आप जानते ही है कि मुल्क में जारी नफ़रतें सारी हदें पार कर चुकी हैं जिसकी इंतेहा आइंदा वक़्त में अपने शबाब पर होगी। इस माहौल की बुनियाद इस प्रोपगेंडा पर पड़ी है कि मुसलमान दहशतगर्द होते हैं, क़ुरान तशद्दुद सीखाता है, इस्लाम एक ख़तरनाक मज़हब है और पैगंबर एक बुरे इंसान थे (नाऊज़ूबिल्लाह)।
जबकि क़ुरान इन सब इल्ज़ामों को न सिर्फ रद्द करता है बल्कि इनके उलट बातें कहता है:-
● कुरान (21:107) कहता है कि ऐ नबी, हमनें
आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बना कर भेजा है।
● कुरान कहता है कि तुम बेहतरीन उम्मत हो जिसे दूनिया के तमाम इन्सानो के लिए लाया गया है। तुम भलाई का हुकुम देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर इमान रखते हो।
● कुरान (33:21) कहता है कि निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है .
नबी ए पाक़ तमाम जहान के लिए रहमत बना कर भेजें गए हैं। नबी की उम्मत यानी नबी के पैरोकार भी तमाम इन्सानो की भलाई के लिय लाये गए हैं, न कि सिर्फ अपनी क़ौम या मुसलमानों के लिए। कुरान का हर लफ्ज़ सच्चा है. मगर आज गैर मुस्लिम ऐसा नहीं मानते हैं. दवत/खिदमत हमारी एक बेहद एहम ज़िम्मेदारी है। आज कितने पेरसेंट मुस्लिम वाकई रहमत के कामों को अंजाम दे रहे हैं? शायद गिने-चुने लोग ही।
इसका मतलब है कुछ हमारी तरफ से गलतियां हुई है. हमारी कुछ जिम्मेदारियां थी जिन्हें हम ने पूरा नहीं किया. ये जिम्मेदारियां हमें अपने गैर मुस्लिमो भाइयों और वतन वालों की जानीब पूरी करनी थी. उन जिम्मेदारियों को पूरी न करने का सिला या सज़ा ये हुई कि आज हिंदुस्तान का मुस्लिम अलग थलग पड़ गया है.
ये सब अल्लाह की मर्ज़ी से ही हुआ है. अल्लाह की मदद तब तक नहीं आएगी जब तक हम अपनी ज़िम्मेदारीयां पुरी नहीं करेंगे। खुदा उसकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करने को तैयार होता हैं. इस बारे में कुरान ने एक उसूल बताया है:-
● कुरान कहता है कि ज़मीन पर वही चीज़ ठहरती है जो लोगो के लिए फायदेमंद होती है.
अगर आप, दूसरे लोगो को लिय फायदेमंद बन जाओगे तो ज़मीन पर ठहर जाओगे नही तो हटा
दिए जाओगे। आज मुसलमान अपनी वो हैसियत खो चुके हैं जो हमनें कभी बरसों तक नेकी और
खैर के कामों को अंजाम दे कर हासिल की थी। आज हम खैरख्वाह नहीं बचे सो गैरों की
नज़रों में हमारी अहमीयत भी नहीं रही।
इसलिए अब वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम फिर से ज़माने के लिए खैरखाव्ह हो जाए/रहमत को फिर से आम किया जाये और खिदमत के काम किए जाये।
हमारी ज़िम्मेदारी थी लोगों तक पैगामे इस्लाम पहुंचाना जिसके दो ज़राएँ है ज़ुबानी और अमलन. नफरत के माहौल में जुबानी पैगाम नहीं दिया जा सकता इसलिए आज अमल के ज़रिये पहुचाने की दरकार है, जिसके दो तरीके हैं, एक अपने अखलाक़ या किरदार के ज़रिये और दुसरा लोगों की खिदमत के ज़रिये या उनके साथ रहमत बनकर.
● कुरान कहता है कि अगर तुम ईमान वाले हो तो तुम ही ग़ालिब होगे.
कुरान का हर लफ्ज़ सच्चा है मगर हम आज ग़ालिब नहीं है यानी कि हमारा ईमान नाम भर का है तभी हम ग़ालिब नही आ पाए हैं। ईमान पुख्ता करिए, दुनिया के तख्त तुम्हारे होंगे।
● कुरान कहता है कि भलाई और बुराई कभी बराबर नहीं हो सकती। तुम बुराई का जवाब भलाई से दो। तो फिर तुम देखोगे कि तुम में और जिसमें दुश्मनी थी, वो तुम्हारा जिगरी दोस्त बन गया है.
बेशक कुरान सच्चा है और अल्लाह का कलाम है इसलिए ऐसा ही होगा.
यानी हमें जो दो काम करने हैं वो हैं: दवत और रहमत.
इस के लिए दो बुनियाद बहुत ज़रूरी हैं: इखलास और ज़ज्बा.
(इखलास यानी जो करें सिर्फ अल्लाह के लिए करें और जज्बा यानी लोगों के लिए कुछ करने की तड़प होनी चाहिए.)
इसके लिए दो उसूल इस्तेमाल करें: हिकमत (Wisdom) और नयी इजाद (Innovation)
(हिकमत यानी कब, कंहा, क्या, कैसे करना है की समझ पैदा करें और अकल का इस्तेमाल करें. काम करने के नए नए तरीके इजाद करें,जिनसे बेहतर अंदाज़ के साथ, कम वक़्त में, ज़्यादा अवाम तक पहुच सके.)
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वही तारीख और वही हल
नबी की सीरत से वाज़ेह है कि नॉन वोयलेंस नबी की एक बहुत बड़ी पॉलिसी रही है। जब मक्का में मुशरीको और मुसलमानों में आखिरी दर्जे की तना-तनी चल रही थी तो इसके खात्मे के लिए सुलैह हुदैबिया करी गयी। यानि मुख़ालिफ़ीन से टकराने के बजाय एअराज़ किया गया। नबी ने जंग की बजाय अमन को तरजीह दी। तब सहाबा को यह एहसास नहीं था कि इसका इतना बड़ा रिज़ल्ट आएगा कि जो काम पिछले दशक भर में नहीं हुआ, वो चंद सालों में हो जाएगा। इस मुवाहिदे के बाद जो अमन क़ायम हुआ, उसके नतीजे में मुशरिक जोक़ दर जोक़ दर इस्लाम में दाखिल होते चले गए।
इस बारे में एक हकीकत है यह है कि तशद्दुद अपने अंजाम के एअतबार से खुदकुशी है और अमन अपने अंजाम के एअतबार से ज़िंदगी है। आज हम भी लगभग वैसे ही मक्की दौर से गुज़र रहे हैं। ये वही मुहाना है जिस पर फिर से एक क़ौम मुस्लिमों के साथ सिर्फ इस बात के लिए जंग पर आमादा है कि हमारा मज़हब अलग है। नफ़रत के माहौल में दो लोगों के बीच की दूरियां बढ़ाना तो जितना आसान है उतना ही मुश्किल होता हैं उन दोनों के बीच की दूरियां कम करना. इसलिए हमें यंहा फिर से सुलैह हुदैबिया जैसे मुवाहिदे को दोहरने की ज़रूरत है। हर सुलैह अमन की निशानी है और अमन क़ायम ऱखने के लिए खैरख्वाह होना लाज़मी है। इसलिए वक़्त का तक़ाज़ा है कि रहमत को फिर से आम किया जाये और खिदमत के काम किए जाये।
इस बारे में एक और हकीकत ये है कि खिदमत ए ख़लक़ से खुदा मिलता है और ख़ुदा साथ है तो दोनों जहान में क़ामयाबी है। आइये हमारे साथ रहमत का रास्ता इख्तियार कीजिये और ख़िदमत का सिलसिला शुरू कीजिये। आइये हमारे साथ जुड़िये और खिदमत के कामों में हाथ बंटाईये। हमारा साथ देने के लिए राबता करें।
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अमन और इंसाफ
अमन के लिए इंसाफ की शर्त लगाना गैर हकीकी है। अमन सिर्फ इसलिए होता है की इंसाफ के मकसद को पूरा करने की कोशिश के लिए कारगर फिज़ा हासिल हो सके। यही अक़्ल के मुताबिक भी है और यही इस्लाम के मुताबिक भी। पैगंबरे इस्लाम ने जब हुदैबिया का अमन मुआहिदा किया तो उसमें आप को सिर्फ अमन मिला था, इंसाफ नहीं मिला था। अलबत्ता जब अमन के ज़रिए मुनासिब हालात पैदा हुए तो आपने उन हालात में अमल करके बाद को इंसाफ भी हासिल कर लिया। इंसाफ कभी अमन का हिस्सा नहीं होता, इंसाफ हमेशा अमन के बाद हासिल शुदा मवाके को इस्तेमाल करने से मिलता है, न कि बराह रास्त तौर पर ख़ुद अमन से। ~ मौलाना वहीदुद्दीन खान।
नफरत के माहौल में दावत नहीं दी जा सकती. ऐसे माहौल में नबी भी हिजरत फरमा गए थे. आज खुले आम दवत पेश करने का वक़्त नहीं है। कलीम साहब, उमर साहब और दूसरों के साथ क्या हुआ आप जानते हैं। इसलिए खुल के करने के लिए अब कंपेशन ही बचता है। नबी तो नबूवत से पहले ही हिल्फुल फुजूल के मेम्बर थे.
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क़ुरान का पैग़ाम उम्मत के नाम
हमारी दुनिया में दो हैसियतें है, एक इंफ्रादी और दूसरी इश्तेमाई। हमारी इंफ्रादी ज़िम्मेदारिया है जैसे नमाज़, रोज़ा ज़कात वगैरह और इश्तेमाई ज़िम्मेदारिया है जैसे नमाज़े जनाज़ा, दवह वगैरह। उम्मत के हैसियत एक तंज़ीम की तरह होती है। कोई भी तंज़ीम या उम्मत तब तक नहीं बनती है जब तक उसके मक़सद नहीं होते। कुरान ने उम्मत का मकसद बताया है।
● (कुरान 3: 110) अब तुम बेहरतरीन उम्मत हो जिसे दूनिया के तमाम इन्सानो के लिए लाया गया है। तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो सकता है और अल्लाह पर इमान रखते हो।
हम दुनिया के सारे इन्सानो की भलाई लिय लाये गए है, सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं। ख़िदमत और पैगामे इस्लाम, उनके लिए एक भलाई है। क्या हमने ऐसे किया?
● (कुरान 9:39)और अगर तुम नहीं निकले तो अल्लाह तुझे दर्दनाक अजाब देगा और तुम्हारी जगह एक दुसरी क़ौम को ले आएगा और तुम चाह कर भी उसका कुछ नही बिगाड़ सकोगे।
यानी जब उम्मत आपना मकसद भुल जाए तो अल्लाह का अज़ाब आता है. हमे किस तरह का अज़ाब मिल रहा है? क्या अल्लाह ने हम पर कोई ऐसी कौम मुसल्लत कर दी है जिसका हम कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे?● (कुरान 47:38) अगर तूम अपनी ज़िम्मेदारी से पीठ फेर लोगे तो अल्लाह एक दुसरी क़ौम को ले आयगा और वो लोग तम्हारी तरह नही होंगे।
मुसलमानों पर जो अज़ाब चल रहा है वो क़ुरान के हिसाब से अपनी ज़िम्मेदारी से पीठ फेर लेने की वजह से है। कौन सी ज़िम्मेदारिया न निभाने की वजह से अल्लाह हमें किसी दूसरी क़ौम से पलटने जा रहा है?
● (कुरान 5:54) ऐ ईमान लाने वालो! तुममें से जो कोई अपने धर्म (ज़िम्मेदारीयों) से फिरेगा तो अल्लाह जल्द ही एक कौम को लाएगा... जिनसे उसे प्रेम होगा और जो उससे प्रेम करेंगे। वे ईमान वालों के प्रति नरम और अविश्वासियों के प्रति कठोर होंगे। अल्लाह की राह में जी-तोड़ कोशिश करेंगे और किसी भर्त्सना करने वाले की भर्त्सना से न डरेंगे।
● (कुरान 42:30) जो परेशानियां तुम्हे पहुंची, वो तुम्हारे अपने हाथो की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ वो माफ कर देता है।
आज हम जिन परेशानीयों में घिरे हुए है, क्या वो हमारी ही वजह से है? जब उम्मत अपना मकसद भुल गई तो अल्लाह का अज़ाब क्यो नही आएगा?
● (कुरान 6:65) अल्लाह ताक़त रखता है कि वह तुम्हे ऊपर से या तुम्हारे नीचे से अज़ाब भेज दे या तुम्हे फ़िरको में बांट कर, आपस में भीड़ा दे और एक दुसरे की ताक़त का मज़ा चखाए।
क्या हमें ऐसा ही कोई अज़ाब झेल रहे है?
● (क़ुरान 6:40) क्या तुमने देखा कि अगर तुम पर अल्लाह का अज़ाब आ जाए, या क़ियामत की घड़ी आ पहुँचे, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे?
● (कुरान 6: 47) ज़रा तुम बताओ अगर अल्लाह का अज़ाब तुम्हारे पर अचानक या एलानिया आ जाए तो ज़ालिमो के सिवा और कौन हलाक होगा।
कुरान के मुताबिक़ ज़ालिम हलाक होते हैं, मगर आज सड़कों पर कौन हलाक हो रहे हैं, हम या हमारे मुख़ालिफ़? वो तो अपने घरो में सही सलामत बैठे हैं.
● (कुरान 28:59) तेरा रब तो बस्तियों को विनष्ट करनेवाला नहीं जब तक कि उनकी केन्द्रीय बस्ती में कोई रसूल न भेज दे, जो उन्हें हमारी आयतें सुनाए। और हम हरगिज़ बस्तियों को हलाक करने वाले नहीं (सिवाय इस स्थिति के कि) जब तक वँहा रहनेवाले लोग ज़ालिम ना हो।
कुरान के मुताबिक़ जालिमों की बस्तियां
हलाक होती है मगर क्या आज किन की बस्तियाँ हलाक हो रही है या होने जा रही है, हमारी
या उनकी? [बुलडोज़र, डिटेंशन कैंप किनके लिए हैं?]
● (कुरान: 17: 15) हमने जब भी किसी बस्ती को नष्ट किया तो यह उसके बाद हुआ कि उसके लोगों को चेतावनी दी गई थी। तुम्हारा रब बस्तियों को इस हाल पर हलाक़ करने वाला नहीं है कि उनके लोग बेखबर हों।
● (20:134) यदि हम उसके पहले इन्हें किसी यातना से विनष्ट कर देते तो ये कहते कि "ऐ हमारे रब, तूने हमारे पास कोई रसूल क्यों न भेजा कि इससे पहले कि हम अपमानित और रुसवा होते, तेरी आयतों का अनुपालन करने लगते?"
यानी बस्तियां तब तक तबाह नहीं करी जाती जब तक वंहा के लोग ग़फ़िल हों और बेखबर रहे अल्लाह के पैगाम से। हमारे मुख़ालिफ़ों की बस्तियां तो वंही की वंही क़ायम है यानी अभी वो गाफिल हैं, अभी उनके दिलो तक पैग़ामे इस्लाम नहीं पहुंचा है. हमारे मुख़ालिफ़ ज़ालिम नहीं बल्कि ग़ाफ़िल है। आप चाहे उन्हें लाख बार ज़ालिम कहो पर अल्लाह की नज़र में वो ग़फ़िल है। क़ुरान बताता है कि ज़ालिम और ग़ाफ़िल में फ़र्क़ है. अरबी भाषा में जुल्म किसी को उसके सही मकाम से हटाने को जुल्म कहते है। अपने मुक़ाम से हट जाना ज़ुल्म हैं और अपनी ज़िम्मेदारियों से हट जाना वाले ज़ालिम हैं। हमने खुद को अपने सही मकाम से हटा लिया है। हमारा मकाम क्या है?
●
(कुरान 3 : 110) तुम एक बेहतरीन उम्मत हो जिसे इन्सानो के लिए लाया गया है, तुम
भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो.
जब हमने इंसानों की दुनिया और अखिरत, दोनों की भलाई का काम छोड़ दिया तो अजाब तो आना ही है. उनके दिलों तक पैग़ामे पहुंचा दीजिए और फिर वो नहीं मानते तो वो ग़ाफ़िल कि फेहरिस्त से निकल कर जालिमो की फेहरिस्त में आ जाएंगे और आप पर से भी ज़ालिम का तमगा हट जाएगा।
अल्लाह की मदद तब तक न आएगी जब तक हम अपनी ज़िम्मेदारी पुरी नहीं करेंगे। इस बारे में कुरान ने एक एहम उसूल दिया है।
● (कुरान 13:17) ज़मीन पर वही चीज़ ठहरती है जो लोगो के लिए फायदेमंद होती है।
अगर आप, दूसरे लोगो को लिय फायदेमंद बन जाओगे तो ज़मीन पर ठहर जाओगे नही तो हटा दिए जाओगे. अगर
हम अब भी नही निकले तो यह जारी अजाब कम नहीं होगा बल्कि बढ़ता चला जाएगा और मरने के बाद भी मिलना है.
● (कुरान 3:139) अगर तुम ईमान वाले हो तो तुम ही ग़ालिब होगे.
कुरान का हर लफ्ज़ सच्चा है मगर हम आज ग़ालिब नहीं है यानी कि हमारा ईमान नाम भर का है तभी हम ग़ालिब नही आ पाए हैं। ईमान पुख्ता करिए, दुनिया के तख्त तुम्हारे होंगे।
● (कुरान 41:34) भलाई और बुराई कभी बराबर नहीं हो सकती। तुम बुराई का जवाब भलाई से दो। तो फिर तुम देखोगे कि तुम में और जिसमें दुश्मनी थी, वो तुम्हारा जिगरी दोस्त बन गया है.
बेशक कुरान सच्चा है और अल्लाह का कलाम है इसलिए ऐसा ही होगा.
इसलिए यह काम करना बेहद ज़रूरी है। अगर अब भी न जागे तो जिंदगी अलम बन जायगी, दर्द बन जायगी. कुरान ने
इस काम के बारे कें कुछ हिकमते बताई है, उन्हें समझिये और काम शुरू कीजिये। बाकी जानकारी के लिए राबता करिए.
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कुरान (3 आयतें/ 32:5, 34:29-30, 22:47) ने कहा कि अल्लाह का अमर नाज़िल होता है 1000 साल में। एक जगह अमर के साथ अज़ाब का भी जिक्र है क्योंकि कौमे भ्रष्ट हो जाती हैं।
कुरान कहता है कि अल्लाह आसमान से ज़मीन कि तरफ अमर भेजता है, फिर वो अमर या सारे मामले या निज़ाम उसी कि और लौटते है वापिस, एक दिन यानि इंसानी एक हज़ार साल के अरसे के बाद। वो पूछते हैं कि ये वादा कब पूरा होगा, कह दो कि तुम्हारे लिए एक दिन इंसानी कि मियाद है, न एक घड़ी आगे और पीछे। वो अज़ाब के लिए जल्दी मचा रहा हैं, अल्लाह कभी वादे के खिलाफ नहीं करेगा। पर उसके यंहा एक दिन तुम्हारे एक हज़ार साल जैसे है।
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◆ इल्म से बढ़कर अमल होता है। हमें दो तरह के अहकाम मिले हैं, एक हुकुकल अल्लाह यानि अल्लाह कि जात से मुतालिक हक अदा करना जैसे अक़ीदे और इबादते क्या हो। दुसरा है हुकुकल इबाद यानि बंदों के के क्या हक अदा करने हैं यानि उनसे कैसा सुलूक करना है। लोगों कि तरफ जो जिम्मेदारी दी गई है वो हैं उनकि आखिरात दुरुस्त करना यानि उन तक इस्लाम, कुरान, नबी और अल्लाह का पैगम पहुंचाना। यानि उन्हें हक का पैगाम देना है और उनके लिए रहेमत बनना है। इसके 2 तरीके हैं, एक जुबानी और दूसरा अमलन। आज के वक़्त में जुबानी मुश्किल हो गया है मगर अमलन उनके लिए रहमत बनके उनतक हक पहुंचाया जा सकता है। रहमत बनने का सबसे बेहतर तरीका है खिदमत।
नफरत के माहौल में जुबानी पैगाम नहीं दिया जा सकता। नबी को भी हिजरत करके जाना पड़ा था। मगर आपने काम जारी रखा। इसलिए सिर्फ कम्पैशन बचाता है। जैसे हिलफूल फजूल।
2 मुल्क: स्पेन और हिंदुस्तान।
तरतारी। हिटलर। श्रीलंका और मयनमार।
प्रॉपगंड चालू है। चारों और परेशानी है। सियासी हल से वो बाद में फिर जीत जाएंगे। सरकारे आती जाती रहती है। मशीन नहीं दिमाग हैक हुए हैं।
इस्लाम पर नहीं है। इबादतों में दम नहीं है तो दुवाएँ भी कुबूल नहीं हो रही है।
हराम कमाई जेब में डाल कर हलाल गोशत कि दुकान धूधते फिरते हैं।
खनजीर नहीं खाएंगे है मगर शराब पी लेंगे।
इमानीयत, इबादतें, अमल, किरदार, अखलाक अच्छे करने हैं।
दूसरों से पहले खुद को बदलना और पलटना होगा।
◆ कुरान ने बताया कि नबी को तमाम जहानों के लिए रहमत बना कर भेजा है, न कि सिर्फ मुसलमानों के लिए। क्या हम बी तमाम इंसानों के लिए रहमत बन पाए?
कुरान ने ये भी बताया कि अब तुम सबसे बेहतरीन उम्मत हो जो भलाई का हुकूम देती है और बुराई से रोकती है। क्या हम ये काम भी कर पाए?
कुरान कहता है कि जमीन पर वही ठहरता है जो फायदेमंद होता है। क्या हमारे पैरों कि जमीन खिसक रही है और हर जगह हमें जिल्लत रुसवाई मिल रही है?
कुरान कहता है कि उम ही गालिब होंगे अगर तुम ईमान वाले हो। मगर आज हम तो गालिब नहीं है? क्या हमारे ईमान में कमी या गई है?
कुरान कहता है कि बुराई का जवाब भलाई से दोगे तो पाओगे कि दुशमन भी दोस्त हो गया है। क्या हम बुराई का जवाब भलाई से दे पा रहे हैं?
कुरान कहता है जो परेशानी तुम्हें पहुंची वो तुम्हारे हाथों कि कमाई से ही है। क्या हमारी परेशानी की वजह हम खुद तो नहीं।
कुरान का हर लफ़्ज़ सच्चा है। इसका मतलब हमारी कमिया रही हैं जिन्हें हमें दूर करना ही होगा। हमने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है जिन्हें अब हमें निभाना ही होगा।
◆ Surah Asr 103: Wal asr, Innal insaana lafee khusr, ''Illal lazeena aamanoo wa amilus saalihaati'' wa tawaasaw bilhaqqi wa tawaasaw bissabr.
Surely humanity is in grave loss, except ''those who have faith, do good'' and urge each other to the truth, and urge each other to perseverance.
बेशक इन्सान खासारे में में है, सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और नेक अमाल किये र एक-दूसरे को हक़ की ताकीद की, और एक-दूसरे को सब्र की ताकीद की।
कुरान में जहा जहा ईमान का जिक्र होता है वहा अमल का जिक्र आता है। यानि ईमान अमल के बिना अधूरा है। ऐसे आमाल को अमले सवालेह कहा गया है यानि ऐसे अमल जीने सुलह हो, सुकून हो, शांति आए। ये अमल बंदे और खुदा के बीच नहीं बल्कि बंदे और बंदों के बीच हो। हुकुकुल अल्लाह और हुकुकल इबाद दोनों कि बहुत अहमियत है।
◆ इस्लाम के 5 सतून है। गवाही, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज। सबसे पहला गवाही है। गवाही क्या है? किसी चीज़ की हक़ीक़त को साबित करना। ये ज़ुबान और अमल दोनों से साबित किया जा सकता है. गवाही मसला या सवाल पैदा होने पर दी जाती है जैसे कोई फ़ोन चोरी होने पर ये गवाही देना की चोरी किसने की है। एक अल्लाह की ज़ात और उसके भेजे हुए रसूल पर जब लोगों ने सवाल उठाए तो ये गवाही बार बार दी गयी। गवाही है कि अशहदु अल्लाह इलाहा इल्ललालः मुहम्मदुर रसूलुल्लाह। यानि अल्लाह एक है और मुहम्मद उसके रसूल हैं। सहाबा ने ये गवाही सिर्फ मुंह से नहीं दी गई बल्कि इसे अमल से भी साबित किया गया। जैसे एक अल्लाह की इबादत करके, अमल से गवाही साबित करते थे। जैसे अल्लाह के रसूल की मुकम्मल इताअत करके, अमल से साबित करते थे। मुहमद सल्ल. को सभी के लिए रहमत थे और इसीलिये आप हमेशा दूसरों की खैरख्वाही में लगे रहते थे। आपने सुना ही होगा ये अक्सर कहा जाता है कि दीन खैर ख़्वाहि का नाम है।
"The Religion is sincerity." We said, "To whom?" He said "To Allah, to His Book, To His Messenger, and to the leaders of the Muslims and their masses." [Muslim 55a]
The Prophet said, “The deen is naseehah (advice, sincerity).” We said, “To whom?” He said, “To Allah, His Book, His Messenger, and to the leaders of the Muslims and their common folk.” [40 Hadise Nawawi : 7]
क्या ये बात हमने अमल से भी साबित करी कि हम भी उन्ही के पैरोकार हैं? जो आप करते थे, क्या हमनें हर वो चीज़ करी? या हम सिर्फ अपनी इबादतों को अदा करने में लगे रहे। सवाल ये है कि क्या हम दूसरों के लिए क्या बने, रहमत या ज़हमत? क्या हम भी इंसानों के लिए खैरख्वाह बने? क्या हम भी दुनिया वालों के लिए फ़ायदेमद बने? क्या हमनें लोगों की ख़िदमत करी।
एक बार आपने 3 बार कहा कि वो मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी भूखा रहे और वो पेट भर कर सो जाए। आपने आस पास के 40 घरों को पड़ोस बताया था और इसमें कोई शर्त नहीं लगाई थी कि वो पड़ोसी सिर्फ मुस्लिम होना चाहिए। क्या हमने ये सब किया? अगर नहीं किया तो फिर ये गवाही सिर्फ ज़ुबानी हुई, अमलन नहीं। और इसी तरह तो हमने तुम को एक ‘उम्मते-वसत’ [उत्तम समुदाय] बनाया है, ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो। (2:143)
मुहम्मद सल्ल ने हज के दौरान आखिरी खुतबे में लोगों से पूछा कि क्या मैंने तुम तक पैगाम पहुंचा दिया तो लोगो ने एक आवाज़ में जवाब दिया, हां। इस पर नबी ने उंगली उठा कर कहा कि ए अल्लाह गवाह रहना। यंहा पर भी आपने शाहदह लफ्ज़ का इस्तेमाल किया। और फिर कहा कि जो शाहिद है यानी जो यंहा मौजूद हैं, वो उन्हें बतला दें जो गायीब हैं यानी जो यंहा मौजूद नहीं है। इतना सुनते ही साहब वंहा से ये पैगाम लोगों को देने के लिए चारों तरफ निकल गए। ये नबी का हुकुम था। क्या हमनें उनके दिये हुए हुकुम माने? आइये उनके हुकुम की फरमाबरदारी करें और लोगो की ख़िदमत में लग जाए।
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सुलह बनाम टकराव – कुरआन की राह
कुरआन का बुनियादी उसूल है: “सुलह बेहतर है” (4:128)
पूरी कायनात इसका ज़िंदा सबूत है। अरबों सितारे अपने-अपने दायरे में घूम रहे हैं, लेकिन एक-दूसरे से टकराते नहीं। यानी पूरी कायनात बिना टकराव के उसूल पर चल रही है।
ह. आदम के सामने फरिश्तों और इब्लिस का किस्सा देखिए – फरिश्तों ने झुककर सुलह का तरीका अपनाया, जबकि इब्लिस ने टकराव चुना। नतीजा? फरिश्तों का रास्ता जन्नत तक और इब्लिस का रास्ता जहन्नम तक (7:18)।
यही सबक हाबील और क़ाबील की कहानी में भी है। हाबील ने फरिश्तों वाला तरीका अपनाया, जबकि क़ाबील ने टकराव और हत्या वाला। कुरआन कहता है: “जिसने एक इंसान को क़त्ल किया, उसने पूरी इंसानियत को क़त्ल किया” (5:32)।
क़त्ल हमेशा टकराव से शुरू होता है – पहले नफ़रत, फिर शिकायत, फिर इंतकाम और आखिर में हिंसा। इसलिए जैसे क़त्ल हराम है, वैसे ही प्री-क़त्ल – यानी नफ़रत, शिकायत और टकराव फैलाना भी हराम है।
अंबिया के उसूल देखिए:
हज़रत इब्राहीम : उन्होंने नमरूद से टकराव करने की बजाय अपनी बस्ती छोड़ दी। न बद्दुआ की, न बदला लिया। यही वजह है कि उनकी नस्ल से साहाबा और आखिरकार आख़िरी नबी पैदा हुए।
हज़रत यूसुफ़: मिस्र के ग़ैर-मुस्लिम बादशाह से टकराने की बजाय उनकी हुकूमत में एक अहम ओहदा संभाली। यानी टकराव से बचकर मौक़ों को क़बूल करना।
हज़रत मूसा: फ़िरऔन टकराव चाहता था, लेकिन मूसा (अ.स) अपनी क़ौम को लेकर दूसरी जगह चले गए।
हज़रत ईसा: उनका मशहूर क़ौल है – “हुक्मरान का हक़ हुक्मरान को दो और ख़ुदा का हक़ ख़ुदा को दो।” यानी सियासी टकराव से बचो और अपनी नज़रें असली मिशन (ख़ुदा का काम) पर रखो।
आख़िरी नबी : मक़्का में 360 बुत मौजूद थे, लेकिन 13 साल तक टकराव नहीं किया, सिर्फ़ दावत का काम किया। जब हालात बदले नहीं, तो हिजरत का रास्ता अपनाया – यानी टकराव को छोड़कर नया वर्कप्लेस चुन लिया। हुदेबिया की सुलह की शर्तें अपमानजनक थीं, लेकिन नबी ने उन्हें क़ुबूल किया, ताकि आगे का दरवाज़ा खुल सके।
हदीस (बुखारी 3560): “जब भी नबी ﷺ के सामने दो रास्ते होते, तो आसान (सुलह वाला) रास्ता चुनते, न कि टकराव वाला।”
नतीजा साफ है – टकराव की पॉलिसी कभी कामयाब नहीं होती। सुलह, सब्र और मौक़ों को अपनाने की पॉलिसी ही असल इस्लामी रास्ता है।
आख़िरी हक़ीक़त: टकराव से इंसान का वक़्त, एनर्जी, टैलेंट और मौक़े – जो सब limited हैं – बर्बाद हो जाते हैं। जबकि सुलह अपनाने से इंसान इन्हीं चीज़ों का सही इस्तेमाल करके उसी मंज़िल तक पहुँच जाता है, जहाँ वो टकराव करके पहुँचना चाहता है।
यही मक़्का में हुआ – बिना एक कतरा खून बहाए पूरा मक़्का फ़तह हो गया।
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अज़ाब से गुज़र
अगर हम पिछले 50-60 सालों के इतिहास पर गौर करे तो हम पाएंगे कि अधिकतर प्राकृतिक आपदाओं और जंगो में मुसलमानों की बड़ी तादाद में मौत हुई है। अफगानिस्तान-रूस, ईरान ईराक जंग, अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, यमन, बोस्निया, चेचन्या, पाकिस्तान, कश्मीर, गुजरात। ये तो है युद्ध और दंगे फसाद में मौतें हैं। इनके अलावा फिलिस्तीन के हालात, चीन में उइगर मुसलमानों की स्थिति, म्यांमार द्वारा मुसलमानों को भगाना, भारत में हिंदुत्व फासिस्म आदि अलग हैं। फिर कुदरती आफते जैसे भूकंप, बाढ़ वगैरा अधिकतर मुसलमानों के इलाके में आती। जैसे भूकंप की वजह से इसी साल सीरिया, तुर्की, मोरक्को, अफगान, पाक मे मौतें हो चुकी हैं। इनके अलावा मुसलमानों में गरीबी, भुखमरी, जिल्लत और रुसवाई सो अलग हैं।
एनआरसी, शाहीन बाग प्रोटेस्ट में क्या हुआ, दिल्ली के दंगे हुए। गौरक्षक मार रहे हैं। हुलिये वालों को बिना बात के मारा जा रहा है। लोकडाउन में थूकने पर बवाल किया गया। बुलडोजर चल रहे हैं। जुमे की नमाज़ पर लड़ाई हो रही है। गोशत बेचने वाले, रेहड़ी वालों को सताया जा रहा है। मुस्लिम विरोधी फिल्मे आई। जहद लफ़्ज़ के साथ कहानिया बना दी गई। कॉनवर्सन के इल्जाम लगा दिए जाते हैं। हिन्दू धर्म की लड़कियों से शादिया नहीं होने दी जा रही। मुस्लिम लड़कियों को टारगेट किया जा रहा है। बुर्के, हिजाब, दाढ़ी, टोपी, कुर्ते पाजामे वालों पर हमला हो रहा है। बाबरी और 370 पर फैसला करवा दिया। सोइयों मस्जिद की लिस्ट है मंदिर साबित करने की। शहरों के नाम बदले। इतिहास बदला गया। स्कूल, कॉलेज, ऑफीस में भेदभाव। एक्स मुस्लिम टीवी पर बिठाए जा रहे हैं। ट्रिपल तलाक, वक्फ के कानून बनाए गए। 2 बच्चों, 4 शादियों, हर चीज पर पर कानून बनने वाले हैं। बंगाल, केरला में तेज़ी से काम चालू है। डुपपते, नौकरिया, जमीने, सारे हक छीन लिए जाएंगे। रोड पर, ट्रेन में नमाज़ नहीं, वक्फ की मस्जिदें नहीं, मस्जिदों के बाहर फूँक लगवाने वाली गायब।
अगर हम यह सोच रहे है कि राजनीतिक जीत से सब ठीक हो जायगा तो गलत हैं। हुसैन, नकवी, हेपतुला को दूसरे दर्जे का नेता बना दिया गया था और फिर हटा दिया। गुजरात के मुस्लिम को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया और उन्होंने मान लिया, वो खुश हैं। आज मुस्लिम को वोट नहीं डालने दिया जा रहा, टिकट नहीं मिलते। सारे मुसलमान एक हो जायेंगे तो यह भी हल नहीं है , क्योंकि वे हमसे 3 - 4 गुना ज्यादा है। अगर हम यह सोच रहे है कि दूसरे देशों में पनाह ले लेंगे तो यह तो नहीं होगा, हिजरत नामुमकिन है। 20-25 करोड़ लोगो को कोई देश घुसने नही देगा। रोहीनगया का हाल देखो, कौन लेने को तैयार है। अगर यह सोच रहे कि सारे मुस्लिम मुल्क हमारा साथ देंगे तो आप फिलिस्तीन के हालात देख सकते है। अरब देश खुद एक नहीं हैं। हज़रत आयेशा की तौहीन पर अरब देशों से सपोर्ट आई मगर इस्लाम के नाम पर, मुस्लिम के नाम पर नहीं।
इस अजाब पर मौलाना शम्स ने कहा और फिर 30 साल से अल्लामा कहते रहे हैं. मगर उन्होंने 2015 में इसे खुले आम कहा। तारतार, मक्का में भी ऐसा हुआ। हिटलर, मुसोलिनी (श्रीलंका, मयनमार) को भी पलट दिया गया। जैसे आज भारत में अम्बेडकरवादी एक अन्दोलन खडा कर रहे हैं.
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परेशानी का हल: जब हम ये कहते है कि अल्लाह की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता तो बिना अल्लाह की मर्ज़ी से ये कैसे हो सकता है कि दुनिया भर में हम बेईज्ज़त हो रहे हैं. हर देश में हमारी मुखालफत करने वाले सत्ता में आ रहे हैं. आज मुस्लिम हर तरफ से टार्गेट किया जा रहा है। दुनिया भर के मुस्लिम को गलत निगाह से देखा जाता है. ये सब अल्लाह की मर्ज़ी के बिना तो नहीं हो सकता. अब इसे अज़माइश समझो या अज़ाब। पर वजह क्या हो सकती है.
सच ये है की आज मुलसमान की नमाज़, रोज़े, ज़कात, हज, क़ुरबानी सब में ऐब पैदा हो चूका है. अख्लाकी तौर पर बैंकरैप्ट हो चूका है. हराम कि कमाई जेब मे डाल कर हलाल गोश्त की दुकान ढूंढता है। खंजीर खाने से नफरत करता है मगर शराब पी लेता है. परदे का सपोर्ट करता है और ऑंखें गाड़ बेहयाई देखता है. जब आप अपनी क़ौम की ज़िल्लत का जिम्मेदार खुद को नहीं किसी दूसरी क़ौम को मानते है तो सुधार के इमकान ख़तम हो जाते हैं. हिन्दू यही कर रहे है. मगर मुस्लिम भी तो यही कर रहे हैं. खुद के गिरेबान में झाँक कर देखने को कोई तय्यार नहीं. इसलिए जाती इमानियत, इबादतें के अलावा अपने अखलाक ठीक करें। अपना किरदार और मामलात दुसरुस्त कीजिये.
बाहर निकलिए लोगों के राब्ता क़ायम कीजिये उन्हें बताइए कि हमारा दीन वैसा नहीं बल्कि ऐसा कहता है। दूसरों तक इस्लाम का पैगाम पहुंचाए. उन्हें दवत दीजिए. दवत और दावे में फर्क होता है। दवात को दिलो दिमाग पर साबित करना होता है कि यही हक़ है. उन्हें सोचने पर मजबूर करिये की इस्लाम और मुसलमान तो बहुत अच्छे होते है। आपको देख वो कहने लगे कि लोग इनके बारे में गलत सोच रखते है। अगर मुसलमानों के पिछड़ेपन, कट्टरपन, दकियानूसी, मज़हबी तंग नज़रिए पर सवाल उठाये जाते है तो उसका जवाब मुसलमान इन्हें दूर करके ही दे सकते है।
सारे हल क़ुरान और सुन्नत या इस्लाम में मौजूद है। दुश्मनों को पलटना है तो पहले खुद को पलटना होगा। दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलना होग। आप दीन के रास्ते पर आओ आपके दुश्मन अपने आप रास्ते पर आ जाएंगे। इस्लाम के लिए मर के बाद में दिखाना पहले इस्लाम के लिए जी कर दिखाओं. इस्लाम को समझाना नही बल्कि जी कर दिखाना है कि ये है असल मुसलमान और इस्लाम। अल्लाह की मदद तभी आयगी जब हम उसके रास्ते परपूरी तरह से होंगे वरना अल्लाह जिसे छोड़ दें उसे क्या हासिल हो सकता है? अल्लाह की रस्सी को थाम लो.
सिख क़ौम की सफलता में सबसे बड़ा हाथ शायद उनकी ख़िदमत का है। अल्लाह का आम निज़ाम है, नवाज़ने वाले को नवाज़ना। खिदमत मुस्लिम की मीरास थी जो हमने खो दी. इस वापिस अपनाइए, अल्लाह वापिस हमें खड़ा कर देगा.
क्रिटिक्स: पर ये सब हम नहीं करते हैं क्योंकि इसमें मेहनत लगती है। हम बस व्हाट्सअप पर फारवर्ड करना जानते है और फेसबुक पर शेयर करना। जमीन पर कुछ नहीं करना चाहते. प्रॉब्लम बताना सब चाहते हैं पर हल बताना नहीं. मुसलामन को खुद जमीन पर उतर के मसाइल हल करने की कोशिश करनी पड़ेगी. कंप्यूटर या फ़ोन पर कीबोर्ड पीटते रहने वाले खुद कुछ नहीं करंगे और जो कर रहा होगा उसको सिर्फ क्रिटिसाईज करेंगे. यही लोग है हकीकत से दूर हैं और दुसरो को भी गुमराह करते हैं. कट्टर हिन्दू कहते हैं मुस्लिम किसी का न हुआ, कट्टर मुस्लिम कहते हैं हिन्दू किसी का न हुआ. ये लोग आज इस्लाम के दुश्मनों को नबी के दुश्मनों से तुलना करती है, चलिए कर लीजये। पर कभी ये तुलना नहीं करती की आज के मुसलमान और नबी के वक़्त के मुसलमान या सहाबा में कितना फर्क है. कुछ गलत होते ही ऐसे हिन्दू कहते हैं और दोस्त बनाओ मुस्लिम को और करो इनकी सेवा. वँही ऐसे मुस्लिम कहते हैं और बनाओ हिन्दू को दोस्त और इनकी खिदमत. यानि कट्टरता हर जगह है, कंही कम कंहीं ज़्यादा. कट्टरत कट्टरता को देख कर और बढती है और रहमत को देख कर कम होती है. मानसिकता बदलने में दशकों लगते है। जितना वक़्त ज़हर बोन में लगता है, कम से कम उतना तो ज़हर निकालने में भी लगेगा। 4 दिन खिदमते खलक में लगा के सदियों का हर्जाना चाहना गलत है।
राजनीती और चुनाव: गुजरात में 2002 में नरसंहार होता है. इसकी बुनियाद पर सरकार बनती है. सरकार सालों तक दोषियों को बचाती है और माइनॉरिटी को दबाती है. इसे ही गुजरात मॉडल कहा गया. इसे विकास नाम के रैपर में भी लपेटा गया. इसी के सहारे गुजरात से दो लोग सेंटर में सरकार बनाने के लिए आये. देश भर में आईटी सेल बनाकर नफरत को आम किया जाने लगा. इसके बाद सबसे पहले प्रयोग यूपी के मुज़फ्फरनगर में हुआ. 2013 में शाह जी को यूपी की कामन दी गयी. गुजरात मॉडल लागु किया गया और दंगे भड़काए गए. माइनॉरिटी का हद से ज़्यादा नुक्सान हुआ. अंदर ही अन्दर मुज़फ्फरनगर को बुनियाद बना कर हिंदुत्व वोट मज़बूत किया जाता रहा. इस वक़्त तक दिल्ली से लेके यूपी और सेंटर तक सेक्युलर पार्टियों की सरकारें थी. इस नफरत के सहारे 2014 में कट्टर पार्टी की सरकार आई और देखते ही देखते फिर देश भर में हिंदुत्व की चपेट में आता चला गया. बीजेपी का वोट शेयर हर बार बढ़ता जा रहा है. लोगों का दिमाग इस कदर नफरत से भर दिया गया की हर जगह हिन्दू मुस्लिम मुद्दों पर ही चुनाव जीतने लगे. इसका असर दूसरी सेक्युलर पार्टी पर भी हुआ. उन्होंने भी हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया. खुल कर न सही, छुपे ढंग से हर पार्टी हिंदुत्व विचारधारा का समर्थन करने लगी.दिल्ली में माइनॉरिटी को लगा की अपनी सरकार चुन ली है मगर शाहीन बाग़ पर और 2020 के दंगों में यह सेक्युलर पार्टी भी खामोश रही. दिल्ली दंगों से साफ़ है कि अगर देश की राजधानी में दंगे किये जा सकते है तो कंही भी किये जा सकते है. अब कोई पार्टी नहीं चाहते की मुस्लिम के चक्कर में उनका हिन्दू वोट कटे. क्योंकि नफरत इतनी बढ़ चूकी है कि मुस्लिम समर्थन को अब हिन्दू अक्सरियत बर्दाश्त नहीं करती. अभी इनका एक तिहाई से भी ज़्यादा बेस वोट बन चूका है. जब ये 50% क्रोस हो जायगा तो सोचिये ये यंहा क्या नहीं कर सकते? अपने मंसूबों पर वो लगभग 100 साल से काम कर रहे है। अब बहुत तेज़ी आ गयी है. हिदू राष्ट् और राम राज्य का मक़सद 2025 तक पाने का है फिलहाल। इनके पास दशकों प्लान है। जल्दी से ये सरकार जाने वाली भी नहीं है. मोदी जी के बाद योगी जी तैयार किये जा चुके हैं. सभी संस्थाएं धवस्त की जा चूकी है. मिडिया ख़रीदा जा चूका है. हारने के बाद ये दुसरो की सरकार तोड़ देते हैं या खरीद लेते हाँ. नोटबन्दी, GST,लॉकडाउन जैसे फैसलों से नारज़गी के बाद भी जनता का नशा नहीं टूट रहा. अगली बार हम गैर भाजपा पार्टियों का समर्थन कर के गैर भाजपाइ सरकार बना भी देते है तो भी संघी मशीनरी चालू है, वो फिर से एन्टी इनकंबेंसी और प्रोपगंडा के सहारे पावर में लौट आएंगे क्योंकि यह खुद को धर्मरक्षक साबित कर चुके हैं. असल में EVM हैक नहीं हुई है, लोगों के दिमाग हैक हो चुके है. न जाने यह बात लोगों को क्यों नहीं समझ आ रही.
एंटी मुस्लिम प्रोपगंडा: दंगे और नरसंहार में फर्क होता है. दंगे दो तरफ़ा होते हैं और नरसंहार एक तरफ़ा. दुनिया के हर जनोसाइड के पीछे एक ही स्ट्रेटेजी काम कर रही होती है जिसमे बड़ी आबादी को ये बताया जाता है कि फला क़ौम आपके संसाधन खा रही है. बहुसंख्यकों के दिलों में ये बिठा दिया जाता है कि अल्पसंख्यक दीमक है. असल में ये सैकोलोजीकल डर्टी गेम्स है जिसमें सबकोंश्य्स लेवल पर ज़हर भरा जाता है. . ये नरसंहार सिर्फ छूट देने और भड़काने भर से ही नहीं हुए थे. बल्कि दशकों से भरी गयी नफरत का ज़हर और लावा बाहर निकल आता है. थोडा सा भडकाने भर से ही लोग आक्रामक और हिंसक हो जाते हैं. हर नरसंहार और दगा दिलो में सालों से देहक रहे ज्वालामुखी को फाड़ देता है. भारत में भी यही हो रहा है. मीडिया और सोशल मिडिया के ज़रिये हर चीज़ के लिए आज हमें दोषी ठहरा दिया जाता है. एक मुस्लिम चेहरे की तलाश होती है और उस पर दोष मढ़ दिया जाता है. कोई अपराधी मुस्लिम निकल आये तो उसे दिखाया जाता है कि जैसे वो हमार एकलौता नुमाइंदा है. लोगो के दिलो में बिठा दिया गया है की मुस्लिम ऐसे ही होते हैं और ये इसी के लायक है। दशकों से इनका प्रोपोगंडा चालू था और अब उरूज पर है। मुस्लिम और इस्लाम की हर बात से इन्हें नफरत हो चूकी है. आज किताबों से इतिहास, जगह के नाम बदलना चालू है। मुस्लिम तुष्टिकरण प्रोपेगंडा, गौ के नाम पर हिंसा, लीनचिंग से होते हुए हज सब्सिडी, ट्रिपल तलाक़, 370 ख़तम करते हुए बाबरी पर राममन्दिर बनाने तक पहुंच गए है। मथुरा कशी के अलावा देश की हर बड़ी मस्जिद या मुस्लिम इमारत इनकी नज़र पर है. लव जिहाद, थूक जिहाद, लैंड जिहाद, UPSC जिहाद वगैरह अलग से चालु है. Uniform Civil Code, Population Control Bill पर भी काम चालू है, दूसरी तरफ CAA के बाद अभी NPR, NRC बाकी है। 4 शादियां बंद, मदरसा बंद, बुर्का बंद, क़ुरबानी बंद, लाउडस्पीकर बंद, अज़ान बंद, टोपी-दाढ़ी बंद, सड़कों पर नमाज़ बंद, मीट पर रोकटोक, आदि। लिस्ट बहुत लंबी है। उनके प्लान खत्म नही होंगे।। इनमें से कुछ चीज़ें तो वैसे हमे ही सुधार लेनी चाहिए थी. इसके अलावा मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे जामिया,अलीगढ, यंहा तक कि बनने जा रही जोहर यूनिवर्सिटी पर हमले हुए. शाहीन बाग़ को भी घेरा गया. इन्हें ऐसे बदनाम किया गया जैसे ये भारत विरोधी हो. हिंदुस्तान मेंगलियों सडको पर दौड़ा कर मारा पीटा जा रहा है. हमारे नागरिकता और नागरिक अधिकार और वोटिंग राईट तक पर तलवार लटक रही है.
हमारा रिएक्शन: शाहीन बाग़, नुपुर शर्मा, वसीम रिज़वी, एक्स मुस्लिम जैसे कई मुद्दे भले ऊपर से ऐसे लगे जैसे उनमें हमें जीत मिल गयी हो मगर बहुसंख्यक समाज में इन्होने घृणा की खाई को और ज़्यादा गहरा किया है, भले ही अभी ये लोगों को दिखे न. वक़्त आने पर इसके रिजल्ट सामने आ जायंगे. विरोध करने का हमे हक़ है मगर विरोधों में कुछ हमारी कमी भी रही. हमने अपने विरोध को मज़हब के रंग से रंग दिया. इससे सेक्युलर लोग अलग हो गए हमसे. ऐसे विरोध टेम्पररी रिलीफ तो देगा पर परेशानी का बुनियादी हल नहीं दे पाएगा। ऐसे मामलों में हमार जज्बात और बिना सोचा समझा विरोध हमें और गर्त में ले जाता है. अगर हंगामा खड़ा करने से आपका और ज़्यादा नुकसान हो रहा है तो हंगामा खड़ा न करे बल्कि दूसरे दुनियावी तरीके ईस्तमाल करे। इग्नोर करे, बॉयकॉट करे, कोर्ट केस लड़े आदि. इसलिए विरोध (Protest) के तरीके दुरुस्त करिए। दूसरी बात हमारी परेशानी का मुकम्मल इलाज यक़ीनन राजनीति में भी नहीं है. सेक्युलर पार्टिया अगर सरकार बना भी लेती है तो भी वो सॉफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलेगी क्योंकि जनता की मागं यही है. मुस्लिम पार्टिया खडी करने से तो हिंदुत्व को और फायदा होता है क्योंकि इससे पोलोरोइज़ेशन बहुत आसान हो जाता है. जैसे न्यूज़ चैनल पर मुस्लिम पक्ष लेने वाला कोई हो तो डिबेट पूरी हिदुत्व का एजेंडे को फायदा पहुचाने लगती है. इसलिए मुसलमान इसका इलाज रद्दे अमल (reaction) में ढूढं रहे है अमल (action)में नही। रद्दे अमल फौरी तौर पर तो फायदा दे सकता है पर हमेशा के लिए हल अमल ही है। दमदार क़ौमे सदियों तक का प्लान करके रखती है। हमारे पास कोई प्लान नहीं है.
रद्दे अमल: दंगे, लव जिहाद, गौहत्या, लीनचिंग, हज सब्सिडी, ट्रिपल तलाक़, 370, बाबरी मस्जिद, CAA, NPR, NRC आप देख चुके। समान कानून सहितां, जनसंख्या नियंत्रण, मदरसा बंद, बुर्का बंद, बकरा ईद बंद, बड़े का गोश्त बंद, अज़ान बंद, टोपी-दाढ़ी बंद जैसे प्लान भी चालू है।
आप चाहे लाख मुख़ालफ़त करलो या अपनी पार्टी बना लो या अपनी हुक़ूमत ही बना लो (जो अब होना लगभग नामुमकिन है) पर अल्लाह के आज़ाब को नही रोक सकते। इसकी कई शक्लें हो सकती है परेशानियां, ज़ुल्म, ज़िल्लत, तबाही या कुछ और, जो दिन ब दिन पुरी दुनीया में हमारे लिए बढ़ती ही जा रही है।
हम कंही फिरकेबाज़ी की क़तलों ग़ारत में फंसे है, कंही दहशतगर्दी में, कंही सिविल वॉर में, कंही जंगों में, कंही मुल्क़ छोड़ने को मजबूर है, कंही देश निकाला दिया जा रहा है, कंही हम पर तरह तरह के बैन लग रहे है, कंही हम क़ुदरती कहर में मर रहे है और कंही हमें सड़को पर दौड़ा दौड़ा की पीटा जा रहा है।
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Maulan Wahiddudin Khan's Approach
Maulan Wahiddudin Khan Sahab was a true Daee. Majority of Muslim scholars are not Daee. A Daee sees the whole world specially the situation, position and hardships of Muslims as per Quran and Allah's laws regarding delivering his message to different communities. A Daee stays closer to his Maduu, the more tyrant they are, the closer he tries to be with them to deliver the message. Muslims have neither understood Maulana nor the laws of Dawah. Allah's given responsibility, his warnings and his Azaab need to be understood by the Ummah, which seems difficult as today's Muslims are just name sake. Sitting with a tyrant, having discussions with him or them is not supporting them at all. If it were so then Prophet would not have always tried to approach or start discussions with Abu Jahal, Abu Lahab, Abu Sufiyan and their allies. When it was made clear by Allah to him that now leave them be on their path, only then the Prophet left them. In no case now, Allah talks to Muslims as he did with Prophets, so there is no question arises of knowing the final decision of Allah about such pepole. It's all about delivering the message. Many Daee today try to approach the upper hierarchy of extreme forces to deliver the message. But in common Muslims eyes they are Sanghi Muslims. Such a lack of ignorance of these people about Islam and Dawah field. With regard to criticising people who are facing any kind of calamities or destruction, Islam teaches to introspect and decide whether this is because of Allah's anger or not. If a leaf cannot move without Allah's command, then why Muslims are being punished or pushing back to the wall everywhere. Not for everything, Sanghi or Zionist are responsible. Muslims themselves are also the reason in most of the cases. Allah punishes them who are not his ways but claim. In Ummah, most of the Muslims do several injustices, sins in their life with their own people and with others as well. Then why Muslims support each other directly or indirectly. We are not prophets, how hard we try we can't do Dawah like him. Sangh is not the only reason or responsible for today scenario. Muslims have not done what they should be doing. Muslims are also a reason and responsible. What can be praised about Sangh should be praised. What can't, shouldn't. Similarly, what can be criticized about Muslims should be. It's a simple rule. It cannot be applied only to sangh, muslims are not above it. I know his stand about Babri. He was right. Because of people who objected to it, Bjp grew from 2 to 300, and we are on the edge of losing thousands of mosques. If Babri issue would have been solved on the table with both sides sitting, we will not be seeing these days most likely. But Muslims leaders had to do their politics. Muslims neither understand quran or seerah properly. Prophet had left the biggest mosque on the earth, Kaba to Mushriks, when both sides claiming they own that. When the right times came, mosque was taken back by muslims from mushriks. That is the power of delivering the message of islam, after which masses come to your side. They demanded 3 mosques so giving them 3 at that time would not be that much loss as you today have of losing every big mosque of every city which is in thousand of numbers. Just wait you may lose all of them if still you don't come back to ways of Quran and Sunnah, leaving political ways and fulfill your responsibilities through Dawah and real presentation of Islam. It's Allah who elevates you or vanishes you. Nothing happens without his will. Every knowledgeable man of Islam knew that so called Muslims political leaders at that time were making mistakes and due to their wrong decisions, the opponenets would go from 2 to making govt one day. People try to get solutions by purely political actions and not by what solutions the Quran and Seerah give about such problems and situations. Part of Babari land was under Non-Muslims occupation at that time as was Kaba also. If leaving a mosque were a sin, Prophet would not have left Kaba and Mecca. Sulah hubadiya, when muslims would have thrown the rule of Mushrik from the Mecca easily but the Prophet returned to Medina that too with a treaty in which Mushrik had dominant side. Because Allah and Rasul knew what it meant. Resulting the whole of Arab coming into islam so soon and after that Kaba got back from them. Regarding, Maulana's books about islamophabes, his literature is full of responses, what muslims should do as per Islam when someone does blasphemy. Not always a book is written targeting another book. Raising questions over him, how many books have you written against these or any islamophobe. Writing is RSS book is not a sin, that may be part of strategy for Dawah for sure. It's so simple thing to understand. You said our Prophet never endorsed any point of Mushrik is wrong. What you think he supported RSS is not like that.

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