क्या चरण स्पर्श करना शिर्क है?
पैर
छूने से मतलब खुद को छोटा मानने और दूसरों को बड़ा मानने से होता है। ऐसा
माना जाता है कि पाँव छू कर मन में विनम्रता पैदा होती है और अहंकार कम
होता है। इसके माध्यम से बड़ों का आशीर्वाद (या दुवाएं) लिया जाता है। यह एक
तरह से छोटा सा शारीरिक व्यायाम भी है।
भारत में पैर छूने का रिवाज और परंपरा बहुत पुरानी है। केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन जैसे नास्तिक धर्म वालों में भी सम्मान और आदर के लिए पैर छुवे जाते हैं क्योंकि उनके धर्मों में तो ईश्वर की कल्पना ही उपलब्ध नहीं है। झुक कर पाँव छूने का अर्थ यह नहीं है कि आपने सामने वाले को ईश्वर मान लिया। कृष्ण जी ने अपने मित्र सुदामा के चरण स्पर्श किए थे और उन्हें धोया भी था। इसका अर्थ यह नहीं था कि कृष्ण जी ने सुदामा को ईश्वर मान लिया था।
हदीसों से साबित है कि सहाबा नबी के हाथ-पाँव चूमा करते थे (अदब अल मुर्फ़द 975). यंहा तक कि यहूदी भी आपके हाथ-पाँव चूमा करते थे (माजह 3705, रियाद अस सालीहीन 889, तिरमिजी 2733, 3144, मिशकात 58, नसाई 4078). हज़रत अली तो हज़रत अब्बास के हाथ- पाँव चूमा करते थे (अदब अल मुर्फ़द 976). ज़ाहिर है पाँव चूमने के लिए अक्सर झुकना पड़ता है. इसलिए अदब में पाँव चूमना जायज़ है और अदब में पाँव छूने के लिए झुकना भी जायज़ है.
पाँव छूना
भारत में गैर मुस्लिमों में अपने बड़ों के अदब में पाँव छूना एक परंपरा है। यह इतना आम है कि नास्तिक मजहब वाले लोग भी इसे करते हैं। इसका मतलब किसी को अपना ईश्वर या भगवान मानना नहीं होता। यह सिर्फ बड़ों को सम्मान देने और खुद को छोटा मानने का अलामती इजहार है। ये कुछ ऐसे ही जैसे बड़ों के पैरों के चूमा या धोया जाता है या माँ के पैरों में जन्नत है कहा जाता है या जैसे कोई कहता है कि तुम्हारे कदमों/ठोकर में मेरी दुनिया/इज्जत है।
मुस्लिम में पैर छूने को शिर्क माना जाता है. जबकि नबी के पैर चूमने तक की बात हादिसो में आती है. पैर चूमने के लिए भले ही इबादती या ताज़ीमी सजदे की तरह न झुके हो, मगर कुछ हद तक तो झुकना पड़ेगा ही।
माजह 3705/तीरमीज़ी 3144: यहूदियों में से कुछ लोगों ने नबी के हाथ-पैर चूमे और कहा कि हम गवाही देते हैं कि आप पैग़म्बर हैं।
सुन्नन अबी दाऊद (on Islam Q&A): ज़ारीजो अब्द क़ैस के प्रतिनिधिमंडल में से थे, ने कहा: हम अपने हौदों से बाहर निकलने लगे और हमने पैगंबर के हाथों और पैरों को चूमा.
अल अदब अल मुफ़रद 976 (इमाम बुखारी): शुहैब ने कहा कि मैंने अली को हज़रत अल-अब्बास के हाथों और पैरों को चूमते देखा।
इबादती सजदा तो हराम है। आदम के सामने और यूसुफ के सामने किये जाने वाले सजदो का जिक्र कुरान में है। आदम और युसूफ वाले सजदे पर दो राय है. पहली कि इसका मतलब ताबे आने है जैसे चाँद सूरज अल्लाह के ताबे हैं. दूसरा यह की ये ताज़ीमी सजदे थे जो अदब में किये जाते हैं, न कि इबादत के तौर पर।
एक हदीस से मालूम पड़ता है कि नबी ने उम्मत
के लिए ताज़िमी सजदे को भी मना फरमाया है।
दावूद 2140: एक साहबी ने आके नबी ने सजदा किया। नबी ने कहा कि क्या मेरी कबर को भी सजदा करोगे, साहबी ने कहा नहीं। तो नबी ने कहा कि तो फिर ऐसा मत करो. अगर मुझे किसी को सजदा करने की हिदायत देनी होती, तो मैं महिलाओं को अपने पतियों को सजदा करने की हिदायत देता।
[आप ने यंहा शिरक की बात नहीं कही, यह ताज़ीमी सजदा था]
इब्ने हिब्बान 4162 : किसी के लिए किसी दूसरे को सजदा करना उचित नहीं है। अगर किसी के लिए किसी और को सजदा करना उचित होता, तो मैं पत्नी को अपने पति को सजदा करने की हिदायत देता।
[आप ने यंहा भी सिर्फ इसके appropriate न होने की बात कही, यानि एक हद तक/हद्दे रुके से ऊपर तक अदब में झुका जा सकता है]
तिमिरजी 2728 (जईफ): किसी ने पूछा कि जब हममें से कोई व्यक्ति अपने भाई या दोस्त से मिले तो क्या उसके सामने झुकना चाहिए?" नबी ने कहा: नहीं। उसने आगे पूछा: क्या उसे उसे गले लगाना और चूमना चाहिए? नबी ने कहा: नहीं। उसने फिर पूछा: क्या उसे अपना हाथ पकड़कर हिलाना चाहिए? नबी ने कहा: हाँ।
[हदीस जईफ है। नबी ने गले लगाने और चूमने को भी मना कर दिया। जबकि यह दोनों अमल तो हमेशा से ही जायज है]
चुटिया, चोटी, शिखा
ह. अब्दुलाह इब्ने मसूद की एक चुटिया थी, हज के दौरान: अहले हदीस आलिम कि किताब फिकह अस सुन्नाह किताब में लिखा है।
नसाई 5051: नबी ने अल क़ज़ा को मना फरमाया है (to shave part of the head and leave part).
नसाई 5050: नबी ने कहा कि अल्लाह ने अल क़ज़ा को मना किया है
दावूद 4195: नबी ने एक लड़के को देखा जिसके सिर का एक हिस्सा मुंडा था और एक हिस्सा मुंडा नहीं था। नबी ने उन्हें इससे मना किया और कहा कि या तो पूरा मुंडवा दो या पूरे बाल रखो।
बुखारी 5920: उबैदुल्लाह ने नफ़ीसे बयान किया कि रसूल ने अल क़ज़ा को मना करा है। पूछा गया कि अल क़ज़ा क्या है? उबैदुल्लाह ने अपने माथे और सिर के किनारों की ओर इशारा किया और कहा जब कोई लड़का अपना सिर मुंडवा ले और बालों का एक गुच्छा इधर और एक उधर छोड़ दे। पूछा गया क्या यह लड़कियों और लड़कों दोनों पर लागू होता है? उन्होंने कहा पाता नहीं, लेकिन नफी ने इसे लड़के के बारे में बताया था। नफी ने कहा था कि जहां तक लड़के की कनपटी और सिर के पिछले हिस्से पर बाल रहने की बात है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है (यंहा मतलब कलमों और गुद्दी के चोटी की तरह बाल छोड़ देने से है), लेकिन अल-क़ज़ा का मतलब है अपने माथे (पेशानी) पर बालों का एक गुच्छा छोड़ना है या सिर के किसी एक तरफ (या दोनों किनारों पर भी) बाल छोड़ना है जबकि उसका बाकी सिर्फ मुंडा हो।
[हादिसो में है कि नबी ने अल क़ज़अ को मना फ़रमाया। ज्यादातर हादिसो में सिर्फ इस लफ़्ज़ को रेफ़र करके इसे मना करा गया, न कि नबी ने इसे डायरेक्ट समझाया। एक हदीस में आपने कहा कि या तो पूरे बाल रखो या फिर कहा या फिर पूरे मुंडवा देने को। जबकि एक हदीस में नबी ने इसे अल्लाह की तरफ से मना किया है। कुछ हदीस में इसके मायने रावियों ने या मुहददिसो ने समझाए है कि इसके मायने हैं सिर के बाज़ हिस्से को मुंडवा देना और बाज़ में बाल बाकि छोड़ देना]
हदिसो से साफ है कि नबी ने यह बात एक बच्चे को देख कर फरमाई। बुखारी की रिवायत से साफ पता लगता है कि यह बात बच्चों का सिर मुंडवाने से संबंधित है। सिर मुंडवाना सबसे पहले जन्म के फ़ौरन बाद किया जाता है। यानी ये बात नबी ने बुनियादी तौर पर वयस्कों के लिए नहीं कही थी। इसी से पता लगता है कि बच्चो और बड़ो दोनों के लिए पीछे चोटी रखने में कोई हर्ज नहीं.
कज़अ के मायने उलेमा ने अलग अलग दिए है। इमाम कस्तालनी ने कहा है कि यह मर्द औरत लड़के सबके लिए मकरूह है क्योंकि यह यहूद की मुशाबिहत है. पहली बात, मुशाबिहत वाली हदीस का हुकुम किसी और पसमंज़र में है. दूसरी बात कुछ मालिकिया उलेमा का मानना है कि कज़अ के मकरूह होने की वजह खिलवत को बिगाड़ना और बुरे लोगों की रविश इख़्तियार करना है.शायद उस ज़माने में यहूद अपने बच्चो के मुंडन इसी तरह बाल छोड़ छोड़ कर किया करते थे, इसलिए इसे मना किया गया है. ऐसा भी लिखा गया है कि कफ्फार में बुतों के नाम पर कुछ बाल छोड़ दिए जाते थे. अहले बिदत में भी पीरों और बुजुर्गो के नाम पर कुछ लटें छोड़ देते थे. शायद इसी की वजह से इसे मकरूह कहा गया है. हालंकि इस पर इज्मा है कि इलाज के लिए अलग अलग जगह से बाल मुंडवा सकते है.
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