लोगों ने गीता से युद्द निकाला, गाँधी जी ने गीता से ही शांति निकाल कर दिखा दी।
कुरान से कुछ लोग हिंसा निकालते हैं, कुछ रहमत।
उसी तरह हदिसो से कुछ मसाइल के हल निकालते हैं और कुछ फिकही/मसलकी मुद्दे.
कुछ ने सिर्फ कुरान को तरजीह दी, कुछ ने practically सिर्फ हादिसो को और कुछ ने सिर्फ फिकह को। फिर इसमें भी तकसीम हुई और हनफी फिकह में भी दो मसलक हो गए, देवबंदी और बरेलवी.
(Quran – Sunnah – Ahadith – Fiqh)
[Quran –
Ahadith/Sunnah – Fiqh]
Seerah -Tarikh –Ijtihad -Ijma
(दीन के दो माखज है, कुरान और सुन्नत. असल माखज रसूल है क्योंकि ये दोनों उन्ही से मिले हैं)
सुन्नत और हदीस में फर्क है. जो आगे समझेंगे.
इज्तीहाद कहते हैं Islamic texts और traditions के basis पर शरीअत के मुताल्लिक राय निकालना.
कियास इसी का part है।
इज्मा कहते हैं मुस्लिम उम्माह का किसी राय पर इत्तेफाक करना।
इज्तिहद और इजमा को दीन का source माना जाता है जबकि ऐसा असल में ठीक नहीं है.
इजतिहाद subjective चीज़ है और इजमा पहले किस किस पर रहा है, ये आज हमें मालूम नहीं है। माखज तो fix होते हैं।
इसी तरह शरियत के असल मायने किन कानूनों से हैं, वो भी ऐसा नहीं है जैसा आम तौर पर माना जाता है.
शरीयत basically कुरान में आए कानून है। उनकी implementation रिसालत में मिल जाती है।
कुरान
(इस्लाम दीने फितरत है, फितरत के खिलाफ इस्लाम का कुछ भी हो नहीं सकता अगर कुछ फितरत के खिलाफ मिल रहा है तो या तो उसे समझने में गलती हुई है या फिर वो मिलावट है)
(कुरान को फुरकान कहा गया है जो हक़ और बातिल में फर्क कर दे)
अरबी में फरक कहते हैं, बालों की मांग को, जो दोनों साइड को अलग अलग कर देती है।
कुरान में तहकीक की आज तक ज़रूरत नहीं पड़ी.
नासिख और मंसूख की बहसे अलग मुद्दा है. उस पर बाद मे बात होगी।
कुरान को महफूज़ किया गया है. कुरान खुद कहता है इस किताब में कोई शक नहीं।
दीन में रसूल कुरान के खिलाफ कुछ नहीं दे सकते। अगर कुछ खिलाफ मिल रहा है तो वो रसूल का दिया हुआ नहीं है.
रसूल कोई बात (सुन्नत) ऐसी नहीं दे सकते जो अल्लाह की तरफ से न हो.
अगर मिल रही है तो वो रसूल के नाम पर थोपी गयी हैं.
5.3: आज, मैंने तुम्हारे लिए दीन को मुक़म्मल कर दिया और तुम्हारे लिए दीने इस्लाम चुन लिया है.
20.2: हमने तुमपर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारा कि तुम मशक़्क़त में पड़ जाओ।
कुरान में सभी दीन के अहकाम बता दिए गए हैं.
कोई भी independent अहकाम बाहर से नहीं ले सकते.
सभी हलाल और हराम बातें बता दी गयी है.
नबी खुद कोई ऐसी नयी चीज़ हराम नहीं दे सकते, जिसका ज़िक्र कुरान में न हो.
खाने में कुरान ने बता दिया कि हलाल और तय्यब चीज़ें खाओ.
खाने की जो चीज़ पाक नहीं है, वो गैर तय्यब हैं, उनके लिए हराम लफ़ज इस्तेमाल न करे.
फ़र्ज़ – मुस्तहब (Recommended) – मुबह (neutral permitted) – मकरूह (disliked) – हराम
हराम –हलाल (असल में दो ही category है)
सुन्नत
सुन्नत का मतलब तरीका है और तरीका किसी का भी हो सकता है। दीन की सुन्नत से मुराद असल में नबी की सुन्नत या ये कहे नबियों के तरीक़े से है।
सुन्नत वो जो पहले से चली आ रही है. आज तक चली आ रही है.
(आदम और इब्राहीम से सुन्नत, ये लगभग 20 हैं).
जैसे नमाज़ कैसे पढ़े, हज कैसे करें, रोज़ा कैसा रखें,
नबी ने इन सुन्नतों में आ चुकी मिलावट को, कमी या पेशी करके आगे जारी कर दिया।
इसलिए कुरान ने हर जगह अल्लाह और रसूल दोनों की ईतात साथ में करने को कहा।
यानी कुरान और सुन्नत की इतात.
एक जगह बुनियाद और दूसरी जगह से तफ़सीलात मिलती हैं। तफसील का मतलब detail नहीं होता.
अरबी में तफसील का मतलब होता है चीज़ों को sort out कर के अलग अलग रख देना।
नबी ने नमाज़ की तफसील, तफसीर, तशरीह करके दिखा दी और लोगों ने ले ली.
कुरान ने कुछ कायनात के उसूल दिए, इंसानों से तहकीक से कुछ खुद उसूल समझे और उन्हें लिया।
वैसे ही बहुत से तफ़सीलात कुरान से बाहर सुन्नत से मिलती है।
जैसे हज और नमाज़ की तफ़सीलात कुरान में नहीं आती, सुन्नत में आती है।
सुन्नत अमल के ज़रिये बढ़ाया, हर बार लफ्जन नहीं बताया. जैसे 5 नमाज़ की रकात की तादात नहीं बताई.
एक बार नबी ने जुहर की गलती से 3 रकात पढाई, सहाबा ने पुछा कि क्या रकात कम हो गयी है?
यानि आप ने कभी रकात की गिनती मुंह से नहीं बताई नहीं थी. ये तो आप के अमल से देख कर चली रही थी. यही हाल नमाज़ के अवकात था.
सभी लोग नमाज़, इन्हीं अवकात और तादात से पढ़ते हैं. शिया, कादियानी और सूफी तक.
नमाज़ के फाराईज़ भी एक हैं, सिर्फ गैर फाराईज़ पर इख्तेलाफ़ है.
फ़र्ज़ – वाजिब - सुन्नत (मुआक्क्दा/गैर मुआक्क्दा)– नफिल
फ़र्ज़ के अलावा बाकी सब अमल नफिल है.
नमाज़ों की नफिल को सुन्नत नाम दे दिया और फिर सुन्नत में भी सुन्नते मुआक्कादा, गैर मुआक्कादा नाम दे दिए गए हैं.
फ़र्ज़ से नीचे और सुन्नत से ऊपर वाजिब category बना दी गयी है।
फ़र्ज़ के अलवा सब – नफिल है.
हदीस
(हदीस का मतलब नबी की कही गयी या करी गयी बातों का तारीखी रिकॉर्ड है।
इसीलिए इन्हें ‘नबी की बात’ की बजाए ‘नबी की निसबत से बयान बात’ कहके बयान किया जाता है।
नबी ने सीधा हम से कुछ कहा होता तो उसका इंकार कुफ्र होता.
मगर हदीसो को नबी नहीं, बल्कि बीच के कुछ रावी हम तक पंहुचा रहे है, जिसमें गलती हो सकती है.
जबकी कुरान को नबी से लेके आज तक पूरी दुनिया पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रही है.
यानि लाखों करोड़ों लोग रोज़ ये काम सदियों से करते आ रहे हैं. इसमें कभी गलती नहीं हुई.
आज भी कोई कुरान पढने या सुनाने या प्रिंट करने में एक गलती भी कर दे तो उसे दुनिया टोक देती है.
हदीसो से दीन के किसी भी बुनियादी हिस्से में कोई कमी या इजाफा नहीं होता।
दीन कुरान और सन्नत में मुकममल है।
नबी की की सीरत और तरीके उस्वए हसनह (यानि बेहतरीन नमूना या उत्तम आदर्श) हैं।
उन तरीकों को तरजीह दी जाएगी।
नबी की बातें उनके वक़्त में ही बयान करी जाती थी। फिर उनके जाने के बाद भी बयान होने लगी.
क्योंकि मामला रसूल का था तो मतन के साथ सनद भी बयान की जाने लगी. यानी ये बात उसने फला से सुना और फला ने फला से।
सालों बाद ये बातें लाखों की तादाद में हो गयी. इनको लिखने का और तेहकीक का काम शुरु हुआ.
उसके लिए उसूल बनाए गए. वक़्त के साथ ये उसूल बढ़ते गए. मुहद्दिस के उसूल भी बाज़ वक्त इख्तिलाफ पाया जाता है, जो कि अपनी सही है।
फिर अमलन मतन से ज़्यादा सनद पर जोर हो गया. और अस्मारिजाल का फन भी पैदा हुआ।
लोग पहले दिन से ही सुन्नत पर अमल करते आ रहे थे।
शुरुवात में कुरान लोगो तक आगे पहुंचाने में कुछ गड़बड़ी न हो जाये, इसलिये नबी ने क़ुरान के अलावा अपनी दूसरी बातें लिखने के लिए मना किया था मगर फिर allow भी कर दिया था
इसलिए कुछ साहबी द्वारा ही लिखी कुछ हदीसें ही हमें पता लग पाती हैं।
1st सदी में लिखा 138 हादिसो का पहला मजमुआ अबू हुरैरा के शागिर्द एक ताबी हुमाम का मिलता है।
2nd सदी में मालिक की मूवत्ता सबसे पहली हदीस की किताब लिखी गई।
इसे सियाए सित्ता में नहीं मना जाता, जबकि ये शुरुवाती दौर के बारे में ज़्यादा बेहतर चीज़ें बताती है।
622 AD में Hijri कलैंडर शुरू हुआ और 632 AD में नबी की वफ़ात हुई, आपके जाने के दशकों बाद हदीसों को लिखा गया।
(हदीसें बयान करने पर साहाबा
के दो रवैये मिलते हैं – बेहद एहतियात और पर नबी की कोई बात बयान करना और दूसरा की खुल नबी की हर बात बयान करो.
अबु बकर और उमर ने चंद. हदीसे ही बयान करी है। जबकि अबू हुरैरा ने सबसे ज्यादा लगभग 5K हदीसें बयान करी हैं। कुल 10K हदीसें बैठती हैं, जिनके 1-1.5 लाख तुर्क बैठते हैं.
मुसनद की 27000 हादिसो में नबी, सहाबा की बातें और हदिसो के दोहराव/तकरार भी शामिल हैं।)
हदीसों में सिर्फ नबी और साहबा के अकवाल दर्ज नहीं है, मज़हबी और तारीखी वाक्यात का ब्योरा भी है.
लाखों में हदीस नहीं तरिक होते थे, यानि तुर्क के plural. हालाँकि मौजु रिवायतें वाकई लाखों थी.)
रिवायत के दर्जात:सहीह, हसन, जईफ, मावज़ू। जैसे अहद, कुदसी, मुतवातिर, मरफू, मौकूफ, मकतू,मुनकर,
गरीब, मकबूल, मरदूद, मुर्सल,
मुन्कती.
रावियों के status: सिकह, मकबूल, जईफ, मजहूल, फ़ासिक़, कज्जाब.
रावियों के लिए उसूल: उनकी ईमानदारी या अदल, याददाश्त का सही होना और रीवायत का सिलसीला कटा हुआ न होना।(यानि दोनों की मुलाकात होने के इमाकानात होने चाहिए)
कुरान की तरह हदीस को महफूज नहीं किया गया। हदीसों में आज भी तहकीक होती है.
अल्बानी, अर्नौत, जुबैर अली जई ने हाल फिलहाल तहक़ीक़ की है. इसलिए हदीसों को कुरान के लेंस में देखा जायगा.
मुनकिरे हदीस कौन है? लाखों हादिसो को मुहददिसो ने और अहले हादिसो ने भी reject किया है, कुछ बुनियाद पर। ऐसी बुनियाद पर दूसरे भी रिजेक्ट कर सकते हैं तो फिर वो अकेले ही मुनकिर कैसे हुए?
जिन्होंने हदीसे गढ़ी, उन्होंने सनद भी गढ़ी थी। रावियों ने दरमयान के रावियों से direct कोई सुना है।
कुछ सदी बाद लिखी गई हदीस में गलतिया हो सकती हैं, बल्कि हैं भी।
चाहे जैसी हो सारी हादिसो को अपनाना और सारी हादिसो को ही ठुकराना, दोनों ही गलत अमल है।
अल्लामा के मोकिफ़: आप जईफ हादिसो को भी कुबूल करते है मगर तब जब वे कुरान और किसी सहीह हदीस से न टकराए। सवाल ये उठता है कि झूठा साबित होने पर रावी की हदीस नहीं ली जाती मगर क्या ऐसे रावी ने ज़िंदगी में कभी एक बार भी सच नहीं बोला होगा या एक बाए भी सही हदीस बयान नहीं करी होगी। इसी तरह क्या एक सच्चा आदमी जिदंगी में क्या एक बार भी झूठ नहीं बोल सकता या मुगालते में कोई गलत बात बयान नहीं कर सकता? गालिबन इमाम बुखारी ने एक रावी से सिर्फ इसलिए हदीस नहीं ली थी क्योंकि उसने अपने घोड़े को अपनी झोली में चारा होने का बहाना करके अपने पास बुलाया था जो बर्ताव उन्हें पसंद नहीं आया था कि जो घोड़े के साथ ऐसा धोखा कर रहा है, उसकी बात कितनी मोतबर होगी। हालांकि ऐसा बर्ताव इतनी बड़ी बाद नहीं है।
(हदीसों को समझना पर एक रीज़नेबल मौकिफ यह है कि: किसी एक हदीस के सार्र तुर्क एक साथ रख कर पूरा मामला समझा जाएगा. हम टकराने वाली हदीसों के पाबंद नहीं है। एक मसले को तमाम हदीसों में मिलने वाली कॉमन बात को अक्सर ज़्यादा अहमियत दी जायगी. वाकये का कॉन्टेक्स्ट देखा जायगा. वगैरह वगैरह. ध्यान रखना है कि कोई भी हदीस कुरआन-सुन्नत और इल्म-अक़ल के प्रामाणिक तथ्यों के विरुद्ध न हो। इस्लाम की रूह और नबी के किरदार के भी खिलाफ न हो। असल में ये ऊपर बताए उसूलों की ही तशरीह है.
किसी हदीस में कोई गैर साइंटिफिक बात आ रही है तो सबसे पहले बाकी रिकार्ड के मुताबिक यह समझने की कोशिश होगी कि क्या वाकई ये बात इस तरह बयान हुई है, अगर हाँ तो फिर इसे भविष्य में साइंस की असीम संभावनाओं के मद्देनजर समझने की कोशिश करेंगे कि क्या ये बाद आने वाले वक्त में विज्ञान द्वारा सिद्ध करना संभव हो सकती है। सिद्द हो सकती है तो इसे आप मान सकते हैं, और फिर भी मुतमईन न हो तो नहीं भी मान सकते। हालांकि सिद्ध होने या न होने की बहस में पड़े बिना भी आप को ऐसी हदीस को ठुकराने हक है। यानि उसके प्रूव होने का इंतज़ार करना लाज़मी नहीं है. जबकि कुरान में इस तरह के फैक्ट के प्रूव हुए बिना भी मानना पड़ेगा. कुरान हदीस में फर्क है. क़ुरान अल्लाह का बयान है। हदीस लोगों का बयान है जो नबी की ओर मंसूब है। सारी कुरानिक बातें एक दिन साबित होनी ही है जैसे जन्नत, जहन्नुम, क़यामत. उनके प्रूव होने तक इन्तेजार होगा यानि साइंस के एडवांस होने का या इसे साइंस द्वारा इसे तहकीक का मौजू बनाने का इंतज़ार होगा. मगर कुरान के लफ़्ज़ों पर गौर करना भी बेहद ज़रुरी है कि जिस तरफ लोग कुरान से फला बात बयान कर रहे हैं, क्या वो कुरान में वैसे ही कही गयी है, क्या लफ़्ज़ वाज़ेह हैं. क्या मायनें लफ़्ज़ों को कवालीफाय कर रहे हैं, कंही अल्लाह की बात में लाफ्जन कोई हिकमत तो ज़ाहिर नहीं हो रही जो अल्लाह ने साफ वैसे बयान नहीं किया? इसी तरह एक बात का और ख्याल रखना है की कुरान ने जो नामुमकिन बताता सिर्फ उसी को नामुमकिन मानना है, बाकी सब कभी न कभी मुमकिन हो सकता है. पहले अजीब लगता था मगर आज साइंस फ़िक्शन मुमकिन हो गया है.)
अल्लाह की हर किताब दीन की किताब है अगर असल शक्ल में मौजूद है तो. दीन की किताबों के बारे में लिखी गयी किताबें दीनी किताबें हैं. कुरान में तारीख बयान हुई है और दीन भी बयान हुआ है (हिदायत के तौर पर - इसमें बशारत, चेतावनी, किस्से हैं) मगर दीन तारीखी तौर पर बयान नहीं हुआ है. हदीस में तारीख बयान हुई है और दीन भी मगर दीन तारीख तौर पर बयान हुआ है.
फिकह
कुरान के दिए माशरी कानून शरीयत है. ये कुरान और सुन्नत से बिलकुल वाज़ेह हैं।
मगर मुस्लिम ने इन पर भी इखतेलाफ़ पैदा कर लिया है।
सीरत में नबी के जरिए दिए जाने फैसलों को शरियत और मौजूदा मामलात की रोशनी में समझना चाहिए।
फ़िक़्ह, दीन पर अमल करते हुए आने वाले practically problems, issues को हल करने का ज्ञान है और दीन से मुताललिक पहलुओं को गौरो फिक्र से समझने की परम्परा है।
इन्हें मजहब कहा जाता है. मसलक भी कह देते हैं. इनके ज़्यादातर Followers अब फिर्कावारियत की तरफ चल दिए हैं.
अल्लामा की कुरान से दी फिरका की definition ये है कि जंहा आपस में दुश्मनी की feelings आ जाएँ, वो फिरका है।
7.45: जो अल्लाह के मार्ग से रोकते और उसे टेढ़ा करना चाहते हैं और जो आख़िरत का इनकार करते हैं.
[जैसे भटकाने वाले लोग कहते हैं कि ये रास्ता ले लो जल्दी पहुचा देगा जबकि वो रास्ता देर करवा देता है। पूरी तरह अध्यातम या आत्मचिंतन की ओर ले जाने वाले या कुरान से रोकने वाले ऐसे ही लोग है. धर्म सही होगा तो मजहबी पेशवायों या ठेकदारों की कमाई नहीं होगी. धर्म को बिगाड़गे तब पेशवाई, कमाई शुरू होगी।]
ये पहली सदी हिजरी में पैदा होना शुरू हुई. यह कुछ आलिमे दीन फकीह के ज़रिये ये वजूद में आई.
सबसे बड़ा सवाल है कि हादिसो, फिकह से पहले लोगों का दीन क्या था?
नबी कौन से मसलक के थे? (तब सुन्नी, शिया भी नहीं थे)
मुस्लिम मोटे मोटे तौर पर सुन्नी, शिया, सूफी में विभाजित हैं. सुन्नियों में अहमदिया और शिया में नुसेरिया (खुले आम कहे जाने वाले फिरके) हैं जो उम्मत की मेनस्ट्रीम से पूरी तरह से टूट के अलग हो चुके हैं।
अलग थलग रहने वाले अहले कुरान, बोहरा जैसे गिरोह भी हैं।
बाकी
मुताज़िला, मातुरुदी, इबादी वगैरह न जाने कितने हैं.
शिया में
अशरीया 85% approx और इस्माइली जो 10% approx. हैं.अशरिया में जैसे
जाफरी, जैदी.
नासबी अली के
मुखालिफ, दुश्मनी, बुग्ज़ रखने वाले थे और इनमें ख्वारिज सबसे ऊपर थे.
राफजी इनके
उलट अली की शान में गुलू करते हैं.
शिया सुन्नी की कुल खुसूसन 5 फिकह मानी जाती है. वैसे बहुत सारी हैं.
4 प्रसिद्ध सुन्नियों के फिकह है:-
हनफी- मुख्यता हिंदुस्तान, तुर्की, रूस, एशिया में। एक तियाही मुस्लिम हनफी हैं।
मालिकी – अफ्रीका और गल्फ में।
शाफी- मिडिल ईस्ट, इंडोनेशिया में।
हंबली – अरब देश में। सबसे कम तादात में है।
कुछ गैर मुक्कललिद भी हैं जैसे अहले हदीस (जो अक्सर शाफी ही हैं).
5th फिकह जाफरिया मानी जाती है, इमाम जाफ़र सादिक की, जो शियाओं में है.
इनका सबका काल
देखिए, ये कब आयें।
इनके इमामों में इखतेलाफे राय होने पर भी आपस में मुहब्बत थी और तशदूद नहीं था।
मगर इनके माननें वालों ने तशद्दु इख़्तियार किया और गिरोह बना लिए.
इनके पैरोकार कहते हैं चारों इमाम हक़ पर हैं. मगर दिल से नहीं मानते है।
400 साल तक इन्होने हरम में 4 मुसल्ले लगाए हुए थे.
पहले 1925 में इनके चारों structure हटा के खेमे में बदले और फिर 1955 में वो खेमे भी हटा दिए सऊदी सरकार ने।
शाफी, हनीफ़ा के शागिर्द थे मगर आपसी इल्मी इखतेलाफ़ भी थे। हनीफ़ा के इंतेकाल के बाद एक बार बगदाद में उन्हीं की मसजिद में शाफी ने हनफी तरीके से नमाज़ पढ़ाई जिससे पता लगता है कि ये इमाम सख्त इल्मी मिजाज़ के नहीं थे। शाफियों में जोर से आमीन और रफ़देईन करते हैं।
मालीकी हाथ छोड़ कर नमाज़ पढ़ते हैं। असल में नबी ने नमाज़ की कैफियत के हिसाब से हाथ बांधे और कभी छोड़े भी दिए। इसलिए जिसने नबी को जिस पोज़िशन में देखा बयान कर दिया। असल बात तो कयाम और अल्लाह का तसव्वुर था।
मालिक ने मदीना
से बाहर सिर्फ एक बार गए वो भी हज करने, सवारी पर नहीं बैठे, जूते नहीं पहले,
मदीना से बाहर न मार जाऊँ।
बुखारी 3560: जब भी पैगंबर को दो मामलों में से एक का विकल्प दिया जाता था, तो वह दोनों में से आसान को चुनते थे, जब तक कि ऐसा करना पापपूर्ण न हो, लेकिन यदि ऐसा करना पापपूर्ण होता, तो वह उस तक नहीं पहुंचते थे। उन्होंने कभी भी अपने लिए (किसी से) बदला नहीं लिया, बल्कि उसने ऐसा केवल अल्लाह के लिए किया जब अल्लाह के कानूनी बंधनों का उल्लंघन हुआ।
[यह हदीस फिकह के बारे में लागू करो। जब ऐसा कहा जाता है तो मुक़ललीद कहते हैं कि यह नफ़स की पैरवी होगी क्योंकि लोग आसान आसान छाँट लेंगे। छांट लेंगे तो क्या हुआ?]
मुस्लिम 2670: नबी ने तीन बार कहा कि हलाक हो गए वो लोग जिन्होंने तशददूद इख्तियार करा।
[गैर जानिबदार उलेमा इस हदीद को दीन और दुनिया दोनों के बारे में मानते हैं]
अहले कुरान
फिलहाल सबसे बड़ा फितना इन्होंने ही फैलाया हुआ है.
ये कहते हैं कि हदीसें फारसी आइम्मा की साज़िश है और हदीसो को जला दो.
ये कहते हैं कि जो कुरान में है, वही नबी की इतात है और सिर्फ उसे ही मानो.
ये कहते हैं कि सब कुछ कुरान से लेंगे, बाहर से कुछ नही लेंगे। यानी ये रसूल से सुन्नत में मिल रही चीजें भी नहीं लेंगे जैसे नमाज़ की तफसीलात वगैरह।
सिर्फ कुरान से दीन लो, कुछ भी सुन्नत से मत लेना, ऐसा मानना कुरान के मुताबिक ही कुफ़र है।
अगर इनका मौकिफ़ सही होता तो साहबा नबी से कह देते कि हम सिर्फ कुरान से ले लेंगे, हर चीज़ लेने आप के पास बार बार नहीं आयंगे।
अगर रसूल की जरूरत नहीं होती तो अल्लाह सीधा कुरान लोगों को नहीं दे देता।
मसल में रसूल की ज़िंदगी को तुम्हारे लिए बेहतरीन नमूना बनाया गया है।
जैसे सुन्नत रसूल से मिली है, वैसे ही कुरान भी तो उन्ही से मिला है।
मुस्लिम 1473a: यकीनन रसूल में तुम्हारे लिए एक मॉडल हैं.
किसी नेक इंसान को अपना representative बनाओ, उसे जिम्मेदारी दो तो वो अपनी तरफ से आगे कुछ नहीं देगा.
और अगर वो उसे ईमानदारी से न निभाएं तो यह अमानत में खयानत होगी। यह नाइंसाफी होगी।
जिसे शूरवात से ही अल अमीन और अस सादिक़ कहा गया, यकीनन वो बाद में भी कभी खयानत नहीं करेगा।
अहले कुरान के कई group हो गए हैं, सब का नमाज़ और अवकात पर इख्तेलाफ है.
ये लोग 1 से 3 तक नमाज़े बताते हैं। कुछ कहते हैं सलात के मायने ही अलग है।
कम से कम इनमे तो नमाज़ पर unanimity होनी चाहिए थी क्योंकि इनका सबका कुरान से लेने का दावा है.
खुद गलत कियास कर रहे हैं मगर सुन्नत या रसूल की राय या रिसालत से कुछ भी लेने को तैयार नहीं है।
हलाल और हराम
5.44:हमने
तौरात उतारी. नबी जोआज्ञाकारी थे, उसको यहूदियों के लिए अनिवार्य ठहराते थे कि वे
उसका पालनकरें. मेरी आयतों के बदले थोड़ा मूल्यप्राप्त करने का
मामला न करना। जो
लोग उस विधान के अनुसार फ़ैसला (उसे हकम नहीं बनाते) न करें,
जिसे
अल्लाह ने उतारा है, तो
ऐसे ही लोग विधर्मी हैं।
6.119: जो कुछ चीज़े उसने तुम्हारे लिए हराम कर दी है, उनको उसने विस्तारपूर्वक तुम्हे बता दिया है।
16.116: अपनी ज़बानों के बयान किए हुए झूठ के आधार पर यह न कहा करो कि यह हलाल है और यह हराम है ताकि इस तरह अल्लाह पर झूठ आरोपित करो।
66.1: ऐ नबी! जिस चीज़ को अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध ठहराया है उसे तुम अपनी पत्नियों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्यों अवैध करते हो?
[यानी नबी को कोई चीज़ पसंद नहीं वो अलग बात है, मगर वो खुद कुछ हराम नहीं ठहरा सकते]
6.145: कह दो, जो कुछ मेरी ओर प्रकाशना की गई है, उसमें तो मैं नहीं पाता कि किसी खाने वाले पर उसका कोई खाना हराम किया गया हो, सिवाय इसके कि वह मुरदार हो या बहता हुआ खून हो या सुअर का मांस हो - कि वह निश्चय ही नापाक (rij'sun word) है – या वह चीज़ जो मर्यादा से हटी हुई हो, जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। पर जो मजबूर हो जाए तो अल्लाह माफ़ और रहम करने वाला है।
[ये मदनी सूरत है और आखिर में नाज़िल हुई. यंहा मज़बूरी में हराम को हलाल नहीं किया गया है बल्कि exempted किया गया है]
2.172: जो साफ़ सुथरी/पाकीज़ा चीज़ें (तय्यब लफ्ज़) हमने तुम्हें प्रदान की हैं उनमें से खाओ और अल्लाह के आगे कृतज्ञता दिखलाओ।
[मलतब खबाइस यानि चीर फाड़ करके खाने वाला जानवर न हो, जिससे दरिंदगी झलकती हो]
कुरान और सुन्नत
2.85: कुरान में मौजूद कुछ भाग को मागोगे और कुछ को नहीं मानोगे।
[जैसे यहूदी ईसा को नहीं मानते, ईसाई मुहम्मद सल्ल. को नहीं मानते। यह कुफ़र है।]
(रसूल के ओहदे या उनके इनकार के बारे में अहले किताब को सब पहले से ही वाज़ेह हैं.)
26:108-179, 3:50: अल्लाह की नाफ़रमानी से बचो और मेरी इताअत करो.
[नूह, हुद, सालेह, लूत, शुएब, ईसा सभी ने कहा यही बात कही है। यह नहीं कहा सिर्फ अल्लाह की किताब का इतात करो, कुरान में दूसरी कई जगह मुहम्मद सल्ल. ने भी यही कहा है]
3.32, 3.132, 4.59, 4.68 5.92, 64.12, 8.20, 47:33: हर जगह अल्लाह और रसूल दोनों की ईतात साथ में करने को कहा गया है।
3:31: कह दो कि यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो
4:64: हमने जो रसूल भी भेजा इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उस रसूल की आज्ञा का पालन किया जाये.
47:33: अल्लाह की इतात करो और रसूल की इतात करो, और अपने कर्मों को ज़ाया न करो.
[यानि उनसे कुछ न लिया जैसे नमाज़ वगैरह तो देखो कंहीं तुम्हारे आमाल ज़ाया न हो जाये]
24:54: कहो कि अल्लाह का आज्ञापालन करो और उसके रसूल का कहा मानो। परन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो बस वही ज़िम्मेदारी है। और यदि तुम आज्ञा का पालन करोगे तो मार्ग पा लोगे।
4.80: जिसने रसूल की ईतात करी, उसने अल्लाह की ईतात करी और जिसने
मुँह मोड़ा, तो हमने तुम्हें ऐसे लोगों पर कोई रखवाला बनाकर तो नहींभेजा है।
कुछ अलग दलाइल
4.59: ए ईमान वालों अल्लाह की ईतात करो और रसूल की भी ईतात करो और उनकी भी ईतात करो जो तुम में आज्ञा देने के पात्र हो यदि किसी मामले में इखतेलाफ़ हो जाए तो अल्लाह और रसूल की ओर लौटना। यह उत्तम है और परिणाम के तौर पर भी अच्छा है.
[उलूलुल अम्र की ईतात – यानी उनकी जिनकी power को माशरा तस्लीम करता हो, Who are charged with authority among you. ये हर field में अलग अलग expert होंगे. ये ध्यान रखना है कि जैसे हदीस, कुरान से न टकराए, वैसे ही इनकी बात भी कुरान और नबी से न टकराए, और इन दोनों की एक ही बात होगी। जैसे सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और हाई कोर्ट, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को overrule कर सकते हैं, वैसे ही क़ुरान और सुन्नत इन अहले इल्म को और बल्कि फ़िक़ह को भी supersede कर देगी।]
3.32: अल्लाह और (वाव) रसूल की इताअत करो.
[यानी अल्लाह और रसूल की ईतात करो। मतलब है कुरान और नबी, दोनों की मानो। अहले क़ुरान कहते हैं कि क्या दोनों अलग अलग ईतात है? वो कहते हैं कि ये दोनों ही कुरान की ईतात है। वो कहते हैं कि यह (वाव) का मतलब 'यानी' है और यंहा इसके मायने बयानीया है जिसका मतलब है ‘यानि’। फिर तो यह उल्टा कहा गया है? क्योंकि सही तरीका कहने का ऐसे होता है बड़ी चीज़ की बात बाद में करी जाती है। जैसे कि कहा जाए कि रसूल की ईतात करो यानि अल्लाह की ईतात करो। जैसे सही से खाना खाओ और अच्छी सेहत बनाओ, न कि ये कि अच्छी सेहत बनाओ यानी सही से खाना खाओ (दोनों अलग बात मगर जुड़ी हुई और final result same है) इसका मतलब है क़ुरान में इस जगह वाव लफ्ज़ का मतकब 'और' ही सही है]
29:51:क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुम पर किताब अवतरित की, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है?
[अहले क़ुरान इस आयत को लाते हैं। समझना यह है कि बिल्कुल कुरान काफी है, इसी को मान रहे हैं। और इसी में रसूल की इबतेदा का हुकूम भी बार बार है, इसे ही पढ़कर सुनाया जा रहा था, याद किया जा रहा था]
कुरान के मिसल
कुरान 2.23: और अगर उसके विषय में, जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी सन्देह में हो तो उस जैसी कोई सूरा ले आओ। अगर तुम ऐसा नहीं कर पाओ बल्कि नहीं कर पाओगे।
[यंहा ये नहीं कहा कि इससे बढ़कर लाओ। नबी को झूठा साबित करना इससे कितना आसान था पर कुफ़्फ़ार ये कर नहीं पाए। 5 -7 लोगों ने अलग अलग शताब्दियों में क़ुरान के मिसल लिखने की कोशिश करी मगर माहिरान ने कहा कि इनके लिखे का कुरान से कोई मुकाबला ही नहीं है।]
दावूद 4604: पैगंबर ने कहा: मुझे कुरान और उसके जैसा कुछ दिया गया है (यानि कुरान के मिसल कुछ
और भी)। ऐसा समय आ रहा है जब एक आदमी अपने तख्त/बिस्तर पर पड़ा हुआ कहेगा: कुरान पर कायम रहो; जो कुछ इसमें permissible पाओ उसे permissible मानों, और जो आप इसमें
prohibited पाओ उसे prohibited मानों। आपके लिए permissible नहीं है घरेलू गधा, नुकीले दांत वाले शिकारी जानवर, किसी जिम्मी (काफिर) की कोई वस्तु (अगर उसके मालिक को वह अब नहीं चाहिए तो जायज़ है)। यदि कोई किसी कौम के पास आता है तो उस कौम को उसकी मेहमाननवाजी करनी चाहिए,लेकिन यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उसे ये अधिकार हासिल है की वह अपनी मेहमाननवाजी के बराबर राशि उनसे इसके बदले में ले ले। (ग्रेड सहिह अल्बानी)।[अगर वाकई कुछ मिसल होता तो उसमें कुरान की तरह बिना तहकीक के नहीं माना जा रहा होता. (हलाकि ये एक हद तक सुन्नत पर बात फिट हो सकती है)यह हदीस झूठी है। इस में कुरान को फर्ज
मानने की बात कही जा रही है। फर्ज तो वो है ही पहले दिन से, खुद कुरान भी कहता है। मेहमान नवाज़ी के बदले रकम पाने वाली बात भी किस पसमंजर में हो रही है, पता नहीं हालांकि
पता होता भी तो यह सच हो नहीं सकता, गैर अखलाकी हुकूम है।]
[इस हदीस के मद्देनजर कुछ लोग कहते हैं कि रसूल को वाहिय ए खफी (खुफिया) और वाहिय ए जली (जो खुले में दी गई) मिली थी।]
दावूद 4605/तिरमीजी 2663:पैगंबर ने कहा: ऐसा न हो कोई अपने तख्त/बिस्तर पर पड़ा हुआ हो और
इसके पास मेरा कोई अहकाम पहुंचे जिसका मैंने हुकूम दिया हो या जिससे रोका हो, मगर वो कहे कि हम नहीं जानते, हम तो किताबूललाह में जो पाएंगे, उस पर अमल करेंगे।[यंहा मिसल का जिक्र नहीं है।]
तिरमीजी 1726/ माजह 3367: पैगंबर से चर्बी (घी), पनीर और जंगली गधा/फर(पोस्तीन– शलवार
के नीचे पहने जाने वाले पाजामा वगैरह)/के बारे में पूछा गया। उन्होंने कहा: वैध वह है जिसे अल्लाह ने अपनी पुस्तक में वैध बनाया है, अवैध वह है जिसे अल्लाह ने अपनी पुस्तक में अवैध बनाया है, औरजिसके बारे में वह चुप है, उसने तुम्हें उनमें माफ किया।[यंहा भी मिसल का जिक्र नहीं है। जिन चीजों के बारे में सवाल किया जा रहा है, वो चीजें अलग अलग हैं।यंहा कहा गया है कि जिनका जिक्र कुरान में नहीं है वो माफ है यानि रसूल को इख्तियार नहीं दिया गया है।]
तिरमीजी 2664: पैगंबर ने कहा: "जल्द ही मेरी ओर से एक हदीस एक आदमी तक पहुंचाई जाएगी,
जब वह अपने बिस्तर पर लेटा हुआ होगा, और वह कहेगा: 'हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह की किताब है। इसलिए हम इसमें जो कुछ भी वैध पाते हैं, उसे वैध संजहते है, और जो कुछ हम उसमें अवैध पाते हैं उसे अवैध समझते हैं।' वास्तव में जो कुछ रसूल ने हराम ठहराया, वह वही है जो अल्लाह ने हराम किया।
[यंहा साफ कर दिया गया है कि रसूल ने जो भी हराम ठहराया, वो वही है जो अल्लाह ने हराम ठहराया है। मिसल वाली बात कुरान और बाकी सहीह हादिसो से टकरा रही है।]
नबी ने फ़रमाया कि एक वक़्त आएगा, लोग तकिये लगा कर बैठे होंगे और जब मेरी बात उन तक पहुंचाई जाएगी तो वो कहेंगे कि यह बात कुरान में कंहा है, इसीलिए जान लो यह कुरान के ही मिसल है. असल में पूरा वाकया खैबर के मौके का है, जब एक हुक्मरान मुसलमानों से कहता है तो कि तुम लड़ने आ गए हो, अब तुम बच्चो को कतल करोगे, औरतो को उठाओगे, घर- फसलों के साथ आग जानी करोगे वगैरह वगैरह. इसके बाद नबी ने एक खुतबा दिया और कहा कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ, कुरान के मुताबिक मेरी हिदायतें माननी हैं, दीन की रौशनी में पैरवी करनी है., जो दूं ले लो, जिससे रोकू रुक जाओ, बच्चो, औरतो, लोगों के साथ कोई ज़ुल्म नहीं करना है, माले गनीमत के साथ क्या करना है. आपने जोर देके ये सब बताया कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. यानि ये न हो कि कोई ऐसा अमल कर बैठे और जब उसे तवज्जो दिलवाई जाए तो वो कहे मगर ऐसा कुरान में तो नहीं है.
4 Video on Quran, Hadith, Fiqh etc.
नबी ने कहा मुझे किसी से भी अफजल नहीं कहना, यूनुस से भी नहीं।(यह
नहीं कहा कि नहीं हूँ,)
यूनुस से इश्तेहादी गलती
हुई थी। सिर्फ यह एक नबी है जिनसे इजतिहादी गलती हुई थी. वो कौम को आजाब से पहले
छोड़ कर चल दिए थे. इन्होंने गौर फ़िक्र किया था मगर फैसला गलत ले लिया था।
अल्लाह ने तवज्जो दिलवाई, थोड़ी दूर जाने दिया, कुछ तकलीफ भी हुई
इसकी वजह से।
मगर यूसुफ को सही वक्त पर रोक दिया गया था, वरना उनसे भी गलती हो
जाती।
(फ़ज़ीलत होती है मगर उनकी बुनियाद पर किसी को छोटा या बड़ा हम नहीं
कर सकते)
मुसा ने अल्लाह से डायरेक्ट कलाम किया था। जबकि मुहम्मद स. ने
नहीं.
बिलाल को नबी पर एक अमल में फ़ज़ीलत हासिल थी,वुज़ू वाली, बशारत मिली
थी।
कुरान में नबियों की फ़ज़ीलत का बयान है जैसे मूसा और ईसा की।
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मुसलमानों ने कुरान, नबी और काबा को कभी नहीं छोड़ा बल्कि हमेशा थामे रखा है।
इन तीनों वजूद पर अब फ़िज़ूल के सवाल उठाये जा रहे हैं.
मुहम्मद शैख़ ने Prophet पर attack किया. इन्हें साजिश के तहत plant किया गया लगता है.
इन्होंने मुहम्मद सल्ल० को मुहम्मद रसूलुल्लाह और मुहम्मद इबने अब्दुल्लाह में तकसीम कर दिया है.
ये कहते हैं कि मुहम्मद इबने अब्दुल्लाह भी historical figure थे, जो बहुत बाद में आये.
जबकि पहले
ही रसूल, नबी सब गुजर चुके थे. मुहम्मद रसूलुल्लाह भी गुज़र चुके थे.
और कहते हैं कि कौन पहले और कौन बाद में था यह तय नहीं हो सकता क्योंकि कुरान ने यह नहीं बताया.
ये कहते हैं कि मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह भी रसूल थे मगर उस status के नहीं जैसे मुहम्मद रसूलुल्लाह हैं. वो ऐसे रसूल थे जैसे आप और मैं भी हो सकते हैं।
इनका मानना है कि कुरान में जंहा जंहा मुहम्मद रसूलुल्लाह से कुछ कहा गया है वो मुहम्मद इबने अब्दुल्लाह नहीं है.
मुहम्मद रसूलुल्लाह खातिमिन नबिईयिन हैं, यह आयात मुहम्मद इबने अब्दुल्लाह के बारे में नहीं हैं.
ये कहते हैं कि यही अरबी में ही कुरान सभी नबी के पास रहा है. इसी एक से ही से सभी ने तालीमात ली.
इसी में तौरेत, इंजील, ज़बूर है. इसमें कानून है (यानी तौरत). इसमें खुशखबरी (यानी इंजील) है.
कुरान का मतलब पढाई है और किताब का मतलब लिखाई है. सो वो भी इसी में है.
क्योंकि इब्राहिम ने कहा था कि एक रसूल आएगा जो किताब और हिकमत की दावत देगा. असल में ये वही किताब है.
ये मानते हैं कि जिब्रील आयातों की रूह का नाम है, न कि फ़रिश्ते का नाम है.
इनके बारे में एक बात साफ है कि यह शुरुवात में क़ुरान का तर्जुमा देख पर पढ़ते थे यानी ख़ुद की तहक़ीक़ नहीं थी। यानी किसी panel ने इनको ये सब ऊल जलूल बना कर दिया है.
दूसरी तरफ, काबे के बारे में एक Dan Gibson ने कहा की काबा असल में Petra, Jordan था, 1300 KM दूर.
नबी के 200 साल बाद मुसलमान यंहा shift हो गए थे। यह 9000 BC पुराना शहर माना जाता है.
यानि इनके मुताबिक कुरान ने जिसे नबी के के वक़्त में काबा कहा है, वो Petra था.
इस बंदे ने नबी और कुरान को बाकी रखा मगर काबे को target किया.
एक फितना यह फैला कि कुरान को उमर ने जमा करवाया.
क्योंकि क़ुरान की आयतें इधर उधर बिखरी हुई थी, कुछ बकरी खा गयी थी वगैरह.
जबकि कुरान शुरू से पढ़ा जाता था, हिफ्ज़ होता था, लोग लिखते थे. नबी खुद एक नुस्खा लिखवाते थे.
जो तैयार होने के बाद आपकी बीवी हफसा के पास था और उमर की खिलाफ़त तक उन्हीं के पास रहा.
उस्मान ने उनके पास में इसे मंगवा कर कुछ copy तैयार करवाई.
इन लोगों ने क़ुरान को छेड़ा. जबकि कुरान अपने अंदर-बाहर दोनों से साबित कर सकता है कि वो महफूज़ है.
किताब कहते ही उसे है जब pages Arranged हुए इकठ्ठे हो.
ऐसे सवाल इतिहास और archeological evidence को आधार बना कर करे जा रहे है.
आम मुस्लिम कभी इस तरह की skill या art से मुहब्बत नहीं कर पाये.
मुसलमानों की अक्सर यही tendency रही की कुरान और इस्लाम हमारे पास फिर हमे बाकी चीज़ों का क्या करना.
(as Mecca excavation is not possible now/Buddha statue demolished in Afgnstn)
15:9: बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं.
75:17-19: हमारे ज़िम्मे है उसे एकत्र करना और उसका पढ़ाना, अतः जब हम उसे पढ़ें तो उसके पठन का अनुसरण कर, फिर हमारे ज़िम्मे है उसका स्पष्टीकरण (यानि कुरान की वज़ाहत करेंगे).
6:38: हमने किताब में कोई भी चीज़ तो नहीं छोड़ी है (यह बात हिदायत के ऐतबार से)
[जिस धर्म की बुनियाद ही इस पर पड़ी की पिछली किताबें तब्दील हो गयी थी, वो कैसे अपनी आखरी किताब की हिफाज़त का इन्तेजाम नहीं करेंगे? हिफाजत ज़ुरूर करंगे।]
2 Video on obedience of Allah & Rasool
2:253: ये रसूल ऐसे हुए हैं कि इनमें हमने कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता
प्रदान की।इनमें कुछ से तो अल्लाह ने बातचीत की और इनमें से कुछ को दर्जों के
एतिबारसे उच्चता प्रदान की। और मरयम के बेटे ईसा को हमने खुली निशानियाँ दीं
औरपवित्र आत्मा से उसकी सहायता की।
4:164:
और मूसा से अल्लाह ने बातचीत की, जिस प्रकार बातचीत की जाती है।
4:150: जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों में फर्क करते हैं और कहते हैं हम किसी को मानेंगे और किसी को नहीं, और कुफ़र और ईमान के बीच एक राह निकालना चाहते हैं।
4:152: जो अल्लाह और रसूलों पर ईमान रखते हैं और दोनों में किसी को अलग नहीं करते, अल्लाह उन्हें जल्द ही इनाम देगा।
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