
नज़र और नियाज़ पर एक आम निष्पक्ष मत।
नज़र
करना एक इबादत है। हज भी एक नज़र की इबादत है। किसी के हुज़ूर में कोई खाना
पेश करना नजर या नियाज़ है। कोई नियत करे कि फला मन्नत पूरी होने पर वो फला
अमल करेगा तो यह भी एक नज़र है जैसे किसी को खाना खिलाना या कंही ज़ियारत
करना। ऐसी मन्नतों में अल्लाह को गवाह बनाया जाता है। नजर पूरी न करने पर
वही कफ़फारा है जो कसम का कफ़फारा है। नबी ने किसी मन्नत के लिए ऐसे अल्लाह
को नजर बनाने को तरजीह नहीं दी। जिस तरह गैरुल्लाह के सामने सजदा
या रुकू नहीं किया जा सकता उसी तरह गैरुल्लाह के नाम की नज़र भी कुबूल नहीं
करी जा सकती। यह शिर्क है। गैरुल्लाह के नज़र किया गया खाना हराम है। किसी
इंसान के नाम पर नज़र किया गया खाना भी जायज़ नहीं है। सिर्फ अल्लाह के नज़र
किया गया खाना ही जायज़ है। हालांकि ईसाले सावाब के लिए या अल्लाह के नाम पर
खान खिलाना जायज है। अमूमन लोग जो अपने इमामों, पीरों, बुजुर्गों के नाम
पर खाना बांटते हैं, वो दरअसल उनको ईसाले सवाब पहुंचाने के नाम पर ऐसा करते
हैं, न कि उनके नाम पर या उनको नजर करके। किसी का दिल न दुखे
इसलिये आप इसे लेके किसी और दे दें या जानवर को दे दें तो कोई हर्ज नहीं।
क्योंकि वो खाना गैरुल्लाह नजर बनाने से हराम हुआ है। नज़र सिर्फ आप तक ही
थी जो आप पर आकार खत्म हो चुकी है। आपने आगे उसे आम खाने या तोहफे की तरह
दिया है।
नियाज़ का मतलब है खाना बनाके खिलाना ताकि सवाब मिले। उर्स, लंगर, फातिहा का खाना किसी मर चुके बुजुर्ग को इसाले सवाब पहुचाने के लिए होता है। इन दोनों में ही खाना अल्लाह के नाम पर और सवाब अपने या दूसरे को पहुचानें के लिए होता है। इसमें तब तक कुछ गलत नहीं है जब तक खाना गैरुल्लाह के नाम पर न हो। किसी बुजुर्ग के नाम पर नियाज़ देने की मन्नत मांगना गलत है। किसी बुर्जग को सवाब हासिल करने का वसीला (ज़रिया/एजेंट) समझ कर भी कोई ऐसी नेकी करना गलत है।
ईसाले सवाब में कुछ हर्ज नहीं मगर ईसाले सवाब ऐसा नहीं पहुंचता है। सवाब तभी पहुंचता है जब मरने वाली की कोई काम करने की नीयत/इरादा था मगर वो जीते जी उसे मुक़म्मल नहीं कर पाया और उसके मरने के बाद में औलाद ने मुक़म्मल कर दिया जैसे हज कर लिया, मस्जिद, स्कूल, प्याऊ वगैरह बनवा दिया, या रेगुलर लंगर चलावा दिया (क्योंकि मृतक की वह काम करने की चाहत थी जो किसी भी वजह से वो करे बगैर ही मर गया)।
11वीं या 13वीं मनान एक रिवाज है जो बिदत के करीब पहुंच चुका है क्योंकि इसे दिन को यह करना दीनी काम माना जाने लगा है। इसलिए ऐसा कुछ करना है उसे किसी तय दिन (रिवाजों से तय किया हुआ या चला आ रहा) न करा जाए। बाकी 11वीं, 13वीं का खान जायज़ है और उसमें कोई गुनाह नहीं। बाज़ वक़्त खाना भी पड़ता है। आखिरत में मनाने वाले से जवाब हो सकता है इस पर, ना कि खाने वाले से क्योंकि खाने वाले की नियत में कुछ भी बिदत नहीं थी। मगर कोई तकवे के तेहत, इसे वजह (बिदत कनेक्शन) करते हुए न खाए तो उसे इंशाअल्लाह नेकी मिलेगी।
प्रसाद, भंडारा, भोग क्या है?
हिन्दू धर्म में भोग सभी कार्यों का एक अनिवार्य अंग है। भोग का अर्थ भगवान को समर्पित सामग्री है। प्रसाद का मूल अर्थ भोग लगी खाद्य सामग्री है। भगवान का भोग लगाने के बाद वो खाना या चीज़ प्रसाद कहलाती है। पूजा के दौरान भोग लगाई गई मिठाई प्रसाद ही हो गयी। भोग नहीं लगाया तो नहीं हुई। भंडारा का अर्थ, सामूहिक भोज है।
दीवली की मिठाई अक्सर बाहर से आती है, बिना भोग लगाए, सो उसे खा सकते हैं। जिसके बारे में आप यकीन से नहीं जानते कि उस मिठाई का भोग लगा है या नहीं, उसे भी खा सकते हो, दिल राज़ी हो तो वरना किसी और को दे दो।
प्रसाद 3 तरह का होता है:-
● (1) नॉन वेज प्रसाद:
यह
बलि के नाम पर क़त्ल किये जाने वाले जानवर का होता है। यह तो सीधा सीधा
हराम है। क्योंकि क़ुरान साफ कहता है कि मुर्दार, खून, और गैरुल्लाह के नाम
पर किया ज़िबह हराम है। हिंदुओ द्वारा दी गयी ऐसी बलि का मांस हराम है। हालांकि
आप अहले किताब का किया गया ज़िबह खा सकते हो अगर आप जानते हो कि वो लोग
खुदा के नाम पर ही जानवर ज़िबह करते हैं और सारा खून जिस्म से बहा दिया जाता
है। पर अगर आप यकीन से यह बात नहीं जानते तो इसके जायज़ होने पर इस पर इखतिलाफ़ ए राय है। बेहतर तो यही कि फिर इस गोश्त से दूर ही रहा जाए। फ़िक़ह शाफ़ई में अहले किताब की ज़बीहा खाना जायज़ है मगर हनाफ़ में नहीं है।
● (2) बिना भोग लगया हुआ वेज प्रसाद:
जिस प्रसाद का भोग ही नहीं लगा हो (भले उसे प्रसाद कह कर दिया जा रहा हो), वो खाना जायज़ है। क्योंकि इसका
मूर्ति पर भोग नहीं लगया जाता, इससे मूर्ति की आरती नहीं की जाती, इसे
मूर्ति के सामने रख कर प्रसाद की तरह पूजा नहीं की जाती। यह घर में कंही
रखा हुआ हो सकता है जिसे पूजा के लिए छुवा भी नहीं जाता है यानि यह पूजा में इस्तेमाल ही नहीं होता। इसके अलावा अगर कोई
चीज़ डायरेक्ट बाहर से खरीद कर प्रसाद की तरह बांट दी जाती है तो वह भी जायज़
है। जैसे लोग अक्सर किसी मंदिर या तीर्थ से वापिस आते हुए मंदिर के बाहर
से, किसी दुकान से आते हुए बिना भोग लगा समान खरीद लाते हैं और उसको प्रसाद
कह कर बांट देते हैं। ऐसे ही दीवाली पर मिठाई बांटी जाती है जो अक्सर बिना
भोग लगी या सीधा बाहर से खरीदी हुई होती है। ये सब खाना बिल्कुल जायज़ है। वैसे कुछ लोग भोग लगा हुआ प्रसाद न तो बाहर बाँटते हैं और न ही उसे
बाकी खाने से मिक्स करते हैं। तीर्थ से भोग लगा हुआ शुद्ध प्रसाद लाकर लोग
घर में अपने लिए ही रख लेते हैं। उसका कारण यह है कि भोग लगा हुआ प्रसाद
थोड़ा सा ही होता है जो लोग अपनी फैमिली वैगरह के लिए रखते हैं। ये लोग अपने
प्रसाद को शुद्ध रखने के लिए, इसको बाकी खाने में नहीं मिलाते हैं
ताकि उन्हें खुद के लिए शुद्ध प्रसाद ही मिले। इसलिए यही लोग फिर बाहर से
खरीदा गया या थाली, बर्तन का बिना भोग लगा हुआ बाकी बचा खाना दूसरों को
प्रसाद के कर बांट देते हैं। अगर ऐसा ही है तो फिर यह खाना भी जायज़ है।
● (3) भोग लगा हुआ वेज प्रसाद:
भोग लगा प्रसाद मिलाने के बाद तैयार हुआ खाना नाजायज़ है। क्योंकि इसका भोग लगाया जाता है या आरती की जाती है। धर्म-कर्म-पितृ-ईष्ट आदि के नाम पर बटनें वाले खाने अक्सर इसी प्रकार मिलाकर तैयार होते हैं। भोग लगाने की अनेकों प्रकार और विधियां हैं, हर जगह अलग अलग। भोग लगाने का तरीका सबका अलग अलग है। हर कोई हर जगह अपने कल्चर के हिसाब से भोग लगाता है। अपने अपने भगवान के नाम पर होने वाले भंडारों में भगवान का ही भोग लगता है और भगवान का ही नाम लिया जाता है और फिर भोग लगे हुए खाने के आंशिक या पूर्ण भाग को बाकी खाने में मिला दिया जाता है। इसी तरह अपने परिजनों हेतु किये गए भंडारे उनके मोक्ष, शांति, पुण्य के लिए होते हैं। इनमें भी अक्सर पूरे खाने में भगवान को भोग लगे खाने को आंशिक या पूर्ण रूप से मिला कर खिला दिया जाता है, जिसे भंडारा या प्रसाद नाम दिया जाता है। इसमें उद्देश्य होता है प्रसाद के रूप में भंडार बाँटके परिजन को पुण्य पहुंचाना। भोग लगाने के भी 3 प्रकार होते हैं:-
(a) इसमें
एक तो पूरा का पूरा वही चीज़ होती है जिसका भोग लगा हो जैसे एक थाली में
रखा भोजन जिसमें प्रत्येक डिश में से एक टुकड़ा तोड़ कर के मूर्ति के मुंह पर
लगा कर फिर साइड में रख दिया जाता है या केवल मूर्ति के सामने ले जाकर साइड
में रख दिया जाता है। कुछ लोग इन टुकड़ों को वापिस कटोरी में मिला देते है
और कुछ इन टुकड़ों को बाहर परिंदों को डाल देते हैं। ये सभी टुकड़े खान नाजायज़ है (यंहा भोग लगा हुआ खाना
वो टुकड़े माने जायँगे, न कि पूरी थाली का खाना इसलिए थाली का बाकी बचा खाना तो
अपने आप में जायज़ है)।
(b) इसमें
दूसरा वह होता है जिसमें भोग लगाई चीज़ वापिस थाली या बर्तन के भोजन में
मिला दी जाती है। जैसे एक कटोरी हलवा भोग लगा कर उसे पूरी कड़ाही के हलवे
में मिला देना। ये पूरा मिक्स किया हुआ भोजन ही अब भोग लगा हुआ हो गया। यंहा एक बात गौर करने वाली है कि परिजनों के नाम/पुण्य हेतु (न कि ईष्ट के नाम पर) किये गए ऐसे भंडारे के सम्पूर्ण खाने में, जो कि कई भगोनों में होता है, उसमें केवल कटोरी भर भोग (जो किसी भगवान को समर्पित किया गया है) मिला देने से हम पूरे खाने को ही नाजायज़ कह रहे हैं, जबकि वो कटोरी का भाग बाकी खाने में ढंग से मिल पाया है या नहीं, यह तो न वो खयाल करते हैं और न ही इसे आसानी से खाने वाला कभी पता कर सकता है। क्योंकि इसमें केवल उस कटोरी के अंश वाला ही भाग भोग है तो जिसके पेट में उस कटोरी का एक अंश तक नहीं गया, उसके लिए बाकी खाया गया खान नाजायज़ कैसे हो सकता है।
(c) इसमें
तीसरा वो समान होता है जो लोग अपने आराध्य या मूर्त के सामने रखते हैं और
फिर पूजा करते हैं। इसके बाद इस समान को आगे बाँट दिया जाता है। ये पूरा ही भोग लगा हुआ माना जाता है।
इन तीनों प्रकार के भोग लगे प्रसाद को ही ज़्यादतर उलेमा हराम मानते हैं क्योंकि वो इसे शिर्क मानते हैं और
इसे क़ुरान की उस आयात से जोड़ते हैं जो ज़बिहा के बारे में है, न कि किसी
वेज खाने के बारे में। हालांकि उलेमा इस आयत को इश्तिहाद करके वेज, नॉन वेज दोनों पर फिट
करते हैं, जो कि गलत भी नहीं है। मगर यह बात इग्नोर नहीं करी जा सकती कि ऐसा
वेज खाना
क़ुरान के हिसाब से सीधा-साफ लफ़्ज़ों में हराम नहीं है
क्योंकि क़ुरान में जिसका जिक्र है वो गैरुल्लाह के नाम का नॉन वेज है। वैसे इसे गैरुल्लाह के नाम पर खिलाए जा रहे वेज खाने में शुमार करना भी गलत मत नहीं है। इस प्रसाद को अवॉयड करने को भी बहुत से लोग इसलिए भी कहते हैं क्योंकि
वो इसे अखलाकियात से जुड़ा मानते हैं क्योंकी जब निराकर ईश्वर की कोई मूर्ति
बनाई ही नहीं जा सकती तो फिर ईश्वर उस मूर्त रूपी भगवान के रूप से खायेगा भी नहीं और ईश्वर को खाने-पीने की कोई ज़रूरत भी नहीं होती है। इसलिए इसे किसी बड़ी ज़रूरत या मजबूरी के तहत इसे खाया जा सकता है मगर जितना हो सके इससे बचना ही बेहतर है। ऐसे कुछ हालात इस प्रकार हैं:-
● जब किसी शख्स के पास खाने के लिए बिल्कुल कोई दूसरा इंतज़ाम न हो। क्योंकि कुरान में अल्लाह ने कहा है कि गैरुल्लाह के नाम पर किया गया खाना हराम है बशर्ते कोई ऐसा करने पर मजबूर हो जाये मगर उसका दिल ईमान पर ही राज़ी हो और दिली रग़बत से वह काम ना कर रहा हो। बल्कि कुरान में (16/106) में ऐसी हालातों में कुफ़्र तक पर ये रियायत दी गई है। कुरान साफ कहता है कि अल्लाह किसी नफ़्स पर उसकी वुसअ़त से ज़्यादा बोझ नही डालता।
● जब कोई शख्स अपने गैर मुस्लिमों के परिचितों के बीच इस तरह हो कि वंहा उसके पास
इसे खाने के सिवा और कोई चारा न हो क्योंकि सभी इसे कहा रहे होते हैं और आपको भी देख रहे होते हैं। कई बार इसके बहाने हमारे
परिचित हमारे अंदर की कट्टरता परखना चाह रहे होते हैं
कि उनके धर्म आदि के प्रति हम में कोई नफ़रत तो नहीं है। ऐसे कई तरह के हालातों में आप प्रसाद खा सकते हैं। लोगों के दिलों से ग़ुबार निकालना हमारा दायित्व है।
● इसी तरह एक दाई भी इस तरह का प्रसाद बाज़ हालात में खा सकता है बशर्ते
बांटने वाला उसका मदऊ हो या उसे मदऊ करने का इरादा हो ताकि उसके दिल में
शंका न आये कि हम उनकी चीजों से नफरत करते हैं और उसका दिल मुसलमानों की ओर से सख्त न हो जाए। लोगों को इस्लाम का पैगाम देना
हमारा दायित्व है।
● एक
सच यह भी है कि भारत में ऐसे प्रसाद को लगभग सभी हिन्दू भाई, खाने पीने की दुकान या रेहड़ी वाले रोज़ सुबह अपनी खाने पीने की चीज़ों में मिलाता है और छोटी सी पूजा के
बाद ही काम शूरु करता है। यंहा तक कि दुकान और गल्ला पूजा के बाद ही खोलता
है। लगभग सभी हिन्दू किसान भी अन्नपूर्णा की पूजा के बाद इसे पूरी उपज में मिक्स करता
है। बल्कि किसान तो खेत जोतने से पहले खेत की, धान बोने से पहले बीज की और
फसल काटकर फसल की पूजा करता है और भगवान को उसका भोग भी लगता है। यानी भारत
के अधिकतर खेतों की फसलें पूजा के बाद ही बज़ार में आती है। इसलिए ऐसे भोग
लगे हुए खाने से भारत में बचा पाना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए बुनियादी तौर
पर देखा जाए तो इसे खाना नाजायज़ नहीं है क्योंकि आप जान नहीं सकते कि कोई चीज़
भोग वाली चीज़ के साथ कब मिक्स की गई है।
● बाज वक़्त हमें पता नहीं लग पाता है कि हिन्दू भाइयों के द्वारा हमें ऑफिस या घर में दी गई खाने की सामग्री या प्रसाद, भोग लगा हुआ है या नहीं। ऐसे हालातों में आप यह समझने की कोशिश करें (प्रसाद देने वाले की बातों को सुनकर, उससे खुले तौर पर पूछे बिना, घुमा फिर कर पूछ सकते हैं) कि प्रसाद किसके नाम पर है, कहां से आया है, कहां से लिया है, वो किस तीर्थ या मंदिर से आ रहा है वगैरह। इसके बाद अगर आपके दिल का झुकाव इस तरफ ज़्यादा हो कि इसे खाना सही है तो बिस्मिल्लाह पढ़ कर खा लीजिए और अगर आपके दिल का झुकाव इस तरफ ज्यादा हो कि इसे खान सही नहीं है क्योंकि यह प्रसाद वाकई भोग लगा हुआ लग रहा है तो तो इसे नहीं खाइए।
● भारत एक गैर मुस्लिम आबादी वाला देश है और यंहा समाजिक रिश्तों की वजह से बहुत से ऐसे मामले हमारे सामने रोज आ ही जाते हैं जिनसे बचना अक्सर बहुत मुश्किल हो जाता है। अंततः ये प्रसाद का मसला उन लोगों के लिए आसान है जो अब्राहमिक मज़हबों वाले देशों या नास्तिकों के बीच रह रहे हैं। जंहा हिन्दू जैसे गूढ़ मज़हब और कोस कोस पर बदलने वाले रिवाज आदि मौजूद हैं और भिन्न भिन्न प्रकार की मान्यताएं और प्रथाएं हैं वंहा यह मसलें बड़े टेढ़े और मुशिकल हो जाते हैं। जिनको ऐसी जगहों की समझ नहीं है, उनकी समझ अनुसार दी गयी हिदायतें इन जगह पर आ कर 'एज़ इट इज़ प्रक्टिकली फॉलो' न तो आसान काम है और न ही समझदारी।
● वैसे अगर आपका दिल बिल्कुल न माने तो आप इसे खाने से बिल्कुल बचें। क्योंकि
ज़बरदस्ती या इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चहिए। इसके लिए आप प्रसाद
देने वाले को प्यार से समझाते हुए से मना कर सकते हैं कि यह हमारे धर्म में
निषेध है (जैसे बहुत से हिन्दू भाई ईद पर बकरे का प्रसाद नहीं खाएगा)। पर इससे उनके दिलों में सवाल, शक, हीनता और कट्टरता पैदा होने
की संभावना है, इसलिए इसका एक आसान तरीका यह हो सकता है कि आप प्रसाद
ज़रूर लें मगर इसे छिपा कर रख लें या खाने का नाटक करें। फिर बाद में अकेले
में किसी और को दे दें या कंही कीड़ों-पक्षी आदि को डाल दें। पर यह किसी का
पता न लग पाए। इसे कूड़े में न फेंके क्योंकि यह भी अन्न है। उन लोगों का
दिल नहीं दुखना चाहिए क्योंकि वो जानते ही नहीं है कि केवल ईश्वर के नाम पर
ही मनुष्यों का जीना, मरना, खाना, पीना है।
निष्कर्ष यह है कि यंहा सारी दलीले रख दी गयी है। कोई खाद्य सामग्री भोग लगी हुई है या नहीं, यह तहक़ीक़ आपको करनी है। इसके बाद आपको ही अपना फैसला खुद लेना है कि प्रसाद खाये या न खाएं। आम तौर पर प्रसाद को अवॉयड करना ही बेहतर है मगर बाज़ हालातों में मजबूरी या ज़रूरत के तहत इसे खाया जा सकता है और अगर किसी को इसे खाना बिलकुल भी गवारा नहीं है तो फिर मामले को कैसे डील करना है, इसके उपाय बताए गए हैं। हमें लोगों को सारे पहलू बयान करके उनके लिए राह आसान करनी है ताकि वो अपना फैसला खुद ले सकें। न कि सिर्फ सवाल उठा कर या खाल में से बाल निकाल कर लोगों को अज्ञानता में पड़े रहने देना है।
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सवाल: कुरान की वो आयात को वेज, नॉन वेज दोनों के लिए है।
जवाब: हमारी समझ इन आयतों के बारे में (कई उलेमा की भी) यही है कि यंहा नॉन वेज का ज़िक्र हो रहा है जो क़ुरान के इन आयतों के टेक्स्ट और कॉन्टेक्सट से ही साबित हो रहा है। इन आयतों में कंही भी जानवर लफ्ज़ नहीं आया है हालांकि है ये जानवरों के बारे में ही। भले ही कोई साहब इनको वेज पर फिट करें, इसमें कोई हर्ज नहीं। मगर यह कहना कि यह आयतें बुनियादी तौर पर वेज और नॉन वेज दोनों के बारे में हैं। यह एक जाती अनुमान या फ़हम है. हालांकि ऐसा मानने में कोई हर्ज भी नहीं मगर टेक्स्ट, कॉन्टेक्स्ट की हदों के बीच में इस आयत को देखने वाले को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि बुनयादी तौर पर वो अल्लाह की उतनी ही बात उतने ही लफ़्ज़ों में, जारी बात के बैकग्राउंड में समझ रहे हैं जितने अल्लाह ने क़ुरान में नाज़िल किये और जारी सब्जेक्ट के संबंध में नाज़िल किये हैं। मायनो को कॉन्टेक्स्ट के बाहर समझने वाले अपनी अक्ल इस्तेमाल कर रहे है, इस मुद्दे पर अपना एक मौकिफ़ बनाने के लिए और कॉन्टेक्स्ट के अंदर समझने वाले अपनी अकल इस्तेमाल कर रहे हैं, इस पर अपना मौकिफ़ बनाने के लिए। क़ुरान लफज़ी और मानन दोनों तरह से चीज़ें बयान करता है, इसलिए दोनों नज़रिए सही हैं मगर क़ुरान का सबसे ज़ुरूरी पहलू हिदायत के तौर पर आयतों का कॉन्टेक्ट है। हम आज भी आयतों का कॉन्टेक्ट समझकर ही अमल में लाते हैं, वरना बिना कॉन्टेक्स्ट के तो गैरो के उठाये गए काफिर को कत्ल करो वगैरह जैसी अनेकों सवाल सही साबित हो जायंगे।
अगर ये आयतें हर तरह की चीज़ों पर फिट होतो है तो फिर हिन्दू खाने पीने की दुकान, रहेड़ी वालों, किसानों, फल, सब्ज़ी उत्पादक और विक्रताओं के लगाए गए दिन प्रारम्भ करने के भोग पर भी होनी चाहिए और फिर इस तरह तो देश का अधिकतर खाद्य सामग्री के जायज़ होने पर पर सवालिया निशान उठ रहा है।
रही बात नियत की तो नियत तो अगर किसान की देखी जा रही है तो प्रसाद खाने वाली की नियत को भी देखा जाना चाहिए। जिसको अनुष्ठान का नही पता उस अपर ये खाना गुनाह नहीं। मगर अब जब हमनें ये बता दिया है तो फिर क्या अब जिस जिस को पता लग गया, उसके लिये हराम हो गया नहीं, सवाल ये उठता है.
हमेशा से ही जानवर की बलि दी जाती रही। इस्लाम मे भी शुरुवात से। हर बड़े मज़हब में भी। हिन्दू धर्म में भी, बाद में उन्होंने जानवर को फल सब्ज़ियों से बदल दिया। यही वजह है अल्लाह ने इस आयत में गैरुल्लाह के नाम पर ज़िबह को रेखांकित किया।
सवाल:क्योंकि हमें नहीं पता कि आंखो के पीछे क्या हो रहा है और हम ऐसे खाने को मजबूर हैं जिसे पूजा पाठ से तैय्यार किया गया है तो यहां रियायत निकल जाती है।
जवाब: इसी तरह बाज़ हालातों में मजूबरीके तहत रियायत निकलनी चाहिए।
सवाल: किसान की खेती से आ रहा भोग लगा अन्न खाना जायज है क्योंकि वो सिर्फ परंपरा से जुड़ा है और पैदावार बेहतर करने से किया गया है, न कि भगवान को पूजा आदि के उद्देश्य से समर्पित किया गया है।
जवाब: किसान द्वारा बुआई, कटाई के समय भावना यही होती है कि भगवान के भोग से, भगवान के आशीर्वाद से फसल अच्छी और फायदेमंद होगी। अगर यंहा किसान की भावना के आधार उनकी फसलें मुस्लिम के लिए जायज़ हो जाती है तो फिर सवाल यह उठता है कि परिजन पुण्य हेतु किये भंडारे में मिलने वाले प्रसाद रूपी भोजन जायज़ क्यों नहीं माने जाने चाहिए? आखिर भोज करवाने वाले की मूल भावना तो खाना वितरण है, वह केवल इसके लिए परंपरा से चला आ रहा भोग संस्कार निभा रहा है। वैसे ही जैसे किसान की भावना तो अच्छी फसल पाना और अच्छा मूल्य पाना है, वो केवल इसके लिए भोज संस्कार अपनी परंपरा के नाते निभा रहा है।
सवाल: भारत में बहुत से सम्प्रदाय हैं जंहा किसान पूजा अनुष्ठान नहीं करते जैसे सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम इसलिए हर खेती से आने वाला अन्न भोग लगा हुआ नहीं है।
जवाब: मगर अधिकतर भोग लगा हुआ ही है क्योंकि खेती बाड़ी में केवल 20%. गैर हिन्दू जनसंख्या लगी हुई है यानी भारत में 80% से अधिक पैदावार हिन्दू किसानों से आती है और उनमें अधिकतर धर्म का आचरण करते हैं। यानी आपके खाने का 3/4 या कम से कम 2/3 हिस्सा पूजा आदि के उपरांत आया है, इसका इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा सिक्ख, ईसाई आदि भले ही हिन्दू जैसा भोग न लगाएं। मगर गुरु नानक (सिखों में माना जाता है कि इनके ज्ञान के बिना हिदायत पा ही नहीं सकते, यानी इस मुक्ति या स्वर्ग आदि यानी पैगम्बर समान ऊपर का दर्जा या शायद उससे ऊपर ही, जबकि इस्लाम ऐसी कोई शर्त नहीं रखता), गुरुग्रंथ साहिब, यीशु (जिन्हें ईश्वर का ज़ाती बेटा माना जाता है) आदि एक नाम पर फसल का एक हिस्सा वे गुरुद्वारों को अर्पण करते हैं। साल भर इनके नामों पर दान चालू रहते हैं और कुछ मुस्लिम इन लंगरों में पेट भी भरते हैं। भारत के आदिवासियों तक मे भोग संस्कार आदि पूरी तरह माने जाते हैं।
सवाल: अब ज़्यादातर कंपनियां खेती बाड़ी करती हैं और वो ये अनुष्ठान नहीं करती और जैविक आदि खेती करती है, वो गुणवत्ता देखती है, न कि पूजा करती हैं। भारत में बड़ी मात्रा में अन्न बाहर से आयात होता है, इसलिए अधिकतर भोग लगा हुआ नहीं खाते हैं।
जवाब: चाहे कोई भी कंपनियां हों उनके यंहा का काम फील्ड में, मशीनों पर, ट्रांसपोर्ट में, हर जगह काम तो इंसान ही करते हैं और ये इंसान मशीनों के सहारे के बावजूद अपने रीति रिवाजों को नहीं छोड़ते। यंहा तो नई मशीन तक के उद्घाटन पर पूजा पाठ किया जाता है, ओम स्वास्तिक बनाना, नारियल फोड़ना, टिक तिलक करना, फूल लगाना आदि जैसे संस्कार तक किये जाते हैं, बड़ी से बड़ी कंपनियों में (भारत में तो विदेशी फाइटर प्लेन को खरीद कर उसका पूजा के बाद उद्घाटन किया जाता है)। इसलिये कंपनी हो या मशीनें, लोग तो वही के वही हैं, कंपनिया इंसान ही तो चला रहे हैं। कोई भी कंपनी हो, वो लोगों की भावनाओं के विरुद्ध कार्य नहीं करती खासतौर पर धार्मिक, बल्कि ऐसे मामलों में छूट और बाज़ वक़्त बढ़ावा भी देती है। ऐसा कहना कि कंपनियों में पूजा नहीं होती, सच्चाई से कोसों दूर है। दूसरी बात कि 2022-23 में भारत का खाद्य उत्पादन 322 मिलियन टन था जिसका लगभग 10-15% निर्यात हुआ बाकी देश मे ही खप गया। जबकि आयात सिर्फ और सिर्फ 7.5 टन किया गया था। ये आयात की फिगर तो 2.5% के आस पास रहा तो फिर ये बहुत बड़ा भाग कैसे हो गया? यानी भारतीयों ने अधिकतर भारत का ही अन्न खाया जिसका बड़ा भाग किसी न किसी अनुष्ठान के बाद ही बाजार में आया है।
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भंडारे का खाना
भंडारे
का खाना भी प्रसाद से जोड़ कर देखा जायेगा और अगर उसमें किसी भी तरह का भोग
आदि शामिल नहीं है तो फिर उसे खा सकते हैं पर अगर भोग आदि जैसे कुछ है तो
ऊपर बताये गए उसूलों के तहत आप अमल कर सकते हैं।
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नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम करना जायज़ या नाजायज़?
इबादत के लिए किसी के आगे झुकना (सजदा इबादह करना) हमेशा
से शिरक और हराम है। क़ुरान ने भी इसे हराम करार दिया है। पर एहतराम के
लिए झुकना पहले की शरीयतों में जायज़ था यानी ताज़ीमी सजदा (सजदा तहिया)। आदम अलैह को फ़रिश्तों का और यसुफ़ अलैह को बाप-भाइयों का किया गया सजदा ताजीमी था।
ताज़ीमी
सजदा कई तरह का हो सकता है क्योंकि इसका तरीके या झुकाव की हद, हमेशा से
ही लोगों के कल्चर पर निर्भर करती आ रही है। यह नमाज़ जैसा भी हो सकता है और
दण्डवत प्रणाम जैसा भी। आज भी किसी को ताज़ीमी सजदा करने को कहो तो हर कोई
अपने तरीके से करेगा। इन दोनों नबियों को तब किस तरह का शारीरिक तौर पर
सजदा किया गया था, यह हमें मालूम नहीं पड़ता पर था वो ताज़ीमी ही।
फिर रसूलल्लाह ने ताज़ीमी सजदे को माना फरमा दिया, जो एक हदीस से साबित है। ज़ाहिर
है उन्हें यह मना करना ही था क्योंकि दुनिया में से खुदाई-बादशाही निज़ाम
खत्म होने जा रहा था और अब किसी को अपने बादशाह को खुदा मानने या खुदा का
प्रतिनिधि मानने की हैसियत से उसे सजदा करने की जरूरत या मजबूरी नहीं थी।
इसके अलावा रसूलुल्लाह को तौहीद को सबसे ऊंचे स्थान पर स्थापित करके जाना
था और शिर्क के लिए ज़रा सी भी गुंजाइश छोड़कर नहीं जानी थी।
इसी
वजह से आज ज़्यादतर उलेमा एहतराम में झुकने को कुफ्र और शिर्क नहीं, पर एक
बड़ा गुनाह मानते हैं। यंहा मुराद पूरी तरह से झुकना यानी सज्दे से है। कुछ
उलेमा, एहतराम में हद्दे रूकू से कुछ ऊपर तक की हद तक झुकने को गुनाह नहीं
बल्कि जायज़ मानते हैं। इसीलिए ताज़ीमी सजदे को हराम या शिर्क नहीं बल्कि
नाजायज़ जैसे लफ्ज़ से लक़ब दिया गया है।
वैसे सजदे के लुगवी मायने है, आत्मसमर्पण करना, किसी के तहत आ जाना या
किसी की बढ़त कुबूल कर लेना आदि। नमाज़ में झुकने का आसान भी सजदा कहलाया
जाता है। असल में जब कोई किसी को बढ़ा मान
लेता है, तो उसके ताबये आ जाता है और सम्मान में उसके सामने झुकता भी है।
इसलिए खुदा को सबसे बढ़ा मान कर उसके सामने इबादती सजदा भी किया जाता है।
क़ुरान में यह लफ्ज़ सजीव के लिए भी आया है और निर्जीव के लिए भी। इसलिए एक
मत यह है कि यह इबादत के लिए (सिर्फ खुदा के लिए), सम्मान के लिए (पिछली
क़ौमों में इंसानों के लिए) और आत्मसमर्पण (निर्जीवों के लिए) प्रयोग हुआ
है। क़ुरान में ह. आदम (कुरान 2:34) और ह. यूसुफ को करे गए सजदों का इसीलिये
कुुुछ आलिम यही महफूम लेेेते हैं कि यह तो उनके ताबये आने के लिए दूसरों
को कहा था, न कि जिस्मानी तौर पर झुक जाने के लिये।
Quran (22:18): जो कुछ आसमानों और जमीन पर हैं, सब अल्लाह को ही सजदा करते हैं, सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, जानवर और बहुत से इंसान।
इसी तरह भारतीय परंपरा
में जो बड़ों के पांव छुवे जाते हैं, वो भी उलेमा के अनुसार हराम है
जबकि ऐसा नहीं है (इस पर दूसरी जगह चर्चा करी गयी है)।
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नमः या नमन शब्द बना है नम्
धातु से जिसका मतलब है झुकना या सम्मान दिखाना। नम् से नमन शब्द बना है जिसका अर्थ है अभिवादन, नमस्कार, नमस्ते, प्रणाम करना। नमन से ही नम्र, विनम्र शब्द बने हैं जो शिष्टाचार वश झुके हुए इंसान को
कहते हैं। नमस्कार, नमस्ते, प्रणाम शब्द भी नमन से बने हैं। नमस्कार या
नमस्ते का अर्थ है कि मैं आपके सामने झुकता हूँ। प्रणाम शब्द का मतलब है
अच्छे ढंग (प्र) से नमन करना। इसलिए आसान शब्दों में नमस्ते
का अर्थ है सत्कार, श्रद्धा, झुकना, नीचा होना, त्याग, अन्न, वज्र
(शस्त्र), यज्ञ और भेंट। यास्क ने निघण्टु में इसका अर्थ सेवा, सत्कार,
वज्र ही लिखा है। शतपथ ब्राह्मण में भी इसका अर्थ अन्न, यज्ञ लिखा है। यजुर्वेद
में इसका अर्थ अन्न, वज्र और सभी को नमस्ते करने के अर्थों में हुआ है।
दण्डवत प्रणाम का मतलब है ज़मीन पर चित लेट जाना। साष्टांग आसन का मतलब है नमाज़ जैसा सजदा या आसन। नमन का मतलब है झुकना। यह झुकना किसी भी हद तक हो सकता है। झुकने के कई पोस्चर हो सकते हैं जिनमें से कुछ हैं:- सजदे के समान झुकना या रुकू के समान झुकना या शरीर के केेेवल ऊपरी भाग को हल्का सा झुकाना (यानि सिर्फ, गर्दन और छाती को जैसे अंग्रेजों में मुलाक़ात की शुरवात में अदब के तौर किया जाता है या टोपी झुका कर इशारा किया जाता है) आदि इत्यादि। नमन शब्द की उत्पत्ति के समय इनमें से उसका कौन सा अर्थ था, यह पता ही नहीं किया जा सकता। इसलिए आज भी इस नमन करने की हद इनमें से कौन सी मानी जायेगी, यह कोई तय ही नहीं कर सकता।
आम
तौर पर नमस्ते या नमस्कार कहने या करने को उलेमा हराम करार देते हैं
क्योंकि इसके मायने वो नमन करने या झुकने के अर्थों में लेते हैं (सजदे या रुकु के समान) जबकि नमस्कार कहते हुए, न तो कोई शारिरिक तौर पर झुकता है और न ही भी शाब्दिक तौर पर कोई इसे इबादत के रूप में झुकना मानता है। यानी नमन करने या झुकने को केवल मुँह से बोला जाता है और वो भी सम्मान के तौर पर केवल शरीर के ऊपरी भाग को झुका लेने के संदर्भ में। अगर एक बार को उलेमा की मान भी लें कि नमस्ते या नमस्कार कहने के सिर्फ एक ही मायने हैं यानी नमन करना या किसी के आगे झुकना तो फिर इस नमन का मतलब आज सज्दे या हद्दे रूकू में या सिर्फ ऊपरी भाग झुुकाने में से कौन सा है, यह कोई भी तय नहीं कर सकता।
वैसे जब कोई समान वगैरह उठाने के लिए किसी
के सामने झुकता है तो किसी कोई कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि लोगों को
झुकने के पीछे का उद्देश्य सही मालूम होता है। मगर जैसे ही कोई सम्मान
(इबादतन नहीं) के तौर पर किसी के सामने झुकता है या सिर्फ कहता है (वो भी केवल शरीर का ऊपरी भाग) तो उसके ख़िलाफ़ फतवे दे दिए
जाते हैं जबकि इसके पीछे का उद्देश्य भी लोगों को अच्छी तरह मालूम होता
है। इसलिए किसी के शिर्क पर फैसला देने से पहले उसके दिल का हाल ज़रूर जान लेना
चाहिए।
ऊपर
से, आज नमस्ते या नमस्कार के मायने बदल गए हैं। आज कोई भी इनसे मतलब झुकने
से नहीं बल्कि सिर्फ ग्रीटिंग से लेता है जैसे हेलो या गुड मॉर्निग। यानी
जब कोई नमस्ते कहता है तो वह कतई इससे यह नहीं समझता कि वो सजदा या रुकू या सिर झुकाना कर रहा है,
न तो करने वाला और न ही सुनने वाला। जैसे हम कहते है कि हैट्स ऑफ, जिसका
मतलब यह नहीं होता कि हमने कोई टोपी पहन रखी थी और वो उतार दी है। यह उसी
तरह है जैसे कई सदियों पूर्व अंग्रेज़ी के सेक्युलर शब्द की जिस अर्थ में
उत्पत्ति हुई थी, आज उसी सेक्युलर शब्द के अर्थ बिल्कुल बदल चुके हैं। वैसे अगर लफ्ज़ बोलने से वह कार्य हो ही जाता है तो फिर मुसलमानों को कहावत के तौर पर 'अपनी ज़िद से सबको झुका दिया', 'उसने सबको झुका कर ही छोड़ा' 'पूरी दुनिया को झुका दिया' आदि नहीं कहना चाहिए क्योंकि इसके लफ़ज़ी मायने भी शिर्क हो जायँगे जबकि इसके मायने तो मुहावरतन है।
फिर
भी किसी को नमस्ते या नमस्कर बोलने में अच्छा नहीं लगता तो वह शब्द बदल कर
बोल दे जैसे नवस्ते, नवस्कार या नमश्कार। उम्मीद है इस तरह उस इंसान को
शाब्दिक तौर पर कैसी भी सजदे या रुकू वाली भावना नहीं आएगी। असल में झुकता नर्म इंसान ही है, अकड़ने वाले को अच्छा इंसान नही माना जाता।
हाथ जोड़ना, नमन करना, फूल अर्पण करना।
किसी
ईष्ट को नमन, फूल अर्पण, नमस्कार करना जायज़ नहीं है। पर मजबूरी या
आवश्यकता पड़ने पर किसी महापुरुष (जिसे ईष्ट न माना जाता हो, जैसे बुद्ध,
महावीर, अम्बेडकर, गांधी आदि) की मूर्ति - पिक्चर आदि के सामने अदब और
सलामी के तौर पर हल्का सा सर झुकाने (जैसे टोपी उतार कर करते हैं) व हाथ
जोड़ने में (शिष्टाचार आदि के रूप में) और फूल अर्पण करके श्रद्धांजलि देने
में कोई हर्ज नहीं है। ये सब भारतीय संस्कृति, परम्परा, रिवाज, चलन से
संबंधित है। इन्हें हिन्दू ही नहीं बल्कि यंहा नास्तिक, बोद्ध, जैन, सिक्ख,
आर्य समाजी, पारसी, ईसाई आदि भी करते हैं। इस तरह श्रदांजलि देना, पूजा का
ही भाग या प्रक्रिया है और पूजा करना (उचित व्यवहार करना, सम्मान करना)
उपासना करन नहीं होता परंतु आम इंसान पूजा और उपासना को एक ही समझता है।
इसी प्रकार ज़रूरत पड़ने पर नमो बुद्धाय (अर्थात बुद्ध को नमन, नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम, अभिवादन) कहना भी नाजयज़ नहीं है। बुद्ध को कोई भी बौद्ध व्यकि ईश्वर या ईश्वर का संगी या ईश्वर का रूप नहीं मानता है। बौद्ध धर्म अनुयायी किसी भी परमसत्ता या सर्वोच्च शक्ति में विश्वास नहीं रखते हैं। इसलिए इसमें कोई शिर्क की बात नहीं है।
किसी की जय कहना या जयकारा लगाना जैसे जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण, जय भीम आदि।
जय
का अर्थ होता है ज़िंदाबाद रहना, विजय होना या प्रशंसा करना आदि। संदर्भ
के आधार पर जय शब्द के अर्थ बदल जाते हैं। किसी की जय, जयकार, जयकारा कहना एक भावात्मक अभिव्यक्ति है।
किसी महापुरुष की जय
कहने या ऐसे नारे लगाने में कोई हर्ज नहीं है। इसका मतलब हुआ वो विजयी रहे, ज़िंदाबाद रहे, उनकी शिक्षाएं चलती रहें, उसकी अच्छे कार्य फैलते रहें आदि। किसी महापुरुष का जयकारा लगाना शिर्क नहीं है।
इसलिए ज़रूरत पड़ने पर जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण कहना जायज़ है क्योंकि ये सभी महान मनुष्य थे। हिन्दू धर्म का सही ज्ञान रखने वाले कई विद्वान, सम्प्रदाय, इन्हें महामानव ही मानते हैं, न कि ईश्वर का रूप। ऊपर से, राम तो ईश्वर का ही एक आरंभिक नाम माना जाता है।
हालांकि किसी देवी, देवता आदि का जयकारा नहीं लगाना चाहिए जैसे जय माता की, जय हनुमान आदि। क्योंकि ये अक्सर पूरी तरह से काल्पनिक तौर गढ़े हुए चरित्र हैं या फिर इनको लेके किसी भी हिन्दू वर्ग में इनके मनुष्य मात्र होने की ज़रा सी भी मान्यता उपलब्ध ही नहीं है। इसलिए इसमें कोई गुंजाइश नैवनहीं आती है। हालांकि अगर किसी को मजूबर कर दिया जाए तो ऐसा कहने वालों का अल्लाह ज़रूर रियायत देगा क्योंकि ये इससे ज़बरदस्ती बुलाया गया है।
इसी तरह जय भीम कहना भी शिर्क नहीं है। यह महाभारत के भीम के लिए जयकारा नहीं है। बल्कि 'भीम'राव अम्बेडकर जी के नाम का संक्षिप्त रूप है। इसे अधिकतर दलित, पिछड़े समाज के लोगों ने प्रचलित किया है।
भारत की जय कहना भी जायज़ है। भारत
माता की जय कहना भी जायज़ है। जय का मतलब उर्दू में ज़िंदाबाद होता है। राष्ट्र माता को उर्दु में मादरे वतन कहते
हैं। वैसे भारत माता का स्वरूप शुरवात में यानी 19वीं सदी में किसी देवी का नहीं बल्की केवल एक सादा स्त्री का था जिसे लोगों ने बाद में अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार देवी के रूप ढाल लिया।
आपके ऐसे नारों या जयकारों से भले ही कोई अपने किसी आराध्य, भगवान, देव, देवी, मूर्ति से मुराद लेता हो, यह उसका
मामला यानी गैर मुस्लिम लोग आपके ऐसे नारे से कुछ ओर मुराद लेते हैं तो इसमें आपका कोई दोष नहीं होगा। क्योंकि आपकी नियत शिर्क नहीं थी और आपने ज़ुरूरत के तहत ऐसा कहा है। वैसे समझदार-जानकर गैर मुस्लिम लोग जानते हैं कि मुस्लिम एक खुदा के सिवा किसी और में श्रद्धा नहीं रखते हैं।
जब जंहा किसी को लगे कि उसे वंहा तब जय श्रीराम कह देना चाहिए, तो उसके कहने में कोई हर्ज नहीं। चाहे सड़क पर हो, टीवी पर हो या समारोह में या और कंही। हर इंसान मौके महल के तहत अपना फैसला लेगा। हमारी नियत अल्लाह जानता है और इन लफ़्ज़ों के मायने हम अच्छी तरह जानते हैं। नियत और मायने दोनों शिर्क से खाली हैं। दूसरी मिसाल के तौर जैसे बड़े बड़े मुफ़्ती वीडियो में लोगों को समझाने के लिए बार बार जय श्री राम लफ्ज़ कहते हैं, ये शिर्क नहीं हुआ। क्योंकि उनकी नियत और मक़सद वाज़ेह हैं। यंहा सिर्फ लफ़्ज़ों पर हकूम नहीं लगेगा।
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The Prophet met Zaid bin Amr bin Nufail in the bottom of (the valley of) Baldah before any Divine Inspiration came to the Prophet. A meal was presented to the Prophet but he refused to eat from it. (Then it was presented to Zaid) who said, "I do not eat anything which you slaughter in the name of your stone idols. I eat none but those things on which Allah's Name has been mentioned at the time of slaughtering./The Messenger presented a dish of meat that had been offered to him by the pagans to Zaid bin Amr but Zaid refused to eat of it and then said to the pagans. (Bukhari 3826 & 5499)
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