Wednesday, 1 May 2024

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 7 (ईश्वर अस्तित्व पर ग्रंथीय, वैज्ञानिक, दर्शन प्रमाण)


1. आज कल नास्तिक, अगनोस्टिक, एक्स-मुस्लिम बहुत हो गए हैं.

Agnosticism बढ़ रहा है। इनमें जो सच में neutral हैं वो आज agnostic हैं। इन दोनों में फर्क है। अथिएस्ट वो हैं जो ये मानते हैं कि ईश्वर नहीं है और अगनोस्टिक वो हैं जो यह मानते हैं ईश्वर है या नहीं, वो पुख्ता तौर पर नहीं कह सकते। 

कुछ अपने intellectual से मज़हब से बेदार हो जाते हैं. कुछ अपने मज़हब की गड़बड़ियों के कारण और कुछ अपने मफाद देख कर.

पहले सबसे कम इस्लाम छोड़ने वाले होते थे. क्योंकि इस्लाम में इशेतामियत का निजाम है.

अब Ex-Muslims बहुत हैं और बढ़ते जायगे. क्योंकि Information और globalization का दौर है.

Ex-Muslims को India में इनको सर आखों पर बिठाया जा रहा है. हिन्दुत्वादियों से protection भी मिल रही है.

मगर ये अक्सर हिन्दू वगैरह कोई भी धर्म नहीं अपनाते.

इन्हें मीडिया बढ़ावा दे रहा है.  Biased Debates करवाई जा रही है. जिसका मकसद Islamophobia फैलाना है. 

जबकि Ex-हिन्दू सबसे ज्यादा है. उन पर कोई programme नहीं होता.

हिंदुत्वादी अक्सर इसाई, नास्तिक और Ex Muslims से ही मसाला लेते हैं.

दिमाग में दीन को लेके उठने वाले सवालों के जवाब जो दीन न दे सके तो वो दीन ही नहीं है.

इस्लाम के बहुत से पहलुओं पर अगर कुछ लोग मुत्मइन नहीं हैं तो यह उनका हक़ है.

मुसलमानों ने दीन को और खुद को इतना बिगाड़ दिया है कि सवाल तो उठेंगे ही.

इनको इतने बेबुनियाद, हलके जवाब दिए जा चुके हैं कि अब वो सही जवाब सुनना ही नहीं चाहते

ये सही जवाब सुनके कहते हैं कि फला किताब या आलिम तो ये कहता है. यानि ये हठधर्मी पर आये हुए हैं.

फिर एक वक़्त के बाद ego की वजह से ये न कुछ सुनते है और न ही कुछ मानते हैं.

कुछ इतना Famous और इतने आगे बढ़ चुके होते हैं कि उनके लिए वापिस आना नामुमकिन हो जाता है.

अल्लामा भी 15 साल तक नास्तिक रहे हैं. कम्युनिस्ट को contradictory और अधूरा पाया तो उन्हें भी छोड़ दिया. फिर basics से इस्लाम समझना शुरू किया, direct कुरान से सीखा और वापिस आये.

सही जवाब सुनके वापिस आने की एक मिसाल अल्लामा ने बताई थी जो कि एक students की जमात थी.

इस्लाम पर सवालों के जवाब हमें देने हैं, जुबान और अमल से (हॉस्पिटल में दवाई ऑफर करने वाली मिसाल)

इन्हें ज़ुबानी जवाबात देने के लिए इनके हिसाब से ही approach अपनानी पड़ेगी.

Debate वाले environment में सबसे पहले जगह और माहौल बदलें। (अल्लामा का एक वाकया दलित जानकर के साथ)

कुरान 5:101-102:किसी ऐसे मामले के बारे में न पूछो जो अगर तुम्हे वाज़ेह कर दिया जाए तो तुम्हें परेशान कर दे. लेकिन अगर क़ुरान में जो कुछ बताया गया है उसके बारे में पूछताछ करो तो वो तुम्हें वाज़ेह कर दिया जाएगा।अल्लाह ने इतिहास में किए गए कामों को माफ कर दिया है।तुमसे पहले भी कुछ लोग इस तरह के सवाल कर चुके हैं, फिर वे इसकी वजह से वो कुफ्र करने वाले हो गए.

[ये लोग दलील देते हैं कि कुरान खुद दिमाग के इस्तेमाल को मना करता है. जबकि कुरान जगह जगह दीन के मामले में भी गौरो फ़िक्र करने को कहता है. यह आयात तो हलाल और हराम के बारे में हैं, इनके बारे में गोरो फ़िक्र कर लो समझ आ जायगा. ज़्यादा तह में जाओगे तो फंसते चले जाओगे. खुद को फ़िज़ूल में मत बांधों. सख्ती में मत पड़ो. अति हर चीज़ की बुरी है. पहले भी लोगों इसमे खुद को उलझा कर बिगाड़ पैदा कर चुको हैं. तुम्हारे लिए सीधा सीधा बता दिया गया है. कुरान के बारे मं कुछ हो तो पूछ लो, उसकी इजाज़त है. तुम्हारे हलाल हरम वाले पहले के किये गए ऐसे कर्मों को माफ़ कर दिया गया है]

 

2. इनके कुछ सवाल है जैसे Who is God/ Does God Exist / Why he impose his will?  यानी Rational rules से Tauheed/creatorका वजूद समझाना है. वो अपनी इच्छा क्यों हम पर थोपता है, ये भी समझाना है क्योंकि यही इनकी असल problem है. ये अपने हिसाब से जीना चाहते हैं.

3. नास्तिकों के अलावा एक गैर मुस्लिम आस्तिक भी तौहीद से बहुत दूर है. इसलिए सबसे ज़रूरी तौहीद को समझाना है. हमारी रणनीति में जगह जगह तौहीद मौजूद होनी चाहिए.  Remedies में पहले नंबर पर तौहीद है भी.

4. Responses to fascism में भी है.

5. इनका पहला सवाल होता है कि क्या खुदा है? इसे हम atheist and ex-Muslims दोनों के नज़रिए से detail में आगे समझेंगे.

 

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1.

One Video on Existence of God

Science किसी चीज के purpose, reason, cause को जानने के लिए काम नहीं करती।

Science यह नहीं बताती की कोई चीज़ क्यों हुई, यह सिर्फ ये बताती है कि यह कैसे हुआ।

बहुत पहले philosophy और science एक साथ एक joint subject/ विद्या थी। Middle ages में जब, Europe में Renaissance आया तो सदियों तक rational लोगों का persecution हुआ, Galileo ने माफी तक मांगी। Church और Science एक दूसरे के सामने थे। तब आपसी सहमति के बाद science और religion एक दूसरे से अलग हुए और अलग अलग फील्ड बनी ताकि कोई किसी के फील्ड में दखलंदाज़ी न करे। 

इस्लाम के फोरन बाद बहुत से scientist मुस्लिम हुए। उनके पास पहले से ही बहुत से results थे, बस सिर्फ research करनी बाकी होती थी। मगर आज modern scientists trial and error method तरीका इस्तेमाल करते हैं। इस इस्लामी golden age के बाद दीन दो हिस्सों में divided हुआ। इस्लाम ने दीन और दुनिया लफ्जों का कभी एक साथ इस्तेमाल नहीं किया बल्कि हमेशा दीन के साथ आखिरत को लेके आया है।  Prophet ने इल्म को इल्मे नाफ़े और इल्मे गैर नाफ़े में divided किया था।

Scientific Approach stages

(i) Observation

(ii) Form a hypothesis: First raise some questions then form a view.

(iii) Make a prediction

(iv) Test the result of the hypothesis: The principal is that the Test should be reproducible/ repeatable. It may in a lab or universe. If the same result is reproduced then it will be a fact.

Science की approach है, पहले assume या suppose करना, फिर उसके लिए research करना, फिर अगर यह successful होता है तो इसे fact or theory के रूप में accept कर लेता है और अगर fail होता है तो इसे discard कर लेता।

Some Facts/Theories about creation:-

Natural selection : Scientist ने earth/living creatures कैसे create हुई, इसके लिए एक view form किया जिसे natural selection कहा जाता है।

 ◆Dark energy and dark matter: इस phenomenon पर सभी agree करते हैं कि यह exist करती हैं, मगर ये exactly क्या है, किसी को पता नहीं। universe का total mass इन्होंने पता लगा लिया है। Mass और Weight दो different चीजें हैं। Only 5% mass देखा जा सका है, 95% mass अभी तक देखा नहीं जा सका (हालांकि observe हो गया है?). इस 95% में 68% dark energy है और 27% dark matter. मगर वो यह नहीं मानते कि खुदा भी dark matter और dark energy की तरह visible नहीं है। (हालांकि observe किया जा सकता है?)

Time:  time कोई close circle नहीं बल्कि 2 ends हैं. Circle होता तो बार बार घूम कर फिर वैसा ही हो रहा होता जैसा पहले हो चूका है. जैसे हम यंहा बैठे हैं, फिर से सदियों बाद यहीं ऐसे बैठे होते. ऐसा ब्रहामाकुमारी वाले मानते हैं कि हर 5000 साल सब कुछ repeat होता है. हालाँकि ये duration time unscientific है. मगर इनकी यह बात सही है कि भारतीय परम्परा में समय को चक्र मानने वाले ये बात ज़रूर माने कि अगर वाकई ऐसा है तो समय और लोग लौट कर ऐसे ही आयंगे. Singularity एक beginning थी यानि ये open-circle है.

Singularity: Singularity वो था जिसकी कोई length, breadth नहीं थी। universal law यह है कि जिस भी चीज़ की beginning है, उसका एक end भी होगा और इसका vice versa भी होगा। एक bullet या ball पहले fast जाएगी और फिर वो slow और slower होती चली जाएगी। same logic sun, moon, earth पर applied करके उनकी end dates calculate करी गई। अपने last interview में Stephen Hawkins से जब पूछा गया कि singularity से पहले क्या था तो उसने कहा था कि nothing. मतलब एक beginning तो हुई है. उसने यह भी बताया कि future में एक ऐसा point of time आएगा जब हम यह आगे comprehend या understand ही कर पाएंगे की क्या हो रहा है।

 

Hadron Collider : हाल में सबसे बड़ी research जिसमें 100 countries और 1000 scientists involved थे। इसमें एक underground lab में neutron को randomly travel or move करवाया गया ताकि collide हो कर वो एक new particle called God Particle form कर लें। कोई meaningful creation इस experiment से form होनी चाहिए थी जो नहीं हो पाई।

 

Science is developing: some examples-

Universe: Scientists पहले ये claim कर रहे थे कि यह एक flat or tube like universe है मगर अब उनका यह view बदल रहा है।

Periodical Table: पहले ये incomplete थी मगर gradually complete कर ली गई। इसमें blank fields थी मगर कुछ को names and numbers allot कर रखे थे क्योंकि वो जानते थे कि जल्द ही वो इसे ज्ञात कर लेंगे और यही हुआ भी।

Black & White holes:  Black holes energy को absorb करते हैं। Scientist को पहले लगा कि energy continuously इसमें जा रही और खतम हो रही रही है मगर energy तो कम हो ही नहीं रही इसलिए अब उन्हे लगा कि जरूर white holes भी हैं जो millions of years से energy create कर रहे होंगे। सो अब white hole भी एक hypothesis है।


2. Creator & Creation

पहले कुछ चीज़ों के मतलब समझ लें.

मशियत: मतलब चाहत, wish, used particularly for divine will or will of God.

अल्लाह की मशियत या चाह है कि उसकी मार्फत हासिल करी जाए या पाई जाए.

संस्कृत में ईश्वर की इच्छा को ईक्षण कहते हैं (?)

मार्फ़त: मतलब किसी के बारे में अनुभव से सब कुछ जान लेना, Knowledge, cognition, cognizance, acquaintance, insight in divine matters or mysteries. हिंदी में अर्थ है, ईश्वर की अनुभूति पाना.

जैसे केले की मार्फत या असल स्वाद तो केला खा कर ही पता करा जा सकता है, वैसे ही अल्लाह की मार्फत भी उसे पा कर ही मालूम होगी. उसकी मार्फत तभी हासिल होगी जब उसकी मखलूक को Three Qualities यानि Intelligence, Intellect, Freewill मिले.

बुद्धि, विवेक, इच्छा :

Intelligence is one's ability to compute materials mentally. On the other hand, intellect is the capacity of materials in one's mind. Its like RAM and Processor ability.

Intelligence जानवरों में भी होती. मगर फिर भी इसानों के लेवल की नहीं होती. Intellect में इन्सान का कोई सानी ही नहीं है.

आस्तिक के लिए बात शुरू होती तब से जब सिर्फ वही एक अस्तित्व था. कोई और सदा से नहीं था.

वो जो असीम, सर्वशक्तिशाली, सभी गुणों में सर्वोच्च्य है.

मगर नास्तिक के लिए बात इस सृष्टि में दिख रहे एक order, pattern, arrangements, organized way से शुरू होगी.

हमें चीजें organized, arranged में दिख रही हैं. यानि एक organizer/Creator है.

वो हर वक्त active है, watchful है। सो वो जिंदा alive, Living entity होगा

जिंदा की चाह (असल में रज़ा) होगी, चाह नहीं है तो मुर्दा होगा।

उसकी चाह ज़ाहिर हुई, उसने चाहा उसे पहचाना जाये।

 उसके गुण, सिफत, attributes, qualities होंगी। गुण है तो गुण ज़ाहिर होते हैं।

उसने चाह कि उसके गुणों को मायने मिले, उसके गुण ज़ाहिर हो

Creation न हो तो creator की सारी सिफ्तें meaningless हो जाएंगी।

चाहे रचयिता के गुण पहले से हो पर रचना होगी तो रचियता होगा,

जैसे दया करने वाला तभी होगा जब दुसरे होंगे और दुसरो पर दया होगी.

 उसने चाहा, दुसरे का अस्तितिव भी हो.

Recognition चाहिए तो मखलूक भी होनी चाहिए.

राजा है तो प्रजा भी होनी चाहिए.

सबसे बड़ा है तो बहुत से उससे छोटे भी होंगे. यानि सबसे बड़े ने छोटे को पैदा किया.

बना के छोड़ दिया तो recognize नहीं करेंगे. Link रखना है. वरना नहीं पहुँच पाएगा।

(एक राबता भी रहे और न भी रहे।)

उसकी हमीयत तब होगी जब उसकी creation उसे बड़ा माने और बड़ा जाने।

बड़ा जानने से बढ़कर मकसद है, उसकी मशियत और मार्फत पाना। 

उसने चाहा उसकी रचना उसकी मार्फत हासिल करे यानि उसे completely जाने।

इसके लिए Creation में इसकी सलाहियत होनी चाहिए।

इसके लिए बुद्धि, intelligence, विवेक, intellect, इच्छा, free will,free choice सलाहियत चाहिए।

असली तारीफ वही है जो सब देख-समझ कर अंदर मन से निकले, जबरदस्ती न हो।

अगर टेप रिकॉर्डर अपनी तारीफ रिकॉर्ड करके चला दिया जाए तो यह असल तारीफ नहीं होगी.

जब free will, है फिर अच्छा बुरा दोनों होगा. क्योंकि मन मर्जी, इख्तियार, इरादा सभी के पास है।

सीमित क्षेत्र में या कर्मो के क्षेत्र में choice मिली.

Choice या discretion है तो Injustice होगा.

Injustice है तो compensation भी होगा. 

intelligence, intellect, choice तो फिर test भी होगा.

Test के लिए venue, Examination Hall, material, stationary, furniture होना चाहिए।

इंसान को जिंदा रखना था तो जिंदा रखने के लिए दूसरी चीजें भी चाहिए होती है।

इसलिए दुनिया में बहुत सी चीजें रखी गई, बहुत सी चीज़ें का अस्तित्व बनाया गया।

यानि इन्सान के लिए दुनीया-ब्रम्हांड बना.

दुनिया की चीजें (निर्जीव) खुद अपने से फायदा नहीं उठा रही, बल्कि दूसरों को उससे फायदा हो रहा है। पानी, आग, सूरज, आक्सिजन, सब्जी, फल, पत्थर, जमीन आदि।

इंसान इनसे फायदा उठा रहा है। सब एकोसिस्टम का पार्ट हैं। अगर यंहा से इंसान निकाल दे तो इनको फर्क नहीं पड़ेगा, ये ऐसे ही चलती रहेंगी। मगर इनमें से एक भी निकाल दी तो इंसान को जीना असंभव हो जायगा।

Test के लिए syllabus, books, guide, Teacher भी चाहिए.

Syllabus बता दिया जाता है या गया है. मानाने न मानने की मर्ज़ी है.

Guidance, inspiration के लिए role model भी चाहिए होते है.

Test के लिए असमानता होनी जरूरी है। inequality or non uniformity test के लिए बेहद जरूरी।

जैसे माल, सेहत, माली, जिस्मानी, उतार चडाव आदि।

Test के लिए marking हैं, passing marks fix किये हुए हैं। grace marks भी हैं।

passing marks 50% रखें क्योंकि 33% को आगे भेज दिया तो वो अक्षम होगा क्योंकि वो 67% नहीं जानता.

किसी से 100% marks  हासिल करवा कर भी साबित किया जाता है कि यह करना मुमकिन है। 

Pass तो next class और fail तो वही सड़ो.

कोई Product है तो उसका quality control test होगा।

Quality test में pass हुआ तो आगे भेज दिया जाएगा for use या जिस मकसद के लिए बनाया गया था।

असली मार्फत वहा होगी।

Fail तो recycle कर दिया जाता है, scrap में फेंक दिया जाता है या आग की भट्टी में गला दिया जाता है।

जैसे मेहमान नवाज़ी कैसी हो ये host और guest कैसे है इस पर निर्भर करता है।

कुछ गली से विदा, कुछ को घर में, कुछ ठहराया जाता है। मेजबान बेहद अमीर तो वैसा ही facilities


उदहारण: एक याददाश्त खोया हुआ आदमी खुद को पैसों से भरे एक bag के साथ सडक पर पाता है। उसे ये सोचना चाहिए कि वो कौन हैं, कंहा हैं, किसलिए है। मगर इसके बजाय वो पैसा उड़ाने में लग जाए तो यह गलती होगी. ऊपर से अगर पैसों का एक note नास्तिक है जिसमे लिखा है कि यह पैसे उसके मालिक के है। मगर वो कुछ नहीं सोचता। यही हाल विधर्मियों का है।  

 

मदर टेरेसा ने अच्छे कर्म किये, परलोक (आखिरत) न हुआ तो उसे कोई पछतावा न होगा, क्योंकि कम से कम यंहा तो इज्ज़त मिली. मगर परलोक हुआ तो हिटलर तो गया काम से, और यंहा जो ज़िल्लत मिली सो अलग. टेरेसा ने अपना पूरा जीवन दुसरो के लिए न्योछावर कर दिया मगर उन्हें इसका पूरा बदला यंहा नहीं मिला. इसी तरह हिटलर ने लाखों लोगो को रोज़ तड़पा तड़पा कर दर्दनाक मौत दिलवाई मगर वो खुद सिर्फ एक बार मरा. यानि असल न्याय कंहीं और मिलना है. 

जीवन परीक्षा है इसलिए यंहा असामानता बनायीं गयी ताकि परीक्षा हो पाए. अगर सभी एक जैसे या बराबर होते तो कोई परीक्षा हो ही नहीं पाती. सब pass होते जाते या fail. असमानता बनाते ही परीक्षा शुरू हो गयी है. असमानता से ही परीक्षा है. किसी स्कूल में बच्चों के साथ असमानता इसलिए नहीं करी जाती या परीक्षा इसलिए नहीं ली जाती क्योंकि बच्चे पहले से ही असमानता से ग्रसित हैं. कुछ गरीब हैं, कुछ नासमझ, कुछ पढने में कमज़ोर. इसलिए इन सबको पहले बराबर शिक्षा और समान परीक्षा पर्चा दिया जाता है ताकि उनकी तरफ से कोई असमानता न हो और बच्चे सामान अवसर पा कर अपनी पूर्व असमानताओं से आगे बढ़ सके. वैसे ढंग से देखो तो जुड़वाँ बच्चों तक में असमानता पायी जाती है.

{school बच्चों में पहले से ही inequality होती है। कुछ intelligent और कुछ गरीब होते हैं। मगर उन्हें equal opportunity मिलती है compete करने के लिए.  उन्हें अपनी performance के basis पर different marks भी मिलते है।}

 

3. Law & Order

Law & Order Implementation:

Law and order न हो तो गुंडाराज होगा. जबकि अभी तो सिर्फ यही शिकायत है कि police मनमानी करती, क़ानून, police, court, jail वगैरह न हो तो हर गुंडा राज कर रहा होता. सरकार Law and order न संभाले तो anarchy होगी. इसी लिए धर्म के कानून होते हैं. ईश्वर के कानून सर्वश्रेष्ट हैं.

{कहते हैं सबसे अधिक उत्पात आस्तिक मचाते आये हैं, यह गलत है, आज भी दुनिया के अधिकतर आस्तिक धर्म के कारण ही उतने बुरे कार्य नहीं करते जितने वो धर्म रहित होने पर कर सकते थे. धर्म न होता तो लगभग सभी स्वार्थ में पागले हुए होते.आस्तिकों के कारण ही दुनिया भली है, जितनी भी है। ईश्वर और धर्म में आस्था है तो दुनिया थोड़ी सही चल भी रही है, ये आस्था न हो तो अंधेरगर्दी मच जाए}

Law of God का आम मतलब है सारे universal, natural laws. विज्ञान इनकी invention नहीं करता बल्कि इनकी discovery करता है. यह तो पहले से ही मौजूद थे. पहले बस इन्सान समझ नहीं पा रहे थे. ऐसे ही खुदा के समाजी कानून होते हैं,उनको मानते रहोगे तो समाज और इन्सान फायदे में रहेगा और अगर उन्हें नहीं मानोगे तो नुकसान भुगतोगे.

4. Results, Gains

purposes के साथ results meaningful हैं।

सबसे पहले ये मान लें कि कोई ईश्वर है. इन्सान को सारे इखितियार दिए गए हैं मगर सारे result इंसान के इख़्तियार में नहीं दिए गए हैं. आप जो मर्ज़ी खाएं, आपकी मर्ज़ी मगर result system के मुताबिक़ ही मिलेंगे, चाहे जहर हो या दवाई. तुम्हे पहले ही बता दिया था की ये खाओगे तो ऐसा हो जायगा और वो खाओगे तो वैसा. उसी तरह काम कुछ भी करें, उसके result भी system हिसाब मिलेंगे. अगर तत्काल या instantly सभी कर्मों के नतीजे मिलने लगते तो कोई जानदार जीवित बच ही नहीं पाता और ये दुनिया भी नहीं चल पाती.

यह ज़िन्दगी अधूरी है. यंहा पूरा इंसाफ नहीं होता है. पुरे इंसाफ के लिए ज़िन्दगी आगे जानी चाहिए. इंसान की ख्वाहिशात पूरी होनी चाहिए.

जवानी में career बनाने की तय्यारी करते हैं. जब तक result पाने का वक्त आता है, तब तक अधेढ़ उम्र में पहुँच चुके होते हैं.  इसीलिए परलोक में परिणाम मिलने चाहिए और मिलेंगे.

 

Marshmallow Experiment or Test by Stanford University in 1972Class में बच्चों से कहा गया की इतना देर तक रुकोगे तो उनके लिए एक small मगर immediate reward मिलेगा या दो small rewards मिलेंगे. अगर वो room में और ज्यादा लंबे टाइम तक रुकते हैं तो इससे भी बड़ा reward मिलेगा. कुछ बच्चे कुछ देर रुके, कुछ ज्यादा देर तक और कुछ बहुत ज़्यादा देर तक. इन सभी को बड़ा होने तक बहुत से index and parameters के According judge किया गया. फिर यह पता लगा की जिन्होंने लंबा wait किया था उन्होंने भविष्य में बहुत कुछ हासिल किया. जबकि कम wait करने वालों को जीवन में कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली. यानी सब्र, इंतज़ार, करने वालो के कुछ बेहतर हासिल करने के इमकान ज्यादा होते है, जो सच्चे-धार्मिक लोग करते हैं. यह Long term and short-term gains का example है.

{नास्तिक सवाल कर सकते हैं कि जन्नत में सारी ख्वाहिश पूरी होगी तो फिर क्या कोई अपनी चाह से अल्लाह भी बन सकता है? इसका जवाब यह है कि हमारा evolution आगे की ओर होना है, न कि वापिस singularity की ओर. कोई भी ख्वाइश करने पर खुदा नहीं बन सकता क्योंकि इसके बदले किया जाने वाला कोई भी अमल इस दर्जे का इस दुनिया में है ही नहीं और न हो सकता है. जैसे जन्नत के दर्जात है, निचले वाला ऊँचे में जाने की ख्वाहिश नहीं कर सकता क्योंकि उसके अमल उस लायक नहीं है. जो खुदा बनने का अहल हो सकता है वही तो खुदा बन सकता है. इस कायनात में ऐसा कोई potential है ही नहीं जो खुदा के दर्जे तक ले जाए. इसके अलावा वंहा ऐसी ख्वाहिश ही पैदा नहीं होगी क्योंकि तुम खुद वंहा अल्लाह की अजमत देखोगे तो यह ख्वाहिश ही बेवकूफी नज़र आएगी.}

 

5.Why is God egoist, why does he want to throw people in hell?

क्योंकि यह एक natural process of justice है.

(हमारे फायदे के लिए कानून होते हैं, अगर कोई तोड़े, उसे सजा मिलनी लाज़मी है.)

There are 4 stages of Justice:

Making Law – Implementation of Law – Judgement – Execution.

(वैसे ये सभी corrupt हो चुके हैं।  हर stage पर एक नया आदमी इसको ensure करता है। अगर कोई एक आदमी ही सभी stages पर इनको ensure कर रहा होता तो ये आज और भी ज्यादा corrupt हो चुके होते। 

दूसरी तरफ, अल्लाह के laws हैं, उसकी implementation है, उसके judgments है और उसी की execution है. (खुदा ये सभी काम अकला perfectly करता है क्योकि ये उसकी characteristics है जैसे रहमत)

 

6. The main problem of Atheists/Agnostics

Atheists यह मानना ही नहीं चाहते कि कोई खुदा है. वो कोई trial या exam ही नहीं चाहते. हालाँकि उन्हें समझाना चाहिए कि Exams evaluation के लिए होते हैं, harassment के लिए नहीं. Syllabus and guidance इसे pass करने के लिए ज़रूरी है.

कुरान guidance है. Guidance उतनी ही ज़रूरी है जितना jungle में signboards कि उधर मत जाओ, उधर हाथी हैं. तुम पहले यह नहीं जानते थे, मगर अब जान गए हो इसलिए अब भी उधर गए तो तो यह तुम्हारी गलती होगी और इसका खामियाज़ाना भी भुगतना होगा. सो तुम ही जहन्नुम में जा रहे हो, वो तुम्हे नहीं भेज रहा. उसके laws हर जगह काम कर रहे हैं.

सभी उसके दिए law पर ज़िन्दगी चला रहे हैं जिसे हम चाह कर भी नहीं बदल सकते.

तो फिर उसने जो हमें जिस जिस में choice दी है, उनमें उसका law क्यों नहीं मानते?

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2 Video on Mathematical Miracles, Qaume Samood & Parmanas from Orientation Classes

1. Ex-Muslim

जिन्हें नहीं समझना है या जिन्होंने तय कर लिया है, वो नहीं समझेंगे.

जब आप उनसे creator पर बात करते हो तो वो पूछते हैं कि खुदा को किसने बनाया?

उनसे organizer/manager/व्यवस्थापक पर बात करें.

Universe/ Human Body, Brain, Eyes examples दे


2. Start with Quran being a miracle

कौमे समूद की बस्ती : Late 20th century में कौमे आद की बस्ती ज़मीन से निकली है. कुरान में जिसका ज़िक्र है. इसाई ऐतराज़ करते आ रहे थे की यह मुस्लिम ने गड ली क्योंकि कंही मिल नहीं रही थी. वो बाकी चीज़ों पर भी कहते थे कि सब इसाईत से ही ली है. हालाँकि वंहा के काबाइल ये मानते आ रहे थे की वंहा ऐसी बस्तियां थी. यह बात खुदा ही जनाता और उसकी किताब ही बता सकती थी.

Other Scientific Miracles. कुरान में 100 के करीब वैज्ञानिक facts हैं।

Quranic Predictions about Abu Jahal, Muslims and fall of Mushrik.

Quranic Ayats were composed at different times but in the last year of Prophet's life, they were re-positioned completely and placed at their present places in Quran by inserting them in between, at start and at end with other Ayats or in Surah as per their contexts. Amazingly, wherever they were placed that form a rhythm and rhyming with the previous and later Ayatas.

Seen flaws in every book after 100 years expect in Quran.

Examples of people who reverted to Islam just by reading simple translation of Quran.

Equal numbers of matching words.

Mathematical miracles or numerical codes of Quran till date


3. Mathematical miracle of Quran for it being the word of God and unchanged.

कोई इन्सान मायनों का इनकार कर सकता है मगर Mathematical miracles का नहीं।

अगर करता है तो कटुहुज्जती पर आया हुआ है।

अबू जहल, अबू लहब नहीं मानना चाहते थे तो वो नहीं मान पाए।

कटुहुज्जती वालों का कोई इलाज नहींहै।

मुखालीफ़ों ने कभी कुरान के literary excellence पर ऐतराज नहीं उठाए बल्कि उलटा इसकी indirectly तारीफ ही करी।

किसी जुबान में कोई किताब है, उसके मायनों पर सवाल सिर्फ वही लोग उठा सकते हैं जो उस जुबान के बोलने वाले यानी माहिरीन है, न कि दुरसी जुबान वाले. क्योंकि वो लोग भाषा शैली, मुहावरे, भाव आदि को जानते हैं. इसलिए लोगो को बिना गहराई समझे, पराई भाषा के ग्रंथो में कमियाँ नहीं निकालनी चाहिए.

 

4. Mathematics is the language in which God wrote the universe - Galileo (1564-1642 AD)

Math is most accurate, not science.

scientific evidence का कोई इंकार कर सकता है और कई राय हो सकती है.

मगर mathematical proof का कोई इंकार नहीं कर सकता.

Maths or Numerical science एक new science है.

2+2=4 होता है हमेशा. अगर किसी का answer 3.99 or 4.01 है तो गलत है और zero marks

 

5. Challenges in Quran

12:2: हमने कुरान अरबी में उतारा है ताकि तुम इसे समझ सको.

[अरबी लोगो से ये बात कही जा रही है. यानी अगर अज़मी कुरान नाज़िल हुआ होता तो लोग कहते कि ये तो समझ में नहीं आ रहा। इसलिए इसे समझना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है]

11:13/10:38/2:23-24: अगर सच्चे हो तो ऐसी 10/1/1 सूरत ले आओ, और अगर तुम ऐसा न कर सको और ऐसा नही कर सकोगे.

[Records बताते हैं कि कुछ ने कोशिश करी मगर वो पागल हो गए। जो लोग थोडा कुछ लिख पाए उन्हें experts ने ख़ारिज कर दिया कि कुरान से कोई मुकाबला ही नहीं. अब तो लोग ये challenge ही नहीं लेते। ये तो सिर्फ मायनों की बात थी इससे अलग कुरान में codes follow हुए हैं, उन्हें ध्यान में रख कर कुछ लिखना तो भूल ही जाओ]

41.53: जल्द ही हम इस कयानात में और उनके भीतर अपनी आयतें दिखाते चले जाएंगे जब तक वो ये न कह दे की यह कुरान हक़ है.

[कुरान में मोजज़े लफ़्ज़ नहीं आया है। इसकी बजाए आयात लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ है। हदीस में आता है की कुरान के मायने खुलते चले जाएंगे। यानि आयतें पहले भी और आइंदा भी साबित होती चली जाएंगी। लोग कहते हैं कि पहले आप इन आयतों से कुछ और मतलब निकालते थे और अब कुछ और मतलब निकाल रहे हो। पहले जो मायने थे यकीनन वो सही थे और आगे भी रहेंगे। मगर नए नए मायने इसी में से बरामद होते चले जाएंगे। क्योंकि लफ़्ज़ limited है और मायने unlimited है। कुरान ऐसी जुबान और ऐसे लफ्जों मे नाज़िल हुआ है जिसके मायने बहुत गहरे और vast है। कुरान  ज़िंदा कलाम है]

 

6. Numerical Codes in Quran

74:30: उस (यानी जहन्नुम की आग) पर 19 (यह एक दलील बनेगा)

15:87: बार बार दोहराने वाल 7 और कुरान दिया

 

7. Meaning of these Ayats

74: 24-31: आखिर वह बोला कि यह तो बस एक जादू है, जो पहले से चला आ रहा है और यह तो मात्र मनुष्य की वाणी है। मैं शीघ्र ही उसे 'सक़र' (जहन्नम की आग) में झोंक दूँगा। और तुम्हें क्या पता कि सक़र क्या है? वह न तरस खाएगी और न छोड़ेगी, खाल को झुलसा देनेवाली है, उस पर उन्नीस (कार्यकर्ता) नियुक्त हैं। और हमने उस आग पर नियुक्त रहनेवालों को फ़रिश्ते ही बनाया है, और हमने उनकी संख्या को इनकार करने वालों के लिए मुसीबत और आज़माइश ही बनाकर रखा है।

[उस पर उन्नीस यानि No. 19 है. कुरान कई जगह कुछ बयान करके पूछता है कि क्या समझें, क्या तुम्हें पता है वगैरह. ऐसी आयतों पर बहुत ज्यादा गौरो फिक्र करनी होती है।]

15:87:हमने तुम्हें बार बार दोहराने वाला सात और महान कुरान दिया

[यानि कुरान और दोहराए जाए वाला No. 7 दिया. यंहा लफ्ज़ ‘वा’ है जिसके मायने है - और, न कि यानी]

 

8. No. 19 & 7 (Codes of Quran)

इन दोनों codes से बहुत से numbers divide होते चले जाएंगे।

यह कुरान की दो locks and keys है। एक double security system रखा गया है।

 एक आयात के बाज़ वक्त कई मह्फूम निकलते हैं.

जो पहले निकाले वो भी दुरुस्त थे. जो और गहन छान बीन कर अब बाद में समझे वो भी दुरुस्त है.

इन दोनों digits पर कुरान ने साफ़ साफ नहीं कहा.

ऐसा इसीलिए कहा की एक वक़्त आएगा जब इसे decode कर लिया जाएगा.

जैसे बड़े बड़े शायरों की शायरी के आज भी नए नए मतलब निकाले जाते हैं जो शायर ने कभी शायद सोचे भी न हो.

मगर अल्लाह अपनी हर बात के सारे मतलब जानता है सो वो ऐसा लिख सकता है जिसके मायने बाद में और बेहतर ढंग से समझें जायंगे.

कुरान में मुकम्मल हिदायत है और साथ ही दुनिया के बहुत से उलूम है।

कुरान के मायने या संदेश तो लाजवाब है मगर खुद  कुरान एक coded कलाम भी है।

कुछ लफ़्ज़ बदलो, निकालो या जोड़ों तो पूरा code हिल जाएगा।

बाकी formulas भी गड़बड़ा जाएंगे।

यह 2 codes तो अब खोजे गए हैं जो accurate लागू हो रहे हैं।

इससे पहले कुछ कुरान मे कुछ abruptly फेर बदल की जाती या लफ़्ज़-आयतें आगे पीछे कर दिए जाते तो यह codes ऐसे लागू ही नहीं होते।

कुरान एक साथ नाज़िल होता तो ऐसे codes रखे जाने का कोई इमकान हो सकता था मगर कुरान की आयतें तो 23 साल में मामलात और जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा नाज़िल होती रही और तरतीब लेती रही।

इसलिए जो हमारे पास कुरान है वही असल है, न ही इधर उधर पाई जाने वाली इखतेलाफ़ी मूसहफ।

नबी तो पढ़े लिखे नहीं थे. सहाबा भी कम पढ़े लिखे थे.

एक हदीस में आता है कि नबी कहते हैं कि हमें हिसाब नहीं आता.

इसलिए नबी ने उँगलियों से 30 दिन गिनवाए और कहा कि max. इतने दिन का महिना होता है.

इसलिए यह हो नहीं सकता कि ऐसा कोई इन्सान या कौम जो उम्मी है, 1400 साल पहले इतने जटिल codesके साथ ऐसी कोई किताब लिख दे.

उलेमा के इस 19 से अलग अलग मायने मुराद लेते हैं जैसे कि फरिश्तों की संख्या 19 है।

कुरान के इस 7 से उलेमा नमाज़ में बार बार दोहराने जाने वाली सूरह फातिहा से मुराद लेते हैं। यह अपनी जगह मुराद ठीक है। मगर आयात कहती है कि 7 और कुरान दिया। जबकि फातिहा तो खुद कुरान का हिस्सा है। 

लोग ऐतराज कर सकते हैं कि 19 & 7 ही क्यों। कोई और digits क्यों नहीं? कुछ और रख लेते तो फिर भी यह लोग कहते कि वो क्यों? सबसे पहली बात कुरान ने खुद इन दोनों digits का जिक्र किया है। और ये भी कहा है कि यह 19 इनकार करने वालों पर दलील बनेगा। जैसे क़ाबा को मरकज बनाने पर लोग सवाल करते हैं। कुछ और क़िबला होता तो उस पर भी सवाल कर देते। काबा के किबला होने के पीछे अल्लाह की कोई वजह हो सकती है मगर कुछ वजह हमनें खुद मालूम कर ली। ऐसे ही 19 & 7 की कुछ वजह हमने मालूम कर ली है।

मिस्र के रशद खलीफा ने 1970s में यह No. 19 वाली खोज की. फिर कहा की सिर्फ सुरह तौबा की आखिरी 2 आयतें extra है अगर इन्हें निकाल दे तो मेरे system पर क़ुरान pass हो जायगा. बाद में फिर नबी होने का दावा कर दिया. फिर उसक कतल हो गया. हमें इनकी तहकीक को पूरी तरह analyze करना था. कुछ तारिक सर ने करी और अपनाई. किसी की अच्छी चीज लेना बुरी बात नहीं है.

 

9. Ancient Arabic alphabet-numerical representation system or table

इन codes को समझने से पहले इस table के बारे में जान लेते हैं. इसका इस्तेमाल code 19 के साथ होगा. यह अरबी के letters की numbering की एक कदीम table है जो नबी से पहले से ही चली आ रही थी. इसी से बिस्मिल्लाह का 786 number बनाया गया है। इसमें हर letter को एक random number दिया गया है.


10. हुरूफ़ए मुक्कतात

ये codes हुरूफ़ए मुकातात पर इस्तमाल किये जायंगे इसलिए पहले इनके बारे में थोडा जान लेते हैं. कुरान में हुरूफ़ए मुकातात क्यों आए हैं, इसकी वजह नहीं मालूम। ये अंदाजे बयान है। इस पर इखतेलाफे राय हैं।  कुछ कहते हैं कि  वजह अल्लाह को ही मालूम है। सिर्फ अल्लाह ही जानता है यह कहना ठीक नहीं है। अगर ये इंसानों के लिए है ही नहीं  तो फिर नाजिल क्यों हुई?, ये बात शाह वालिलुल्लाह ने भी कही थी. कुरान बंदों के लिए आया है तो उसके मायने का इल्म बंदों को भी मिलेगा। पहले कुछ नहीं समझ पाए तो बाद में ज़रूर कुछ समझेंगे. आइंदा वक्त में आसल मायने मालूम हो सकते है। मुजदिद अल्फ्सानी मुताशाबिहात के मायने सिर्फ अपने शागिर्दों में बयान करते थे और मुकातात के मायने सिर्फ अपने खलीफा को बयान करते थे. आज तक के इन्हें दिए गए मायने, ज़्यादातर खींचातानी है. फिलहाल इसके मायनो पर बात नहीं कर रहे. मगर इसकी positions तो यही हो सकती थी जो कि इन codes से मालूम पड जाती है। ये 29 आयतों से पहले आते हैं। अरबी के 28 alphabets में से 14 इसमे इस्तेमाल हुए हैं। इसके 14 ही set बनते है।


11.Some Important points on No. 19 & No. 7

इन सभी calculations में repeat होने वाले numbers को सिर्फ एक बार ही लिया गया है।

preposition को नहीं लिया गया है.

nouns लिए गए हैं. जो उसूल लिया वो शुरू से आखिर तक follow किया गया है.

Among 5 pillars of Islam no calculations on Imaan has been done.

एक हदीस में अल्लाह के 99 नामे आए हैं। मगर अल्लाह के सिर्फ 99 नाम नहीं है, वो तो unlimited हैं.  Approx 400 सिफ़ाती नाम हैं। ये नाम वो दीगर ज़ुबानों मे बदल भी जाते है।

एक सूरत में बिस्मिल्लाह नहीं आया है, एक में बीच में आया है। इसके पीछे की हिकमत नहीं पता। कुछ कहते हैं क्योंकि बिस्मिल्लाह से शुरू होने वाले एकमात्र सूरत में चेतावनी भरी है इसलिए बिस्मिल्लाह से शुरू करने का औचित्य ही नहीं बचता।  मगर इन codes से वजह मालूम पड रही है। बिस्मिल्लाह के खड़े अलीफ़ को नहीं गिना गया है, यह तो मात्रा की तरह है।

कुरान में सभी जगह कौमे लूत कहा गया है, सिर्फ एक जगह को छोड़ कर जहा इखवाने (मतलब भाई) लूत कहा गया है।


12-15. Long list of related words/equal times in Qur'an

Hayat & Maut – 145 times

Malaikah & Shayateen – 88 times

Salihat (righteous deeds & Sayiat (evil deeds) – 167 times

Duniya & Akhira – 115 times

Jahr (saying aloud) & Alaniyah (in public) – 16 times

Mahabbah (love) & Taah/Jaah (obedience) - 83 times

Huda (guidance) & Rahma – 79 times

Salam (peace) & Tayyibat(good and clean things) – 50 times

Shiddah (hardship) & Sabr – 102 times

Zakat & Barakah (blessings) – 32 times

Etc.

 

16-96. PPT for 19& 7


97. Open Challenge

आखिर में अब एक खुला challenge पूरी दुनिया को कि मौसम पर एक खूबसूरत meaning and rhyme वाली book or novel or poetry collection लिखें। उसमे कम से कम 17 chapters हो और हर chapter की line no.  17 मे आने वाले सभी 'बे और मीम' हुरूफ़ 17 से divide होने चाहिए। इसमें आने वाले सभी मौसम, सुबह, सूरज लफ़्ज़ भी 17 से divide होने चाहिए। ये सिर्फ 3 शर्त है जबकि कुरान में ऐसे कितने codes हैं। लोग पागल हो जाएंगे मगर लिख नहीं पाएंगे। Words change हो जायंगे, literary meaning dilute हो जायगा. इसके अलावा दुनिया भर के उलूम और हिदायत जैसे कुरान में हैं वो भी शामिल नहीं कर पाएंगे। AI अगर आज थोडा सा ऐसा लिख भी दे मगर कुछ साल पहले तक ये बिलकुल ही नामुमकिन था.

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क्या ईश्वर है? - दर्शन शास्त्र से सिद्ध करना।

Philosophy-Arguments

हिन्दुओ की संस्कृति, परम्परा आदि से ही ऐसी चीज़ें ले और इनके द्वार अपने मत को सिद्ध करें और समझाए.

भारतीय दर्शन में किसी भी दावे को परखने के लिए सिद्धांत बताए गए हैं. यानी अगर कोई दावा लाये तो उसे किन आधार या प्रमाणों पर परख कर प्रमाणिक माना जायगा।
 
इसमें 4 मुख्य प्रमाण होते हैं (वैसे 6 तक होते हैं, अलग अलग दर्शन 1-6 तक मानते हैं)पश्चिम दर्शन भी इनमें से कुछ (3-5 को) मानता है. कई दर्शन कुछ प्रमाणों को दुसरे प्रमाणों के अंतर्गत मानते हैं, इसलिए गिनती में भेद हो जाता है. जो दावा चारों (जितने अधिक) पर सिद्ध होता है उतना सर्वमान्य होता है. अगर केवल एक पर सिद्द होता है तो कम प्रामाणित होगा परन्तु फिर भी प्रामाणित माना जायेगा।
 
सर्वप्रथम न्याय दर्शन ने प्रमाण दिए. मीमांसा ने 6 प्रमाण माने हैं. वेदान्त दर्शन ने 3-6 [अद्वैत 6 और बाकी सभी 3 मानते हैं]. न्याय और वैशेषिक ने 4 माने हैं. सांख्य और योग ने 3. जैन धर्म ने 2-3. बौद्ध ने 2 प्रमाण (प्रत्यक्ष व अनुमान) माने हैं. चार्वाक ने केवल 1 (प्रत्यक्ष प्रमाण) माना है.
 
मीमांसा दर्शन में 'शब्द' से आशय वेद (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद), वेद सम्मत स्मृतियों आदि से हैं. वेदांत दर्शन में 'श्रुति' (वेद, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि) से. योग दर्शन में 'आगम' (ऋषियों, मुनियों, सिद्धियों के परम्परागत अध्यात्मिक उपदेश) से है, हालाँकि शैव (तंत्र), वैष्णव, शाक्त, बौद्ध और जैन के आगम ग्रन्थ भिन्न होते हैं.
 
 
1. प्रत्यक्ष/Perception/Empiricism as called in West: सामने मौजूद, इन्द्रियों से हासिल ज्ञान या प्रमाण. Like Touch, see, smell, hear, taste etc. हालंकि senses में न आने वाली या सिर्फ महसूस होने वाली चीज भी exist करती है.

2. अनुमान/Inference: अनुमान आधारित, यथार्थ ज्ञान अनुमान द्वारा प्राप्त तो अनुमान प्रमाण होगा. जैसे कपडे हिल रहे हैं तो हवा चल रही है (कोई हिला भी सकता है मगर धुल, पत्ते उड़ रहें है और सायं सायं आवाज़ भी आ रही है वगैरह)।

3. उपमान/Comparison: इसका अर्थ यथार्त ज्ञान की प्राप्ति, तुलना के माध्यम में, सम्बन्ध स्थापित करने से. जैसे जिस व्यक्ति ने खच्चर को देख रखा है अगर उसे गधे का हुलिया समझाएं तो समझ जाएगा की दोनों एक ही तरह के जानवर हैं। 

4. शब्द प्रमाण/आप्त वचन/आगम/Words/testimony/authority: यह Credible instructions, knowledge, enlightened words हैं। अर्थात यह हैं आप्त पुरुष के उपदेश जिसने धर्म और सब पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को भली भांति जान लिया हो। गवाही, आधिकारिक स्रोतों, शास्त्रों से बयान जैसे, वेद, ऋषि, संतों, गुरु (प्रत्येक दर्शन में उपलब्ध) आदि के कथनों से उत्त्पन्न शब्द प्रमाण हैं। ईश्वरवाणी भी शब्द प्रमाण है. इसलिए हिन्दुओ आदि को कोई चीज समझाने के लिए कहिये कि पहले इस बारे में आपका वेद जो कि शब्द प्रमाण है, वो क्या कह रहा है, वो तो देखिए। 
 
5. अर्थापत्ति/Implication/Presumption: परिस्थिति से निष्कर्ष निकलना. जैसे वेह दिन में नहीं खाता पर फिर भी मोटा है यानि वह रात में खाता होगा.
6. अनुपलब्धि / अभाव/ Non-existence/Negation: अभाव का ज्ञान. जैसे यहाँ पहाड़ नहीं है.

7. तर्क-बुद्धि/Reason/Rational (Western): बुद्धि व तर्क से प्राप्त ज्ञान. जैसे गणित, तर्कशास्त्र.
8. अंतर्ज्ञान/Intuition (Western): तर्क के चरणों से गुजरे बिना अचानक उत्पन्न हुआ. जैसे समाधि में प्राप्त ज्ञान.
 
मोटे तौर पर प्रमाण स्वतः प्रमाण (स्वयं उसी ज्ञान से सिद्ध, बाहरी ज़रूरत नहीं होती जैसे प्रत्यक्ष) और प्रथा प्रमाण (परंपरा के आधार पर प्रमाण, बाहरी स्रोत पर निर्भर जैसे शब्द) में भी बांटे जाते हैं. 
 
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