Friday, 22 November 2024

होमोसेक्सुएलिटी, जानवरों, ख़ुदकुशी, अंगदान करने वालों का आखिरत में क्या होगा?

 

होमोसेक्सुएलिटी और इस्लाम


दीन पाकीज़गी का नाम है। इस्लाम में होमोसेक्सुएलिटी मना है क्योंकि फेमिली नामक इंस्टीटयूशन को बर्बाद कर सकता है और इसलिए यह अल्लाह की स्कीम के खिलाफ है। साथ ही दो हमजिंस लोगों के रिशतें लाइफ भर चलते भी नहीं है जैसे दो मुखतलीफ़ जिंस के लोगों के चल जाते हैं। हज़रत लूत की कौम ने जो अज़ाब दिया गया था उसकी एक बड़ी बुनियाद उनका यही गुनाह था मगर असल गुनाह रसूल और उसकी हिदायतों का इनकार था। साथ ही हमें यह बात समझना चाहिए कि यह बुराई उनकी कौम के चंद लोगों ने नहीं बल्कि पूरी कौम (ज्यादातर) ने अपना ली थी। कुरान (4:16) कहता है कि दो मर्दों की हमजिंसी पर उन्हें सजा दो, मगर कुरान ने इसकी सजा नहीं बताई। ये सजा हुक्मरान तय करेंगे। इस तरह के मामलों में हुकूमत चाहे तो निष्पक्ष रहते हुए कानून बना सकती है और सही तहकीक के बाद सजा भी दे सकती है।

होमोसेक्सुएलिटी पर दोनों (धार्मिक और अधार्मिक) पक्ष अपनी अपनी राय रखते हैं और इसके लिए साइंस को आधार बताते हैं। एक कहते हैं कि यह टेन्डेन्सी नैचुरल है और दूसरे कहते हैं कि यह नैचुरल नहीं है।

हालाँकि यह बात सच है कि अधिकतर होमोसेक्सुएल लोग नैचुरल नहीं बल्कि बचपन, तजुर्बे, संगत, एडिक्शन, नए बदलाव आदि जैसी कई वजुहात के कारण ऐसे बन जाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में भी समझाने की कोशिश करें और खूद कोई हुक्म न लगाए। कोई वाकई नेचुरली होमोसेक्सुएल है भी तो उसका मामला तो पहले से ही अल्लाह के सुपुर्द है।

बाज वक़्त जिस्मानी कमियों के साथ भी बच्चें पैदा हो जाते हैं जैसे बिना हाथ, पैर के। इसी तरह प्राइवेट पार्ट में कोई बिगाड़ के साथ भी बच्चें पैदा होते हैं। ऐसे मामलों में तो यह नेचुरल खामी हो गई और इसी वजह से ऐसे लोग बालिग होते होते कई वजुहात के चलते, हमजिंसी ताल्लुक की ओर चले जाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में भी बस समझाने की कोशिश करें। ऐसे लोग अपने जिस्म में किसी को कमी को दुरुस्त करवाना चाहे तो उन्हें बिल्कुल करवाना चाहिए मगर दूसरे जिंस की अलमात पाने के लिए कुछ नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे तो फिर यह बात कही जा कर नहीं रुकेगी।

मुसलमानों की दिक्कत यह है कि वो इस गुनाह को बाकी दूसरे इससे भी बड़े गुनाहों के मुकाबले ज्यादा तवज्जो देते हैं और ऐसे लोगों को मौत या टोटल बॉयकोट के बराबर सजा देने को तैयार बैठे होते हैं। जबकि मुस्लिमों में ज़िना, शराब, जुवा, सूद, रिश्वतखोरी, हक तलफ़ी, चोरी, कत्ल, बेस्टेलिटी, पीडोफिलिया जैसे बड़े बड़े गुनाह आम बात हैं और मुस्लिम इन्हें उतनी तवज्जो नहीं देते। असल में मुसलमान ऐसे कई मामलों में सेडिस्ट बन जाते हैं। इसलिए होमोसेक्सुएलिटी को रोकने के लिए लोगों के लिए वैसे ही समझाइए जैसे दूसरे गुनाहों के बारे में समझाते हैं।

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हमजिन्सी लोगों के आपरेशन

ऐसे ओपेरेशन जायज़ हैं, ऐसी अलामतों से उनका जेंडर डिसाइड करना भी और उनसे उसी तरह शादी भी। नेचुरली लोगों की बात कर रहे हैं जो आम ज़िन्दगी जीना चाहते हैं। जिनका इरादा ही सीधी राह चलना नहीं है, वो नहीं सुधरने वाले। इसमें बॉयोलोजीकल, साइकोलॉजिकल, सोशल बहुत से पहलुओं से बदलाव किया जाना चाहिए मगर उससे पहले इरादा और नियत चाहिए, दोनों तरफ़ से. ज़्यादातर हमजिन्सी लोग के ऑर्गन्स काम कर रहे होते हैं मगर कुछ इश्यूज की वजह से वो दूसरे जिंस की पहचान या अलामतों या जिस्मानी साख्त की ओर चल पड़ते हैं। अगर सही ट्रीटमेंट (जिसके कई पहलू हैं) किया जाए तो अक्सर को रोका जा सकता है, बशर्त उनमें भी इरादा, नियत चाहिए। अगर इनमें सुधार है तो ये शादी भी कर सकते हैं, धोखा भी न दे। इसी तरह इंडियन सबकॉन्टिनेंट में किन्नर बनने या उनमें शामिल होने वाले ज़्यादातर लोग बाई बर्थ किन्नर नहीं होते हैं, जैसे आंकड़े और एक्सपर्ट्स बताते हैं। इनके ऐसे बनने के पीछे भी बहुत से इश्यूज छिपे हैं। जो बाई बर्थ किन्नर या नेचुरली हमजिन्स है, उन्हें रोका जाना नामुमकिन है और इसलिये उनकी या उनसे शादी भी एक फ़िज़ूल काम है जिसका नतीजा कुछ नहीं निकलना। यह मेरी राय और समझ है।

 

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जानवरों के साथ आखिरत में क्या होगा?

 

कुरान (6:38, 81:5) बताता है कि आखिरत में तमाम जानवरों को भी अल्लाह इकट्ठा करेगा।  मगर इसके बाद उनके साथ क्या होगा, उनके लिए अल्लाह ने क्या स्कीम रखी है, हमें यकीनी तौर पर नहीं मालूम क्योंकि कुरान इसकी वाज़हत नहीं करता।  

हालाँकि जन्नत में फल, जानवर खाने के तौर पर मौजूद होंगे, यह वाजेह है (देखिए कुरान 56:21, 52:22, मुस्लिम 315) क्योंकि दुनिया आखिरत का ही एक छोटा सा मॉडेल है, इसलिए जन्नत में भी पहाड़, दरिया, जानवर, परिंदे वगैरह उसकी खूबसूरती के वास्ते होंगे ही। क्या ये वही दुनिया वाले होंगे या कोई और यह एक अलग बात है। वैसे इनका असल वजूद भी कैसा होगा, किसी को यकीनी तौर पर नहीं मालूम क्योंकि यह सब मुशाबिहात से संबंधित भी हैं।

रही बात बदले की तो हादिसो (मुस्लिम 2582 वगैरह) से मालूम पड़ता है कि जानवरों के आखिरात में कॉमपेन्सेट जरूर करा जायगा। उनके साथ हुए आपसी ज्यादतियों का बदला दिया जायगा जैसे दुनिया में सींग वाले और बिना सींग वाले जानवर में हुई लड़ाई का बदला कमजोर को दिया जाएगा। जाहीर हैं ज़ुल्म का बदला उतार जायगा। इंसानों द्वारा जो जानवरों के साथ ज़्यादतिया हुई अल्लाह उसका बदला भी इंसानों से लेगा मगर क्या इसके बदले जानवरों को भी कुछ मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है। इसमें जरूरत के तौर पर खाने के लिए जानवरो को जो ज़िबह करा जाता है, उसका बदला नहीं होगा।
वो अन्याय नहीं करता और उसका हर काम सबसे उत्तम होता है, इसलिए जो भी होगा सर्वश्रेष्ट होगा।

क्योंकि ये दुनिया इंसानों के लिए एक इम्तिहान है, जानवरों के लिए नहीं। जानवरों को इंसान की तरह अकल, इल्म, शऊर, इकतीदार, इरादा नहीं दिया गया है।  

असहाबे कहफ के कुत्ते और कई अन्य जानवरों के जन्नत में जाने के बारे में जो रिवायत बयान करी जाती है, वो काबीले कुबूल नहीं है।

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ख़ुदकुशी करने वालों का आखिरत में क्या होगा?


अल्लाह ने इंसानी जान को हुरमत बक्शी है। गैर इंसानी मखलूक की जान उन्हीं ज़रूरत के मद्देनजर ली जा सकती है जिनके लिए अल्लाह ने इंसान को इनकी जान लेने की इजाज़त दी है। इसी तरह किसी इंसान की जान की लेना इस्लाम में  सबसे बड़े गुनाहों में से एक गुनाह है (सिर्फ कत्ल करने, फितना फैलाने वगैरह जैसे कारणों से ही किसी की जान ली जा सकती है, हालांकि माफ करने की तरग़ीब भी की गई है)। ख़ुदकुशी में भी किसी की जान ली जाती है जो कि अपनी ही जान होती है, इसलिए ये भी सबसे बड़ा गुनाह में से है। इसलिए ख़ुदकुशी कभी नहीं करनी चाहिए, चाहे जो मसाइल हो। अल्लाह पर भरोसा रखने वालों को तो इम्तिहान खत्म करने तक इंतजार करना चाहिए, पहले ही पर्चा फाड़ कर एग्जाम सेंटर से बाहर नहीं चले जाना चाहिये। इस्लाम में कई गुनाहों की सज़ा हमेशा की (इंसानी हमेशगी जो कि अल्लाह की हमेशगी के बराबर नहीं हो सकती) जहन्नुम है जैसे क़त्ल (ख़ुदकुशी भी, फिर भी खुद को क़त्ल करने और दूसरों को क़त्ल करने में बहुत फ़र्क़ है।), ज़िना वगैरह।

अल्लाह किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ नहीं डालता, यह दीन के एहकाम के ऐतबार से कहा गया है, न कि जिंदगी की परेशानियों के ऐतबार से। परेशानियों की कोई इन्तेहाँ नही है। मगर कोई भी परेशानी इतनी बड़ी भी नहीं है कि मौत उसे हल कर दे। मौत से उस परेशानी से छुटकारा तो मिल सकता है मगर हल नहीं। किसी परेशानी का हल ज़िन्दगी के किस मोड़ पर मिल जाये किसी को पता नहीं और किस परेशानी की बदल जन्नत के रास्ते आसान हो जाये, पता नहीं। परेशानिया ही इम्तिहान है। मरना कोई नहीं चाहता, और खुद की जान लेना तो और मुश्किल है। किस के साथ क्या परेशानी, किस स्तर की चल रही है ये वही जानता है। कब्र का हाल मुर्दा जाने वाली कहावत सही है। मानसिक, शारीरिक प्रताड़ना झेलना सबके लिए समान नहीं होता और न ही सबके पास समान बुद्धि, विवेक होता है।

अल्लाह हर मुजरिम को उसके जुर्म की सजा देते हुए उसके हालातों, कारणों, मजबूरियों, मानसकिता वगैरह तमाम पहलूयो को ध्यान में रखेगा और जंहा रियायत की ज़रूरत होगी दी जाएगी और जंहा शदीद सख्ती की ज़रूरत होगी वंहा मामूली सी भी रियायत नहीं दी जायेगी। यही कायदा दुनिया में भी कानूनी फैसलों को देते हुए ध्यान में रखा जाता है। इसलिये आत्महत्या करने का बड़ा जुर्म करने वालों के साथ भी अल्लाह कोई ज़्यादती नहीं करेगा और उनकी सारी जायज़ वजूहात के मद्देनज़र ही उसके जहन्नुम में मिलने वाले अज़ाब पर फैसला होगा।
 

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इस्लाम में अंगदान

इस्लाम में अंगदान पूरी तरह जायज़ है अगर वो डोनर की जान जाने का सबब न बन रहा हो तो। कुरान कहता है जिसने किसी की जान बचाई, उसने सारी इंसानियत की जान बचाई। इसके अलावा जो चीज कुरान ने हराम करी है, सिर्फ वही हराम है, उनके अलावा कुछ भी हराम नहीं है, सुरक्षित अंग दान करने में कोई हर्ज नहीं है। कुरान ने जिनसे चीज़ों के निषेध का ज़िक्र है, उन्हें रुकना है (और उनके जैसी चीज़ों से), जिनका ज़िक्र ही कुरान में नहीं है, उन सभी से नहीं रुकना है। अंगदान और रक्तदान लगभग एक ही सा है, अगर एक को अनुमति है तो दूसरा भी कैसे अनुमति नहीं होनी चाहिए। इस्लाम ने कही भी नहीं कहा है की जिस्म को सही सलामत रखना है, अंग दान के सम्बन्ध में. अगर ऐसा होता तो फिर खतना, रक्तदान क्यों जायज़ है? दलील हलाल घोषित होने की नहीं, बल्कि हराम होने की खोज की जानी चाहिए। इस्लाम को सीधा पकड़ना है हमें, उल्टा नहीं। उलेमा को जब खुद अंग दान की ज़रूरत होगी, वो इसे जायज़ कर देंगे। पहले भी ऐसा किया है। पहले कभी लाउडस्पीकर, फ़ोटो, कैमरा, टीवी, मोबाइल का इस्तेमाल नाजायज़ हुआ करता था, आज लगभग सभी उलेमा यूट्यूब पर अपने चैनल सब्सक्राइब करवा रहे हैं। अक्सर इनकी ट्यूबलाइट जलने में एक-आध सदी लग जाती है।

कुछ "वाइस वर्सा" सिंपल चीज़ें या थंब रूल्स हैं जिनके मुताबिक मुसलमान 'बाज़ कामों' के जायज़-नाजायज़ होने के बारे अक्सर आसानी से समझ सकते हैं। भले ही उन चीजों को हमारे "पॉपुलर उलेमा" नाजायज़ बताते फिरें। असल में हमारे उलेमा की अक्सरियत के फैसले इल्म और अक्ल की रोशनी में नहीं होते हैं बल्कि अपके मसलक की रिवायतों के बुनियाद पर होते हैं।

रूल: अगर कोई चीज़ लेना जायज़ है तो वो देना भी जायज़ है। अगर किसी की नमाज़ में अल्लाह की बारगाह में कुबूलियत के ऐतबार से कोई नुक्स नहीं है तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ने में भी किसी के लिए कोई ऐब नहीं है। अगर मुसलमानों की निगाह में इस्लाम में दाख़िल होने के लिए कलमे को मानना ​​जरूरी है तो किसी को इस्लाम से बेदखल करने के लिए के लिए भी उसका कलमे का इंकार करना जरूरी है।

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