Wednesday, 1 May 2024

शिर्क, बिदत में फ़र्क़ और करुणा दिवस, संस्कृति, त्यौहार क्या बिदत हैं?


शिर्कअल्लाह की ज़ात में किसी को शामिल करना शिरक है। (यानि नियत में शिरक होना या अमलन शिरक करना)

वैसे अल्लाह के कानून तोडना शिर्क है, किसी और के कानून पर बिना किसी मज़बूरी के यूँही राज़ी हो जाना भी शिर्क है, फिरके बनाना शिर्क है, ख्वाहिशात को इलाह बनाना भी शिर्क है.


शिर्क इख्तियार करने पर ज़रूरी नहीं दुनिया में नुक़सानात ही हो, आख़िरत में तो ज़ुरूर होगा। अरबों लोग दुनिया में शिर्क पर हैं और हो चुके हैं, उन्हें दुनिया में पहुचंने वाले बड़े नुक़सानात अक्सर दिखाई तो नहीं देते। बाकी आख़िरत में किसको क्या मिलेगा यह तो अल्लाह ही जानता है। हालाँकि अक्सरियत का मानना है कि इंसान की शिर्क का मानसिक और शारीरिक प्रभाव ज़रूर पड़ता है बस इस पर तहकीक किये जाने की ज़रूरत है. इस्लाम या अल्लाह ने जिसे शिर्क कहा है और मज़हबी उलेमा ने जिन्हें शिर्क करार दिया है, उसमें फर्क है। शिर्क है असल में है क्या, शिर्क की सही डेफिनेशन क्या है, सबसे पहले यह जानने की ज़रूरत है। शिर्क के लुग्वी मायने हैं, पार्टनर होने के और शरई मायने हैं अल्लाह के साथ किसी को पार्टनर बनाने के (ज़ात, सिफत, इबादात में)। क़ुरान और हदीसों के मुताबिक शिर्क को दो भागों में बांटा जाता है, एक मेजर शिर्क और दूसरे माइनर शिर्क। जिस सेंस में हम शिर्क की बात यंहा कर रहे हैं वो शिर्के अकबर ही है। शिर्क का इंतिखाब 3 तरह से होता है, एक अक़ाइद के ज़रिए, दूसरा अमल के ज़रिए, तीसरा ज़ुबान के ज़रिए। इन तीनों में सबसे अहम बात जो देखनी चाहिए वो है अक़ाइद क्योंकि किसी पर भी शिर्क के फतवे लगाने से मुस्लिम अक्सर उस इंसान का अक़ीदा नहीं देखते। गैर मुस्लिम के त्योहारों पर मुबारकबाद देने पर, मज़हबी समझी जाने वाली किसी कल्चरल चीज़ को करने पर इसी तरह फतवे बाटें जाते हैं जबकि इन केसेज़ में अक्सर यह तीनों की तीनों लागू ही नहीं हो रही होती।  वैसे किसी के मुश्रिकाना अमल पर उसे मुशरिक कहने के लिए कुछ शर्ते हैं जिन्हें देखा जाना चाहिए, जैसे क़ुरान ने ईसाइयों को अहले किताब कहा है, न कि मुशरिक। शिर्क, मुशरिक, मुश्रिकाना अमल को सही से समझने की ज़रूरत है।
 

बिदत: बिदत के मायने नयी इजाद से है। बिदत लफ्ज़ पहले से ही इस्तेमाल में था. जो दीन में नहीं , उस चीज़ को दीन बना के दीन में डाला जाए तो वो बिदत है या यह मानना कि जो इन चीजों को नहीं करे, उसके दीन में कमी आ गयी, ये बिदत है. नयी चीज़ें तो आती चली जायंगी मगर इसे दीन का जुज़ नहीं बनाना है। ऐसी नई और मुफीद चीजों की ईजाद को उमर ने बिदत ए हसना पुकारा था यानी बेहतरीन ईजाद.

 

जो नबी ने मना किया है, वो नहीं करना है. जो नबी ने नहीं कहा या नहीं किया, इससे हर वो काम गलत नही हो जायगा।

 

Compassion Day (12 रबीउल अव्वल): बिदत नहीं है।

हमारे वाकई 2 त्योहार हैं, मगर हम इस दिन कोई त्योहार नहीं मना रहे, हम तो बस खिदमत कर रहे हैं।

सोचिये कि अगर हम अपनी कोशिशों से UNO से इसे compassion day घोषित करवा दे तो पूरी दुनिया में इसका पैगाम जायगा।

 

 

3 Video on Bid'ah, Compassion Day, Vain desires are Shirk

 

कुछ वाक्यात:

उमर ने तरावीह proper तरावीह शुरू करवाई. नबी ने तो सिर्फ 3 दिन पढाई थी।


हज के दौरान अब्दुल्लाह बिन उमर पेशाब की हाजत की तरह एक जगह बैठे और कहा कि मेरा दिल करता है, मैं यहां बैठूं क्योंकि नबी को यहाँ हाजत पेश आयी थी।

इमाम मालिक (सलफ) ने मदीना में कभी चप्पले नहीं पहनी अदब की वजह से क्योंकि वंहा जगह जगह नबी के कदम पड़े थे।

कोई इसी तरह नहीं पहनना ज़रूरी करार दे दे या पहनना गुस्ताखी करार दे दे तो यह बिदत होगी.

 

एक सहाबी ने फ़र्ज़ रुकु के बाद एक दुवा पढ़ी तो 70000 फ़रिश्ते उस दुवा को लपकने को दौड़ पड़े (हमदन कसीरन वाली)।

एक सहाबी ने खवाब में सजदे में अपने मन से एक दुवा पढ़ी और देखा कि इसे सुनकर पेड़ झुक गया। उन्होंने नबी को बताया तो नबी ने भी इसे पढ़ना शुरू कर दिया।


कुछ सवाल:

नबी सिर्फ एक बार तबलीग के लिए शहर से बाहर गये थे, ताइफ़ में और साथ में सिर्फ एक सहाबी थे.

अब लोगों की महीनो के लिए बाहर जमाते जाती है और उनमें दर्जनों लोग जाते हैं.

 

आपकी मुख्य सवारी ऊंट थी. वैसे सवारी घोडा, खच्चर भी थे. मगर हमारी सवारी तो गाड़ियां हैं. क्या ये सुन्नत तर्क करना नहीं, बिदत नहीं?

सिर्फ नमाज़ से पहले पायंचे मोड़ना भी तो बिदत है क्योंकि ऐसा नबी, सहाबा ने नहीं किया। फिर लोग ऐसा क्यों करते, करवाते हैं?

नबी, सहाबा हमारी तरह ऊपर से टोपी नहीं लगाते थे। फिर तो मस्जिद में टोपियाँ रखना, लगाना भी बिदत माननी चाहिए।



एक हदीस से बुनियादी उसूल समझ लें.


गजवा ए खंदक से वापीसी के दौरान बीच में ही नबी को बनू कुरेज़ा द्वारा की जा रही गड़बड़ी की इत्तला मिली और उन्होंने कुछ सहाबा को कहा कि बनू कुरेज़ा की ओर रुख करो क्योंकि वो दुशमन से मिल चुके हैं और उन्होंने मुस्लिम को नाज़ुक मौके पर धोखा दिया है. सो नबी ने फौरन एक छोटा लशकर तेज़ी से रवाना किया ताकि वो वंहा की बाकी लोगों से पहले ही पहुंच कर खबर लेलें। नबी ने कहा कि असर न पढ़े जब तक वंहा न पहुँच जाओ. मगर बीच में जब असर का वक़्त कज़ा होने को हुआ तो साहबा में इख्तेलाफे राय हो गया। कुछ ने कहा कि नबी ने जल्दी पहुंचने का हुक्म दिया था मगर नमाज़ क़ज़ा नहीं होने देनी भले ही थोड़ा देर हो जाये सो रास्ते में ही नमाज़ पढ़ लेते हैं। जबकि कुछ कहने लगे कि नबी का हुकुम था कि वंहा पहुंच कर नमाज़ पढ़नी है। नतीजतन कुछ ने रास्ते में नमाज़ पढ़ी और कुछ ने वंहा पहुचं कर। यह उन लोगों का  इश्तिहाद था। जब नबी के सामने ये मुद्दा बयान हुआ तो नबी ने किसी को भी गलत नहीं कहा और खामोश रहे यानी दोनो की ताईद करी. इसका मतलब है कि नबी के हुकुम की मंशा समझ कर और लफ़ज़न, दोनों तरह से ताईद करना जायज़ है।

 

करुणा दिवस के बारे में सीराह से समझ लें:


नबी हर पीर के दिन रोज़ा रखते थे. क्योंकि आपका जन्म पीर को हुआ था। उस वक़्त जन्म तिथि याद नहीं रखी जाती थी. वरना आप शायद उस तारीख को भी रोज़ा रखते। पर आज जन्मदिन पर ऐसा कुछ करना बिदत मान लिया जाएगा।

 

मक्का में अशरे वाले दिन पर मक्कावासी रोजा रखते थे जबकि उन्हें इसकी वजह न मालूम थी बस रिवायत में चला आ रहा था कि ये खास दिन है। नबी नबूवत से पहले ये रोज़ा रखते थे. जब नबी मदीना आए देखा यहूद इस दिन रोज़ा रखते थे क्योंकि तो इस दिन क़ौमें मूसा को फिरौन से निजात मिली थी। इस पर नबी ने मुस्लिम को दो रोज़े रखने का हुकूम दिया कि हमारा मूसा पर यहूद से ज्यादा हक़ है. यानि नबी ने मुशरीकों और यहूदियों दोनों से रोजा लिया। रमजान के रोज़े फ़र्ज़ होने से पहले तक इस रोज़े को रखना लाज़मी था.


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Definition of culture: किसी एक place, group, time के manners, lifestyle, customs, beliefs, rituals, behavior, language, ideas groups or sets को Culture कहते हैं.

Basically, culture पहले mainly geographical area से related था

मगर बाद में religions-based culture भी पैदा होने शुरू हुए।

 

इस्लाम किसी खास culture, इलाकों, कौमों के लिए नहीं आया हैं।

न ही इस्लाम के नाम पर मुल्क बनाने के लिए आया है।

जो बने हैं उसमें इस्लाम का हाल देख लीजिए।

अविभाजित पाक में दो कल्चर थे, पंजाबी और बंगाली, सो टूट गया।

इस्लाम तोड़ने का नहीं जोड़ने के लिए आया था।

 

2:29 - उसने ही तुम्हारे लिए जमीन की सारी चीजें पैदा करी हैं (सबके लिए की हैं)।

लोगों ने जमीने बाँट ली। Region, Language, Creed को अहमियत दी।

नाज़ियों ने अपनी नस्ल को बरतर माना।

पारसीयों ने अपनी तहज़ीब को अरब से ऊंचा माना। नस्ल की बुनियाद पर धर्म चलाया।

यहूदीयों ने भी खुद की नस्ल और मजहब चुना हुआ मान लिया। किसी को अपने धर्म में शामिल नहीं करते।

हिन्दु ब्राह्मणों ने संस्कृत और वेद को दूसरे वर्णों को नहीं दिया।

मुस्लिम ने भी कुरान को सिर्फ अपना ही माना। अक्सर गैर मुस्लिम को हाथ नहीं लगाने देते।

मुस्लिम ने नबी को अपनी शिफात का जरिया माना, अपने ही फिरके को हक माना।

असल में खुद की बड़ाई पसंद नहीं की जाती।

तुम बड़े तब बनोगे जब लोग और दुनिया खुद कह देगी। जैसे विश्व गुरु भी तब होंगे.

(जैसे सिखों को कहते हैं। वो खिदमत कर रहे हैं। इसलिए खुदा उनको नवाज़ रहा है। )

 

 

ब्रह्माकुमारी अलग धर्म है, terminologies वही हैं मगर concepts बिल्कुल अलग हैं।culture वही है। सिख धर्म भी अलग है मगर culture वही है। जैन और बोद्ध धर्म का कल्चर भी हिंदुओं जैसा ही है।

Indonesia वालों ने धर्म बदला है, culture नहीं।

इस्लामीक/मुस्लिम नाम अरबी, फारसी, उर्दू वाले ही माने जाते हैं, हिन्दी और संस्कृत वाले नहीं।

 

मुस्लिम और मुश्रीक का खान पान, रहना पहनावा, ओढ़ना बीछोना  वगैरह सब एक ही था।

विचारधारा का अंतर था वरना नबी और मुश्रीकों का कल्चर एक सा ही था

 

इस्लाम का कल्चर क्या है?

हममें रहमत नहीं है तो मुस्लिम नहीं है.

इस्लाम का culture है लोगों पर रहम करना, फायदा पहुंचाना, लोगों के हक देना, अखलाक अच्छे रखना।

 

खाने पीने के मामले में हराम से बचना और पाकीज़ा खाना है.

पहनने के मामले में सत्र को ढकना और तकब्बुर न रखना है (यानि कपड़े इलाकाई ऐतबार से बेढंगे न हो)

लोगों ने ऊंचे पायचे, टोपी, कुर्ते पाजामे को इस्लाम समझ लिया है।

जो पहचान नबी ने नहीं बताई, उसे पहचान बनान बिदत है।

(शेरवानी – राजपूताना है, कुर्ता – अफ़ग़ानी है, पाजामा – फारसी है)। 

 

आपकी नमाज़, रोज़े, हज, ज़कात, दाढ़ी, टोपी, ऊंचे पायचे से दूसरों को क्या फायदा?

आपके हुलिए, लिबास वगैरह से उनको फायदा होगा तभी तो वो लोग भी अपनाएंगे।

Culture वो होना चाहिए जो सबके लिए फायदेमंद हो तभी तो लोग अपनाना चाहेंगे।

हमारा कल्चर ऐसा होने चाहिए, रहमत मिजाज़ बन जाए, आदत बन जाए।

फिर यही culture बन जायगा।

फिर दूसरे आपके लिए खड़े होंगे कि ये तो अच्छे लोग हैं, हमें फायदा पहुंचाते हैं।

जंगों में मुस्लिम से हारने वाले इलाकों के लोग खुद कहते थे कि अगर मुस्लिम आ रहे हैं तो हमें कोई परेशानी नहीं।

 

दूसरों की मुशाहबीहत वाली हदीस का पसमंजर अलग है। वो बात जंग के दौरान कही गई थी कि..

"रसूलुलाह ने फरमाया, मैं तलवार के साथ मब'ऊस किया गया हूं यहां तक कि अल्लाह इबादत की जाए, मेरा रिज़्क मेरे नेज़े के साए में रख दिया गया है जिसने मेरी मुख़ालिफ़त की अल्लाह ने ज़िल्लत और रुसवाई उसके हक़ में लिख दी है और जो जिस कौम की मुशाबहत इख़्तियार करेगा वो उनमें से होगा।" 

(मुसनद अहमद: 11252, मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा: 6/471 , 33016)


नबी से रहमत और अख्लाकियात सीखें:

 

(आपने किसी मज़हब का अपमान नहीं किया, कभी किसी को पलट कर गलत जवाब नहीं दिया, आप पर बेइन्तेहाँ ज़ुल्म करने दुश्मनों को भी माफ किया वगैरह वगैरह.)


6:108  - उनके खुदाओं की तौहीन न करो।(नबी ने किसी भी मज़हब वालों के साथ यह नहीं करा)

कुरान ने कहा जो फायदेमंद होगा वही ठहरेगा और तुम्हें लोगों के बेहतरी के लिए लाया गया है। यह करना है।


107:1-7: जो दीन को झुठलाते हैं, यतीम को धक्के देते हैं, मीसकीन का पेट नहीं भरते। उन नमाज़ियों के लिए विनाश है जो दिखावे-अचेतन में नमाज़ पढ़ते हैं और मांगने पर मामूली चीज़ भी नहीं देते हैं।

यानी हम ज़कात दे कर फारिग नहीं हो गये, पड़ोसी या रिश्तेदार को जरूरत है तो बाद में भी उन्हें देना है।


कुरान ने कहा कि तुम ज्यादती नहीं करोगे, मजबूरों की मदद करोगे, दान करोगे और दानफर्ज करार दिया गया।


नबी ने कहा तुम तकवे की बुनियाद पर ऊंचे होंगे और तुम में बेहतर वो हैं जो दूसरों के काम आयें।

उन्होंने कहा कि पड़ोसी भूखा है, या आपकी शरारतों से महफूज नहीं है तो आप मुस्लिम नहीं।

और कहा किराहगीर को रास्ता बताओ,लोगों को सलाम का जवाब करो, बोझ ढोनेवाले की मदद करो.


नबी का एक दुश्मन था जिसकी 5 बेटियाँ थी। कहता था कि मुहम्मद उसे छोड़ देंगेऔर वाकई उसे छोड़ दिया।

जिसने नबी के दांत तोड़े थे, वो कहता था मुहम्मद उसे माफ कर देंगे। और वो वो बाद में मुस्लिम हो गया.

ताआइफ़ वालों ने आपको लहू लुहान किया, उनको माफ़ किया बल्कि उनकी नसले इस्माल ले आयें, यह दुवा करी.

मुस्लिमों को घरों से निकालने वाले मुशरिकों को मक्का फतह पर माफ़ी दे दी, जो घरों के अंदर रहे.

हदीस: फिरका परस्ती वो है जब ज्यादती में अपनों का साथ दिया जाता है.

ये पहली communalism की definition थी जो नबी ने दी थी.


जब गैर मुसलमान , मोमिनों को चिढ़ाने के लिए उलटे सीधे सलाम कर रहे थे तो आप ने किसी से झगडा नहीं किया.सलाम में मौत की दुवा देने वाले को भी न्यूट्रल जवाब दिया.

एक शख्स ने लफ़्ज़ों को घुमा के अटपटा सा सलाम किया तो एक सहाबा ने जवाब में कहा कि सलाम हो उस पर जो हिदायत की पैरवी करे। यह जवाब सुन कर नबी बस मुस्कुरा दिए।

इब्राहीम ने भी आखिरी स्टेज के बाद अपने बाप को सलाम करना बंद किया था।

असल में मुस्लिम का सलाम गैरों के लिए हिफाजत की गारंटी है।

 

हर नेकी के काम के लिए पैसों की जरूरत नहीं होती है। किसी को Lift दे दो, किसी को सड़क पार करवा दो, समान उठाने में हाथ लगा दो, ठेले को धक्का लगा दो, Bus train में सीट दे दो, किसी अनपढ़ बेचारे का form भर दो, किसी को बिठा कर line में लगे रहो, रास्ते से पत्थर हटा दो, दुकान के बाहर पानी का मटका रखवा दो। ऐसे बहुत से रहमत के काम फ्री या सस्ते में हो सकते हैं.

 

5 Video on Abrahamic Culture, Islamic Culture, Wrong perception of Islam, Extremism vs Islamic culture, Compassion is real culture.


कुरान:  मिल्लत ए इब्राहीम।

कुरान:  इब्राहीम खुद एक उम्मत थे।

कुरान:  जो इब्राहिम के पंथ से हटा वो बेवकूफ है।

मिल्लत (उर्दू में मतलब कौम): Culture (बेखोफ थे, फरमाबरदार थे, खुद तौहीद समझी)

इमाम रागिब ने कहा है कि मिल्लत का ताल्लुक दीन से होता है। 

3:83, 16:123, 6:79, 16:120, 6:75, 6:77-78, 6:74, 2:258, 2:260, 2:131, 19:46, 19:47, 9:114, 2:124, 37:105-107, 2:124, 2:127, 2:128, 14:36-36, 2:130


2:271: अल्लाह के रास्ते में खर्च करने वालों बढ़ाई न महसूस करो भले ही ऐलानिया करो या छिप कर।

16:126: बराबर बदला मगर बेहतर है न लो तो।


इस्लाम की wrong image/perception पेश करी जाती है और ऐसा कुछ हदीसों से हम ही करते हैं.

हदीस में नबी ने कहा कि यहूदी का जनाज़ा देख कर खड़े हो जाओ, क्या ऐसा वो कह सकते हैं?

(ऐसे कई मुद्दे हमने खड़े किये हैं जैसे मुर्तद, शातिमे रसूल की सजा मौत, काफिर लफ़्ज़, गैरों से दोस्ती मना, नबी का जाती किरदार, 4 शादियां, तलाक, गोशतखोरी लाज़मी होना)

 

Extremism के उलट है Islamic culture.

Soft liner and hardliner इस्लाम कहा जाता है. मगर इस्लाम क्या दो है?

ऐसे ही फिर बात आगे नबी तक पहुंची क्योंकि Soft liner and hardliner दोनों उन्ही को मानते हैं सो नबी के भी 2 चेहरे हुए। इसलिए ये सवाल उठाते हैं कि मक्का और मदीना में अलग अलग स्ट्रैटिजी इस्तेमाल कर गई थी। इसलिए यह भी कहते हैं कि मुस्लिम आबादी कम होने पर सही से रहते हैं मगर जहा ज्यादा हो जाते वहा दूसरों का जीना हराम कर देते हैं। 

इसी तरह फिर अल्लाह तक भी पहुची कि वो भी जब्बार और कहार है यानि दो रुख वाला.

 

90s में S.i.m जो बाद में सिमि हो गयी, के सदर कट्टरता भरे भाषण देते फिरते थे.

कहते थे कि मुझे हुकूमत हाथ तो लगा कर दिखाए. एक दिन आखिर उन्हें उठा लिया गया.

बुद्धा मूर्ति अफगान ने तोड़ने की धमकियाँ दी और अमेरिका मना करता था. फिर वो भी हटा दिए गए.

911 के बाद मुस्लिम ने उन्हें support किया. जबकी शैख़ अल करदावी का इसके खिलाफ बयान आया था.

उन्होंने कहा कि इसको करने वालों के साथ कोई हमदर्दी न रखें बल्कि खुद पकडवाएं इन्हें.

गैर लोग पहले नमाज़ के लिए जगह छोड़ देते थे. आज विडियो बना कर वायरल कर देते हैं.

इन लोगों में आज जो शिद्दत है, वो बाद में इनके अपने घरवालों पर भी निकलेगी.

 

Compassion ही है Islamic Culture.

(मक्की दौर में तो सिर्फ इमानियात और अख्लाकियात ही आयें थे. )

मक्का में तौहीद, आखिरत, रिसालत, ईमानियात, अखलाकियात, पुराने किस्से, अंजाम बताए गए।

मदीना में नमाज़, रोज़े के अहकाम आए।

 

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