वास्थ्य सही रखने के लिए, भविष्य के लिए बचत करने,
अपने ज़रूरी कागज़ात बनवाने के लिए, जुवा शराब
छोड़ने के बारे में बातें कहें. ऊंच नीच, अमीर गरीब के अंतर पर अधिक जोर देना।
■ औरतों से महिला समबन्धित बातें जैसे दहेज़, घरेलु उत्पीडन, छेड़छाड़, पति की शराब, रैप, अपराध, एसिड अटैक आदि.
■ बुजुर्गों के
अनुभव को तोल कर बात करना, वृद्धाश्रम, बच्चों की बेरुखी, मनमानी आदि की बात करना. दुनिया से वृदाश्रम ख़तम होने की, बच्चो को बचपन से नैतिकिता की शिक्षा देने की बात करना।
■ बुद्धिजीवियों के सामने हवा हवाई बात या हलके उदहारण नहीं देना. प्रैक्टिकल बातें करना।
■ इसाई समझे लिए जाने पर स्पष्ट करना कि इसाई नहीं है. सनातन शब्द पर जोर देना. परमेश्वर या गॉड शब्द का इस्तेमाल कम करना. कहना कि कुछ ने ईश्वर को 3 में विभाजित कर दिया, एक गॉड , दूसरा होली स्पिरिट और तीसरा गॉड के बेटे यीशु मसीह में जबकि ईश्वर को शादी की, संतानों की जरूरत ही नहीं है, लोगों की बीमारियाँ भी किसी जंतर-मंत्र-तंत्र से ठीक नहीं होती है बल्कि उसका सही इलाज करने से होती है (आज के जारी माहौल में वो इस पर आपत्ति नहीं करेंगे क्योंकि वो भी दबाए गए हैं)।
[Amedkarites/Buddhist/Athiest]
■ Talk about Environment, Plantation, Pollution, Rain Harvesting etc and about our social works.
■ Focus on education, casteism, similarities, humanity.
■ Use Nature instead of God mostly, both while speaking on similarities. Talk much about Karma. They have rebirth concept but not of soul. Satyug is nothing but Golden Age or स्वर्ण युग. कलयुग की बजाए, कलयुगी और सतयुगी शब्द प्रयोग करना. Buddhism also have the concept of Kalpa (Kaal). Dhammin Buddhism is equivalent to Dharma. In Indian culture, Dharma is taken in two sense, one as personal duty and the other as religious ideology.
■ India was Vishvaguru at the time of Buddha and immediately after him, when people from all over the Asia came to learn. Biggest universities were here. Budhdha focused on Satya and Ahimsa. His era was a type of Satyuga.
■ Tell them they want all religious, irreligious, god fearing, and atheist to come and do something for the society and the masses and the country. That is why we use religions terms as well. Ambedkar emphasis on these in the Constitution.
■ Ask then what is bad about Samaj Sudhar, Samaj Behtar Banana, Acche Karma, Bure Karma Se Bachana.
■ धर्म ही जातिवाद को समाप्त करने का आधार है. धर्म समाज को दिशा देता है। विज्ञान समाज को सुविधा देता है। अध्यात्म समाज को पवित्रता देता है।
■ शरीर मांस और आत्मा का बना है. दोनों की अपनी ज़रूरतें है. भौतिक वस्तुओं से आत्मा को शांत नहीं किया जा सकता और अध्यात्म से शरीर की भूख को. मन, मस्तिष्क को शांति चाहिए होती है. वो केवल ध्यान और धर्म में है.
■ मनु कथा, १४ मनु, मनु उपाधि, विभिन्न नाम, मनुस्मृति वाले नहीं, ऋषियों की संतानें. 4 धर्मों के 90% लोग मान रहे है.
[People connected to or concerned with Cleaning]
स्वच्छता, पवित्रता, शुद्धि बेहद महत्वपूर्ण हैं. शुद्धि केवल बाहर की नहीं बल्कि भीतर की भी आवश्यक है यानि केवल वातावरण, शरीर की नहीं बल्कि मानसिकता की भी। बाहरी वातारण शुद्ध तो शरीर स्वस्थ्य रहता है और शरीर स्वस्थ्य रहे तो मन शुद्ध रहता है. स्वच्छता से सकारात्मक शक्तियों और गंदगी से नकारात्मक शक्तियों प्रभाव बढ़ता है. जंहा स्वच्छता, पवित्रता, शुद्धता होती है वंहा परमेश्वर का वास होता है। जैसे कुम्भ में स्नान से शरीर और आत्म की अशुद्धियां दूर हुई जिससे मोक्ष प्राप्तहोता है, ऐसा माना जाता है। यानी अपनी अशुद्धियों को दूर करके स्वर्ग का मार्ग का मार्ग प्रशस्त होता है. इसलिए मन शुद्ध तो सब शुद्ध। जंहा कैमरा होता है वंहा अक्सर स्वच्छता होती है.
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