Wednesday, 4 December 2024

आदम, नूह, असहाबे कहफ की उम्र, कद व हदे सैलाब, कश्ती के जानवर

 


हज़रत नूह की उम्र क्या थी? 
 
 
Quran (29:14): And verily, We sent Noah to his people, and he remained among them, a thousand year(s) (sanatin), save fifty year(s) (aman) then seized them the flood while they (were) wrongdoers.

Quran (18:25-26): And they remained in their cave, three hundred years (sinina) and add nine. Say, O Prophet, Allah knows best how long they stayed.

[It's an old way of saying numbers like Indians also used to say "50 कम 2=48" या 50 जमा 2=52.]

Quran 10:5: He made the sun a shining light and the moon a reflected light and determined for it phases, that you may know the number (adada) of years (sinina) and the count (walhisaba).  

Quran 12:47-49:  Joseph said, You will sow for seven years (sinina) as usual and that which you reap, so leave it in its ear, except a little from which you will eat. Then will come after that seven difficult which will consume what you advanced for them, except a little of what you will store. Then will come after that, a year (amun), people will be given abundant rain in it and they will press in it.

 

Jami` at-Tirmidhi 3367 (In Musnad Ahmad also mentioned): When Allah created Adam, He breathed the soul into him, then he sneezed and said: ‘All praise is due to Allah.’ So he praised Allah by His permission. Then His Lord said to him: ‘May Allah have mercy upon you O Adam. Go to those angels – to that gathering of them sitting – so say: 'As-Salamu alaikum.' They said 'Wa Alaikas-Salamu Wa Rahmatullah’. Then he returned to his Lord, He said: ‘This is your greeting and the greeting of your children among each other.’ Then Allah said to him – while His Two Hands were closed – ‘Choose which of them you wish.’ He said: ‘I chose the right My Lord and both of the Hands of my Lord are right, blessed.’ Then He extended it, and there was Adam and his offspring in it.’ So he said: ‘What are these O my Lord?’ He said: ‘These are your offspring?’ Each one of them had his age written between his eyes. But among them there was a man who was the most illuminating of them – or among the most illuminated of them. He said: ‘O Lord! Who is this?’ He said: ‘This is your son Dawud, I wrote forty years for him.’ He said: ‘O Lord! Add to his age.’ He said: ‘That is what I have written for him.’ He said: ‘O Lord! Give him sixty of my years.’ He said: ‘So you shall have it.’” He said: “Then, he resided in Paradise as long as Allah willed, then he was cast from it, so Adam was counting for himself.” He said: “So the Angel of death came to him, and Adam said to him: ‘You are hasty, one-thousand years were written for me.’ He said: ‘Of course! But you gave sixty years to your son Dawud.’ So he rejected, and his offspring rejected, and he forgot, and his offspring forgot.” He said: “So ever since that day, what is written and witnessed has been decreed.”

Ibn Hibbaan in his Saheeh, 14/69; and by al-Haakim, 2/262 (On Islam QA): A man said: “O Messenger of Allah, was Adam a Prophet?” He said, “Yes, and Allah spoke to him.” A man asked, “How much (time) was there between him and The Prophet said, 10 centuries.”

Al-Haakim in al-Mustadrak, 2/288, Al-Tabaraani in al-Mu’jam al-Kabeer, 8/118 (On  Islam QA)
: A man asked“And how long was there between Nooh and Ibraaheem?” The Prophet said, “10 centuries.”

Ibn Katheer said in al-Bidaayah wa’l-Nihaayah (1/94) also mentioned the above narration. 

On Islam QA: Muhammad ibn Sa’d mentioned in his book al-Tabaqaat: between Moosa ibn Imraan and Eesa ibn Maryam there were 1700 years, and there was no fatrah (interval when no Prophet was sent) between them, for 1000 Prophets of the Children of Israel were sent between them, apart from other Prophets who were also sent (to other nations). Tafseer al-Qurtubi (6/121) says: And between the birth of Eesa and the Muhammad, there were 599 years. Ibn Hajar (Fath al-Baari, 4/449) said: The narrators are agreed that the period of the Jews until the coming of Muhammad was more than 2000 years, and the period of the Christians until the coming of the Muhammad was 600 years.”
 

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सबसे पहली बात उस समय कुरान में संख्याओं के लिए शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था (चाहे 1 हो या 50000), अंकों का नहीं, और उस समय अरब में दशमलव का इस्तेमाल नहीं होता था, इसलिए 950 को 95 नहीं समझा जा सकता।  

(1) वैसे कुछ लोग यहाँ कई प्रकार की संभावनाएं जताते हैं जैसे कि यंहा हज़रत नूह की उम्र की नहीं बल्कि उनकी वंशावली की बात हो रही है या यह उनकी रूहानी/शरीयत (इतने साल तक नूह की शरीयत रही और फिर इब्राहीम की शरीयत आ गई) उम्र थी।  

 
(2) ऐसा भी माना जाता है कि ये वर्ष दरअसल उस समय की कोई विशेष गणना अनुसार वर्ष हैं या ये कि इस लफ्ज़ के मायने वर्ष नहीं बल्कि कुछ और या इसके मायने तमसीली हैं। वैसे ही जैसे क़ुरान में यौम का मतलब सिर्फ दिन नहीं बल्कि अवधि भी होता है। नूह का समय प्रागैतिहासिक था, जब गणित या संख्याओं का विकास नहीं हुआ था, इसलिए ऐसा संभव है कि ये उस समय का संख्या या उम्र लिखने का तरीका हो.

हम जानते हैं कि प्राचीन समय में हर स्थान के समय मानक अपने स्थानीय रिवाजो के मूताबिक होते थे। आज जैसे कैलेंडर का प्रयोग लगभग 800 BC में शुरू हुआ था। कैलेंडर 4 तरह के रहे हैं: लुनर जैसे हिजरी कैलेंडर, सोलर जैसे ग्रेगोरियन, लूनर-सोलर जैसे हिन्दू, चीनी, यहूदी कैलेंडर और मौसमी जैसे आदिवसियों के कैलन्डर।
 
अन्य धर्मो में भी, हम लम्बी आयु का ऐसे ही प्राचीन उल्लेख पाते हैं जैसे कि बाइबिल अनुसार मेथुसेलह (Methuselah) 969 साल तक जीवित रहा, हिन्दू धर्म अनेकों राजाओं और ऋषियों का शासन या जीवन हज़ारों या लाखों साल का रहा और चीनी पौराणिक राजाओं के बारे में भी लिखा मिलता है कि उन्होंने सदियों तक शासन किया। इसके अलावा, अनेकों प्राचीन सुमेरियन राजाओं ने इतिहास में अपने लिए बहुत लंबे शासनकाल दर्ज किए जैसे: Alulim (28K वर्ष), Alalgar (36K वर्ष), Enmenluan (43K वर्ष), Enmengalana (28K वर्ष), Dumuzid (36K वर्ष)।
 
हम जानते हैं कि प्राचीन समय में बहुत सी सभ्यताओं में गणना करने और लिखने की बेहद अनोखी पद्धतिया थी जैसे सुमेरियन (4500-1900 ई.पू., इराक) और गिलगमेश के समय के लोग (ये महाकाव्य अक्कादियन भाषा में 1200 ई.पू. का मिट्टी की पट्टियों पर लिखा मिलता है हालांकि ये 2100 ई.पू. की मौखिक कहानियों पर आधारित था), और बाद में प्राचीन मेसोपोटामिया में बेबीलोन के लोगों ने sexagesimal (base-60) number system का उपयोग किया। यही कारण है कि हमारे पास अभी भी एक मिनट में 60 सेकंड और एक घंटे में 60 मिनट हैं। इसने खगोल विज्ञान, व्यापार और इंजीनियरिंग में मदद की। जैसा कि हम 61 लिखते हैं मगर वे 1:01 लिखते थे। प्राचीन मिस्र प्राचीन decimal system और बेबीलोनियन Abacus or Tablets (base-60) जैसी कई अन्य अलग-अलग विधियाँ भी प्रचलित थीं। आज, हम आधुनिक decimal system (base-10) का उपयोग करते हैं। 
 
कुरान में इसी तरह ह. युसूफ के वक़्त के हाकिम को मलिक और ह. मुसा के वक़्त के हाकीम को फिरोन लिखा गया है क्योंकि फिरोन लफ्ज़ बाद में इस्तेमाल में आया था. कुरान में इसी तरह ह. इब्राहिम का नाम लिखने के लिए भी दो तरह की स्पेलींग का इस्तेमाल हुआ है. 
 
 
(3) जिस अंदाज में क़ुरान ने नूह अलैह. की उम्र बताई है उससे यही महसूस होता है कि उनके वक़्त में उम्र इसी तरीक़े और अंदाज़ से बताई जाती है और साथ ही क़ुरान में इसे ऐसे बताने के पीछे यक़ीनन अल्लाह की कोई हिकमत (एक आयत में दो अलग लफ़्ज़ों इस्तेमाल और हज़ार कम पचास कहना) मौजूद होगी। खैर इस पर सबसे सही मत यह है कि:-

क़ुरान (29:14) में जो हज़रत नूह की उम्र के लिए लफ्ज़ आएं हैं, वो 1000 के लिए "सना (सीनीन)" है और 50 के लिए "आम " है। अरबी में साल के लिए "सना" और "आम" दोनों लफ्ज़ इस्तेमाल होते हैं। 

अरबी में सना के मायने सिर्फ साल ही नहीं होते बल्कि महीने और सीज़न (मौसमी, फसली वगैरह)। क़ुरान में यह लफ्ज़ इन तीनों संदर्भ में इस्तेमाल हुआ है। इसलिए यह नूह की उम्र सालों में नहीं बल्कि यकीनन महीनों के हिसाब से दी गई है जो कि लगभग 83 साल बैठती है।

क़ुरान से ये भी वाज़ेह है कि सना शदीद जद्दोजहद वाले वक्त के लिए और आम, सुकून वाले वक्त के मायनो में भी इस्तेमाल हुआ है। ऐसा भी माना जाता है कि यंहा 1000 एक विशेष काल बताया गया है और उसमें से 50 आम इंसानी साल कम कर दिए जाने पर आयी उम्र, नूह की तबलीगी उम्र थी जो कि लगभग 33 साल बैठती है।

सना लफ्ज़ साल, महीने, सीज़न (मौसमी, फसली) सबके लिए इस्तेमाल होता है। अरबी शायरी और साहित्य में इसके उदाहरण मौजूद हैं। क़ुरान में (10:5) सूरज और चांद की मंज़िलो से सीनीन/सना की गिनती (नंबर) पता लगाने की बात कही गई है। हम जानते हैं कि चांद की मंज़िलें महीने से और सूरज की मंजिलें साल से संबंधित हैं और उनसे ही महीनों और सालों की गणना होती है। यानी इस लफ्ज़ का इतलाक़ महीनों और सालों दोनों पर हो सकता है। इसी तरह क़ुरान (12:-47-49) में यही लफ्ज़ हज़रत यूसुफ के वाकये में सीज़न के लिए आया है क्योंकि फसल के मौसम होते हैं, साल नहीं। जबकि यहीं पर 'आम' लफ्ज़ उस साल के लिये आया है जिसमें पूरे साल बारिश होगी। 

वैसे एक अनुमान यह भी है कि सना लफ्ज़ दिन या किसी भी अवधि को भी परिभाषित कर सकता है क्योंकि क़ुरान (10:5) के अनुसार सूरज और चांद की मंज़िलो से "दिन और पहरों" का भी पता चलता है।

इसके अलावा क़ुरान ऐसा ही एक अवधि यानी 309 साल, गुफा वाले असहाब के बारे में भी दी गई है और वंहा भी उनके "रहने या ठहरने" का ज़िक्र है।  क़ुरान (18:25-26) ने बताया कि असहाबे कहफ़ वंहा 300 सीनीन जमा 9 रहे और अल्लाह बेहतर जानता है कि वो वंहा कितने अरसा रहें। असल में यंहा सीनीन के मायने साल, महीने, सीज़न में से कौन से है, यह अल्लाह बेहतर जानता है (ये बात अगली आयात में बयान हुई है)। मगर ज़ाहिर है यंहा इसके मायने सालों से नहीं बल्कि महीनों, सीज़न से ही हैं या शायद दिन से भी हो सकते हैं।


हम जानते हैं कि दुनिया में आमतौर पर हर साल 4 मौसम आते हैं। कंही कंही जैसे भारत में 2 और मौसम भी आते हैं। जबकि मिस्र (ह. यूसुफ का स्थान) में 2 ही मौसम (सबसे मुख्य) आते हैं और 1 बार हल्की-सीमित वर्षा ऋतु आती है।
1- Spring (blooming). 2- Summer (with rain or humidity). 3- Autumn (fall). 4- Winter. 5- Wet (monsoon). 6- Dry (almost no rain).

दुनिया भर में 1 से 3 कृषि मौसम या ऋतुएँ होती हैं। जबकि भारत और मिस्र में 2 ऋतुएँ मुख्य होती हैं। 
1- खरीफ़: जून-जुलाई के आसपास बुवाई और सितंबर-अक्टूबर के आसपास कटाई। इसमें चावल, मक्का, बाजरा, गन्ना, सोयाबीन जैसी फसलें पैदा करी जाती हैं। 2- रबी: अक्टूबर-नवंबर के आसपास बुवाई और मार्च-अप्रैल के आसपास कटाई। इसमें गेहूँ, जौ, सरसों, चना जैसी फसलें पैदा करी जाती हैं। 3- जायद: रबी और खरीफ के बीच (मार्च - जून) बुवाई और खरीफ शुरू होने से पहले कटाई। इसमें तरबूज, खीरा जैसी फसलें पैदा करी जाती हैं।



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हज़रत आदम की उम्र और ऊंचाई कितनी थी?
 
 
हज़रत आदम की 1000 साल उम्र होने का बयान कुरान में नहीं आया है बल्कि कई रिवायतों में आया है। हो सकता वहा भी इसके लिए सना लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ हो या फिर वो इज़राईली रिवयतों से मुतासिर होके हमारे लिटेरेचर में शामिल हो गई हो। इसके अलावा उन हदीसों की सेहत पर भी सवालिया निशान हैं जिनमें हज़रत आदम की ऊंचाई लगभग 60 क्यूबिट या 28 मीटर बताई गई है। इसके लिए आप मुफ़्ती मुंतसिर ज़मन की किताब या तहक़ीक़ देख सकते हैं। हालंकि तमाम बड़े मुहद्दिसों के नज़दीक यह रिवायत सहीह है सिर्फ चंद मुहक्कीक हैं जो इसे कमज़ोर मानते हैं।

इसके अलावा, जिस हदीस में ह. आदम की उंचाई 90 फ़ीट (60 क्युबिट) बताई गयी है, उस पर इब्ने हजरे असकलानी ने अपनी बुखारी शरीफ की शरह फतह अल बारी में लिखा है कि पहले के ज़माने में ऊंचाई ज्यादा हुआ करती जो आगे कम होती गयी, ये बात मुशाहीदे से साबित नहीं होती है (पिछली कौमों के पाए गए मकानों, सामानों वगैरह की बुनियाद पर).
 
ऐसा भी लगता है कि यह उंचाई जन्नत कि बताई गयी होगी, जिसे लोगों ने दुनिया की मान कर उसमें बातें बढ़ा दी होंगी.  
 
Bukhari 3326: Allah created Adam, making him 60 cubits tall. When He created him, He said to him, Go and greet that group of angels, and listen to their reply, for it will be your greeting and the salutation of your offspring. So Adam said Salam and the angels replied. Any person who will enter Paradise will resemble Adam. People have been decreasing in stature since Adam's creation.

Muslim 2841: Allah created Adam in His image with His length of 60 cubits. So he who would get into Paradise would get in the form of Adam, his length being sixty cubits, then the people who followed him continued to diminish in size up to this day.

Bukhari 3327, Muslim 2834:
The first group of people who will enter Paradise, their wives will be large-eyed maidens/ houris. All of them will look alike and will resemble their father Adam, 60 cubits tall.

 

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असहाबे कहफ इतने लंबे अरसे तक गार में कैसे सोये रहें?


हाइबरनेशन: यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा दुनिया भर में लगभग 2000 अलग-अलग किस्म के जीव (चूहे, चमगादड़, गिलहरियाँ, लँगूर, रीछ, पंछियों, साँपों की कई नस्लें) कठोर मौसम, ख़ुराक की कमी से बचने के लिए लम्बे वक्त के लिये सो जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान उनके दिल की धड़कन धीमी हो जाती है, शरीर का तापमान कम होकर ठंडा हो जाता है, और वो जीव अपने शरीर की पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने जिस्म की चर्बी और मांसपेशियों पर निर्भर हो जाता हैहाइबरनेशन में जानवर अंदर चर्बी बनाने के लिए भरपूर खाते हैं। हायबर्नेशन में कुछ महीनों रहने के बाद उठने पर जानवर को ज़ोरों की भूख लगने लगती है और फिर सबसे पहला काम वो शिकार को ढूंढने का करते हैं। अब तक का सबसे लंबा हाइबरनेशन उस चमगादड़ का है जो लगभग 344 दिन तक बिना खाए या पिये सोया रहा था। सरल शब्दों कह सकते हैं कि हाइबर्नेशन के दौरान जानवरों की उम्र बढ़ना लगभग बंद हो जाती है। एक हॉलीवुड फिल्म Passengers (2016) में लोगों का समूह एक नए ग्रह पर जा रहा है, क्योंकि ये नया ग्रह पृथ्वी से दूर है तो इंसान के लिए अपनी सामान्य आयु में वहां पहुँच पाना मुश्किल है, इसके लिये वैज्ञानिकों ने ऐसे ट्यूब बनाए हैं जिसमें हर किसी को हाइबरनेट किया जाता है ताकि उसकी उम्र बढ़ने की रफ़्तार बेहद मद्धिम हो सके, और 120 साल बीत जाएं और वे एक नए ग्रह पर नई जिंदगी जीने के लिये उतर जाएं।

कुरान, सूरह कहफ: फिर हमने उस गुफा में कई वर्षो के लिए उनके कानों पर परदा डाल दिया। और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। और तुम समझते कि वे जाग रहे है, हालाँकि वे सोए हुए होते। हम उन्हें दाएँ और बाएँ फेरते और उनका कुत्ता ड्योढ़ी पर अपनी दोनों भुजाएँ फैलाए हुए होता। यदि तुम उन्हें कहीं झाँककर देखते तो उनके पास से उलटे पाँव भाग खड़े होते और तुममें उसका भय समा जाता और इसी तरह हमने उन्हें उठा खड़ा किया कि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें एक कहनेवाले ने कहा, "तुम कितना ठहरे रहे?" वे बोले, "हम यही कोई एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरें होंगे।" उन्होंने कहा, "जितना तुम यहाँ ठहरे हो उसे तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है। अब अपने में से किसी को यह चाँदी का सिक्का देकर नगर की ओर भेजो। फिर वह देख ले कि उसमें सबसे अच्छा खाना किस जगह मिलता है। तो उसमें से वह तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आए और चाहिए की वह नरमी और होशियारी से काम ले और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे।

असहाबी कहफ का वाकया और विज्ञान: बाहर का तापमान कितना भी हो, अधिकतर गुफाओं का तापमान साल भर एक सा रहता है। अल्लाह उन लोगों के कानों पर नींद का पर्दा डाल दिया, यहां वास्तव में हमारे अंदर के कान के हिस्से की बात हो सकती है कि हमारे कान किसी तेज आवाज़ की वजह से मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं और मस्तिष्क हमें जगा देता है लेकिन असहाबे कहफ़ के मामले में वह कान का हिस्सा पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया था। फिर अगर सूर्य की रोशनी गुफा में गिरती तो गुफा का तापमान बढ़ जाता, जिससे असहाब की नींद टूट सकती थी। दूसरे, त्वचा पर सूर्य की किरणों के पड़ने से शरीर में फ्री रेडिकल अणुओं की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य की आयु बढ़ने लगती है। लेकिन कुरान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय, सूरज गुफा के सामने नहीं आता था। अगर सोता हुआ व्यक्ति लंबे समय तक अपना करवट नहीं बदलता है, तो ब्लड सर्कुलेशन रुकने पर उसे शरीर पर ज़ख्मों के होने की बीमारी हो सकती है लेकिन कुरान कहता है कि असहाबे कहफ़ को नियमित रूप से करवटें बदलाई जाती रहीं। लंबे समय तक आँखों को बंद करके रखना हानिकारक होता है, जबकि लम्बे समय तक आंखें खुली रखने पर भी आंखों को खतरा पैदा होता है। कुरान कहता है कि तुम उन्हें देखते तो सोचते कि वे जाग रहे हैं (मतलब वे पलक झपक रहे थे) जबकि वे सो रहे थेजैसे ही कोई जानवर हाइबरनेशन से बाहर आता है वह तेज भूख की वजह से शिकार करना शुरू कर देता है, कुरान कहता है कि जैसे ही असहाबे कहफ़ नींद से उठते हैं उनमें से एक शख्स दूसरे से कहता है कि बाज़ार जाकर सबसे अच्छा खाना ले आओ।

असहाबे कहफ़ के सालों तक गुफा में लेटी हुई अवस्था में रहने के पीछे सबसे अच्छी साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन हाईबरनेट की है। हालांकि कोई इससे बेहतर अनुमान आता है तो राय बदलने में किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए। 

हम आज विज्ञान के जरिए यह अनुमान लगा चुके हैं कि लाखों साल पहले शूरवाती इंसानी प्रजातियाँ हाईबरनेशन किया करती थी। इंसान को हाईबरनेट करने के लिए जैसी जिस्मानी क्षमताएं चाहिए वो फिलहाल इंसान के पास नहीं है। हालाँकि पहले हुआ करती थी इसलीए लाखों साल पहले इन्सान हाईबरनेट कर चूके हैं ऐसा DNA रिसर्च के मुताबिक अनुमान लगाया जा रहा हैं। हालांकि वैज्ञानिको का एक पक्ष ये भी है कि आने वाले समय में छोटे छोटे काल के लिए हाईबरनेट करते हुए, बहुत समय बाद फिर से इंसानी जिस्म में यह क्षमता पैदा हो सकती है।

वैसे जानवरो या कीड़ों में उनकी उम्र:हाईबरनेट पीरियड का रेशो देखें तो वो लंबे समय तक ऐसा कर लेते हैं और कोई जिस्मानी दिक्कत नहीं होती क्योंकि उनके अस्तितव का हिस्सा बन चुका है, लाखों साल में एवोलुशन से गुजरते हुए।

क़ुरान में जो लफ्ज़ असहाबे कहफ़ के सोए रहने के लिए आया है वो  309 सीनीन/सना है और सना के मायने अरबी शायरी, लिटरेचर और क़ुरान तक में साल, महीनों, सीज़न (मौसमी/फसली) के लिए भी आया है। यानी वो 309 महीनें, या सीज़न वगैरह (यह लफ्ज़ दिन या किसी भी अबधि के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है) तक सोए रहे, एक मत यह है। यही लफ्ज़ हज़रत नूह की उम्र 950 के लिये आया है। इस लफ्ज़ के इन मायनों में रख कर अब हज़रत नूह की उम्र समझने की कोशिश करें। 

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