{इन्हें अच्छे से परिभाषित कीजिये। इसमें पूरे भाषण का निचोड़ आ जाएगा।}
हमारा पूज्य - एक परमेश्वर:
हमारा गौरव - हिंदुस्तान:
{वतन से मुहब्बत को ईमान का हिस्सा कहा जाता है. ईमान का हो
या न हो मगर फितरत का हिस्सा ज़रूर है. तिरमीजी के हदीस है कि मक्का छोड़ने से पहले
आपने बेहद दुःख प्रकट किया था अपने वतन के लिए. इमाम ज़हबी ने लिखा है कि नबी को
अपने वतन से बहुत मोहब्बत थी. इमाम इब्ने हज़ार अस्कलानी ने फतह उल बारी में लिखा है कि नबी को अपने वतन के लिए बेहद
मुहब्बत और तड़प थी.}
{कुरान
कहता है हर हज़ार साल में अल्लाह का अम्र बदलता है और नया निजाम आता है. अखीरी बार
ऐसा 1500 कमरी साल पहले हुआ था जब नबी आये थे. अबु दावूद की हदीस में कहा गया है
की नबी की उम्मत को 500 साल की एक्स्टेंशन मिलेगी. सो कुल मिला कर ये 1500 साल 2026 में पुरे हो रहे है. यही युग परिवर्त है यानि सतयुग
आगमन जो कि दौरे जाहिलिया के बाद दौरे हक़ आना ही है।}
सतयुग जब शुरू होगा - भारत विश्वगुरु होगा:
करुणा के आधार पर, होगा भारत विश्वगुरु, सतयुग की राह पर, होगा भारत धर्मगुरु.
■ हमारा लोगो:
[ये चिन्ह एक पेड़ है। इस पेड़ की एक जड़ है। जड़ से पेड़ पनपा और उस पर अलग अलग फल/फूल लग गए। वैसे ही सभी ईश्वरीय धर्मों की जड़ एक है जिससे अलग अलग धर्म निकले हैं. जबकि एक पेड़ पर एक जैसे फल/फूल ही निकलते हैं. इसलिए हमें सभी को एक करने और सभी के लिए कार्य करने की कोशिश करनी है।]
हमारा उर्दू में नाम है: معتمرعالَمِایمانودانش (معاد)
[यह मन, मस्तिष्क को केन्द्रित, स्थिर करने में सहायता करता है और इससे थकान भी दूर होती है. असल में यह हम नहीं करवा सकते, ये तो आपको ही करना होगा। हम केवल मार्ग दिखा सकते हैं, चलना आपको स्वयं होगा.]
जैसे किसी जगह अंधेरे में अकेले निकलते हुए डर लगता है मगर कोई इंसान या बच्चा भी साथ हो तो डर कम हो जाता है, जबकि बच्चे का तो खूद ख्याल रखने की जरूरत होती है। उसी तरह वो जो सर्वशक्तिशाली है अगर उसके हमारे साथ होने का एहसास हो गया तो इस जीवन में से सारे भय, डर, शंकाएं दूर हो जायगी.
{पहले
ही ईश्वर पर बात करे लें ताकि ताकि लोग तैयार हो कि किससे जुड़ने जा रहे
है. इसके लिए पहले सही माहौल बनाए. ये करवाते हुए कुछ साथी आखें खोले
रखें और सब पर निगाह बनाए रखे। ये साफ सुथरी, खुली जगह में, समूह के लिए
और 10 मिनट के लिए बढ़िया है. सकारात्मकता बनायें रखे. किसी भी चीज का खंडन
करने की जरूरत नहीं। एकेश्वरवाद, परलोकवाद ज़्यादा रखे मगर गहराई में
न जाए. इसके माध्यम से Subconscious Mind तक मुख्य बात पहुचाएं. श्वास को
अनुलोम विलोम न कहें. स्वर्ग नरक की बजाय अनंत सुख, अनंत दुख, अनंत जीवन
जैसे शब्द इस्तेमाल करें. मंत्र प्रयोग न करें। उचित लगे तो थोड़े से मंत्र
रख सकते हैं। ॐ, गायत्री मंत्र आदि से शुरू कर सकते हैं। पहले थोड़ी देर
श्वास अभ्यास करवाएं और फिर ध्यान. ये संभव न हो तो सीधा प्रार्थना करवाएं
मगर प्रार्थना की शुरवात या अंत में थोड़ी देर मौन रहें या गहरी सांस दिलवाएं}
पूरी दुनिया में पोलूशन के कारण ऑक्सीजन कम हो गयी है. जितनी हमें ज़रूरत होती है, हम उससे कम ऑक्सीजन ले रहे हैं। फेंफडों को कम हवा की आदत पड़ गयी है इसलिए महसूस नहीं होता जबकि फेफड़ों को ज़्यादा हवा की ज़रूरत है.
कोरोना काल ने हमें बताया कि प्राकृतिक तौर पर फ्री मिलने वाली हवा कितनी कीमती है। तब सभी हवा के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर ढूंढते फिर रहे थे. ऑक्सीजन हज़ारो रुपये की बेची गयी। अगर हमारी हवा साफ सुथरी होती और हमारा फेफड़े शक्तिशाली होते तो कोरोना काल में इतनी मृत्यु न होती।
[यह श्वास के लिए आसन (मुद्रा) करने का सही समय और जगह नहीं. बहुत से यंहा नहीं कर पायंगे पर आप थोड़ी देर करके यंहा सीख सकते हैं. आइये इसलिय हम श्वास अभ्यास कर लेते है ताकि आप घरों पर जाकर रोज़ ये काम कर सके है और अपने शरीर निरोगी रख सके। हमारा शरीर स्वस्थ हो तो आधी बीमारियां तो वैसे ही दूर हो जायंगी.]
Deep Breathing से शरू करें. ऐसा 20 बार करें. कहें कि सोचो अंदर जाने वाली वायु से शुद्दी आ रही है और बाहर जाने वाली से भीतर की गंदगी बाहर जा रही है. वही है जो यह श्वास दे रहा है, जब रोक लेगा तो मृत्यु आ जाएगी।
■ ध्यान:
■ प्रार्थना/मौन:
सत्संग सुनने और समय देने के लिए धन्यवाद।
कुछ गलत कहने के लिए क्षमा अवश्य मांगिए।अंत में अगर उचित लगे तो किसी को ब्रोशर/पेंफ्लेट/लीफलेट/फ्लायर/कार्ड्स दे सकते है.
लोगो से हाथ मिलाये, गले मिले और विदा लें.
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ईजे बहविधैर्यज्ञैः स सुतभातृ बान्धवः ||
एक सर्वोत्तम राज्य प्राप्त कर के धर्मात्मा राम ने अपने पुत्रों और संबंधियों सहित कई प्रकार के यज्ञों द्वारा सर्वशक्तिमान को प्रसन्न किया।
(वाल्मीकि रामायण 6:128:98)
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं.
(रामचरितमानस 20:1)
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥
सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये । प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये; यही सनातन धर्म है।
(मनु० 4 : 138)
सत्यमेव जयते नानृतं।
सत्य की ही सदैव विजय होती है, असत्य की नहीं।
(मुण्डकोपनिषद् 3:1:6)
सत्यं ब्रह्म सनातनम अर्थात सदा रहने वाला परमेश्वर ही सत्य है।
(शांतिपर्व महाभारत 162.5)
सत्यं धर्मस्तपो योग अर्थात सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है और सत्य ही योग है।
(शांतिपर्व महाभारत 162.5)
सद्भाव: सत्यमुच्यते अर्थात सत्ता या वास्तविकता को ही सत्य कहते है।
(शांतिपर्व महाभारत 299.45)
यद्भूतहितमत्यंत तत् सत्यम् अर्थात जो वाक्य सभी प्राणियों के लिये अत्यंत हितकारी हो वही सत्य है।
(वनपर्व महाभारत 209.4)
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः।।
इस देश में जन्में ज्ञानियों से संसार के सभी मनुष्य चरित्र व आचरण सीखें।
(मनुस्मृति : 2 : 20)
भारत: जगद्गुरू आसीत तथा परमेश्वरस्य कृप्या अग्रे अपि भवेत एव।
भारत जगतगुरु था और परमेश्वर की कृपा से हम फिर होंगे।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
मन के हारे हार है। मन के जीते जीत।
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है। जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।
लोग कहते हैं कि ज़माना सब को बदल देता है, असल इंसान वो है, जो ज़माने को बदल देता है।
कौन कहता है कि आसमान में सूराख़ नहीं हो सकता। एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम..
[Prayer Mantra/Duwa]
फातिहा: सम्पूर्ण प्रशंसा केवल उस ईश्वर के लिए है जो इस सृष्टि का पालनहार है। जो अत्यंत दयावान और कृपा करने वाला है। जो उस दिन का स्वामी है जिस दिन हमारे लिए स्वर्ग और नर्क का निर्णय किया जायेगा। हे ईश्वर हम केवल तेरी उपासना करते हैं और तुझसे ही सहायता मांगते है। हमें सत्य का मार्ग दिखा और उस पर चला। वह मार्ग जिस पर चलकर लोगों की कल्याण हुआ। हमें उस मार्ग से बचा जिस पर लोग भटक जाते हैं कर अंधकार में चले जाते है, तेरा प्रकोप झेलते हैं।
अत्तहियात: प्रत्येक जीवन प्रदान करने वाली गुणों, कृपाओं और शुद्धियों का स्रोत ईश्वर है। ईशदूत पर शांति, कृपा और आशीर्वाद हो। हम सभी ईश्वर के भक्तगणों पर भी शांति हो। हम साक्षी है कि महामद ईशदूत हैं।
दरूद: हे ईश्वर कृपा कर और दया कर महामद और परिवार पर जैसे कि तूने पहले की अबराम पर और कुटुम्ब पर। निःसंदेह तू प्रशंसा के योग्य है और यशस्वी तेजस्वी है।
दुआ: हे ईश्वर हमें इहलोक और परलोक की सभी अच्छाई, भलाई और सुविधाएं प्रदान कर और नरकाग्नि से बचा।
क़ुनूत: हे ईश्वर, हम तुझसे सहायत चाहते हैं और क्षमा मांगते हैं। तुझे में विशवास करते हैं और तुझ पर ही निर्भर करते हैं। तेरी प्रशंसा करते हैं और तेरा आभार व्यक्त करते हैं। हम तुझे स्वीकारते हैं और उसकी संगति छोड़ते हैं जो तेरा निरादर करता हो। हम तेरी ही उपासना करते हैं और साष्टांग करते है। हम तेरी सेवा में सदैव तत्पर हैं। हम तेरी दया की आशा करते हैं और तेरे दंड से बचने को आश्रय चाहते है।
कुर्सी: ईश्वर के अतिरिक्त कोई प्रभू नहीं है। वह अमर है। उसे न निद्रा आती है और न ही ऊंघ। आकाश और पृथ्वी में सब उसी का है। उसकी अनुमति के बिना कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। वो दृश्य अदृश्य सबको देखता है। वो जिसे चाहे, वही ज्ञान पाता है। उसका शासन धरती और आकाश को घेरे हुए है जिनकी रक्षा उसके लिए तुच्छ कार्य है। वह उच्चतम और महानतम है।
सामानो मंत्र समिति: समानी। समानम मन: सह चित्तमेषाम।
समानं मंत्रमभि मंत्रये व: समानेम वो हविषा जुहोमि।
हम सब का मंत्र, स्तुतियां समान हों। हमारे मन और चित्त समान हो। मैं एक ही मंत्र से तुम सबको अभिमंत्रित करता हूँ। एक ही हवि से तुम्हारा हवन करता हूँ।
समानी प्रपा सहवोऽन्भागः।
तुम्हारा पीने का स्थान एक हो, तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ साथ हो। और मिलजुल कर उस प्रभु का पुजन करो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
हे ईश्वर, सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े!
ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप:...ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात हे परमेश्वर द्युलोक में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हों...ओ३म् शांति शांति शांति भव।
ॐ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो.
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