Friday, 3 May 2024

सतयुग आगमन (रीडिफाइंड सत्संग-भाग 1)



सतयुग आगमन - पुनः परिभाषित सत्संग 
  
1.  परिचय।
 
नमस्कार। वंदेश्वरम। आरम्भ करता हूँ उसके नाम से जो बहुत ही दयालु और कृपालु है। सबसे पहले मैं आपको अपना परिचय दे दूं। हम न तो राजनीतिक लोग है और न ही दान दक्षिणा लेते है। हम ….. नाम के एक NGO से है जो समाज सेवा का कार्य करती है। लगभग हर राज्य और ज़िले में हमारे स्वयंसेवक मौजूद है। हम अपने सदस्यों के दिये दान से ही सेवा या कार्य करते हैं। हम गरीबों को खाना, राशन, कपड़े, कंबल, दवाईया बांटना जैसे समाजसेवी कार्य करते हैं। हम गरीबों की तंगी, रोजगार, शिक्षा, बीमारी में भी सहायता करते हैं। हम वृदाश्रम, अनाथालयों, हेंडिकेपड (विकलांग) शेल्टर, महिला शेल्टर, रेन बसेरों में भी दौरे करके वंहा सेवाएँ देते हैं। हमारे बहुत सी जगह रोटी घर, जनता रसोई, फ्री लंगर, ट्यूशन सेंटर, {कोचिंग हेल्प}, ऑक्सिजन बैंक, सेवा घर जैसे कार्यक्रम भी चालू हैं। हमारी संस्था बहुत से अभियान जैसे ब्लड डोनेशन केंप, मेडिकल केंप, रोड सेफ्टी अवेरनेस, स्वछता अभियान भी चलाते है। साथी ही प्राक्रतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप आदि में भी जगह जगह सहायत मुहय्या करवाते हैं.
 
 
हम प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के संरक्षण, सुरक्षा के लिए भी कार्य करते हैं। प्लांटेशन ड्राइव (पेड़ लगाओ), नदियों की सफाई (नदी बचाओ), वातावरण (वायु) की स्वच्छता, जल संरक्षण, प्रदुषण रोकथाम {प्लास्टिक कम उपयोग करना} और खाने की बर्बादी न होने देने आदि कार्यों में भी योगदान देते हैं। हम भारत को स्वच्छ, आत्मनिर्भर बनाना चाहते है।
 
[हम कश्मीरी पंडितों रीहेबिलिटेशननो वार, नो टेरर, नो वायलेंस अभियान, शांति पदयात्रा जैसे नोबल कौज के लिए भी काम करते है। हम सभी धर्मों के त्योहारों और जयंतियों आदि पर जा कर लोगों की सेवा करते हैं। अंतर्धार्मिक मीटिंग/संवाद, गोष्टी, सम्मलेन भी रखते हैं ताकि लोग निकट आयें].
 
इनके साथ, हम समाज सुधार अभियान भी चलाते हैं. आज हमारा समाज शराब, नशा, जुआ, मिलावट, जातिगत भेदभाव (जातिवाद), दहेज़ प्रथा, स्त्री सूचक अपशब्द (गाली), घरेलू मारपीट, महिला उत्पीड़न, हिंसा, अपराध [और धन असमानता, अशिक्षा, कुपोषण, कन्याभ्रूण हत्या, बाल मज़दूरी, बाल विवाह] जैसी अनेकों बुराइयों से ग्रस्त है। आइये मिलकर समाज में फैली सभी बुराइयों के विरुद्ध मुहिम छेड़ें और लोगों को जागरूक करने का आह्वान करें। स्वयं सुधार से समाज सुधार की शुरवात करें। हमें एक सुनहरा भारत बनाना है . 
 
इनके अलावा, हम देश में आपसी एकता, समानता (भाईचारा/अपनापन/मेलजोल/एकजुटता) को बढ़ाने का भी काम करते है यानी समाज को अच्छा और बेहतर बनाने का। इसके लिए हम लोगों के बीच जाके उनसे बातचीत करते हैं और हम इसे सत्संग कहते है, सत्संग का अर्थ होता है सत्य की बात करना संग बैठ कर। इसके माध्यम से हम समाज को सदुगुनी, सत्यवादि और सत्यसमावेशी बनाने का काम करते है ताकि हमारे समाज से बुराइयाँ समाप्त हो कर अच्छाइयाँ पैदा होना शुरू हो जाये। इसे उद्देश्य को हम कहते हैं प्रोजेक्ट युग परिवर्तन यानि कलियुगी समाज को बदलकर सतयुगी समाज बनाना. हमारा उद्देश्य भारत को विश्वगुरु और अखण्ड भारत बनाना भी है। हमारे साथ इस प्रोजेक्ट पर बहुत से धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं काम कर रही हैं. 

ये सभी उद्देश्य कैसे प्राप्त होंगे, आइये जानते और समझते है?


2.  प्रस्तावना (युग परिचय/कलयुग/सतयुग/मॉडल)।

{भारत विश्व का एक प्राचीनतम देश है। हमारी सभ्यता व संस्कृति में 4 अंक या संख्या का बेहद महत्व है जैसे यंहा 4 आश्रम और 4 वेद {4 वर्ण भी} होते हैं इसी प्रकार 4 युग भी होते हैं सतयुग (या कृतयुग), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग (या कलयुग)। एक के बाद एक, ये युग यूँहीं बदलते रहते हैं। ये कालचक्र या समय का चक्र है जो ऐसे ही चलता रहता है। हम जानते हैं कि आज कलयुग चल रहा है जिसके बाद सतयुग आना है। कलयुग का अर्थ होता है कलि का युग अर्थात बुराई और पाप का युग। सतयुग का अर्थ होता है सत्य या अच्छाई का युग। ऐसा नहीं है कि कलयुग  में थोड़ी सी भी अच्छाई नहीं होती या सतयुग में थोड़ी सी भी बुराई नहीं होती। होतीं हैं परन्तु अपवाद स्वरूप नाममात्र की।}
 
{आज कलयुग में नैतिकता और चरित्र में भारी गिरावट आ गई है। अन्याय, अत्याचार, शोषण, जुर्म, भ्रष्टाचार, हिंसा समाज का अभिन्न अंग बन गए है। धोखा, बेईमानी, चोरी चारों ओर फैली है। जलन, स्वार्थ, लालच, बहुत बढ़ चूका है। लोग एक दूसरे की हानि, अहित करने में लगे रहते हैं। जात-पात, अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े में अंतर किया जाता है। लोगों में नफरतें, दूरियां, भेदभाव, मतभेद, मनमुटावव, लड़ाई/झगड़े बहुत बढ़ चुके हैं। जीवन दुःख, तनावभय से भरा हुआ है। धर्म, जाती, भाषा, क्षेत्र, नस्ल के आधार पर सब आपस में लड़ रहे है।}
 
 
 
आज घोर कलियगु चल रहा है। ऐसी कोई बुराई नहीं है जो आज हमारे समाज में न हो जैसे...  
 
[मनुष्य धन- संपत्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार है। इंसान का इंसान पर से भरोसा उठ चुका है। किसी को उधार दे दो तो वापिस नहीं आता है। मकान किराए पर दे दो मकान कब्जा हो जाता है। कंही समान रख दो तो दो मिनट में गायब हो जाता है। बच्चों को पार्क मे अकेला छोड़ दो तो किडनैप कर लेते है। लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं, छेड़छाड़/रैप आम बात है। बेटी की शादी में ज़िंदगी भर की जमापूंजी निचोड़ लेते हैं, आज भी दहेज के लिए हत्या तक हो जाती है।]
 
लोग एक दूसरे को कुचल कर आगे बढ़ना चाहते है। आज भला आदमी परेशान है और बुरा आदमी मौज कर रहा है। जानवर खाने की तलाश में मर जाता है और इंसान दौलत की तलाश में। इंसान की भूख कभी नहीं मिटती. किसी के पास इतना है कि उसके पास अपने पैसा का हिसाब ही नहीं है और किसी के पास इतना भी नहीं कि 2 वक्त की रोटी खा पाए क्योंकि व्यवस्था ऐसी बना चूकी है। अमीर और अमीर होता जा रहा है, ग़रीब और ग़रीब। सबसे ज्यादा मेहनत करने वाला मजदूर जितना पूरे साल में नहीं कमाता, उतना ये रील बनाने वाले थोड़ी सी मेहनत में एक दिन में कमा लेते हैं, क्योंकि आज दिखावे-अय्याशी, भोग-विलासता का ज़माना है.

और तो और मंदिर मस्जिद तक से चप्पलें चोरी हो जाती है. यंहा तक कि ज़रा सा एक्सिडेंट हो जाए लोग मरने- मारने को तैयार हो जाते है। लोग बिना गाली के एक वाक्य नहीं कह सकते, महिलाओं को गाली क्यों देते हो, उनका का क्या दोष है। जिन्होंने पाल पोस के बढ़ा किया, संतान उन्हीं बूढ़े मां- बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आती है। कोरोना काल में लोगों ने अपने सगे- संबंधियों की लाशों को हाथ लगाने से मना कर दिया। उनकी अर्थी को कांधा देने वाला और अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न था।
 
मरने के बाद, आत्मा निकलने के बाद कोई भी नाम से नहीं बुलाता। शव, शरीर, बॉडी नाम से बुलाते हैं। शमसान, कब्रिस्ताब में कर्मों की, परलोक की बात होती है, मुंह लटकाए शांत खड़े रहते हैं पर घर आते ही सब भूल जाते हैं और हंसने, ठहाके लगाने लगते है।
 
आपने वो भजन सुना होगा कि रामचंद्रकह गए सिया से ऐसा कलियुग आयेगा की हंस चुगेगा दाना भैय्या कव्वा मोती खाएगा। आज बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है। हमे इस कलियुगी समाज को बदलने की आवश्यकता है
 
 
 
जबकि इसके विपरीत या उलट सतयुग में हर वो भलाई होती है जिसे मनुष्य मन से चाहता है। हुमारी तो बहुत छोटी, मामूली जरूरतें हैं जैसे...  
 
[हम चाहते हैं कि हमें कोई भी दुकानदार महंगा सामान न बेचें.  हमें मिलावट वाला राशन न बेचें. हमारे अनाज में कंकड़ न मिले हो.  हमें सामान कम न तौल कर दें. सब्जिया नाले के पानी में धो कर न बेचे. दूध वाला दूध में पानी न मिलाएं. ऑटो वाला ज़्यादा किराया न मांगे. ठेकेदार हमारी तनख्वा में से अपनी कमीशन न काटे. हमसे कोई नाजायज़ रिश्वत न मांगे। लाइन में कोई लाइन काट कर हमसे आगे न लग जाएँ.]
 
आज एक अमीर और ताकतवर आदमी थाने से लेके अस्पताल तक हर विभाग में अपने सारे काम आसानी से करवा लेता है। पैसे, जुगाड़ या सेटिंग से उनके तो सारे काम हो जाते हैं. जबकि आम इंसान इधर उधर धक्के खाता रह जाता है. उसकी कोई पूछ और सुनवाई नहीं होती.  क्या आम आदमी नागरिक नहीं है? क्या गरीब इंसान नहीं होते? क्या हमें भी अच्छी ज़िन्दगी जीने का हक़ नहीं है? बिल्कुल है.
 
इसलिए हम चाहते है कि हर इंसान को बराबर समझा जाये, इज्ज़त दी जाये, समान सुविधाएं मिले. ऐसा सतयुगी समाज मे ही संभव है। सतयुग लाना ही हमारी सभी समस्याओं को समाधान है।
 
 
{सतयुग में समाज के आचरण में सच/सत्य, अच्छाई/भलाई होती है। करुणा, सद्भाव, उदारता, नैतिकता,  चरित्ता उच्चतम स्तर पर होती है। लोग ईमानदार, सभ्य होते हैं। जंहा चारों ओर समृद्धि, खुशहाली, सुख, शांति, संतोषचैन/सुकून होता है। लोग धर्म के मार्ग और उच्च सिद्धांतों पर चलने वाले होते है। कोई किसी का अधिकार नहीं मारता। लोग अपने कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों, नियमों और कानूनों का पालन करने वाले होते हैं। सतयुग में लोग एक पारदर्शी, तटस्थ, निष्पक्ष, नैतिकतावादि और न्यायपूर्ण व्यवस्था बना लेते हैं यानी ऐसी व्यवस्था जो नैतिक मूल्यों और न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित होती है। सतयुग में समाज सुरक्षित, पाप रहित, अपराध रहित होता है।}

{कलियुग और सतयुग पर आप अपने अनुसार जो चाहे बिंदु, उदाहरण आदि रख सकते हैं जो आम लोगों से जुड़े हुए हो।}



सत्यगु से आशय, वर्तमान सन्दर्भ या परिप्रेक्ष्य में सतयुग क्या है।
 
{हिन्दू धर्म के अलावा भिन्न-भिन्न धर्मों जैसे जैन (आरा/अरा/आरो; उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी), बौद्ध (कल्प), सिक्ख (अंधमयकाल), यहूदी (Sabbatical; Messianic Age or Olam HaBa), इसाई (Jubilee; Fallen World and Messianic Age or Second Coming), पारसी धर्म (Gumezishn and Frashokereti/Messianic Age) और इस्लाम धर्म (दौरे हक़, दौरे जाहिलिया) में भी ऐसी ही कुछ युग या काल संबन्धित मान्यताएं मिलती हैं। कुछ संस्कृतियों जैसे ग्रीक (यूनानी)नॉर्स माईथोलोजी और मेक्सिकन सभ्यता (ऐज़टेक, माया) में भी युग या काल संबन्धित मान्यताएं पाई गयी हैं
इन समय को हिन्दू धर्म के रामे राज्यम (रामायण में राम का राज्य अर्थात रामराज्य), सिक्ख धर्म के खालसा राज, ईसाइयत के किंगडम ऑफ गॉड, इस्लाम के हुकूमते इलाही, खिलाफ़त/रियासते मदीना जैसी कुछ शब्दावली के समानांतर रख कर समझा जा सकता है।}
 
 
{ऐतिहासिक और वैज्ञानिक आधार पर इनको धातु युगों आदि (मेटल ऐजेस - कॉपर, ब्रोंज़, आयरन ऐज़, क्लाइमेट शिफ्ट, Holocene Period, Neolithic Sub-Pluvial) से जोड़ कर देखा जाता रहा है। सतयुग को पुनर्जागरण काल (Renaissance) या स्वर्गयुग (Golden Age) और कलयुग को अंधयुग (Dark Age) जैसे शब्दों से भी समझा जा सकता है।}
 
[जब धरती पर बर्फ ही बर्फ थी तो उसे हिमयुग कहा गया। आज के आधुनिककाल को विज्ञानयुग या सूचनायुग कहा जाता है। इसी प्रकार जब सत्य से ओत-प्रोत समाज होगा तो उसे सतयुग कहेंगे। केवल इंसानियत में विश्वास करने वाले लोग इसे इंसानियत का युग भी कह सकते हैं.]
 
 
{स्वतंत्रता सैनानियों ने सत्याग्रह के माध्यम से सच्चा चरित्र दिखाया था जो की सतयुगी जीवन या चरित्र का एक उदाहरण था।}
 
[सच से ही समाज बनता है. जिस समाज का आधार झूठ हो वो कभी नहीं पनप सकता। सतयुग में सत्य होता है। इसलिए सत्य को अपनाएं बिना सतयुग नहीं आ सकता। सत्य एक होता है, असत्य अनेकवास्तविकता को सत्य कहते है। वास्तविकता को ज्यों का त्यों अपनाना ही सत्य को अपनाना है। जो समाज के सम्पूर्ण अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उचित है, उसे अपनाना सबसे आवश्यक है। जिसका जो कर्तव्य है, वो निभाना और जिसका जो अधिकार है, वह उसको देना ही समाज के अस्तित्व को बचाना है।]
 
{ऐसा सतयुगी समाज तब बनता है जब किसी क्षेत्र के निवासी एक नैतिकतावादी, न्यायोचित व्यवस्था बनाने का दृढ़ निश्चय करते हैं जिससे ऐसी शिक्षातंत्र बन जाता है कि नागरिक स्वयं ही शुरू से नियम, कानून, कर्तव्य, उत्तरदायित्वों का पालन करने लगते है और इसके साथ ही प्रशासन इतना निष्पक्ष, पारदर्शी बन जाता है कि उल्लंघन करने वालो को किसी भी हाल में नहीं छोड़ा जाता।} 
 
 
इस प्रकार, कर्तव्य पालन, अधिकार संरक्षण से ही सतयुगी समाज की नींव पड़ती है। यानि जंहा अव्वल तो कोई आदमी खुद ही गलत काम न करें और अगर कोई कर दें तो उसे उचित दंड मिले भले ही वो कितना भी बड़ा/ऊँचा आदमी क्यों न हो. यही सतयुगी समाज का आधार/मॉडल है।
 
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम देखते हैं कि इसी आधार पर बहुत से अतिविकसित देशों जैसे जापान, फ़िनलैंड, युएई आदि ने अपने समाज इतने बेहतर बना लिए हैं कि वंहा लिविंग स्टैंडर्ड व हैपिनेस इंडेक्स बहुत ऊंचे हैं और क्राइम करप्शन बहुत कम। ऐसे सिस्टम एक प्रकार से सतयुगी समाज के लघु और सीमीत मॉडल हैं। परंतु ये क्षेत्रीय मॉडल दोषमुक्त और विस्तारवादी नहीं होते। क्योंकि न तो इनके नैतिकमूल्य सर्वमान्य होते हैं क्योंकि इनमें अक्सर जुवे, नशे, नग्नता, व्यभिचार, बुजुर्गों के प्रति असम्मान जैसी बुराईयों को नैतिक मान्यता मिली होती है और न ही इनका फैलाव विश्वव्यापक होता है क्योंकि ये विश्व के हर कोने तक नहीं पहुँच पाते। इसलिए वास्तविक सतयुग वह होगा जब कोई सुधार अभियान निपुण (परफेक्ट) और वैश्विक (ग्लोबल) (सर्वव्यापक/सार्वभौमिक/विश्वव्यापी) होगा
 
 
3.  भारत की भूमिका (विश्वगुरु और अखंड भारत)।

नियति अनुसार वास्तविक सतयुग की शुरुवात उसी धरती से होनी है जहां से मानवता, ज्ञान, धर्म की शुरुवात हुई थी और वह धरती भारत की पवित्र व पूण्य भूमि है।
 
 
इसके बाद भारत ही विश्व का मार्गदर्शन, नेतृत्व करेगा और दुबारा विश्वगुरु कहलाया जाएगा। आज विश्व में ऐसे ही पद पर अमेरिका विराजमान है। मगर वह वास्तव में विश्वगुरु नहीं है क्योंकि वह शक्ति प्रदर्शन करता है. इतिहास बताता है कि शक्ति या नफरत से दुनिया जीतने वालों को लोग इज्जत नहीं देते चाहे सिकंदर हो, चंगेज़ खान, नेपोलियन, हिटलर। मगर प्रेम से दुनिया जो जीतने वालों को हर कोई इज्जत देता है और याद करता है जैसे गाँधी, मंडेला। खून खराबे से राज करने वाले अशोक को भी लोगों ने तब याद रखा जब वो शांति के मार्ग पर आया। डाकू अंगुलिमाल ने जब बुद्ध के कहने पर हिंसा का मार्ग छोड़ा तब जा कर उसका नाम लोगों के लिए अमर हुआ.

इसलिए असल विश्वगुरु वह होगा जो अध्यात्मिक रूप से भी गुरु होगा और अध्यात्म आएगा ध्यान से। भारत को सब गुरु मान लें यह केवल ज्ञान से हो पायेगा और ध्यान अध्यात्म का एक भाग है। असल शक्ति हथियारों से नहीं बल्कि धर्म, नैतिकता से होती है. भविष्य में अध्यात्म व ज्ञान के क्षेत्रों में भारतियों को नेत्तृत्व करना है. जैसे भारत ने UNO द्वारा विश्व योग दिवस घोषित करवाया था. गुरु उसे कहते हैं जिससे कुछ सीखा जा सके, शिक्षा ली जा सके. आज भी जब हमें कोई ज्ञानी व्यक्ति मिलता है तो हम अपने आप उसे गुरु कह देते हैं.
 
विश्वगुरु का अर्थ है विश्व का स्वामी या गुरु प्राचीन काल में विदेशों से लोग शिक्षा लेने भारत आत थे क्योंकि तब हमारे पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ होता था. इसलिए जब हम फिर से अपने समाज, राष्ट्र को सर्वश्रेष्ट बन लेंगे तो पूरा विश्व हमें गुरु मान लेगा. जैसे सबसे काबिल लड़के को क्लास का मॉनिटर बनाया जाता है. हम नहीं बल्कि दुसरे खुद कहंगे कि तुम हो विश्वगुरु और हमें भी साथ ले लो.

फिर भारत ही विश्व की सबसे बड़ी सुपरपावर बन के उभरेगा और सभी देश हमारे पीछे चलगें जैसे आज अमेरिका के पीछे चलते हैं। इतिहास साक्षी है कि कुछ दशकों या शताब्दी में विश्वसत्ता पलटना कोई नयी बात नहीं है। जैसे कभी ब्रीटेन, रशिया विश्वसत्ता थी, आज यूएस है। कल को हम भी हो सकते हैं क्योंकि हमारा पोटेंशल सबसे ज़्यादा है क्योंकि सर्वाधिक युवा आबादी हमारे पास है, विश्व की शीर्ष कम्पनियां भारतीय चला रहे हैं, विदेशों में हर क्षेत्र में भारतीय टॉप पर हैं. बड़े बड़े पेशेवर जैसे साइंटिस्ट, डॉक्टर, इन्जीनियरिंग भारतीय हैं. भारत विश्व की सबसे बड़ी इकॉनमी बनने की रेस में शामिल है. वैसे चाइना भी इस दौड़ में है. जब हम खुद को वापिस उन्नत और उत्कृष्ट देश बना लेंगे तो फिर से सोने की चिड़िया भी कहलाए जायंगे जिन्हे आज डेवेलपड/फर्स्टवर्ल्ड/वेल्दिह नेशन कहते हैं। जैसे मध्यकाल में या अंग्रेजों के आने से पहले भारत विश्व की सबसे बड़ी जीडीपी हुआ करता था। 
 
 
फिर तब प्रेम और मानवता के आधार पर दुबारा अखंड भारत भी बनेगा। जैसे दो टुकड़ों में विभाजित जर्मनी 1990 वापिस जुड़ कर एक हो गया था या जैसे 1975 में सिक्किम जनमत संग्रह के द्वारा भारत से जुड़ गया था। आज भी नेपाल हमारे साथ ऐसे ही जुड़ा हुआ है। [इस बारे में European Union या UAE, US, UK जैसे उदाहरण भी हमारे सामने उपलब्ध है। इसी के लिए पूर्व चीफ जस्टिस मार्केंडेय काटजू भी IRA-इंडियन रयूनिफिकेशन एशोसिएशन नामक अभियान चलाते है और उन्हें समर्थन मिल रहा है।] जब हम संसार के लिए लाभदायक, गुणकारी बन जायेंगे तो हर कोई हमसे जुड़ना चाहेगा जैसे आज सभी अमीर, ताकतवर देशों से जुड़ना चाहते है।  
 
{महाभारत में भारत शब्द भरत के लिए, भारत देश के लिए और पूरे विश्व के लिए भी प्रयोग हुआ है। प्राचीन काल में धरती के आधे से भी अधिक भूभाग को अर्थात आबादी वाले भाग को भारत कहा जाता था।

पहले भारत की बहुत दूर तक सीमा होती थी। ईरान से लेके जापान तक और रूस से  इंडोनेशिया तक। फिर धीरे धीरे भारत के टुकड़े होते गए और बहुत से देश बनते गए
 
{इसमें थाइलेंड, कोम्बोडिया, विएतनाम, मलेशिया सब सम्मिलित थे। कुछ समय बाद भारत केवल अफ़ग़ानिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान, बर्मा तक ही सिमट कर रह गया। इसके बाद भारत विभाजित होते होते भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित रह गयाअंत में केवल आज के भारत की भूमि ही हमारे पास रह गयी।}
 
 
कोई कहता मुसलमानों ने टुकड़े कर दिए, कोई कहता है हिंदुओं ने और कोई कहता है अंग्रेजों ने। मगर ये विभाजन तो हजारों सालों से होते आ रहे हैं, जब न मुस्लिम थे और न अंग्रेज। ये हमने भी नहीं किए थे। ये विभाजन मुस्लिम या हिन्दू या अंग्रेज़ नहीं करवाते। वो नहीं करवा सकते। तो फिर ये विभाजन किसने किए थे। ये विभाजन स्वार्थ और नफरत ने करवाए थे।  विभाजन स्वार्थ, नफरत ही करवाती है.
{भारत के टूटने का कारण धर्म नहीं बल्कि नफरत है, यह समझाना है}
 
घर- परिवार भी इसी कारण से टूटते हैं। कोई भाई अपना हिस्सा लेके अलग हो जाता है या एक ही घर में दीवारे खड़ी हो जाती हैं। मगर जब स्वार्थ और नफरत समाप्त हो जाती है तो उसी दीवार में खिड़की भी खुलती है और फिर एक दिन वो दीवार भी टूटती है। ऐसे ही आज अगर आपसी प्रेम वापिस आ जाए तो हम से टूटे हुए सभी देश वापिस जुड़ जायंगे। हमें विश्वास है एक दिन आएगा जब ये सारे खंड वापिस अखंड हो जाएंगे। 
 
मगर पहले अपने घरों को अखंड करना है। हमारे घरों में सास-बहु के झगड़े हैं, ननद-बहु के हैं, जेठानी-देवरानी के हैं और तो और बेटी-दामाद के अपने घर में झड़गे हैं। हमें विश्वास है, ये झगड़े केवल प्रेम से ही खतम हो सकते हैं, नफरत से तो और बढ़ेंगे
 
{इन्सान के प्रेम से ही इच्छित संतान पैदा होती है। प्रेम है तो सब कुछ है. प्रेम से कुछ भी किया जा सकता है. प्रेम सबसे ताकतवर शस्त्र है.}
 
{क्या आप जानते है पहले भारत को आर्यावर्त क्यों कहा जाता था। क्योंकि आर्य गुणवान और सज्जन व्यक्तियों को कहते थे। ये देश ऐसी ही चरित्रवान लोगो का था तो इसे आर्यावर्त कहते थे। 
सतयुग रूपी ऐसा ही एक कल्याणकारी रामराज्य अर्थात श्रीराम का राज्य था। जब जनता बहुत ही सुखी और समृद्ध थी। रामराज्य में न दुख था और न कष्ट। ऐसा इसलिए था क्योंकि श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वह सर्वश्रेष्ट राजा और मनुष्य थेयही असल रामराज्य होगा जंहा लोग धर्म, मर्यादाओ का पालन करने वाले होंगे यानि न्यायप्रिय राज होगा। 
ऐसा माना जाता है कि विश्व नरेश और जगतगुरु जैस शब्द ग्रन्थों से ही लिए गए हैं।  इस्लामी परंपरा अनुसार इसे इमामे आलम कहा जायगा।  
स्मृति शस्त्रों में हमारे श्रेष्ट लोगों से चरित्र और आचरण सीखने की बात कही गयी है। 
स्वामी विवेकानंदरबिन्द्रनाथ टैगोर, श्री अरबिंदो, बाबा जयगुरुदेव, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महर्षि महेश योगी जैसे विद्वानों ने भारत के लिए विश्वगुरु शब्द का प्रयोग किया है।
बाल गंगाधर तिलक, विनोदा भावे, स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे विद्वान भी भारत को वापिस विश्वगुरु बनाने के प्रबल समर्थक थे।}
 
 

4.  सतयुग कब आयेगा, क्यों आयेगा, कौन लाएगा, कैसे आएगा?

संशयों व संदेहों का समाधान। 
 
 
{एक प्रश्न उठता है कि सतयुग आगमन में तो अभी लाखों वर्ष बाकी हैं। सामान्यतः युगों को लाखों वर्षों की अवधि माना जाता हैं जबकि तर्कशील विद्वानगण पुराणों में आये इस प्रकार के युगों की कालावधि को अलंकारिक, कल्पित वर्णन मानते हैं। दूसरी ओर बहुत से ज्योतिषों और खगोलशास्त्रियों का मत है कि ये पौराणिक युगकाल गणनाएं मात्र पृथ्वी की चाल पर नहीं बल्कि सम्पूर्ण सौरमंडल के ग्रहों, नक्षत्रों आदि की चाल पर आधारित हैं इसलिए मानवजाति के लिए युगकाल लाखों वर्षो का नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, कुछ विद्वानों ने युगों को क्रमिक काल या लगातार आने वाले समय अवधि भी माना है जो मानव के कार्यों से प्रभावित होकर बदल जाते हैं, न कि नक्षत्रों की चाल से.  इस प्रकार विभिन्न विद्वानों के शोधों, गणनाओं के आधार पर युगों का काल हजारों वर्ष भी सिद्ध किया जाता रहा है। पौराणिक युगकाल अवधि को जस के तस लेने पर यह अतार्किक व पहेली लगती है।}
 
{महाभारत के शांतिपर्व में तो कई अवसरों पर परिस्तिथि को युग शब्द से संबोधित किया गया है. इसके अलावा ग्रन्थों में क्षण भर को भी युग कहा गया हैं और 5 वर्ष से लेके 100 वर्ष तक को भी युग कहा गया है। प्रारम्भिक ग्रंथों जैसे महाभारत, मनुस्मृति के मूलपाठों में युग काल हजारों वर्षों का बताया गया था जो कि बाद में निर्मित ग्रंथों जैसे पुराणों में अलग गणनाओं के आधार पर लाखों वर्षों का हो गया। मनुस्मृति, महाभारत, रामायण, पुराणों आदि में बहुत से मनुष्यों और पात्रों की बताई गयी आयु में लाखों, हजारो वर्षों का अंतर है।  इसका अर्थ यही है कि ग्रन्थों में ही युगकाल की धारणाओं में स्पष्ट मतभेद हैं.}
 
{बाल गंगाधार तिलक, यूक्तेश्वर गिरि, परमहंस योगानन्द, श्रीराम शर्मा आचार्य, बाबा लेखराम कृपलानी, सद्गुरु वासुदेव, तुलसीदास बाबा जयगुरुदेव, बापूजी दशरथ भाई पटेल जैसे कई प्रसिद्द विद्वानों ने युगकाल की अवधि हजारों वर्षों की मानी है। इतिहास से ज्ञात होता है कि आर्यभट्ट ने चारों युगों को समान वर्षकालिक माना है। युक्तेश्वर गिरी, परमहंस योगानंद, सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इन युगों का क्रम बढ़ते-ढलते हुए क्रम में भी माना है। श्री अरबिंदो घोष और स्वामी विवेकानंद (इनकी युगों पर सहमति-असहमति दोनों मिलती हैं।) ने सतयुग आगमन को विशेष घटनाओं के साथ जोड़ कर देखा है। दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन,  देवदत्त पटनायक, आचार्य प्रशांत ने युगों के विभाजन और प्रकृति पर असहमति भी जाताई हैं।}
 
 
साधारण शब्दों में कहे तो युग की काल अवधि संदर्भ अनुसार कुछ भी हो सकती है। इसलिए अमुक वर्षो बीतने के पर ही सतयुग आगमन होगा, ऐसा नहीं है।
 
 
{एक अन्य प्रश्न उठता है कि बिना कल्कि अवतार के आगमन के कलयुग  का अंत कैसे हो सकता है? वास्तवमें कुछ पुराण व कवि, कल्कि के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं और मानते हैकि ये घटना हो चुकी है। इसका भी उल्लेख मिलता है कि उनका जन्म कलियुग केचरमोत्कर्ष पर हो चुका है। कल्कि के विवरण इंगित करते हैं कि वह प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में रहे होंगे।कल्कि की विशेषताएँ, ऐतिहासिक सन्दर्भ और विभिन्न तथ्य यही संकेत देते हैं कि ये घटना हो चुकी है। कल्कि द्वारा घोड़े की सवारी, तलवार का प्रयोग और उनका योद्धा होना आदि जैसे लक्षण, उन्हें आधुनिक काल से पहले का ही व्यक्ति सिद्ध करते हैं। इतिहासकार ऐसे एक- दो ऐतिहासिक व्यक्तियों की ओर संकेत भी करते है जो कल्कि हो सकते हैं।  विद्वानों का ये भी अनुमान है कि पुराण काल में हुए अनेकों बाहरी आक्रमणों से मुक्ति की तीव्र मनोकामना और भारत के संपर्क में आई भावी मसीहा में आस्था रखने वाली कई विदेशी मान्यताओं के प्रभाव में कल्कि अवतार की अवधारणा जन्मी थी।  क्योंकि पुराणों के निर्माण काल के समय हुन, मंगोल आदि भारत पर आक्रमण कर रहे थे और इससे त्रस्त लोगों में ये अवधारणा जन्मी की उनका भी कोई रक्षक आएगा जो उन्हें इनसे मुक्ति दिलवाएगा। साथ ही भारत के नए संपर्क में आये मुस्लिम, ईसाई और यहूदी लोगों के मसीहा आने के मत से प्रभावित होकर भी ये धारणा जन्म ली हुई हो सकती है। इसके साथ ही बोद्ध धर्म में भी भावी बुद्ध आने की की धारणा पहले ही भारतीय समाज में अस्तित्व में थी। इसलिए या तो कल्कि आगमन हो चुका है या ये कल्कि अवधारणा एक बाहरी प्रभाव ही है। इस पर आचार्य प्रशांत का भी यही मत है.
असत्य, अधर्म और पाप बढ़ने पर अवतार आते हैं। अर्थात जब पाप कम होंगे तो अवतार कम आने चाहिए थे और जब पाप अधिक होंगे तो अवतार अधिक आने चाहिए। परंतु इसका उल्टा हुआ है।  सतयुग में 4 अवतार हुए हैं, त्रेतायुग में 3 और द्वापरयुग में 2 अवतार।  जबकि कलयुग में 1 अवतार आने की धारणा है।  इससे यही ज्ञात होता है कि या तो युगकाल धारणा में कोई त्रुटि है या फिर अवतारवाद की धारणा में}
 
आसान शब्दों में कहें तो जिस प्रकार कलयुग लाने के लिए कोई राक्षस धरती पर नहीं आया था, उसी प्रकार, सतयुग लाने के लिए भी कोई देवता धरती पर नहीं आएंगे।
 
इसलिए कलियगु के लाखों वर्षो बीतने के बाद और कल्कि अवतार के आने के बाद ही सतयुग का आरंभ होगा जैसी मान्यताओं पर सतयुग आगमन निर्भर नहीं करता है। हम मनुष्यों के प्रयत्नों, प्रयासों पर नए युग का आगमन निर्भर करता है।
 

सतयुग कब आयेगा। 
 
 
भले ही अभी आपको ये असंभव सा लगे पर सतयुग शीघ्र आ सकता है। जब कोई चीज़ अपने चरम पर पहुँच जाती है तभी उसका अंत होता है। आज बुराई सारी सीमाएं पार करके चरम पर पहुँच चुकी है इसलिए अब इसका अंत होना है और अच्छाई का जन्म होना है जैसे हर रात के बाद सवेरा आता है। जैसे पहाड़ पर चढ़ने के बाद नीचे उतरना ही पड़ता हैं, उससे ऊपर जाने का रास्ता ही नहीं होता। प्रकृति नियमनुसार माँ की असहनीय प्रसव पीड़ा के बाद शिशु जन्म लेता है। इसलिए इस घोर कलयुग  से अब सतयुग दूर नहीं है। पहले लोगों को लगता था कि आज़ादी पाना असंभव है, परन्तु स्वतंत्रता सेनानियों के विश्वास ने आज़ादी लेके दिखाई। इसी प्रकार सतयुग एक क्रांति है और हम क्रांतिवीर। सतयुग लाने के लिए पहल करने वाले वालों का भविष्य में समाज सुधारकों के रूप में सम्मान होगा। सतयुग आगमन में कोई बाधा न डालते हुए, हमें इसमें योगदान देना चाहिए क्योंकि सतयुग तो आके रहेगा, चाहे जो हो। किसी के सुबह तक सोते रहने के कारण सूरज निकलना बंद नहीं कर देता। आपके जाने के बाद लोग आप का नाम याद रखें इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी क्योंकि केवल 1% लोगों को दुनिया याद रख पाती है।
 
{किसी एरिया में स्कूल बनने के लिए सरकार ने सारी अनुमति दे दी है पर एरिया वाले कहते है कि हमें स्कूल नहीं हमें तो जुवाघर या सिनेमा हॉल चाहिए और वो स्कूल बनने से सरकार, पुलिस को रोकने लगे। तो क्या होगा, अंत में ये होगा कि एरिया वाले जेल जायँगे और स्कूल भी बनके रहेगा। उसी प्रकार सतयुग आके रहेगा। किसी की रात से सुबह तक सोते रहने से सूरज निकलना बंद नहीं होता।}
 
बहुत से गुरुओं और सम्प्रदायों के अनुसार सतयुग बस चंद वर्षों में आरम्भ होने वाला है।
 
{गायत्री परिवार (संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा) 2000 के बाद कभी भी और ब्रह्माकुमारी समाज (संस्थापक ब्रह्मा बाबालेखराम कृपलानी) 2036 तक सतयुग आरंभ होने की बात कह रहे हैं। जबकि ईशा फाउंडेशन (संस्थापक जग्गी वासुदेव) 2082 में युग परिवर्तन की बात कर रहा है (हालांकि यह मानते है कि ये द्वापर युग चल रहा है जिसके बाद त्रेता युग आएगा -उल्टे क्रमनुसार)
तुलसीदास बाबा जयगुरुदेव, बापूजी दशरथभाई पटेल (परमशांति), भविष्यमालिका पुराण ग्रन्थ (संत अच्युतानन्द) आदि ने भी शीघ्र सतयुग आगमन की बात कही है। पूर्व RSS सरसंघ चालक एस. सुदर्शन ने लगभग  2011 से युग परिवर्तन के बाद सतयुग आरंभ होने की और भारत के स्वर्णकाल शुरू होने की बात कही थी.
पूरी शंकराचार्य, देवकीनंदन ठाकुर, संत रामपाल, सद्गुरु जग्गी वासुदेव आदि भी शीघ्र होने वाले बड़े परिवर्तन की ओर इशारा कर रहें है
कुछ जैनी, मुस्लिम, इसाई विद्वान भी भावी बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं.}

इनके अलावा अनेकों विद्वान, विचारक, ज्योतिष बेहद जल्द आने वाले युग परिवर्तन की बात कर रहे हैं।  बल्कि अब तो 2025-26 तक सतयुग आरम्भ होने की बात कही जा रही है। इस समय को संगम/संधि समय तक कहा जा रहा है, जब दो युगों का मिलन हो रहा है। 

सतयुग लाने के लिए बहुत से धार्मिक संगठन और सामाजिक संस्थाएँ प्रयासरत हैं। 
{जैसे CRDG फाउंडेशन, GAIA सोसाइटी और ऊपर बताए गए संस्थान}। 



सतयुग की आवश्यकता क्यों है?

 
आम तौर पर हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी की परम्परा आगे बढ़ाती है. अक्सर अगर पिछली पीढ़ी अच्छा काम करके गयी तो अगली पीढ़ी भी अच्छा निकलती है और पिछली पीढ़ी बुरा करके गयी तो अगली भी बुरा निकलती है. हम सब अपने आस पास देखते हैं कि अगर कोई बाप झूठ बोलता तो उसे देख कर उसका बच्चा भी झूठ बोलने लगता है और बाप फिर बेटे पर गुस्सा करता है कि उसने झूठ बोलना ज़रूर बाहर से सीखा होगा. इसलिए हमें अपनी आने वाली नस्ल के लिए एक अच्छा आदर्श बनना है. 
 
हमें सतयुग लाने की आवश्यकता इसलिए भी है कि हम अपने बच्चों को बेहतर जीवन देके जाना चाहते है अन्यथा उन्हें भी वही बुराइयां झेलनी पड़ेगी जो हम झेल रहे है। जैसे आज हम उनके लिए पानी और पेड़ बचाते हैं, जैसे ज़मीन और जायदात छोड़के जाते हैं। उसी तरह हमें उनके लिए समाज को बचाना होगा। वरना कल वो भी यही बुराइयाँ झेलेंगे और हमें ही दोष देंगे कि आपने हमारे भविष्य के लिए क्या किया। सब कुछ करने के बाद भी बच्चें तो आज भी कह देते हैं कि आपने हमारे लिए क्या किया? और अगर हमनें सच में खूद को और अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाने के लिए कुछ नहीं किया तो वो वाकई हम इसके दोषी  होंगे।   
 

 
सतयुग कौन लाएगा?
 

ऐसा नहीं होगा कि एक दिन आप उठेंगे और सतयुग आ चूका होगा। कोई भी युग अपने आप नहीं आता है। प्रत्येक नवयुग का आरम्भ लोगों के द्वारा होता है। जब लोग बुरी प्रवत्ति अपना लेते हैं तो कलियुग आ जाता है और जब लोग अच्छी प्रवत्ति अपना लेते हैं तो सतयुग आ जाता है।
जिस प्रकार रोटी खाने के लिए हमें स्वयं अपना हाथ उठाना पड़ता है, उसी प्रकार सतयुग लाने के लिए भी हमें स्वयं ही प्रयास करने पड़ेंगे।
इसलिए हमें ही युग परिवर्तन, युग निर्माण करना है। भाग्य,
भविष्य परिश्रम माँगता है।



सतयुग कैसे आयेगा?
 
सतयुग तभी आएगा जब हम स्वयं में सुधार का प्रयास करेंगे। जब हम ये सोचेंगे कि बुराई मुझ से शुरू हुई है तो अच्छाई भी मुझ से ही शुरू होगी। हमें किसी और से नहीं बल्कि स्वयं से लड़ना हैं, अपनी कमियों, बुराइयों और गलत कामों से। जब हम हर काम करने से पहले यह सोचेंगे की अगर यह हमारे साथ कोई यही करता तो हमे कैसा लगता।  बुरे कर्म करने से पहले अंतिम सिरे पर स्वयं को रख कर देखें। कर्म अक्सर लौट कर वापिस आते हैं। सीधी सी बात है कि हमें बस यह सोचना होगा कि अगर मैं सुधर गया तो मेरे लिए सतयुग आ गया और मेरे कारण कोई दूसरा सुधर गया तो कम से कम हम दोनों के लिए तो सतयुग आ गया। आख़िरकार, बूँद बूँद से ही घड़ा भरता है। 
 
 
 
5.  सतयुग लाने की युक्ति/तरीका।
 
सभी का यही मानना होता है कि उनमें कोई बुराई नहीं है और उन्हें किसी सुधार की जरूरत नहीं। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि अन्य लोग सुधर जाये परंतु उसे कोई न सुधारे। हर कोई दूसरों को सुधारना चाहता हैक्योंकि चोर कहता है कि मैं क्यों सुधरूँ मुझे तो चोरी से फायदा हो रहा है, ठग भी ऐसा ही कहता है। हम भ्रष्टाचारी सरकारी बाबुओं, नेताओ को कोसते हैं मगर जब खुद उनकी सीट पर बैठने का मौका मिलता है तो हम भी रिश्वत लेने और भ्रष्टाचार करने लगते हैं.
 
कोई भी अपनी बुराई को जल्दी से छोड़ने को तैयार नहीं होता है। इसलिए लोगों को अपनी बुराइयों से लड़ने का दृढ़ निश्चय स्वयं करना पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति बुराई छोड़ने के लिए स्वयं तैयार हो जाये, उसके लिए उसे एक सशक्त कारण चाहिए होता है। 
 
सो इसके लिए पहले हमें यह समझना पड़ेगा कि बुराई सबसे पहले कंहा पैदा होती है। बुराई सबसे पहले लोगों के विचारों में पैदा होती है और उसके बाद उनके व्यवहार, आचरण में। यानि पहले वो बुरा सोचता है और फिर बुरा करता है। 
 
मनुष्य अक्सर खुलेआम बुरे काम करने से तब रुकता है जब उसे देखे या पकड़े जाने का डर होता है। अगर किस जगह समाज, प्रशासन देख रहा हो या कोई सीसीटीवी (CCTV) कैमरा लगा तो अक्सर वंहा बुरे काम बहुत कम होते हैं क्योंकि लोग वंहा बुरा काम करने से पहले स्वयं को रोक लेते हैं। उन्हें कैमरे में खुद के रिकार्ड होने का डर होता है। परन्तु लोग स्वयं को बुरा सोचने से आसानी से नहीं रोक पाते क्योंकि वो जानता हैं कि उन के दिमाग, मन में कोई झांक कर नहीं देख सकता। इसलिए बुराई को सोच में ही रोक देना सबसे अधिक अवाश्यक है।  
 
इसलिए अगर इंसान के दिमाग में भी एक कैमरा लगा दें जो उसके सभी विचारों को रिकार्ड करे लें तो इंसान बुरा सोचने से अवशय ही रूक जायगा। परंतु दिमाग में कैमरा लागाना असंभव है। तो फिर क्या किया जाए? इसका एक ही उपाय है की लोगों को महसूस करवा दिया जाए कि उनके मन में पहले से ही एक कैमरा लगा हुआ है जो उसके सभी विचारों को देख रहा है तो वह बुरा सोचने से रुक जाएगा। 
 
यह किसका कैमरा है? यह उसका कैमरा है। ईश्वर का कैमरा हमारे प्रत्येक विचार, व्यवहार को रेकॉर्ड कर रहा है। ईश्वर हमारी हर सोच, हर काम को देख रहा है। ईश्वर का अहसास ही एकमात्र तरीका है जो हमारी मानसिकता, कर्म को सुधार सकता है। इसलिए ईश्वर का सच्चा बोध हो जाने पर हमारे आचार- विचार अपने आप सुधर (शुद्ध,स्वच्छ हो) जाएंगे।  
 
बुरे लोग रिश्वत और सेटिंग की मदद से इस कैमरे या यहां के दंड से बच जाते हैं परन्तु उस कैमरे या वहां के दंड से उन्हें कोई नहीं बचा सकता।

इसलिए हमें ईश्वर से सीधा जुड़ कर पहले अपने अंदर सुधार करना होगा फिर बाहर. स्वयं के बाद परिवार सुधरेगा और फिर समाज अंत में बड़े स्तर पर आए इस क्रमवार सुधारवादी बदलाव के साथ सतयुग आगमन होगायही सतयुग लाने कि युक्ति और मूलमंत्र है.
 
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सतयुग के परम सत्य। 


6.  समानता (एकता)


[सतयुग धर्म की धारणा है। धर्म रहित समाज सतयुग नहीं ला सकता। धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है – मानवता व समानता। इसी सिद्धांत पर हमारी जीवन शैली आधारित होनी चाहिए.]
 
अभी तक जो बताया गया उसका निचोड़ ये है की समाज को बदलने के लिए पहले हमें खुद को बदलना होगा। पहले खुद में सुधार करना होगा और अपने अन्दर अच्छे गुण पैदा करने होंगे. अपने जीवन में मानवता, समानता को अपनाना पड़ेगा. इंसान की पहचान इंसानियत है और जिसमे इंसानियत नहीं वो इंसान नहीं है। 
 
{जैसे आग का धर्म जलाना है, वैसे ही इंसान का धर्म इंसानियत है और धर्म ईश्वर से जोड़ता है}
 
{सिर्फ इंसानियत की बात नहीं करें बल्कि इंसानियत को धर्म व ईश्वर से जोड़े जैसे यह इंसानियत भी तो ईश्वर और धर्म की शिक्षा है} 
 
[मानव का मन समानता ढूंढता है। समानता से जुड़ाव आता है। मुम्बई में यूपी वाले मिल जाये तो लगाव पैदा हो जाता है। हम सभी में कई समानता है]
 

सभी इंसान बराबर है। हम सब तो बल्कि आपस में रिश्तेदार हैं। आपको लगेगा ये क्या बात कर रहे हैं? हम तो मिल ही पहली बार रहे हैं। हम आपस में संबंधी कैसे हुए? धर्म कहता है और DNA रिसर्च भी यही इशारा करती है कि समस्त मनुष्य जाति केवल एक जोड़े से पैदा हुई है। दुनिया की आज आबादी लगभग 8 अरब है। 500 साल पहले ये सिर्फ 50 करोड़ थी। 2000 साल पहले सिर्फ 3 करोड़ थी और 10000 साल पहले दुनिया मे सिर्फ कुछ लाख लोग ही थे। यानी समय मे जितना पीछे जाते रहोगे, आबादी कम होती चली जाती है। पीछे जाने पर जीवन के आरम्भ में ऐसा समय आएगा जब धरती पर केवल एक स्त्री और एक पुरूष थे जिनसे सारी मानव जाति फैली। जिन्हे हिन्दू धर्म में स्वयंभूमनु एंव शतरूपा नाम से जानते हैं। इन्हे इस्लाम धर्म में आदम और हव्वा और ईसाइयत में एडम और ईव कहते हैं। इनके बारे में लगभग सभी धर्मों में ऐसी ही आस्था पाई जाती हैं। हम सब उन्हीं की संताने हैं। हम सभी इस सांसारिक परिवार के सदस्य हैं। इसलिए हम सभी एक हैं। सभी का खून लाल है। फिर हम में कैसी ऊंच-नीच, कैसा भेद-भाव, कैसी जात-पात
 
यह सृष्टि हम में कोई अंतर नहीं करती। प्रकृति किसी को मना नहीं करती बल्कि सभी को समान सुविधाएं देती हैं, चाहे हवा हो जो सबको सांस देती है, बारिश का पानी हो जो सब पर बरसता है, सूरज की धूप हो या पेड़ की छाँव, सबको मिलती है।  
 
[उसकी फ्री सुविधाओं का महत्व तब पता लगता है जब हमें बाहर से इतनी महंगी बिसलेरी, ऑक्सीजन का सिलिंडर और बिजली खरीदनी पड़ती है।]
 
{मीठा सबको मीठा लगता है, कड़वा सभी को कड़वा लगता है, सर्दी और गर्मी भी सभी को लगती है।}

ईश्वर ने हम में कोई भेदभाव किया। पर हम ने आपस में भेदभाव, बँटवारा कर लिया। कंही धर्म के नाम पर, कंही जाती के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर, कभी नसल के नाम पर, रंग के नाम पर, क्षेत्र/स्थान के नाम पर और अमीरी गरीबी के नाम पर। इस पर भी बात नहीं रुकी तो ज़मीन पर लकीरें खींच कर, उसके टुकड़े कर दिए और खुद को देशों में बांट लिया। हमें अपने कर्मों के आधार पर बड़ा बनना था। पर हम स्वार्थ के आधार पर बड़ा बनने लगे। जबकि किसी से खून/पैसे/मदद लेने का समय हो तो कोई नहीं पूछता किस धर्म या जाती वाले का है।
 
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[दोहरे व्यवहार के कारण आज हमारा मन बैचेन है। इतनी तरक्की के बाद भी मन में चैन, सुकून, सुख, शांति नहीं है. शांति मिलेगी भी कैसे। इस मन में शांति चाहते है और इसी मन में दूसरा का बुरा चाहते हैं. इस दिमाग में सुकून चाहते हैं और इसी से दूसरों को नुकसान करने का प्लान बनाते हैं. इस शरीर को सुख देना चाहते हैं और इस शरीर की आँखों, मुंह, जुबान, हाथों से बुरे और गलत काम करते हैं.]
 
{गरीबो में पैसे की भूख फिर भी कम है. थोड़ी से भी कमाई बढ़ जाय तो संतुष्ट हो जाता है. जबकि अमीरों को पेट नहीं भरता. अमीर पूरी दुनिया की दौलत चाहते हैं। बड़े बड़े पैसे वाले खुद को नंबर वन बनाने में लगे रहते हैं, जरा सी कमाई कम हो जाए तो अपना चैन, सुकून खो देते हैं, घर वालों के साथ समय नहीं बिताते, उन पर बैंकों का कर्जा होता है, रातों को नींद नहीं आती, जो पैसा कमाते है, उसे इस्तेमाल भी नहीं कर पाते और कुछ तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। पैसों से अस्थायी खुशी तो मिल सकती है मगर असली स्थायी खुशी नहीं मिलती।}
 
[हम स्वार्थ में अपने अंदर की इंसानियत ही ख़त्म कर चुके हैं. नाशुक्रे इतने कि नए जूते न हो तो रोते हैं और किसी विकलांग को देख कर भी शुक्र नहीं करते. लालच इतना कि दुख मिलने पर कहते हैं कि मैं ही मिला था की दुःख देने के लिए और सुख मिलने पर कोई नहीं कहता कि मेरे पास पहले से बहुत सुख है, ये सुख किसी दुसरे को दे दो. आज हम अपने दुःख से ज़्यादा दुसरे का सुख देख कर दुखी है. इंसान सुख में अपनों को भी भूल जाता है मगर फिर दुःख में उन्हीं को याद करता है. इसी तरह हम ईश्वर को भी दुःख में याद करते हैं, सुख में कोई याद नहीं करता. कबीर का दोहा सच है कि दुख से सिमरन सब करे सुख में न करे कोई, जो सुख में सिमरन करे तो दुख काये को होये।]
 
हर हाल में उस ईश्वर का धन्यवाद करिए। हमारे हाथ-पाँव सलामत है, वरना दुनिया में कितने ही लोग जो बेचारे हैन्डीकैप हैं। हमारी रसोई में भले ही अच्छे पकवान नहीं, दाल-चावल ही सही, मगर दुनिया में करोड़ों लोग हैं जो रोज भूखे सोते हैं। हमारे पास पुराने ही सही कपड़े तो हैं, बहुतों के पास तो कपड़े भी नहीं होते। हमारे सरों पर छत तो हैं, वरना लाखों लोग सड़कों पर सोते हैं। माना कि हमारे बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते वरना ऐसे भी बच्चें हैं जो बेचारे पढ़ना तो दूर या तो भीख मांग रहे होते हैं या नशा कर रहे होते हैं। अगर जीवन में संतुष्ट रहना है तो अपने से ऊपर वालों को देख कर आगे बढ़ने की प्रेरणा जरूर लो मगर साथ ही अपने से नीचे वालों को देख कर उस मालिक का शुक्र अदा करो।
 
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आज बच्चें बड़ों की बात नहीं सुनते हैं और फोन में लगे रहते हैं। बड़े अपने, बड़े- बुज़ुर्गों की बात नहीं सुनतें हैं और खुद को ज़्यादा समझदार मानते हैं। सब अपनी ही मर्जी चला रहे हैं क्योंकि बड़ों के प्रति डर समाप्त हो चुका है। जब अपनों से उपरवालों के प्रति जवाबदेही समाप्त हो जाती हैं तो लोग मनमानी करने लगते हैं। इसलिए सबसे ऊपर वाले यानि ईश्वर से डरने और उसके प्रति अपनी जवाबदेह होने पर ही हम अपनी कर्मों पर अंकुश लगा सकते हैं। 
 
अभी हम उससे दूर हैं इसलिए सभी को उससे जुड़ना है। पंखा तभी फायदा करता है यानि हवा देता है जब बिजली से उसके तार जुड़े हुए हो, वैसे ही जब तक हमारे तार उससे कटे हुए हैं तब तक हम भी किसी को फायदा नहीं दे सकते, न खूद को और न दुसरों को. 
 
हो सकता है कोई कह दे कि मैं ईश्वर से क्यों जुडु?, मैं तो अल्लाह जुडुगां. हो सकता है कोई दुसरा कह दे कि मेरे ईश्वर का नाम तो गॉड है. कोई तीसरा भाई कह दे मैं तो वाहेगुरु को मानता हूँ। तो हम उसे बस यही समझायेंगे कि उसे किसी भी नाम से बुला लो, वो है तो एक ही. 
 

{यंहा पर आप इन्डरेक्टली अपनी पहचान, हिन्दू मुस्लिम पर बैलन्स बात करते हुए इस तरह जाहीर कर सकते हैं जिससे श्रोताओं पर आपको संदेश को लेकर कोई फ़र्क़ नहीं पड़े}

 
 
7.  एकेश्वरवाद 

    
ईश्वर केवल एक है और वह निराकार है। ईश्वर को सभी जानते हैं।
[जैसे वायु को अनेकों नामों से पुकारा जाता है] जिस प्रकार पानी को जल, नीर एवं वाटर जैसे विभिन्न नामों से पुकारने पर उसका अस्तित्व और स्वभाव नहीं बदलता है, उसी प्रकार ईश्वर को ब्रह्म, परमेश्वर, अल्लाह, ख़ुदा, गॉड, वाहेगुरु जैसे विभिन्न नामों से पुकारने पर वह भी नहीं बदलता है। इसलिए ईश्वर को बुरा कहोगे तो अल्लाह को लगेगा और गॉड को बुरा कहोगे तो वाहेगुरु को लगेगा क्योंकि वो है तो एक ही।
 
{यंहा कुछ मंत्र पढ़ सकते हैं}
 
[हम ईश्वर को नहों देख सकते परन्तु वह हम सबको देख सकता है। वह हमारे सबसे निकट है। उसका न आकार है और न ही प्रतिमा। वह धरती पर न तो किसी निर्जीव वस्तु में विद्यमान है और न ही किसी सजीव प्राणी के रूप में। जगत की प्रत्येक शय निर्मित व नश्वर है परन्तु ईश्वर अजन्मा व अमर है। वह इस सृष्टि का निर्माता, संचालक और संहारक तीनों है। वह सर्वशक्तिमान, सर्वाधार एवं सर्वेश्वर है। वही इस सृष्टि का कर्ता-धर्ता है। वेदानुसार वही पूजा और उपासना के योग्य है। इसीलिए ईश्वर की भक्ति में ही हमारी मुक्ति बसी है।]
 
{विज्ञान कहता है कि सभी जीव जंतु आदि एक झुंड में रहते है और एक मुखिया चुनते हैं। मनुष्य भी ऐसे ही रहते हैं और पीएम, ड्राइवर इसके उदाहरण है। क्योंकि इससे संचलान बेहतर होता है  जिसे मैनेजमेंट की भाषा मे यूनिटी ऑफ कमांड कहा जाता है। जबसे सृष्टि बनी है तब से सृष्टि सही तरीके से चल रही है क्योंकि इसे चलाने वाले एक ईश्वर है। दो ईश्वर होते तो ये सब संभव न होता। जब एक बिल्डर तक के पास  निर्माता, संचालक और संहार तीनों शक्ति होती है तो ईश्वर के पास क्यों नहीं हो सकती जो सर्वशक्तिमान है। हमनें उसे मनुष्यों जैसे समझ लिया। जबकि हमने उसे देखा तक नहीं। क्या कोई हवा, आत्मा का चित्र बना सकता है। उसके बनाये सूर्य तक को हम नहीं देख पाते, आखें चौंधया जाती है फिर उसका तेज इन साधारण आखों से कैसे देख सकते हैं। वो तो भाव में यानि मन में आता है।}
 
 
हमें वापिस ईश्वर से जुड़ना हैं। जिस प्रकार पेड़ अपनी जड़ों से जुड़े रहने पर ही पनप सकता है, उसी प्रकार अपने मूल स्रोत- ईश्वर से जुड़े रहने पर ही मनुष्य सदगुणी और समाज सतयुगी हो सकता है।



8.  परलोकवाद। 
 

सृष्टि में हर चीज का एक महत्व और उद्देश्य होता है।
ब्रह्माण्ड में प्रत्येक क्रिया के पीछे एक कारण होता है जैसे हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है। 
 
{हमारे हर काम के पीछे भी कोई न कोई उद्देश्य होता है, जैसे बच्चा बेग टांग कर पढ़ने के लिए स्कूल जाता हैं, जैसे हम यंहा सत्संग करने आए हैं, जैसे आप में से कुछ हमारा संदेश सुनने के लिए और कुछ टाइम पास करने के उद्देश्य से बैठे हैं। इसी तरह मानव इस धरती पर क्यों हैं, उसका भी तो कोई उद्देश्य होगा?}
 
नियमानुसार निर्माता ही निर्मित का उद्देश्य बताता है. जैसे कंप्युटर बनाने वाले बताएगा कि कंप्युटर किसलिए बनाया गया है। ईश्वर ने हमें बनाया ताकि हम केवल उसकी भक्ति करें और हम उसके अनुसार जीवन व्यतीत करें।
 
 
{अगर हमारा जन्म हमारी इच्छा से होता तो हम सब अंबानी-टाटा के घर में पैदा हो रहे होते}
सो जब हमारा जन्म-मरण हमारी इच्छा से नहीं होता तो यह जीवन भी हम कैसे अपनी इच्छानुसार जी सकते हैं? यानि यह जीवन ईश्वर के सामने समर्पण के लिए है.
 
{यह रुमाल है, मान लीजिए यह आपका जीवन है। आपको इसे रुमाल यानि जीवन को थामे रहना हैं। इसके दो सिरे हैं और एक बीच का भाग हैं। मान लीजिए इसका यह सिरा जन्म है जो आपके हाथ में नहीं, इसका दूसरा सिरा मृत्यु हैं, वो भी आपके हाथ में नहीं है। यह रुमाल आपका है यानि यह जीवन आपका है जिसे आप फैलाना भी चाहते हैं और इसे छोड़ना भी नहीं चाहते। तो फिर इसे आप कैसे पकड़ेंगे। इसे फिर आप बीच से पकड़ेंगे। तो यह बीच वाला भाग ही आपके कर्म हैं, इसे अच्छे से थामे रहें। ईश्वर ने बीच वाला भाग हमारे हाथ में थमा दिया है। अब हम चाहे तो इसे पकड़े रहे या छोड़ दे।}

 
कोई व्यक्ति ईश्वर का इनकार कर सकता है पर मृत्यु का नहीं, मृत्यु हर तो किसी को आकर रहेगी. मृत्यु के पश्चात ईश्वर कर्मानुसार हमारा मूल्यांकन करेगा। एक अंतिम दिन आना है जब हमें दुबारा जीवित किया जाएगा और हमारे कर्मों का हिसाब होगा।
 
[जैसे कोई मालिक अपने नौकर को रोज़ पैसे दे मगर हिसाब नहीं ले और नौकर काटा मारता हो. फिर एक दिन वो कह दें की चल आजा आज सारा हिसाब दे तो सोचो नौकर का क्या हाल होगा {बेटे का उदाहरण भी}. इसको ही महाप्रलय का दिन कहते हैं।] 
{हमारे कर्मों का फल फ़ौरन निकलता रहता है मगर वो सारा मिलता नहीं बल्कि इकठ्ठा होता रहता है और सही समय पर सामने आता है जैसे कोई फल पकता रहता है और पकने पर टूट जाता है}
 
 
जब अच्छे कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलेगा और बुरे कर्म करने वालों को नरक स्वर्ग की सुख और नर्क के दुख हमें बचपन से ही मालूम है। स्वर्ग नरक को विभिन्न धर्मों में अलग अलग नामों से पुकारा जाता हैं जैसे जन्नत जहन्नुम और हेवेन हेल. ये परलोक ही हमारे कर्मों का पुरस्कार या दंड होगा। 
 
[परन्तु फिर भी उस अनंत कालिक जीवन की यात्रा के लिए हम कोई तैयारी या सत्कर्म नहीं करतें. जबकि छोटी से छोटी यात्रा की इतनी बड़ी बड़ी तैयारी करते हैं. रैलवे वेटिंग रूम में कुछ घंटे बैठने की तरह थोड़ी देर का यानि केवल 50-60 साल जीवन है फिर आगे चले जाना है, इसलिए वैटिंग रूम में या इस संसार में क्या साज सज्जा करनी। बिजली के बिल की तरह कर्मों का बिल आना है, जैसे रिपोर्ट कार्ड आती है। यह हमारा निवास है यानि जहा वास न हो सके। यंहा खर्च कि गयी करंसी परलोक में एक्सचेंज हो कर मिल जायगी.] 

 
मृत्यु एक अटल सत्य है और फिर (मर कर) कोई वापिस नहीं आता आज तक कोई अमर नहीं हो पाया।  इस पृथ्वी पर हम एक बार जन्म लेते हैं {स्वर्गवासी, स्वर्गीय, स्वर्गसीधार शब्द का उदाहरण} इसलिए उस लोक के लिए हमें जो भी करना है, इसलोक में ही करना है। 
 
 
 
अच्छे और बुरे कर्मों की पहचान ईश्वर ने हमारे मन मे पहले से ही डाल रखी है जैसे अंदर कोई इनबिल्ट चिप हो, उसमें से आवाज़ आ जाती है मगर हम उस आवाज़ पर ध्यान नहीं देते। यह उस ईश्वर की ही आवाज होती है। मन भांप लेता है कि क्या सही है मगर फिर दिमाग बीच में आ जाता है और गलत काम करवा बैठता है। असल में सबके अंदर अच्छाई मौजूद है, बस हम बुराई को उस पर हावी कर लेते हैं।
 
{यंहा आप कुछ अच्छे कामों के नाम गिनवा सकते हैं कि अंदर से अवाज़ आती है फला फला काम कर डाल और फला फला मत कर}
 
[इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है किसी का एक्सीडेंट हो जाए या कंहीं आग लग जाए तो हम तुरंत उनकी मदद करने के लिए भागते है. कोई हादसा होने वाला हो तो धक्का देके किसी को बचा लेते हैं। किसी बच्चे को रोता देख लें तो सभी पूछने लगते हैं कि क्या हुआ। क्योंकि मन से आवाज़ आती है जिस पर हम एकदम से एक्शन ले लेते हैं मगर कई लोग इस आवाज़ को अक्सर स्वार्थ में इगनोर कर देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं कि हमें क्या हम तो अपने काम के लिए लेट हो रहे हैं.]
 
[हर अच्छे काम के लिए पैसों की जरूरत नहीं होती है, बहुत से काम फ्री या सस्ते में हो जाते हैं.  किसी पैदल राहगुज़र को लिफ्ट दे दो, किसी बुज़ुर्ग को सड़क पार करवा दो, किसी बेसहारा का सौदा ला दो, किसी मजदूर को समान उठाने मे हाथ लगा दो , ठेले, रिक्शे को धक्का लगा दो,  बस ट्रेन मे सीट दे दो, किसी अनपढ़ बेचारे का फॉर्म भर दो, किसी को बिठा कर लाइन में लगे रहो, रास्ते से पत्थर हटा दो, दुकान के बाहर पानी का जग/मटका रख दो। और ये सब भी नहीं तो कम से कम किसी से दो मीठे बोल लो या लोगों से मुस्कुरा कर मिल लिया करो।]
 


जीवन एक परीक्षा है. पास होकर अगली कक्षा यानि अगले लोक यानि परलोक में जाना है. क्योंकि यह लोक न्याय के सिद्धांत पर नहीं बल्कि परीक्षा के सिद्धांत पर बनाया गया है। यंहा पूर्ण न्याय नहीं मिल पाता क्योंकि पूर्ण न्याय तो वंहा मिलना है.
 
[जैसे गाँधी जी, अम्बेडकर साहब, मदर टेरेसा आदि अनेकों समाज सुधारकों ने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन दुखियों के लिए लगा दी मगर उन्हें जीते जी इसका बदला नहीं मिला। अनेकों क्रांतिकारी जैसे भगत सिंह हमारी आजादी के लिए जवानी में ही सूली पर लटक गए, मगर उन्हें इसका बदला या सुख इस जीवन में नहीं मिला. सेना के जवान सरहद पर शहीद हो जाते हैं, मगर वो इसका बदला नहीं पा पाते. यही चीज़ बुरे कर्म करने वालो के साथ भी होती है. ब्रिटेन के राज/रानी ने भारत पर 100 साल राज किया और भारतियों पर बहुत ज़ुल्म किये मगर उन्हें भी इसका बदला नहीं मिला और पूरी ज़िन्दगी ऐश से काट कर चले गए. हिटलर को उसके द्वारा किये गए बेरहम अत्याचारों का बदला उसे यंहा नहीं मिला। हिटलर ने 60 लाख लोगों को मौत के घात उतार दिया मगर खुद हिटलर को केवल एक बार मौत मिला। यह न्याय नहीं नहीं हुआ, न्याय तो वो होगा जब उसे भी 60 लाख बार तड़पा तड़पा कर मारा जायगा।]

 
कर्म सुधारने से न केवल यहलोक बल्कि परलोक भी सुधरता है। हमारे कर्म ही सतयुग आगमन का निर्धारण करंगे।



9.  ईशदूतवाद।

प्रकृति का एक नियम है जिसे
एन्ट्रॉपी कहते हैं जिसका मतलब है की अगर ऑर्डर, व्यवस्था न रखी जाए तो बिगाड़ शुरू हो जाता है। जैसे अगर कोई वस्तु या जगह जैसे यह गली/पार्क/घर बिना किसी देख-भाल या रख-रखाव के यूँहीं छोड़ दी जाए तो वह भी ख़राब और बर्बाद हो जाती है। 
[जैसे अगर हमारे घरों में हमारी माँ-बहनें साफ सफाई न रखें तो घर कूड़ा घर बन जायगा। ये तो वो हैं तो हमारे घर साफ सुथरे रहते हैं।]
 
[इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि ईश्वर मानवता को को बनाए और मानवों के सुधार करने किसी को न भेजें।]

मनुष्य सही प्रकार से जीवन जी सकें इसलिए ईश्वर ने धरती पर भिन्न-भिन्न समय व स्थानों पर बहुत से महापुरुषों एंव महामानवों के द्वारा मानवजाति को ग्रंथ रूपी धर्मादेश और धर्मज्ञान दिया। इन्होने धर्म व दिव्य मार्ग (सन्मार्ग, सत्पथ, सुमार्ग, सुपथ) पर चलकर दिखाया। इन सभी की प्रमुख शिक्षा थी कि ईश्वर ही सर्वोपरि है और सत्कर्म करो। इनकी शिक्षाओं से मानवता का कल्याण उद्धार हुआ। ये सभी आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक व प्रेरणास्रोत हैं। सभी धर्म और उनके अनुयायी ऐसे धर्म अग्रदूतों या प्रवर्तकों में निष्ठा, आस्था रखते हैं जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, मोज़ेस, जरथुस्त्र आदि। इन धर्मपुरुषों, दिव्यपुरुषों के पदचिन्हों और इनके द्वारा दिखाए गए सत्य के मार्ग पर चलकर ही पहले, लोग सत्यवादी और सत्यसमावेशी बने थे तो अब भी उसी प्रकार और उसी पथ पर चलकर बनेंगे।
 
{श्रीराम ने आकार असत्य पर सत्य की जीत स्थापित करी। श्रीकृष्ण ने आकर अधर्म पर धर्म की जीत स्थापित करी। मुहम्मद साहब ने आकर अन्याय का अंत किया और न्याय की स्थापना करी। बुद्ध ने आकार अशान्ति को मिटा दिया और शांति को स्थापति किया।}
 
[ये दिखाने आते थे कि ईश्वर के आदेशों पर चलना कठिन नहीं आसान है, कठिन काम नहीं है। जैसे एक अच्छा पेपर सेटर ऐसा पेपर सेट करता है कि एक मेधावी छात्र उसमें जरूर पूरे मार्क्स ले आएगा। इन्होंने कभी नहीं कहा की तुम्हारा ईश्वर अलग है और मेरा ईश्वर अलग। ये सतपुरुष ईश्वर के संदेशवाहक और संदेष्टा थें। ये आदरणीय और सम्मानीय हैं पर उपासनीय कतई नहीं हैं। क्योंकि कोई भी मनुष्य ईश्वर के समकक्ष या समान नहीं हो सकता और न ही ईश्वर का साक्षात रूप। ईश्वर मनुष्य को रचता है परन्तु ईश्वर को किसी ने नहीं रचा क्योकि केवल भारत की धरती ईश्वर की नहीं है इसलिए उसने इन्हें हर स्थानों पर भेजा जैसे अलग अलग जगह सरकार अपने अम्बेस्डर भेजती हैं या जैसे शादी का कार्ड लेके हम अलग अलग जगह अलग अलग लोगों को भेजते हैं. दीवाली पर मालिक का नौकर गिफ्ट/मिठाई देने आए तो हम उसका सत्कार करते है पर उसको मालिक नहीं कहते क्योंकि वो तो अपने घर बैठा हुआ होता है। जिस तरह डाकिया चिट्ठी का मालिक नहीं होता उसी प्रकर ये लोग स्वयं ईश्वर नहीं थे बल्कि उसके डाकिये थे। जैसे मैं सन्देश देने आया हूँ और कोई मुझे ही इश्वर बना दे. जैसे कोई अपनी पत्नी को माँ नहीं बोल सकता क्योंकि माँ और पत्नी दोनों अलग व्यक्ति हैं और दोनों का अलग स्थान है, उसी प्रकार ईश्वर और उसके इन महाभक्तों को एक ही नहीं मान सकते और दोनों को अलग अलग स्थान पर रखना होगा क्योंकि यही सत्य का समर्थन है।]
 
{जब एक मामूली सा इसान किसी प्रॉपर्टी का बिल्डर, मेंटेनर, डिस्ट्रॉयर तीनों हो सकता है तो फिर सर्वशक्तिशाली ईश्वर इस सृष्टि का निर्माता, संचालक और संहारक तीनो क्यों नहीं हो सकता? इसी तरह धरती पर बिगड़ चुकी व्यवस्था को ठीक करने के लिए ईश्वर स्वयं धरती पर मनुष्य बन कर नहीं आएगा बल्कि किसी मनुष्य को अपना अवतार बना कर भेजगा जैसे कोई फैक्ट्री मालिक फैक्ट्री में काम सही न चलने पर वंहा अपना एक फैक्ट्री मेनेजर भेजेगा जो जाकर सभी कामों को ठीक कर देगा, न कि मालिक खुद फक्ट्री में आके काम करेगा।} 
 
{इन तीन STAR बिंदुओं पर अधिक विवरण के लिए सत्संग नामक पोस्ट पुरानी पढ़े. आप खुद भी इन पर अपनी आपत्ति रहित बातें रख सकते हैं।}


 
10. सारांश, निष्कर्ष।


सारांश
 
जिस प्रकार स्कूल में किसी कक्षा में एक वर्ष बिता कर और पढाई करके हम परीक्षा देते हैं और फिर हमारा रिपोर्ट कार्ड, रिजल्ट आता है. अंत में उत्तीर्ण हो कर हम अगली कक्षा में चलें जाते हैं, उसी प्रकार हमें इहलोक की परीक्षा पास करके परलोक में जाना हैं। 
[उदाहरण स्वरुप यह समझ लीजिये कि स्कूल - इस धरती के समान है। छात्र - हमारे समान है। प्रधानचार्य – ईश्वर के समान है जो सर्वोच्च संचालक है, अध्यापकगण – ईश्वर के भेजे सत्पुरुषों के सामान हैं जो मार्ग दिखाते हैं, पुस्तकें – ईश्वर के ग्रंथों के समान हैं जो शिक्षा देती हैं, पाठ्यक्रम – ईश्वर के आदेशों के समान हैं जिसका अनुसरण अनिवार्य हैं और अध्यनन – कर्मों के समान हैं जिनके बिना कल्याण सम्भव नहीं हैं।]
 
 
 
निष्कर्ष। 
सतयुग का आना 3 बातों (3 प्रमुख सत्यों) पर निर्भर करता है - ईश्वर से जुड़ना व उसके आदेशों को मानना (भक्तिमार्ग), ईश्वर कृत स्वर्ग व नरक को दृष्टि में रख कर सत्कर्म करना व दुष्कर्मों से बचना (कर्ममार्ग) और ईश्वर के महाभक्तों द्वारा दिखाए गए सत्यमार्ग (ज्ञानमार्ग) पर चलना क्योंकि ईश्वर ही इस सृष्टि का प्रथम एवं अंतिम सत्य यानि परम सत्य है और केवल सत्य अपना कर ही सतयुग लाया जा सकता है।

 
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प्रस्थान करते हुए संक्षेप में कुछ बातें:-

 
धर्म अंधा नहीं होता, आस्था अंधी होती है। धर्म सृष्टा तक जाने का मार्ग है। उसकी इच्छा को धारण करना ही धर्म है। क्या है कोई हमें जो उसकी इच्छा अनुसार चल रहा है। हम केवल नाममात्र के धार्मिक है। उसके धर्म का दो मूल आधार है सत्यनिष्ठा और करुणा जिनमे ये दोनों गुण नहीं हैं वो धार्मिक नहीं है।
 
आज धर्म का नाम सुनते ही लोगों में दुसरे धर्म वालों के प्रति मन में गुस्सा, नफ़रत, लड़ाई की भावना आती है जबकि मन में प्रेम, दया, करुणा, सेवा की भावना आनी चाहिए।  धर्म के नाम पर या श्री रामचन्द्र जी और मुहम्मद साहब के नाम पर लोग मरने, मारने को तैयार हैं, मगर धर्म अनुसार या उनकी तरह जीने को कोई तैयार नहीं है। आज जब लोग धर्म के नाम पर लड़ाई कर हैं तो धर्म के नाम पर ही सब एक भी होंगे, जैसे लोहा लोहे को काटता है।
 
जैसे बच्चें अलग अलग रंग के कवर या रेपर वाली टॉफियों पर लड़ाई करते है की लाल वाली मैं लूंगा और हरी वाली मैं लूंगा। जबकि उनके अंदर एक ही तरह की चोकोलेट टॉफी होती है। इसी तरह हम बड़े बच्चें भी अलग अलग धर्मों के रंग पर लड़ते है। यह पीला वाला मेरा, वो हरा मेरा, यह नीला वाला तेरा और वो सफ़ेद वाला उसका। जबकि उन धर्मों मे झांक कर कोई देखने को तैयार नहीं है कि उनमें एक जैसी ही बातें होती है कि सबका भला करो, किसी का बुरा न करो आदि। सब अच्छी बातें सीखातें हैं। कोई धर्म बुरा नहीं सीखाता। क्या कोई धर्म कहता है कि चोरी करो या लोगों को सताओ? कोई नहीं कहता। समानता, एकता, सेवा सभी धर्मों में हैं।
 
हमने उसके दिये एक धर्म को भी मेरा-तेरा बना लिया है. हर कोई कह रहा है मेरा धर्म सच्चा है. सबका धर्म सच्चा है तो फिर उसका एक धर्म कौन सा है. अगर सभी सच कह रहे हैं तो इसक मतलब है कि उसके सच्चे धर्म को जानने के लिए सभी धर्मों की सामान मूलभूत बातें एकत्रित कर लो और उसका सही धर्म जान लोगे. वो सामान बातें यही है कि ईश्भक्ति, कर्म और सत्पुरुषों का सत्यमार्ग।
 
जैसे नदी अपने उद्गम से निकल कर आगे बढ़ती हुई अलग अलग छोटी छोटी नदियों में बदलती जाती है और उसका रंग, स्वादगंध भी बदलता रहता है मगर उसका पानी अंत तक पानी ही रहता है और बहता रहता है। वैसे ही उसका दिया एक धर्म भी बदलता गया। उसके संदेश के शब्द, भाषा भी बदलती गई। समय के साथ उसकी शिक्षाओं पर अलग अलग धर्म बनते गए। मगर उसका मूल न बदल सका जो आज भी विभिन्न रूपों में उपलब्ध, प्रवाहित है। संसार की सारी अच्छी शिक्षाओं का स्रोत ईश्वर ही रहा है।

जैसे एक पिता अपने 4 बेटों के जवान होने पर उन्हें कुछ शिक्षा देता है जैसे कि शरीफ इंसान बनना और पिता का नाम रोशन करना। पिता यही शिक्षाएं अपने दूसरे बेटे के जवान होने पर देता है। तीसरे और फिर चौथे बेटे को भी यही शिक्षाएं देता है। बाद में चारों बेटे आपस में लड़ने लगते है। एक बेटा कहता है कि पिता केवल उससे ही प्रेम करता था, उसने केवल उसे ही शिक्षाएं दी और इसलिए वह केवल मेरा पिता है तुम्हारा नहीं। बाकी तीनों बेटे भी ऐसा ही दवा करते है। ये कोई नहीं समझता कि उनका पिता चारों का पिता है, चारों से प्रेम करता था और चारों को एक ही शिक्षा दी। इसी तरह हम हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई भी आपस में लड़ रहे हैं कि वो ईश्वर तो केवल मेरा है, वो तुम्हारा नहीं है। मगर वह ईश्वर तो सभी का है। सबका मालिक एक है। उसने अलग अलग समय पर हम सभी को एक जैसे ही सिद्धांत दिए जैसे अच्छे कर्म करो, बुरे कर्मों से बचो और सभी की सेवा करो आदि।
 
जैसे एक पिता की संतानें आपस मे कितनी ही लड़ाई हो पर वही पिता जब अपने नाम का वास्ता दे देता है तो अक्सर बेटे भी एक हो जाते है। उसी तरह सभी पिताओं का पिता, वो परमपिता भी तो एक ही है। हम सभी उसी के द्वारा अलग अलग धर्मों, मतों में पैदा किए हुए है। तो फिर हम उसके नाम पर क्यों नहीं एक हो सकते जैसे पूरा देश खेल के नाम पर या युद्ध के समय में एक हो जाता है।
 
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असल में जो मिथ्या में जी रहा है वो कलियुग में हैं जो सत्य में जी रहा है वो सतयुग में है। आपके और मेरे अंदर अभी कलियुग है, सतयुग भी है। जिसे खाद-पानी देंगे, वो बाहर आएगा। 

जो अंदर होता है वही बाहर आता है। पेन के अंदर के रीफ़ील की स्याही का जो रंग होगा, लिखने पर लिखावट में वही बाहर आएगा। हमारे अंदर बुराई, गंदगी, 
लड़ाई-झगड़ा है तो वही बाहर आता है। हर बात पर गुस्सा करना, दूसरों को गाली देना, लोगों का अपमान करना। अगर हमारे अंदर अच्छाई है, हमारी अंतरआत्मा जागी हुई है तो बाहर भी सभी के लिए आदर, सदभाव दिखाई देगा।
 
यह सब आटोमेटिक व्यवस्था है. जैसे लोगों को पढ़ा लिखा बनाने के लिए स्कूल होते हैं. किसी को अनपढ़ बनाने के लिए भी स्कूल नहीं होते है. पढोगे नहीं तो अनपढ़ अपने आप बन जाओगे. अमीर बनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. गरीब बनने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती. पैसे नहीं कमाओगे तो सारी जमापूंजी ख़तम होती जायगी. दूध पीना शुरू करवाने के लिए दूध के फायदे बताने पड़ते हैं. दारू शुरु करवाने के लिए किसी को शिक्षित नही करना पड़ता, उसके फायदे नहीं बताने पड़ते। इसी तरह अच्छा बनने के लिए अच्छे कार्य करने पड़ते हैं. अच्छे काम करना छोड़ दो, अपने आप बूरा बन जाओगे. अच्छी संगत में अच्छे बन जाओगे और बुरी संगत में बुरे। जैसी संगत वैसी रंगत। 

 
ईश्वर ने हमे धरती पर जानवरों की तरह सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं भेजा है और न ही किसी कोने में अकेले जीवन बीताने के लिए. पर उसने हमें इंसानी समाज में जीने के लिए भेजा है। समाज ही परीक्षा की कसौटी है. यानी एक दूसरे के काम आना, लोगों से अच्छा व्यवहार करना,पड़ोसी की सहायता करना, रिश्तेदारों के अधिकार देना आदि। वीराने में सन्यासी, संत, फकीरी की ज़िंदगी आसान है। मगर लोगो के बीच सही तरह जीना मुश्किल है। ईश्वर हमसे सिर्फ भक्ति करवाना चाहता तो हम समुह में नहीं बल्कि अकेले किसी जंगल में रहने के लिए भेजता. उसने हमें लोगों के बीच भेजा है। वो चाहता है हम अपने अंदर उसके गुण जैसे करुणा, दया, न्याय, प्रेम पैदा करें और आस पास वालों का ध्यान रखें। असली परीक्षा तो लोगों के बीच रहकर अपना संयम बनाये रखना और अच्छे इंसान बने रहे। 


सतयुग की प्रैक्टिस करें, हम भी कर रहे हैं। आपको चुनना है कि आप कैसा बनाना चाहते हो. 
 
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कुछ लोग हमसे कहते हैं कि तुम अपना समय खराब कर रहे हो, कोई नहीं सुधरने वाला। तो हम उनसे कहते हैं कि अगर कही भयंकर आग लगी हो और हमें पता है कि हम अकेले इस आग को नहीं बुझा सकते। मगर हमारे पास एक बाल्टी है तो हम कम से कम अपनी तरफ से इतना प्रयास तो कर ही सकते हैं। पूरी न सही थोड़ी आग तो भुजा ही सकते हैं। और अगर हमें देख कर कुछ और लोग भी बाल्टियाँ भर के पानी डालने लगे और फिर सारे डालने लगे तो आग क्यों नहीं भुजेगी। एक बाल्टी पानी डालने सभी लोग जब उस ईश्वर के समक्ष जब खड़े होंगे तो खुल कर कह सकेंगे कि हमने तो अपनी पूरी कोशिश करी थी। क्या इतना सा आशावादी होना बुरी बात हैं। उम्मीद पर दुनिया कायम हैं। तो अब हम सबको सोचना है कि हम आग बुझाने वाले बनना है कि तमाशा देखने वाले?
 
समस्या ये है कि बुरे लोग इक्कट्ठे हुए हैं और अच्छे लोग इक्कट्ठे नहीं हो पा रहे. जबकि वो इकट्ठा हो कर भी आपस में भी एक दुसरे की काट करते हैं. बुराई फैलाने वाले एकजुट हो कर अच्छे लोगों को धोखा दे रहे हैं। हम सब अच्छाई पसंद करने वाले एक हो कर काम नहीं कर सकते क्या? अभी कोई बाहर आकर ताश खलेने बैठ जाए, तो थोड़ी ही देर में अधिकतर लोग वहा जमावड़ा लगा देंगे। अभी किसी की गली में लड़ाई हो जाए सभी खिड़कियों से झाँकने लगेंगे। मगर कोई आकर यह कहे कि उसे धर्म, कर्म, सत्संग की बात करनी है तो सब इधर उधर निकल जाएंगे, वो अक्सर अकेला ही खड़ा रह जाएगा। 

मगर आप लोग यंहा आयें और इकट्ठा हुए। आपने हमारे संदेश को सुना और स्वीकारा। अगर एक व्यक्ति को भी हमारी बात समझ या जाए तो हमारे यहा आने का उद्देश सफल हो गया। सभी लोग आपकी तरह यह बात समझ जाएं तो सुधार और अच्छाई क्यों नहीं या सकती।
 
अब जैसे हमें देखिए, हम लोग भी तो इकट्ठा है। हम सब अलग अलग जगह रहते हैं, हम में से कुछ पढ़ाई करते हैं, कुछ जॉब करते हैं, कुछ अपना छोटा मोटा बिजनेस करते हैं। मगर हम हर हफ्ते अपना कुछ समय इस नेक काम को देते हैं। 
 
इन भाई ने हमें पानी पिलाया और पुण्य का काम किया। यह हमारे पुण्य में भागीदार हो गए। हमनें मुंह से बोल कर आपके कानों और मन को सुख दिया और इन्होंने हमारे गले को तर करके हमारे शरीर को। बस ऐसे ही छोटे छोटे अच्छे कार्य करते चले जाएँ।  यही तो अच्छे कार्य का समर्थन और प्रोत्साहन करना है।
 
एक बात और कि ये बच्चे कल का भविष्य हैं। बच्चों को बचपन से ही संस्कार देने पड़ते हैं। आप लोगों के साथ साथ, इन बच्चों ने भी ये बातें सुनी।  बच्चों का दिमाग बहुत तेज होता है। भले ही ये यंहा थोड़ा खेल में लगे रहे मगर इनके सब कॉनशियस माइंड में हमारी बातें गई है और वहा स्टोर हो गई हैं। जब सही समय आएगा इनको ये सभी अच्छी बातें एकदम से रीकाल हो जाएंगी कि हाँ उन अंकल ने वो बात कही थी। अच्छा हुआ यह बाहर आ गए और बच्चों को भी अच्छी बातें सुनने को मिली वरना अंदर बैठ कर या तो फोन चला रहे होते या फिर टीवी देख रहे होते।
 

अंतिम बात कि उसके केमरे का आप खूद भी ध्यान रखें और दूसरों को भी करवाए।
 
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(1) जब हम संकट में फंस जाते हैं तो सब उसी को अलग अलग नामों से याद करते हैं। आप होंगे तो कहेंगे कि हे ईश्वर हमें बचा ले। मैं होऊँगा तो कहूँगा कि ऐ अल्लाह, मुझे बचा ले। उसे बचाना होगा तो वो वह यह नहीं देखेगा कि हमनें उसे किस नाम से पुकारा है।

(2) मैं एक मुस्लिम हूँ, अगर में किसी मंदिर पर जा कर ईश्वर की बात करना चाहूं तो लोग कहंगे कि ईश्वर नाम तुम्हारा कब से हो गया, ईश्वर तो हमारा है, ईश्वर पर हम बात करेंगे, तुम उसके बारे में कुछ नहीं जानते. ऐसे ही हमारे एक साथी कीर्ति भाई अगर मस्जिद पर अल्लाह की बात करने जाना चाहे तो लोग उनसे कहगें तुम क्या अल्लाह पर कैसे बात कर सकते हो हो, ये तो हमारा काम हो.
 
क्या एक मुस्लिम किसी हिन्दू या पंडित जी से कोई अच्छी बात नहीं सीख सकता। क्या कोई हिन्दू, किसी मुस्लिम या मौलना जी से कोई अच्छी बात नहीं सीख सकता। बिल्कुल हम एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते हैं बस हमारे दिल खुले होने चाहिए।
 
(3) मेरा नाम, मुहम्मद ___ है। मैं पिछले कई साल से भारत को विश्वगुरु और अखंड भारत बनाने के लिए प्रयास कर रहा हूँ। हम गायत्री परिवार और ब्रह्माकुमारी समाज के साथ मिलकर सतयुग लाने के लिए काम कर रहे हैं। आप भी हमारे साथ सहयोग करिए। 

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क्या इस्लाम पर केवल मुस्लिम ही अधिकार जता सकते हैं। क्या सनातन धर्म पर केवल हिन्दू ही अधिकार जता सकते हैं? क्या हम दोनों को अपना नहीं मान सकते, क्या हम दोनों धर्मों से अच्छी बातें नहीं सीख सकते? सीख सकते हैं।

क्या कोई हिन्दू कुरान में लिखी कोई अच्छी शिक्षा ग्रहण कर लेंगे तो वो क्या मुस्लिम हो जाएंगे। या कोई मुस्लिम अगर वेदों में लिखी कोई अच्छी
शिक्षा ग्रहण कर लेगा तो क्या वो हिन्दू हो जाएगा? नहीं होगा।

क्या श्री रामचंद्र जी मुसलमानों के नहीं हो सकते हैं। क्या मुहम्मद साहब हिन्दुओ के नहीं हो सकते। क्या हम इन दोनों के सिद्धांतों पर नहीं चल सकते? अगर ये महापुरुष पूरे संसार के उद्धार, कल्याण के लिए आए थे तो ये सभी के हैं। दुनिया के सभी ऐसे महापुरुष हम सभी की सांझी विरासत है।
 
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