क्या सिर्फ कलिमा पढ़ने से जन्नत के हक़दार हो जाते हैं?
एक हदीस से मालूम पड़ता है कि कलिमा पढ़ने वाला हर इंसान जन्नत में जाएगा। इसकी बुनियाद पर कुछ आम मोकइफ़ पाए जाते हैं।
■ पहला कि चाहे कितना भी बुरा इंसान हो, उसने कलमा पढ़ लिया तो वो जन्नत में ही जाएगा। ये मोकइफ़ पूरी तरह गलत है और इसे सही वो मानते हैं जिन्हें इस्लाम का कोई खास इल्म नहीं होता।
■ दूसरा मोकइफ़ है कि कलिमा पढ़ने वाला जन्नत में जरूर जायगा मगर अपने हर किये गए गुनाहों कि सजा जहन्नुम में भुगतने के बाद। इसकी बुनियाद कई हादिसो को बनाया गया है जिनमें कुछ इस तरह की ही बात करी गई है जैसे कि हर मुस्लिम के लिए जन्नत है, नबी अपनी उम्मत के लिए शिफात करेंगे, राई के दाने के बराबर ईमान वाले को भी जहन्नुम से निकाल लिया जाएगा वगैरह। यानि सिर्फ शिरक और कुफ़र करने वाले ही जहन्नुम में बचेंगे। वैसे जहन्नुम की सजा कहना तो आसान है मगर झेलना बहुत मुश्किल।
■ तीसरा मोकइफ़ (दूसरे मोकइफ़ की ही एक्सटेंशन) सबसे सही है और इसे उलेमा की अकसरियत की ताईद हासिल है। यह कहता है कि सिर्फ कलमा पढ़ने से ही जन्नत नहीं मिलेगी क्योंकि ऐसा होना खूद कुरान और सुन्नत की आम तालीमात के खिलाफ होगा। जन्नत या फलाह कलिमे पर नहीं बल्कि ईमान और अमले सालिह पर मिलेगी जैसा कुरान ने खूद कहा है। कुरान की रोशनी में हादिसो को समझा जाएगा और कुरान के मुताबिक ही नतीजा निकाला जाएगा। यंहा कलमे के इकरार का मतलब कन्डीशनल है और इसके साथ साथ इस्लाम के बताए तमाम अहकाम को मानना भी जरूरी है। यानि कलमे के इकरार के साथ ही ऑटोमैटिक्ली इस्लाम की बाकी चीजें भी लागू हो जाती हैं। असल में यह हदीस कलमे की हकीकत वाजेह कर रही है कि कलमे के असल मायने क्या है।
इसी हदीस पर इमाम अमीन हसन इसलाही ने कहा है कि यह वैसे ही जैसे निकाह कुबूल करने का मतलब सिर्फ कहना भर नहीं होता बल्कि अपनी बीवी की हर जिम्मेदारी उठाना होता है जैसे उसके खाने, पीने, पहनने, रहने वगैरह के सारे खर्चे उठाना। निकाह के दौरान शादी की तमाम जिम्मेदारियों को बयान करने के लिए कोई खुतबा नहीं किया जाता क्योंकि यह पहले से ही अन्डर्स्टुड है। कोई यह कहे कि मैंने तो सिर्फ निकाह कुबुला था बाकी कुछ नहीं तो ऐसे वो अपना पल्ला नहीं छूट सकता। मौलाना वहीदुद्दीन खान ने भी इस हदीस पर लिखा है कि कलमा गो के लिए जन्नत नहीं है बल्कि साहिबे कलमा के लिए जन्नत है यानि जो कलमे का हक अदा करे। यह भी कहा जाता है कि इस हदीस को बयान करने के लिए हज़रत उमर ने हज़रत अबू हुरैरा को मना कर दिया था कि इससे मुसलमान इस बात का गलत मतलब निकाल लेंगे और सुस्त हो जाएंगे। ऐसा भी कहा जाता है कि यह बात तो नबी ने एक बद्दू को कही थी जिसने अपने अक्खड़ अंदाज में पूछा था कि मुझे आसान जुमले में समझा दो कि जन्नत कैसे मिलेगी ताकि वही बात मैं अपने इलाकों वालों को बता सकूँ, इस पर आपने उससे यह जुमला कहा जिसका मतलब था कि अब इस कलमे पर कायम हो जाना यानि ईमान पर।
● असल में ऐसी बातें लोगों को छोटे छोटे कामों की तरफ तवज्जो दिलवाने के लिए होती थी जो उनके लिए जन्नत को आसान बना सकती हैं। क्योंकि हादिसो में पसमंजर बयान नहीं होता इसलिए कोई बात नबी ने किस पसमनज़र में कही थी अक्सर इसका पूरा इल्म हदीसों से नहीं हो पाता है। अक्सर हादिसो में नबी की पूरी नहीं बल्कि मूल बात बयान करी हुई होती है।
इसीलिए ऐसा लगता है कि यह बात नबी ने किसी खास पसमंजर में कही होगी, शायद तब जब लोगों को इस्लाम में दाखिल करने की जद्दो जहद की जा रही थी। क्योंकि उस वक़्त कलमा पढ़ने का मतलब इस्लाम में पूरी तरह दाखिल हो जाना था, पिछले सारे गलत अकाइद और अमाल छोड़कर। हम इसे एक मिसाल से समझ सकते हैं कि अगर आज भी हमसे कोई कहे की हमारी आइडिलोजी अपना लो तो इसका मतलब होता है सारे पुराने खयालात छोड़ कर नए अपना लो।
जैसा कि रियादअससालिहीन (424) हदीस में कहा गया है कि एक बार नबी कही चले गए और सबको उनकी हिफाजत की फिक्र होने लगी और फिर सब उन्हें ढूँढने निकले तो पाया कि वो एक अंसार के बाग में थे। उन्होंने कहा कि जाओ और यह मुनादी कर दो कि जिसने भी दिल से लाइलाहाइल्लललाह कहा वो जन्नत में जाएगा। इससे ऐसा लगता है कि जैसे यह बात मदीना वासियों को इस्लाम की ओर तवज्जो दिलवाने के लिए कही गई थी, जिनमें अंसार पहले ही इस्लाम के मुताबिक ईमान और अमल के जरिए जन्नत के हकदार हो चुके थे। यानि इस तरह कलमे को कुबूल करने को कहा गया है। हालाँकि बुखारी (3693, 6216), मुस्लिम (2403a), तिरमीजी (3710) में ऐसे ही वाकये का बयान हुआ हैं जहा नबी एक अंसार के बाग में घूम रहे थे जब एक एक करके, अबू बकर, उमर, उस्मान, कुछ और सहाबा ने अंदर दाखिल होने की इजाजत मांगी और हर किसी कि बारी पर नबी ने कहा कि इनके लिए दरवाजे खोल दो और इन्हे जन्नत की बाशरत दे दो। यानि असल बात या वाक़या क्या था, हादिसो से मालूम करना आसान नहीं होता और कोई आखिरी नतीजा निकालना भी।
तिरमीजी (3506, 3508) और माजह (3860) में कहा गया है कि जिसने भी अल्लाह के 99 नाम गिने वो जन्नत में जाएगा। जबकि (बुखारी 6410) में कहा गया है जिसने भी इन नामों, उनके मायनों में यकीन रखा और इनके मुताबिक अमल किये वो जन्नत में जाएगा। इससे पता चलता है असल बात यह है कि इंसान को अल्लाह की सिफ्तों के मुताबिक काम भी करने होंगे।
तिरमिज़ी (1914) में कहा गया है कि जिसने 2 बेटियों को पाला वो नबी के साथ जन्नत में जाएगा। इसका मतलब है कि उसे बाकी इस्लाम कि शराइत भी पूरी करनी होगी तो वो जन्नत में ऐसे जाएगा कि नबी साथ होंगे। यंहा बेटियों की परवरिश की ओर ध्यान दिलवाया गया है।
इसी तरह यह बात (अबू दावूद 3/190) मौत के वक़्त लाइलाहाइल्लललाह पुकारने वालों के लिए भी कही जाती है कि वो जन्नत में जाएगा। मुसनद (464, 498) और मुस्लिम (26a) कहती है कि जो कोई ऐसी हालत में मरा कि उसने अल्लाह के सिवा किसी और को खुदा नहीं माना वो जन्नत में जाएगा। बुखारी (4497) में कहा गया जिसने भी मरते हुए अल्लाह के दुश्मन को पुकारा वो जहन्नुम में जाएगा और जिसने अल्लाह के दुशमन को नहीं पुकारा वो जन्नत में जाएगा। इनसे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे यह बात अल्लाह के अज़ाब या जंग से पहले आम लोगों को कही जा रहा है कि आखिरी वक्त है मान जाओ और मरने से पहले अल्लाह का इक़रार करो, न कि अल्लाह के दुश्मनों या मुख़ालिफ़ों यानि गैरुल्लाह, काफिरो या मुश्रीकों का।
● इसी तरह की कई और हदीसे भी है जिनका पसमंजर नहीं जानने की हालत में लोग गलत नतीजे निकाल लेते हैं।
नसाई (674), दाऊद (527), मुस्लिम (385) में कहा गया है कि जिसने भी अज़ान को यकीन के साथ दोहराया वो जन्नत में जाएगा। मुसनद (423) कहती है कि नमाज़ की फरज़ियत कुबुलने वाला जन्नत में होगा।
माजह (2168) कहती है कि जसिने भी शर्क नहीं किया और नाजायज खून नहीं बहाया वो जन्नत में जाएगा।
बुखारी (3222), तिरमीजी (2644) में तो यह तक कहा गया है कि जिनसे भी ज़िंदगी में अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत नहीं करी वो जन्नत में जाएगा भले ही उसने ज़िना या चोरी करी हो। बुखारी और मुस्लिम में भी कहा गया है जिसने अल्लाह, मुहम्मद, ईसा, जन्नत और जहन्नुम को सच्चा माना वो जन्नत में जाएगा भले ही उसने कुछ भी किया हो।
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बलात्कार करने वालो को माफ़ किया जा सकता है मगर शिर्क करने वाले को क्यों नहीं?
● क़ुरान की आयतें सामने पेश आ रहे सवालों, परेशानियों, हालातों के मद्देनजर नाज़िल होती थी। इसलीए कंही कोई बात हिदायतन कह दी जाती थी और कंही उसूलन। कंही मुख्तसर और कंही तफसील से। लिहाजा क़ुरान में बताए गए अल्लाह के कानूनों, रियायतो, सज़ाओं, माफियों वगैरह को मजमुई तौर पर देखना चाहिए। जब हम ऐसे देखते हैं तो चंद बातें इस तरह सामने आती हैं कि इस दुनिया या इम्तिहान में सबसे बड़ा और अहम सवाल एक अल्लाह का इक़रार है। क्योंकि बुनियाद वही है। वो था तो हम हैं। जो अपने एक मालिक को मान लेगा, उसने सबसे पहला पड़ाव पार कर लिया। शिर्क करके इंसान को कुछ हासिल नहीं होता है जबकि गुनाह करके उसे मानसिक, शारीरिक, आर्थिक फायदा भले मिल जाए। इसलिए शिर्क इल्हाद से बड़ा जुर्म है। शिर्क करने वाला ये मानता है कि वो एक मामूली बंदा है, क़ायनात का मालिक कोई और है। मगर वो इसमें दिलो, दिमाग का इस्तमाल किये बिना, उस मालिक को एक की बजाए कई मान लेता है।
भले इंसान के लिए भी शिर्क की कठोरतम सज़ा है क्योंकि जैसे कितना भी भला इंसान हो अगर वो दुश्मन देश का जासूस होता है तो उसके अच्छे काम भी उसे देशद्रोह की सज़ा से नहीं बचा सकते. ईश्वर के लिए किये गए अच्छे कर्म जाया नहीं जाते, उनका पूरा सिला आखिरत में मिलना है. जो अच्छे कर्म दुनिया के लिए किये, उसका सिला दुनिया में ही मिल जाता है.
● मोटे मोटे तौर पर दो तरह के गुनाह हैं, एक अल्लाह के मुत्तालिक (हुकुकुल्लाह) और दूसरे बंदों के मुत्तालिक (हुकुकुल इबाद)।
1. काफ़िर (अल्लाह के खुले कट्टर दुश्मन जैसे नमरूद, फिरोन, अबु लहब, अबु जहल, वग़ैरह ) को माफी नहीं मिलेगी। वो हमेशा जहन्नुम में रहंगे। इनका सबसे बड़ा गुनाह है अल्लाह के सामने तकब्बुर से डट जाना।
2. अल्लाह शिर्क माफ नही करेगा। मगर दुनिया में जिन्होंने तौबा करली और ईमान में पूरी तरह दाखिल हो कर रहे, उनके पिछले अल्लाह के मुत्तालिक गुनाह माफ हो जायँगे क्योंकि उनके पास उज़र है, उन्होंने जहालत में ऐसा किया।
3. जो लोग कुफ्र, जहालत में इंसानों के साथ गुनाह करते रहे मगर फिर सच्ची तौबा करके आगे हक़ पर रहे हैं (जैसे कई सहाबा) तो उनके गुनाह इसी जहालत की बुनियाद और उज़र पर माफ हो जायँगे। मगर उनके मज़लूमों को इसके बदले बड़ी बड़ी नेमतें मिल जायेगीं, उन्ही की मर्ज़ी से, और इंसाफ हो जायेगा।
4. जो ईमान और गैर ईमान वाले हैं, उनके अल्लाह से मुत्तालिक गुनाह अल्लाह माफ कर सकता है, पर अगर उनके उज़र कुबूल करने लायक हुए तो। पर उनके शिर्क की माफी नहीं मिलेगी, उसका अज़ाब मिलेगा।
5. ईमान और गैर ईमान वालों को बंदों से मुतालिक गुनाहों को भी अल्लाह माफ कर सकता है अगर दुनिया मे तौबा करके वापिस उसी तरफ नही पलटे तो। इसके अलावा जो कोई उज़र पेश कर पाए तो भी अल्लाह माफ कर सकता है। ऐसे गुनहगार की नीयत, हालात भी देखे जायँगे। बदले में मज़लूमो को बड़ी नेमतें मिल जाएंगी या ज़ालिम से नेकियों लेके मज़लूम की बदीयां भी दे दी जाएंगी। मज़लूम को इंसाफ और बदला ऐसे मिल जाएगा कि शिकायत नहीं रहेगी बल्कि शुक्र होगा।
पर अगर कोई तौबा या उज़र नही हुआ तो कोई गुनाह माफ़ नहीं होगा। सज़ा मिलेगी। मज़लूम खुद बदला लेगा। जहन्नम में अज़ाब झेलेगा। कई तरह से इंसाफ किया जायेगा।
6. फिर जैसा हदीसों से वाज़ेह है कि आखिर में हर ईमान वाला (ईश्वर, आख़िरत, अमले सवालीह में यकीन करने वाला चाहे किसी मज़हब का हो) जन्नत में जायेगा। पर जहन्नुम से एक दिन निकल जाएगा ऐसा कहना आसान है मगर वंहा अज़ाब झेलना आसान नही होगा। ये ऐसा ही होगा जैसे किसी को कहा जाए कि इस आग के दरिया को पार कर लो तो उस पार तुम्हारे लिए ईनाम है। बंदा कहेगा कि ईनाम गया भाड़ में, मैं यहीं ठीक हूँ, पर इस दरिया में नहीं कुदूँगा। पर अफसोस वो कितना भी मना करे जहन्नुम की आग तो झेलनी ही पड़ेगी।
7. रही बात गैर ईमान वालों की हमेशा जहन्नुम में पड़े रहने कि तो अल्लाह ने क़ुरान में बताया है कि जन्नत हमेशा रहेगी और जहन्नुम भी। पर जहन्नुम के साथ ये कह दिया कि उसकी मर्ज़ी वो जो चाहे करे। यानी हमेशगी (ये हमेशगी अल्लाह की हमेशगी के बराबर नहीं है) के बाद अल्लाह चाहेगा तो जहन्नुम खत्म भी कर सकता है। पर हमारे लिए ये हमेशगी की इंतिहा मापना नामुकिम है। रहे वो काफ़िर जो अल्लाह के मुखालिफ डट गए थे, उनके साथ यक़ीनन वो अपने वादे के मुताबिक ही डील करेगा।
ये राय इस तरह के मुद्दों पर बहुत से उलेमा को पढ़कर, सुनकर, गौरो फिकर करके लिखी है। इसमें कोई गलती है तो इगोनर करिएगा।
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